श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 411–420
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
पृष्ठ 411
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विमृज्य नेत्रे विदुरं प्रत्याहोद्धव उत्स्मयन् ॥६ उद्धव उवाच
कृष्णद्युमणिनिम्लोचे गीर्णेष्वजगरेण ह ।
किं नु नः कुशलं ब्रूयां गतश्रीषु गृहेष्वहम् ॥७
दुर्भगो बत लोकोऽयं यदवो नितरामपि ।
ये संवसन्तो न विदुर्हरिं मीना इवोडुपम् ॥८
इङ्गितज्ञाः पुरुप्रौढा एकारामाश्च सात्वताः ।
सात्वतामृषभं सर्वे भूतावासममंसत ॥९
देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः ।
भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युप्तात्मनो हरौ ॥ १०
प्रदर्श्यातप्ततपसामवितृप्तदृशां नृणाम् ।
आदायान्तरधाद्यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम् ॥११
यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग-मायाबलं दर्शयता गृहीतम् । विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम् ॥१२ यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये
निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः ।
कार्त्स्न्येन चाद्येह गतं विधातु-रर्वाक्सृतौ कौशलमित्यमन्यत ॥१३
कुछ समय बाद जब उद्धवजी भगवान्के प्रेमधामसे उतरकर पुनः धीरे - धीरे संसारमें आये, तब अपने नेत्रोंको पोंछकर भगवल्लीलाओंका स्मरण हो आनेसे विस्मित हो विदुरजीसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ६ ॥
उद्धवजी बोले- विदुरजी! श्रीकृष्णरूप सूर्यके छिप जानेसे हमारे घरोंको कालरूप अजगरने खा डाला है, वे श्रीहीन हो गये हैं; अब मैं उनकी क्या कुशल सुनाऊँ ॥७ ॥ ओह!
यह मनुष्यलोक बड़ा ही अभागा है; इसमें भी यादव तो नितान्त भाग्यहीन हैं, जिन्होंने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 412
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
निरन्तर श्रीकृष्णके साथ रहते हुए भी उन्हें नहीं पहचाना - जिस तरह अमृतमय चन्द्रमाके समुद्रमें रहते समय मछलियाँ उन्हें नहीं पहचान सकी थीं || ८ || यादवलोग मनके भावको ताड़नेवाले, बड़े समझदार और भगवान् के साथ एक ही स्थानमें रहकर क्रीडा करनेवाले थे; तो भी उन सबने समस्त विश्वके आश्रय, सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्णको एक श्रेष्ठ यादव ही समझा ॥९ ॥ किंतु भगवान्की मायासे मोहित इन यादवों और इनसे व्यर्थका वैर ठाननेवाले
शिशुपाल आदिके अवहेलना और निन्दासूचक वाक्योंसे भगवत्प्राण महानुभावोंकी बुद्धि भ्रममें नहीं पड़ती थी || १० || जिन्होंने कभी तप नहीं किया, उन लोगोंको भी इतने दिनोंतक दर्शन देकर अब उनकी दर्शन - लालसाको तृप्त किये बिना ही वे भगवान् श्रीकृष्ण अपने त्रिभुवन - मोहन श्रीविग्रहको छिपाकर अन्तर्धान हो गये हैं और इस प्रकार उन्होंने मानो उनके नेत्रोंको ही छीन लिया है ॥ ११ ॥ भगवान् ने अपनी योगमायाका प्रभाव दिखानेके लिये
