श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1491–1500

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1491–1500

पृष्ठ 1491

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1491 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समुद्रमन्थनसे निकली हुई सभी वस्तुएँ हमें मिल जायँ । जब असुर उस अमृतसे भरे कलशको छीन ले गये, तब देवताओंका मन विषादसे भर गया । अब वे भगवान्की शरणमें आये । उनकी दीन दशा देखकर भक्तवाञ्छाकल्पतरु भगवान्ने कहा – ' देवताओ! तुमलोग खेद मत करो । मैं अपनी मायासे उनमें आपसकी फूट डालकर अभी तुम्हारा काम बना देता हूँ ' ॥३५-३७ ॥ परीक्षित्! अमृतलोलुप दैत्योंमें उसके लिये आपस में झगड़ा खड़ा हो गया । सभी कहने लगे ‘ पहले मैं पीऊँगा, पहले मैं; तुम नहीं, तुम नहीं ' ॥ ३८ ॥ उनमें जो दुर्बल थे, वे उन

बलवान् दैत्योंका विरोध करने लगे, जिन्होंने कलश छीनकर अपने हाथमें कर लिया था, वे ईर्ष्यावश धर्मकी दुहाई देकर उनको रोकने और बार - बार कहने लगे कि ' भाई! देवताओंने भी हमारे बराबर ही परिश्रम किया है, उनको भी यज्ञभागके समान इसका भाग मिलना ही चाहिये । यही सनातनधर्म है ' ॥३९ -४० ॥ इस प्रकार इधर दैत्योंमें ' तू - तू, मैं - मैं ' हो रही थी और उधर सभी उपाय जाननेवालोंके स्वामी चतुरशिरोमणि भगवान्ने अत्यन्त अद्भुत और अवर्णनीय स्त्रीका रूप धारण किया ॥ ४१ ॥

शरीरका रंग नील कमलके समान श्याम एवं देखने ही योग्य था । अंग - प्रत्यंग बड़े ही आकर्षक थे । दोनों कान बराबर और कर्णफूलसे सुशोभित थे । सुन्दर कपोल, ऊँची नासिका और रमणीय मुख ॥४२ ॥ नयी जवानीके कारण स्तन उभरे हुए थे और उन्हींके भारसे कमर

पतली हो गयी थी । मुखसे निकलती हुई सुगन्धके प्रेमसे गुनगुनाते हुए भौंरे उसपर टूटे पड़ते थे, जिससे नेत्रोंमें कुछ घबराहटका भाव आ जाता था ॥४३ ॥

बिभ्रत् स्वकेशभारेण मालामुत्फुल्लमल्लिकाम् ।

सुग्रीवकण्ठाभरणं सुभुजाङ्गदभूषितम् ॥४४

विरजाम्बरसंवीतनितम्बद्वीपशोभया ।

काञ्च्या प्रविलसद्वल्गुचलच्चरणनूपुरम् ॥ ४५

सव्रीडस्मितविक्षिप्तभ्रूविलासावलोकनैः ।

दैत्ययूथपचेतः सु काममुद्दीपयन् मुहुः ॥४६

अपने लंबे केशपाशोंमें उन्होंने खिले हुए बेलेके पुष्पोंकी माला गूँथ रखी थी । सुन्दर गलेमें कण्ठके आभूषण और सुन्दर भुजाओंमें बाजूबंद सुशोभित थे ॥ ४४ ॥ इनके चरणोंके

नूपुर मधुर ध्वनिसे रुनझुन - रुनझुन कर रहे थे और स्वच्छ साड़ीसे ढके नितम्बद्वीपपर शोभायमान करधनी अपनी अनूठी छटा छिटका रही थी ॥ ४५ ॥ अपनी सलज्ज मुसकान,

नाचती हुई तिरछी भौंहें और विलासभरी चितवनसे मोहिनी - रूपधारी भगवान् दैत्यसेनापतियोंके चित्तमें बार - बार कामोद्दीपन करने लगे ॥ ४६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भगवन्मायोपलम्भनं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1492

