श्रीगणेशाय नमः।

लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 491–500

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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९ २ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका अध्याय

शमीपुष्पं च विधिना बिल्वपत्रं च पङ्कजम् ।

अन्यान्यपि च पुष्पाणि बिल्वपत्रं न सन्त्यजेत् ॥

चतुर्द्रोणैर्महादेवमष्टद्रोणैरथापि वा ।

दशद्रोणैस्तु नैवेद्यमष्टद्रोणैरथापि वा ॥

शतद्रोणसमं पुण्यमाढकेऽपि विधीयते ।

वित्तहीनस्य विप्रस्य नात्र कार्या विचारणा ॥

भेरीमृदङ्गमुरजतिमिरापटहादिभिः 1 वादित्रैर्विविधैश्चान्यैर्निनादैर्विविधैरपि ॥

जागरं कारयेद्यस्तु प्रार्थयेच्च यथाक्रमम् ।

स भृत्यपुत्रदारैश्च तथा सम्बन्धिबान्धवैः ॥

सार्धं प्रदक्षिणं कृत्वा प्रार्थयेल्लिङ्गमुत्तमम् ।

द्रव्यहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनं सुरेश्वर ॥

कृतं वा न कृतं वापि क्षन्तुमर्हसि शङ्कर ।

इत्युक्त्वा वै जपेद्रुद्रं त्वरितं शान्तिमेव च ॥

जपित्वैवं महाबीजं तथा पञ्चाक्षरस्य वै ।

स एवं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम् ॥

तत्फलं समवाप्नोति वाराणस्यां यथा मृतः ।

तथैव मम सायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥

मत्प्रियार्थमिदं कार्यं मद्भक्तैर्विधिपूर्वकम् ।

ये न कुर्वन्ति ते भक्ता न भवन्ति न संशयः ॥

सूत उवाच

निशम्य वचनं देवी गत्वा वाराणसीं पुरीम् ।

अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं पयसा च घृतेन च ॥

अर्चयामास देवेशं रुद्रं भुवननायकम् ।

अविमुक्ते च तपसा मन्दरस्य महात्मनः ॥

कल्पयामास वै क्षेत्रं मन्दरे चारुकन्दरे ।

तत्रान्धकं महादैत्यं हिरण्याक्षसुतं प्रभुः ॥

माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८ ९ | पूर्वक गन्धयुक्त जलसे अभ्यंग पचीस पलसे करना १७५ चाहिये ॥ १७१ - १७४ ॥ विधिपूर्वक शमीपुष्प, बिल्वपत्र, कमल तथा अन्य पुष्प अर्पित करना चाहिये; बिल्वपत्रका त्याग १७६ [ कभी नहीं ] करना चाहिये । महादेवकी पूजा चार अथवा आठ द्रोण पुष्पोंसे करनी चाहिये और दस १७७ अथवा आठ द्रोण नैवेद्य अर्पित करना चाहिये । धनहीन ब्राह्मणके लिये एक आढक नैवेद्यका पुण्य सौ द्रोण नैवेद्य पुण्यके समान बताया गया है; इसमें सन्देह नहीं १७८ करना चाहिये ॥ १७५ - १७७ ॥ भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिर, पटह आदि विविध १७ ९ वाद्य यन्त्रों और अन्य प्रकारके निनादोंके द्वारा [ रात्रिमें ] जो जागरण करे, उसे अपने सेवकों, पुत्रों, पत्नी, सम्बन्धियों तथा बन्धुओंके साथ प्रदक्षिणा १८० करके उत्तम लिङ्गसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये – ' हे सुरेश्वर! हे शंकर! मैंने जो भी द्रव्यहीन, क्रियाहीन तथा श्रद्धाहीन [ पूजन ] किया है अथवा जो १८१ नहीं भी किया गया है, उसे आप कृपा करके क्षमा करें ' – यह प्रार्थना करके त्वरित रुद्र तथा शान्तिमन्त्रका १८२ जप करना चाहिये । पंचाक्षरके महाबीजका जप करके वह सभी तीर्थोंमें जाने तथा सभी यज्ञोंको करनेसे जो फल होता है, उस फलको प्राप्त कर लेता है और १८३ वाराणसीमें मरनेपर जो सायुज्य गति होती है, मेरे उस सायुज्यको प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है । १८४ [ हे देवि! ] मेरे भक्तोंको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक यह सब करें । जो ऐसा नहीं करते, वे मेरे भक्त नहीं होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १७८-१८४ ॥ १८५ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] यह वचन सुनकर वाराणसीपुरी जाकर देवीने दूध तथा घीसे अविमुक्तेश्वर लिङ्गको स्नान कराकर भुवननायक देवेश रुद्रका १८६ अर्चन किया और अविमुक्त [ काशी ] में तपस्याके द्वारा मन्दर - पर्वतपर एक सुन्दर कन्दरामें महात्मा मन्दरका १८७ | क्षेत्र निर्मित किया; वहाँ प्रभु [ शिव ] - ने हिरण्याक्षके

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४ ९ ०

अनुगृह्य गणत्वं च प्रापयामास लीलया ।

एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमादरात् ॥

यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम् ।

सर्वक्षेत्रेषु यत्पुण्यं तत्सर्वं सहसा लभेत् ॥

श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् कृतशौचान् जितेन्द्रियान् । स एव सर्वयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग | पुत्र महादैत्य अन्धकपर अनुग्रह करके लीलापूर्वक १८८ उसे गणत्व प्राप्त कराया था । [ हे ऋषियो! ] इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे आदरपूर्वक सम्पूर्ण कथासार । कहा । जो मनुष्य इस क्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी क्षेत्रोंमें वासका जो पुण्य १८ ९ होता है, वह सब तत्काल प्राप्त कर लेता है अथवा जो सभी पवित्र तथा जितेन्द्रिय द्विजोंको सुनाता है, वह भी समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त कर ॥ १ ९ ० | लेता है ॥ १८५–१९ ० ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वाराणसी श्रीशैलमाहात्म्यकथनं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ २ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' वाराणसी श्रीशैलमाहात्म्यकथन ' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ २ ॥ तिरानबेवाँ अध्याय हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा ऋषय ऊचुः

