लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 481–490

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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अध्याय ९ २ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४७ ९ सम्पूज्य पूज्यं त्रिदशेश्वराणां

सम्प्रेक्ष्य चोद्यानमतीव रम्यम् ।

गणेश्वरैर्नन्दिमुखैश्च सार्ध-मुवाच देवं प्रणिपत्य देवी ॥३४

श्रीदेव्युवाच

उद्यानं दर्शितं देव प्रभया परया युतम् ।

क्षेत्रस्य च गुणान् सर्वान् पुनर्मे वक्तुमर्हसि ॥ ३५

अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य सर्वथा ।

वक्तुमर्हसि देवेश देवदेव वृषध्वज ॥ ३६

सूत उवाच

देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो वरप्रभुः ।

आघ्राय वदनाम्भोजं तदाह गिरिजां हसन् ॥ ३७

श्रीभगवानुवाच

इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम ।

सर्वेषामेव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा ॥ ३८ ।

अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः ।

नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ ३ ९

अभ्यस्यन्ति परं योगं युक्तात्मानो जितेन्द्रियाः ।

नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगशोभिते ॥ ४०

कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते ।

अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे ॥ ४१

रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु ।

मन्मना मम भक्तश्च मयि नित्यार्पितक्रियः ॥ ४२

यथा मोक्षमवाप्नोति अन्यत्र न तथा क्वचित् ।

कामं ह्यत्र मृतो देवि जन्तुर्मोक्षाय कल्पते ॥ ४३

एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतमं महत् ।

ब्रह्मादयो विजानन्ति ये च सिद्धा मुमुक्षवः ॥ ४४

अतः परमिदं क्षेत्रं परा चेयं गतिर्मम ।

विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन ॥ ४५ ।

पुष्पोंसे इन देवदेव शंकरको भक्तिपूर्वक अलंकृत किया ॥ ३३ ॥

तदनन्तर उस अत्यन्त रम्य उद्यानको देखकर नन्दी आदि गणेश्वरोंके साथ देवताओंके लिये पूज्य देव [ शंकर ] -की पूजा करके और उन्हें प्रणामकर देवी [ पार्वती ] कहने लगीं ॥ ३४ ॥

श्रीदेवी बोलीं- हे देव! आपने परम शोभासे युक्त उद्यानको मुझे दिखाया; अब आप इस क्षेत्रके समस्त गुणोंको मुझे बतानेकी कृपा करें । हे देवेश! हे देवदेव! हे वृषभध्वज! आप इस अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य पूर्णरूपसे बतायें ॥ ३५-३६ ॥ सूतजी बोले – [ हे ऋषियो! ] तब देवीका वह वचन सुनकर देवदेव श्रेष्ठ प्रभु उनके मुखकमलको सूँघकर हँसते हुए पार्वतीसे कहने लगे ॥३७ ॥

श्रीभगवान् बोले — वाराणसी नामक यह मेरा नित्य गुह्यतम क्षेत्र है; यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका हेतु है । हे देवि! इस [ क्षेत्र ] - में सिद्ध लोग सदा मेरे व्रतमें स्थित रहते हैं और मेरे लोककी अभिलाषा करनेवाले लोग नित्य अनेकविध लिङ्गोंको धारण किये रहते हैं । अनेक प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे सुशोभित, कमल तथा उत्पलके पुष्पोंसे सम्पन्न सरोवरोंसे अलंकृत और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित इस शुभ क्षेत्रमें युक्तात्मा जितेन्द्रिय लोग श्रेष्ठ योगका अभ्यास करते हैं ॥ ३८–४१ ॥ [ हे देवि! ] जिस कारणसे मुझे यहाँ निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो । मुझमें अपने मनको स्थिर रखनेवाला तथा मुझमें सदा सभी क्रियाएँ अर्पित करनेवाला मेरा भक्त जिस प्रकारका मोक्ष यहाँ प्राप्त करता है, वैसा अन्यत्र कहीं भी नहीं । हे देवि! यहाँ मरनेवाला प्राणी मोक्ष प्राप्त करता है । मेरा यह पुर दिव्य, गुह्यसे भी गुह्यतम तथा महान् है - इसे ब्रह्मा आदि, सिद्धगण तथा मुक्तिके इच्छुक लोग जानते हैं । अतः यह परम क्षेत्र मेरी परम गति है । मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया है और न तो कभी इसका त्याग करूँगा, अतः मेरा यह क्षेत्र अविमुक्त कहा गया

पृष्ठ 482

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४८० मम क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिति स्मृतम् नैमिषे च कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे स्नानात्संसेवनाद्वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः इह सम्प्राप्यते येन तत एतद्विशिष्यते

प्रयागे वा भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात् ।

प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादविमुक्तमिदं शुभम् ॥

धर्मस्योपनिषत्सत्यं मोक्षस्योपनिषच्छमः क्षेत्र तीर्थोपनिषदं न विदुर्बुधसत्तमाः कामं भुञ्जन् स्वपन् क्रीडन् कुर्वन् हि विविधाः क्रियाः । अविमुक्ते त्यजेत्प्राणान् जन्तुर्मोक्षाय कल्पते

कृत्वा पापसहस्त्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम् ।

न तु शक्रसहस्त्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना ॥

तस्मात्संसेवनीयं हि अविमुक्तं हि मुक्तये । जैगीषव्यः परां सिद्धिं गतो यत्र महातपाः अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद्भक्त्या च मम भावितः । जैगीषव्यगुहा श्रेष्ठा योगिनां स्थानमिष्यते

ध्यायन्तस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्दीप्यते भृशम् ।

कैवल्यं परमं याति देवानामपि दुर्लभम् ॥

अव्यक्तलिङ्गैर्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः इह सम्प्राप्यते मोक्षो दुर्लभोऽन्यत्र कर्हिचित् तेभ्यश्चाहं प्रवक्ष्यामि योगैश्वर्यमनुत्तमम् आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च कुबेरोऽत्र मम क्षेत्रे मयि सर्वार्पितक्रियः क्षेत्रसंसेवनादेव गणेशत्वमवाप ह संवर्ती भविता यश्च सोऽपि भक्तो ममैव तु इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम् ॥ पराशरसुतो योगी ऋषिर्व्यासो महातपाः मम भक्तो भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । है ॥ ४२–४५१ / २ ॥ ५ ॥ ४६ नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा पुष्करमें स्नान | करने तथा वहाँ निवास करनेसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता । बल्कि यहाँ प्राप्त हो जाता है, अतः यह [ अन्य तीर्थोंसे है, ] ॥ ४७ विशिष्ट है । प्रयागमें अथवा यहाँपर मेरे परिग्रहके कारण मुक्ति होती है; तीर्थोंमें अग्रणी ( श्रेष्ठ ) प्रयागसे भी शुभ ४८ | यह अविमुक्त [ क्षेत्र ] है ॥ ४६–४८१ / २ ॥ धर्मका सारतत्त्व सत्य है, मोक्षका सारतत्त्व शम है; । किंतु क्षेत्रतीर्थके सारतत्त्वको ऋषिगण भी नहीं जानते ॥ ४ ९ | हैं ॥ ४ ९ ॥ इच्छानुसार खाता हुआ, सोता हुआ, क्रीड़ा करता ॥ ५० हुआ तथा अनेक क्रियाएँ करता हुआ भी प्राणी इस अविमुक्तक्षेत्रमें प्राणत्याग करे, तो वह मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ५० ॥

