श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1041–1050
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050
पृष्ठ 1041
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बड़ी बात है ॥४७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवोंके आश्रयस्थान हैं । यद्यपि वे सदा-सर्वदा सर्वत्र उपस्थित ही रहते हैं, फिर भी कहनेके लिये उन्होंने देवकीजीके गर्भसे जन्म
लिया है । यदुवंशी वीर पार्षदोंके रूपमें उनकी सेवा करते रहते हैं । उन्होंने अपने भुजबलसे अधर्मका अन्त कर दिया है । परीक्षित्! भगवान् स्वभावसे ही चराचर जगत्का दुःख मिटाते रहते हैं । उनका मन्द -मन्द मुसकानसे युक्त सुन्दर मुखारविन्द व्रजस्त्रियों और पुरस्त्रियोंके हृदयमें प्रेम - भावका संचार करता रहता है । वास्तवमें सारे जगत्पर वही विजयी हैं । उन्हींकी जय हो! जय हो!! ॥४८ ॥
कृष्णस्यैतन्न चित्रं क्षितिभरहरणं कालचक्रायुधस्य ॥४७ जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो यदुवरपर्षत्स्वैर्दोर्भिरस्यन्नधर्मम् । स्थिरचरवृजिनघ्नः सुस्मितश्रीमुखेन व्रजपुरवनितानां वर्धयन् कामदेवम् ॥४८ इत्थं परस्य निजवर्त्मरिरक्षयाऽऽत्त- लीलातनोस्तदनुरूपविडम्बनानि । कर्माणि कर्मकषणानि यदूत्तमस्य श्रूयादमुष्य पदयोरनुवृत्तिमिच्छन् ॥४९ मर्त्यस्तयानुसवमेधितया मुकुन्द- श्रीमत्कथाश्रवणकीर्तनचिन्तयैति । तद्धाम दुस्तरकृतान्तजवापवर्गं ग्रामाद् वनं क्षितिभुजोऽपि ययुर्यदर्थाः ॥ ५० परीक्षित्! प्रकृतिसे अतीत परमात्माने अपने द्वारा स्थापित धर्म- मर्यादाकी रक्षाके लिये दिव्य लीला- शरीर ग्रहण किया और उसके अनुरूप अनेकों अद्भुत चरित्रोंका अभिनय किया । उनका एक-एक कर्म स्मरण करनेवालोंके कर्मबन्धनोंको काट डालनेवाला है । जो यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाका अधिकार प्राप्त करना चाहे, उसे उनकी लीलाओंका ही श्रवण करना चाहिये ॥ ४ ९ ॥ परीक्षित्! जब मनुष्य प्रतिक्षण भगवान् श्रीकृष्णकी मनोहारिणी लीला - कथाओंका अधिकाधिक श्रवण, कीर्तन और चिन्तन करने लगता है, तब उसकी यही भक्ति उसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा देती है । यद्यपि कालकी गतिके परे पहुँच जाना बहुत ही कठिन है, परन्तु भगवान्के धाममें कालकी दाल नहीं गलती । वह वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता । उसी धामकी प्राप्तिके लिये अनेक सम्राटोंने अपना राजपाट छोड़कर तपस्या करनेके उद्देश्यसे जंगलकी यात्रा की है । इसलिये मनुष्यको ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1042
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उनकी लीला - कथाका ही श्रवण करना चाहिये ॥ ५० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्यां पारमहंस्यां संहितायां दश् उत्तरार्धे श्रीकृष्णचरितानुवर्णनं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
॥इति दशमस्कन्धोत्तरार्धः सम्पूर्णः ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1043
