श्रीमद्भागवत महापुराण - १
Srimad Bhagavat Mahapuran Volume 1 Sanskrit Hindi · Gita Press, Gorakhpur · 1617 पृष्ठ · 162 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः । 26 श्रीमद्भागवत महापुराण — [ प्रथम - खण्ड ] [ सचित्र, हिन्दी- व्याख्यासहित ] गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR… 1–10
- ४ - सतीका अग्निप्रवेश ५ - वीरभद्रकृत दक्षयज्ञविध्वंस और दक्षवध ६ - ब्रह्मादि देवताओंका कैलास जाकर श्रीमहादेवजीको मनाना ७ - दक्षयज्ञकी पूर्ति ८ - ध्रुवका… 11–20
- वशीकृतो ह्यहं तैश्च सत्स्त्रिया सत्पतिर्यथा । ३१ । सुव्रत! जो लोग मेरे पर्वोंसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी उत्सवोंमें मेरी प्रसन्नताके लिये वस्त्र, आभूषण,… 21–30
- सब इस पुरुषकी महिमा है, इस परमात्माका विभूति - विस्तार है । उसका पारमार्थिक स्वरूप इतना ही नहीं है, वह पुरुष इस ब्रह्माण्डमय विराट्स्वरूपसे भी बहुत बड़ा… 31–40
- नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ शिवाय नमः, ॐ सूर्याय नमः, ॐ चन्द्रमसे नमः, ॐ भौमाय नमः, ॐ बुधाय नमः, ॐ बृहस्पतये नमः, ॐ भार्गवाय नमः, ॐ शनैश्चराय नमः, ॐ राहवे नमः,… 41–50
- दशांश ( अर्थात् १,८०० ) आहुति देनी चाहिये । खीरके अभाव में तिल, चावल, जौ, मेवा, शुद्ध घी और चीनीको मिलाकर हवनीय पदार्थ तैयार कर लेना चाहिये… 51–60
- ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* गीताप्रेस, गोरखपुर ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* भगवान् नारायणके नाभि - कमलसे लोकपितामह… 61–70
- ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* गीताप्रेस, गोरखपुर बालक ध्रुवपर भगवान्का अनुग्रह The grace of Lord descends on Dhruva ****** ebook… 71–80
- परीक्षिते कथां वक्तुं सभायां संस्थिते शुके । सुधाकुम्भं गृहीत्वैव देवास्तत्र समागमन् । १३ शुकं नत्वावदन् सर्वे स्वकार्यकुशलाः सुराः… 81–90
- * इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये भक्तिनारदसमागमो नाम प्रथमोऽध्यायः । १ । अट्टमन्नं शिवो वेदः शूलो विक्रय उच्यते… 91–100
- तत्र ते विस्मयः केन यतः प्रश्नकरो भवान् । श्रीमद्भागवतं श्राव्यं शोकदुःखविनाशनम् । ७४ तब प्रेमरस प्रवाहित करनेवाली भक्ति ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर… 101–110
- अतः सत्सु दयां कृत्वा भक्तवत्सल मा व्रज । भक्तार्थं सगुणो जातो निराकारोऽपि चिन्मयः । ५८ त्वद्वियोगेन ते भक्ताः कथं स्थास्यन्ति भूतले… 111–120
- पेट बढ़ जायगा । फिर कुछ खाया - पीया जायगा नहीं, इससे मेरी शक्ति क्षीण हो जायगी; तब बता, घरका धंधा कैसे होगा? । ४५… 121–130
- इति सूर्यवचः सर्वैर्धर्मरूपं तु विश्रुतम् । ४१ गोकर्णने कहा — भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है - मैंने तुम्हारे लिये विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया,… 131–140
- तैयार रखे । इनके पीछे वक्ताके लिये भी एक दिव्य सिंहासनका प्रबन्ध करे । १७ । यदि वक्ताका मुख उत्तरकी ओर रहे तो श्रोता पूर्वाभिमुख होकर बैठे और यदि वक्ता… 141–150
- प्रेमार्द्रचित्ता हरिमूचिरे ते । ८८ नगाहगाथासु च सर्वभक्तै-रेभिस्त्वया भाव्यमिति प्रयत्नात् । मनोरथोऽयं परिपूरणीय-स्तथेति चोक्त्वान्तरधीयताच्युतः… 151–160
- अथ द्वितीयोऽध्यायः भगवत्कथा और भगवद्भक्तिका माहात्म्य व्यास उवाच इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां रौमहर्षणिः । प्रतिपूज्य वचस्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे… 161–170
- राजा नाभिकी पत्नी मेरु देवीके गर्भसे ऋषभदेवके रूपमें भगवान्ने आठवाँ अवतार ग्रहण किया । इस रूपमें उन्होंने परमहंसोंका वह मार्ग, जो सभी आश्रमियोंके लिये… 171–180
- अग्निष्टोमादि यज्ञको चातुर्होत्र कहते हैं । १. - यहाँ प्राचीन प्रतिमें ' नारदागमनं ' इतना पाठ अधिक है… 181–190