अन्धको नाम दैत्येन्द्रो मन्दरे चारुकन्दरे ।

दमितस्तु कथं लेभे गाणपत्यं महेश्वरात् ॥ १

वक्तुमर्हसि चास्माकं यथावृत्तं यथाश्रुतम् । | सूत उवाच अन्धकानुग्रहं चैव मन्दरे शोषणं तथा ॥ २

वरलाभमशेषं च प्रवदामि समासतः ।

हिरण्याक्षस्य तनयो हिरण्यनयनोपमः ॥ ३

पुरान्धक इति ख्यातस्तपसा लब्धविक्रमः ।

प्रसादाद् ब्रह्मणः साक्षादवध्यत्वमवाप्य च ॥४

त्रैलोक्यमखिलं भुक्त्वा जित्वा चेन्द्रपुरं पुरा ।

लीलया चाप्रयत्नेन त्रासयामास वासवम् ॥५

बाधितास्ताडिता बद्धाः पातितास्तेन ते सुराः ।

विविशुर्मन्दरं भीता नारायणपुरोगमाः ॥ ६।

एवं सम्पीड्य वै देवानन्धकोऽपि महासुरः ।

यदृच्छया गिरिं प्राप्तो मन्दरं चारुकन्दरम् ॥७

शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति ऋषिगण बोले - [ हे सूतजी! ] अन्धक नामक दैत्यराजने मन्दरपर्वतकी सुन्दर गुफामें दमित होकर किस प्रकार महेश्वरसे गाणपत्य ( गणपतिपद ) प्राप्त किया; जिस प्रकार यह घटित हुआ और जैसा आपने सुना है, वह कृपापूर्वक हम लोगोंको बताइये ॥ ११२ ॥

सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] मैं अन्धकपर [ शिवजीके ] अनुग्रह, मन्दरपर उसके दमन तथा वरप्राप्ति — यह सब संक्षेपमें बता रहा हूँ । प्राचीनकालमें हिरण्याक्षका एक पुत्र था; हिरण्याक्षके समान शक्तिशाली वह अन्धक — इस नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने तपस्यासे महान् पराक्रम प्राप्त कर लिया । वह साक्षात् ब्रह्माकी कृपासे [ किसीसे ] न मारे जानेका वर प्राप्त करके सम्पूर्ण त्रिलोकोंका उपभोग करके इन्द्रलोकको लीलापूर्वक बिना प्रयासके ही जीतकर इन्द्रको पीड़ित करने लगा ॥ २-५ ॥ उसके द्वारा कष्ट पहुँचाये गये, पीटे गये, बाँधे गये, गिराये गये नारायण आदि वे देवता डरकर मन्दरपर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हो गये ॥६ ॥

इस प्रकार देवताओंको बहुत पीडित करके

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अध्याय ९ ३ ] हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा ततस्ते समस्ताः सुरेन्द्राः ससाध्याः सुरेशं महेशं पुरेत्याहुरेवम् । चाल्पवीर्यप्रभिन्नाङ्गभिन्ना वयं दैत्यराजस्य शस्त्रैर्निकृत्ताः ॥ ८

इतीदमखिलं श्रुत्वा दैत्यागममनौपमम् ।

गणेश्वरैश्च भगवानन्धकाभिमुखं ययौ ॥ ९

तत्रेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः सुरेश्वरा विप्रवराश्च सर्वे । जयेति वाचा भगवन्तमूचुः किरीटबद्धाञ्जलयः समन्तात् ॥ १०

अथाशेषासुरांस्तस्य कोटिकोटिशतैस्ततः ।

भस्मीकृत्य महादेवो निर्बिभेदान्धकं तदा ॥ ११

शूलेन शूलिना प्रोतं दग्धकल्मषकञ्चुकम् ।

दृष्ट्वान्धकं ननादेशं प्रणम्य स पितामहः ॥ १२

तन्नादश्रवणान्नेदुर्देवा देवं प्रणम्य तम् ।

ननृतुर्मुनयः सर्वे मुमुदुर्गणपुङ्गवाः ॥ १३

ससृजुः पुष्पवर्षाणि देवाः शम्भोस्तदोपरि ।

त्रैलोक्यमखिलं हर्षान्ननन्द च ननाद च ॥ १४

दग्धोऽग्निना च शूलेन प्रोतः प्रेत इवान्धकः ।

सात्त्विकं भावमास्थाय चिन्तयामास चेतसा ॥ १५

जन्मान्तरेऽपि देवेन दग्धो यस्माच्छिवेन वै ।

आराधितो मया शम्भुः पुरा साक्षान्महेश्वरः ॥ १६

तस्मादेतन्मया लब्धमन्यथा नोपपद्यते ।

यः स्मरेन्मनसा रुद्रं प्राणान्ते सकृदेव वा ॥ १७

स याति शिवसायुज्यं किं पुनर्बहुशः स्मरन् ।

ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ १८ ।

शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति ४ ९ १ महादैत्य अन्धक भी अपनी इच्छासे सुन्दर गुफावाले मन्दरपर्वतपर पहुँच गया ॥७ ॥

