श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 671–680
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680
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अत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठाः स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।
किञ्चिच्चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो ॥१६
मैत्रेय उवाच
ब्रह्मणा नोदितः ४ सृष्टावत्रिर्ब्रह्मविदां वरः ।
सह पत्न्या ययावृक्षं कुलाद्रिं तपसि स्थितः ॥१७
स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ' तुषित ' नामके देवता हुए । उस मन्वन्तरमें मरीचि आदि सप्तर्षि थे, भगवान् यज्ञ ही देवताओंके अधीश्वर इन्द्र थे और महान् प्रभावशाली प्रियव्रत एवं उत्तानपाद मनुपुत्र थे । वह मन्वन्तर उन्हीं दोनोंके बेटों, पोतों और दौहित्रोंके वंशसे छा गया ॥८ - ९ ॥ प्यारे विदुरजी! मनुजीने अपनी दूसरी कन्या देवहूति कर्दमजीको ब्याही थी । उसके सम्बन्धकी प्रायः सभी बातें तुम मुझसे सुन चुके हो || १० || भगवान् मनुने अपनी तीसरी कन्या प्रसूतिका विवाह ब्रह्माजी के पुत्र दक्षप्रजापतिसे किया था; उसकी विशाल वंशपरम्परा तो सारी त्रिलोकीमें फैली हुई है ॥११ ॥
मैं कर्दमजीकी नौ कन्याओं का, जो नौ ब्रह्मर्षियोंसे ब्याही गयी थीं, पहले ही वर्णन कर चुका हूँ । अब उनकी वंशपरम्पराका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥१२ ॥ मरीचि ऋषिकी पत्नी
कर्दमजीकी बेटी कलासे कश्यप और पूर्णिमा नामक दो पुत्र हुए, जिनके वंशसे यह सारा जगत् भरा हुआ है ॥१३ ॥ शत्रुतापन विदुरजी! पूर्णिमाके विरज और विश्वग नामके दो पुत्र
तथा देवकुल्या नामकी एक कन्या हुई । यहाँ दूसरे जन्ममें श्रीहरिके चरणोंके धोवनसे देवनदी गंगाके रूपमें प्रकट हुई ॥१४ ॥ अत्रिकी पत्नी अनसूयासे दत्तात्रेय, दुर्वासा और चन्द्रमा
नामके तीन परम यशस्वी पुत्र हुए । ये क्रमशः भगवान् विष्णु, शंकर और ब्रह्माके अंशसे उत्पन्न हुए थे ॥१५ ॥
विदुरजीने पूछा - गुरुजी! कृपया यह बतलाइये कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाले इन सर्वश्रेष्ठ देवोंने अत्रि मुनिके यहाँ क्या करनेकी इच्छासे अवतार लिया था? ॥१६ ॥
श्रीमैत्रेयजीने कहा- जब ब्रह्माजीने ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महर्षि अत्रिको सृष्टि रचनेके लिये आज्ञा दी, तब वे अपनी सहधर्मिणीके सहित तप करनेके लिये ऋक्षनामक कुलपर्वतपर गये ॥१७ ॥
तस्मिन् प्रसूनस्तबकपलाशाशोककानने ।
वार्भिःस्रवद्भिरुद्घुष्टे निर्विन्ध्यायाः समन्ततः ॥ १८
प्राणायामेन संयम्य मनो वर्षशतं मुनिः ।
अतिष्ठदेकपादेन निर्द्वन्द्वोऽनिलभोजनः ॥१९
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शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः ।
प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥२०
तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधसाग्निना ।
निर्गतेन मुनेर्मूर्ध्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥२१
अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।
वितायमानयशसस्तदाश्रमपदं ययुः ॥२२
तत्प्रादुर्भावसंयोगविद्योतितमना मुनिः ।
उत्तिष्ठन्नेकपादेन ददर्श विबुधर्षभान् ॥२३
प्रणम्य दण्डवद्भूमावुपतस्थेऽर्हणाञ्जलिः ।
वृषहंससुपर्णस्थान् स्वैः स्वैश्चित्रैश्च चिह्नितान् ॥२४
कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान् ।
तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी ॥ २५
चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्नस्तावीत्संहताञ्जलिः ।
श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयसः ॥२६
अत्रिरुवाच
विश्वोद्भवस्थितिलयेषु विभज्यमानै-मयागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहाः ।
ते ब्रह्मविष्णुगिरिशाः प्रणतोऽस्म्यहं व-स्तेभ्यः क एव भवतां म इहोपहूतः ॥२७
वहाँ पलाश और अशोकके वृक्षोंका एक विशाल वन था । उसके सभी वृक्ष फूलोंके गुच्छोंसे लदे थे तथा उसमें सब ओर निर्विन्ध्या नदीके जलकी कलकल ध्वनि गूँजती रहती थी ॥१८ ॥ उस वनमें वे मुनिश्रेष्ठ प्राणायामके द्वारा चित्तको वशमें करके सौ वर्षतक केवल
वायु पीकर सर्दी - गरमी आदि द्वन्दोंकी कुछ भी परवा न कर एक ही पैरसे खड़े रहे ॥१९ । उस समय वे मन - ही - मन यही प्रार्थना करते थे कि ' जो कोई सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं, मैं उनकी शरणमें हूँ; वे मुझे अपने ही समान सन्तान प्रदान करें ' ॥ २० ॥
तब यह देखकर कि प्राणायामरूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ अत्रि मुनिका तेज उनके मस्तकसे निकलकर तीनों लोकोंको तपा रहा है - ब्रह्मा, विष्णु और महादेव – तीनों जगत्पति उनके आश्रमपर आये । उस समय अप्सरा, मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और नाग – उनका सुयश गा रहे थे ॥२१-२२ ॥ उन तीनोंका एक ही साथ प्रादुर्भाव होनेसे अत्रि मुनिका अन्तःकरण प्रकाशित हो उठा । उन्होंने एक पैरसे खड़े - खड़े ही उन देवदेवोंको देखा और फिर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर प्रणाम करनेके अनन्तर अर्घ्य - पुष्पादि पूजनकी सामग्री हाथमें ले उनकी पूजा की । वे तीनों अपने - अपने वाहन - हंस, गरुड और बैलपर चढ़े हुए तथा अपने कमण्डलु, चक्र, त्रिशूलादि चिह्नोंसे सुशोभित थे ॥ २३-२४ ॥ उनकी आँखोंसे कृपाकी वर्षा हो रही थी । उनके मुखपर मन्द हास्यकी रेखा थी – जिससे उनकी प्रसन्नता झलक रही थी । उनके तेजसे चौंधियाकर मुनिवरने अपनी आँखें मूँद लीं ॥२५ ॥ वे चित्तको
उन्हींकी ओर लगाकर हाथ जोड़ अति मधुर और सुन्दर भावपूर्ण वचनोंमें लोकमें सबसे बड़े उन तीनों देवोंकी स्तुति करने लगे ॥२६ ॥
अत्रि मुनिने कहा- भगवन्! प्रत्येक कल्पके आरम्भमें जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके लिये जो मायाके सत्त्वादि तीनों गुणोंका विभाग करके भिन्न - भिन्न शरीर धारण करते हैं —वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आप ही हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ । कहिये — मैंने जिनको बुलाया था, आपमेंसे वे कौन महानुभाव हैं? ॥ २७ ॥
एको मह भगवान् विबुधप्रधान-श्चित्तीकृतः प्रजननाय कथं नु यूयम् अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूरा ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे ॥२८ मैत्रेय उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा त्रयस्ते विबुधर्षभाः ।
प्रत्याहुः श्लक्ष्णया वाचा प्रहस्य तमृषिं प्रभो ॥२९
देवा ऊचुः
यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा ।
सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम् ॥३०
अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुताः ।
भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यशः ॥३१
एवं कामवरं दत्त्वा प्रतिजग्मुः सुरेश्वराः ।
सभाजितास्तयोः सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्ततः ॥३२
सोमोऽभूद्ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् ।
दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥३३
श्रद्धा त्वङ्गिरसः पत्नी चतस्रोऽसूत कन्यकाः ।
सिनीवाली कुहू राका चतुर्थ्यनुमतिस्तथा ॥ ३४
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तत्पुत्रावपरावास्तां ख्यातौ स्वारोचिषेऽन्तरे ।
उतथ्यो भगवान् साक्षाद्ब्रह्मिष्ठश्च बृहस्पतिः ॥३५
पुलस्त्योऽजनयत्पत्न्यामगस्त्यं च हविर्भुवि ।
सोऽन्यजन्मनि दह्राग्निर्विश्रवाश्च महातपाः ॥ ३६
तस्य यक्षपतिर्देवः कुबेरस्त्विडविडासुतः ।
रावणः कुम्भकर्णश्च तथान्यस्यां विभीषणः ॥ ३७
क्योंकि मैंने तो सन्तानप्राप्तिकी इच्छासे केवल एक सुरेश्वर भगवान्का ही चिन्तन किया था । फिर आप तीनोंने यहाँ पधारनेकी कृपा कैसे की? आप लोगोंतक तो देहधारियोंके मनकी भी गति नहीं है, इसलिये मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है । आपलोग कृपा करके मुझे इसका रहस्य बतलाइये ॥२८ ॥
उनसे श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — समर्थ विदुरजी! अत्रि मुनिके वचन सुनकर वे तीनों देव हँसे और सुमधुर वाणीमें कहने लगे ॥२९ ॥
देवताओंने कहा — ब्रह्मन्! तुम सत्यसंकल्प हो । अतः तुमने जैसा संकल्प किया था, वही होना चाहिये । उससे विपरीत कैसे हो सकता था? तुम जिस ' जगदीश्वर ' का ध्यान करते थे, वह हम तीनों ही हैं || ३० || प्रिय महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे यहाँ हमारे ही अंशस्वरूप तीन जगद्विख्यात पुत्र उत्पन्न होंगे और तुम्हारे सुन्दर यशका विस्तार करेंगे ॥३१ ॥
उन्हें इस प्रकार अभीष्ट वर देकर तथा पति - पत्नी दोनोंसे भलीभाँति पूजित होकर उनके देखते - ही - देखते वे तीनों सुरेश्वर अपने - अपने लोकोंको चले गये || ३२ || ब्रह्माजीके अंशसे चन्द्रमा, विष्णुके अंशसे योगवेत्ता दत्तात्रेयजी और महादेवजीके अंशसे दुर्वासा ऋषि अत्रिके
पुत्ररूपमें प्रकट हुए । अब अंगिरा ऋषिकी सन्तानोंका वर्णन सुनो ॥३३ ॥
-अंगिराकी पत्नी श्रद्धाने सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति – इन चार कन्याओंको जन्म दिया ॥३४ ॥ इनके सिवा उनके साक्षात् भगवान् उतथ्यजी और ब्रह्मनिष्ठ बृहस्पतिजी
— ये दो पुत्र भी हुए, जो स्वारोचिष मन्वन्तरमें विख्यात हुए ॥ ३५ ॥ पुलस्त्यजीके उनकी
पत्नी हविर्भूसे महर्षि अगस्त्य और महातपस्वी विश्रवा - ये दो पुत्र हुए । इनमें अगस्त्यजी दूसरे जन्ममें जठराग्नि हुए || ३६ || विश्रवा मुनिके इडविडाके गर्भसे यक्षराज कुबेरका जन्म हुआ और उनकी दूसरी पत्नी केशिनीसे रावण, कुम्भकर्ण एवं विभीषण उत्पन्न हुए ॥३७ ॥
पुलहस्य गतिर्भार्या त्रीनसूत सती सुतान् ।
कर्मश्रेष्ठं वरीयांसं सहिष्णुं च महामते ॥३८
क्रतोरपि क्रिया भार्या वालखिल्यानसूयत ।
ऋषीन्षष्टिसहस्राणि ज्वलतो ब्रह्मतेजसा ॥३९
ऊर्जायां जज्ञिरे पुत्रा वसिष्ठस्य परंतप । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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चित्रकेतुप्रधानास्ते सप्त ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥४०
चित्रकेतुः सुरोचिश्च विरजा मित्र एव च ।
उल्बणो वसुभृद्यानो द्युमान् शक्त्यादयोऽपरे ॥४१
चित्तिस्त्वथर्वणः पत्नी लेभे पुत्रं धृतव्रतम् ।
दध्यञ्चमश्वशिरसं भृगोर्वंशं निबोध मे ॥४२
भृगुः ख्यात्यां महाभागः पत्न्यां पुत्रानजीजनत् ।
धातारं च विधातारं श्रियं च भगवत्पराम् ॥४३
आयतिं नियतिं चैव सुते मेरुस्तयोरदात् ।
ताभ्यां तयोरभवतां मृकण्डः प्राण एव च ॥४४
मार्कण्डेयो मृकण्डस्य प्राणाद्वेदशिरा मुनिः ।
