श्रीमद्भागवत महापुराण - २
Srimad Bhagavat Mahapuran Volume 2 Sanskrit Hindi · Gita Press, Gorakhpur · 1520 पृष्ठ · 152 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः । 27 श्रीमद्भागवत महापुराण [द्वितीय-खण्ड ] [ सचित्र, हिन्दी- व्याख्यासहित ] गीताप्रेसगोरखपुरर GITA PRESS, GORAKHPUR गीताप्रेस,… 1–10
- किया । १ । आपने कहा कि पिछले कल्पके अन्तमें द्रविड़ देशके स्वामी राजर्षि सत्यव्रतने भगवान्की सेवासे ज्ञान प्राप्त किया और वही इस कल्पमें वैवस्वत मनु हुए… 11–20
- लम्बुषा देवी भजनीयगुणालयम् । वराप्सरा यतः पुत्राः कन्या चेडविडाभवत् । ३१ तस्यामुत्पादयामास विश्रवा धनदं सुतम्… 21–30
- न प्राभूद् यत्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः । १४ श्रीशुक उवाच अम्बरीषो महाभागः सप्तद्वीपवतीं महीम् । अव्ययां च श्रियं लब्ध्वा विभवं चातुलं भुवि… 31–40
- औरकुछभी नहीं जानता । ६८ । दुर्वासाजी! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ । जिसका अनिष्ट करनेसे आपको इस विपत्तिमें पड़ना पड़ा है, आप उसीके पास जाइये… 41–50
- ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* गीताप्रेस, गोरखपुर H. Srivashava मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम Lord Rama the MaryIdIpurusottama… 51–60
- ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* गीताप्रेस गोरखपुर माता देवकीके मृत पुत्रोंको वापस लाना Restoration of dead sons of Devaki गीताप्रेस गोरखपुर… 61–70
- तत्र तप्त्वा तपस्तीक्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान् । सहैवाग्निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि । ५४ ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्तसे बैठे हुए थे… 71–80
- अंशुमानुवाच न पश्यति त्वां परमात्मनोऽजनो न बुध्यतेऽद्यापि समाधियुक्तिभिः । कुतोऽपरे तस्य मनःशरीरधी- विसर्गसृष्टा वयमप्रकाशाः… 81–90
- नारीकवच इत्युक्तो निःक्षत्रे मूलकोऽभवत् । ४० ततो दशरथस्तस्मात् पुत्र ऐडविडस्ततः २ । राजा विश्वसहो यस्य खट्वांगश्चक्रवर्त्यभूत्… 91–100
- इधर तो ब्रह्मा आदि बड़े आनन्दसे भगवान्की लीलाओंका गान कर रहे थे और उधर जब भगवान्को यह मालूम हुआ कि भरतजी केवल गोमूत्रमें पकाया हुआ जौका दलिया खाते हैं,… 101–110
- इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे श्रीरामोपाख्याने एकादशोऽध्यायः । ११ । १. नाधिर्व्याधिर्जरा ग्लानिर्दुःख०… 111–120
- नाहं त्वां भस्मसात् कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति । ९ तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम् । स्पृहामांगिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च… 121–130
- नहीं होना चाहिये । ' तब उन्होंने कहा–' अच्छी बात है । पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र वैसा ( घोर प्रकृतिका) होगा… 131–140
