लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 431–440

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ),

गुरुस्तुष्टो दहत्येवं पापं तन्मन्त्रतेजसा ।

ब्रह्मा हरिस्तथा रुद्रो देवाश्च मुनयस्तथा ॥ १७३

कुर्वन्त्यनुग्रहं तुष्टा गुरौ तुष्टे न संशयः ।

कर्मणा मनसा वाचा गुरोः क्रोधं न कारयेत् ॥ १७४

तस्य क्रोधेन दह्यन्ते आयुः श्रीर्ज्ञानसत्क्रियाः ।

तत्क्रोधं ये करिष्यन्ति तेषां यज्ञाश्च निष्फलाः ॥ १७५

जपान्यनियमाश्चैव नात्र कार्या विचारणा ।

गुरोर्विरुद्धं यद्वाक्यं न वदेत्सर्वयत्नतः ॥१७६

वदेद्यदि महामोहाद्रौरवं नरकं व्रजेत् ।

चित्तेनैव च वित्तेन तथा वाचा च सुव्रताः * ॥ १७७

मिथ्या न कारयेद्देवि क्रियया च गुरोः सदा ।

दुर्गुणे ख्यापिते तस्य नैर्गुण्यशतभाग्भवेत् ॥ १७८

गुणे तु ख्यापिते तस्य सार्वगुण्यफलं भवेत् ।

गुरोर्हितं प्रियं कुर्यादादिष्टो वा न वा सदा ॥ १७ ९

असमक्षं समक्षं वा गुरोः कार्यं समाचरेत् ।

गुरोर्हितं प्रियं कुर्यान्मनोवाक्कायकर्मभिः ॥ १८०

कुर्वन् पतत्यधो गत्वा तत्रैव परिवर्तते ।

तस्मात्स सर्वदोपास्यो वन्दनीयश्च सर्वदा ॥ १८१

समीपस्थोऽप्यनुज्ञाप्य वदेत्तद्विमुखो गुरुम् ।

एवमाचारवान् भक्तो नित्यं जपपरायणः ॥ १८२

गुरुप्रियकरो मन्त्रं विनियोक्तुं ततोऽर्हति ।

विनियोगं प्रवक्ष्यामि सिद्धमन्त्रप्रयोजनम् ॥ १८३

दौर्बल्यं याति तन्मन्त्रं विनियोगमजानतः ।

यस्य येन वियुञ्जीत कार्येण तु विशेषतः ॥ १८४

विनियोगः स विज्ञेय ऐहिकामुष्मिकं फलम् ।

विनियोगजमायुष्यमारोग्यं तनुनित्यता ॥ १८५

राज्यैश्वर्यं च विज्ञानं स्वर्गो निर्वाण एव च ।

प्रोक्षणं चाभिषेकं च अघमर्षणमेव च ॥ १८६

* सुव्रताः — यह सम्बोधन सूतजीद्वारा ऋषियोंके लिये प्रयुक्त है जपविधान तथा उसकी महिमा 6 हुए गुरु अपने मन्त्रके तेजसे कर देते हैं ॥ १६८–१७२१ / २ गुरुके प्रसन्न रहनेपर देवता तथा मुनि भी [ उस कृपा करते हैं; इसमें सन्देह ४२ ९ [ शिष्यके ] पापको भस्म ॥ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सभी व्यक्तिपर ] प्रसन्न होकर नहीं है । मन, वचन तथा कर्मसे गुरुको क्रोधित नहीं करना चाहिये; उनके क्रोधसे आयु, लक्ष्मी ( वैभव ), ज्ञान और सत्कर्म दग्ध हो जाते हैं । जो लोग उन्हें कुपित करते हैं, उनके यज्ञ, जप तथा अन्य अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥१७३ – १७५१/२ ॥ पूर्ण प्रयत्नपूर्वक गुरुके विरुद्ध कुछ भी वचन नहीं बोलना चाहिए; यदि कोई अज्ञानवश ऐसा बोलता है, तो वह रौरव नरकमें पड़ता है । हे देवि! मन, धन, वचन तथा कर्मसे गुरुको कभी झूठा सिद्ध नहीं करना चाहिये । उनका दुर्गुण कहनेपर व्यक्ति सौ दुर्गुणोंसे युक्त हो जाता है और उनका गुण कहनेपर सभी गुणोंका फल मिलता । है । गुरुने आदेश दिया हो अथवा नहीं, सर्वदा उनका हित तथा प्रिय करना चाहिये; गुरु सामने हों अथवा परोक्षमें हों, उनका कार्य करना चाहिये । मन, वचन, शरीर तथा कर्मसे गुरुका हित तथा प्रिय करना चाहिये । ऐसा न करनेवाला नरकमें गिरता है और वहाँ जाकर वहीं पर विचरण करता रहता है । अतः सर्वदा उनकी उपासना तथा वन्दना करनी चाहिये । पास रहते हुए भी गुरुसे आज्ञा । लेकर तथा उनकी ओर मुख न करके बोलना चाहिये । ऐसा आचारवान्, भक्ति - सम्पन्न, नित्य जप करनेवाला तथा गुरुका प्रिय करनेवाला [ शिष्य ] इस मन्त्रका विनियोग करनेके योग्य होता है ॥ १७६–१८२ / २ ॥ [ हे देवि! ] अब मैं सिद्धमन्त्रके प्रयोजनस्वरूप | विनियोगको बताऊँगा; विनियोग न जाननेवालेका वह मन्त्र प्रभावहीन हो जाता है । जिसका जिस कार्यके साथ विशेष रूपसे संयोजन किया जाय, उसे विनियोग कहा गया है । यह इस लोकमें तथा परलोकमें फल प्रदान करता है । विनियोगसे आयु, आरोग्य, शरीरकी नित्यता, | राज्य, ऐश्वर्य, उत्तम ज्ञान, स्वर्ग तथा मोक्ष — ये सब ।

पृष्ठ 432

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४३० स्नाने च सन्ध्ययोश्चैव कुर्यादेकादशेन वै शुचिः पर्वतमारुह्य जपेल्लक्षमतन्द्रितः 969696969696969696969696969696969696 महानद्यां द्विलक्षं तु दीर्घमायुरवाप्नुयात् । दूर्वाङ्कुरास्तिला वाणी गुडूची घुटिका तथा तेषां तु दशसाहस्त्रं होममायुष्यवर्धनम् । अश्वत्थ वृक्षमाश्रित्य जपेल्लक्षद्वयं सुधीः

