श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 71–80
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
पृष्ठ 71
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गीताप्रेस, गोरखपुर
पृष्ठ 72
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बालक ध्रुवपर भगवान्का अनुग्रह The grace of Lord descends on Dhruva
पृष्ठ 73
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पृष्ठ 74
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवधा भक्ति श्रवण कीर्तन स्मरण पादसेवन गीताप्रेस, गोरखपुर अर्चन आत्मनिवेदन सख्य ' दास्य वन्दन B.K.Mitra
पृष्ठ 75
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भक्तिके नौ प्रकार Ninefold devotion
पृष्ठ 76
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पृष्ठ 77
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गीताप्रेस, गोरखपुर
पृष्ठ 78
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भगवान् विष्णु वामन - रूपमें Lord VisIu as a Dwarf
पृष्ठ 79
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम्
कृष्णं नारायणं वन्दे कृष्णं वन्दे व्रजप्रियम् ।
कृष्णं द्वैपायनं वन्दे कृष्णं वन्दे पृथासुतम् ॥
अथ प्रथमोऽध्यायः देवर्षि नारदकी भक्तिसे भेंट
सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे ।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः ॥१
यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥२
नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम् ।
कथामृतरसास्वादकुशलः शौनकोऽब्रवीत् ॥ ३
शौनक उवाच
अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ ।
सूताख्याहि कथासारं मम कर्णरसायनम् ॥४
भक्तिज्ञानविरागाप्तो विवेको वर्धते महान् ।
मायामोहनिरासश्च वैष्णवैः क्रियते कथम् ॥५
इह घोरे कलौ प्रायो जीवश्चासुरतां गतः ।
क्लेशाक्रान्तस्य तस्यैव शोधने किं परायणम् ॥६
सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको हम नमस्कार करते हैं, जो जगत्की उत्प
पृष्ठ 80
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्थिति और विनाशके हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक — तीनों प्रकारके तापों का नाश करनेवाले हैं ॥ १ ॥
जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था तथा लौकिक - वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, तभी उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके लिये घरसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे- ' बेटा! बेटा! तुम कहाँ जा रहे हो? ' उस समय वृक्षोंने तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे उत्तर दिया था । ऐसे सर्वभूत - हृदयस्वरूप श्रीशुकदेवमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ॥२ ॥
एक बार भगवत्कथामृतका रसास्वादन करनेमें कुशल मुनिवर शौनकजीने नैमिषारण्य क्षेत्रमें विराजमान महामति सूतजीको नमस्कार करके उनसे पूछा ॥३ ॥
शौनकजी बोले – सूतजी! आपका ज्ञान अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेके लिये करोड़ों सूर्योंके समान है । आप हमारे कानोंके लिये रसायन - अमृत - स्वरूप सारगर्भित कथा कहिये ॥४ ॥ भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले महान् विवेककी वृद्धि किस प्रकार
होती है तथा वैष्णवलोग किस तरह इस माया - मोहसे अपना पीछा छुड़ाते हैं? ॥५ ॥ इस घोर
कलि - कालमें जीव प्रायः आसुरी स्वभावके हो गये हैं, विविध क्लेशोंसे आक्रान्त इन जीवोंको शुद्ध ( दैवीशक्तिसम्पन्न ) बनानेका सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है? ॥६ ॥
श्रेयसां यद्भवेच्छ्रेयः पावनानां च पावनम् ।
कृष्णप्राप्तिकरं शश्वत्साधनं तद्वदाधुना ॥७
चिन्तामणिर्लोकसुखं सुरद्रुः स्वर्गसम्पदम् ।
प्रयच्छति गुरुः प्रीतो वैकुण्ठं योगिदुर्लभम् ॥८
सूत उवाच
प्रीतिः शौनक चित्ते ते ह्यतो वच्मि विचार्य च ।
सर्वसिद्धान्तनिष्पन्नं संसारभयनाशनम् ॥९
भक्त्योघवर्धनं यच्च कृष्णसंतोषहेतुकम् ।
तदहं तेऽभिधास्यामि सावधानतया शृणु ॥१०
कालव्यालमुखग्रासत्रासनिर्णाशहेतवे ।
श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कीरेण भाषितम् ॥ ११
एतस्मादपरं किंचिन्मनः शुद्ध्यै न विद्यते ।
जन्मान्तरे भवेत्पुण्यं तदा भागवतं लभेत् ॥ १२