मानवलीलाओंके योग्य जो दिव्य श्रीविग्रह प्रकट किया था, वह इतना सुन्दर था कि उसे देखकर सारा जगत् तो मोहित हो ही जाता था, वे स्वयं भी विस्मित हो जाते थे । सौभाग्य और सुन्दरताकी पराकाष्ठा थी उस रूपमें । उससे आभूषण ( अंगोंके गहने ) भी विभूषित हो जाते थे ॥१२ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें जब भगवान्के उस नयनाभिराम रूपपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी थी, तब त्रिलोकीने यही माना था कि मानव सृष्टिकी रचनामें विधाताकी जितनी चतुराई है, सब इसी रूपमें पूरी हो गयी है ॥१३ ॥
यस्यानुरागप्लुतहासरास-लीलावलोकप्रतिलब्धमानाः ।
व्रजस्त्रियो दृग्भिरनुप्रवृत्त-धियोऽवतस्थुः किल कृत्यशेषाः ॥ १४
स्वशान्तरूपेष्वितरैः स्वरूपै-रभ्यर्द्यमानेष्वनुकम्पितात्मा । परावरेशो महदंशयुक्तो ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्निः ॥१५ मां खेदयत्येतदजस्य जन्म-विडम्बनं यद्वसुदेवगेहे । व्रजे च वासोऽरिभयादिव स्वयं पुराद् व्यवात्सीद्यदनन्तवीर्यः ॥१६ दुनोति चेतः स्मरतो ममैतद् यदाह पादावभिवन्द्य पित्रोः । ताताम्ब कंसादुरुशङ्कितानां प्रसीदतं नोऽकृतनिष्कृतीनाम् ॥१७ को वा अमुष्याङ्घ्रिसरोजरेणुं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 413
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विस्मर्तुमीशीत पुमान् विजिघ्रन् ।
यो विस्फुरद्भ्रूविटपेन भूमे-भरं कृतान्तेन तिरश्चकार ॥१८
दृष्टा भवद्भिर्ननु राजसूये चैद्यस्य कृष्णं द्विषतोऽपि सिद्धिः । यां योगिनः संस्पृहयन्ति सम्यग् योगेन कस्तद्विरहं सहेत ॥१९ तथैव चान्ये नरलोकवीरा य आहवे कृष्णमुखारविन्दम् । नेत्रैः पिबन्तो नयनाभिरामं पार्थास्त्रपूताः पदमापुरस्य ॥२० उनके प्रेमपूर्ण हास्य - विनोद और लीलामय चितवनसे सम्मानित होनेपर व्रजबालाओंकी आँखें उन्हींकी ओर लग जाती थीं और उनका चित्त भी ऐसा तल्लीन हो जाता था कि वे घरके काम - धंधोंको अधूरा ही छोड़कर जड पुतलियोंकी तरह खड़ी रह जाती थीं ॥१४ ॥
चराचर जगत् और प्रकृतिके स्वामी भगवान्ने जब अपने शान्तरूप महात्माओंको अपने ही घोररूप असुरोंसे सताये जाते देखा, तब वे करुणाभावसे द्रवित हो गये और अजन्मा होनेपर भी अपने अंश बलरामजीके साथ काष्ठमें अग्निके समान प्रकट हुए ॥१५ ॥
अजन्मा होकर भी वसुदेवजीके यहाँ जन्म लेनेकी लीला करना, सबको अभय देनेवाले होनेपर भी मानो कंसके भयसे व्रजमें जाकर छिप रहना और अनन्तपराक्रमी होनेपर भी कालयवनके सामने मथुरापुरीको छोड़कर भाग जाना - भगवान्की ये लीलाएँ याद आ-आकर मुझे बेचैन कर डालती हैं ॥ १६ ॥ उन्होंने जो देवकी - वसुदेवकी चरण - वन्दना करके
कहा था- - ' पिताजी, माताजी! कंसका बड़ा भय रहनेके कारण मुझसे आपकी कोई सेवा न बन सकी, आप मेरे इस अपराधपर ध्यान न देकर मुझपर प्रसन्न हों । ' श्रीकृष्णकी ये बातें जब याद आती हैं, तब आज भी मेरा चित्त अत्यन्त व्यथित हो जाता है ॥१७ ॥ जिन्होंने कालरूप
