श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 611–620

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

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तस्मात्सूर्यो व्यभिद्येतां कर्णौ श्रोत्रं ततो दिशः ॥ ५५ तेजका विशेष गुण रूप जिसका विषय है, वह नेत्रेन्द्रिय है; जलका विशेष गुण रस जिसका विषय है, वह रसनेन्द्रिय है और पृथ्वीका विशेष गुण गन्ध जिसका विषय है, उसे घ्राणेन्द्रिय कहते हैं ॥४८ ॥ वायु आदि कार्य - तत्त्वोंमें आकाशादि कारण - तत्त्वोंके रहनेसे

उनके गुण भी अनुगत देखे जाते हैं; इसलिये समस्त महाभूतोंके गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध केवल पृथ्वीमें ही पाये जाते हैं ॥ ४ ९ ॥ जब महत्तत्त्व, अहंकार और पंचभूत — ये सात तत्त्व परस्पर मिल न सके - पृथक् - पृथक् ही रह गये, तब जगत्के आदिकारण श्रीनारायणने काल, अदृष्ट और सत्त्वादि गुणोंके सहित उनमें प्रवेश किया ॥ ५० ॥

फिर परमात्माके प्रवेशसे क्षुब्ध और आपसमें मिले हुए उन तत्त्वोंसे एक जड अण्ड उत्पन्न हुआ । उस अण्डसे इस विराट् पुरुषकी अभिव्यक्ति हुई ॥ ५१ ॥ इस अण्डका नाम

विशेष है, इसीके अन्तर्गत श्रीहरिके स्वरूपभूत चौदहों भुवनोंका विस्तार है । यह चारों ओरसे क्रमशः एक - दूसरेसे दसगुने जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार और महत्तत्त्व – इन छः आवरणोंसे घिरा हुआ है । इन सबके बाहर सातवाँ आवरण प्रकृतिका है ॥५२ ॥ कारणमय

जलमें स्थित उस तेजोमय अण्डसे उठकर उस विराट् पुरुषने पुनः उसमें प्रवेश किया और फिर उसमें कई प्रकारके छिद्र किये ॥ ५३ ॥ सबसे पहले उसमें मुख प्रकट हुआ, उससे वाक्-इन्द्रिय और उसके अनन्तर वाक्का अधिष्ठाता अग्नि उत्पन्न हुआ । फिर नाकके छिद्र ( नथुनें )

प्रकट हुए, उनसे प्राणसहित घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई ॥ ५४ ॥ घ्राणके बाद उसका अधिष्ठाता वायु

उत्पन्न हुआ । तत्पश्चात् नेत्रगोलक प्रकट हुए, उनसे चक्षु - इन्द्रिय प्रकट हुई और उसके अनन्तर उसका अधिष्ठाता सूर्य उत्पन्न हुआ । फिर कानोंके छिद्र प्रकट हुए, उनसे उनकी इन्द्रिय श्रोत्र और उसके अभिमानी दिग्देवता प्रकट हुए ॥५५ ॥

निर्बिभेद विराजस्त्वग्रोमश्मश्र्वादयस्ततः ।

तत ओषधयश्चासन् शिश्नं निर्बिभिदे ततः ॥५६

रेतस्तस्मादाप आसन्निरभिद्यत वै गुदम् ।

गुदादपानोऽपानाच्च मृत्युर्लोकभयङ्करः ॥ ५७

हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् ।

पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥५८

नाड्योऽस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभृतम् ' ।

नद्यस्ततः समभवन्नुदरं निरभिद्यत ॥५९

क्षुत्पिपासे ततः स्यातां समुद्रस्त्वेतयोरभूत् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 612

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अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् ॥६०

मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरां पतिः ।

अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोऽभवत् ॥६१

एते ह्यभ्युत्थिता देवा नैवास्योत्थापनेऽशकन् ।

पुनराविविशुः खानि तमुत्थापयितुं क्रमात् ॥ ६२

वह्निर्वाचा मुखं भेजे नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।

घ्राणेन नासिके वायुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६३

इसके बाद उस विराट् पुरुषके त्वचा उत्पन्न हुई । उससे रोम, मूँछ - दाढ़ी तथा सिरके बाल प्रकट हुए और उनके बाद त्वचाकी अभिमानी ओषधियाँ ( अन्न आदि ) उत्पन्न हुईं । इसके पश्चात् लिंग प्रकट हुआ ॥५६ ॥

उससे वीर्य और वीर्यके बाद लिंगका अभिमानी आपोदेव ( जल ) उत्पन्न हुआ । फिर गुदा प्रकट हुई, उससे अपानवायु और अपानके बाद उसका अभिमानी लोकोंको भयभीत करनेवाला मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ ॥५७ ॥

तदनन्तर हाथ प्रकट हुए, उनसे बल और बलके बाद हस्तेन्द्रियका अभिमानी इन्द्र उत्पन्न हुआ । फिर चरण प्रकट हुए, उनसे गति ( गमनकी क्रिया ) और फिर पादेन्द्रियका अभिमानी विष्णुदेवता उत्पन्न हुआ ॥५८ ॥

इसी प्रकार जब विराट् पुरुषके नाडियाँ प्रकट हुईं, तो उनसे रुधिर उत्पन्न हुआ और उससे नदियाँ हुईं । फिर उसके उदर ( पेट ) प्रकट हुआ ॥ ५ ९ ॥ उससे क्षुधा - पिपासाकी अभिव्यक्ति हुई और फिर उदरका अभिमानी समुद्रदेवता उत्पन्न हुआ । तत्पश्चात् उसके हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मनका प्राकट्य हुआ || ६० || मनके बाद उसका अभिमानी देवता चन्द्रमा हुआ । फिर हृदयसे ही बुद्धि और उसके बाद उसका अभिमानी ब्रह्मा हुआ । तत्पश्चात् अहंकार और उसके अनन्तर उसका अभिमानी रुद्रदेवता उत्पन्न हुआ । इसके बाद चित्त और उसका अभिमानी क्षेत्रज्ञ प्रकट हुआ ॥६१ ॥

जब ये क्षेत्रज्ञके अतिरिक्त सारे देवता उत्पन्न होकर भी विराट् पुरुषको उठानेमें असमर्थ रहे, तो उसे उठानेके लिये क्रमशः फिर अपने - अपने उत्पत्तिस्थानोंमें प्रविष्ट होने लगे ॥६२ ॥

अग्निने वाणीके साथ मुखमें प्रवेश किया, परन्तु इससे विराट् पुरुष न उठा । वायुने घ्राणेन्द्रियके सहित नासाछिद्रोंमें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा ॥६३ ॥

अक्षिणी चक्षुषाऽऽदित्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।

श्रोत्रेण कर्णौ च दिशो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६४

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पृष्ठ 613

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त्वचं रोमभिरोषध्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।

रेतसा शिश्नमापस्तु नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६५

गुदं मृत्युरपानेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।

हस्ताविन्द्रो बलेनैव नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६६

विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।

नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६७

क्षुत्तृड्भ्यामुदरं सिन्धुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।

हृदयं मनसा चन्द्रो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥६८

बुद्धया ब्रह्मापि हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।

रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६ ९

चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद्यदा ।

विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥७०

यथा प्रसुप्तं पुरुषं प्राणेन्द्रियमनोधियः ।

प्रभवन्ति विना येन नोत्थापयितुमोजसा ॥७१

तमस्मिन् प्रत्यगात्मानं धिया योगप्रवृत्तया ।

भक्त्या विरक्त्या ज्ञानेन विविच्यात्मनि चिन्तयेत् ॥७२

सूर्यने चक्षुके सहित नेत्रोंमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा । दिशाओंने श्रवणेन्द्रियके सहित कानोंमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ॥६४ ॥