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणाम् एकादशः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः यदुवंशको ऋषियोंका शाप श्रीबादरायणिरुवाच
कृत्वा दैत्यवधं कृष्णः सरामो पदुभिर्वृतः ।
भुवोऽवतारयद् भारं जविष्ठं जनयन् कलिम् ॥१
ये कोपिताः सुबहु पाण्डुसुताः सपत्नै- र्दुर्द्यूतहेलनकचग्रहणादिभिस्तान् । कृत्वा निमित्तमितरेतरतः समेतान् हत्वा नृपान् निरहरत् क्षितिभारमीशः ॥२ भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य गुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः । मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं यद् यादवं कुलमहो अविषह्यमास्ते ॥३
नैवान्यतः परिभवोऽस्य भवेत् कथंचि- न्मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम् ।
अन्तःकलिं यदुकुलस्य विधाय वेणु- स्तम्बस्य वह्निमिव शान्तिमुपैमि धाम ॥४
व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजी तथा अन्य यदुवंशियोंके साथ मिलकर बहुत- से दैत्योंका संहार किया तथा कौरव और पाण्डवोंमें भी शीघ्र मार- काट मचानेवाला अत्यन्त प्रबल कलह उत्पन्न करके पृथ्वीका भार उतार दिया ॥१ ॥
कौरवोंने कपटपूर्ण जूएसे, तरह -तरहके अपमानोंसे तथा द्रौपदीके केश खींचने आदि अत्याचारोंसे पाण्डवोंको अत्यन्त क्रोधित कर दिया था । उन्हीं पाण्डवोंको निमित्त बनाकर भगवान् श्रीकृष्णने दोनों पक्षोंमें एकत्र हुए राजाओंको मरवा डाला और इस प्रकार पृथ्वीका भार हलका कर दिया ॥२ ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1044
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपने बाहुबलसे सुरक्षित यदुवंशियोंके द्वारा पृथ्वीके भार - राजा और उनकी सेनाका विनाश करके, प्रमाणोंके द्वारा ज्ञानके विषय न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने विचार किया कि लोकदृष्टिसे पृथ्वीका भार दूर हो जानेपर भी वस्तुतः मेरी दृष्टिसे अभीतक दूर नहीं हुआ; क्योंकि जिसपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता, वह यदुवंश अभी पृथ्वीपर विद्यमान है ॥३ ॥
यह यदुवंश मेरे आश्रित है और हाथी, घोड़े, जनबल, धनबल आदि विशाल वैभवके कारण उच्छृंखल हो रहा है । अन्य किसी देवता आदिसे भी इसकी किसी प्रकार पराजय नहीं हो सकती । बाँसके वनमें परस्पर संघर्षसे उत्पन्न अग्निके समान इस यदुवंशमें भी परस्पर कलह खड़ा करके मैं शान्ति प्राप्त कर सकूँगा और इसके बाद अपने धाममें जाऊँगा ॥४ ॥
एवं व्यवसितो राजन् सत्यसंकल्प ईश्वरः ।
शापव्याजेन विप्राणां संजह्रे स्वकुलं विभुः ॥५
स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुक्त्या लोचनं नृणाम् ।
गीर्भिस्ताः स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रियाः ॥६
आच्छिद्य कीर्तिं सुश्लोकां वितत्य ह्यंजसा नु कौ ।
तमोऽनया तरिष्यन्तीत्यगात् स्वं पदमीश्वरः ॥७
राजोवाच
ब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्यं वृद्धोपसेविनाम् ।