- भगवान् श्रीहरिने इस प्रकार भृगुवंशियोंमें अवतार ग्रहण करके पृथ्वीके भारभूत राजाओंका बहुत बार वध किया । २७ । एवं भृगुषु विश्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः… 141–150
- वृषपर्वा तमाज्ञाय प्रत्यनीकविवक्षितम् । गुरुं प्रसादयन् मूर्ध्ना पादयोः पतितः पथि । २६ क्षणार्धमन्युर्भगवान् शिष्यं व्याचष्ट भार्गवः… 151–160
- अथ विंशोऽध्यायः पूरुके वंश, राजा दुष्यन्त और भरतके चरित्रका वर्णन श्रीशुक उवाच पूरोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोऽसि भारत… 161–170
- दुरितक्षयो महावीर्यात् तस्य त्रय्यारुणिः कविः । १९ पुष्करारुणिरित्यत्र ये ब्राह्मणगतिं गताः । बृहत्क्षत्रस्य पुत्रोऽभूद्धस्ती यद्धस्तिनापुरम्… 171–180
- यह कन्या वास्तवमें उपरिचरवसुके वीर्यसे मछलीके गर्भसे उत्पन्न हुई १ दाशों ( केवटों ) -के द्वारा पालित होनेसे वह केवटोंकी कन्या कहलायी… 181–190
- पृथा च श्रुतदेवा च श्रुतकीर्तिः श्रुतश्रवाः । ३० सात्वतके पुत्र अन्धकके चार पुत्र हुए- कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि… 191–200
- श्रीशुक उवाच सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम । वासुदेवकथायां ते यज्जाता नैष्ठिकी रतिः १ । १५ वासुदेवकथाप्रश्नः पुरुषांस्त्रीन् पुनाति हि… 201–210
- अथ द्वितीयोऽध्यायः भगवान्का गर्भ- प्रवेश और देवताओंद्वारा गर्भ- स्तुति श्रीशुक उवाच प्रलम्बबकचाणूरतृणावर्तमहाशनैः २… 211–220
- अथ तृतीयोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य श्रीशुक उवाच अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः । यवाजनजन्मक्षं शान्तर्क्षग्रहतारकम्… 221–230
- हुआ कि स्वयं परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण मेरे अंदर अवतीर्ण हो रहे हैं, तब वह आनन्दसे भर गया और समस्त सद्गुणोंको धारणकर तथा सुहावना बनकर प्रकट हो गया… 231–240
- देवता तो बस वहीं वीर बनते हैं, जहाँ कोई लड़ाई-झगड़ा न हो । रणभूमिके बाहर वे बड़ी-बड़ी डींग हाँकते हैं… 241–250
- एक ही काम था- बच्चोंको मारना । कंसकी आज्ञासे वह नगर, ग्राम और अहीरोंकी बस्तियोंमें बच्चोंको मारनेके लिये घूमा करती थी || २ || जहाँके लोग अपने प्रतिदिनके… 251–260
- अथ सप्तमोऽध्यायः शकट- भंजन और तृणावर्त - उद्धार राजोवाच येन येनावतारेण भगवान् हरिरीश्वरः । करोति कर्णरम्याणि मनोज्ञानि च नः प्रभो… 261–270
- त्वं हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठः संस्कारान् कर्तुमर्हसि । बालयोरनयोर्नृणां जन्मना ब्राह्मणो गुरुः । ६ गर्ग उवाच यदूनामहमाचार्यः ख्यातश्च भुवि सर्वतः… 271–280
- भी मेरे बराबर ही मुझे स्वीकार है; ले, खा । खा ले, भैया! ' यशोदा माता अपने लालाकी तोतली बोली सुन रही थीं । उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, वे घरमें भीतर घुस आयीं… 281–290
- अथ नवमोऽध्यायः श्रीकृष्णका ऊखलसे बाँधा जाना श्रीशुक उवाच एकदा गृहदासीषु यशोदा नन्दगेहिनी । कर्मान्तरनियुक्तासु निर्ममन्थ स्वयं दधि… 291–300