ओषधियोंने रोमोंके सहित त्वचामें प्रवेश किया फिर भी विराट् पुरुष न उठा । जलने वीर्यके साथ लिंगमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६५ ॥ मृत्युने अपानके साथ

गुदामें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा । इन्द्रने बलके साथ हाथोंमें प्रवेश किया, परन्तु इससे भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६६ ॥ विष्णुने गतिके सहित चरणोंमें प्रवेश किया, तो

भी विराट् पुरुष न उठा । नदियोंने रुधिरके सहित नाडियोंमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा ॥६७ ॥ समुद्रने क्षुधा पिपासाके सहित उदरमें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न

उठा । चन्द्रमाने मनके सहित हृदयमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६८ ॥ ब्रह्माने

बुद्धिके सहित हृदयमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा । रुद्रने अहंकारके सहित उसी हृदयमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ॥६९ ॥

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पृष्ठ 614

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किन्तु जब चित्तके अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञने चित्तके सहित हृदयमें प्रवेश किया, तो विराट् पुरुष उसी समय जलसे उठकर खड़ा हो गया ॥७० ॥

जिस प्रकार लोकमें प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि चित्तके अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञकी सहायताके बिना सोये हुए प्राणीको अपने बलसे नहीं उठा सकते, उसी प्रकार विराट् पुरुषको भी वे क्षेत्रज्ञ परमात्माके बिना नहीं उठा सके ॥७१ ॥

अतः भक्ति, वैराग्य और चित्तकी एकाग्रतासे प्रकट हुए ज्ञानके द्वारा उस अन्तरात्मस्वरूप क्षेत्रज्ञको इस शरीरमें स्थित जानकर उसका चिन्तन करना चाहिये ॥७२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेये तत्त्वसमाम्नाये षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

१. प्रा ० पा ० — प्रधानं पुरुषं प्रा ० । * जिसे अध्यात्ममें चित्त कहते हैं; उसीको अधिभूतमें महत्तत्त्व कहा जाता है । चित्तमें अधिष्ठाता ‘ क्षेत्रज्ञ ’ और उपास्यदेव ' वासुदेव ' हैं । इसी प्रकार अहंकारमें अधिष्ठाता ‘ रुद्र ' और उपास्यदेव ‘ संकर्षण ’ है, बुद्धिमें अधिष्ठाता ' ब्रह्मा ' और उपास्यदेव ' प्रद्युम्न ' है तथा मनमें अधिष्ठाता ‘ चन्द्रमा ’ और उपास्यदेव ' अनिरुद्ध ' है । -१. प्रा ० पा ० — क्वचित् । २. प्रा ० पा ० – तत्त्वन्नभः । १. प्रा ० पा ० — लभ्यते । २. प्रा ० पा०— -नेन वृतै ० | १. प्रा ० पा ० — माश्रितम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 615

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अथ सप्तविंशोऽध्यायः प्रकृति - पुरुषके विवेकसे मोक्ष प्राप्तिका वर्णन श्रीभगवानुवाच