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1492 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नामाष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

१. प्रा ० पा ० — मेध्यस्य । २. प्रा ० पा ० – हरञ्छृङ्गव ० । ३. प्रा ० पा ० — निष्कग्रीवाः । १. प्रा ० पा ० — नार्यश्च । २. प्रा ० पा ० - चारस ० । १. प्रा ० पा ० — श्रयसद्गुणा ० । १. प्रा ० पा ० — महास्कन्धः | २. प्रा ० पा ० - नील ० । ३. प्रा ० पा ० - शुभाङ्गः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1493

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1493 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ नवमोऽध्यायः मोहिनीरूपसे भगवान्के द्वारा अमृत बाँटा जाना श्रीशुक उवाच

तेऽन्योन्यतोऽसुराः पात्रं हरन्तस्त्यक्तसौहृदाः ।

क्षिपन्तो दस्युधर्माण आयान्तीं ददृशुः स्त्रियम् ॥१

अहो रूपमहो धाम अहो अस्या नवं वयः ।

इति ते तामभिद्रुत्य पप्रच्छुर्जातहृच्छयाः ॥२

का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कुतो वा किं चिकीर्षसि ।

कस्यासि वद वामोरु मथ्नन्तीव ' मनांसि नः ॥३

न वयं त्वामरैर्दैत्यैः सिद्धगन्धर्वचारणैः ।

नास्पृष्टपूर्वं जानीमो लोकेशैश्च कुतो नृभिः ॥४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! असुर आपसके सद्भाव और प्रेमको छोड़कर एक-दूसरेकी निन्दा कर रहे थे और डाकूकी तरह एक - दूसरेके हाथसे अमृतका कलश छीन रहे थे । इसी बीचमें उन्होंने देखा कि एक बड़ी सुन्दरी स्त्री उनकी ओर चली आ रही है ॥१ ॥

वे सोचने लगे — ‘ कैसा अनुपम सौन्दर्य है । शरीरमेंसे कितनी अद्भुत छटा छिटक रही है! तनिक इसकी नयी उम्र तो देखो! ' बस, अब वे आपसकी लाग- डाँट भूलकर उसके पास दौड़ गये । उन लोगोंने काममोहित होकर उससे पूछा— ॥२ ॥

' कमलनयनी! तुम कौन हो? कहाँसे आ रही हो? क्या करना चाहती हो? सुन्दरी! तुम किसकी कन्या हो? तुम्हें देखकर हमारे मनमें खलबली मच गयी है ॥३ ॥

हम समझते हैं कि अबतक देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्धर्व, चारण और लोकपालोंने भी

तुम्हें स्पर्शतक न किया होगा । फिर मनुष्य तो तुम्हें कैसे छू पाते? ॥४ ॥

नूनं त्वं विधिना सुभूः प्रेषितासि शरीरिणाम् ।

सर्वेन्द्रियमनः प्रीतिं विधातुं सघृणेन किम् ॥५

सा त्वं नः स्पर्धमानानामेकवस्तुनि मानिनि ।

ज्ञातीनां बद्धवैराणां शं विधत्स्व सुमध्यमे ॥६

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1494

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1494 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वयं कश्यपदायादा भ्रातरः कृतपौरुषाः ।