- सास्वतन्त्रा न कल्पाऽऽसीद्योगक्षेमं ममेच्छती । ईशस्य हि वशे लोको योषा दारुमयी यथा । ७ अहं च तद्ब्रह्मकुले ऊषिवांस्तदपेक्षया… 191–200
- सन्धान किया । २० । उस अस्त्रसे सब दिशाओंमें एक बड़ा प्रचण्ड तेज फैल गया । अर्जुनने देखा कि अब तो मेरे प्राणोंपर ही आ बनी है, तब उन्होंने श्रीकृष्णसे… 201–210
- विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शना-दसत्सभाया वनवासकृच्छ्रतः । मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो द्रौण्यस्त्रतश्चास्म हरेऽभिरक्षिताः… 211–220
- पुरुषस्वभावविहितान् यथावर्णं यथाश्रमम् । वैराग्यरागोपाधिभ्यामाम्नातोभयलक्षणान् । २६ दानधर्मान् राजधर्मान् मोक्षधर्मान् विभागशः… 221–230
- यह यदुवंश परम प्रशंसनीय है; क्योंकि लक्ष्मीपति पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने जन्म ग्रहण करके इस वंशको सम्मानित किया है… 231–240
- कभी लिप्त नहीं होते, जैसे भगवान्की शरणागत बुद्धि अपनेमें रहनेवाले प्राकृत गुणोंसे लिप्त नहीं होती । ३८ । तं मेनिरेऽबला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं रहः… 241–250
- जब वे भोजन एवं विश्राम करके सुखपूर्वक आसनपर बैठे थे तब युधिष्ठिरने झुककर सबके सामने ही उनसे कहा । ७… 251–260
- अथ चतुर्दशोऽध्यायः अपशकुन देखकर महाराज युधिष्ठिरका शंका करना और अर्जुनका द्वारकासे लौटना सूत उवाच सम्प्रस्थिते द्वारकायां जिष्णौ बन्धुदिदृक्षया… 261–270
- समस्त देवताओंने मेरी इन्हीं गाण्डीव धारण करनेवाली भुजाओंका निवातकवच आदि दैत्योंको मारनेके लिये आश्रय लिया… 271–280
- स्वलङ्कृतं श्यामतुरङ्गयोजितं रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रितः पुरात् । वृतो रथाश्वद्विपपत्तियुक्तया स्वसेनया दिग्विजयाय निर्गतः… 281–290
- बहुत प्रसन्न हुए, उनका खेद मिट गया । उन्होंने शान्तचित्त होकर उनसे कहा— । २१ । परीक्षित्ने कहा — धर्मका तत्त्व जाननेवाले वृषभदेव! आप धर्मका उपदेश कर रहे… 291–300
- वहाँ आँखें बंद करके शान्तभावसे एक मुनि आसनपर बैठे हुए हैं । २५ । इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धिके निरुद्ध हो जानेसे वे संसारसे ऊपर उठ गये थे… 301–310
- पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट् परीक्षित् जब इस प्रकार आमरण अनशनका निश्चय करके बैठ गये, तब आकाशमें स्थित देवतालोग बड़े आनन्दसे उनकी प्रशंसा करते हुए वहाँ… 311–320
- मापोऽस्य तालू रस एव जिह्वा । ३० छन्दांस्यनन्तस्य शिरो गृणन्ति दंष्ट्रा यमः स्नेहकला द्विजानि । हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः… 321–330
- दयावश वहाँके लोगोंके मनमें बड़ी व्यथा होती है । २७ । सत्यलोकमें पहुँचनेके पश्चात् वह योगी निर्भय होकर अपने सूक्ष्म शरीरको पृथ्वीसे मिला देता है और फिर… 331–340
- है । ८ । भगवान् तो अकेले ही हैं । वे बहुत - से कर्म करनेके लिये पुरुषरूपसे प्रकृतिके विभिन्न गुणोंको एक साथ ही धारण करते हैं अथवा अनेकों अवतार ग्रहण करके… 341–350
- परमात्माके वक्षःस्थलमें महर्लोककी कल्पना की गयी है । ३८ । उसके गलेमें जनलोक, दोनों स्तनोंमें तपोलोक और मस्तकमें ब्रह्माका नित्य निवासस्थान सत्यलोक है… 351–360
- धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । दृष्ट्वाऽऽत्मनो भगवतो नियमावलोपं देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकुः… 361–370
- राजाओंके रूपमें तथा जब सृष्टिके प्रलयका समय होता है, तब अधर्म, रुद्र तथा क्रोधवश नामके सर्प एवं दैत्य आदिके रूपमें सर्वशक्तिमान् भगवान्की माया -… 371–380
- तपस्युपादिष्ट इवादधे मनः । ७ दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः । अतप्यत स्माखिललोकतापनं तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः… 381–390
