श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 811–820

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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हैं ॥२ ॥ तत्त्वदर्शी मुनियोंने इस लोक और परलोकमें मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये कृषि,

अग्निहोत्र आदि बहुत - से उपाय निकाले और काममें लिये हैं || ३ || उन प्राचीन ऋषियोंके बताये हुए उपायोंका इस समय भी जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भलीभाँति आचरण करता है, वह सुगमतासे अभीष्ट फल प्राप्त कर लेता है || ४ || परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायोंका आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार - बार निष्फल होते रहते हैं ॥५ || राजन्! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिन धान्य आदिको उत्पन्न किया था, मैंने देखा कि यम - नियमादि व्रतोंका पालन न करनेवाले दुराचारीलोग ही उन्हें खाये जा रहे हैं ॥६ ॥ लोकरक्षक! आप राजालोगोंने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया;

इसलिये सब लोग चोरोंके समान हो गये हैं । इसीसे यज्ञके लिये ओषधियोंको मैंने अपनेमें छिपा लिया ॥७ ॥ अब अधिक समय हो जानेसे अवश्य ही वे धान्य मेरे उदरमें जीर्ण हो गये

हैं; आप उन्हें पूर्वाचार्योंके बतलाये हुए उपायसे निकाल लीजिये ॥८ ॥ लोकपालक वीर! यदि

आपको समस्त प्राणियोंके अभीष्ट एवं बलकी वृद्धि करनेवाले अन्नकी आवश्यकता है तो आप मेरे योग्य बछड़ा, दोहनपात्र और दुहनेवालेकी व्यवस्था कीजिये; मैं उस बछड़ेके स्नेहसे पिन्हाकर दूधके रूपमें आपको सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे दूँगी ॥९ -१० ॥

समां च कुरु मां राजन्देववृष्टं यथा पयः ।

अपर्तावपि भद्रं ते उपावर्तेत मे विभो ॥११

इति प्रियं हितं वाक्यं भुव आदाय भूपतिः ।

वत्सं कृत्वा मनुं पाणावदुहत्सकलौषधीः ॥ १२

तथा परे च सर्वत्र सारमाददते बुधाः ।

ततोऽन्ये ' च यथाकामं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥१३

ऋषयो दुदुहुर्देवीमिन्द्रियेष्वथ सत्तम ।

वत्सं बृहस्पतिं कृत्वा पयश्छन्दोमयं शुचि ॥१४

कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् ।

हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥ १५

दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् ।

विधायादूदुहन् क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥१६

गन्धर्वाप्सरसोऽधुक्षन् पात्रे पद्ममये पयः ।

वत्सं विश्वावसुं कृत्वा गान्धर्वं मधु सौभगम् ॥१७

वत्सेन पितरोऽर्यम्णा कव्यं क्षीरमधुक्षत ।

आमपात्रे महाभागाः श्रद्धया श्राद्धदेवताः ॥१८

प्रकल्प्य वत्सं कपिलं सिद्धाः सङ्कल्पनामयीम् ।

सिद्धिं नभसि विद्यां च ये च विद्याधरादयः ॥१९

पृष्ठ 812

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अन्ये च मायिनो मायामन्तर्धानाद्भुतात्मनाम् ।

मयं प्रकल्प्य वत्सं ते दुदुहुर्धारणामयीम् ॥२०

यक्षरक्षांसि भूतानि पिशाचाः पिशिताशनाः ।

भूतेशवत्सा दुदुहुः कपाले क्षतजासवम् ॥२१

राजन्! एक बात और है; आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा ऋतु : जानेपर भी मेरे ऊपर इन्द्रका बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे - मेरे भीतरकी आर्द्रता सूखने न पावे । यह आपके लिये बहुत मंगलकारक होगा ' ॥११ ॥

पृथ्वीके कहे हुए ये प्रिय और हितकारी वचन स्वीकार कर महाराज पृथुने स्वायम्भुव मनुको बछड़ा बना अपने हाथमें ही समस्त धान्योंको दुह लिया ॥ १२ ॥ पृथुके समान अन्य