अपने भ्रुकुटिविलाससे ही पृथ्वीका सारा भार उतार दिया था, उन श्रीकृष्णके पादपद्मपरागका सेवन करनेवाला ऐसा कौन पुरुष है, जो उसे भूल सके ॥१८ ॥ आपलोगोंने
राजसूय यज्ञमें प्रत्यक्ष ही देखा था कि श्रीकृष्णसे द्वेष करनेवाले शिशुपालको वह सिद्धि मिल गयी, जिसकी बड़े - बड़े योगी भलीभाँति योग - साधना करके स्पृहा करते रहते हैं । उनका विरह भला कौन सह सकता है ॥ १ ९ ॥ शिशुपालके ही समान महाभारत - युद्धमें जिन दूसरे योद्धाओंने अपनी आँखोंसे भगवान् श्रीकृष्णके नयनाभिराम मुखकमलका मकरन्द पान करते हुए अर्जुनके बाणोंसे बिंधकर प्राणत्याग किया, वे पवित्र होकर सब - के - सब भगवान्के परमधामको प्राप्त हो गये ॥ २० ॥
स्वयं त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीशः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 414
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ स्वाराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः । बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः किरीटकोट्येडितपादपीठः ॥२१ तत्तस्य कैङ्कर्यमलं भृतान्नो विग्लापयत्यङ्ग यदुग्रसेनम् । तिष्ठन्निषण्णं परमेष्ठिधिष्ण्ये न्यबोधयद्देव निधारयेति ॥२२ अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥२३ मन्येऽसुरान् भागवतांत्र्यधीशे
संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।
संयुगेऽक्षत तार्क्ष्यपुत्र-मंसे सुनाभायुधमापतन्तम् ॥२४
वसुदेवस्य देवक्यां जातो भोजेन्द्रबन्धने ।
चिकीर्षुर्भगवानस्याः शमजेनाभियाचितः ॥२५
ततो नन्दव्रजमितः पित्रा कंसाद्विबिभ्यता ।
एकादश समास्तत्र गूढार्चिः सबलोऽवसत् ॥२६
परीतो वत्सपैर्वत्सांश्चारयन् व्यहरद्विभुः २ ।
यमुनोपवने कूजद्विजसंकुलिताङ्घ्रिपे ॥२७
कौमारीं दर्शयंश्चेष्टां प्रेक्षणीयां व्रजौकसाम् ।
रुदन्निव हसन्मुग्धबालसिंहावलोकन: ॥ २८
स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण तीनों लोकोंके अधीश्वर हैं । उनके समान भी कोई नहीं है, उनसे बढ़कर तो कौन होगा । वे अपने स्वतःसिद्ध ऐश्वर्यसे ही सर्वदा पूर्णकाम हैं । इन्द्रादि असंख्य लोकपालगण नाना प्रकारकी भेंटें ला- लाकर अपने - अपने मुकुटोंके अग्रभागसे उनके चरण रखनेकी चौकीको प्रणाम किया करते हैं ॥ २१ ॥ विदुरजी! वे ही भगवान् श्रीकृष्ण
रादसिंहासनपर बैठे हुए उग्रसेनके सामने खड़े होकर निवेदन करते थे, ' देव! हमारी प्रार्थना सुनिये । ' उनके इस सेवा - भावकी याद आते ही हम जैसे सेवकोंका चित्त अत्यन्त व्यथित हो जाता है ॥२२ ॥ पापिनी पूतनाने अपने स्तनोंमें हलाहल विष लगाकर श्रीकृष्णको मार
डालनेकी नियतसे उन्हें दूध पिलाया था; उसको भी भगवान्ने वह परम गति दी, जो धायको मिलनी चाहिये । उन भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कौन दयालु है, जिसकी शरण ग्रहण ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 415
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