कविश्च भार्गवो यस्य भगवानुशना सुतः ॥४५
त एते मुनयः क्षत्तर्लोकान् सर्गेरभावयन् ।
एष कर्दमदौहित्रसंतानः कथितस्तव ।
शृण्वतः श्रद्दधानस्य सद्यः पापहरः परः ॥४६
प्रसूतिं मानवीं दक्ष उपयेमे ह्यजात्मजः ।
तस्यां ससर्ज दुहितृः षोडशामललोचनाः ॥४७
त्रयोदशादाद्धर्माय तथैकामग्नये विभुः ।
पितृभ्य एकां युक्तेभ्यो भवायैकां भवच्छिदे ॥ ४८
श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिः क्रियोन्नतिः ।
बुद्धिर्मेधा तितिक्षा ह्रीर्मूर्तिर्धर्मस्य पत्नयः ॥ ४ ९
महामते! महर्षि पुलहकी स्त्री परम साध्वी गतिसे कर्म श्रेष्ठ, वरीयान् और सहिष्णु — ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए || ३८ || इसी प्रकार क्रतुकी पत्नी क्रियाने ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान बालखिल्यादि साठ हजार ऋषियोंको जन्म दिया ॥ ३ ९ ॥ शत्रुतापन विदुरजी! वसिष्ठजीकी पत्नी ऊर्जा ( अरुन्धती ) - से चित्रकेतु आदि सात विशुद्धचित्त ब्रह्मर्षियोंका जन्म हुआ || ४० || उनके नाम चित्रकेतु, सुरोचि, विरजा, मित्र, उल्बण, वसुभृद्यान और घुमान् थे । इनके सिवा उनकी दूसरी पत्नीसे शक्ति आदि और भी कई पुत्र हुए || ४१ ॥ अथर्वा मुनिकी पत्नी चित्तिने दध्यङ् ( दधीचि ) नामक एक तपोनिष्ठ पुत्र प्राप्त किया, जिसका दूसरा नाम अश्वशिरा भी था । अब भृगुके वंशका वर्णन सुनो ॥४२ ॥
महाभाग भृगुजीने अपनी भार्या ख्यातिसे धाता और विधाता नामक पुत्र तथा श्री नामकी एक भगवत्परायणा कन्या उत्पन्न की ॥४३ ॥ मेरुऋषिने अपनी आयति और नियति
नामकी कन्याएँ क्रमशः धाता और विधाताको ब्याहीं; उनसे उनके मृकण्ड और प्राण नामक ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पुत्र हुए ॥४४ ॥
उनमेंसे मृकण्डके मार्कण्डेय और प्राणके मुनिवर वेदशिराका जन्म हुआ । भृगुजीके एक कवि नामक पुत्र भी थे । उनके भगवान् उशना ( शुक्राचार्य ) हुए || ४५ ॥ विदुरजी! इन सब मुनीश्वरोंने भी सन्तान उत्पन्न करके सृष्टिका विस्तार किया । इस प्रकार मैंने तुम्हें यह कर्दमजीके दौहित्रोंकी सन्तानका वर्णन सुनाया । जो पुरुष इसे श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके पापों को यह तत्काल नष्ट कर देता है ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीके पुत्र दक्षप्रजापतिने मनुनन्दिनी प्रसूतिसे विवाह किया । उससे उन्होंने सुन्दर नेत्रोंवाली सोलह कन्याएँ उत्पन्न कीं ॥४७ ॥ भगवान् दक्षने उनमेंसे तेरह धर्मको, एक
अग्निको, एक समस्त पितृगणको और एक संसारका संहार करनेवाले तथा जन्म - मृत्युसे छुड़ानेवाले भगवान् शंकरको दी ॥४८ ॥ श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति,
बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति – ये धर्मकी पत्नियाँ हैं ॥ ४ ९ ॥
श्रद्धासूत शुभं मैत्री प्रसादमभयं दया ।
शान्तिः सुखं मुदं तुष्टिः स्मयं पुष्टिरसूयत ॥५०
योगं क्रियोन्नतिर्दर्पमर्थं बुद्धिरसूयत ।
मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ॥५१
मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्तिर्नरनारायणावृषी ॥ ५२
ययोर्जन्मन्यदो विश्वमभ्यनन्दत्सुनिर्वृतम् ।
मनांसि ककुभो वाताः प्रसेदुः सरितोऽद्रयः ॥५३
दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतुः कुसुमवृष्टयः ।
मुनयस्तुष्टुवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥५४
नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत्परममङ्गलम् ।
देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥५५