- ओजः सहो बलं जज्ञे ३ ततः प्राणो महानसुः । १५ अनुप्राणन्ति यं प्राणाः प्राणन्तं सर्वजन्तुषु । अपानन्तमपानन्ति नरदेवमिवानुगाः… 391–400
- अथाह तन्मन्त्रदृशां वरीयान् यन्मन्त्रिणो वैदुरिकं वदन्ति । १० अजातशत्रोः प्रतियच्छ दायं तितिक्षतो दुर्विषहं तवागः… 401–410
- विमृज्य नेत्रे विदुरं प्रत्याहोद्धव उत्स्मयन् । ६ उद्धव उवाच कृष्णद्युमणिनिम्लोचे गीर्णेष्वजगरेण ह । किं नु नः कुशलं ब्रूयां गतश्रीषु गृहेष्वहम्… 411–420
- तत्र स्नात्वा पितॄन्देवानृषींश्चैव तदम्भसा । तर्पयित्वाथ विप्रेभ्यो गावो बहुगुणा ददुः । २६ हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान्… 421–430
- क्रीडन् विधत्ते द्विजगोसुराणां क्षेमाय कर्माण्यवतारभेदैः । मनो न तृप्यत्यपि शृण्वतां नः सुश्लोकमौलेश्चरितामृतानि… 431–440
- कालशक्तिको स्वीकार करके एक साथ ही महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, पंच- तन्मात्रा और मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ - इन तेईस तत्त्वोंके समुदायमें प्रविष्ट हो गये… 441–450
- सम्प्रसीदति वा येषामेतदाख्याहि चानघ । ३५ अनुव्रतानां शिष्याणां पुत्राणां च द्विजोत्तम । अनापृष्टमपि ब्रूयुर्गुरवो दीनवत्सलाः… 451–460
- अथ नवमोऽध्यायः ब्रह्माजीद्वारा भगवान्की स्तुति ब्रह्मोवाच ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्… 461–470
- श्रीमैत्रेयजीने कहा – अजन्मा भगवान् श्रीहरिने जैसा कहा था, ब्रह्माजीने भी उसी प्रकार चित्तको अपने आत्मा श्रीनारायणमें लगाकर सौ दिव्य वर्षोंतक तप किया । ४… 471–480
- यान्त्यूष्मणा महर्लोकाज्जनं भृग्वादयोऽर्दिताः । २९ तावत्त्रिभुवनं सद्यः कल्पान्तैधितसिन्धवः । प्लावयन्त्युत्कटाटोपचण्डवातेरितोर्मयः… 481–490
- भर गया । ५६ || यस्तु तत्र पुमान् सोऽभून्मनुः स्वायम्भुवः स्वराट् । स्त्री याऽऽसीच्छतरूपाख्या महिष्यस्य महात्मनः । ५३ तदा मिथुनधर्मेण प्रजा होधाम्बभूविरे… 491–500
- संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषां लोकाय पत्नीमसि मातरं पिता । विधेम चास्यै नमसा सह त्वया यस्यां स्वतेजोऽग्निमिवारणावधाः… 501–510
- तथा चन्द्रमा जैसे ग्रीष्म ऋतुके तापको हर लेता है, वैसे ही वह संसारके शोकको शान्त करनेवाला होगा । ४८… 511–520
- प्रभु समस्त सद्गुणोंके आश्रय हैं, उनकी सौम्य मुखमुद्राको देखकर जान पड़ता था मानो वे सभीपर अनवरत कृपासुधाकी वर्षा कर रहे हैं… 521–530
- जिनकी योगमायाको बड़े - बड़े योगिजन भी बड़ी कठिनतासे पार कर पाते हैं - वे सत्त्वादि तीनों गुणोंके नियन्ता श्रीहरि ही हमारा कल्याण करेंगे… 531–540
- मैत्रेयजी कहते हैं - विदुरजी! जब भगवान्ने रोषसे उस दैत्यका इस प्रकार खूब उपहास और तिरस्कार किया, तब वह पकड़कर खेलाये जाते हुए सर्पके समान क्रोधसे तिलमिला… 541–550
- अथ विंशोऽध्यायः ब्रह्माजीकी रची हुई अनेक प्रकारकी सृष्टिका वर्णन शौनक उवाच महीं प्रतिष्ठामध्यस्य सौते स्वायम्भुवो मनुः… 551–560
- स तं विरजमर्काभं सितपद्मोत्पलस्रजम् । स्निग्धनीलालकव्रातवक्त्राब्जं विरजोऽम्बरम् । ९ किरीटिनं कुण्डलिनं शङ्खचक्रगदाधरम्… 561–570
- विद्या और योगसे सम्पन्न तथा विषयोंमें अनासक्त आप ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया है और फिर उन सहस्र चरणोंवाले विराट् पुरुषने आपलोगोंकी रक्षाके लिये ही… 571–580
- तां दृष्ट्वा सहसोत्थाय प्रोचुः प्रांजलयः स्त्रियः । वयं कर्मकरीस्तुभ्यं शाधि नः करवाम किम् । २७ स्नानेन तां महार्हेण स्नापयित्वा मनस्विनीम्… 581–590
- बहुत काल बीतने पर प्रसन्न होते हैं || २७ || किन्तु जिनके स्वरूपको योगिजन अनेकों जन्मोंके साधनसे सिद्ध हुई सुदृढ़ समाधिके द्वारा एकान्तमें देखनेका प्रयत्न… 591–600
- अरुण नयन एवं मनोहर मुखारविन्दसे युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिव्य रूपोंकी झाँकी करते हैं और उनके साथ सप्रेम सम्भाषण भी करते हैं, जिसके लिये बड़े -… 601–610