विज्ञजन भी सब जगहसे सार ग्रहण कर लेते हैं, अतः उन्होंने भी पृथुजीके द्वारा वशमें की हुई वसुन्धरासे अपनी - अपनी अभीष्ट वस्तुएँ दुह लीं || १३ || ऋषियोंने बृहस्पतिजीको बछड़ा बनाकर इन्द्रिय ( वाणी, मन और श्रोत्र ) रूप पात्रमें पृथ्वीदेवीसे वेदरूप पवित्र दूध दुहा ॥१४ ॥ देवताओंने इन्द्रको बछड़ेके रूपमें कल्पना कर सुवर्णमय पात्रमें अमृत, वीर्य

( मनोबल ), ओज ( इन्द्रियबल ) और शारीरिक बलरूप दूध दुहा ॥१५ ॥ दैत्य और दानवोंने

असुरश्रेष्ठ प्रह्लादजीको वत्स बनाकर लोहेके पात्रमें मदिरा और आसव ( ताड़ी आदि ) रूप दूध दुहा ॥१६ ॥ गन्धर्व और अप्सराओंने विश्वावसुको बछड़ा बनाकर कमलरूप पात्रमें

संगीतमाधुर्य और सौन्दर्यरूप दूध दुहा ॥१७ ॥ श्राद्धके अधिष्ठाता महाभाग पितृगणने अर्यमा

नामके पित्रीश्वरको वत्स बनाया तथा मिट्टीके कच्चे पात्रमें श्रद्धापूर्वक कव्य ( पितरोंको अर्पित किया जानेवाला अन्न ) रूप दूध दुहा || १८ || फिर कपिलदेवजीको बछड़ा बनाकर आकाशरूप पात्रमें सिद्धोंने अणिमादि अष्टसिद्धि तथा विद्याधरोंने आकाशगमन आदि विद्याओंको दुहा ॥१९ ॥ किम्पुरुषादि अन्य मायावियोंने मयदानवको बछड़ा बनाया तथा

अन्तर्धान होना, विचित्र रूप धारण कर लेना आदि संकल्पमयी मायाओंको दुग्धरूपसे दुहा ॥२० ॥

इसी प्रकार यक्ष - राक्षस तथा भूत - पिशाचादि मांसाहारियोंने भूतनाथ रुद्रको बछड़ा बनाकर कपालरूप पात्रमें रुधिरासवरूप दूध दुहा ॥ २१ ॥

तथाहयो दन्दशूकाः सर्पा नागाश्च तक्षकम् ।

विधाय वत्सं दुदुहुर्बिलपात्रे विषं पयः ॥२२

पशवो यवसं क्षीरं वत्सं कृत्वा च गोवृषम् ।

अरण्यपात्रे चाधुक्षन्मृगेन्द्रेण च दंष्ट्रिणः ॥२३

क्रव्यादाः प्राणिनः क्रव्यं दुदुहुः स्वे ' कलेवरे ।

सुपर्णवत्सा विहगाश्चरं चाचरमेव च ॥२४

पृष्ठ 813

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वटवत्सा वनस्पतयः पृथग्रसमयं पयः गिरयो हिमवद्वत्सा नानाधातून् स्वसानुषु ॥२५