देवा ऊचुः यो मायया विरचितं निजयाऽऽत्मनीदं खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय । एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥५६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान् सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः । दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम् ॥५७
एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्टुतौ ।
लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम् ॥५८
इनमेंसे श्रद्धाने शुभ, मैत्रीने प्रसाद, दयाने अभय, शान्तिने सुख, तुष्टिने मोद और पुष्टिने अहंकारको जन्म दिया ॥ ५० ॥ क्रियाने योग, उन्नतिने दर्प, बुद्धिने अर्थ, मेधाने स्मृति,
तितिक्षाने क्षेम और ह्री ( लज्जा ) - ने प्रश्रय ( विनय ) नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ५१ ॥ समस्त
गुणोंकी खान मूर्तिदेवीने नर - नारायण ऋषियोंको जन्म दिया ॥ ५२ ॥ इनका जन्म होनेपर इस
सम्पूर्ण विश्वने आनन्दित होकर प्रसन्नता प्रकट की । उस समय लोगोंके मन, दिशाएँ, वायु, नदी और पर्वत — सभीमें प्रसन्नता छा गयी ॥५३ ॥ आकाशमें मांगलिक बाजे बजने लगे,
देवतालोग फूलोंकी वर्षा करने लगे, मुनि प्रसन्न होकर स्तुति करने लगे, गन्धर्व और किन्नर गाने लगे ॥५४ ॥ अप्सराएँ नाचने लगीं । इस प्रकार उस समय बड़ा ही आनन्द - मंगल हुआ
तथा ब्रह्मादि समस्त देवता स्तोत्रोंद्वारा भगवान्की स्तुति करने लगे ॥ ५५ ॥
देवताओंने कहा — जिस प्रकार आकाशमें तरह - तरहके रूपोंकी कल्पना कर ली जाती है — उसी प्रकार जिन्होंने अपनी मायाके द्वारा अपने ही स्वरूपके अन्दर इस संसारकी रचना की है और अपने उस स्वरूपको प्रकाशित करनेके लिये इस समय इस ऋषि - विग्रहके साथ धर्मके घरमें अपने - आपको प्रकट किया है, उन परम पुरुषको हमारा नमस्कार है ॥५६ ॥
जिनके तत्त्वका शास्त्रके आधारपर हमलोग केवल अनुमान ही करते हैं, प्रत्यक्ष नहीं कर पाते — उन्हीं भगवान्ने देवताओंको संसारकी मर्यादामें किसी प्रकारकी गड़बड़ी न हो, इसीलिये सत्त्वगुणसे उत्पन्न किया है । अब वे अपने करुणामय नेत्रोंसे — जो समस्त शोभा और सौन्दर्यके निवासस्थान निर्मल दिव्य कमलको भी नीचा दिखानेवाले हैं - हमारी ओर निहारें ॥५७ ॥
प्यारे विदुरजी! प्रभुका साक्षात् दर्शन पाकर देवताओंने उनकी इस प्रकार स्तुति और पूजा की । तदनन्तर भगवान् नर - नारायण दोनों गन्धमादन पर्वतपर चले गये ॥५८ ॥
ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहागतौ भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥५९
स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत् ।
पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम् ॥ ६०
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तेभ्योऽग्नयः समभवन् चत्वारिंशच्च पञ्च च ।
त एवैकोनपञ्चाशत्साकं पितृपितामहैः ॥६१
वैतानिके कर्मणि यन्नामभिर्ब्रह्मवादिभिः ।
आग्नेय्य इष्टयो यज्ञे निरूप्यन्तेऽग्नयस्तु ते ॥६२
अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोम्याः पितर आज्यपाः ।
साग्नयोऽनग्नयस्तेषां पत्नी दाक्षायणी स्वधा ॥६३
तेभ्यो दधार कन्ये द्वे वयुनां धारिणीं स्वधा ।
उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ ज्ञानविज्ञानपारगे ॥६४
भवस्य पत्नी तु सती भवं देवमनुव्रता ।
आत्मनः सदृशं पुत्रं न लेभे गुणशीलतः ॥६५
पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।
अप्रौढैवात्मनाऽऽत्मानमजहाद्योगसंयुता ॥६६