- तस्मात्सूर्यो व्यभिद्येतां कर्णौ श्रोत्रं ततो दिशः । ५५ तेजका विशेष गुण रूप जिसका विषय है, वह नेत्रेन्द्रिय है; जलका विशेष गुण रस जिसका विषय है, वह… 611–620
- एतैरन्यैश्च पथिभिर्मनो दुष्टमसत्पथम् । बुद्धया युंजीत शनकैर्जितप्राणो ह्यतन्द्रितः । ७ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य विजितासन आसनम्… 621–630
- देवहूतिने पूछा – प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादिका जैसा लक्षण सांख्यशास्त्रमें कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग - अलग जाना जाता… 631–640
- नयतो दीर्घमध्वानं दण्ड्यं राजभटा यथा । २० तयोर्निर्भिन्नहृदयस्तर्जनैर्जातवेपथुः । पथि श्वभिर्भक्ष्यमाण आर्तोऽघं स्वमनुस्मरन्… 641–650
- तत्सृष्टसृष्टसृष्टेषु को न्वखण्डितधीः पुमान् । ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया । ३७ बलं मे पश्य मायायाः स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम्… 651–660
- १. प्रा ० पा ० — जिघृक्षुः । २. प्रा ० पा ० - यान्ति गता ० । ३. प्रा ० पा ० - भाविनि । १. प्रा ० पा ० — पथा ते तु । २. प्रा ० पा०— - वै… 661–670
- अत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठाः स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः । किञ्चिच्चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो… 671–680
- सद्भिराचरितः पन्था येन स्तब्धेन दूषितः । १० एष मे शिष्यतां प्राप्तो यन्मे दुहितुरग्रहीत् । पाणिं विप्राग्निमुखतः सावित्र्या इव साधुवत्… 681–690
- वासुदेवका अपरोक्ष अनुभव होता है । उस शुद्ध चित्तमें स्थित इन्द्रियातीत भगवान् वासुदेवको ही मैं नमस्कार किया करता हूँ । २३… 691–700
- स देवदेवं परिचक्रमे विभुम् । मेने तदाऽऽत्मानमसंगरंहसा महीयसां तात सहः सहिष्णुम् । ५ अन्वीयमानः स तु रुद्रपार्षदै-भृशं नदद्भिर्व्यनदत्सुभैरवम्… 701–710
- कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं पादपद्मं च जानुनि । बाहुं प्रकोष्ठेऽक्षमालामासीनं तर्कमुद्रया । ३८ उसमें कोकिल आदि पक्षियोंका कलरव और भौंरोंका गुंजार हो रहा था तथा… 711–720
- निद्रामें सोये हुए हैं, वे ब्रह्मादि देहधारी आत्मज्ञानमें उपयोगी आपके तत्त्वको अभीतक नहीं जान सके… 721–730
- कोई सन्तान नहीं हुई ) । अधर्म भी ब्रह्माजीका ही पुत्र था, उसकी पत्नीका नाम था मृषा । उसके दम्भ नामक पुत्र और माया नामकी कन्या हुई… 731–740
- तत्प्रभावमविज्ञाय प्रावृङ्क्ते यद्यशो जगत् । ६८ सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः । एष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव… 741–750
- इस भूलके लिये पश्चात्ताप हुआ । २९ । ध्रुवजी मन - ही - मन कहने लगे - अहो! सनकादि ऊर्ध्वरेता ( नैष्ठिक ब्रह्मचारी ) सिद्ध भी जिन्हें समाधिद्वारा अनेकों… 751–760
- झुंड मतवाले हाथी, सिंह और बाघ भी दौड़े चले आ रहे हैं । २६ । प्रलयकालके समान भयंकर समुद्र अपनी उत्ताल तरंगोंसे पृथ्वीको सब ओरसे डुबाता हुआ बड़ी भीषण… 761–770
- भगवान् ही द्रव्य, क्रिया और देवता - सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफलके दाता भी हैं । १०… 771–780
- अंगोऽश्वमेधं राजर्षिराजहार महाक्रतुम् । नाजग्मुर्देवतास्तस्मिन्नाहूता ब्रह्मवादिभिः । २५ तमूचुर्विस्मितास्तत्र यजमानमथर्त्विजः… 781–790
- कर सकता है '? । ३३ । इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोधको प्रकट कर उन्होंने उसे मारनेका निश्चय कर लिया… 791–800
- समस्त व्यापारोंको देखते रहनेपर भी उदासीन रहता है, उसी प्रकार ये गुप्तचरोंके द्वारा प्राणियोंके गुप्त और प्रकट सभी प्रकारके व्यापार देखते हुए भी अपनी… 801–810