शनैश्चरदिने स्पृष्ट्वा दीर्घायुष्यं लभेन्नरः ।

शनैश्चरदिनेऽश्वत्थं पाणिभ्यां संस्पृशेत्सुधीः ॥

जपेदष्टोत्तरशतं सोऽपमृत्युहरो भवेत् ।

आदित्याभिमुखो भूत्वा जपेल्लक्षमनन्यधीः ॥

अर्कैरष्टशतं नित्यं जुह्वन् व्याधेर्विमुच्यते ।

समस्तव्याधिशान्त्यर्थं पलाशसमिधैर्नरः ॥

हुत्वा दशसहस्त्रं तु निरोगी मनुजो भवेत् ।

नित्यमष्टशतं जप्त्वा पिबेदम्भोऽर्कसन्निधौ ॥

औदर्यैर्व्याधिभिः सर्वैर्मासेनैकेन मुच्यते । एकादशेन भुञ्जीयादन्नं चैवाभिमन्त्रितम् ।

भक्ष्यं चान्यत्तथा पेयं विषमप्यमृतं भवेत् ।

जपेल्लक्षं तु पूर्वाह्ने हुत्वा चाष्टशतेन वै ॥

सूर्यं नित्यमुपस्थाय सम्यगारोग्यमाप्नुयात् ।

नदीतोयेन सम्पूर्णं घटं संस्पृश्य शोभनम् ॥

जप्त्वायुतं च तत्स्नानाद्रोगाणां भेषजं भवेत् ।

अष्टाविंशज्जपित्वान्नमश्नीयादन्वहं शुचिः ॥

हुत्वा च तावत्पालाशैरेवं वारोग्यमश्नुते ।

चन्द्रसूर्यग्रहे पूर्वमुपोष्य विधिना शुचिः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । प्राप्त होते हैं ॥ १८३ – १८५१२ ॥ ॥ १८७ स्नानमें तथा [ प्रातः - सायं ] दोनों सन्ध्याओं | ग्यारह बार पंचाक्षरमन्त्रसे प्रोक्षण, अभिषेक तथा अघमर्षण में करना चाहिए । जो शुद्ध होकर पर्वतपर चढ़कर ॥ १८८ आलस्यरहित हो एक लाख बार मन्त्रका जप करता है अथवा किसी महानदीके तटपर दो है, वह दीर्घ आयु प्राप्त करता ॥ १८ ९ दूर्वांकुर, तिल, वाणी, गुरुच दस हजार होम आयुकी वृद्धि बुद्धिमान्को चाहिये कि पीपलके १ ९ ० । दो लाख जप करे । शनिवारको लाख बार जप करता । १८६-१८७९ २ ॥ और घुटिका – इनका करनेवाला होता है । वृक्षका आश्रय लेकर पीपल वृक्षका स्पर्श करके मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है । बुद्धिमान्‌को शनैश्चरके दिन [ अपने ] दोनों हाथोंसे पीपलके वृक्षका १ ९९ | स्पर्श करना चाहिये और एक सौ आठ बार [ मन्त्रका ] जप करना चाहिये; यह भी अकाल मृत्युको दूर करनेवाला होता है॥१८८–१९ ०२ ॥ १ ९ २ सूर्यकी ओर मुख करके एकाग्रचित्त होकर एक लाख जप करना चाहिये; अर्ककी समिधाओंसे प्रतिदिन एक सौ आठ होम करनेवाला [ व्यक्ति ] रोगसे मुक्त १ ९ ३ । जाता है । मनुष्यको समस्त रोगोंके शमनके लिये पलाश - समिधाओंसे होम करना चाहिये; इससे दस हजार होम करके मनुष्य रोगरहित हो जाता है । प्रतिदिन १ ९ ४ | एक सौ आठ बार जप करके सूर्यके समक्ष जल पीना चाहिये; ऐसा करनेवाला एक महीनेमें ही सभी उदर-सम्बन्धी रोगों मुक्त हो जाता है ॥ १ ९ १ – १ ९ ३२ ॥ १ ९ ५ ग्यारह बार मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके अन्न तथा अन्य भक्ष्य - पेय पदार्थ ग्रहण करना चाहिये; इससे विष भी अमृत हो जाता है । प्रतिदिन पूर्वाह्नमें एक सौ आठ १ ९ ६ आहुति देकर तथा सूर्योपस्थान करके एक लाख जप करना चाहिये; ऐसा करनेवाला पूर्ण आरोग्य प्राप्त करता है । नदीके जलसे भरे हुए सुन्दर घड़ेको स्पर्श करते हुए दस १ ९ ७ हजार जप करने से तथा उसी जलसे स्नान करनेसे सभी रोगोंकी चिकित्सा हो जाती है ॥१ ९४–१९ ६२ 11 पवित्र होकर प्रतिदिन अट्ठाईस बार [ मन्त्रका ] १ ९ ८ | जप करके अन्न ग्रहण करना चाहिये और बादमें उतनी