तब साध्योंसहित वे सभी देवगण शीघ्र ही सुरेश्वर महेशके सामने पहुँचकर इस प्रकार बोले-' दैत्यराज [ अन्धक ] -के शस्त्रोंसे काटे गये हमलोग छिन्न - भिन्न अंगोंवाले हो गये हैं और अल्प पराक्रमवाले हो गये हैं'॥८ ॥

तब दैत्यका अद्भुत आगमन - सम्बन्धी यह सब वृत्तान्त सुनकर भगवान् शिव अपने गणेश्वरोंके साथ अन्धकके समक्ष पहुँचे ॥ ९ ॥

उस समय इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रधान सुरेश्वर तथा श्रेष्ठ विप्र – ये सब बद्ध अंजलियोंको सिरसे लगाकर चारों ओरसे भगवान् शिवकी जय बोलने लगे ॥ १० ॥

तब महादेवने सैकड़ों - करोड़ों सैनिकोंके साथ उस अन्धकके समस्त राक्षसोंको भस्म करके अन्धकको [ अपने त्रिशूलसे ] बींध डाला ॥११ ॥

शिवके द्वारा त्रिशूलसे बींधे गये उस दग्धपापरूपी कंचुकवाले अन्धकको देखकर ब्रह्माजी ईश्वर ( शिव ) -को प्रणाम करके [ प्रसन्नतासे ] निनाद करने लगे ॥ १२ ॥

उस ध्वनिको सुनकर सभी देवता, मुनि तथा श्रेष्ठ गण भी उन्हें प्रणाम करके हर्षध्वनि करने लगे, नाचने लगे और आनन्द मनाने लगे । देवताओंने उस समय शिवजीके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा की और सम्पूर्ण त्रैलोक्य हर्षके कारण आनन्दित हो उठा लगा ॥ १३-१४ ॥ प्रज्वलित अग्निवाले त्रिशूलसे वह अन्धक सात्त्विक भावमें स्थित लगा - ' पूर्वजन्ममें भी शिवने मुझे पहले साक्षात् महेश्वर शिवकी इसीलिये मैंने ऐसी गति प्राप्त की, न होता । जो [ व्यक्ति ] मृत्युकालके तथा ध्वनि करने बींधा हुआ प्रेततुल्य होकर मनमें सोचने दग्ध किया था, मैंने आराधना की थी, अन्यथा ऐसा कभी समय एक बार भी मनसे शिवका स्मरण करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है, तो फिर जो बहुत बार स्मरण करे, उसका कहना ही क्या! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और इन्द्रसहित सभी

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४ ९ २ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

शरणं प्राप्य तिष्ठन्ति तमेव शरणं व्रजेत् ।

एवं सञ्चिन्त्य तुष्टात्मा सोऽन्धकश्चान्धकार्दनम् ॥

सगणं शिवमीशानमस्तुवत्पुण्यगौरवात् ।

प्रार्थितस्तेन भगवान् परमार्तिहरो हरः ॥

हिरण्यनेत्रतनयं शूलाग्रस्थं सुरेश्वरः ।

प्रोवाच दानवं प्रेक्ष्य घृणया नीललोहितः ॥

तुष्टोऽस्मि वत्स भद्रं ते कामं किं करवाणि ते ।

वरान् वरय दैत्येन्द्र वरदोऽहं तवान्धक ॥

श्रुत्वा वाक्यं तदा शम्भोर्हिरण्यनयनात्मजः ।

हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाचेदं महेश्वरम् ॥

भगवन् देवदेवेश भक्तार्तिहर शङ्कर ।

त्वयि भक्तिः प्रसीदेश यदि देयो वरश्च मे ॥

श्रुत्वा भवोऽपि वचनमन्धकस्य महात्मनः ।

प्रददौ दुर्लभां श्रद्धां दैत्येन्द्राय महाद्युतिः ॥

गाणपत्यं च दैत्याय प्रददौ चावरोप्य तम् ।

प्रणेमुस्तं सुरेन्द्राद्या गाणपत्ये प्रतिष्ठितम् ॥

| देवता उन्हींकी शरण ग्रहण करके स्थित हैं, अत: उन्हीं १ ९ । [ शिव ] - की शरणमें जाना चाहिये ' ॥ १५ - १८२ इस प्रकार विचार करके वह अन्धक ॥ अपने पुण्यगौरव के कारण गणोंसहित अन्धकका संहार करनेवाले २० उन ईशान शिवकी स्तुति करने लगा । तब उसके द्वारा प्रार्थित होकर बड़े - से - बड़े दुःखका हरण करनेवाले नीललोहित सुरेश्वर भगवान् हर [ अपने ] त्रिशूलके २१ अग्रभागपर स्थित हिरण्याक्षपुत्र [ अन्धक ] - की ओर | दयापूर्वक देखकर उससे बोले — ' हे वत्स! मैं [ तुमपर ] प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हारी कौन - सी कामना पूर्ण करूँ? हे दैत्येन्द्र! वर माँगो । हे अन्धक! २२ मैं तुम्हें वर देनेवाला हूँ ' ॥ १ ९ -२२ ॥ तब शम्भुका वचन सुनकर हिरण्याक्षपुत्रने हर्षके कारण गद्गद वाणीमें महेश्वरसे यह कहा — ' हे २३ भगवन्! हे देवदेवेश! भक्तोंका कष्ट हरनेवाले हे शंकर! मुझपर प्रसन्न होइये । हे ईश! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यही वर प्रदान करें कि आपमें २४ [ सदा ] मेरी भक्ति हो ' ॥ २३-२४ ॥ महान् आत्मावाले अन्धकका वचन सुनकर परम कान्तिवाले शिवने [ उस ] दैत्येन्द्रको [ अपनी ] दुर्लभ २५ भक्ति प्रदान की और उस दैत्यको त्रिशूलपरसे उतारकर उसे गणाधिप पद प्रदान किया । तब इन्द्र आदि देवताओंने गाणपत्य पदपर प्रतिष्ठित उस अन्धकको २६ | प्रणाम किया ॥ २५-२६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अन्धकगाणपत्यात्मको नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' अन्धकगाणपत्यात्मक ' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ३ ॥ चौरानबेवाँ अध्याय भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओं द्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले- हे सूतजी! [ भगवान् ] विष्णुके कथमस्य पिता दैत्यो हिरण्याक्षः सुदारुणः । द्वारा इस [ अन्धक ] -का पिता महाभयंकर दैत्य हिरण्याक्ष विष्णुना सूदितो विष्णुर्वाराहत्वं कथं गतः ॥ १ कैसे मारा गया, विष्णुने वाराहका रूप क्यों धारण किया तस्य शृङ्गं महेशस्य भूषणत्वं कथं गतम् । । और उनकी सींगने महेश्वरका कैसे प्राप्त एतत्सर्वं विशेषेण सूत वक्तुमिहार्हसि ॥ २ । किया? यह सब आप विशेषरूपसे भूषणत्व बताइये॥१-२ ॥