करें ॥२३ ॥
मैं असुरोंको भी भगवान्का भक्त समझता हूँ; क्योंकि वैरभावजनित क्रोधके कारण उनका चित्त सदा श्रीकृष्णमें लगा रहता था और उन्हें रणभूमिमें सुदर्शनचक्रधारी भगवान्को कंधेपर चढ़ाकर झपटते हुए गरुड़जीके दर्शन हुआ करते थे ॥२४ ॥
ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे पृथ्वीका भार उतारकर उसे सुखी करनेके लिये कंसके कारागारमें वसुदेव - देवकीके यहाँ भगवान्ने अवतार लिया था ॥ २५ ॥ उस समय कंसके डरसे पिता
वसुदेवजीने उन्हें नन्दबाबाके व्रजमें पहुँचा दिया था । वहाँ वे बलरामजीके साथ ग्यारह वर्षतक इस प्रकार छिपकर रहे कि उनका प्रभाव व्रजके बाहर किसीपर प्रकट नहीं हुआ ॥२६ ॥ यमुनाके उपवनमें, जिसके हरे - भरे वृक्षोंपर कलरव करते हुए पक्षियोंके झुंड-के - झुंड रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्णने बछड़ोंको चराते हुए ग्वालबालोंकी मण्डलीके साथ
विहार किया था ॥२७ ॥ वे व्रजवासियोंकी दृष्टि आकृष्ट करनेके लिये अनेकों बाल - लीला उन्हें
दिखाते थे । कभी रोने - से लगते, कभी हँसते और कभी सिंहशावकके समान मुग्ध दृष्टिसे देखते ॥२८ ॥ फिर कुछ बड़े होनेपर वे सफेद बैल और रंग - बिरंगी शोभाकी मूर्ति गौओंको
चराते हुए अपने साथी गोपोंको बाँसुरी बजा - बजाकर रिझाने लगे ॥ २ ९ ॥ इसी समय जब कंसने उन्हें मारनेके लिये बहुत से मायावी और मनमाना रूप धारण करनेवाले राक्षस भेजे, तब उनको खेल - ही - खेल में भगवान्ने मार डाला – जैसे बालक खिलौनोंको तोड़ - फोड़ डालता है ॥३० ॥ कालियनागका दमन करके विष मिला हुआ जल पीनेसे मरे हुए
ग्वालबालों और गौओंको जीवितकर उन्हें कालियदहका निर्दोष जल पीनेकी सुविधा कर दी ॥३१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने बढ़े हुए धनका सद्व्यय करानेकी इच्छासे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके
द्वारा नन्दबाबासे गोवर्धनपूजारूप गोयज्ञ करवाया ॥ ३२ ॥ भद्र! इससे अपना मानजब
इन्द्रभंग होनेके कारण ने क्रोधित होकर व्रजका विनाश करनेके लिये मूसलधार जल बरसाना आरम्भ किया, तब भगवान्ने करुणावश खेल - ही - खेलमें छत्तेके समान गोवर्धन पर्वतको उठा लिया और अत्यन्त घबराये हुए व्रजवासियोंकी तथा उनके पशुओंकी रक्षा की ॥३३ ॥
सन्ध्याके समय जब सारे वृन्दावनमें शरत्के चन्द्रमाकी चाँदनी छिटक जाती, तब श्रीकृष्ण उसका सम्मान करते हुए मधुर गान करते और गोपियोंके मण्डलकी शोभा बढ़ाते हुए उनके साथ रासविहार करते ॥३४ ॥
स एव गोधनं लक्ष्म्या निकेतं सितगोवृषम् ।
चारयन्ननुगान् गोपान् रणद्वेणुररीरमत् ॥२९
प्रयुक्तान् भोजराजेन मायिनः कामरूपिणः ।
लीलया व्यनुदत्तांस्तान् बालः क्रीडनकानिव ॥३०
विपन्नान् विषपानेन निगृह्य भुजगाधिपम् ।
उत्थाप्यापाययद्गावस्तत्तोयं प्रकृतिस्थितम् ॥ ३१
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 416
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयाजयद्गोसवेन गोपराजं द्विजोत्तमैः ।