पृष्ठ 433

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ),

यावद्ग्रहणमोक्षं तु तावन्नद्यां समाहितः ।

जपेत्समुद्रगामिन्यां विमोक्षे ग्रहणस्य तु ॥ १ ९९

अष्टोत्तरसहस्त्रेण पिबेद् ब्राह्मीरसं द्विजाः ।

ऐहिकां लभते मेधां सर्वशास्त्रधरां शुभाम् ॥ २००

सारस्वती भवेद्देवी तस्य वागतिमानुषी ।

ग्रहनक्षत्रपीडासु जपेद्भक्त्यायुतं नरः ॥ २०१

हुत्वा चाष्टसहस्त्रं तु ग्रहपीडां व्यपोहति ।

दुःस्वप्नदर्शने स्नात्वा जपेद्वै चायुतं नरः ॥ २०२

घृतेनाष्टशतं हुत्वा सद्यः शान्तिर्भविष्यति ।

चन्द्रसूर्यग्रहे लिङ्गं समभ्यर्च्य यथाविधि ॥ २०३

यत्किञ्चित्प्रार्थयेद्देवि जपेदयुतमादरात् ।

सन्निधावस्य देवस्य शुचिः संयतमानसः ॥ २०४

सर्वान् कामानवाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ।

गजानां तुरगाणां तु गोजातीनां विशेषतः ॥ २०५

व्याध्यागमे शुचिर्भूत्वा जुहुयात्समिधाहुतिम् ।

मासमभ्यर्च्य विधिनायुतं भक्तिसमन्वितः ॥ २०६

तेषामृद्धिश्च शान्तिश्च भविष्यति न संशयः ।

उत्पाते शत्रुबाधायां जुहुयादयुतं शुचिः ॥ २०७

पालाशसमिधैर्देवि तस्य शान्तिर्भविष्यति ।

आभिचारिकबाधायामेतद्देवि समाचरेत् ॥ २०८

प्रत्यग् भवति तच्छक्तिः शत्रोः पीडा भविष्यति ।

विद्वेषणार्थं जुहुयाद् वैभीतसमिधाष्टकम् ॥ २० ९

अक्षरप्रातिलोम्येन आर्द्रेण रुधिरेण वा ।

विषेण रुधिराभ्यक्तो विद्वेषणकरं नृणाम् ॥ २१०

जपविधान तथा उसकी महिमा ४३१ ही पलाश - समिधाओंसे हवन करनेसे [ व्यक्ति ] आरोग्य प्राप्त करता है । चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके अवसरपर पवित्र होकर विधिपूर्वक उपवास करके जबतक ग्रहणका | मोक्ष हो, तबतक किसी समुद्रगामिनी नदीमें एकाग्रचित्त होकर जप करना चाहिये और हे द्विजो! ग्रहणके समाप्त होनेपर एक हजार आठ मन्त्रका जप करके ब्राह्मीरसका पान करना चाहिये । ऐसा करनेवाला सभी शास्त्रोंको धारण करनेवाली कल्याणमयी लौकिक प्रतिभा प्राप्त करता | है और उसकी वाणी अतिमानुषी होकर देवी सरस्वतीकी वाणीके तुल्य हो जाती है ॥ १ ९ ७ – २००१/२ ॥ ग्रह तथा नक्षत्रके कारण कष्ट होनेपर मनुष्य भक्तिपूर्वक दस हजार जप करके तथा आठ हजार आहुति देकर ग्रहपीड़ासे मुक्त हो जाता । दुःस्वप्न | देखनेपर स्नान करके मनुष्यको दस हजार जप करना चाहिये; इसके बाद घृतकी एक सौ आठ आहुति देनेसे उसे शीघ्र ही शान्ति प्राप्त होगी ॥ २०१ - २०२१ / २ ॥ चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके समय विधिपूर्वक लिङ्गका पूजन करके शुद्ध तथा एकाग्रचित्त होकर इन महादेवके समीप आदरपूर्वक दस हजार जप करना चाहिये; हे देवि! वह मनुष्य जो कुछ भी माँगता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २०३ - २०४१ / २ ॥ हाथियों, घोड़ों तथा विशेषकर गोजातिके पशुओंमें रोग उत्पन्न होनेपर शुद्ध होकर तथा भक्तियुक्त होकर विधिपूर्वक महीनेभर पूजन करके समिधाकी दस हजार आहुति देनेसे उन पशुओंके रोगकी शान्ति तथा उनकी वृद्धि होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २०५ - २०६१ / २ ॥ हे देवि! उपद्रव तथा शत्रुबाधा उत्पन्न होनेपर जो [ व्यक्ति ] पवित्र होकर पलाशकी समिधाओंसे दस हजार होम करता है; उसकी शान्ति होती है । हे देवि! आभिचारिक बाधामें भी ऐसा ही करना चाहिये; ऐसा करनेसे उसकी शक्ति प्रकट होती है और शत्रुको पीड़ा उत्पन्न होती है । विद्वेषणके लिये बहेड़ेकी समिधाओंसे आठ आहुति डालनी चाहिये; अथवा रुधिरसे स्नान | करके विपरीत अक्षरसे मन्त्रका जप करते हुए गीले