५१ यहाँ हजारों पाप करके पिशाचत्वको प्राप्त होना मनुष्योंके लिये अच्छा है, किंतु काशीपुरीको छोड़कर स्वर्ग हजार बार इन्द्र होना अच्छा नहीं है । अतएव ॥ ५२ मुक्ति लिये इस अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करना चाहिये । महातपस्वी महर्षि जैगीषव्यने इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा ॥ ५३ । मेरी भक्तिसे युक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त की थी । महर्षि जैगीषव्यकी श्रेष्ठ गुफा योगियोंकी स्थली मानी जाती है । योगी लोग वहाँ सदा मेरा ध्यान करते हैं और ५४ वहाँ योगकी अग्नि तीव्रतासे प्रज्वलित होती रहती है ॥ | मनुष्य [ यहाँ ] परम कैवल्य ( मोक्ष ) प्राप्त करता है, ॥ ५५ जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है ॥ ५१-५४ ॥ अव्यक्त लिङ्गोंवाले तथा सभी सिद्धान्तोंको । जाननेवाले मुनिगण यहाँ मोक्ष प्राप्त करते हैं, जो अन्यत्र ॥ ५६ कहीं भी दुर्लभ है । मैं उनके लिये अत्युत्तम योगैश्वर्य । । तथा अपने सायुज्यरूप अभीष्ट स्थानको बताऊँगा । मेरे ॥५७ । क्षेत्रमें अपनी सभी क्रियाएँ मुझमें समर्पित करनेवाले । कुबेरने क्षेत्रके सेवनसे ही गणेशत्वको प्राप्त किया था । हे देवि! जो ऋषि संवर्त नामक मेरे भक्त जन्म लेंगे, ५८ वे भी यहाँ मेरी आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त । करेंगे । हे कमलनयने! महातपस्वी पराशरपुत्र योगी ॥ ५ ९ । ऋषि व्यास मेरे भक्त होंगे; वेदसंहिताओंका प्रवर्तन

पृष्ठ 483

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अध्याय ९ २ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य

रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः ।

ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वापि दिवाकरः ॥ ६०

देवराजस्तथा शक्रो येऽपि चान्ये दिवौकसः ।

उपासते महात्मानः सर्वे मामिह सुव्रते ॥ ६१

अन्येऽपि योगिनो दिव्याश्छन्नरूपा महात्मनः ।

अनन्यमनसो भूत्वा मामिहोपासते सदा ॥ ६२

विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः ।

इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारे न पुनर्भवेत् ॥ ६३

ये पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था विजितेन्द्रियाः ।

व्रतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः ॥ ६४

देवदेवं समासाद्य धीमन्तः सङ्गवर्जिताः ।

गता इह परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६५

जन्मान्तरसहस्रेषु यं न योगी समाप्नुयात् ।

तमिहैव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६६

गोप्रेक्षकमिदं क्षेत्रं ब्रह्मणा स्थापितं पुरा ।

कैलासभवनं चात्र पश्य दिव्यं वरानने ॥ ६७

गोप्रेक्षकमथागम्य दृष्ट्वा मामत्र मानवः ।

न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते ॥ ६८

कपिलाहृदमित्येवं तथा वै ब्रह्मणा कृतम् ।

गवां स्तन्यजतोयेन तीर्थं पुण्यतमं महत् ॥ ६ ९

अत्रापि स्वयमेवाहं वृषध्वज इति स्मृतः ।

सान्निध्यं कृतवान् देवि सदाहं दृश्यते त्वया ॥ ७०

भद्रतोयं च पश्येह ब्रह्मणा च कृतं ह्रदम् ।

सर्वैर्देवैरहं देवि अस्मिन् देशे प्रसादितः ॥ ७१

गच्छोपशममीशेति उपशान्तः शिवस्तथा ।

अत्राहं ब्रह्मणानीय स्थापितः परमेष्ठिना ॥ ७२

ब्रह्मणा चापि सङ्गृह्य विष्णुना स्थापितः पुनः ।

ब्रह्मणापि ततो विष्णुः प्रोक्तः संविग्नचेतसा ॥ ७३

मयानीतमिदं लिङ्गं कस्मात्स्थापितवानसि ।

तमुवाच पुनर्विष्णुर्ब्रह्माणं कुपिताननम् ॥ ७४ ।

1985 Lingamahapuran_Section_17_1_Front तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८१ करनेवाले वे मुनिश्रेष्ठ भी इस क्षेत्रमें विहार करेंगे । हे सुव्रते! देवर्षियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, देवराज इन्द्र अन्य देवता लोग तथा महात्मा - ये सब यहाँपर मेरी उपासना करते हैं ॥ ५५–६१ ॥ अन्य दिव्य योगी तथा महात्मा लोग भी प्रच्छन्न [ गुप्त ] रूप धारणकर एकाग्रचित्त होकर यहाँपर सदा मेरी उपासना करते रहते हैं । विषयोंमें आसक्त मनवाला तथा धर्मका त्याग किया हुआ मनुष्य भी यदि इस क्षेत्रमें मृत हो जाय, तो वह भी संसारमें पुनः जन्म नहीं प्राप्त करता है; तो फिर हे सुव्रते! जो ममतारहित, धीर, सत्त्वगुणमें स्थित, जितेन्द्रिय, व्रती, कर्मप्रवृत्तिसे रहित, मुझमें ध्यानरत, बुद्धिमान् तथा संगरहित हैं - वे सब [ मुझ ] देवदेवको प्राप्त करके मेरी कृपासे यहाँ श्रेष्ठ मोक्ष अवश्य प्राप्त करते हैं । हे सुव्रते! हजारों जन्मोंमें भी योगी जिस [ मोक्ष ] - को प्राप्त नहीं कर पाता है, उस उत्तम मोक्षको वह यहाँपर मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है ॥ ६२–६६ ॥ हे वरानने! पूर्वकालमें यहाँ ब्रह्माके द्वारा स्थापित किये गये कैलास भवन नामक इस गोप्रेक्षक क्षेत्रको देखो । इस गोप्रेक्षक [ क्षेत्र ] में आकर मेरा दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे छूट जाता है । इसी प्रकार यहाँपर ब्रह्माने गायोंके दूधसे कपिलाह्रद नामक विशाल तथा पुण्यतम तीर्थका निर्माण किया है । यहाँ भी मैं स्वयं वृषध्वज - इस नामसे विख्यात हूँ । हे देवि! मैंने सदासे यहाँ निवास किया है; ऐसा आप देखती भी हैं ॥ ६७ – ७० ॥ यहाँ ब्रह्मा द्वारा निर्मित किये गये भद्रतोय नामक सरोवरको देखो । हे देवि! सभी देवताओंने ‘ हे ईश! शान्त हो जाइए ' - ऐसा कहकर इस स्थानपर मुझ शिवको प्रसन्न किया था, तब मैं शान्त हो गया था । परमेष्ठी ब्रह्माने यहाँ लाकर मुझे स्थापित किया । ब्रह्माजीसे प्राप्त करके विष्णुने पुनः स्थापित किया । तब दुःखी चित्तवाले ब्रह्माने विष्णुसे कहा — आपने मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको क्यों स्थापित किया? तत्पश्चात् विष्णु कुपितमुखवाले उन ब्रह्मासे पुनः बोले – रुद्र