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अध्याय ९ ४ ] भगवान्‌के! वाराहावतारकी कथा, 96 96 96 96 96 96 96 96 95 6 सूत उवाच हिरण्यकशिपोर्भ्राता हिरण्याक्ष इति स्मृतः

FKKKKKKKKKKK ।

पुरान्धकासुरेशस्य पिता कालान्तकोपमः ॥

देवाञ्जित्वाथ दैत्येन्द्रो बद्ध्वा च धरणीमिमाम् ।

नीत्वा रसातलं चक्रे बन्दीमिन्दीवरप्रभाम् ॥

ततः सब्रह्मका देवाः परिम्लानमुखश्रियः ।

बाधितास्ताडिता बद्धा हिरण्याक्षेण तेन वै ॥

बलिना दैत्यमुख्येन क्रूरेण सुदुरात्मना ।

प्रणम्य शिरसा विष्णुं दैत्यकोटिविमर्दनम् ॥

सर्वे विज्ञापयामासुर्धरणीबन्धनं हरेः ।

श्रुत्वैतद्भगवान् विष्णुर्धरणीबन्धनं हरिः ॥

भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ यथा लिङ्गोद्भवे तथा ।

दैत्यैश्च सार्धं दैत्येन्द्रं हिरण्याक्षं महाबलम् ॥

दंष्ट्रा कोट्या हत्वैनं रेजे दैत्यान्तकृत्प्रभुः ।

कल्पादिषु यथापूर्वं प्रविश्य च रसातलम् ॥

आनीय वसुधां देवीमङ्कस्थामकरोद् बहिः ।

ततस्तुष्टाव देवेशं देवदेवः पितामहः ॥

शक्राद्यैः सहितो भूत्वा हर्षगद्गदया गिरा ।

शाश्वताय वराहाय दंष्ट्रिणे दण्डिने नमः ॥

नारायणाय सर्वाय ब्रह्मणे परमात्मने ।

कर्त्रे धर्त्रे धरायास्तु हर्त्रे देवारिणां स्वयम् ।

कर्त्रे नेत्रे सुरेन्द्राणां शास्त्रे च सकलस्य च ॥

त्वमष्टमूर्तिस्त्वमनन्तमूर्ति-स्त्वमादिदेवस्त्वमनन्तवेदितः त्वया कृतं सर्वमिदं प्रसीद सुरेश लोकेश वराह विष्णो ॥ तथैकदंष्ट्राग्रमुखाग्रकोटि-भागैकभागार्धतमेन विष्णो । हताः क्षणात्कामददैत्यमुख्याः स्वदंष्ट्रकोट्या सह पुत्रभृत्यैः ॥ हिरण्याक्षका वध भगवान् वाराहकी स्तुति ४ ९ ३ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] हिरण्याक्ष हिरण्य-कशिपुका भाई कहा गया है । पूर्वकालमें असुरेन्द्र ३ अन्धकके पिता दैत्येन्द्र हिरण्याक्षने, जो कालान्तकके समान था, देवताओंको जीतकर कमलके समान प्रभावाली ४ इस पृथ्वीको बाँधकर रसातलमें ले जाकर उसे बन्दी बना लिया ॥ ३-४ ॥ तदनन्तर बलशाली, क्रूर तथा अति दुरात्मा उस ५ महादैत्य हिरण्याक्षके द्वारा सताये गये, पीटे गये तथा बाँधे गये ब्रह्मासहित मुरझाये मुखश्रीवाले सभी देवताओंने करोड़ों ६ दैत्योंका संहार करनेवाले विष्णुको प्रणाम करके पृथ्वीके बन्धनका वृत्तान्त उन हरिको बताया ॥५-६१२ ॥ इस पृथ्वीबन्धनको सुनकर उन भगवान् श्रीहरि ७ विष्णुने लिङ्ग - प्रादुर्भाव के समय जैसा रूप धारण किया था, वैसा ही यज्ञवाराहका रूप धारणकर वे अपने ८ दाँतोंके आगेके नुकीले भागसे [ सभी ] दैत्योंसहित महाबली दैत्यराज हिरण्याक्षका वध करके सुशोभित हुए । दैत्योंका अन्त करनेवाले उन प्रभुने जैसे पूर्व ९ कल्पोंमें रसातलमें प्रवेश किया था, वैसे ही रसातलमें प्रवेश करके पृथ्वीदेवीको अपनी गोदमें रखकर वहाँसे १० लाकर पुनः बाहर स्थापित कर दिया ॥ ७ – ९ १ / २ ॥ तत्पश्चात् देवदेव ब्रह्मा हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें इन्द्र आदि [ देवताओं ] -के साथ मिलकर [ उन ] देवेशकी ११ | स्तुति करने लगे - शाश्वत, दंष्ट्र ( दाढ़ ) - वाले, दण्डधारी, नारायण, सर्वमय, ब्रह्मस्वरूप, परमात्मा, पृथ्वीकी रचना तथा रक्षा करनेवाले, देवताओंके शत्रुओंका नाश करनेवाले, १२ सुरेन्द्रोंके जनक एवं नायक और सबके नियन्ता [ भगवान् ] वाराहको नमस्कार है ॥ १०–१२ ॥ हे सुरेश! हे लोकेश! हे वाराह! हे विष्णो! आप अष्टमूर्ति हैं, आप अनन्तमूर्ति हैं, आप आदिदेव हैं, आप सर्वज्ञ हैं; आपने ही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना १३ की है; आप प्रसन्न होइये ॥१३ ॥