प्रकृतिस्थोऽपि पुरुषो नाज्यते प्राकृतैर्गुणैः ।

अविकारादकर्तृत्वान्निर्गुणत्वाज्जलार्कवत् ॥ १

स एष यर्हि प्रकृतेर्गुणेष्वभिविषज्जते ।

अहंक्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीत्यभिमन्यते ॥ २

तेन संसारपदवीमवशोऽभ्येत्यनिर्वृतः ।

प्रासंगिकैः कर्मदोषैः सदसन्मिश्रयोनिषु ॥३

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।

ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥४

अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तमसतां पथि ।

भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम् ॥ ५

यमादिभिर्योगपथैरभ्यसन् श्रद्धयान्वितः ।

मयि भावेन सत्येन मत्कथाश्रवणेन च ॥ ६

सर्वभूतसमत्वेन निर्वैरेणाप्रसंगतः ।

ब्रह्मचर्येण मौनेन स्वधर्मेण बलीयसा ॥७

यदृच्छयोपलब्धेन सन्तुष्टो मितभुङ्मुनिः ।

विविक्तशरणः शान्तो मैत्रः करुण आत्मवान् ॥८

श्रीभगवान् कहते हैं — माताजी! जिस तरह जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके साथ जलके शीतलता, चंचलता आदि गुणोंका सम्बन्ध नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृतिके कार्य शरीरमें स्थित रहनेपर भी आत्मा वास्तवमें उसके सुख - दुःखादि धर्मोंसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह स्वभावसे निर्विकार, अकर्ता और निर्गुण है ॥ १ ॥

किन्तु जब वही प्राकृत गुणोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, तब अहंकारसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 616

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मोहित होकर ' मैं कर्ता हूँ ' – ऐसा मानने लगता है ॥ २ ॥ उस अभिमानके कारण वह देहके

संसर्गसे किये हुए पुण्य - पापरूप कर्मोंके दोषसे अपनी स्वाधीनता और शान्ति खो बैठता है तथा उत्तम, मध्यम और नीच योनियोंमें उत्पन्न होकर संसारचक्रमें घूमता रहता है ॥३ ॥ जिस

प्रकार स्वप्नमें भय - शोकादिका कोई कारण न होनेपर भी स्वप्नके पदार्थोंमें आस्था हो जानेके कारण दुःख उठाना पड़ता है, उसी प्रकार भय - शोक, अहं मम एवं जन्म - मरणादिरूप संसारकी कोई सत्ता न होनेपर भी अविद्यावश विषयोंका चिन्तन करते रहनेसे जीवका संसार - चक्र कभी निवृत्त नहीं होता ॥४ ॥ इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि

असन्मार्ग ( विषय - चिन्तन ) में फँसे हुए चित्तको तीव्र भक्तियोग और वैराग्यके द्वारा धीरे - धीरे अपने वशमें लावे || ५ || यमादि योगसाधनोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक अभ्यास – चित्तको बारंबार एकाग्र करते हुए मुझमें सच्चा भाव रखने, मेरी कथा श्रवण करने, समस्त प्राणियोंमें समभाव रखने, किसीसे वैर न करने, आसक्तिके त्याग, ब्रह्मचर्य, मौन व्रत और बलिष्ठ ( अर्थात् भगवान्को समर्पित किये हुए ) स्वधर्मसे जिसे ऐसी स्थिति प्राप्त हो गयी है कि - प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाता है उसीमें सन्तुष्ट रहता है, परिमित भोजन करता है, सदा एकान्तमें रहता है, शान्तस्वभाव है, सबका मित्र है, दयालु और धैर्यवान् है, प्रकृति और पुरुषके वास्तविक स्वरूपके अनुभवसे प्राप्त हुए तत्त्वज्ञानके कारण स्त्री - पुत्रादि सम्बन्धियोंके सहित इस देहमें मैं - मेरेपनका मिथ्या अभिनिवेश नहीं करता, बुद्धिकी जाग्रदादि अवस्थाओंसे भी अलग हो गया है तथा परमात्माके सिवा और कोई वस्तु नहीं देखता - वह आत्मदर्शी मुनि नेत्रोंसे सूर्यको देखनेकी भाँति अपने शुद्ध अन्तःकरणद्वारा परमात्माका साक्षात्कार कर उस अद्वितीय ब्रह्मपदको प्राप्त हो जाता है, जो देहादि सम्पूर्ण उपाधियोंसे पृथक्, अहंकारादि मिथ्या वस्तुओंमें सत्यरूपसे भासनेवाला, जगत्कारणभूता प्रकृतिका अधिष्ठान, महदादि कार्य - वर्गका प्रकाशक और कार्य - कारणरूप सम्पूर्ण पदार्थोंमें व्याप्त है ॥६-११ ॥