पृष्ठ 484

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४८२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

रुद्रे देवे ममात्यन्तं परा भक्तिर्महत्तरा ।

मयैव स्थापितं लिङ्गं तव नाम्ना भविष्यति ॥

हिरण्यगर्भ इत्येवं ततोऽत्राहं समास्थितः ।

दृष्ट्वैनमपि देवेशं मम लोकं व्रजेन्नरः ॥

ततः पुनरपि ब्रह्मा मम लिङ्गमिदं शुभम् ।

स्थापयामास विधिवद्भक्त्या परमया युतः ॥

स्वर्लीनेश्वर इत्येवमत्राहं स्वयमागतः ।

प्राणानिह नरस्त्यक्त्वा न पुनर्जायते क्वचित् ॥

अनन्या सा गतिस्तस्य योगिनां चैव या स्मृता ।

अस्मिन्नपि मया देशे दैत्यो दैवतकण्टकः ॥

व्याघ्ररूपं समास्थाय निहतो दर्पितो बली ।

व्याघ्रेश्वर इति ख्यातो नित्यमत्राहमास्थितः ॥

न पुनर्दुर्गतिं याति दृष्ट्वैनं व्याघ्रमीश्वरम् ।

उत्पलो विदलश्चैव यौ दैत्यौ ब्रह्मणा पुरा ॥

स्त्रीवध्यौ दर्पितौ दृष्ट्वा त्वयैव निहतौ रणे ।

सावज्ञं कन्दुकेनात्र तस्येदं देहमास्थितम् ॥

आदावत्राहमागम्य प्रस्थितो गणपैः सह ।

ज्येष्ठस्थानमिदं तस्मादेतन्मे पुण्यदर्शनम् ॥

देवैः समन्तादेतानि लिङ्गानि स्थापितान्यतः ।

दृष्ट्वापि नियतो मर्त्यो देहभेदे गणो भवेत् ॥

पित्रा ते शैलराजेन पुरा हिमवता स्वयम् ।

मम प्रियहितं स्थानं ज्ञात्वा लिङ्गं प्रतिष्ठितम् ॥

शैलेश्वरमिति ख्यातं दृश्यतामिह चादरात् ।

दृष्ट्वैतन्मनुजो देवि न दुर्गतिमतो व्रजेत् ॥

नद्येषा वरुणा देवि पुण्या पापप्रमोचनी ।

क्षेत्रमेतदलङ्कृत्य जाह्नव्या सह सङ्गता ॥

| देवतामें मेरी अत्यधिक, श्रेष्ठ तथा महत्तर भक्ति है ; मेरे ७५ द्वारा स्थापित किया गया यह लिङ्ग आपके ही नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ७१–७५ ॥ [ हे देवि! ] मैं तभीसे यहाँ हिरण्यगर्भ - इस ७६ नामसे स्थित हूँ । इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य मेरा लोक प्राप्त करता है । तत्पश्चात् ब्रह्माने परम भक्तिसे युक्त होकर मेरे इस पवित्र लिङ्गको विधिपूर्वक पुनः ७७ स्थापित किया । मैं यहाँ स्वर्लीनेश्वर नामसे स्वयं विद्यमान हूँ; यहाँ प्राणत्याग करनेपर मनुष्य कभी जन्म ७८ नहीं लेता है । जो गति योगियोंकी कही गयी हैं, वह अनन्य गति उसकी भी होती है ॥ ७६ - ७८ १ / २ ॥ इसी स्थानपर मैंने व्याघ्रका रूप धारण करके ७ ९ देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक अभिमानी तथा बलवान् दैत्यका वध किया था; [ तभीसे ] व्याघ्रेश्वर इस नामसे प्रसिद्ध होकर मैं यहाँ सदा स्थित हूँ । इन व्याघ्रेश्वरका दर्शन ८० करके मनुष्य पुनः दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता है । पूर्वकालमें उत्पल तथा विदल नामक जिन दो दैत्योंके लिये ब्रह्माने स्त्रीके द्वारा वध्य होनेका विधान किया था, उन्हें अभिमानयुक्त ८१ देखकर आपने ही रणमें अवज्ञापूर्वक एक कन्दुकसे मार डाला था; आपके उसी कन्दुकका यह देह यहाँ स्थापित ८२ हो गया अर्थात् वह कन्दुक लिङ्गरूपमें परिणत होकर स्थापित हो गया ॥ ७ ९ -८२ ॥ प्रारम्भमें गणपोंके साथ आकर मैं यहाँ स्थित हो ८३ गया, अतः यह ज्येष्ठस्थान है; यहाँ मेरा दर्शन पुण्यप्रद है । | देवताओंने यहाँ सभी ओर इन लिङ्गोंको स्थापित किया है; अतः भक्तियुक्त होकर इन लिङ्गोंका केवल दर्शन ८४ करके मनुष्य मृत्यु होनेपर [ शिवका ] गण हो जाता है । ८३-८४ ॥ [ हे देवि! ] पूर्वकालमें स्वयं तुम्हारे पिता पर्वत-८५ राज हिमालयने इसे मेरा प्रिय तथा हितकर स्थान समझकर यहाँ लिङ्गकी स्थापना की थी । शैलेश्वर ८६ नामसे प्रसिद्ध इस लिङ्गको तुम आदरपूर्वक देखो । हे | देवि! इसका दर्शन करके मनुष्य दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता है ॥ ८५-८६ ॥ ८७ | हे देवि! पुण्यमयी तथा पापको नष्ट करनेवाली

पृष्ठ 485

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९ २ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य अध्याय