हे विष्णो! आपने एक दाढ़के अग्र भागकी कोटिके एक भागके आधे भागके बराबर अपनी दाढ़ी कोटिसे ही पुत्रों तथा सेवकोंसमेत कामद आदि १४ । प्रधान दैत्योंको क्षणभरमें मार डाला ॥१४ ॥

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४ ९ ४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग हे देव! हे धरेश! हे पर्वताकार! हे सेवितचन्द्रवक्त्र त्वयोद्धृता देव धरा धरेश आपने दिग्गजों, सभी प्राणियों, समुद्रों देवताओं! धराधराकार धृताग्रदंष्ट्रे ।, तथा धराधरैः सर्वजनैः समुद्रैः सुरासुरैः सेवितचन्द्रवक् ॥ १५ त्वयैव देवेश विभो कृतश्च जयः सुराणामसुरेश्वराणाम् । अहो प्रदत्तस्तु वरः प्रसीद वाग्देवतावारिजसम्भवाय ॥ १६ तव रोम्ण सकलामरेश्वरा नयनद्वये शशिरवी पदद्वये निहिता रसातलगता वसुन्धरा तव पृष्ठतः सकलतारकादयः जगतां हिताय भवता वसुन्धरा भगवन् रसातलपुटं गता तदा अबलोद्धृता च भगवंस्तवैव सकलं त्वयैव हि धृतं जगद्गुरो इ वाक्पतिर्बहुविधैस्तवार्चनैः प्रणिपत्य विष्णुममरैः प्रजापतिः विविधान् वरान् हरिमुखात्तु लब्धवान् हरिनाभिवारिजदेहभृत्स्वयम् अथ तामुद्धृतां तेन धरां देवा मुनीश्वराः मूर्थ्यारोप्य नमश्चक्रुश्चक्रिणः सन्निधौ तदा । असुरोंसहित पृथ्वीको उठा लिया और उसे अपनी दाढ़ के अग्र भागपर रख लिया ॥ १५ ॥

॥ १७ हे देवेश! हे विभो! आपने ही असुरोंपर देवताओंकी विजय दिलायी है । अहो, आपने ही सरस्वतीयुक्त ब्रह्माको वर दिया था; आप प्रसन्न हो जाइये ॥ १६ ॥

सभी देवता आपके रोममें स्थित हैं, चन्द्रमा तथा । सूर्य आपके दोनों नेत्रोंमें विराजमान हैं, रसातलमें गयी हुई पृथ्वी आपके दोनों चरणोंमें निहित है, सम्पूर्ण तारे ॥ ९ ८ आदि आपकी पीठपर स्थित हैं ॥ १७ ॥

हे भगवन्! आपने रसातलमें गयी हुई अबला पृथ्वीका उद्धार जगत्के हितके लिये किया है । हे भगवन्! हे जगद्गुरो! आपने ही सबको धारण किया । है ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीहरिके नाभिकमलसे उत्पन्न होनेवाले प्रजापति ब्रह्माने देवताओंके साथ अनेक प्रकार के ॥१ ९ | स्तुतिवचनोंसे [ वाराहरूपधारी ] विष्णुको प्रणाम कर उन [ भगवान् ] विष्णुके मुखसे अनेक वर प्राप्त किये ॥ १ ९ ॥ । इसके बाद सभी देवताओं तथा मुनीश्वरोंने उन ॥ २० । विष्णुके द्वारा लायी गयी पृथ्वीको [ अपने ] र

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अध्याय ९ ४ ] भगवान्‌के वाराहावतारकी कथा