विप्रशापः कथमभूद् वृष्णीनां कृष्णचेतसाम् ॥८
यन्निमित्तः स वै शापो यादृशो द्विजसत्तम ।
कथमेकात्मनां भेद एतत् सर्वं वदस्व मे ॥९
राजन्! भगवान् सर्वशक्तिमान् और सत्यसंकल्प हैं । उन्होंने इस प्रकार अपने मनमें निश्चय करके ब्राह्मणोंके शापके बहाने अपने ही वंशका संहार कर डाला, सबको समेटकर अपने धाममें ले गये || ५ || परीक्षित्! भगवान्की वह मूर्ति त्रिलोकीके सौन्दर्यका तिरस्कार करनेवाली थी । उन्होंने अपनी सौन्दर्य- माधुरीसे सबके नेत्र अपनी ओर आकर्षित कर लिये थे । उनकी वाणी, उनके उपदेश परम मधुर, दिव्यातिदिव्य थे । उनके द्वारा उन्हें स्मरण करनेवालोंके चित्त उन्होंने छीन लिये थे । उनके चरणकमल त्रिलोक - सुन्दर थे । जिसने उनके एक चरण- चिह्नका भी दर्शन कर लिया, उसकी बहिर्मुखता दूर भाग गयी, वह कर्मप्रपंचसे ऊपर उठकर उन्हींकी सेवामें लग गया । उन्होंने अनायास ही पृथ्वीमें अपनी कीर्तिका विस्तार कर दिया, जिसका बड़े - बड़े सुकवियोंने बड़ी ही सुन्दर भाषामें वर्णन किया है। वह इसलिये कि मेरे चले जानेके बाद लोग ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1045
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मेरी इस कीर्तिका गान, श्रवण और स्मरण करके इस अज्ञानरूप अन्धकारसे सुगमतया पार हो जायँगे । इसके बाद परमैश्वर्यशाली भगवान् श्रीकृष्णने अपने धामको प्रयाण किया ॥६-७ ॥ राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! यदुवंशी बड़े ब्राह्मणभक्त थे । उनमें बड़ी उदारता भी थी और वे अपने कुलवृद्धोंकी नित्य निरन्तर सेवा करनेवाले थे । सबसे बड़ी बात तो यह थी कि उनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णमें लगा रहता था; फिर उनसे ब्राह्मणोंका अपराध कैसे बन गया? और क्यों ब्राह्मणोंने उन्हें शाप दिया? ॥८ ॥
भगवान्के परम प्रेमी विप्रवर! उस शापका कारण क्या था तथा क्या स्वरूप था? समस्त यदुवंशियोंके आत्मा, स्वामी और प्रियतम एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही थे; फिर उनमें फूट कैसे हुई? दूसरी दृष्टिसे देखें तो वे सब ऋषि अद्वैतदर्शी थे, फिर उनको ऐसी भेददृष्टि कैसे हुई? यह सब आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥९ ॥
श्रीशुक उवाच बिभ्रद् वपुः सकलसुन्दरसन्निवेशं कर्माचरन् भुवि सुमंगलमाप्तकामः । आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्तिः संहर्तुमैच्छत कुलं स्थितकृत्यशेषः ॥ १० कर्माणि पुण्यनिवहानि सुमंगलानि गायज्जगत्कलिमलापहराणि कृत्वा । कालात्मना निवसता यदुदेवगेहे पिण्डारकं समगमन् मुनयो निसृष्टाः ॥११
विश्वामित्रो ऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुरंगिराः ।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठो नारदादयः ॥१२
क्रीडन्तस्तानुपव्रज्य कुमारा यदुनन्दनाः ।
उपसंगृह्य पप्रच्छुरविनीता विनीतवत् ॥१३
ते वेषयित्वा स्त्रीवेषः साम्बं जाम्बवतीसुतम् ।
एषा पृच्छति वो विप्रा अन्तर्वत्न्यसितेक्षणा ॥ १४