- परिश्रम भी सहन नहीं करते हैं । वे अपने भक्तको परिश्रमसे मुक्त करनेके लिये स्वयं ही बन्धन स्वीकार कर लेते हैं… 301–310
- ऐसा प्रतीत होता है कि त्रिकालदर्शी देवर्षि नारदने अपनी ज्ञानदृष्टिसे यह जान लिया कि इनपर भगवान्का अनुग्रह होनेवाला है… 311–320
- धरके वहाँ आया था । उसकी चोंच बड़ी तीखी थी और वह स्वयं बड़ा बलवान् था । उसने झपटकर श्रीकृष्णको निगल लिया । ४८… 321–330
- वक्त्रान्मुकुन्दो भगवान् विनिर्ययौ । ३२ पीनाहिभोगोत्थितमद्भुतं मह- ज्ज्योतिः स्वधाम्ना ज्वलयद् दिशो दश… 331–340
- गायोंपर बड़ा क्रोध आया । जब वे बहुत कष्ट उठाकर उस कठिन मार्गसे उस स्थानपर पहुँचे, तब उन्होंने बछड़ोंके साथ अपने बालकोंको भी देखा । ३२… 341–350
- बड़े मायावी भी आपकी मायाके चक्रमें हैं । फिर भी मैंने आपपर अपनी माया फैलाकर अपना ऐश्वर्य देखना चाहा! प्रभो मैं आपके सामने हूँ ही क्या… 351–360
- समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्यदं पुण्ययशो मुरारेः । भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद् विपदां न तेषाम्… 361–370
- जनन्युपहृतं प्राश्य स्वाद्वन्नमुपलालितौ । संविश्य वरशय्यायां सुखं सुषुपतुर्व्रजे । ४६ एवं स भगवान् कृष्णो वृन्दावनचरः क्वचित्… 371–380
- यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽऽचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता । ३६ न नाकपृष्ठं न च सार्वभौमं न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम्… 381–390
- ——नन्दजी! तुम्हारे बालकको कालिय नागने पकड़ लिया था । सो छूटकर आ गया । यह बड़े सौभाग्यकी बात है! । १७… 391–400
- अथैकोनविंशोऽध्यायः गौओं और गोपों को दावानलसे बचाना श्रीशुक उवाच क्रीडासक्तेषु गोपेषु तद्गावो दूरचारिणीः । स्वैरं चरन्त्यो विविशुस्तृणलोभेन गह्वरम्… 401–410
- योगीजन अपनी इन्द्रियोंको विषयोंकी ओर जानेसे रोककर, प्रत्याहार करके उनके द्वारा क्षीण होते हुए ज्ञानकी रक्षा करते हैं । ४१… 411–420
- अथ द्वाविंशोऽध्यायः चीरहरण श्रीशुक उवाच हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकुमारिकाः । चेरुर्हविष्यं भुंजानाः कात्यायन्यर्चनव्रतम्… 421–430
- क्या तुम मेरे लिये इतना भी नहीं कर सकती हो? ' गोपियोंने मानो कहा - ' श्रीकृष्ण! हम अपनेको कैसे भूलें? हमारी जन्म -जन्मकी धारणाएँ भूलने दें, तब न… 431–440
- कोई भी तुम्हारा तिरस्कार नहीं करेंगे । उनकी तो बात ही क्या, सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा । इसका कारण है… 441–450
- चूर- चूर कर दें । नन्दबाबा आदि गोपोंने उनकी बात सुनकर बड़ी प्रसन्नतासे स्वीकार कर ली । ३१ । भगवान् श्रीकृष्णने जिस प्रकारका यज्ञ करनेको कहा था, वैसा ही… 451–460
- ग्वालबालोंको उबार लिया । ११ । यमुनाजलमें रहनेवाला कालियनाग कितना विषैला था? परन्तु इसने उसका भी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुनाजीका जल… 461–470