अनेनैव वराहेण चोद्धृतासि वरप्रदे ।

कृष्णेनाक्लिष्टकार्येण शतहस्तेन विष्णुना ॥

धरणि त्वं महाभोगे भूमिस्त्वं धेनुरव्यये ।

लोकानां धारणी त्वं हि मृत्तिके हर पातकम् ॥

मनसा कर्मणा वाचा वरदे वारिजेक्षणे ।

त्वया हतेन पापेन जीवामस्त्वत्प्रसादतः ॥

इत्युक्ता सा तदा देवी धरा देवैरथाब्रवीत् ।

वराहदंष्ट्राभिन्नायां धरायां मृत्तिकां द्विजाः ॥

मन्त्रेणानेन योऽबिभ्रत् मूर्ध्नि पापात्प्रमुच्यते ।

आयुष्मान् बलवान् धन्यः पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥

क्रमाद्भुवि दिवं प्राप्य कर्मान्ते मोदते सुरैः ।

अथ देवे गते त्यक्त्वा वराहे क्षीरसागरम् ॥

वाराहरूपमनघं चचाल च धरा पुनः ।

तस्य दंष्ट्राभराक्रान्ता देवदेवस्य धीमतः ॥

यदृच्छया भवः पश्यन् जगाम जगदीश्वरः ।

दंष्ट्रां जग्राह दृष्ट्वा तां भूषणार्थमथात्मनः ॥

दधार च महादेवः कूर्चान्ते वै महोरसि ।

देवाश्च तुष्टुवुः सेन्द्रा देवदेवस्य वैभवम् ॥

धरा प्रतिष्ठिता ह्येवं देवदेवेन लीलया ।

भूतानां सम्प्लवे चापि विष्णोश्चैव कलेवरम् ॥

ब्रह्मणश्च तथान्येषां देवानामपि लीलया ।

विभुरङ्गविभागेन भूषितो न यदि प्रभुः ॥

कथं विमुक्तिर्विप्राणां तस्माद्दंष्ट्री महेश्वरः ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे , हिरण्याक्षका वध भगवान् वाराहकी स्तुति ४ ९ ५ लगाकर चक्रधारी विष्णुके सामने ही उसे नमस्कार किया । २१ [ वे बोले - ] हे वरप्रदे! सहज क्रिया - कलापोंवाले तथा सैकड़ों हाथोंवाले वाराहरूपधारी इन विष्णुने ही आपका उद्धार किया है । हे धरणि! हे महाभोगे! आप भूमि हैं । हे २२ । अव्यये! आप धेनु हैं । हे मृत्तिके! आप लोकोंको धारण करनेवाली हैं; [ हमारे ] पापको दूर कीजिये । हे वरदे! हे कमलनयने! हमलोगोंद्वारा मन - वचन - कर्मसे किये गये २३ पाप आपके द्वारा नष्ट किये जानेपर ही हमलोग आपकी कृपासे जीते हैं ॥ २०–२३ ॥ देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन पृथ्वीदेवीने २४ | कहा— ' हे द्विजो! जो [ व्यक्ति ] वाराहके दंष्ट्रासे खोदी गयी पृथ्वीकी मिट्टीको [ पूर्वोक्त ] इस मन्त्रसे अपने सिरपर धारण करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है; २५ वह क्रमसे पृथ्वीलोकमें दीर्घजीवी, बलवान्, धन्य और पुत्र - पौत्रसे युक्त होता है, पुनः प्रारब्ध कर्मके क्षीण होनेपर स्वर्ग प्राप्त करके देवताओंके साथ आनन्द २६ मनाता है ' ॥ २४-२५१ / २ ॥ इसके बाद निष्पाप वाराहरूपको त्यागकर भगवान् वाराहके क्षीरसागर चले जानेपर उन बुद्धिमान् देवदेवके २७ । दाढ़ोंके भारसे आक्रान्त पृथ्वी एक बार पुनः हिल गयी । संयोगवश यह सब देखते हुए जगत्के स्वामी शिव वहाँ पहुँच गये और उन्होंने उस दंष्ट्राको देखकर उसे अपने २८ भूषणके लिये ग्रहण कर लिया । महादेवने उसे अपने श्मश्रु ( दाढ़ी ) - के केशके समीप विशाल वक्षःस्थलपर धारण कर लिया ॥ २६ - २८ १/२ ॥ २ ९ तब इन्द्रसहित सभी देवगण देवदेव [ शिव ] -के ऐश्वर्यकी स्तुति करने लगे । इस प्रकार देवदेवने ३० लीलापूर्वक पृथ्वीको प्रतिष्ठित किया । महाप्रलयकालमें भी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंके कलेवरको देखकर यदि सर्वव्यापक प्रभु [ शिव ] भक्तवात्सल्यके ३१ कारण [ विष्णुके ] अंगके अंश [ उस द्रष्टा ] - से विभूषित न होते, तो विप्रोंकी मुक्ति कैसे होती; अतः महेश्वर ३२ | दंष्ट्री हैं ॥ २ ९ –३२ ॥ वाराहप्रादुर्भावो नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' वाराहप्रादुर्भाव ' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ४ ॥

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४ ९ ६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग पंचानबेवाँ अध्याय नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा, हिरण्यकशिपुका वध, भगवान् नृसिंहके उग्ररूपको देखकर देवताओंका भयभीत होकर भगवान् महेश्वरकी स्तुति करना, महेश्वरके शरभावतारका प्राकट्य ऋषय ऊचुः