प्रष्टुं विलज्जती साक्षात् प्रब्रूतामोघदर्शनाः ।
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किंस्वित् संजनयिष्यति ॥ १५
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1046
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचुः कुपिता नृप ।
जनयिष्यति वो मन्दा मुसलं कुलनाशनम् ॥१६
श्रीशुकदेवजीने कहा – भगवान् श्रीकृष्णने वह शरीर धारण करके जिसमें सम्पूर्ण सुन्दर पदार्थोंका सन्निवेश था ( नेत्रोंमें मृगनयन, कन्धोंमें सिंहस्कन्ध, करोंमें करि- कर, चरणोंमें कमल आदिका विन्यास था। ) पृथ्वीमें मंगलमय कल्याणकारी कर्मोंका आचरण किया । वे पूर्णकाम प्रभु द्वारकाधाममें रहकर क्रीडा करते रहे और उन्होंने अपनी उदार कीर्तिकी स्थापना की । ( जो कीर्ति स्वयं अपने आश्रयतकका दान कर सके वह उदार है। ) अन्तमें श्रीहरिने अपने कुलके संहार- उपसंहारकी इच्छा की; क्योंकि अब पृथ्वीका भार उतरनेमें इतना ही कार्य शेष रह गया था ॥ १० ॥ भगवान् श्रीकृष्णने ऐसे परम मंगलमय और पुण्य-प्रापक कर्म किये, जिनका गान करनेवाले लोगोंके सारे कलिमल नष्ट हो जाते हैं । अब
भगवान् श्रीकृष्ण महाराज उग्रसेनकी राजधानी द्वारकापुरीमें वसुदेवजीके घर यादवोंका संहार करनेके लिये कालरूपसे ही निवास कर रहे थे । उस समय उनके विदा कर देनेपर— विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ और नारद आदि बड़े - बड़े ऋषि द्वारकाके पास ही पिण्डारकक्षेत्रमें जाकर निवास करने लगे थे ॥११-१२ ॥ एक दिन यदुवंशके कुछ उद्दण्ड कुमार खेलते- खेलते उनके पास जा निकले । उन्होंने बानवटी नम्रतासे उनके चरणोंमें प्रणाम करके प्रश्न किया ॥१३ ॥ वे जाम्बवतीनन्दन साम्बको
स्त्रीके वेषमें सजाकर ले गये और कहने लगे, 'ब्राह्मणो! यह कजरारी आँखोंवाली सुन्दरी गर्भवती है । यह आपसे एक बात पूछना चाहती है । परन्तु स्वयं पूछनेमें सकुचाती है । आपलोगोंका ज्ञान अमोघ - अबाध है, आप सर्वज्ञ हैं । इसे पुत्रकी बड़ी लालसा है और अब प्रसवका समय निकट आ गया है । आपलोग बताइये, यह कन्या जनेगी या पुत्र? ' ॥१४-१५ ॥ परीक्षित्! जब उन कुमारोंने इस प्रकार उन ऋषि- मुनियोंको धोखा देना चाहा, तब वे भगवत्प्रेरणासे क्रोधित हो उठे । उन्होंने कहा -' मूर्खो! यह एक ऐसा मूसल पैदा करेगी, जो तुम्हारे कुलका नाश करनेवाला होगा ॥ १६ ॥ मुनियोंकी यह बात सुनकर वे
बालक बहुत ही डर गये । उन्होंने तुरंत साम्बका पेट खोलकर देखा तो सचमुच उसमें एक लोहेका मूसल मिला ॥१७ ॥ अब तो वे पछताने लगे और कहने लगे - ' हम बड़े अभागे हैं ।
देखो, हमलोगोंने यह क्या अनर्थ कर डाला? अब लोग हमें क्या कहेंगे? ' इस प्रकार वे बहुत ही घबरा गये तथा मूसल लेकर अपने निवासस्थानमें गये ॥१८ ॥ उस समय उनके चेहरे
फीके पड़ गये थे । मुख कुम्हला गये थे । उन्होंने भरी सभामें सब यादवोंके सामने ले जाकर वह मूसल रख दिया और राजा उग्रसेनसे सारी घटना कह सुनायी ॥ १ ९ ॥ राजन्! जब सब लोगोंने ब्राह्मणोंके शापकी बात सुनी और अपनी आँखोंसे उस मूसलको देखा, तब सब - के-सब द्वारकावासी विस्मित और भयभीत हो गये; क्योंकि वे जानते थे कि ब्राह्मणोंका शाप कभी झूठा नहीं होता ॥ २० ॥ यदुराज उग्रसेनने उस मूसलको चूरा- चूरा करा डाला और उस