- अथाष्टाविंशोऽध्यायः वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना श्रीशुक उवाच एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्… 471–480
- देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून् । ३१ गोपियो! मेरी लीला और गुणोंके श्रवणसे, रूपके दर्शनसे, उन सबके कीर्तन और ध्यानसे मेरे प्रति जैसे अनन्य प्रेमकी… 481–490
- चलती और गोपियोंसे कहने लगती - ' मित्रो! मैं श्रीकृष्ण हूँ । तुमलोग मेरी यह मनोहर चाल देखो ' । १९… 491–500
- जंगलमें छिपे - छिपे भटक रहे हो! क्या कंकड़, पत्थर आदिकी चोट लगने से उनमें पीड़ा नहीं होती? हमें तो इसकी सम्भावनामात्रसे ही चक्कर आ रहा है… 501–510
- यमुनाजलमें गोपियोंने प्रेमभारी चितवनसे भगवान्की ओर देख-देखकर तथा हँस - हँसकर उनपर इधर- उधरसे जलकी खूब बौछारें डालीं । जल उलीच उलीचकर उन्हें खूब नहलाया… 511–520
- और यह जानकर ही उनसे प्रेम करती हैं - इस बातका कितना सुन्दर परिचय दिया; यह सब विषय मूलमें ही पाठ करनेयोग्य है… 521–530
- जिस समय बलराम और श्याम दोनों भाई इस प्रकार स्वच्छन्द विहार कर रहे थे और उन्मत्तकी भाँति गा रहे थे, उसी समय वहाँ शंखचूड नामक एक यक्ष आया… 531–540
- अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः अरिष्टासुरका उद्धार और कंसका श्री अक्रूरजीको व्रजमें भेजना श्रीशुक उवाच अथ तर्ह्यागतो गोष्ठमरिष्टो वृषभासुरः… 541–550
- आत्माके रूपमें होनेपर भी आप अपनेको छिपाये रखते हैं; क्योंकि आप पंचकोशरूप गुफाओंके भीतर रहते हैं… 551–560
- रथेन गोकुलं प्राप्तः सूर्यश्चास्तगिरिं नृप । २४ मैं उनके कुटुम्बका हूँ और उनका अत्यन्त हित चाहता हूँ । उनके सिवा और कोई मेरा आराध्यदेव भी नहीं है… 561–570
- दुर्भाग्यने हमारे सामने उनका वियोग उपस्थित करके हमारे चित्तको विनष्ट एवं व्याकुल कर दिया है । २८… 571–580
- प्रभो! आप केवल विज्ञानस्वरूप हैं, विज्ञान- घन हैं । जितनी भी प्रतीतियाँ होती हैं, जितनी भी वृत्तियाँ हैं, उन सबके आप ही कारण और अधिष्ठान हैं… 581–590
- भगवान् श्रीकृष्णने सुदामाको उसके माँगे हुए वर तो दिये ही- ऐसी लक्ष्मी भी दी जो वंशपरम्पराके साथ- साथ बढ़ती जाय; और साथ ही बल, आयु, कीर्ति तथा कान्तिका भी… 591–600
- दन्तमुत्याट्य तेनेभं हस्तिपांश्चाहनद्धरिः । १४ मृतकं द्विपमुत्सृज्य दन्तपाणिः समाविशत् । अंसन्यस्तविषाणोऽसृङ्मदबिन्दुभिरंकितः… 601–610
- इसी प्रकार मुष्टिकने भी पहले बलरामजीको एक घूँसा मारा । इसपर बली बलरामजीने उसे बड़े जोरसे एक तमाचा जड़ दिया । २४… 611–620
- समुद्र उवाच नैवाहार्षमहं देव दैत्यः पंचजनो महान् । अन्तर्जलचरः कृष्ण शंखरूपधरोऽसुरः । ४० आस्ते तेनाहृतो नूनं तच्छ्रुत्वा सत्वरं प्रभुः… 621–630
- मनुष्य वेगसे चक्कर लगाने लगते हैं, तब उन्हें सारी पृथ्वी घूमती हुई जान पड़ती है । वैसे ही वास्तवमें सब कुछ करनेवाला चित्त ही है; परन्तु उस चित्तमें… 631–640
- आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं सृजे हन्म्यनुपालये । आत्ममायानुभावेन भूतेन्द्रियगुणात्मना । ३० आत्मा ज्ञानमयः शुद्धो व्यतिरिक्तोऽगुणान्वयः… 641–650
- झालरें और स्थान - स्थानपर झंडियाँ भी लगी हुई थीं । चँदोवे तने हुए थे । सेजें बिछायी हुई थीं और बैठनेके लिये बहुत सुन्दर- सुन्दर आसन लगाये हुए थे… 651–660
- धृतराष्ट्रके पास आये । अबतक यह स्पष्ट हो गया था कि राजा अपने पुत्रोंका पक्षपात करते हैं और भतीजोंके साथ अपने पुत्रोंका-सा बर्ताव नहीं करते… 661–670
- चहल - पहल थी । सारा नगर छोटी- छोटी झंडियों और बड़ी - बड़ी विजय - पताकाओंसे सजा दिया गया था । ब्राह्मणोंकी वेदध्वनि गूँज रही थी और सब ओर आनन्दोत्सवके सूचक… 671–680
- पृथ्वीके भार बने हुए असुरोंका संहार करनेके लिये प्रार्थना की थी । ४० । उन्हींकी प्रार्थनासे मैंने यदुवंशमें वसुदेवजीके यहाँ अवतार ग्रहण किया है… 681–690
- योग्य वर समझा । २५ । जब परमसुन्दरी रुक्मिणीको यह मालूम हुआ कि मेरा बड़ा भाई रुक्मी शिशुपालके साथ मेरा विवाह करना चाहता है, तब वे बहुत उदास हो गयीं… 691–700
- पद्भ्यां विनिर्ययौ द्रष्टुं भवान्याः पादपल्लवम् । सा चानुध्यायती सम्यङ्मुकुन्दचरणाम्बुजम् । ४० यतवाङ्मातृभिः सार्धं सखीभिः परिवारिता… 701–710
- तथाभूतं हतप्रायं दृष्ट्वा संकर्षणो विभुः । विमुच्य बद्धं करुणो भगवान् कृष्णमब्रवीत् । ३६ असाध्विदं त्वया कृष्ण कृतमस्मज्जुगुप्सितम्… 711–720
- बोले, चुपचाप खड़े रहे । इतनेमें ही नारदजी वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने प्रद्युम्नजीको शम्बरासुरका हर ले जाना, समुद्रमें फेंक देना आदि जितनी भी घटनाएँ घटित… 721–730
- शयानमवधील्लोभात्स पापः क्षीणजीवितः । ५ स्त्रीणां विक्रोशमानानां क्रन्दन्तीनामनाथवत् । हत्वा पशून् सौनिकवन्मणिमादाय जग्मिवान्… 731–740
- तत्रोपस्पृश्य विशदं पीत्वा वारि महारथौ । कृष्णौ ददृशतुः कन्यां चरन्तीं चारुदर्शनाम् । १७ तामासाद्य वरारोहां सुद्विजां रुचिराननाम्… 741–750
- र्वसुर्नभस्वानरुणश्च सप्तमः । पीठं पुरस्कृत्य चमूपतिं मृधे भौमप्रयुक्ता निरगन् धृतायुधाः । १२ प्रायुंजतासाद्य शरानसीन् गदाः शक्त्यृष्टिशूलान्यजिते… 751–760
- तयोर्विवाहो मैत्री च नोत्तमाधमयोः क्वचित् । १५ वैदर्म्येतदविज्ञाय त्वयादीर्घसमीक्षया । वृता वयं गुणैर्हीना भिक्षुभिः श्लाघिता मुधा… 761–770
- अथैकषष्टितमोऽध्यायः भगवान्की सन्ततिका वर्णन तथा अनिरुद्धके विवाहमें रुक्मीका मारा जाना श्रीशुक उवाच एकैकशस्ताः कृष्णस्य पुत्रान् दश दशाबलाः… 771–780
- मैंने बहुतसे पहाड़ोंको तोड़- फोड़ डाला था' । ९ । बाणासुरकी यह प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकरने तनिक क्रोधसे कहा - ' रे मूढ़! जिस समय तेरी ध्वजा टूटकर गिर… 781–790