विभजस्व यथान्यायं नैव भेदो यथा भवेत् ॥७

इत्युपामन्त्रितो दैत्यैर्मायायोषिद्वपुर्हरिः ।

प्रहस्य रुचिरापाङ्गैर्निरीक्षन्निदमब्रवीत् ॥८

श्रीभगवानुवाच

कथं कश्यपदायादाः पुंश्चल्यां मयि सङ्गताः ।

विश्वासं पण्डितो जातु कामिनीषु न याति हि ॥९

सालावृकाणां स्त्रीणां च स्वैरिणीनां सुरद्विषः ।

सख्यान्याहुरनित्यनि नूत्नं नूत्नं विचिन्वताम् ॥१०

श्रीशुक उवाच

इति ते क्ष्वेलिसैस्तस्या आश्वस्तमनसोऽसुराः ।

जहसुर्भावगम्भीरं ददुश्चामृतभाजनम् ॥११

ततो गृहीत्वामृतभाजनं हरि-र्बभाष ईषत्स्मितशोभया गिरा । यद्यभ्युपेतं क्व च साध्वसाधु वा कृतं मया वो विभजे सुधामिमाम् ॥१२

इत्याभिव्याहृतं तस्या आकर्ण्यासुरपुङ्गवाः ।

अप्रमाणविदस्तस्यास्तत् तथेत्यन्वमंसत ॥१३

सुन्दरी! अवश्य ही विधाताने दया करके शरीरधारियोंकी सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं मनको तृप्त करनेके लिये तुम्हें यहाँ भेजा है || ५ || मानिनी! वैसे हमलोग एक ही जातिके हैं । फिर भी हम सब एक ही वस्तु चाह रहे हैं, इसलिये हममें डाह और वैरकी गाँठ पड़ गयी है । सुन्दरी! तुम हमारा झगड़ा मिटा दो || ६ || हम सभी कश्यपजीके पुत्र होनेके नाते सगे भाई हैं । हमलोगोंने अमृतके लिये बड़ा पुरुषार्थ किया है । तुम न्यायके अनुसार निष्पक्षभावसे इसे बाँट दो, जिससे फिर हमलोगोंमें किसी प्रकारका झगड़ा न हो ' || ७ || असुरोंने जब इस प्रकार प्रार्थना की, तब लीलासे स्त्रीवेष धारण करनेवाले भगवान्‌ने तनिक हँसकर और तिरछी चितवनसे उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥८ ॥

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1495

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1495 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीभगवान्ने कहा — आपलोग महर्षि कश्यपके पुत्र हैं और मैं हूँ कुलटा । आपलोग मुझपर न्यायका भार क्यों डाल रहे हैं? विवेकी पुरुष स्वेच्छाचारिणी स्त्रियोंका कभी विश्वास नहीं करते ॥९ ॥

दैत्यो! कुत्ते और व्यभिचारिणी स्त्रियोंकी मित्रता स्थायी नहीं होती । वे दोनों ही सदा नये - नये शीकार ढूँढ़ा करते हैं ॥१० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! मोहिनीकी परिहासभरी वाणी से दैत्योंके मनमें और भी विश्वास हो गया । उन लोगोंने रहस्यपूर्ण भावसे हँसकर अमृतका कलश मोहिनीके हाथमें दे दिया ॥११ ॥

भगवान्ने अमृतका कलश अपने हाथमें लेकर तनिक मुसकराते हुए मीठी वाणीसे कहा —'मैं उचित या अनुचित जो कुछ भी करूँ, वह सब यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो मैं यह अमृत बाँट सकती हूँ ' ॥१२ ॥

बड़े - बड़े दैत्योंने मोहिनीकी यह मीठी बात सुनकर उसकी बारीकी नहीं समझी, इसलिये सबने एक स्वरसे कह दिया ' स्वीकार है । ' इसका कारण यह था कि उन्हें मोहिनीके वास्तविक स्वरूपका पता नहीं था ॥१३ ॥