नृसिंहेन हतः पूर्वं हिरण्याक्षाग्रजः श्रुतम् ।

कथं निषूदितस्तेन हिरण्यकशिपुर्वद ॥

सूत उवाच

हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लाद इति विश्रुतः ।

धर्मज्ञः सत्यसम्पन्नस्तपस्वी चाभवत्सुधीः ॥

जन्मप्रभृति देवेशं पूजयामास चाव्ययम् ।

सर्वज्ञं सर्वगं विष्णुं सर्वदेवभवोद्भवम् ॥

तमादिपुरुषं भक्त्या परब्रह्मस्वरूपिणम् ।

ब्रह्मणोऽधिपतिं सृष्टिस्थितिसंहारकारणम् ॥

सोऽपि विष्णोस्तथाभूतं दृष्ट्वा पुत्रं समाहितम् ।

नमो नारायणायेति गोविन्देति मुहुर्मुहुः ॥

स्तुवन्तं प्राह देवारिः प्रदहन्निव पापधीः ।

न मां जानासि दुर्बुद्धे सर्वदैत्यामरेश्वरम् ॥

प्रह्लाद वीर दुष्पुत्र द्विजदेवार्तिकारणम् ।

को विष्णुः पद्मजो वापि शक्रश्च वरुणोऽथ वा ॥

वायुः सोमस्तथेशानः पावको मम यः समः ।

मामेवार्चय भक्त्या च स्वल्पं नारायणं सदा ॥

प्रह्लाद जीविते वाञ्छा तवैषा शृणु चास्ति चेत् ।

श्रुत्वापि तस्य वचनं हिरण्यकशिपोः सुधीः ॥

प्रह्रादः पूजयामास नमो नारायणेति च ।

नमो नारायणायेति सर्वदैत्यकुमारकान् ॥

अध्यापयामास च तां ब्रह्मविद्यां सुशोभनाम् ।

दुर्लङ्घयां चात्मनो दृष्ट्वा शक्रादिभिरपि स्वयम् ॥

ऋषिगण बोले— [ हे सूतजी! ] यह सुना गया है कि पूर्वकालमें हिरण्याक्षका ज्येष्ठ भ्राता हिरण्य-१ कशिपु भगवान् नृसिंहद्वारा मारा गया था; आप [ हम-लोगोंको ] बतायें कि उनके द्वारा उसका वध कैसे किया गया? ॥ १ ॥

सूतजी बोले – हिरण्यकशिपुका पुत्र ‘ प्रह्लाद ’ २ इस नामसे विख्यात था । वह धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ, तपस्वी तथा बुद्धिमान् था । वह जन्मसे ही अविनाशी, सर्वज्ञ, ३ सभी देवताओंकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप, आदिपुरुष, परब्रह्मरूप, ब्रह्माके अधिपति और सृष्टि- पालन - संहार करनेवाले उन देवेश्वर विष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा करता ४ था ॥ २–४ ॥ अपने पुत्रको एकाग्रचित्त होकर विष्णुकी उस प्रकारकी भक्तिमें तत्पर और बार - बार ' नमो नारायणाय, ५ नमो गोविन्दाय ' – इस प्रकार स्तुति करते हुए देखकर उस पापबुद्धि तथा देवशत्रु हिरण्यकशिपुने हँसते हुए ६ कहा- हे दुर्बुद्धे! हे प्रह्लाद! हे वीर! हे दुष्पुत्र! सभी दैत्यों तथा देवताओंके स्वामी और ब्राह्मणों तथा देवताओंको दुःख देनेवाले मुझ [ हिरण्यकशिपु ] -को ७ नहीं जानते हो । विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, वायु, चन्द्र, ईशान अथवा अग्नि- इनमें ऐसा कौन जो ८ मेरे समान है; अतः तुम नारायणको पूर्णरूपसे छोड़कर सदा भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो । प्रह्लाद! यदि | जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो, तो [ ध्यान देकर ] ९ इस बातको सुन लो॥५–८१ / २ ॥ उस हिरण्यकशिपुका वचन सुनकर भी बुद्धिमान् १० प्रह्लाद [ विष्णुकी ] पूजा करता रहा और ' नमो नारायणाय, नमो नारायणाय ' - ऐसा उच्चारण करता रहा । उसने सभी दैत्यकुमारोंको [ नारदोपदिष्ट ] वह उत्तम ब्रह्मविद्या ११ । भी सिखायी । तब इन्द्र आदिके द्वारा भी दुर्लङ्घ्य अपनी

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अध्याय ९ ५ ] नृसिंहावतारके सन्दर्भमें भक्त प्रह्लादकी कथा " महेश्वरके शरभावतारकाप्राकट्य ४ ९ ७ पुत्रेण लङ्घितामाज्ञां हिरण्यः प्राह दानवान् । आज्ञाको स्वयं अपने पुत्रके द्वारा उल्लंघित देखकर एतं नानाविधैर्वध्यं दुष्पुत्रं हन्तुमर्हथ ॥ १२ हिरण्यकशिपुने दानवों से कहा — इस वधयोग्य कुपुत्रको अनेकविध उपायोंसे मार डालो ॥ ९ - १२ ॥ तब उस दुरात्मा दैत्यके कहनेपर वे दानव देवदेव

एवमुक्तास्तदा तेन दैत्येन सुदुरात्मना ।

निजघ्नुर्देवदेवस्य भृत्यं प्रह्रादमव्ययम् ॥१३

तत्र तत्प्रतिकृतं तदा सुरै-दैत्यराजतनयं द्विजोत्तमाः ।

क्षीरवारिनिधिशायिनः प्रभो-र्निष्फलं त्वथ बभूव तेजसा ॥ १४

तदाथ गर्वभिन्नस्य हिरण्यकशिपोः प्रभुः ।

तत्रैवाविरभूद्धन्तुं नृसिंहाकृतिमास्थितः ॥

जघान च सुतं प्रेक्ष्य पितरं दानवाधमम् ।

बिभेद तत्क्षणादेव करजैर्निशितैः शतैः ॥

ततो निहत्य तं दैत्यं सबान्धवमघापहः ।

पीडयामास दैत्येन्द्रं युगान्ताग्निरिवापरः ॥

नादैस्तस्य नृसिंहस्य घोरैर्वित्रासितं जगत् ।

आब्रह्मभुवनाद्विप्राः प्रचचाल च सुव्रताः ॥

१५ [ विष्णु ] -के नाशरहित भक्त प्रह्लादको मारने लगे ॥ १३ ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस समय असुरोंके द्वारा दैत्यराज [ हिरण्यकशिपु ] - के पुत्रके प्रति किया गया समस्त उपाय क्षीरसागरमें शयन करनेवाले विष्णु तेजसे निष्फल ( व्यर्थ ) हो गया ॥ १४ ॥