स्थापितं ब्रह्मणा चापि सङ्गमे लिङ्गमुत्तमम् ।

सङ्गमेश्वरमित्येवं ख्यातं जगति दृश्यताम् ॥ ८८

सङ्गमे देवनद्या हि यः स्नात्वा मनुजः शुचिः ।

अर्चयेत्सङ्गमेशानं तस्य जन्मभयं कुतः ॥ ८ ९

इदं मन्ये महाक्षेत्रं निवासो योगिनां परम् ।

क्षेत्रमध्ये च यत्राहं स्वयं भूत्वाग्रमास्थितः ॥ ९ ०

मध्यमेश्वरमित्येवं ख्यातः सर्वसुरासुरैः ।

सिद्धानां स्थानमेतद्धि मदीयव्रतधारिणाम्॥९ १

योगिनां मोक्षलिप्सूनां ज्ञानयोगरतात्मनाम् ।

दृष्ट्वैनं मध्यमेशानं जन्म प्रति न शोचति ॥ ९ २

स्थापितं लिङ्गमेतत्तु शुक्रेण भृगुसूनुना ।

नाम्ना शुक्रेश्वरं नाम सर्वसिद्धामरार्चितम् ॥ ९ ३

दृष्ट्वैनं नियतः सद्यो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।

मृतश्च न पुनर्जन्तुः संसारी तु भवेन्नरः ॥ ९ ४

पुरा जम्बुकरूपेण असुरो देवकण्टकः ।

ब्रह्मणो हि वरं लब्ध्वा गोमायुर्बन्धशङ्कितः ॥ ९ ५

निहतो हिमवत्पुत्रि जम्बुकेशस्ततो ह्यहम् ।

अद्यापि जगति ख्यातं सुरासुरनमस्कृतम् ॥ ९ ६

दृष्ट्वैनमपि देवेशं सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।

ग्रहैः शुक्रपुरोगैश्च एतानि स्थापितानि ह॥९ ७

पश्य पुण्यानि लिङ्गानि सर्वकामप्रदानि तु ।

एवमेतानि पुण्यानि मन्निवासानि पार्वति ॥ ९ ८ ।

कथितानि मम क्षेत्रे गुह्यं चान्यदिदं शृणु ।

चतुःक्रोशं चतुर्दिक्षु क्षेत्रमेतत्प्रकीर्तितम् ॥ ९९ ।

1985 Lingamahapuran_Section_17_2_Front तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८३ यह वरुणा नदी इस क्षेत्रको अलंकृत करके गंगाके साथ मिल जाती है । इनके संगमपर भी ब्रह्माके द्वारा उत्तम लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह संगमेश्वर – इस नामसे जगत्में प्रसिद्ध है, तुम इसका दर्शन करो । देवनदीके संगमपर स्नान करके शुद्ध होकर जो मनुष्य संगमेश्वरकी पूजा करता है, उसे जन्मभय कहाँसे हो सकता है! ॥ ८७ -८ ९ ॥ [ हे देवि! ] मैं इसे महाक्षेत्र मानता हूँ; यह योगियोंका परम निवास स्थान है । इस श्रेष्ठ क्षेत्रके मध्यमें मैं स्वयं प्रकट होकर अधिष्ठित हूँ । सभी सुर तथा असुर [ यहाँ ] मुझे मध्यमेश्वर – इस नामसे कहते हैं । मेरा व्रत धारण करनेवाले सिद्धों और मोक्षकी अभिलाषावाले तथा ज्ञानयोगमें परायण मनवाले योगियोंका यह निवास - स्थान है । इन मध्यमेश्वरका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य अपने जन्मके विषयमें चिन्ता नहीं करता है ॥ ९ ० - ९ २ ॥ भृगुपुत्र शुक्राचार्यने भी यहाँ लिङ्गको स्थापित किया है; शुक्रेश्वर नामसे विख्यात यह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंसे पूजित है । नियमित होकर इनका दर्शन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर पुनः संसारी जीव नहीं होता है ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक दैत्य सियारके रूपमें विद्यमान था । अपने बन्धनसे सशंकित उस दैत्यने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके गोमायु ( सियार ) का रूप धारण कर लिया था । हे पार्वति! मैंने उसका वध किया और तब मैं जम्बुकेश कहा जाने लगा; आज भी लोकमें प्रसिद्ध तथा देवताओं और असुरोंसे नमस्कृत इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है । [ हे देवि! ] शुक्र आदि प्रधान ग्रहोंके द्वारा स्थापित किये गये इन पुण्यमय तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले लिङ्गोंका दर्शन करो । हे पार्वति! इस प्रकार मैंने अपने निवासस्वरूप इन पवित्र लिङ्गोंका वर्णन किया; मेरे क्षेत्रमें एक अन्य गुप्त रहस्य भी है, इसे सुनो॥९ ५ – ९ ८१ / २ ॥

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४८४ योजनं विद्धि चार्वङ्गि मृत्युकालेऽमृतप्रदम् महालयगिरिस्थं मां केदारे च व्यवस्थितम् ॥ गणत्वं लभते दृष्ट्वा ह्यस्मिन् मोक्षो ह्यवाप्यते । गाणपत्यं लभेद्यस्माद्यतः सा मुक्तिरुत्तमा