अथोपोष्य कृतस्नाना हुत्वा च हविषानलम् ।

दत्त्वा गोविप्रभूतेभ्यः कृतस्वस्त्ययना द्विजैः ॥१४

यथोपजोषं वासांसि परिधायाहतानि ते ।

कुशेषु प्राविशन्सर्वे प्रागग्रेष्वभिभूषिताः ॥१५

प्राङ्मुखेषूपविष्टेषु सुरेषु दितिजेषु च ।

धूपामोदितशालायां जुष्टायां माल्यदीपकैः ॥१६

तस्यां नरेन्द्र करभोरुरुशद्दुकूल-श्रोणीतटालसगतिमॅदविह्वलाक्षी । सा कूजती कनकनूपुरशिञ्जितेन कुम्भस्तनी कलशपाणिरथाविवेश ॥१७ तां श्रीसखीं कनककुण्डलचारुकर्ण-नासाकपोलवदनां परदेवताख्याम् । संवीक्ष्य सम्मुमुहरुत्स्मितवीक्षणेन देवासुरा विगलितस्तनपट्टिकान्ताम् ॥१८ असुराणां सुधादानं सर्पाणामिव दुर्नयम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1496

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1496 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मत्वा जातिनृशंसानां न तां व्यभजदच्युतः ॥१९

कल्पयित्वा पृथक् पङ्क्तीरुभयेषां जगत्पतिः ।

तांश्चोपवेशयामास स्वेषु स्वेषु च पङ्क्तिषु ॥ २०

दैत्यान्गृहीतकलशो वञ्चयन्नुपसञ्चरैः ।

दूरस्थान् पाययामास जरामृत्युहरां सुधाम् ॥२१

इसके बाद एक दिनका उपवास करके सबने स्नान किया । हविष्यसे अग्निमें हवन किया । गौ, ब्राह्मण और समस्त प्राणियोंको घास चारा, अन्न - धनादिका यथायोग्य दान दिया तथा ब्राह्मणोंसे स्वस्त्ययन कराया ॥१४ ॥ अपनी - अपनी रुचिके अनुसार सबने नये - नये वस्त्र

धारण किये और इसके बाद सुन्दर - सुन्दर आभूषण धारण करके सब - के - सब उन कुशासनोंपर बैठ गये, जिनका अगला हिस्सा पूर्वकी ओर था ॥ १५ ॥ जब देवता और दैत्य

दोनों ही धूपसे सुगन्धित, मालाओं और दीपकोंसे सजे - सजाये भव्य भवनमें पूर्वकी ओर मुँह करके बैठ गये, तब हाथमें अमृतका कलश लेकर मोहिनी सभामण्डपमें आयी । वह एक बड़ी सुन्दर साड़ी पहने हुए थी । नितम्बोंके भारके कारण वह धीरे - धीरे चल रही थी । आँखें मदसे विह्वल हो रही थीं । कलशके समान स्तन और गजशावककी सूँड़के समान जंघाएँ थीं । उसके स्वर्णनूपुर अपनी झनकारसे सभाभवनको मुखरित कर रहे थे ॥१६-१७ ॥ सुन्दर कानोंमें सोनेके कुण्डल थे और उसकी नासिका, कपोल तथा मुख बड़े ही सुन्दर थे । स्वयं परदेवता भगवान् मोहिनीके रूपमें ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मीजीकी कोई श्रेष्ठ सखी वहाँ आ गयी हो । मोहिनीने अपनी मुसकान भरी चितवनसे देवता और दैत्योंकी ओर देखा, तो वे सब - के-सब मोहित हो गये । उस समय उनके स्तनोंपरसे अंचल कुछ खिसक गया था ॥१८ ॥

भगवान्ने मोहिनीरूपमें यह विचार किया कि असुर तो जन्मसे ही क्रूर स्वभाववाले हैं । इनको अमृत पिलाना सर्पोको दूध पिलानेके समान बड़ा अन्याय होगा । इसलिये उन्होंने असुरोंको अमृतमें भाग नहीं दिया ॥ १ ९ ॥ भगवान्ने देवता और असुरोंकी अलग - अलग पंक्तियाँ बना दीं और फिर दोनोंको कतार बाँधकर अपने - अपने दलमें बैठा दिया || २० || इसके बाद अमृतका कलश हाथमें लेकर भगवान् दैत्योंके पास चले गये । उन्हें हाव - भाव और कटाक्षसे मोहित करके दूर बैठे हुए देवताओंके पास आ गये तथा उन्हें वह अमृत पिलाने लगे, जिसे पी लेनेपर बुढ़ापे और मृत्युका नाश हो जाता है ॥२१ ॥