- हैं । २ । तत्त्वदर्शी मुनियोंने इस लोक और परलोकमें मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये कृषि, अग्निहोत्र आदि बहुत - से उपाय निकाले और काममें लिये हैं || ३ || उन… 811–820
- श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — लोकगुरु भगवान् ब्रह्माजीके इस प्रकार समझानेपर प्रबल पराक्रमी महाराज पृथुने यज्ञका आग्रह छोड़ दिया और इन्द्रके साथ प्रीतिपूर्वक… 821–830
- गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् । क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन् । ८ विदुर उवाच सोऽभिषिक्तः पृथुर्विप्रैर्लब्धाशेषसुरार्हणः… 831–840
- श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— जिस समय प्रजाजन परमपराक्रमी पृथ्वीपाल पृथुकी इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय वहाँ सूर्यके समान तेजस्वी चार मुनीश्वर आये… 841–850
- १. प्रा ० पा ० — पाञ्चकोशं । ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* अथ त्रयोविंशोऽध्यायः राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन मैत्रेय उवाच… 851–860
- तद्ध्यायन्तो जपन्तश्च पूजयन्तश्च संयताः । १५ विदुर उवाच प्रचेतसां गिरित्रेण यथाऽऽसीत्पथि संगमः । यदुताह हरः प्रीतस्तन्नो ब्रह्मन् वदार्थवत्… 861–870
- समाहितधियः सर्व एतदभ्यसतादृताः । ७१ इदमाह पुरास्माकं भगवान् विश्वसृक्पतिः । भृग्वादीनामात्मजानां सिसृक्षुः संसिसृक्षताम्… 871–880
- महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत । ५६ क्वचित्पिबन्त्यां पिबति मदिरां मदविह्वलः । अश्नन्त्यां क्वचिदश्नाति जक्षत्यां सह जक्षति… 881–890
- कदाचिदटमाना सा ब्रह्मलोकान्महीं गतम् । वव्रे बृहद्व्रतं मां तु जानती काममोहिता । २१ मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदुःसहम्… 891–900
- गयी और रो - रोकर आँसू बहाने लगी । ४ ९ । लकड़ियोंकी चिता बनाकर उसने उसपर पतिका शव रखा और अग्नि लगाकर विलाप करते - करते स्वयं सती होनेका निश्चय किया । ५०… 901–910
- पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम् । ४४ शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे । मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम्… 911–920
- थे, मानो सुमेरुके शिखरपर कोई श्याम घटा छायी हो । उनके श्रीअंगमें मनोहर पीताम्बर और कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी… 921–930
- किं वा योगेन सांख्येन न्यासस्वाध्याययोरपि । किं वा श्रेयोभिरन्यैश्च न यत्रात्मप्रदो हरिः । १२ श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थतः… 931–940
- यः षट् सपत्नान् विजिगीषमाणो गृहेषु निर्विश्य यतेत पूर्वम् । अत्येति दुर्गाश्रित ऊर्जितारीन् क्षीणेषु कामं विचरेद्विपश्चित्… 941–950
- इति ललनानुनयातिविशारदो ग्राम्यवैवग्ध्यया परिभाषया तां विबुधवधूं विबुधमतिरधि - सभाजयामास । १७ । सा च ततस्तस्य वीरयूथपतेर्बुद्धिशीलरूपवयः श्रियौदार्येण… 951–960
- भरसुयन्त्रितानप्युपशिक्षयन्निति होवाच । १ ९ । भगवान् ऋषभदेवके शासनकालमें इस देशका कोई भी पुरुष अपने लिये किसीसे भी अपने प्रभुके प्रति दिन - दिन बढ़नेवाले… 961–970
- अथ षष्ठोऽध्यायः ऋषभदेवजीका देहत्याग राजोवाच न नूनं भगव आत्मारामाणां योगसमीरित - ज्ञानावभर्जितकर्मबीजानामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि भवितुमर्हन्ति… 971–980
- राजर्षि भरतने देखा कि बेचारा हरिनीका बच्चा अपने बन्धुओं से बिछुड़कर नदीके प्रवाहमें बह रहा है… 981–990
- अथ दशमोऽध्यायः जडभरत और राजा रहूगणकी भेंट श्रीशुक उवाच अथ सिन्धुसौवीरपते रहूगणस्य व्रजत इक्षुमत्यास्तटे तत्कुलपतिना शिबिकावाह े - पुरुषान्वेषणसमये… 991–1000
- वेदात्मतत्त्वं भ्रमतीह तावत् । १५ न यावदेतन्मन आत्मलिङ्गं संसारतापावपनं जनस्य । यच्छोकमोहामयरागलोभ-वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते… 1001–1010