ततो महालयात्तस्मात्केदारान्मध्यमादपि ।

स्मृतं पुण्यतमं क्षेत्रमविमुक्तं वरानने ॥

केदारं मध्यमं क्षेत्रं स्थानं चैव महालयम् । मम पुण्यानि भूर्लोके तेभ्यः श्रेष्ठतमं त्विदम् यतः सृष्टास्त्विमे लोकास्ततः क्षेत्रमिदं शुभम् कदाचिन्न मया मुक्तमविमुक्तं ततोऽभवत् अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं मम दृष्ट्वेह मानवः । सद्यः पापविनिर्मुक्तः पशुपाशैर्विमुच्यते शैलेशं सङ्गमेशं च स्वर्लीनं मध्यमेश्वरम् हिरण्यगर्भमीशानं गोप्रेक्षं वृषभध्वजम् ॥ उपशान्तं शिवं चैव ज्येष्ठस्थाननिवासिनम् शुक्रेश्वरं च विख्यातं व्याघ्रेशं जम्बुकेश्वरम् दृष्ट्वा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे सूत उवाच एवमुक्त्वा महादेवो दिशः सर्वा व्यलोकयत् विलोक्य संस्थिते पश्चाद्देवदेवे महेश्वरे अकस्मादभवत्सर्वः स देशोज्वलितो यथा ततः पाशुपताः सिद्धा भस्माभ्यङ्गसितप्रभाः माहेश्वरा महात्मानस्तथा वै नियतव्रताः बहवः शतशोऽभ्येत्य नमश्चक्रुर्महेश्वरम् पुनर्निरीक्ष्य योगेशं ध्यानयोगं च कृत्स्नशः तस्थुरात्मानमास्थाय लीयमाना इवेश्वरे स्थितानां स तदा तेषां देवदेव उमापतिः स बिभ्रत्परमां मूर्ति बभूव पुरुषः प्रभुः कृत्स्नं जगदिहैकस्थं कर्तुमन्त इव स्थितः श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । यह क्षेत्र चारों दिशाओंमें चार कोस अतएव १०० योजनमें कहा गया है; हे सुन्दर अंगोंवाली! मृत्युकाल एकमें इसे अमरता प्रदान करनेवाला जानो । महालय गिरिमें विराजमान और केदारपर स्थित मेरा दर्शन करके ॥ १०१ । गणत्व प्राप्त करता है, किंतु इस क्षेत्रमें मोक्षकी मनुष्य प्राप्ति होती है । उन स्थानोंमें गणपति पद प्राप्त होता है और १०२ यहाँपर उत्तम मुक्ति प्राप्त होती है, अतः हे वरानने! उस महालय, केदार तथा मध्यम क्षेत्र - इन सबसे पुण्यप्रद ॥ १०३ । यह अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है । केदार, मध्यमक्षेत्र तथा महालय स्थान —- ये तीनों पृथ्वीलोकमें मेरे पवित्र क्षेत्र । हैं, किंतु यह [ अविमुक्तक्षेत्र ] उनसे भी अधिक श्रेष्ठ ॥ १०४ | है॥९९ –१०३ ॥ जबसे इन लोकोंकी सृष्टि की गयी है, तबसे मैंने ॥ १०५ । इस पवित्र क्षेत्रका परित्याग कभी नहीं किया, इसलिये यह अविमुक्त [ क्षेत्र ] हो गया । यहाँ मेरे अविमुक्तेश्वर । लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य शीघ्र ही पापोंसे मुक्त १०६ होकर पशुपाशों ( जीवबन्धन ) - से छूट जाता है । शैलेश्वर, । संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भ, ईशान, ॥ १०७ गोप्रेक्ष, वृषभध्वज, उपशान्त, ज्येष्ठस्थानमें निवास करनेवाले शिव, शुक्रेश्वर, प्रसिद्ध व्याघ्रेश्वर तथा । जम्बुकेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुःखके सागररूप संसारमें [ पुनः ] जन्म नहीं लेता है ॥ १०४–१०७ / २ ॥ ॥ १०८ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] ऐसा कहकर । महादेवने सभी दिशाओंकी ओर देखा । [ दिशाओंकी ॥ १० ९ ओर ] देखकर देवदेव महेश्वरके बैठ जानेके अनन्तर वह सम्पूर्ण स्थान सहसा देदीप्यमान हो गया । तत्पश्चात् । भस्म लगानेसे श्वेत प्रभावाले, नियम- व्रत धारण ॥ ११० करनेवाले, पशुपतिके भक्त और महेश्वरके प्रति समर्पित । बहुत - से सैकड़ों सिद्ध तथा महात्माओंने वहाँ आकर ॥ १११ महेश्वरको प्रणाम किया; पुनः वे ध्यानयोगमें स्थित । । योगेश्वर [ शिव ] - को बार - बार देखकर अपने मनको स्थिर करके उन ईश्वरमें लीन होते हुए - से स्थित हो ॥ ११२ गये । उनके इस प्रकार स्थित होनेपर वे देवदेव उमापति । परम मूर्ति धारण करते हुए विराट् पुरुषके रूपमें हो ॥ ११३ । गये; वे सम्पूर्ण जगत्को एक स्थानपर एकत्र करने

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९ २ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन अध्याय ************************** ४८५

तस्य तां परमां मूर्तिमास्थितस्य जगत्प्रभोः ।

न शशाक पुनर्द्रष्टुं हृष्टरोमा गिरीन्द्रजा ॥

ततस्त्वदृष्टमाकारं बुद्ध्वा सा प्रकृतिस्थितम् ।

प्रकृतेर्मूर्तिमास्थाय योगेन परमेश्वरी ॥

तं शशाक पुनर्द्रष्टुं हरस्य च महात्मनः ।

ततस्ते लयमाधाय योगिनः पुरुषस्य तु ॥

विविशुर्हृदयं सर्वे दग्धसंसारबीजिनः ।

पञ्चाक्षरस्य वै बीजं संस्मरन्तः सुशोभनम् ॥

सर्वपापहरं दिव्यं पुरा चैव प्रकाशितम् ।

नीललोहितमूर्तिस्थं पुनश्चक्रे वपुः शुभम् ॥

तं दृष्ट्वा शैलजा प्राह हृष्टसर्वतनूरुहा ।

स्तुवती चरणौ नत्वा क इमे भगवन्निति ॥

तामुवाच सुरश्रेष्ठस्तदा देवीं गिरीन्द्रजाम् । श्रीभगवानुवाच मदीयं व्रतमाश्रित्य भक्तिमद्भिर्द्विजोत्तमैः ॥