पृष्ठ 434

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४३२

प्रायश्चित्तं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविशुद्धये ।

पापशुद्धिर्यथा सम्यक् कर्तुमभ्युद्यतो नरः ॥

पापशुद्धिर्यतः सम्यग् ज्ञानसम्पत्तिहैतुकी ।

पापशुद्धिर्न चेत्पुंसः क्रियाः सर्वाश्च निष्फलाः ॥

ज्ञानं च हीयते तस्मात्कर्तव्यं पापशोधनम् ।

विद्यालक्ष्मीविशुद्ध्यर्थं मां ध्यात्वाञ्जलिना शुभे ॥

शिवेनैकादशेनाद्भिरभिषिञ्चेत्समन्ततः 1 अष्टोत्तरशतेनैव स्नायात्पापविशुद्धये ॥

सर्वतीर्थफलं तच्च सर्वपापहरं शुभम् ।

सन्ध्योपासनविच्छेदे जपेदष्टशतं नरः ॥

विड्वराहैश्च चाण्डालैर्दुर्जनैः कुक्कुटैरपि ।

स्पृष्टमन्नं न भुञ्जीत भुक्त्वा चाष्टशतं जपेत् ॥

ब्रह्महत्याविशुद्ध्यर्थं जपेल्लक्षायुतं नरः ।

पातकानां तदर्थं स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥

उपपातकदुष्टानां तदर्धं परिकीर्तितम् ।

शेषाणामपि पापानां जपेत्पञ्चसहस्रकम् ॥

आत्मबोधपरं गुह्यं शिवबोधप्रकाशकम् ।

शिवः स्यात्स जपेन्मन्त्रं पञ्चलक्षमनाकुलः ॥

पञ्चवायुजयं भद्रे प्राप्नोति मनुजः सुखम् ।

जपेच्च पञ्चलक्षं तु विगृहीतेन्द्रियः शुचिः ॥

पञ्चेन्द्रियाणां विजयो भविष्यति वरानने ।

ध्यानयुक्तो जपेद्यस्तु पञ्चलक्षमनाकुलः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग | रक्तसे या विषसे होम करना चाहिये; यह मनुष्यों २११ लिये विद्वेषणकारी है ॥ २०७–२१० ॥ के [ हे देवि! ] अब मैं समस्त पापोंसे शुद्धिके लिये । प्रायश्चित्तका वर्णन करूँगा । मनुष्यको पापशुद्धि करनेहेतु २१२ | पूर्णरूपसे प्रयत्नशील होना चाहिये; क्योंकि सम्यक् पापशुद्धि ज्ञान - सम्पदाका मूल कारण होती है । यदि पापशुद्धि नहीं होती है, तो मनुष्यकी सभी क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं २१३ और उसका ज्ञान क्षीण होता रहता है, इसलिये पापका शोधन [ अवश्य ] करना चाहिये ॥ २११-२१२३ ॥ हे शुभे! विद्या तथा लक्ष्मीकी विशुद्धिके लिये २१४ अंजलिमें जल लेकर मेरा ध्यान करके ग्यारह बार शिव - मन्त्रका जप करके उस जलसे अभिषेक करना चाहिये । पाप - शोधनके लिये एक सौ आठ बार मन्त्रका २१५ जप करके स्नान करना चाहिये; यह सभी तीर्थोंका फल देनेवाला, सभी पापोंको दूर करनेवाला तथा कल्याणकारक है । सन्ध्योपासन बार मन्त्रका जप २१६ तथा कुक्कुटका चाहिये और खा करना चाहिये ॥ २१७ छूट जानेपर मनुष्यको एक सौ आठ करना चाहिये । सुअर, चाण्डाल, दुर्जन स्पर्श किया हुआ अन्न नहीं खाना लेनेपर एक सौ आठ बार मन्त्रका जप २१३–२१६ ॥ ब्रह्महत्याके शोधनके लिये मनुष्यको सौ हजार | करोड़ बार मन्त्रका जप करना चाहिये, अन्य बड़े पापोंके शोधनके लिये उसका आधा जप होना चाहिये; २१८ इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । उपपातक शोधनके लिये उसका आधा जप करना बताया गया है । शेष [ छोटे ] पापोंकी शुद्धिके लिये भी पाँच हजार बार २१ ९ मन्त्रको जपना चाहिये॥२१७-२१८ ॥ जो शान्त होकर आत्मबोध करानेवाले, गोपनीय | तथा शिवज्ञानको प्रकाशित करनेवाले इस मन्त्रका पाँच २२० लाख जप करता है, वह [ साक्षात् ] शिव हो जाता है और हे भद्रे! वह मनुष्य सुखपूर्वक पाँचों वायुपर विजय प्राप्त कर लेता है । हे सुमुखि! जो शुद्ध होकर इन्द्रियोंको २२१ | वशमें करके पाँच लाख मन्त्र जप करता है, वह पाँचों

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ), ** ££££ ***

विषयाणां च पञ्चानां जयं प्राप्नोति मानवः ।

चतुर्थं पञ्चलक्षं तु यो जपेद्भक्तिसंयुतः ॥ २२२

भूतानामिह पञ्चानां विजयं मनुजो लभेत् ।

चतुर्लक्षं जपेद्यस्तु मनः संयम्य यत्नतः ॥२२३

सम्यग्विजयमाप्नोति करणानां वरानने ।

पञ्चविंशतिलक्षाणां जपेन कमलानने ॥ २२४

पञ्चविंशतितत्त्वानां विजयं मनुजो लभेत् ।

मध्यरात्रेति निर्वाते जपेदयुतमादरात् ॥ २२५

ब्रह्मसिद्धिमवाप्नोति व्रतेनानेन सुन्दरि ।

जपेल्लक्षमनालस्यो निर्वाते ध्वनिवर्जिते ॥ २२६

मध्यरात्रे च शिवयो: पश्यत्येव न संशयः ।

अन्धकारविनाशश्च दीपस्येव प्रकाशनम् ॥ २२७

हृदयान्तर्बहिर्वापि भविष्यति न संशयः ।

सर्वसम्पत्समृद्ध्यर्थं जपेदयुतमात्मवान् ॥ २२८

सबीजसम्पुटं मन्त्रं शतलक्षं जपेच्छुचिः ।

मत्सायुज्यमवाप्नोति भक्तिमान् किमतः परम् ॥ २२ ९

इति ते सर्वमाख्यातं पञ्चाक्षरविधिक्रमम् ।

यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम् ॥ २३०

श्रावयेच्च द्विजाञ्छुद्धान् पञ्चाक्षरविधिक्रमम् ।

दैवे कर्मणि पित्र्ये वा शिवलोके महीयते ॥ २३१

जपविधान तथा उसकी महिमा ४३३ YEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYEYE 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेता है । जो शान्त होकर | ध्यानमग्न हो पाँच लाख बार मन्त्रका जप करता है, वह पाँचों विषयोंपर विजय प्राप्त करता है । जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर चौथी बार इस मन्त्रको पाँच लाख बार जपता वह इस लोकमें [ पृथ्वी आदि ] पंचभूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ २१ ९ -२२२१२ ॥ हे वरानने! जो [ अपने ] मनको नियन्त्रित करके प्रयत्नपूर्वक चार लाख बार मन्त्रका जप करता है, वह [ मन, बुद्धि आदि ] अन्तःकरणोंपर पूर्णरूपसे विजय प्राप्त कर लेता है । हे कमलमुखि! पचीस लाख बार मन्त्रके जपसे मनुष्य पचीस तत्त्वोंपर विजय प्राप्त कर लेता है । हे सुन्दरि! जो मध्यरात्रिमें वातरहित स्थानमें आदरपूर्वक दस हजार जप करता है, वह इस व्रत द्वारा ब्रह्मसिद्धि प्राप्त कर लेता है । जो [ मनुष्य ] आलस्यरहित होकर मध्यरात्रिमें वातशून्य तथा ध्वनि-रहित स्थानमें एक लाख बार जप करता है, वह शिव तथा पार्वतीका दर्शन कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है । उस समय अन्धकारका विनाश हो जाता है और हृदयके बाहर तथा भीतर दीपककी भाँति प्रकाश हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है । आत्मज्ञको सभी प्रकारकी सम्पदा तथा समृद्धिके लिये मन्त्रका दस हजार जप करना चाहिये । [ हे देवि! ] जो पवित्र तथा भक्तियुक्त होकर बीजके सम्पुटसहित मन्त्रका सौ लाख ( एक करोड़ ) जप करता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेता है; इससे बढ़कर [ फल ] क्या हो सकता है! ॥ २२३ – २२ ९ ॥ [ हे देवि! ] मैंने तुम्हें पंचाक्षरमन्त्रके जपकी सम्पूर्ण विधि बता दी । जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम गति प्राप्त करता है । जो देवकर्म अथवा पितृकर्ममें शुद्ध ब्राह्मणोंको पंचाक्षर विधिके क्रमका श्रवण कराता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त | करता है | २३०-२३१ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाक्षरमाहात्म्यं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥। ८५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘ पंचाक्षरमाहात्म्य ' नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८५ ॥

पृष्ठ 436

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४३४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग छियासीवाँ अध्याय पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ऋषय ऊचुः