- दृष्टि रखनेके कारण इसे बड़ा तिरस्कार सहना पड़ता है । १२ । इस प्रकार व्यावहारिक सम्बन्धके कारण एक - दूसरेसे द्वेषभाव बढ़ जानेपर भी वह वणिक् - समूह आपसमें… 1011–1020
- यदपि दिगिभजयिनो यज्विनो ये वै राजर्षयः किं तु परं मृधे शयीरन्नस्यामेव ममेयमिति कृतवैरानुबन्धा यां विसृज्य स्वयमुपसंहृताः || ४० || कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत… 1021–1030
- उस नदीके दोनों किनारोंकी मिट्टी उस रससे भीगकर जब वायु और सूर्यके संयोगसे सूख जाती है, तब वही देवलोकको विभूषित करनेवाला जाम्बूनद नामका सोना बन जाती है… 1031–1040
- महाभागवत प्रह्लादजी उस वर्षके अन्य पुरुषोंके सहित निष्काम एवं अनन्य भक्तिभावसे उपासना करते हैं… 1041–1050
- अनुग्रह करनेके लिये अव्यक्तरूपसे कल्पके अन्ततक तप करते रहते हैं । उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरतिकी… 1051–1060
- पर्वतोंके नाम शुक्ल, वर्धमान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र हैं तथा नदियोंके नाम - अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, वृत्तिरूपवती, पवित्रवती और… 1061–1070
- भानोर्मान्द्यशैघ्रयसमगतिभिः समामनन्ति । ७ । एवं चन्द्रमा अर्कगभस्तिभ्य उपरिष्टाल्लक्षयोजनत उपलभ्यमानोऽर्कस्य संवत्सरभुक्तिं पक्षाभ्यां मासभुक्तिं… 1071–1080
- । २२ । यत्तद्-पुनरात्मानुस्मृतिमोषणं मायामय भोगैश्वर्यमेवानुति भगवतानधिगतान्योपायेन वरुणपाशैश्च सम्प्रतिमुक्तो गिरिदर्यां चापविद्ध इति होवाच । २३… 1081–1090
- दन्दशूक, अवटनिरोधन, पर्यावर्तन और सूचीमुख - ये सात और मिलाकर कुल अट्ठाईस नरक तरह - तरहकी यातनाओंको भोगनेके स्थान हैं । ७… 1091–1100
- महाभाग! अब मैं वह उपाय जानना चाहता हूँ, जिसके अनुष्ठानसे मनुष्यों को अनेकानेक भयंकर यातनाओंसे पूर्ण नरकोंमें न जाना पड़े… 1101–1110
- ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* अथ द्वितीयोऽध्यायः विष्णुदूतोंद्वारा भागवतधर्म - निरूपण और अजामिलका परमधामगमन श्रीशुक उवाच एवं ते भगवता… 1111–1120
- * वस्तुकी स्वाभाविक शक्ति इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि यह मुझपर श्रद्धा रखता है कि नहीं, जैसे अग्नि या अमृत । हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः… 1121–1130
- सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम् । ते मे न दण्डमर्हन्त्यथ यद्यमीषां स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरुगायवादः… 1131–1140
- कृतपादः सुपर्णांसे प्रलम्बाष्टमहाभुजः । चक्रशङ्खासिचर्मेषुधनुःपाशगदाधरः । ३६ पीतवासा घनश्यामः प्रसन्नवदनेक्षणः । वनमालानिवीताङ्गो लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभः… 1141–1150
- अनुकूल है । वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही । ३३ । दक्षप्रजापतिने देखा कि आजकल बहुत - से अशकुन हो रहे हैं… 1151–1160
- तर्ह्येव प्रतिबुद्ध्येन्द्रो गुरुहेलनमात्मनः । गर्हयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना । १० राजा परीक्षित्ने पूछा — भगवन्! देवाचार्य बृहस्पतिजीने अपने प्रिय… 1161–1170
- मेरी रक्षा करें । १४ । अपनी दाढ़ोंपर पृथ्वीको धारण करनेवाले यज्ञमूर्ति वराहभगवान् मार्गमें, परशुरामजी पर्वतोंके शिखरोंपर और लक्ष्मणजीके सहित भरतके बड़े… 1171–1180
- निगल गया । १९ । अब तो देवताओंके आश्चर्यकी सीमा न रही । उनका प्रभाव जाता रहा । वे सब - के - सब दीन - हीन और उदास हो गये तथा एकाग्रचित्तसे अपने हृदयमें… 1181–1190
- वृतो देवगणैः सर्वैर्गजेन्द्रोपर्यशोभत । स्तूयमानो मुनिगणैस्त्रैलोक्यं हर्षयन्निव । १४ वृत्रमभ्यद्रवच्छेत्तुमसुरानीकयूथपैः… 1191–1200
- ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* अथ द्वादशोऽध्यायः ऋषिरुवाच एवं जिहासुर्नृप देहमाजौ वृत्रासुरका वध मृत्युं वरं विजयान्मन्यमानः… 1201–1210