यैयैर्योगा इहाभ्यस्तास्तेषामेकेन जन्मना ।

क्षेत्रस्यास्य प्रभावेन भक्त्या च मम भामिनि ॥

अनुग्रहो मया ह्येवं क्रियते मूर्तितः स्वयम् ।

तस्मादेतन्महत्क्षेत्रं ब्रह्माद्यैः सेवितं तथा ॥

श्रुतिमद्भिश्च विप्रेन्द्रैः संसिद्धैश्च तपस्विभिः ।

प्रतिमासं तथाष्टम्यां प्रतिमासं चतुर्दशीम् ॥

उभयोः पक्षयोर्देवि वाराणस्यामुपास्यते ।

शशिभानूपरागे च कार्तिक्यां च विशेषतः ॥

सर्वपर्वसु पुण्येषु विषुवेष्वयनेषु च ।

पृथिव्यां सर्वतीर्थानि वाराणस्यां तु जाह्नवीम् ॥

उत्तरप्रवहां पुण्यां मम मौलिविनिःसृताम् ।

पितुस्ते गिरिराजस्य शुभां हिमवतः सुताम् ॥

पुण्यस्थानस्थितां पुण्यां पुण्यदिक्प्रवहां सदा ।

भजन्ते सर्वतोऽभ्येत्य ये ताञ्छृणु वरानने ॥

6 36 36 36 36 36 36 36 96 96! लिये प्रलयकालके समान खड़े हो गये । १०८ -११३ ॥ ११४ तब पुलकित रोमोंवाली पार्वती वहाँ स्थित उन जगत्प्रभुकी उस परम मूर्तिको पुनः देखनेमें समर्थ न हो सकीं । तदनन्तर पहले कभी न देखे गये उस ११५ स्वरूपको प्रकृतिमें स्थित समझकर वे परमेश्वरी योगके द्वारा प्रकृतिका रूप धारणकर महात्मा शिवके उस स्वरूपको ९ १६ पुनः देखनेमें समर्थ हो गयीं ॥ ११४-११५१ / २ ॥ तब अत्यन्त सुन्दर पंचाक्षर मन्त्रका स्मरण करते ११७ हुए दग्ध लिङ्गवाले वे सभी योगी शिवके ध्यानमें लीन होकर उन [ विराट् ] पुरुषके हृदयमें प्रविष्ट हुए । तदनन्तर शिवजीने सभी पापोंका हरण करनेवाले, दिव्य ११८ | तथा पूर्वमें प्रकट किये गये नीललोहितमूर्तिस्थ रूपको पुनः धारण किया | ११६–११८ ॥ ११ ९ उस रूपको देखकर पुलकित समस्त रोमोंवाली पार्वतीने स्तुति करते हुए तथा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा — ' हे भगवन्! ये कौन हैं? ' तब सुरश्रेष्ठ [ शिव ] पर्वतराजकी उन पुत्री से कहने लगे ॥ ११ ९ १/२ ॥ १२० श्रीभगवान् बोले – हे भामिनि! मेरे व्रतका आश्रय लेकर जिन - जिन भक्तियुक्त श्रेष्ठ द्विजोंने यहाँ योगका अभ्यास किया है, उनके एक जन्ममें ही इस १२१ क्षेत्रके प्रभाव तथा उनकी भक्तिके कारण मैं स्वयं विग्रहरूपसे इस प्रकारका अनुग्रह करता हूँ । अतः यह १२२ | महान् क्षेत्र ब्रह्मा आदि [ देवताओं ], वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों, सिद्धों तथा तपस्वियोंके द्वारा सेवित है । हे १२३ देवि! प्रत्येक महीनेमें दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको वाराणसीमें शिवकी पूजा की जाती है । सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर, विशेषकर १२४ कार्तिक महीनेमें, पुण्यप्रद सभी पर्वोंमें, विषुवत् एवं अयन संक्रान्तियोंमें पृथ्वीपर स्थित सभी तीर्थ वाराणसीमें १२५ विद्यमान उत्तरवाहिनी, पुण्यमयी, मेरे सिरसे निकली हुई, तुम्हारे पिता गिरिराज हिमालयकी पुत्री, पुण्यमयस्थानमें विराजमान और सदा पुण्य दिशाकी १२६ ओर प्रवाहित होनेवाली पवित्र गंगाका सेवन करते हैं । हे वरानने! सभी ओरसे आकर जो उन भागीरथीका १२७ | सेवन करते हैं, उन्हें सुनो॥१२०–१२७ ॥

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सन्निहत्य कुरुक्षेत्रं सार्धं तीर्थशतैस्तथा ।

पुष्करं निमिषं चैव प्रयागं च पृथूदकम् ॥

द्रुमक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं नैमिषं तीर्थसंयुतम् ।

क्षेत्राणि सर्वतो देवि देवता ऋषयस्तथा ॥

सन्ध्या च ऋतवश्चैव सर्वा नद्यः सरांसि च ।

समुद्राः सप्त चैवात्र देवतीर्थानि कृत्स्नशः ॥

भागीरथीं समेष्यन्ति सर्वपर्वसु सुव्रते ।

अविमुक्तेश्वरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा चैव त्रिविष्टपम् ॥

कालभैरवमासाद्य धूतपापानि सर्वशः ।

भवन्ति हि सुरेशानि सर्वपर्वसु पर्वसु ॥

पृथिव्यां यानि पुण्यानि महत्यायतनानि च ।

प्रविशन्ति सदाभ्येत्य पुण्यं पर्वसु पर्वसु ।

अविमुक्तं क्षेत्रवरं महापापनिबर्हणम् ॥

केदारे चैव यल्लिङ्गं यच्च लिङ्गं महालये ॥

मध्यमेश्वरसंज्ञं च तथा पाशुपतेश्वरम् ।

शङ्कुकर्णेश्वरं चैव गोकर्णौ च तथा ह्युभौ ॥

द्रुमचण्डेश्वरं नाम भद्रेश्वरमनुत्तमम् ।

स्थानेश्वरं तथैकाग्रं कालेश्वरमजेश्वरम् ॥

भैरवेश्वरमीशानं तथोङ्कारकसंज्ञितम् ।

अमरेशं महाकालं ज्योतिषं भस्मगात्रकम् ॥

यानि चान्यानि पुण्यानि स्थानानि मम भूतले ।

अष्टषष्टिसमाख्यानि रूढान्यन्यानि कृत्स्नशः ॥

तानि सर्वाण्यशेषाणि वाराणस्यां विशन्ति माम् ।

सर्वपर्वसु पुण्येषु गुह्यं चैतदुदाहृतम् ॥

तेनेह लभते जन्तुर्मृतो दिव्यामृतं पदम् ।

स्नातस्य चैव गङ्गायां दृष्टेन च मया शुभे ॥

सर्वयज्ञफलैस्तुल्यमिष्टैः शतसहस्रशः ।

सद्य एव समाप्नोति किं ततः परमाद्भुतम् ॥

सर्वायतनमुख्यानि दिवि भूमौ गिरिष्वपि ।

परात्परतरं देवि बुध्यस्वेति मयोदितम् ॥

अविशब्देन पापस्तु वेदोक्तः कथ्यते द्विजैः ।

तेन मुक्तं मया जुष्टमविमुक्तमतोच्यते ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग हे देवि! हे सुव्रते! कुरुक्षेत्र, पुष्कर, निमिष, १२८ प्रयाग, पृथूदक, द्रुमक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, तीर्थमय नैमिष, सभी क्षेत्र, देवता, ऋषिगण, सन्ध्या, ऋतुएँ, सभी नदियाँ. १२ ९ | सभी सरोवर, सातों समुद्र तथा समस्त देवतीर्थ एकीभूत होकर सैकड़ों तीर्थोंसहित सभी पर्वोंके अवसरपर १३० भागीरथीमें आकर मिल जाते हैं और हे सुरेशानि! सभी पर्वोंपर अविमुक्तेश्वर तथा त्रिविष्टपका दर्शन करके पुनः कालभैरव पहुँचकर पूर्णरूपसे पापमुक्त हो जाते १३१ । पृथ्वीपर जो भी पवित्र तथा महान् आयतन ( देवालय ) हैं, वे समस्त पर्वोंके अवसरपर महापापोंका १३२ नाश करनेवाले क्षेत्र श्रेष्ठ पुण्यमय अविमुक्तमें आकर प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ १२८–१३३ ॥ केदार [ खण्ड ] - में स्थित लिङ्ग, महालयमें स्थित १३३ लिङ्ग, मध्यमेश्वर नामक लिङ्ग, पाशुपतेश्वर, शंकु-९ ३४ कर्णेश्वर, दोनों गोकर्णेश्वर, द्रुमचण्डेश्वर, अत्युत्तम भद्रेश्वर, स्थानेश्वर, एकाग्रेश्वर, कालेश्वर, अजेश्वर, १३५ भैरवेश्वर, ईशान, ओंकारेश्वर, अमरेश्वर, महाकालेश्वर, ज्योतिष, भस्मगात्र आदि तथा अन्य जो प्रसिद्ध अरसठ १३६ मेरे पवित्र स्थान इस भूतलपर हैं एवं जो अन्य सभी लोकप्रसिद्ध स्थान हैं; वे सब वाराणसीमें मेरे पास १३७ सभी पुण्यप्रद पर्वोंपर आ जाते हैं । [ हे देवि! ] इसी कारणसे यहाँपर मृत्युको प्राप्त प्राणी दिव्य अमृत १३८ ( अमर ) पद प्राप्त करता है; मैंने यह रहस्यमय बात कही है॥१३४–१३९९ २ ॥ १३ ९ हे शुभे! [ वाराणसीमें ] गंगामें स्नान करके मेरा दर्शन करनेसे मनुष्य सैकड़ों - हजारों समस्त यज्ञोंके अभीष्ट फलोंके समान फल शीघ्र ही प्राप्त करता है, १४० इससे बढ़कर आश्चर्य क्या हो सकता है? हे देवि! स्वर्गमें, पृथ्वीपर तथा पर्वतोंपर जो भी सभी प्रधान १४१ | देवस्थान हैं, उनमें मेरे द्वारा बताये गये इस वाराणसीक्षेत्रको सबसे श्रेष्ठ जानो । ब्राह्मणोंने वेदोंमे वर्णित पापको १४२ | ' अवि ' शब्दसे कहा है; यह क्षेत्र उस [ पाप ] -से मुक्त है तथा मेरे द्वारा सेवित है, अतः इसे ' अविमुक्त ' कहा १४३ | जाता है॥१४०–१४३ ॥