- भक्तानुकम्प्युपव्रज्य चक्रायुधमभाषत । ३३ श्रीरुद्र उवाच त्वं हि ब्रह्म परं ज्योतिर्गूढं ब्रह्मणि वाङ्मये । यं पश्यन्त्यमलात्मान आकाशमिव केवलम्… 791–800
- अनुजानीहि मां कृष्ण यान्तं देवगतिं प्रभो । यत्र क्वापि सतश्चेतो भूयान्मे त्वत्पदास्पदम् । २८ नमस्ते सर्वभावाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये… 801–810
- ‘ आप ही भगवान् वासुदेव हैं और जगत्की रक्षाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं । ' इसका फल यह हुआ कि वह मूर्ख अपनेको ही भगवान् मान बैठा || २ || जैसे बच्चे… 811–820
- प्रतिजग्राह बलवान् सुनन्देनाहनच्च तम् । मुसलाहतमस्तिष्को विरेजे रक्तधारया । १९ गिरिर्यथा गैरिकया प्रहारं नानुचिन्तयन्… 821–830
- दासीनां निष्ककण्ठीनां सहस्रं दुहितृवत्सलः । ५१ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कौरवोंका नगर डगमगा रहा था और वे अत्यन्त घबराहटमें पड़े हुए थे… 831–840
- अथ सप्ततितमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णकी नित्यचर्या और उनके पास जरासन्धके कैदी राजाओंके दूतका आना श्रीशुक उवाच अथोषस्युपवृत्तायां कुक्कुटान् कूजतोऽशपन्… 841–850
- अथैकसप्ततितमोऽध्यायः श्रीकृष्ण भगवान्का इन्द्रप्रस्थ पधारना श्रीशुक उवाच इत्युदीरितमाकर्ण्य देवर्षेरुद्धवोऽब्रवीत्… 851–860
- ध्यायन्त्यभद्रनशने शुचयो गृणन्ति । विन्दन्ति ते कमलनाभ भवापवर्ग- माशासते यदि त आशिष ईश नान्ये । ४ तद् देवदेव भवतश्चरणारविन्द- सेवानुभावमिह पश्यतु लोक एषः… 861–870
- सर्वथा मिथ्या है । यही नहीं, हमें कर्मके फल स्वर्गादि लोकोंकी भी, जो मरनेके बाद मिलते हैं, इच्छा नहीं है… 871–880
- हाथ जोड़े हुए ‘ नमो नमः! जय जय! ' इस प्रकारके नारे लगाकर उन्हें नमस्कार करने लगे । उस समय आकाशसे स्वयं ही पुष्पोंकी वर्षा होने लगी । २९… 881–890
- तारे परम हितैषी भगवान् श्रीकृष्णके साथ मयदानवकी बनायी सभामें स्वर्णसिंहासनपर देवराज इन्द्रके समान विराजमान थे… 891–900
- अपने सारथि दारुकसे कहा- || ९ || ' दारुक! तुम शीघ्र से शीघ्र मेरा रथ शाल्वके पास ले चलो । देखो, यह शाल्व बड़ा मायावी है, तो भी तुम तनिक भी भय न करना' । १०… 901–910
- यथा भवेद् वचः सत्यं तथा राम विधीयताम् । ३५ श्रीभगवानुवाच आत्मा वै पुत्र उत्पन्न इति वेदानुशासनम् । तस्मादस्य भवेद् वक्ता आयुरिन्द्रियसत्त्ववान्… 911–920
- ‘ भगवन्! साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण आपके सखा हैं । वे भक्तवाञ्छाकल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणोंके परम भक्त हैं || ९ || परम भाग्यवान्… 921–930
- वहाँ क्या देखते हैं कि सब का सब स्थान सूर्य, अग्नि और चन्द्रमाके समान तेजस्वी रत्ननिर्मित महलोंसे घिरा हुआ है… 931–940
- अपने मा - बापको देखातक न था और इनके पिताने धरोहरके रूपमें इन्हें आप दोनोंके पास रख छोड़ा था, उस समय आपने इन दोनोंकी इस प्रकार रक्षा की, जैसे पलकें… 941–950