- तयेन्द्रः स्मासहत् तापं निर्वृतिर्नामुमाविशत् । ह्रीमन्तं वाच्यतां प्राप्तं सुखयन्त्यपि नो गुणाः । ११ तां ददर्शानुधावन्तीं चाण्डालीमिव रूपिणीम्… 1211–1220
- उसे पत्नी करके नहीं मानते । सचमुच पुत्रहीन स्त्री धिक्कारके योग्य है । ४० । भला, दासियोंको क्या दुःख है? वे तो अपने स्वामीकी सेवा करके निरन्तर सम्मान पाती… 1221–1230
- अथ षोडशोऽध्यायः चित्रकेतुका वैराग्य तथा संकर्षणदेवके दर्शन श्रीशुक उवाच अथ देवऋषी राजन् सम्परेतं नृपात्मजम् । दर्शयित्वेति होवाच ज्ञातीनामनुशोचताम्… 1231–1240
- एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् । ५४ येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा… 1241–1250
- इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी ये भगवत् - स्वरूपके ज्ञान एवं भक्तिसे परिपूर्ण ही रहे । ३८ । तुमने मुझसे पूछा था कि वृत्रासुरका दैत्ययोनिमें जन्म क्यों… 1251–1260
- एक वर्षतक तुम इसे बिना किसी त्रुटिके पालन कर सकोगी तो तुम्हारी कोखसे इन्द्रघाती पुत्र उत्पन्न होगा । ५४ । वाढमित्यभिप्रेत्याथ ' दिती राजन् महामनाः… 1261–1270
- चिरायु पुत्र प्राप्त करती है । धनवती किन्तु अभागिनी स्त्रीको सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपाको श्रेष्ठ रूप मिल जाता है… 1271–1280
- अथ द्वितीयोऽध्यायः हिरण्याक्षका वध होनेपर हिरण्यकशिपुका अपनी माता और कुटुम्बियोंको नारद उवाच समझाना भ्रातर्येवं विनिहते हरिणा क्रोडमूर्तिना '… 1281–1290
- होनेवाली है । तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं और इसके लिये रो - पीट रही हो! यदि तुमलोग सौ बरसतक इसी तरह शोकवश छाती पीटती रहो, तो भी अब तुम इसे नहीं पा… 1291–1300
- यत्र स्फाटिककुड्यानि वैदूर्यस्तम्भपङ्क्तयः । ९ यत्र चित्रवितानानि पद्मरागासनानि च । पयःफेननिभाः शय्या मुक्तादामपरिच्छदाः… 1301–1310
- पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणीसे पूछा II II बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो । ठीक - ठीक बतलाना । देखो, झूठ न बोलना… 1311–1320
- पुरुषको अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये । ५ । पुंसो वर्षशतं ह्यायुस्तदर्धं चाजितात्मनः । निष्फलं यदसौ रात्र्यां शेतेऽन्धं प्रापितस्तमः… 1321–1330
- भाव - विकार शरीरमें ही देखे जाते हैं, आत्मासे इनका कोई सम्बन्ध नहीं है । १८ । आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्ध एकः क्षेत्रज्ञ आश्रयः… 1331–1340
- अन्तःसभायां न ददर्श तत्पदं वितत्रसुर्येन सुरारियूथपाः । १७ सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः… 1341–1350
- भवता हरे स वृजिनोऽवसादितो नरसिंह नाथ विभवाय नो भव । ५५ विष्णुपार्षदा ऊचुः अद्यैतद्धरिनररूपमद्भुतं ते दृष्टं नः शरणद सर्वलोकशर्म… 1351–1360
- है, वह सब आप ही हैं और इससे भिन्न भी आप ही हैं । अपने - परायेका भेद - भाव तो अर्थहीन शब्दोंकी माया है; क्योंकि जिससे जिसका जन्म, स्थिति, लय और प्रकाश होता… 1361–1370
- आपका भक्त होनेके कारण मुझसे भी द्रोहो किया । १५-१६ । तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात् । पूतस्तेऽपाङ्गसंदृष्टस्तदा कृपणवत्सल… 1371–1380
- अथैकादशोऽध्यायः मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्मका निरूपण श्रीशुक उवाच श्रुत्वेहितं साधुसभासभाजितं महत्तमाग्रण्य उरुक्रमात्मनः… 1381–1390
- वेदान्त - विचार करनेकी भी सामर्थ्य न रहे, तब उसे अनशन आदि व्रत करने चाहिये । २३ । आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहंममात्मताम्… 1391–1400
- नारद उवाच धर्मं पारमहंस्यं वै मुनेः श्रुत्वासुरेश्वरः । पूजयित्वा ततः प्रीत आमन्त्र्य प्रययौ गृहम् । ४६ मैं अपने प्रारब्धके भोगमें ही सन्तुष्ट रहता हूँ… 1401–1410