सानुबन्धे च देहेऽस्मिन्नकुर्वन्नसदाग्रहम् ।

ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥९

निवृत्तबिद्धयवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः ।

उपलभ्यात्मनाऽऽत्मानं चक्षुषेवार्कमात्मदृक् ॥१०

मुक्तलिंगं सदाभासमसति प्रतिपद्यते ।

सतोबन्धुमसच्चक्षुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥ ११

यथा जलस्थ आभासः स्थलस्थेनावदृश्यते ।

स्वाभासेन तथा सूर्यो जलस्थेन दिवि स्थितः ॥ १२

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पृष्ठ 617

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एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोमयैः ।

स्वाभासैर्लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यदृक् ॥१३

भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्धयादिष्विह निद्रया ।

लीनेष्वसति यस्तत्र विनिद्रो निरहंक्रियः ॥१४

मन्यमानस्तदाऽऽत्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा ।

नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः ॥१५

एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते ।

साहङ्कारस्य द्रव्यस्य योऽवस्थानमनुग्रहः ॥१६

जिस प्रकार जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब दीवालपर पड़े हुए अपने आभासके सम्बन्धसे देखा जाता है और जलमें दीखनेवाले प्रतिबिम्बसे आकाशस्थित सूर्यका ज्ञान होता है, उसी प्रकार वैकारिक आदि भेदसे तीन प्रकारका अहङ्कार देह, इन्द्रिय और मनमें स्थित अपने प्रतिबिम्बोंसे लक्षित होता है और फिर सत् परमात्माके प्रतिबिम्बयुक्त उस अहङ्कारके द्वारा सत्यज्ञानस्वरूप परमात्माका दर्शन होता है - जो सुषुप्तिके समय निद्रासे शब्दाद भूतसूक्ष्म, इन्द्रिय और मनबुद्धि आदिके अव्याकृतमें लीन हो जानेपर स्वयं जागता रहता है और सर्वथा अहंकारशून्य है ॥१२- १४ ॥ ( जाग्रत अवस्थामें यह आत्मा भूत - सूक्ष्मादि दृश्यवर्गके द्रष्टारूपमें स्पष्टतया अनुभवमें आता है; किन्तु ) सुषुप्तिके समय अपने उपाधिभूत अहंकारका नाश होनेसे वह भ्रमवश अपनेको ही नष्ट हुआ मान लेता है और जिस प्रकार धनका नाश हो जानेपर मनुष्य अपनेको भी नष्ट हुआ मानकर अत्यन्त व्याकुल हो जाता है, उसी प्रकार वह भी अत्यन्त विवश होकर नष्टवत् हो जाता है ॥ १५ ॥ माताजी! इन सब

बातोंका मनन करके विवेकी पुरुष अपने आत्माका अनुभव कर लेता है, जो अहंकारके सहित सम्पूर्ण तत्त्वोंका अधिष्ठान और प्रकाशक है ॥१६ ॥

देवहूतिरुवाच

पुरुषं प्रकृतिर्ब्रह्मन्न विमुञ्चति कर्हिचित् ।

अन्योन्यापाश्रयत्वाच्च नित्यत्वादनयोः प्रभो ॥१७

यथा गन्धस्य भूमेश्च न भावो व्यतिरेकतः ।

अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धेः परस्य च ॥ १८

अकर्तुः कर्मबन्धोऽयं पुरुषस्य यदाश्रयः ।

गुणेषु सत्सु प्रकृतेः कैवल्यं तेष्वतः कथम् ॥१९

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पृष्ठ 618

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क्वचित् तत्त्वावमर्शेन निवृत्तं भयमुल्बणम् ।