जपाच्छ्रेष्ठतमं प्राहुर्ब्राह्मणा दग्धकिल्विषाः ।

विरक्तानां प्रबुद्धानां ध्यानयज्ञं सुशोभनम् ॥

तस्माद्वदस्व सूताद्य ध्यानयज्ञमशेषतः ।

विस्तरात्सर्वयत्नेन विरक्तानां महात्मनाम् ॥

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां दीर्घसत्रिणाम् ।

रुद्रेण कथितं प्राह गुहां प्राप्य महात्मनाम् ॥

संहृत्य कालकूटाख्यं विषं वै विश्वकर्मणा । सूत उवाच गुहां प्राप्य सुखासीनं भवान्या सह शङ्करम् ॥

मुनयः संशितात्मानः प्रणेमुस्तं गुहाश्रयम् ।

अस्तुवंश्च ततः सर्वे नीलकण्ठमुमापतिम् ॥

अत्युग्रं कालकूटाख्यं संहृतं भगवंस्त्वया ।

अतः प्रतिष्ठितं सर्वं त्वया देव वृषध्वज ॥

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भगवान्नीललोहितः ।

प्रहसन् प्राह विश्वात्मा सनन्दनपुरोगमान् ॥

किमनेन द्विजश्रेष्ठा विषं वक्ष्ये सुदारुणम् ।

संहरेत्तद्विषं यस्तु स समर्थो ह्यनेन किम् ॥

न विषं कालकूटाख्यं संसारो विषमुच्यते ।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संहरेत सुदारुणम् ॥

संसारो द्विविधः प्रोक्तः स्वाधिकारानुरूपतः ।

पुंसां सम्मूढचित्तानामसङ्क्षीणः सुदारुणः ॥

ईषणारागदोषेण सर्गे ज्ञानेन सुव्रताः ।

तद्वशादेव सर्वेषां धर्माधर्मौ न संशयः ॥

ऋषिगण बोले- दग्ध पापवाले ब्राह्मणोंने विरक्त ज्ञानियोंके उत्तम ध्यानयज्ञको जपसे श्रेष्ठ कहा है; अत: १ हे सूतजी! अब आप विरक्त महात्माओंके ध्यान विषयमें पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक पूर्णप्रयत्नके साथ [ हमलोगोंको ] बताइये ॥ १-२ ॥ २ दीर्घ कालतक यज्ञ करनेवाले उन ऋषियोंका वचन सुनकर सूतजीने वह सारा वृत्तान्त कहा, जिसे विश्वकी रचना करनेवाले रुद्रने कालकूट नामक ३ विषको निष्क्रिय करके [ मेरुपर्वतकी ] गुफामें आकर महात्माओंको बताया था ॥ ३१/२ ॥ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] गुफामें पहुँचकर पार्वतीके साथ सुखपूर्वक बैठे हुए उन शंकरको ४ महात्मा मुनियोंने प्रणाम किया । उसके बाद उन सभीने गुफामें विराजमान उमापति [ भगवान् ] नीलकण्ठकी स्तुति की और कहा - हे भगवन्! आपने ५ अति भयंकर कालकूट नामक विषको निष्क्रिय कर दिया; अतः हे देव! हे वृषध्वज! आपके द्वारा ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ४–६ ॥ ६ उनका वह वचन सुनकर विश्वात्मा भगवान् नीललोहित सनन्दन आदि [ मुनियों ] - से हँसते हुए कहने ७ लगे - हे श्रेष्ठ द्विजो! यह [ विष ] क्या है! मैं अति भयंकर विषके विषयमें बताऊँगा, जो इस [ कालकूट ] विषको भी निष्क्रिय कर देता है, वह [ परम ] समर्थ है; यह कालकूट ८ विष कौन - सी चीज है । कालकूट नामक विष [ वास्तवमें ] विष नहीं है, बल्कि संसार ही विष कहा जाता है । अतः पूर्ण प्रयत्नसे इस संसाररूपी अत्यन्त भीषण विषको नष्ट ९ करना चाहिये अर्थात् संसारमें मिथ्यात्वका भाव रखना चाहिये ॥ ७ – ९ ॥ १० अपने अधिकारके अनुसार यह संसार दो प्रकारका कहा गया है; मूढचित्तवाले मनुष्योंके लिये यह असंक्षीण ( क्षय न होनेवाला ) तथा अत्यन्त भयंकर है । हे सुव्रतो! ११ | यह सृष्टि इच्छा तथा रागजनित दोषके कारण है; इसका

पृष्ठ 437

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अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४३५