- न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य यः । ८ एके कर्ममयान् यज्ञान् ज्ञानिनो यज्ञवित्तमाः । आत्मसंयमनेऽनीहा जुह्वति ज्ञानदीपिते… 1411–1420
- यद् यस्य वानिषिद्धं स्याद् येन यत्र यतो नृप । स तेनेहेत कर्माणि नरो नान्यैरनापदि । ६६ एतैरन्यैश्च वेदोक्तैर्वर्तमानः स्वकर्मभिः… 1421–1430
- मुनियोंकी भरी सभामें कहने लगे । ३३ । इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुचरिते प्रथमोऽध्यायः । १… 1431–1440
- नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि । १० सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता । नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे… 1441–1450
- शृङ्गाणीमानि धिष्णयानि ब्रह्मणो मे शिवस्य च । क्षीरोदं मे प्रियं धाम श्वेतद्वीपं च भास्वरम् । १८ श्रीवत्सं कौस्तुभं मालां गदां कौमोदकीं मम… 1451–1460
- जो पाँचों प्राण ( प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान ), दसों इन्द्रिय, मन, पाँचों असु ( नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय ) एवं शरीरका आश्रय है - वे परम… 1461–1470
- गिरिं चारोप्य गरुडे हस्तेनैकेन लीलया । आरुह्य प्रययावब्धिं सुरासुरगणैर्वृतः । ३८ अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः… 1471–1480
- एतावान्हि प्रभोरर्थो यद् दीनपरिपालनम् । ३८ प्राणैः स्वैः प्राणिनः पान्ति साधवः क्षणभङ्गुरैः । बद्धवैरेषु भूतेषु मोहितेष्वात्ममायया… 1481–1490
- समुद्रमन्थनसे निकली हुई सभी वस्तुएँ हमें मिल जायँ । जब असुर उस अमृतसे भरे कलशको छीन ले गये, तब देवताओंका मन विषादसे भर गया । अब वे भगवान्की शरणमें आये… 1491–1500
- -से किसी - किसीने सियारिन, चूहे, गिरगिट और खरहोंपर ही सवारी कर ली थी तो बहुत - स मनुष्य, बकरे, कृष्णसार मृग, हंस और सूअरोंपर चढ़े थे । ११… 1501–1510
- इन्द्र कुछ झेंप गये । तबतक वीरोंका मान मर्दन करनेवाले बलिने अपने धनुषको कानतक खींच - खींचकर बहुत - से बाण मारे || १० || सत्यवादी देवशत्रु बलिने इस प्रकार… 1511–1520
- कौतूहलाय दैत्यानां योषिद्वेषो मया कृतः । पश्यता सुरकार्याणि गते पीयूषभाजने । १५ तत्तेऽहं दर्शयिष्यामि दिदृक्षोः सुरसत्तम… 1521–1530
- देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठादयः सुताः । २७ ऋतधामा च तत्रेन्द्रो देवाश्च हरितादयः । ऋषयश्च तपोमूर्तिस्तपस्व्याग्नीध्रकादयः… 1531–1540
- यात कालं प्रतीक्षन्तो यतः शत्रोर्विपर्ययः । ३० एष विप्रबलोदर्कः सम्प्रत्यूर्जितविक्रमः । तेषामेवापमानेन सानुबन्धो विनङ्क्ष्यति… 1541–1550
- पूर्ववत् प्रतिदिन हवन और ब्राह्मण भोजन भी कराना चाहिये । ४६ । इस प्रकार पयोव्रती रहकर बारह दिनतक प्रतिदिन भगवान्की आराधना, होम और पूजा करे तथा ब्राह्मण… 1551–1560
- सर्वे नक्षत्रताराद्याश्चक्रुस्तज्जन्म दक्षिणम् । ५ द्वादश्यां सवितातिष्ठन्मध्यंदिनगतो नृप । विजया नाम सा प्रोक्ता यस्यां जन्म विदुर्हरेः… 1561–1570
- यदृच्छयोपपन्नेन संतुष्टो वर्तते सुखम् । नासंतुष्टस्त्रिभिर्लोकैरजितात्मोपसादितैः । २४ पुंसोऽयं संसृतेर्हेतुरसंतोषोऽर्थकामयोः… 1571–1580
- मेघके समान भयंकर टंकार करनेवाला शार्ङ्गधनुष, बादलकी तरह गम्भीर शब्द करनेवाला पांचजन्य शंख, विष्णुभगवान्की अत्यन्त वेगवती कौमोदकी गदा, सौ चन्द्राकार… 1581–1590
- सव्रीडनीचीनमुखो बभूव ह । १४ स तत्र हासीनमुदीक्ष्य सत्पतिं सुनन्दनन्दाद्यनुगैरुपासितम् । उपेत्य भूमौ शिरसा महामना ननाम मूर्ध्ना पुलकाश्रुविक्लवः… 1591–1600
- यत्र यत्रानुकीर्त्येत तत् तेषां सुकृतं विदुः । ३१ भगवान्की लीलाएँ अनन्त हैं, उनकी महिमा अपार है… 1601–1610
- श्रीशुक उवाच इत्युक्तवन्तं नृपतिं भगवानादिपूरुषः । मत्स्यरूपी महाम्भोधौ विहरंस्तत्त्वमब्रवीत् । ५४ पुराणसंहितां दिव्यां सांख्ययोगक्रियावतीम् ४… 1611–1617