अनिवृत्तनिमित्तत्वात्पुनः प्रत्यवतिष्ठते ॥२०

श्रीभगवानुवाच

अनिमित्तनिमित्तेन स्वधर्मेणामलात्मना ।

तीव्रया मयि भक्त्या च श्रुतसम्भृतया चिरम् ॥२१

ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा ।

तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ॥२२

प्रकृतिः पुरुषस्येह दह्यमाना त्वहर्निशम् ।

तिरोभवित्री शनकैरग्नेर्योनिरिवारणिः ॥२३

भुक्तभोगा परित्यक्ता दृष्टदोषा च नित्यशः ।

नेश्वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्य च ॥२४

यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत् ।

स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ २५

एवं विदिततत्त्वस्य प्रकृतिर्मयि मानसम् ।

युंजतो नापकुरुत आत्मारामस्य कर्हिचित् ॥२६

यदैवमध्यात्मरतः कालेन बहुजन्मना ।

सर्वत्र जातवैराग्य आब्रह्मभुवनान्मुनिः ॥२७

देवहूतिने पूछा – प्रभो! पुरुष और प्रकृति दोनों ही नित्य और एक - दूसरेके आश्रयसे रहनेवाले हैं, इसलिये प्रकृति तो पुरुषको कभी छोड़ ही नहीं सकती ॥१७ ॥ ब्रह्मन्! जिस

प्रकार गन्ध और पृथ्वी तथा रस और जलकी पृथक् - पृथक् स्थिति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पुरुष और प्रकृति भी एक - दूसरेको छोड़कर नहीं रह सकते ॥१८ ॥ अतः जिनके

आश्रयसे अकर्ता पुरुषको यह कर्मबन्धन प्राप्त हुआ है, उन प्रकृतिके गुणोंके रहते हुए उसे कैवल्यपद कैसे प्राप्त होगा? ॥१९ ॥ यदि तत्त्वोंका विचार करनेसे कभी यह संसारबन्धनका

तीव्र भय निवृत्त हो भी जाय, तो भी उसके निमित्तभूत प्राकृत गुणोंका अभाव न होनेसे वह भय फिर उपस्थित हो सकता है ॥२० ॥

श्रीभगवान्ने कहा — माताजी! जिस प्रकार अग्निका उत्पत्तिस्थान अरणि अपनेसे ही उत्पन्न अग्निसे जलकर भस्म हो जाती है, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये हुए स्वधर्मपालनद्वारा अन्तःकरण शुद्ध होनेसे बहुत समयतक भगवत्कथा श्रवणद्वारा पुष्ट हुई मेरी तीव्र भक्तिसे, तत्त्वसाक्षात्कार करानेवाले ज्ञानसे, प्रबल वैराग्यसे, व्रतनियमादिके सहित किये हुए ध्यानाभ्याससे और चित्तकी प्रगाढ़ एकाग्रतासे पुरुषकी प्रकृति ( अविद्या ) दिन - रात ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 619

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क्षीण होती हुई धीरे - धीरे लीन हो जाती है ॥ २१-२३ ॥ फिर नित्यप्रति दोष दीखनेसे भोगकर त्यागी हुई वह प्रकृति अपने स्वरूपमें स्थित और स्वतन्त्र ( बन्धनमुक्त ) हुए उस पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती ॥२४ ॥ जैसे सोये हुए पुरुषको स्वप्नमें कितने ही अनर्थोंका अनुभव

करना पड़ता है, किन्तु जग पड़नेपर उसे उन स्वप्नके अनुभवोंसे किसी प्रकारका मोह नहीं होता ॥२५ । उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है और जो निरन्तर मुझमें ही मन लगाये रहता है, उस आत्माराम मुनिका प्रकृति कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती ॥ २६ ॥ जब मनुष्य

अनेकों जन्मोंमें बहुत समयतक इस प्रकार आत्मचिन्तनमें ही निमग्न रहता है, तब उसे ब्रह्मलोक - पर्यन्त सभी प्रकारके भोगोंसे वैराग्य हो जाता है ॥२७ ॥ मेरा वह धैर्यवान् भक्त