भगवान् श्रीहरिके अंशभूत वे नर - नारायण ही इस समय पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यदुकुलभूषण श्रीकृष्ण और उन्हींके सरीखे श्यामवर्ण, कुरुकुलतिलक अर्जुनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥५९ ॥
अग्निदेवकी पत्नी स्वाहाने अग्निके ही अभिमानी पावक, पवमान और शुचि - ये तीन पुत्र उत्पन्न किये । ये तीनों ही हवन किये हुए पदार्थोंका भक्षण करनेवाले हैं ॥ ६० ॥ इन्हीं
तीनोंसे पैंतालीस प्रकारके अग्नि और उत्पन्न हुए । ये ही अपने तीन पिता और एक पितामहको साथ लेकर उनचास अग्नि कहलाये ॥६१ ॥ वेदज्ञ ब्राह्मण वैदिक यज्ञकर्ममें जिन
उनचास अग्नियोंके नामोंसे आग्नेयी इष्टियाँ करते हैं, वे ये ही हैं ॥६२ ॥
अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमप और आज्यप - ये पितर हैं; इनमें साग्निक भी हैं और निरग्निक भी । इन सब पितरोंकी पत्नी दक्षकुमारी स्वधा हैं ॥ ६३ ॥ इन पितरोंसे स्वधाके
धारिणी और वयुना नामकी दो कन्याएँ हुईं । वे दोनों ही ज्ञान - विज्ञानमें पारंगत और ब्रह्मज्ञानका उपदेश करनेवाली हुईं || ६४ || महादेवजीकी पत्नी सती थीं, वे सब प्रकारसे अपने पतिदेवकी सेवामें संलग्न रहनेवाली थीं । किन्तु उनके अपने गुण और शीलके अनुरूप कोई पुत्र नहीं हुआ ॥६५ ॥ क्योंकि सतीके पिता दक्षने बिना ही किसी अपराधके भगवान्
शिवजीके प्रतिकूल आचरण किया था, इसलिये सतीने युवावस्थामें ही क्रोधवश योगके द्वारा स्वयं ही अपने शरीरका त्याग कर दिया था ॥ ६६ ॥
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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे विदुरमैत्रेयसंवादे प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥
१. प्रा ० पा ० – सुव्रताः । * ' पुत्रिकाधर्म ' के अनुसार किये जानेवाले विवाहमें यह शर्त होती है कि कन्याके जो पहला पुत्र होगा, उसे कन्याके पिता ले लेंगे । -१. प्रा ० पा ० — यद ० । २. प्रा ० पा ० - क्ताः क्षत्तर्ब्रह्म ० । ३. प्रा ० पा ० – यज्ञं च । ४. प्रा ० पा ० — चो ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ द्वितीयोऽध्यायः भगवान् शिव और दक्ष प्रजापतिका मनोमालिन्य विदुर उवाच
भवे शीलवतां श्रेष्ठे दक्षो दुहितृवत्सलः ।
विद्वेषमकरोत्कस्मादनादृत्यात्मजां सतीम् ॥ १
विदुरजीने पूछा — ब्रह्मन्! प्रजापति दक्ष तो अपनी लड़कियोंसे बहुत ही स्नेह रखते थे, फिर उन्होंने अपनी कन्या सतीका अनादर करके शीलवानोंमें सबसे श्रेष्ठ श्रीमहादेवजीसे द्वेष क्यों किया? ॥१ ॥
कस्तं चराचरगुरुं निर्वैरं शान्तविग्रहम् ।
आत्मारामं कथं द्वेष्टि जगतो दैवतं महत् ॥२
एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् जामातुः श्वशुरस्य च ।
विद्वेषस्तु यतः प्राणांस्तत्यजे दुस्त्यजान्सती ॥ ३
मैत्रेय उवाच
पुरा विश्वसृजां सत्रे समेताः परमर्षयः ।
तथामरगणाः सर्वे सानुगा मुनयोऽग्नयः ॥४
तत्र प्रविष्टमृषयो दृष्ट्वार्कमिव रोचिषा ।
भ्राजमानं वितिमिरं कुर्वन्तं तन्महत्सदः ॥५
उदतिष्ठन् सदस्यास्ते स्वधिष्ण्येभ्यः सहाग्नयः ।
ऋते विरिञ्चं शर्वं च तद्भासाऽऽक्षिप्तचेतसः ॥६
सदसस्पतिभिर्दक्षो भगवान् साधु सत्कृतः ।
अजं लोकगुरुं नत्वा निषसाद तदाज्ञया ॥७
प्रानिषण्णं मृडं दृष्ट्वा नामृष्यत्तदनादृतः ।
उवाच वामं चक्षुर्भ्यामभिवीक्ष्य दहन्निव ॥८
श्रूयतां ब्रह्मर्षयो मे सहदेवाः सहाग्नयः ।
साधूनां ब्रुवतो वृत्तं नाज्ञानान्न च मत्सरात् ॥९
अयं तु लोकपालानां यशोघ्नो निरपत्रपः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******