वित्तस्य चोरुभारस्य चिकीर्षन् सद्व्ययं विभुः ॥३२
वर्षतीन्द्रे व्रजः कोपाद्भग्नमानेऽतिविह्वलः ।
गोत्रलीलातपत्रेण त्रातो भद्रानुगृह्णता ॥३३
शरच्छशिकरैर्मृष्टं मानयन् रजनीमुखम् ।
गायन् कलपदं रेमे स्त्रीणां मण्डलमण्डनः ॥ ३४
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विदुरोद्धवसंवादे द्वितीयोऽध्यायः ॥२ ॥
१. प्रा ० पा ० — साम्राज्य ० । २. प्रा ० पा ० – व्यचरद् भुवि । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 417
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ तृतीयोऽध्यायः भगवान् के अन्य लीलाचरित्रोंका वर्णन उद्धव उवाच ततः स आगत्य पुरं स्वपित्रो-श्चिकीर्षया शं बलदेवसंयुतः । निपात्य तुङ्गाद्रिपुयूथनाथं हतं व्यकर्षद् व्यसुमोजसोर्व्याम् ॥ १ उद्धवजी कहते हैं — इसके बाद श्रीकृष्ण अपने माता - पिता देवकी - वसुदेवको सुख पहुँचानेकी इच्छासे बलदेवजीके साथ मथुरा पधारे और उन्होंने शत्रुसमुदायके स्वामी कंसको ऊँचे सिंहासनसे नीचे पटककर तथा उसके प्राण लेकर उसकी लाशको बड़े जोरसे पृथ्वीपर घसीटा ॥१ ॥
सान्दीपनेः सकृत्प्रोक्तं ब्रह्माधीत्य सविस्तरम् ।
तस्मै प्रादाद्वरं पुत्रं मृतं पञ्चजनोदरात् ॥ २
समाहुता भीष्मककन्यया ये श्रियः सवर्णेन बुभूषयैषाम् । गान्धर्ववृत्त्या मिषतां स्वभागं जहे पदं मूर्ध्नि दधत्सुपर्णः ॥ ३ ककुद्मतोऽविद्धनसो दमित्वा
स्वयंवरे नाग्नजितीमुवाह ।
तद्भग्नमानानपि गृध्यतोऽज्ञा-ञ्जघ्नेऽक्षतः शस्त्रभृतः स्वशस्त्रैः ॥४
प्रियं प्रभुग्रम्य इव प्रियाया विधित्सुरार्च्छद् द्युतरुं यदर्थे । वग्र्याद्रवत्तं सगणो रुषान्धः क्रीडामृगो नूनमयं वधूनाम् ॥५ सुतं मृधे खं वपुषा ग्रसन्तं दृष्ट्वा सुनाभोन्मथितं धरित्र्या । आमन्त्रितस्तत्तनयाय शेषं दत्त्वा तदन्तःपुरमाविवेश ॥६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 418
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तत्राहृतास्ता नरदेवकन्याः
कुजेन दृष्ट्वा हरिमार्तबन्धुम् ।
उत्थाय सद्यो जगृहुः प्रहर्ष-व्रीडानुरागप्रहितावलोकैः ॥७
आसां मुहूर्त एकस्मिन्नानागारेषु योषिताम् ।
सविधं जगृहे पाणीननुरूपः स्वमायया ॥८
तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः ।
एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥९
सान्दीपनि मुनिके द्वारा एक बार उच्चारण किये हुए सांगोपांग वेदका अध्ययन करके दक्षिणास्वरूप उनके मरे हुए पुत्रको पंचजन नामक राक्षसके पेटसे ( यमपुरीसे ) लाकर दे दिया ॥२ ॥ भीष्मकनन्दिनी रुक्मिणीके सौन्दर्यसे अथवा रुक्मीके बुलानेसे जो शिशुपाल
और उसके सहायक वहाँ आये हुए थे, उनके सिरपर पैर रखकर गान्धर्व विधिके द्वारा विवाह करनेके लिये अपनी नित्यसंगिनी रुक्मिणीको वे वैसे ही हरण कर लाये, जैसे गरुड अमृतकलशको ले आये थे || ३ || स्वयंवरमें सात बिना नथे हुए बैलोंको नाथकर नाग्नजिती ( सत्या ) -से विवाह किया । इस प्रकार मानभंग हो जानेपर मूर्ख राजाओंने शस्त्र उठाकर राजकुमारीको छीनना चाहा । तब भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं बिना घायल हुए अपने शस्त्रोंसे उन्हें मार डाला ॥४ ॥ भगवान् विषयी पुरुषोंकी - सी लीला करते हुए अपनी प्राणप्रिया