सर्वे स्वमुख्यवत्सेन स्वे स्वे पात्रे पृथक् पयः ।

सर्वकामदुघां पृथ्वीं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥२६

एवं पृथ्वादयः पृथ्वीमन्नादाः स्वन्नमात्मनः ।

दोहवत्सादिभेदेन क्षीरभेदं कुरूद्वह ॥२७

ततो महीपतिः प्रीतः सर्वकामदुघां पृथुः ।

दुहितृत्वे चकारेमां प्रेम्णा दुहितृवत्सलः ॥२८

चूर्णयन् स्वधनुष्कोट्या गिरिकूटानि राजराट् ।

भूमण्डलमिदं वैन्यः प्रायश्चक्रे समं विभुः ॥२९

अथास्मिन् भगवान् वैन्यः प्रजानां वृत्तिदः पिता ।

निवासान् कल्पयांचक्रे तत्र तत्र यथार्हतः ॥ ३०

ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च ।

घोषान् व्रजान् सशिविरानाकरान् खेटखर्वटान् ॥३१

बिना फनवाले साँप, फनवाले साँप, नाग और बिच्छू आदि विषैले जन्तुओंने तक्षकको बछड़ा बनाकर मुखरूप पात्रमें विषरूप दूध दुहा || २२ || पशुओंने भगवान् रुद्रके वाहन बैलको वत्स बनाकर वनरूप पात्रमें तृणरूप दूध दुहा । बड़ी - बड़ी दाढ़ोंवाले मांसभक्षी जीवोंने सिंहरूप बछड़ेके द्वारा अपने शरीररूप पात्रमें कच्चा मांसरूप दूध दुहा तथा गरुडजीको वत्स बनाकर पक्षियोंने कीट - पतंगादि चर और फलादि अचर पदार्थोंको दुग्धरूपसे दुहा ॥२३-२४ ॥ वृक्षोंने वटको वत्स बनाकर अनेक प्रकारका रसरूप दूध दुहा और पर्वतोंने हिमालयरूप बछड़ेके द्वारा अपने शिखररूप पात्रोंमें अनेक प्रकारकी धातुओंको दुहा ॥२५ ॥ पृथ्वी तो सभी अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली है और इस समय वह पृथुजीके

अधीन थी । अतः उससे सभीने अपनी - अपनी जातिके मुखियाको बछड़ा बनाकर अलग-अलग पात्रोंमें भिन्न - भिन्न प्रकारके पदार्थोंको दूधके रूपमें दुह लिया || २६ || कुरुश्रेष्ठ विदुरजी! इस प्रकार पृथु आदि सभी अन्न- भोजियोंने भिन्न - भिन्न दोहन - पात्र और वत्सोंके द्वारा अपने - अपने विभिन्न अन्नरूप दूध पृथ्वीसे दुहे ॥ २७ ॥ इससे महाराज पृथु

ऐसे प्रसन्न हुए कि सर्वकामदुहा पृथ्वीके प्रति उनका पुत्रीके समान स्नेह हो गया और उसे उन्होंने अपनी कन्याके रूपमें स्वीकार कर लिया || २८ || फिर राजाधिराज पृथुने अपने

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धनुषकी नोकसे पर्वतोंको फोड़कर इस सारे भूमण्डलको प्रायः समतल कर दिया ॥२९ ॥ वे

पिताके समान अपनी प्रजाके पालन - पोषणकी व्यवस्थामें लगे हुए थे । उन्होंने इस समतल भूमिमें प्रजावर्गके लिये जहाँ - तहाँ यथायोग्य निवासस्थानोंका विभाग किया || ३० ॥ अनेकों गाँव, कस्बे, नगर, दुर्ग, अहीरोंकी बस्ती, पशुओंके रहनेके स्थान, छावनियाँ, खानें, किसानोंके गाँव और पहाड़ोंकी तलहटीके गाँव बसाये ॥३१ ॥

प्राक्पृथोरिह नैवैषा पुरग्रामादिकल्पना ।

यथासुखं वसन्ति स्म तत्र तत्राकुतोभयाः ॥३२

महाराज पृथुसे पहले इस पृथ्वीतलपर पुर - ग्रामादिका विभाग नहीं था; सब लोग अपने-अपने सुभीतेके अनुसार बेखटके जहाँ - तहाँ बस जाते थे ॥३२ ॥

इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुविजयेऽष्टादशोऽध्यायः ॥१८ ॥

१. प्रा ० पा ० – क्रोधं । २. प्रा ० पा ० - अथवा । ३. प्रा ० पा ० - प्रारब्धा ० । ४. प्रा ० पा०— दृष्टेन योगेन । १. प्रा ० पा ० — ततः सर्वे । २. प्रा ० पा ० – गन्धं । ३. प्रा ० पा ० — ससौभगम् । १. प्रा ० पा ० — स्वकले ० । २. प्रा ० पा ० - चूर्णयंश्च धनु ० ।

पृष्ठ 815

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अथैकोनविंशोऽध्यायः महाराज पृथुके सौ अश्वमेध यज्ञ मैत्रेय उवाच

अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः ।

ब्रह्मावर्ते मनोः क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती ॥१

तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मनः ।

शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥२

यत्र यज्ञपतिः साक्षाद्भगवान् हरिरीश्वरः ।

अन्वभूयत सर्वात्मा सर्वलोकगुरुः प्रभुः ॥३

अन्वितो ब्रह्मशर्वाभ्यां लोकपालैः सहानुगैः ।

उपगीयमानो गन्धर्वैर्मुनिभिश्चाप्सरोगणैः ॥४

सिद्धा विद्याधरा दैत्या दानवा गुह्यकादयः ।

सुनन्दनन्दप्रमुखाः पार्षदप्रवरा हरेः ॥५

कपिलो नारदो दत्तो योगेशाः सनकादयः ।

तमन्वीयुर्भागवता ये च तत्सेवनोत्सुकाः ॥६

यत्र धर्मदुघा भूमिः सर्वकामदुघा सती ।

दोग्धि स्माभीप्सितानर्थान् यजमानस्य भारत ॥७

ऊहुः सर्वरसान्नद्यः क्षीरदध्यन्नगोरसान् ।

तरवो भूरिवर्ष्माणः प्रासूयन्त मधुच्युतः ॥८

सिन्धवो रत्ननिकरान् गिरयोऽन्नं चतुर्विधम् ।

उपायनमुपाजहुः सर्वे लोकाः सपालकाः ॥९

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं - विदुरजी! महाराज मनुके ब्रह्मावर्त क्षेत्रमें, जहाँ सरस्वती नदी पूर्वमुखी होकर बहती है, राजा पृथुने सौ अश्वमेध यज्ञोंकी दीक्षा ली ॥१ ॥ यह देखकर

भगवान् इन्द्रको विचार हुआ कि इस प्रकार तो पृथुके कर्म मेरे कर्मोंकी अपेक्षा भी बढ़ जायँगे । इसलिये वे उनके यज्ञमहोत्सवको सहन न कर सके ॥ २ ॥ महाराज पृथुके यज्ञमें

सबके अन्तरात्मा सर्वलोकपूज्य जगदीश्वर भगवान् हरिने यज्ञेश्वररूपसे साक्षात् दर्शन दिया था ॥३ ॥ उनके साथ ब्रह्मा, रुद्र तथा अपने - अपने अनुचरोंके सहित लोकपालगण भी पधारे

थे । उस समय गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ प्रभुकी कीर्ति गा रहे थे ॥४ ॥ सिद्ध, विद्याधर,

पृष्ठ 816

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दैत्य, दानव, यक्ष, सुनन्द - नन्दादि भगवान्‌ के प्रमुख पार्षद और जो सर्वदा भगवान्की सेवाके लिये उत्सुक रहते हैं - वे कपिल, नारद, दत्तात्रेय एवं सनकादि योगेश्वर भी उनके साथ आये थे ॥५-६ ॥ भारत! उस यज्ञमें यज्ञसामग्रियोंको देनेवाली भूमिने कामधेनुरूप होकर यजमानकी सारी कामनाओंको पूर्ण किया था || ७ || नदियाँ दाख और ईख आदि सब प्रकारके रसोंको बहा लाती थीं तथा जिनसे मधु चूता रहता था - ऐसे बड़े - बड़े वृक्ष दूध, दही, अन्न और घृत आदि तरह - तरहकी सामग्रियाँ समर्पण करते थे || ८ || समुद्र बहुत - सी रत्नराशियाँ, पर्वत भक्ष्य, भोज्य, चोष्य और लेह्य - चार प्रकारके अन्न तथा लोकपालोंके सहित सम्पूर्ण लोक तरह - तरहके उपहार उन्हें समर्पण करते थे ॥९ ॥

इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम् ।

असूयन् भगवानिन्द्रः प्रतिघातमचीकरत् ॥१०

चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् ।

वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहितः ॥ ११

तमत्रिर्भगवानैक्षत्त्वरमाणं विहायसा ।

आमुक्तमिव पाखण्डं योऽधर्मे धर्मविभ्रमः ॥१२

अत्रिणा चोदितो ' हन्तुं पृथुपुत्रो महारथः ।

अन्वधावत संक्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥१३

तं तादृशाकृतिं वीक्ष्य मेने धर्मं शरीरिणम् ।

जटिलं भस्मनाच्छन्नं तस्मै बाणं न मुंचति ॥१४

वधान्निवृत्तं तं भूयो हन्तवेऽत्रिरचोदयत् ।

जहि यज्ञहनं तात महेन्द्रं विबुधाधमम् ॥१५

एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा ।

अन्वद्रवदभिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव ॥१६

सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट् ।

वीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान् ॥१७

तत्तस्य चाद्भुतं कर्म विचक्ष्य परमर्षयः ।

नामधेयं ददुस्तस्मै विजिताश्व इति प्रभो ॥१८

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महाराज पृथु तो एकमात्र श्रीहरिको ही अपना प्रभु मानते थे । उनकी कृपासे उस यज्ञानुष्ठानमें उनका बड़ा उत्कर्ष हुआ । किन्तु यह बात देवराज इन्द्रको सहन न हुई और उन्होंने उसमें विघ्न डालनेकी भी चेष्टा की ॥ १० ॥ जिस समय महाराज पृथु अन्तिम यज्ञद्वारा