ते पालयन्तः समयमसुराः स्वकृतं नृप ।

तूष्णीमासन्कृतस्नेहाः स्त्रीविवादजुगुप्सया ॥२२

तस्यां कृतातिप्रणयाः प्रणयापायकातराः ।

बहुमानेन चाबद्धा नोचुः किञ्चन विप्रियम् ॥२३

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1497

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1497 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

देवलिङ्गप्रतिच्छन्नः स्वर्भानुर्देवसंसदि ।

प्रविष्टः सोममपिबच्चन्द्रार्काभ्यां च सूचितः ॥२४

चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबतः शिरः ।

हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत् ॥२५

शिरस्त्वमरतां नीतमजो ग्रहमचीक्लृपत् ।

यस्तु पर्वणि चन्द्रार्कावभिधावति वैरधीः ॥ २६

पीतप्रायेऽमृते देवैर्भगवाल्लोँकभावनः ।

पश्यतामसुरेन्द्राणां स्वं रूपं जगृहे हरिः १ ॥२७

एवं सुरासुरगणाः समदेशकाल-हेत्वर्थकर्ममतयोऽपि फले विकल्पाः ।

तत्रामृतं सुरगणाः फलमञ्जसाऽऽपु-र्यत्पादपङ्कजरजःश्रयणान्न दैत्याः ॥२८

परीक्षित्! असुर अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन कर रहे थे । उनका स्नेह भी हो गया था और वे स्त्रीसे झगड़नेमें अपनी निन्दा भी समझते थे । इसलिये वे चुपचाप बैठे रहे ॥२२ ॥

मोहिनीमें उनका अत्यन्त प्रेम हो गया था । वे डर रहे थे कि उससे हमारा प्रेमसम्बन्ध टूट न जाय । मोहिनीने भी पहले उन लोगोंका बड़ा सम्मान किया था, इससे वे और भी बँध गये थे । यही कारण है कि उन्होंने मोहिनीको कोई अप्रिय बात नहीं कही ॥२३ ॥

जिस समय भगवान् देवताओंको अमृत पिला रहे थे, उसी समय राहु दैत्य देवताओंका वेष बनाकर उनके बीचमें आ बैठा और देवताओंके साथ उसने भी अमृत पी लिया । परन्तु तत्क्षण चन्द्रमा और सूर्यने उसकी पोल खोल दी ॥२४ ॥

अमृत पिलाते - पिलाते ही भगवान् ने अपने तीखी धारवाले चक्रसे उसका सिर काट डाला । अमृतका संसर्ग न होनेसे उसका धड़ नीचे गिर गया ॥२५ ॥

परन्तु सिर अमर हो गया और ब्रह्माजीने उसे ' ग्रह ' बना दिया । वही राहु पर्वके दिन ( पूर्णिमा और अमावस्याको ) वैर - भावसे बदला लेनेके लिये चन्द्रमा तथा सूर्यपर आक्रमण किया करता है || २६ || जब देवताओंने अमृत पी लिया, तब समस्त लोकोंको जीवनदान करनेवाले भगवान्ने बड़े - बड़े दैत्योंके सामने ही मोहिनीरूप त्यागकर अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया ॥ २७ ॥

परीक्षित्! देखो — देवता और दैत्य दोनोंने एक ही समय एक स्थानपर एक प्रयोजन ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1498