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९ २ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका अध्याय 95 95 95 95 95 36363636363636363695 भगवान् रुद्रः सर्वलोकमहेश्वरः । इत्युक्त्वा सुदृष्टं कुरु देवेशि अविमुक्तं गृहं मम ॥

इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तया सार्धमुमापतिः ।

दर्शयामास भगवान् श्रीपर्वतमनुत्तमम् ॥

अविमुक्तेश्वरे नित्यमवसच्च सदा तया । सर्वगत्वाच्च सर्वत्वात्सर्वात्मा सदसन्मयः ।

श्रीपर्वतमनुप्राप्य देव्या देवेश्वरो हरः ।

क्षेत्राणि दर्शयामास सर्वभूतपतिर्भवः ॥

कुण्डिप्रभं च परमं दिव्यं वैश्रवणेश्वरम् ।

आशालिङ्गं च देवेशं दिव्यं यच्च बिलेश्वरम् ॥

रामेश्वरं च परमं विष्णुना यत्प्रतिष्ठितम् ।

दक्षिणद्वारपार्श्वे तु कुण्डलेश्वरमीश्वरम् ॥

पूर्वद्वारसमीपस्थं त्रिपुरान्तकमुत्तमम् ।

विवृद्धं गिरिणा सार्धं देवदेवनमस्कृतम् ॥

मध्यमेश्वरमित्युक्तं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

अमरेश्वरं च वरदं देवैः पूर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

गोचर्मेश्वरमीशानं तथेन्द्रेश्वरमद्भुतम् ।

कर्मेश्वरं च विपुलं कार्यार्थं ब्रह्मणा कृतम् ॥

श्रीमत्सिद्धवटं चैव सदावासो ममाव्यये ।

अजेन निर्मितं दिव्यं साक्षादजबिलं शुभम् ॥

तत्रैव पादुके दिव्ये मदीये च बिलेश्वरे ।

तत्र शृङ्गाटकाकारं शृङ्गाटाचलमध्यमे ॥

शृङ्गाटकेश्वरं नाम श्रीदेव्या तु प्रतिष्ठितम् ।

मल्लिकार्जुनकं चैव मम वासमिदं शुभम् ॥

रजेश्वरं च पर्याये रजसा सुप्रतिष्ठितम् ।

गजेश्वरं च वैशाखं कपोतेश्वरमव्ययम् ॥

कोटीश्वरं महातीर्थं रुद्रकोटिगणैः पुरा ।

सेवितं देवि पश्याद्य सर्वस्मादधिकं शुभम् ॥

द्विदेवकुलसंज्ञं च ब्रह्मणा दक्षिणे शुभम् ।

उत्तरे स्थापितं चैव विष्णुना चैव शैलजम् ॥

महाप्रमाणलिङ्गं च मया पूर्वं प्रतिष्ठितम् ।

पश्चिमे पर्वते पश्य ब्रह्मेश्वरमलेश्वरम् ॥

माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८७ फ्र ऐसा कहकर सभी लोकोंके स्वामी भगवान् रुद्र १४४ पुनः बोले – ' देवेशि! मेरे इस अविमुक्त निवास - स्थानको भली - भाँति देखो । ' ऐसा कहनेके बाद उन देवीको साथ १४५ लेकर भगवान् उमापतिने उन्हें अत्युत्तम श्रीपर्वत दिखाया और वे वहाँ अविमुक्तेश्वरमें उनके साथ नित्य रहने लगे । १४६ सर्वत्र गमनकी शक्तिसे युक्त होने तथा सर्वव्यापी होनेके कारण सर्वात्मा, सत् - असत्स्वरूपवाले, देवताओंके १४७ स्वामी तथा सभी प्राणियोंके स्वामी भगवान् शिव उन देवीके साथ श्रीपर्वतपर पहुँचकर वहाँके [ पवित्र ] क्षेत्र दिखाने लगे ॥ १४४ –१४७ ॥ १४८ यहाँ कुण्डिप्रभ, परम दिव्य वैश्रवणेश्वर, आशालिङ्ग, देवेश्वर, दिव्य बिलेश्वर, विष्णुके द्वारा स्थापित महान् १४ ९ रामेश्वर, दक्षिण द्वारके पार्श्वभागमें भगवान् कुण्डलेश्वर, पूर्व द्वारके समीप स्थित और पर्वतके साथ वृद्धिको १५० प्राप्त सर्वदेवनमस्कृत उत्तम त्रिपुरान्तक, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मध्यमेश्वर, पूर्वकालमें देवताओंके द्वारा स्थापित १५१ वरप्रद अमरेश्वर, गोचर्मेश्वर, ईशान, अद्भुत इन्द्रेश्वर और अपने कार्यके लिये ब्रह्माके द्वारा स्थापित विशाल १५२ कर्मेश्वर लिङ्ग हैं । हे अव्यये! श्रीमत्सिद्धवट सदा मेरा निवासस्थान है । साक्षात् ब्रह्माके द्वारा निर्मित यह दिव्य १५३ तथा पवित्र अजबिल नामक स्थान है; वहीं बिलेश्वरमें मेरी दिव्य पादुकाएँ भी हैं । वहाँ शृंगाटक पर्वतके मध्य शिखरपर शृंगाटकके आकारवाला ( त्रिकोण ) श्रृंगाटकेश्वर १५४ नामक लिङ्ग है, जो श्रीदेवी ( लक्ष्मी ) के द्वारा स्थापित किया गया है । यह मल्लिकार्जुन [ लिङ्ग ] मेरा शुभ १५५ निवासस्थान है । हे देवि! युगादिके परिवर्तित होनेपर ब्रह्माके द्वारा स्थापित रजेश्वरको, स्कन्दके द्वारा स्थापित १५६ गजेश्वरको अविनाशी कपोतेश्वरको तथा सबसे अधिक शुभ और करोड़ों रुद्रगणोंके द्वारा सेवित कोटीश्वर १५७ नामक महातीर्थको इस समय देखो ॥ १४८–१५७ ॥ दक्षिणमें ब्रह्माके द्वारा तथा उत्तरमें विष्णुके द्वारा १५८ स्थापित किये गये पाषाणनिर्मित सुन्दर द्विजदेवकुल नामक लिङ्गको, पूर्वमें मेरे द्वारा स्थापित महाप्रमाण लिङ्ग तथा १५ ९ | पश्चिममें पर्वतपर स्थित ब्रह्मेश्वर अलेश्वर नामक