भगवान् यज्ञपतिकी आराधना कर रहे थे, इन्द्रने ईर्ष्यावश गुप्तरूपसे उनके यज्ञका घोड़ा हर लिया ॥११ ॥ इन्द्रने अपनी रक्षाके लिये कवचरूपसे पाखण्डवेष धारण कर लिया था, जो

अधर्ममें धर्मका भ्रम उत्पन्न करनेवाला है - जिसका आश्रय लेकर पापी पुरुष भी धर्मात्मा - सा जान पड़ता है । इस वेषमें वे घोड़ेको लिये बड़ी शीघ्रतासे आकाशमार्गसे जा रहे थे कि उनपर भगवान् अत्रिकी दृष्टि पड़ गयी । उनके कहनेसे महाराज पृथुका महारथी पुत्र इन्द्रको मारनेके लिये उनके पीछे दौड़ा और बड़े क्रोधसे बोला, ' अरे खड़ा रह! खड़ा रह् ' ॥१२-१३ ॥ इन्द्र सिरपर जटाजूट और शरीरमें भस्म धारण किये हुए थे । उनका ऐसा वेष देखकर पृथुकुमारने उन्हें मूर्तिमान् धर्म समझा, इसलिये उनपर बाण नहीं छोड़ा ॥१४ ॥ जब वह इन्द्रपर वार किये

बिना ही लौट आया, तब महर्षि अत्रिने पुनः उसे इन्द्रको मारनेके लिये आज्ञा दी — ' वत्स! इस देवताधम इन्द्रने तुम्हारे यज्ञमें विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो ' ॥१५ ॥

अत्रि मुनिके इस प्रकार उत्साहित करनेपर पृथुकुमार क्रोधमें भर गया । इन्द्र बड़ी तेजीसे आकाशमें जा रहे थे । उनके पीछे वह इस प्रकार दौड़ा, जैसे रावणके पीछे जटायु || १६ || स्वर्गपति इन्द्र उसे पीछे आते देख, उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये और वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया ॥१७ ॥ शक्तिशाली विदुरजी!

उसके इस अद्भुत पराक्रमको देखकर महर्षियोंने उसका नाम विजिताश्व रखा ॥१८ ॥

उपसृज्य तमस्तीव्रं जहाराश्वं पुनर्हरिः ।

चषालयूपतश्छन्नो हिरण्यरशनं विभुः ॥१९

अत्रिः सन्दर्शयामास त्वरमाणं विहायसा ।

कपालखट्वांगधरं वीरो नैनमबाधत ॥२०

अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा ।

सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् ॥२१

वीरश्चाश्वमुपादाय पितृयज्ञमथाव्रजत् ।

तदवद्यं हरे रूपं जगृहुर्ज्ञानदुर्बलाः ॥२२

यानि रूपाणि जगृहे इन्द्रो हयजिहीर्षया ।

तानि पापस्य खण्डानि लिंगं खण्डमिहोच्यते ॥२३

एवमिन्द्रे हरत्यश्वं वैन्ययज्ञजिघांसया ।

तद्गृहीतविसृष्टेषु पाखण्डेषु मतिर्नृणाम् ॥२४

धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु ।

प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ २५

तदभिज्ञाय भगवान् पृथुः पृथुपराक्रमः ।

पृष्ठ 818

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इन्द्राय कुपितो बाणमादत्तोद्यतकार्मुकः ॥२६ तमृत्विजः शक्रवधाभिसन्धितं विचक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमसह्यरंहसम् । निवारयामासुरहो महामते न युज्यतेऽत्रान्यवधः प्रचोदितात् ॥२७ यज्ञपशुको चषाल और यूपमें बाँध दिया गया था । शक्तिशाली इन्द्रने घोर अन्धकार फैला दिया और उसीमें छिपकर वे फिर उस घोड़ेको उसकी सोनेकी जंजीर समेत ले गये ॥१९ ॥ अत्रि मुनिने फिर उन्हें आकाशमें तेजीसे जाते दिखा दिया, किन्तु उनके पास

कपाल और खट्वांग देखकर पृथुपुत्रने उनके मार्गमें कोई बाधा न डाली ॥२० ॥ तब अत्रिने

राजकुमारको फिर उकसाया और उसने गुस्सेमें भरकर इन्द्रको लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया । यह देखते ही देवराज उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥२१ ॥

वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया । तबसे इन्द्रके उस निन्दित वेषको मन्दबुद्धि पुरुषोंने ग्रहण कर लिया ॥ २२ ॥ इन्द्रने अश्वहरणकी इच्छासे जो - जो रूप

धारण किये थे, वे पापके खण्ड होनेके कारण पाखण्ड कहलाये । यहाँ ' खण्ड ' शब्द चिह्नका वाचक है ॥२३ ॥ इस प्रकार पृथुके यज्ञका विध्वंस करनेके लिये यज्ञपशुको चुराते समय

इन्द्रने जिन्हें कई बार ग्रहण करके त्यागा था, उन ' नग्न ', ' रक्ताम्बर ' तथा ' कापालिक ' आदि पाखण्डपूर्ण आचारोंमें मनुष्योंकी बुद्धि प्रायः मोहित हो जाती है; क्योंकि ये नास्तिकमत देखनेमें सुन्दर हैं और बड़ी - बड़ी युक्तियोंसे अपने पक्षका समर्थन करते हैं । वास्तवमें ये उपधर्ममात्र हैं । लोग भ्रमवश धर्म मानकर उनमें आसक्त हो जाते हैं ॥ २४-२५ ॥ इन्द्रकी इस कुचालका पता लगनेपर परम पराक्रमी महाराज पृथुको बड़ा क्रोध हुआ । उन्होंने अपना धनुष उठाकर उसपर बाण चढ़ाया ॥ २६ ॥ उस समय क्रोधावेशके कारण

उनकी ओर देखा नहीं जाता था । जब ऋत्विजोंने देखा कि असह्य पराक्रमी महाराज पृथु इन्द्रका वध करनेको तैयार हैं, तब उन्हें रोकते हुए कहा, ' राजन्! आप तो बड़े बुद्धिमान् हैं, यज्ञदीक्षा ले लेनेपर शास्त्रविहित यज्ञपशुको छोड़कर और किसीका वध करना उचित नहीं है ॥२७ ॥

वयं मरुत्वन्तमिहार्थनाशनं ह्वयामहे त्वच्छ्रवसा हतत्विषम् । अयातयामोपहवैरनन्तरं प्रसह्य राजन् जुहवाम तेऽहितम् ॥२८

इत्यामन्त्र्य क्रतुपतिं विदुरास्यर्त्विजो रुषा ।

स्रुग्घस्तांजुह्वतोऽभ्येत्य स्वयम्भूः प्रत्यषेधत ॥२९

न वध्यो भवतामिन्द्रो यद्यज्ञो भगवत्तनुः ।

पृष्ठ 819

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यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनवः सुराः ॥ ३०

तदिदं पश्यत महद्धर्मव्यतिकरं द्विजाः ।

इन्द्रेणानुष्ठितं राज्ञः कर्मैतद्विजिघांसता ॥३१

पृथुकीर्तेः पृथोर्भूयात्तर्ह्येकोनशतक्रतुः ।

अलं ते क्रतुभिः स्विष्टैर्यद्भवान्मोक्षधर्मवित् ॥ ३२

नैवात्मने महेन्द्राय रोषमाहर्तुमर्हसि ।

उभावपि हि भद्रं ते उत्तमश्लोकविग्रहौ ॥ ३३

मास्मिन्महाराज कृथाः स्म चिन्तां निशामयास्मद्वच आदृतात्मा । यद्ध्यायतो दैवहतं नु कर्तुं मनोऽतिरुष्टं विशते तमोऽन्धम् ॥३४

क्रतुर्विरमतामेष देवेषु दुरवग्रहः ।

धर्मव्यतिकरो यत्र पाखण्डैरिन्द्रनिर्मितैः ॥३५

एभिरिन्द्रोपसंसृष्टैः पाखण्डैर्हारिभिर्जनम् ।

ह्रियमाणं विचक्ष्वैनं यस्ते यज्ञध्रुगश्वमुट् ॥३६

इस यज्ञकार्यमें विघ्न डालनेवाला आपका शत्रु इन्द्र तो आपके सुयशसे ही ईर्ष्यावश निस्तेज हो रहा है । हम अमोघ आवाहन - मन्त्रोंद्वारा उसे यहीं बुला लेते हैं और बलात् अग्निमें हवन किये देते हैं ' ॥२८ ॥