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1498 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तथा एक वस्तुके लिये एक विचारसे एक ही कर्म किया था, परन्तु फलमें बड़ा भेद हो गया । उनमेंसे देवताओंने बड़ी सुगमतासे अपने परिश्रमका फल - अमृत प्राप्त कर लिया, क्योंकि उन्होंने भगवान्‌के चरणकमलोंकी रजका आश्रय लिया था । परन्तु उससे विमुख होनेके कारण परिश्रम करनेपर भी असुरगण अमृतसे वंचित ही रहे ॥२८ ॥

यद् युज्यतेऽसुवसुकर्ममनोवचोभि-र्देहात्मजादिषु नृभिस्तदसत् पृथक्त्वात् । तैरेव सद् भवति यत् क्रियतेऽपृथक्त्वात् सर्वस्य तद् भवति मूलनिषेचनं यत् ॥ २ ९ मनुष्य अपने प्राण, धन, कर्म, मन और वाणी आदिसे शरीर एवं पुत्र आदिके लिये जो कुछ करता है — वह व्यर्थ ही होता है; क्योंकि उसके मूलमें भेदबुद्धि बनी रहती है । परन्तु उन्हीं प्राण आदि वस्तुओंके द्वारा भगवान्‌के लिये जो कुछ किया जाता है, वह सब भेदभावसे रहित होनेके कारण अपने शरीर, पुत्र और समस्त संसारके लिये सफल हो जाता है । जैसे वृक्षकी जड़में पानी देनेसे उसका तना, टहनियाँ और पत्ते - सब - के - सब सिंच जाते हैं, वैसे ही भगवान्के लिये कर्म करनेसे वे सबके लिये हो जाते हैं ॥२९ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धेऽमृतमथने नवमोऽध्यायः || ९ || १. प्रा ० पा ० — मथ्नासीव । २. प्रा ० पा ० — योगेशैश्च । १. प्रा ० पा ० – प्रभुः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1499

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1499 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ दशमोऽध्यायः देवासुर - संग्राम श्रीशुक उवाच

इति दानवदैतेया नाविन्दन्नमृतं नृप ।

युक्ताः कर्मणि यत्ताश्च वासुदेवपराङ्मुखाः ॥ १

साधयित्वामृतं राजन्पाययित्वा स्वकान्सुरान् ।

पश्यतां सर्वभूतानां ययौ गरुडवाहनः ॥२

सपत्नानां परामृद्धिं दृष्ट्वा ते दितिनन्दनाः ।

अमृष्यमाणा उत्पेतुर्देवान्प्रत्युद्यतायुधाः ॥ ३

ततः सुरगणाःसर्वे सुधया पीतयैधिताः ।

प्रतिसंयुयुधुः शस्त्रैर्नारायणपदाश्रयाः ॥४

तत्र दैवासुरो नाम रणः परमदारुणः ।

रोधस्युदन्वतो राजंस्तुमुलो रोमहर्षणः ॥ ५

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! यद्यपि दानवों और दैत्योंने बड़ी सावधानीसे समुद्रमन्थनकी चेष्टा की थी, फिर भी भगवान् से विमुख होनेके कारण उन्हें अमृतकी प्राप्ति नहीं हुई ॥१ ॥ राजन्! भगवान्ने समुद्रको मथकर अमृत निकाला और अपने निजजन

देवताओंको पिला दिया । फिर सबके देखते - देखते वे गरुड़पर सवार हुए और वहाँसे चले गये ॥२ ॥ जब दैत्योंने देखा कि हमारे शत्रुओंको तो बड़ी सफलता मिली तब वे उनकी बढ़ती

सह न सके । उन्होंने तुरंत अपने हथियार उठाये और देवताओंपर धावा बोल दिया ॥३ ॥ इधर

देवताओं एक तो अमृत पीकर विशेष शक्ति प्राप्त कर ली थी और दूसरे उन्हें भगवान्‌के चरणकमलोंका आश्रय था ही । बस, वे भी अपने अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसज्जित हो दैत्योंसे भिड़ गये ॥४ ॥ परीक्षित्! क्षीरसागरके तटपर बड़ा ही रोमांचकारी और अत्यन्त भयंकर संग्राम