चूरे तथा लोहेके बचे हुए छोटे टुकड़ेको समुद्रमें फेंकवा दिया । ( इसके सम्बन्धमें उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे कोई सलाह न ली; ऐसी ही उनकी प्रेरणा थी ) ॥२१ ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1047
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तच्छ्रुत्वा तेऽतिसन्त्रस्ता विमुच्य सहसोदरम् ।
साम्बस्य ददृशुस्तस्मिन् मुसलं खल्वयस्मयम् ॥१७
किं कृतं मन्दभाग्यैर्नः किं वदिष्यन्ति नो जनाः ।
इति विह्वलिता गेहानादाय मुसलं ययुः ॥ १८
तच्चोपनीय सदसि परिम्लानमुखश्रियः ।
राज्ञ आवेदयांचक्रुः सर्वयादवसन्निधौ ॥१९
श्रुत्वामोघं विप्रशापं दृष्ट्वा च मुसलं नृप ।
विस्मिता भयसन्त्रस्ता बभूवुर्द्वारकौकसः ॥२०
तच्चूर्णयित्वा मुसलं यदुराजः स आहुकः ।
समुद्रसलिले प्रास्यल्लोहं चास्यावशेषितम् ॥२१
कश्चिन्मत्स्योऽग्रसील्लोहं चूर्णानि तरलैस्ततः ।
उह्यमानानि वेलायां लग्नान्यासन् किलैरकाः ॥२२
मत्स्यो गृहीतो मत्स्यघ्नैर्जालेनान्यैः सहार्णवे ।
तस्योदरगतं लोहं स शल्ये लुब्धकोऽकरोत् ॥२३
भगवाञ्ज्ञातसर्वार्थ ईश्वरोऽपि तदन्यथा ।
कर्तुं नैच्छद् विप्रशापं कालरूप्यन्वमोदत ॥२४
परीक्षित्! उस लोहेके टुकड़ेको एक मछली निगल गयी और चूरा तरंगोंके साथ बह-बहकर समुद्रके किनारे आ लगा । वह थोड़े दिनोंमें एरक (बिना गाँठकी एक घास ) के रूपमें उग आया ॥२२ ॥ मछली मारनेवाले मछुओंने समुद्रमें दूसरी मछलियोंके साथ उस मछलीको
भी पकड़ लिया । उसके पेटमें जो लोहेका टुकड़ा था, उसको जरा नामक व्याधने अपने बाणके नोकमें लगा लिया ॥ २३ ॥ भगवान् सब कुछ जानते थे । वे इस शापको उलट भी
सकते थे । फिर भी उन्होंने ऐसा करना उचित न समझा । कालरूपधारी प्रभुने ब्राह्मणोंके शापका अनुमोदन ही किया ॥ २४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1048
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1049
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ द्वितीयोऽध्यायः वसुदेवजीके पास श्रीनारदजीका आना और उन्हें राजा जनक तथा नौ योगीश्वरोंका संवाद सुनाना श्रीशुक उवाच
गोविन्दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह ।
अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालसः ॥१
को नु राजन्निन्द्रियवान् मुकुन्दचरणाम्बुजम् ।
न भजेत् सर्वतोमृत्युरुपास्यममरोत्तमैः ॥२
तमेकदा तु देवर्षिं वसुदेवो गृहागतम् ।
अर्चितं सुखमासीनमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥३
वसुदेव उवाच
भगवन् भवतो यात्रा स्वस्तये सर्वदेहिनाम् ।
कृपणानां यथा पित्रोरुत्तमश्लोकवर्त्मनाम् ॥४
भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।
सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं –कुरुनन्दन! देवर्षि नारदके मनमें भगवान् श्रीकृष्णकी सन्निधिमें रहनेकी बड़ी लालसा थी । इसलिये वे श्रीकृष्णके निज बाहुओंसे सुरक्षित द्वारकामें —जहाँ दक्ष आदिके शापका कोई भय नहीं था, विदा कर देनेपर भी पुनः पुनः आकर प्रायः रहा ही करते थे ॥ १ ॥
राजन्! ऐसा कौन प्राणी है, जिसे इन्द्रियाँ तो प्राप्त हों और वह भगवान्के ब्रह्मा आदि बड़े - बड़े देवताओंके भी उपास्य चरणकमलोंकी दिव्य गन्ध, मधुर मकरन्द - रस, अलौकिक रूपमाधुरी, सुकुमार स्पर्श और मंगलमय ध्वनिका सेवन करना न चाहे? क्योंकि यह बेचारा प्राणी सब ओरसे मृत्युसे ही घिरा हुआ है ॥ २ ॥
एक दिनकी बात है, देवर्षि नारद वसुदेवजीके यहाँ पधारे । वसुदेवजीने उनका अभिवादन किया तथा आरामसे बैठ जानेपर विधिपूर्वक उनकी पूजा की और इसके बाद पुनः प्रणाम करके उनसे यह बात कही ॥३ ॥
वसुदेवजीने कहा – संसारमें माता- पिताका आगमन पुत्रोंके लिये और भगवान्की ओर अग्रसर होनेवाले साधु - संतोंका पदार्पण प्रपंचमें उलझे हुए दीन-दु:खियोंके लिये बड़ा ही ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1050
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुखकर और बड़ा ही मंगलमय होता है । परन्तु भगवन्! आप तो स्वयं भगवन्मय, भगवत्स्वरूप हैं । आपका चलना - फिरना तो समस्त प्राणियोंके कल्याणके लिये ही होता है ॥४ ॥
देवताओंके चरित्र भी कभी प्राणियोंके लिये दुःखके हेतु, तो कभी सुखके हेतु बन जाते हैं । परन्तु जो आप-जैसे भगवत्प्रेमी पुरुष हैं - जिनका हृदय, प्राण, जीवन, सब कुछ भगवन्मय हो गया है— उनकी तो प्रत्येक चेष्टा समस्त प्राणियोंके कल्याणके लिये ही होती है ॥५ ॥
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् ।
छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥६
ब्रह्मंस्तथापि पृच्छामो धर्मान् भागवतांस्तव ।
याञ्छ्रुत्वा श्रद्धया मर्त्यो मुच्यते सर्वतोभयात् ॥७
अहं किल पुरानन्तं प्रजार्थो भुवि मुक्तिदम् ।
अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया ॥८
यथा विचित्रव्यसनाद् भवद्भिर्विश्वतोभयात् ।
मुच्येम ह्यंजसैवाद्धा तथा नः शाधि सुव्रत ॥९
श्रीशुक उवाच
राजन्नेवं कृतप्रश्नो वसुदेवेन धीमता ।
प्रीतस्तमाह देवर्षिर्हरेः संस्मारितो गुणैः ॥१०
नारद उवाच
सम्यगेतद् व्यवसितं भवता सात्वतर्षभ ।
यत् पृच्छसे भागवतान् धर्मांस्त्वं विश्वभावनान् ॥११
श्रुतोऽनुपठितो ध्यात आदृतो वानुमोदितः ।
सद्यः पुनाति सद्धर्मो देव विश्वद्रुहोऽपि हि ॥१२
जो लोग देवताओंका जिस प्रकार भजन करते हैं, देवता भी परछाईंके समान ठीक उसी रीतिसे भजन करनेवालोंको फल देते हैं; क्योंकि देवता कर्मके मन्त्री हैं, अधीन हैं । परन्तु सत्पुरुष दीनवत्सल होते हैं अर्थात् जो सांसारिक सम्पत्ति एवं साधनसे भी हीन हैं, उन्हें अपनाते हैं ॥६ ॥ ब्रह्मन्! ( यद्यपि हम आपके शुभागमन और शुभ दर्शनसे ही कृतकृत्य हो
गये हैं ) तथापि आपसे उन धर्मोंके – साधनोंके सम्बन्धमें प्रश्न कर रहे हैं, जिनको मनुष्य ****** ebook converter DEMO Watermarks *******