सत्यभामाको प्रसन्न करनेकी इच्छासे उनके लिये स्वर्गसे कल्पवृक्ष उखाड़ लाये । उस समय इन्द्रने क्रोधसे अंधे होकर अपने सैनिकोंसहित उनपर आक्रमण कर दिया; क्योंकि वह निश्चय ही अपनी स्त्रियोंका क्रीडामृग बना हुआ है || ५ || अपने विशाल डीलडौलसे आकाशको भी ढक देनेवाले अपने पुत्र भौमासुरको भगवान्के हाथसे मरा हुआ देखकर पृथ्वीने जब उनसे प्रार्थना की, तब उन्होंने भौमासुरके पुत्र भगदत्तको उसका बचा हुआ राज्य देकर उसके अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ ६ ॥ वहाँ भौमासुरद्वारा हरकर लायी हुई बहुत - सी राजकन्याएँ थीं ।
वे दीनबन्धु श्रीकृष्णचन्द्रको देखते ही खड़ी हो गयीं और सबने महान् हर्ष, लज्जा एवं प्रेमपूर्ण चितवनसे तत्काल ही भगवान्को पतिरूपमें वरण कर लिया ॥७ ॥
तब भगवान्ने अपनी निजशक्ति योगमायासे उन ललनाओंके अनुरूप उतने ही रूप धारणकर उन सबका अलग - अलग महलोंमें एक ही मुहूर्तमें विधिवत् पाणिग्रहण किया ॥८ ॥
अपनी लीलाका विस्तार करनेके लिये उन्होंने उनमेंसे प्रत्येकके गर्भसे सभी गुणोंमें अपने ही समान दस - दस पुत्र उत्पन्न किये || ९ || जब कालयवन, जरासन्ध और शाल्वादिने अपनी सेनाओंसे मथुरा और द्वारकापुरीको घेरा था, तब भगवान्ने निजजनोंको अपनी अलौकिक शक्ति देकर उन्हें स्वयं मरवाया था || १० || शम्बर, द्विविद, बाणासुर, मुर, बल्वल तथा दन्तवक्त्र आदि अन्य योद्धाओंमेंसे भी किसीको उन्होंने स्वयं मारा था और किसीको दूसरोंसे मरवाया ॥११ ॥ इसके बाद उन्होंने आपके भाई धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्रोंका पक्ष लेकर
आये हुए राजाओंका भी संहार किया, जिनके सेनासहित कुरुक्षेत्रमें पहुँचनेपर पृथ्वी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 419
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
डगमगाने लगी थी ॥१२ ॥ कर्ण, दुःशासन और शकुनिकी खोटी सलाहसे जिसकी आयु और
श्री दोनों नष्ट हो चुकी थीं तथा भीमसेनकी गदासे जिसकी जाँघ टूट चुकी थी, उस दुर्योधनको अपने साथियोंके सहित पृथ्वीपर पड़ा देखकर भी उन्हें प्रसन्नता न हुई ॥१३ ॥ वे सोचने लगे
– यदि द्रोण, भीष्म, अर्जुन और भीमसेनके द्वारा इस अठारह अक्षौहिणी सेनाका विपुल संहार हो भी गया, तो इससे पृथ्वीका कितना भार हलका हुआ । अभी तो मेरे अंशरूप प्रद्युम्न आदिके बलसे बढ़े हुए यादवोंका दुःसह दल बना ही हुआ है ॥१४ ॥ जब ये मधुपानसे
मतवाले हो लाल - लाल आँखें करके आपसमें लड़ने लगेंगे, तब उससे ही इनका नाश होगा । इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है । असलमें मेरे संकल्प करनेपर ये स्वयं ही अन्तर्धान हो जायँगे ॥१५ ॥
कालमागधशाल्वादीननीकै रुन्धतः पुरम् ।