हुआ । देवता और दैत्योंकी वह घमासान लड़ाई ही ' देवासुर संग्राम ' के नामसे कही जाती ॥५ ॥

तत्रान्योन्यं सपत्नास्ते संरब्धमनसो रणे ।

समासाद्यासिभिर्बाणैर्निजघ्नुर्विविधायुधैः ॥ ६

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1500

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1500 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शङ्खतूर्यमृदङ्गानां भेरीडमरिणां १ महान् ।

हस्त्यश्वरथपत्तीनां नदतां निःस्वनोऽभवत् ॥७

रथिनो रथिभिस्तत्र पत्तिभिः सह पत्तयः ।

हया हयैरिभाश्चेभैः समसज्जन्त संयुगे ॥८

उष्ट्रैः केचिदिभैः केचिदपरे युयुधुः खरेः ।

केचिद् गौरमृगैरृक्षैर्द्वीपिभिर्हरिभिर्भटाः ॥ ९

गृध्रैः कङ्कुर्बकैरन्ये श्येनभासैस्तिमिङ्गिलैः ।

शरभैर्महिषैः खड्गैर्गोवृषैर्गवयारुणैः ॥ १०

शिवाभिराखुभिः केचित् कृकलासैः शशैर्नरैः २ I बस्तैरेके ' कृष्णसारैर्हंसैरन्ये च सूकरैः ॥११

अन्ये जलस्थलखगैः सत्त्वैर्विकृतविग्रहैः ।

सेनयोरुभयो राजन्विविशुस्तेऽग्रतोऽग्रतः ॥ १२

चित्रध्वजपटै राजन्नातपत्रैः सितामलैः ।

महाधनैर्वज्रदण्डैर्व्यजनैर्बार्हचामरैः ४ ॥१३

वातोद्धूतोत्तरोष्णीषैरर्चिर्भिर्वर्मभूषणैः ।

स्फुरद्भिर्विशदैः शस्त्रैः सुतरां सूर्यरश्मिभिः ॥ १४

देवदानववीराणां ध्वजिन्यौ पाण्डुनन्दन ।

रेजतुर्वीरमालाभिर्यादसामिव सागरी ॥१५

वैरोचनो बलिः संख्ये सोऽसुराणां चमूपतिः ।

यानं वैहायसं नाम कामगं मयनिर्मितम् ॥१६

दोनों ही एक - दूसरेके प्रबल शत्रु हो रहे थे, दोनों ही क्रोधसे भरे हुए थे । एक - दूसरेको आमने - सामने पाकर तलवार, बाण और अन्य अनेकानेक अस्त्र - शस्त्रोंसे परस्पर चोट पहुँचाने लगे ॥६ ॥ उस समय लड़ाईमें शङ्ख, तुरही, मृदंग, नगारे और डमरू बड़े जोरसे बजने लगे;

हाथियोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, रथोंकी घरघराहट और पैदल सेनाकी चिल्लाहटसे बड़ा कोलाहल मच गया ॥७ ॥ रणभूमिमें रथियोंके साथ रथी, पैदलके साथ पैदल,

घुड़सवारोंके साथ घुड़सवार एवं हाथीवालोंके साथ हाथीवाले भिड़ गये ॥८ ॥ उनमेंसे कोई-कोई वीर ऊँटोंपर, हाथियोंपर और गधोंपर चढ़कर लड़ रहे थे तो कोई - कोई गौरमृग, भालू,

बाघ और सिंहोंपर ॥९ ॥ कोई - कोई सैनिक गिद्ध, कंक, बगुले, बाज और भास पक्षियोंपर

चढ़े हुए थे तो बहुत - से तिमिङ्गिल मच्छ, शरभ, भैंसे, गैंडे, बैल, नीलगाय और जंगली साँड़ोंपर सवार थे ॥१० ॥

****** ebook converter DEMO Watermarks *******