मेरी ही महती कृपासे तत्त्वज्ञान प्राप्त करके आत्मानुभवके द्वारा सारे संशयोंसे मुक्त हो जाता है और फिर लिंगदेहका नाश होनेपर एकमात्र मेरे ही आश्रित अपने स्वरूपभूत कैवल्यसंज्ञक मंगलमय पदको सहजमें ही प्राप्त कर लेता है, जहाँ पहुँचनेपर योगी फिर लौटकर नहीं आता ॥२८-२९ ॥ माताजी! यदि योगीका चित्त योगसाधनासे बढ़ी हुई मायामयी अणिमादि सिद्धियोंमें, जिनकी प्राप्तिका योगके सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है, नहीं फँसता, तो उसे मेरा वह अविनाशी परमपद प्राप्त होता है – जहाँ मृत्युकी कुछ भी दाल नहीं गलती ॥ ३० ॥

मद्भक्तः प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा ।

निःश्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम् ॥२८

प्राप्नोतीहांजसा धीरः स्वदृशा छिन्नसंशयः ।

यद्गत्वा न निवर्तेत योगी लिंगाद्विनिर्गमे ॥ २ ९

यदा न योगोपचितासु चेतो मायासु सिद्धस्य विषज्जतेऽङ्ग । अनन्यहेतुष्वथ मे गतिः स्याद् आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहासः ॥३० इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेयोपाख्याने सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७ ॥

१. प्रा ० पा ० – लिंगविनिर्गमे । २. प्रा ० पा ० — जते कथम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 620

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 620 का मूल पृष्ठ
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अथाष्टाविंशोऽध्यायः अष्टांगयोगकी विधि श्रीभगवानुवाच

योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मज ।

मनो येनैव विधिना प्रसन्नं याति सत्पथम् ॥१

स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम् ।

दैवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मविच्चरणार्चनम् ॥२

ग्राम्यधर्मनिवृत्तिश्च मोक्षधर्मरतिस्तथा ।

मितमेध्यादनं शश्वद्विविक्तक्षेमसेवनम् ॥३

अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रहः ।

ब्रह्मचर्यं तपः शौचं स्वाध्यायः पुरुषार्चनम् ॥४

कपिलभगवान् कहते हैं - माताजी! अब मैं तुम्हें सबीज ( ध्येयस्वरूपके आलम्बनसे युक्त ) योगका लक्षण बताता हूँ, जिसके द्वारा चित्त शुद्ध एवं प्रसन्न होकर परमात्माके मार्गमें प्रवृत्त हो जाता है ॥१ ॥ यथाशक्ति शास्त्रविहित स्वधर्मका पालन करना तथा शास्त्रविरुद्ध

आचरणका परित्याग करना, प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहना, आत्मज्ञानियोंके चरणोंकी पूजा करना, ॥२ ॥ विषय - वासनाओंको बढ़ानेवाले कर्मोंसे दूर

रहना, संसारबन्धनसे छुड़ानेवाले धर्मोंमें प्रेम करना, पवित्र और परिमित भोजन करना, निरन्तर एकान्त और निर्भय स्थानमें रहना, || ३ || मन, वाणी और शरीरसे किसी जीवको न सताना, सत्य बोलना, चोरी न करना, आवश्यकतासे अधिक वस्तुओंका संग्रह न करना, ब्रह्मचर्यका पालन करना, तपस्या करना ( धर्मपालनके लिये कष्ट सहना ), बाहर - भीतरसे पवित्र रहना, शास्त्रोंका अध्ययन करना, भगवान्की पूजा करना, ॥४ ॥

मौनं सदाऽऽसनजयस्थैर्यं प्राणजयः शनैः ।

प्रत्याहारश्चेन्द्रियाणां विषयान्मनसा हृदि ॥५

स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् ।

वैकुण्ठलीलाभिध्यांन समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥६

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