१६ तत्पश्चात् अभिमानके मदमें चूर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये विष्णुजी नृसिंहरूप धारण करके वहींपर प्रकट हुए और उन्होंने पुत्र [ प्रह्लाद ] - की ओर देखकर उसके पिता दानवाधम हिरण्यकशिपुका वध १७ कर दिया । उन्होंने उसी क्षण अपने तीक्ष्ण सैकड़ों नाखूनों से उसे विदीर्ण कर दिया । इसके बाद पापोंका नाश करनेवाले वे विष्णु बान्धवोंसहित उस दैत्यका वध करके पुनः उस दैत्येन्द्रको पीसने लगे; वे उस समय प्रलयकालीन दूसरी अग्निके समान प्रतीत हो रहे १८ । थे । हे सुव्रतो! हे विप्रो! उस समय ब्रह्मलोकपर्यन्त

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४ ९ ८ श्रीलिङ्गमहापुराण दृष्ट्वा सुरासुरमहोरगसिद्धसाध्या-स्तस्मिन् क्षणे हरिविरिञ्चिमुखा नृसिंहम् । धैर्यं बलं च समवाप्य ययुर्विसृज्य आदिङ्मुखान्तमसुरक्षणतत्पराश्च ॥१ ततस्तैर्गतैः सैष देवो नृसिंहः सहस्त्राकृतिः सर्वपात्सर्वबाहुः । सहस्रेक्षणः सोमसूर्याग्निनेत्र-| सम्पूर्ण जगत् उन और काँपने लगा ॥ उस समय ९ | रक्षामें तत्पर सभी ब्रह्मा - विष्णु आदि [ पूर्वभाग नृसिंहके गर्जनसे भयभीत १५–१८ ॥ हो गया नृसिंहको देखकर अपने प्राणकी देवता, दानव, नाग, सिद्ध, साध्य भी किसी तरह धैर्य तथा, बल धारणकर उस स्थानको छोड़कर सभी दिशाओं में गये ॥ १ ९ ॥ भाग तदनन्तर उनके चले जानेपर मायामय ये भगवान् स्तदा संस्थितः सर्वमावृत्य मायी ॥ २० नृसिंह हजाररूपवाले, सभी ओर पैरोंवाले, सभी आर

तं तुष्टुवुः सुरश्रेष्ठा लोकालोकाचले स्थिताः ।

सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सयमाः समरुद्गणाः ॥ २१

परात्परतरं ब्रह्म तत्त्वातत्त्वतमं भवान् । ज्योतिषां तु परं ज्योतिः परमात्मा जगन्मयः ॥ २२

स्थूलं सूक्ष्मं सुसूक्ष्मं च शब्दब्रह्ममयः शुभः ।

वागतीतो निरालम्बो निर्द्वन्द्वो निरुपप्लवः ॥ २३

यज्ञभुग्यज्ञमूर्तिस्त्वं यज्ञिनां फलदः प्रभुः ।

भवान् मत्स्याकृतिः कौर्ममास्थाय जगति स्थितः ॥ २४

वाराहीं चैव तां सैंहीमास्थायेह व्यवस्थितः । देवानां देवरक्षार्थं निहत्य दितिजेश्वरम् ॥ २५

द्विजशापच्छलेनैवमवतीर्णोऽसि लीलया ।

न दृष्टं यत्त्वदन्यं हि भवान् सर्वं चराचरम् ॥ २६

भवान् विष्णुर्भवान् रुद्रो भवानेव पितामहः ।

भवानादिर्भवानन्तो भवानेव वयं विभो ॥ २७

भवानेव जगत्सर्वं प्रलापेन किमीश्वर । मायया बहुधा संस्थमद्वितीयमयं । प्रभो ॥ २८ | भुजाओंवाले, हजार नेत्रोंवाले, चन्द्र - सूर्य- अग्निरूप नेत्रोंवाले होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित हो गये ॥ २० ॥

तब लोकालोक [ मर्यादा ] पर्वतपर एकत्र हुए श्रेष्ठ देवता ब्रह्मा, साध्यगण, यम तथा मरुद्गणोंके साथ उनकी स्तुति करने लगे- आप परसे भी परतर ब्रह्म हैं, तत्त्वसे भी तत्त्वतम हैं, नक्षत्रोंकी परम ज्योति हैं, परमात्मा हैं, जगन्मय हैं, स्थूल सूक्ष्म तथा अत्यन्त सूक्ष्म हैं, शब्दब्रह्ममय हैं, परम पवित्र हैं, वाणीसे परे हैं, आश्रयरहित हैं, [ सुख - दुःख, राग - द्वेष आदि ] द्वन्द्वोंसे रहित हैं और उपद्रवशून्य हैं । आप प्रभु यज्ञभोक्ता हैं, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, आप यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले हैं, आपने मत्स्यरूप धारण किया, आप कूर्म ( कच्छप ) - का रूप धारण करके । जगत् में स्थित हैं । देवताओंकी रक्षाके लिये वाराह तथा नृसिंहका रूप धारणकर दैत्येन्द्रका वध करके आप इस लोकमें प्रतिष्ठित हुए । इसी प्रकार भृगुमुनिके शापके बहाने अपनी लीलासे आपने अवतार ग्रहण किया । आपसे पृथक् अन्य कुछ भी नहीं देखा गया है; आप चर - अचर सब कुछ हैं । हे विभो! आप ही विष्णु हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही आदि हैं, आप ही अन्त हैं और आप ही हम सब हैं । आप [ स्वयं ] सम्पूर्ण जगत् हैं; हे ईश्वर! अधिक कहने से क्या प्रयोजन? हे प्रभो! अद्वितीय ( एक ) होते हुए भी [ अपनी ] मायासे अनेक रूपोंमें स्थित आप [ प्रभु ] -