असन्निकृष्टे त्वर्थेऽपि शास्त्रं तच्छ्रवणात्सताम् ।

बुद्धिमुत्पादयत्येव संसारे विदुषां द्विजाः ॥

तस्माद् दृष्टानुश्रविकं दुष्टमित्युभयात्मकम् ।

सन्त्यजेत्सर्वयत्नेन विरक्तः सोऽभिधीयते ॥

शास्त्रमित्युच्यतेऽभागं श्रुतेः कर्मसु तद् द्विजाः ।

मूर्धानं ब्रह्मणः सारं ऋषीणां कर्मणः फलम् ॥

ननु स्वभावः सर्वेषां कामो दृष्टो न चान्यथा ।

श्रुतिः प्रवर्तिका तेषामिति कर्मण्यतद्विदः ॥

निवृत्तिलक्षणो धर्मः समर्थानामिहोच्यते ।

तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम् ॥

कला संशोषमायाति कर्मणान्यस्वभावतः ।

सकलस्त्रिविधो जीवो ज्ञानहीनस्त्वविद्यया ॥

नारकी पापकृत्स्वर्गी पुण्यकृत्पुण्यगौरवात् ।

व्यतिमिश्रेण वै जीवश्चतुर्धा संव्यवस्थितः ॥

उद्भिजः स्वेदजश्चैव अण्डजो वै जरायुजः ।

एवं व्यवस्थितो देही कर्मणाज्ञो ह्यनिर्वृतः ॥

प्रजया कर्मणा मुक्तिर्धनेन च सतां न हि ।

त्यागेनैकेन मुक्तिः स्यात्तदभावाद् भ्रमत्यसौ ॥

एवमज्ञानदोषेण नानाकर्मवशेन च ।

षट्कौशिकं समुद्भूतं भजत्येष कलेवरम् ॥

ज्ञान होनेपर संसार बाधित हो जाता है । उन्हीं ( ईषणा १२ और ज्ञान ) -के वशमें होनेसे ही सभी लोगोंकी धर्म तथा अधर्ममें प्रवृत्ति होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १०-११ ॥ हे ब्राह्मणो! पारलौकिक पदार्थके प्रत्यक्ष न रहनेपर भी शास्त्र के द्वारा उसके विषयमें श्रवण कर १३ लेनेसे उसमें सज्जनों तथा विद्वानोंकी प्रवृत्ति हो जाती है । अतः जो इहलौकिक तथा पारलौकिक – इन दोनों पदार्थोंको हेय समझकर पूर्ण प्रयत्नसे इनका परित्याग १४ कर देता है; वह विरक्त कहा जाता है ॥ १२-१३ ॥ हे द्विजो! श्रुतिप्रतिपादित सकाम कर्मोंमें, जिसमें सबकी प्रवृत्ति है तथा वेदके मस्तकस्वरूप एवं मन्त्र-द्रष्टा ऋषियोंके सारस्वरूप निष्कामकर्मफलको प्रतिपादित १५ करनेवाला जो अध्यात्मशास्त्र है, वही शास्त्र कहा जाता है ॥ १४ ॥

जो श्रुति रहस्यको नहीं जानते हैं, वे ही ऐसा कहते हैं कि चूँकि सभी लोगोंका स्वभाव कामनामूलक १६ दिखायी देता है, अत: श्रुति सकामकर्मकी ही प्रवर्तिका है ॥ १५ ॥

वास्तविक रूपमें विरक्त जनोंके लिये निष्कामकर्मका प्रतिपादन करनेमें ही श्रुतिका तात्पर्य है, अतः सभी १७ देहधारियोंके लिये संसार अज्ञानमूलक है । वेदोक्त निष्कामकर्मके द्वारा जीवभाव क्षीण होता है । अविद्यासे उत्पन्न जो अज्ञान है, उसके कारण सकामकर्मके वशीभूत १८ तीन प्रकारका जीवभाव दृढ़ होता है ॥ १६ - १७ ॥ पापकर्म करनेवाला नारकी होता है, पुण्यकर्म करनेवाला अपने पुण्यकी महिमाके कारण स्वर्गी होता है और पाप - पुण्यकर्मके मिश्रणवाला जीव उद्भिज, १ ९ स्वेदज, अण्डज तथा जरायुज – इन चार रूपोंमें व्यवस्थित होता है । इस प्रकारसे व्यवस्थित वह अज्ञानी जीव अपने कर्मके कारण [ संसारचक्रसे ] मुक्त नहीं हो पाता है ॥ १८-१९ ॥ २० सन्तान, कर्म तथा धनसे सज्जनोंकी मुक्ति नहीं होती है; एकमात्र त्यागके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त होती है और उसके अभाव के कारण यह जीव भ्रमण करता २१ । रहता है । इस प्रकार अज्ञानके दोषके कारण तथा अनेक

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४३६ 6666666666 गर्भे दुःखान्यनेकानि योनिमार्गे च भूतले कौमारे यौवने चैव वार्धके मरणेऽपि वा विचारतः सतां दुःखं स्त्रीसंसर्गादिभिर्द्विजाः दुःखेनैकेन वै दुःखं प्रशाम्यन्तीह दुःखिनः न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते