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४८८ ********* 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6 6696969696969696969696969

अलङ्कृतं त्वया ब्रह्मन् पुरस्तान्मुनिभिः सह ।

इत्युक्त्वा तद्गृहेऽतिष्ठदलगृहमिति स्मृतम् ॥

तत्रापि तीर्थं तीर्थज्ञे व्योमलिङ्गं च पश्य मे ।

कदम्बेश्वरमेतद्धि स्कन्देनैव प्रतिष्ठितम् ॥

गोमण्डलेश्वरं चैव नन्दाद्यैः सुप्रतिष्ठितम् ।

देवैः सर्वैस्तु शक्राद्यैः स्थापितानि वरानने ॥

श्रीमद्देवह्रदप्रान्ते स्थानानीमानि पश्य मे ।

तथा हारपुरे देवि तव हारे निपातिते ॥

त्वया हिताय जगतां हारकुण्डमिदं कृतम् ।

शिवरुद्रपुरे चैव तत्कायोपरि सुव्रते ॥

तत्र पित्रा सुशैलेन स्थापितं त्वचलेश्वरम् ।

अलङ्कृतं मया ब्रह्मपुरस्तान्मुनिभिः सह ॥

चण्डिकेश्वरकं देवि चण्डिकेशा तवात्मजा ।

चण्डिकानिर्मितं स्थानमम्बिकातीर्थमुत्तमम् ॥

रुचिकेश्वरकं चैव धारैषा कपिला शुभा ।

एतेषु देवि स्थानेषु तीर्थेषु विविधेषु च ॥

पूजयेन्मां सदा भक्त्या मया सार्धं हि मोदते ।

श्रीशैले सन्त्यजेद्देहं ब्राह्मणो दग्धकिल्बिषः ॥

मुच्यते नात्र सन्देहो ह्यविमुक्ते यथा शुभम् ।

महास्नानं च यः कुर्याद् घृतेन विधिनैव तु ॥

स याति मम सायुज्यं स्थानेष्वेतेषु सुव्रते ।

स्नानं पलशतं ज्ञेयमभ्यङ्गं पञ्चविंशति ॥

पलानां द्वे सहस्त्रे तु महास्नानं प्रकीर्तितम् ।

स्नाप्य लिङ्गं मदीयं तु गव्येनैव घृतेन च ॥

विशोध्य सर्वद्रव्यैस्तु वारिभिरभिषिञ्चति ।

सम्मार्ज्य शतयज्ञानां स्नानेन प्रयुतं तथा ॥

पूजया शतसाहस्त्रमनन्तं गीतवादिनाम् ।

महास्नाने प्रसक्ते तु स्नानमष्टगुणं स्मृतम् ॥

जलेन केवलेनैव गन्धतोयेन भक्तितः ।

अनुलेपनं तु तत्सर्वं पञ्चविंशत्पलेन वै ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । लिङ्गको देखो । महादेवने ब्रह्मासे कहा था - ' हे ५५ १६० आपने मुनियोंके साथ इसे अलंकृत किया है ' - ब्रह्मन्! ऐसा | कहकर वे रुद्र उस गृहमें स्थित हो गये, अतः उसे अलंगृह

कहा गया है । १५८-१६० ॥

१६१ हे तीर्थज्ञे! वहाँपर स्थित मेरे व्योमलिङ्ग तीर्थको भी देखो; कदम्बेश्वर नामवाला यह तीर्थ स्कन्दके द्वारा १६२ । स्थापित किया गया है । नन्द आदिके द्वारा विधिवत् स्थापित गोमण्डलेश्वरको भी देखो । हे वरानने! शोभासम्पन्न १६३ देव - हद ( सरोवर ) - के तटपर इन्द्र आदि सभी देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये मेरे इन स्थानोंका अवलोकन करो । हे देवि! हारपुरमें तुम्हारे हारके गिर जानेपर तुमने १६४ जगत्के हितके लिये इसे हारकुण्ड बना दिया था । हे सुव्रते! शिवरुद्रपुरमें उस पर्वतपर तुम्हारे पिता सुशैलने १६५ अचलेश्वरकी स्थापना की थी, जिसे मैंने ब्रह्मा आदि ऋषियोंके साथ सुशोभित किया था । हे देवि! तुम्हारी १६६ पुत्री चण्डिकेशाने चण्डिकेश्वरको स्थापित किया है; चण्डिकाके द्वारा स्थापित यह स्थान उत्तम अम्बिकातीर्थ है । यह रुचिकेश्वर तीर्थ है; यह पवित्र कपिलधारा १६७ [ तीर्थ ] है ॥ १६१–१६६ / २ हे देवि! जो इन विविध स्थानों तथा तीर्थोंमें भक्तिपूर्वक १६८ सदा मेरी पूजा करता है, वह मेरे साथ आनन्द करता है । जो ब्राह्मण श्रीशैलपर शरीरत्याग करता है, वह पापरहित होकर १६ ९ | मुक्त हो जाता है, जिस प्रकार अविमुक्तक्षेत्रमें शुभ फल होता है; इसमें सन्देह नहीं है । हे सुव्रते! जो इन स्थानोंमें विधिपूर्वक घृतसे महास्नान कराता है, वह मेरा सायुज्य १७० प्राप्त करता है । पचीस पल [ घृत ] - का ' अभ्यंग ' तथा सौ पलका ' स्नान ' जानना चाहिये । दो हजार पलोंसे स्नान १७१ | करानेको ' महास्नान ' कहा गया है ॥ १६७–१७०२ ॥ जो मेरे लिङ्गको गायके घीसे स्नान कराकर सभी १७२ पूजाद्रव्योंसे विशुद्ध करके जलसे मेरा अभिषेक करता | है - इस प्रकार मार्जन करनेसे सौ यज्ञोंका, स्नान करानेसे तथा पूजा करानेसे लाख - लाख यज्ञोंका, गीतवाद्य आदिसे अर्चन १७३ करनेपर अनन्त यज्ञोंका फल प्राप्त होता है । महास्नानमें रुचि रखनेवाले भक्तोंको स्नानका आठ गुना ( आठ लाख यज्ञोंका ) १७४ । फल बताया गया है । केवल जलसे अथवा भक्ति-