अजीघनत्स्वयं दिव्यं स्वपुंसां तेज आदिशत् ॥१०
शम्बरं द्विविदं बाणं मुरं बल्वलमेव च ।
अन्यांश्च दन्तवक्त्रादीनवधीत्कांश्च घातयत् ॥११
अथ ते भ्रातृपुत्राणां पक्षयोः पतितान्नृपान् ।
चचाल भूः कुरुक्षेत्रं येषामापततां बलैः ॥१२
स कर्णदुश्शासनसोबलानां कुमन्त्रपाकेन हतश्रियायुषम् । सुयोधनं सानुचरं शयानं भग्नोरुमूर्व्यं न ननन्द पश्यन् ॥१३ कियान् भुवोऽयं क्षपितोरुभारो
यद्द्रोणभीष्मार्जुन भीममूलैः ।
अष्टादशाक्षौहिणिको मदंशै-रास्ते बलं दुर्विषहं यदूनाम् ॥१४
मिथो यदैषां भविता विवादो मध्वामदाताम्रविलोचनानाम् । नैषां वधोपाय इयानतोऽन्यो मय्युद्यतेऽन्तर्दधते स्वयं स्म ॥१५
एवं सञ्चिन्त्य भगवान् स्वराज्ये स्थाप्य धर्मजम् ।
नन्दयामास सुहृदः साधूनां वर्त्म दर्शयन् ॥ १६
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 420
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उत्तरायां धृतः पूर्वंशः साध्वभिमन्युना ।
स वै द्रौण्यस्त्रसंछिन्नः पुनर्भगवता धृतः ॥१७
अयाजयद्धर्मसुतमश्वमेधैस्त्रिभिर्विभुः ।
सोऽपि क्ष्मामनुजै रक्षन् रेमे कृष्णमनुव्रतः ॥१८
भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः ।
कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः सांख्यमास्थितः ॥१९
यों सोचकर भगवान्ने युधिष्ठिरको अपनी पैतृक राजगद्दीपर बैठाया और अपने सभी सगे - सम्बन्धियोंको सत्पुरुषोंका मार्ग दिखाकर आनन्दित किया ॥१६ ॥ उत्तराके उदरमें जो
अभिमन्युने पूरुवंशका बीज स्थापित किया था, वह भी अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे नष्ट - सा हो चुका था; किन्तु भगवान्ने उसे बचा लिया ॥१७ ॥ उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिरसे तीन
अश्वमेधयज्ञ करवाये और वे भी श्रीकृष्णके अनुगामी होकर अपने छोटे भाइयोंकी सहायतासे पृथ्वीकी रक्षा करते हुए बड़े आनन्दसे रहने लगे ॥ १८ ॥ विश्वात्मा श्रीभगवान्ने भी
द्वारकापुरीमें रहकर लोक और वेदकी मर्यादाका पालन करते हुए सब प्रकारके भोग भोगे, किन्तु सांख्ययोगकी स्थापना करनेके लिये उनमें कभी आसक्त नहीं हुए ॥१९ ॥
स्निग्धस्मितावलोकेन वाचा पीयूषकल्पया ।
चरित्रेणानवद्येन ' श्रीनिकेतेन चात्मना ॥२०
इमं लोकममुं चैव रमयन् सुतरां यदून् ।
रेमे क्षणदया दत्तक्षणस्त्रीक्षणसौहृदः ॥२१
तस्यैवंर रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् ।
गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥२२
दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् ।
को विस्रम्भेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥२३
पुर्यां कदाचित्क्रीडद्भिर्यदुभोजकुमारकैः ।
कोपिता मुनयः शेपुर्भगवन्मतकोविदाः ॥ २४
ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ।
ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्देवविमोहिताः ॥२५
****** ebook converter DEMO Watermarks *******