तस्माद्विचारतो नास्ति संयोगादपि वै नृणाम् ।

अर्थानामर्जनेऽप्येवं पालने च व्यये तथा ॥

पैशाचे राक्षसे दुःखं याक्षे चैव विचारतः ।

गान्धर्वे च तथा चान्द्रे सौम्यलोके द्विजोत्तमाः ॥

प्राजापत्ये तथा ब्राह्ये प्राकृते पौरुषे तथा ।

क्षयसातिशयाद्यैस्तु दुःखैर्दुःखानि सुव्रताः ॥

तानि भाग्यान्यशुद्धानि सन्त्यजेच्च धनानि च ।

तस्मादष्टगुणं भोगं तथा षोडशधा स्थितम् ॥

चतुर्विंशत्प्रकारेण संस्थितं चापि सुव्रताः ।

द्वात्रिंशद्भेदमनघाश्चत्वारिंशद्गुणं पुनः ॥

तथाष्टचत्वारिंशच्च षट्पञ्चाशत्प्रकारतः ।

चतुःषष्टिविधं चैव दुःखमेव विवेकिनः ॥

पार्थिवं च तथाप्यं च तैजसं च विचारतः ।

वायव्यं च तथा व्यौम मानसं च यथाक्रमम् ॥

आभिमानिकमप्येवं बौद्धं प्राकृतमेव च ।

.दुःखमेव न सन्देहो योगिनां ब्रह्मवादिनाम् ॥

गौणं गणेश्वराणां च दुःखमेव विचारतः ।

आदौ मध्ये तथा चान्ते सर्वलोकेषु सर्वदा ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । कर्मोंके वशीभूत होनेके कारण यह जीव छः कोशों ॥ २२ ( स्नायु, अस्थि, मज्जा, त्वचा, मांस, रक्त ) - से निर्मित इस शरीरको धारण करता है ॥ २०-२१ ॥ । गर्भमें, योनिमार्गमें, पृथ्वीतलपर, कुमारावस्थामें, ॥ २३ युवावस्थामें, वृद्धावस्थामें और मृत्युके समय प्राणीको अनेक दुःख होते हैं । हे द्विजो! विचारपूर्वक देखा जाय तो स्त्रीसंसर्ग आदिसे ही सज्जनोंको दुःख उत्पन्न होता ॥ २४ है; वे एक दु: खसे दूसरे दुःखको शान्त करना चाहते हैं और दु: खी होते रहते हैं । विषयोंके उपभोगसे कामकी शान्ति कभी नहीं होती है; जैसे हविसे अग्नि २५ बढ़ती है, वैसे ही वह [ वासना ] निरन्तर बढ़ती ही जाती है | २२ - २४ ॥ २६ अतः विचार किया जाय तो मनुष्योंको विषयोंके प्राप्त होनेपर भी सुख नहीं प्राप्त होता है । धनके अर्जनमें, उसकी सुरक्षा करनेमें तथा व्ययमें भी दुःख है । हे श्रेष्ठ २७ ब्राह्मणो! विचार करनेपर देखा जाय, तो पिशाचलोक, राक्षसलोक, यक्षलोक, गन्धर्वलोक, चन्द्रलोक, बुधलोक, प्रजापतिलोक, ब्राह्मलोक और प्रकृतिलोक तथा पुरुषलोकमें २८ भी भोगोंके नाशकी सम्भावनासे तथा एक- दूसरेसे श्रेष्ठ होनेके कारण ईर्ष्याजन्य दुःखोंसे वे भी दुःखी ही रहते हैं । अतः हे सुव्रतो! भाग्यसे प्राप्त अशुद्ध भोगों तथा २ ९ अशुद्ध धनोंका त्याग कर देना चाहिये; हे सुव्रतो! चाहे वह भोग ( सुख ) आठ प्रकारका हो, अथवा सोलह प्रकारका हो, अथवा चौबीस प्रकारका हो, अथवा बत्तीस ३० प्रकारका हो, अथवा चालीस प्रकारका हो, अथवा अड़तालीस प्रकारका हो, अथवा छप्पन प्रकारका हो अथवा चौंसठ प्रकारका हो, * विवेकयुक्त व्यक्तिके लिये ३१ भोग दुःखरूप ही होता है॥२५–३० ॥ विचार किया जाय तो पृथ्वीसम्बन्धी, जलसम्बन्धी, ३२ अग्निसम्बन्धी, वायुसम्बन्धी, आकाशसम्बन्धी, मनसम्बन्धी, अहंकारसम्बन्धी, बुद्धिसम्बन्धी तथा प्रकृतिसम्बन्धी भोग भी ब्रह्मवादी योगियोंके लिये दुःख ही हैं; इसमें सन्देह ३३ । नहीं है । विचारपूर्वक देखा जाय, तो गणेश्वरोंके गुण अष्टगुणयुक्त पार्थिव आदि सुखभोग ( ऐश्वर्य ) -से लेकर चौंसठ प्रकारके सुखभोग ( ऐश्वर्य ) इसी लिङ्गपुराणके पूर्वभाग अध्याय ९ में विस्तार से बताये गये हैं ।

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अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४३७

वर्तमानानि दुःखानि भविष्याणि यथातथम् ।

दोषदुष्टेषु देशेषु दुःखानि विविधानि च ॥

न भावयन्त्यतीतानि ह्यज्ञाने ज्ञानमानिनः ।

क्षुद्व्याधेः परिहारार्थं न सुखायान्नमुच्यते ॥

यथेतरेषां रोगाणामौषधं न सुखाय तत् ।

शीतोष्णवातवर्षाद्यैस्तत्तत्कालेषु देहिनाम् ॥

दुःखमेव न सन्देहो न जानन्ति ह्यपण्डिताः ।

स्वर्गेऽप्येवं मुनिश्रेष्ठा ह्यविशुद्धक्षयादिभिः ॥

रोगैर्नानाविधैर्ग्रस्ता रागद्वेषभयादिभिः ।

छिन्नमूलतरुर्यद्वदवशः पतति क्षितौ ॥

पुण्यवृक्षक्षयात्तद्वद् गां पतन्ति दिवौकसः ।

दुःखाभिलाषनिष्ठानां दुःखभोगादिसम्पदाम् ॥

अस्मात्तु पततां दुःखं कष्टं स्वर्गाद्दिवौकसाम् ।

नरके दुःखमेवात्र नरकाणां निषेवणात् ॥

विहिताकरणाच्चैव वर्णिनां मुनिपुङ्गवाः ॥

यथा मृगो मृत्युभयस्य भीतो उच्छिन्नवासो न लभेत निद्राम् । एवं यतिर्ध्यान महात्मा संसारभीतो न लभेत निद्राम् ॥

की पक्षिमृगाणां च पशूनां गजवाजिनाम् ।

दृष्टमेवासुखं तस्मात्त्यजतः सुखमुत्तमम् ॥

वैमानिकानामप्येवं दुःखं कल्पाधिकारिणाम् ।

स्थानाभिमानिनां चैव मन्वादीनां च सुव्रताः ॥

देवानां चैव दैत्यानामन्योन्यविजिगीषया ।

दुःखमेव नृपाणां च राक्षसानां जगत्त्रये ॥

भी [ वास्तवमें ] दुःख ही हैं । समस्त लोकोंमें प्रारम्भ, ३४ मध्य तथा अन्तमें सर्वदा दुःख ही है । वास्तवमें वर्तमानमें भी दुःख है और भविष्यमें भी दुःख होंगे । दोषोंसे ग्रस्त | सभी देशोंमें अनेक प्रकारके दुःख हैं; अपनेको ज्ञानी ३५ समझनेवाले [ कुछ लोग ] अज्ञानके कारण अतीतका स्मरण नहीं करते हैं । जिस प्रकार औषधि रोगोंके उपचारके लिये होती है; न कि सुखके लिये, उसी प्रकार ३६ आहारको भूखरूपी रोगको दूर करनेके लिये बताया गया है, न कि सुखके लिये । शीत, ताप, वायु, वर्षा आदिके द्वारा उन - उन कालोंमें शरीरधारियोंको दुःख ही होता ३७ है, इसमें सन्देह नहीं है; किंतु अज्ञानी लोग इसे नहीं समझ पाते हैं ॥ ३१–३६१ / २ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी प्रकार स्वर्गमें भी लोग ३८ | पुण्यके क्षय आदि दुःखोंसे तथा राग, द्वेष, भय आदि नानाविध रोगोंसे ग्रस्त होते हैं । जैसे जड़से कटा हुआ वृक्ष विवश होकर पृथ्वीपर गिर जाता है, वैसे ही स्वर्ग में ३ ९ रहनेवाले भी पुण्यरूपी वृक्षके क्षय होनेसे पृथ्वीपर पुनः आ जाते हैं । दुःखमय कामनाओंसे युक्त तथा दुःखमय भोगसम्पदासे परिपूर्ण स्वर्गवासी [ देवताओं ] को भी ४० इस स्वर्गसे पतित होनेपर दुःख तथा कष्ट ही होता है । ४१ हे श्रेष्ठ मुनियो! शास्त्रोचित कर्मोंको न करनेसे विभिन्न वर्णके लोगोंको नरकोंमें पड़नेके कारण वहाँ दुःख ही भोगना पड़ता ॥ ३७-४१ ॥ जैसे उजड़े हुए निवासवाला मृग मृत्युसे भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता, उसी प्रकार ४२ ध्यानपरायण महात्मा संन्यासी संसारसे भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता अर्थात् प्रमादरहित होकर सर्वथा सजग रहता है ॥ ४२ ॥