विदुरजी! यजमानसे इस प्रकार सलाह करके उसके याजकोंने क्रोधपूर्वक इन्द्रका आवाहन किया । वे स्रुवाद्वारा आहुति डालना ही चाहते थे कि ब्रह्माजीने वहाँ आकर उन्हें रोक दिया ॥२९ ॥ वे बोले, ' याजको! तुम्हें इन्द्रका वध नहीं करना चाहिये, यह यज्ञसंज्ञक इन्द्र तो

भगवान्की ही मूर्ति है । तुम यज्ञद्वारा जिन देवताओंकी आराधना कर रहे हो, वे इन्द्रके ही तो अंग हैं और उसे तुम यज्ञद्वारा मारना चाहते हो ॥ ३० ॥ पृथुके इस यज्ञानुष्ठानमें विघ्न

डालनेके लिये इन्द्रने जो पाखण्ड फैलाया है, वह धर्मका उच्छेदन करनेवाला है । इस बातपर तुम ध्यान दो, अब उससे अधिक विरोध मत करो; नहीं तो वह और भी पाखण्ड मार्गोंका प्रचार करेगा ॥३१ ॥ अच्छा, परमयशस्वी महाराज पृथुके निन्यानबे ही यज्ञ रहने दो । ' फिर

राजर्षि पृथुसे कहा, ‘ राजन्! आप तो मोक्षधर्मके जाननेवाले हैं; अतः अब आपको इन यज्ञानुष्ठानोंकी आवश्यकता नहीं है ॥३२ ॥ आपका मंगल हो! आप और इन्द्र — दोनोंकी

पृष्ठ 820

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पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहरिके शरीर हैं; इसलिये अपने ही स्वरूपभूत इन्द्रके प्रति आपको क्रोध नहीं करना चाहिये || ३३ || आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ — इसके लिये आप चिन्ता न करें । हमारी बात आप आदरपूर्वक स्वीकार कीजिये । देखिये, जो मनुष्य विधाताके बिगाड़े हुए कामको बनानेका विचार करता है, उसका मन अत्यन्त क्रोधमें भरकर भयंकर मोहमें फँस जाता है ॥३४ ॥ बस, इस यज्ञको बंद कीजिये । इसीके कारण इन्द्रके

चलाये हुए पाखण्डोंसे धर्मका नाश हो रहा है; क्योंकि देवताओंमें बड़ा दुराग्रह होता है ॥३५ ॥ जरा देखिये तो, जो इन्द्र घोड़ेको चुराकर आपके यज्ञमें विघ्न डाल रहा था, उसीके

रचे हुए इन मनोहर पाखण्डोंकी ओर सारी जनता खिंचती चली जा रही है ॥३६ ॥

भवान् परित्रातुमिहावतीर्णो धर्मं जनानां समयानुरूपम् । वेनापचारादवलुप्तमद्य तद्देहो विष्णुकलासि वैन्य ॥३७ स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते सङ्कल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि । ऐन्द्री च मायामुपधर्ममातरं प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि ॥३८ मैत्रेय उवाच

इत्थं स लोकगुरुणा समादिष्टो विशाम्पतिः ।

तथा च कृत्वा वात्सल्यं मघोनापि च सन्दधे ॥३९

कृतावभृथस्नानाय पृथवे भूरिकर्मणे ।

वरान्ददुस्ते वरदा ये तद्बर्हिषि तर्पिताः ॥४०

विप्राः सत्याशिषस्तुष्टाः श्रद्धया लब्धदक्षिणाः ।

आशिषो युयुजुः क्षत्तरादिराजाय सत्कृताः ॥४१

त्वयाऽऽहूता महाबाहो सर्व एव समागताः ।

पूजिता दानमानाभ्यां पितृदेवर्षिमानवाः ॥४२

आप साक्षात् विष्णुके अंश हैं । वेनके दुराचारसे धर्म लुप्त हो रहा था, उस समयोचित धर्मकी रक्षाके लिये ही आपने उसके शरीरसे अवतार लिया है ॥ ३७ ॥ अतः प्रजापालक

पृथुजी! अपने इस अवतारका उद्देश्य विचारकर आप भृगु आदि विश्वरचयिता मुनीश्वरोंका संकल्प पूर्ण कीजिये । यह प्रचण्ड पाखण्ड - पथरूप इन्द्रकी माया अधर्मकी जननी है । आप इसे नष्ट कर डालिये ' ॥३८ ॥