४३ कीटों, पक्षियों, मृगों, घोड़ा - हाथी आदि पशुओंमें भी [ सर्वदा ] दुःख ही देखा गया है; अतः भोगका त्याग करनेवालेको उत्तम सुख प्राप्त होता है । हे सुव्रतो! वैमानिक ४४ देवताओं और कल्पोंके अधिकारी तथा अपने पदका अभिमान करनेवाले मनु आदिको भी दुःख प्राप्त होता है । तीनों लोकोंमें एक - दूसरेको जीतनेकी इच्छाके कारण ४५ | देवताओं तथा दैत्योंको और राजाओं तथा राक्षसोंको भी

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४३८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग अफ्र

श्रमार्थमा श्रमश्चापि वर्णानां परमार्थतः ।

आश्रमैर्न च देवैश्च यज्ञः सांख्यैर्व्रतैस्तथा ॥ ४६

उग्रैस्तपोभिर्विविधैर्दानैर्नानाविधैरपि न लभन्ते तथात्मानं लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥ ४७

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चरेत्पाशुपतव्रतम् ।

भस्मशायी भवेन्नित्यं व्रते पाशुपते बुधः ॥ ४८

पञ्चार्थज्ञानसम्पन्नः शिवतत्त्वे समाहितः ।

कैवल्यकरणं योगविधिकर्मच्छिदं बुधः ॥ ४ ९

पञ्चार्थयोगसम्पन्नो दुःखान्तं व्रजते सुधीः ।

परया विद्यया वेद्यं विदन्त्यपरया न हि ॥ ५०

द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा तथा ।

अपरा तत्र ऋग्वेदो यजुर्वेदो द्विजोत्तमाः ॥ ५१

सामवेदस्तथाथ वेदः सर्वार्थसाधकः ।

शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव च ॥ ५२

ज्योतिषं चापरा विद्या पराक्षरमिति स्थितम् ।

तददृश्यं तदग्राह्यमगोत्रं तदवर्णकम् ॥ ५३

तदचक्षुस्तदश्रोत्रं तदपाणि अपादकम् ।

तदजातमभूतं च तदशब्दं द्विजोत्तमाः ॥ ५४

अस्पर्शं तदरूपं च रसगन्धविवर्जितम् ।

अव्ययं चाप्रतिष्ठं च तन्नित्यं सर्वगं विभुम् ॥ ५५

महान्तं तद् बृहन्तञ्च तदजं चिन्मयं द्विजाः ।

अप्राणममनस्कं च तदस्निग्धमलोहितम् ॥ ५६

अप्रमेयं तदस्थूलमदीर्घं तदनुल्बणम् ।

अह्रस्वं तदपारं च तदानन्दं तदच्युतम् ॥५७

अनपावृतमद्वैतं तदनन्तमगोचरम् ।

असंवृतं तदात्मैकं परा विद्या न चान्यथा ॥ ५८

परापरेति कथिते नैवेह परमार्थतः ।

अहमेव जगत्सर्वं मय्येव सकलं जगत् ॥ ५ ९

मत्त उत्पद्यते तिष्ठन्मयि मय्येव लीयते ।

मत्तो नान्यदितीक्षेत मनोवाक्याणिभिस्तथा ॥ ६०

सर्वमात्मनि सम्पश्येत्सच्चासच्च समाहितः ।

सर्वं ह्यात्मनि सम्पश्यन्न बाह्ये कुरुते मनः ॥ ६१ ।

दु: ख प्राप्त होता है ॥ ४३–४५ ॥

वस्तुतः समस्त वर्णोंके आश्रम भी श्रमके । दुःख ही देते हैं । लोग आश्रमों, देवों, यज्ञों सांख्यों कारण व्रतों, विविध कठोर तपों तथा अनेक प्रकारके , दानों, से भी आत्मतत्त्व नहीं प्राप्त करते; अपितु ज्ञानवान् लोग | स्वतः प्राप्त कर लेते हैं, अतः पूर्ण प्रयत्नसे पाशुपतव्रत करना चाहिये । बुद्धिमान्‌को पाशुपतव्रतमें स्थित होकर नित्य भस्मशायी होना चाहिये । सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंके अर्थ - ज्ञानसे सम्पन्न तथा शिवतत्त्वमें समाहित बुद्धिमान् व्यक्तिको मुक्तिदायक तथा कर्मका नाश करनेवाले पाशुपत योगका आश्रय लेना चाहिये । पंचार्थयोगसे युक्त विद्वान् दुःखके अन्तको प्राप्त होता है ॥ ४६ – ४ ९ १ %, ॥ भक्तजन परा विद्यासे ही ज्ञान प्राप्त करते हैं, अपरा विद्यासे नहीं । परा तथा अपरा- ये दो प्रकारकी विद्याएँ कही गयी हैं । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, सभी अर्थोंको सिद्ध करनेवाला अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष — ये अपरा विद्या हैं । परा विद्या अक्षररूपमें स्थित है । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह अदृश्य, अग्राह्य, गोत्ररहित, वर्णरहित, नेत्र - कान- हाथ-पैर आदिसे रहित, अजात, अभूत तथा शब्दविहीन है । हे द्विजो! वह स्पर्शरहित, रूपरहित, रस- गन्धहीन, अव्यय, आधारहीन, नित्य, सर्वगामी, सर्वशक्तिशाली, महान्, बृहत्, अज तथा चित्स्वरूप है । वह प्राणरहित, मनरहित, स्नेहरहित तथा अलोहित है । वह अप्रमेय, अस्थूल, अदीर्घ तथा अनुल्बण है । वह अह्रस्व, अपार आनन्दमय एवं अच्युत है । वह अनपावृत, अद्वैत, अनन्त, अगोचर, आवरणरहित तथा आत्मस्वरूप है; उस पराविद्याका अन्य प्रकारसे वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥ ५० - ५८ ॥ जो परा तथा अपरा विद्याएँ कही गयी हैं; वे परमार्थकी दृष्टिसे नहीं हैं । वास्तवमें मैं ही सम्पूर्ण जगत् हूँ; मुझमें ही सम्पूर्ण जगत् स्थित है । यह जगत् मुझसे ही उत्पन्न होता है, मुझमें ही स्थित रहता है और [ अन्तमें ] मुझमें ही विलीन हो जाता है । मुझसे पृथक कुछ नहीं है - ऐसा मन, वचन तथा कर्मसे अनुभव करना चाहिये | एकाग्रचित्त होकर सत् तथा असत् सब कुछ