- दिवि दुन्दुभयो नेदुर्जयशब्दयुता भुवि । देवाश्च कुसुमासारान् मुमुचुर्हर्षविह्वलाः । २७ तद् रंगमाविशमहं कलनूपुराभ्यां पद्भ्यां प्रगृह्य कनकोज्ज्वलरत्नमालाम्… 951–960
- वसुदेव भवान् नूनं भक्त्या परमया हरिम् । जगतामीश्वरं प्रार्चः स यद् वां पुत्रतां गतः । ४१ श्रीशुक उवाच इति तद्वचनं श्रुत्वा वसुदेवो महामनाः… 961–970
- आत्मा ह्येकः स्वयंज्योतिर्नित्योऽन्यो निर्गुणो गुणैः । आत्मसृष्टैस्तत्कृतेषु भूतेषु बहुधेयते । २४ खं वायुर्ज्योतिरापो भूस्तत्कृतेषु यथाशयम्… 971–980
- आनर्तधन्वकुरुजांगलकंकमत्स्य- पांचालकुन्तिमधुकेकयकोसलार्णाः । अन्ये च तन्मुखसरोजमुदारहास- स्निग्धेक्षणं नृप पपुर्दृशिभिर्नृनार्यः… 981–990
- सनन्दन उवाच स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयांचक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् । १२ यथा शयानं सम्राजं वन्दिनस्तत्पराक्रमैः… 991–1000
- सत इदमुत्थितं सदिति चेन्ननु तर्कहतं व्यभिचरति क्व च क्व च मृषा न तथोभययुक् । भगवन्! जैसे मिट्टीसे बना हुआ घड़ा मिट्टीरूप ही होता है, वैसे ही सत्से बना हुआ… 1001–1010
- दुःखके संयोगकी स्फूर्ति नहीं होती । अथवा मुझे अपने गुणोंके श्रवण और वर्णनका प्रेम ही दीजिये, जिससे कि मैं विधि - निषेधका किंकर न होॐ… 1011–1020
- फैला दीं । ५ । नैच्छत्त्वमस्युत्पथग इति देवश्चुकोप ह । शूलमुद्यम्य तं हन्तुमारेभे तिग्मलोचनः । ६ पतित्वा पादयोर्देवी सान्त्वयामास तं गिरा… 1021–1030
- महाराजाओंके समान श्रेष्ठ- श्रेष्ठ यज्ञ किये । ६४ । भगवान् श्रीकृष्णने आदर्श महापुरुषोंका- सा आचरण करते हुए ब्राह्मण आदि समस्त प्रजावर्गोंके सारे मनोरथ… 1031–1040
- बड़ी बात है । ४७ । भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवोंके आश्रयस्थान हैं । यद्यपि वे सदा-सर्वदा सर्वत्र उपस्थित ही रहते हैं, फिर भी कहनेके लिये उन्होंने… 1041–1050
- श्रद्धासे सुन भर ले तो इस सब ओरसे भयदायक संसारसे मुक्त हो जाय । ७ । पहले जन्ममें मैंने मुक्ति देनेवाले भगवान्की आराधना तो की थी, परन्तु इसलिये नहीं कि… 1051–1060
- अथ तृतीयोऽध्यायः माया, मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोगका निरूपण राजोवाच परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्… 1061–1070
- जिसका अज्ञान निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, वह यदि मनमाने ढंगसे वेदोक्त कर्मोंका परित्याग कर देता है, तो वह विहित कर्मोंका आचरण न… 1071–1080
- देखते कि हमारा यह शरीर मृत्युका शिकार है और वह मृत्यु किसी प्रकार भी टाली नहीं जा सकती । १२ । सौत्रामणि यज्ञमें भी सुराको सूँघनेका ही विधान है, पीनेका… 1081–1090
- यशो वितेने लोकेषु सर्वलोकमलापहम् । ४ तस्यां विभ्राजमानायां समृद्धायां महर्द्धिभिः । व्यचक्षतावितृप्ताक्षाः कृष्णमद्भुतदर्शनम्… 1091–1100
- अथ सप्तमोऽध्यायः अवधूतोपाख्यान– पृथ्वीसे लेकर कबूतरतक आठ गुरुओंकी कथा श्रीभगवानुवाच यदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे… 1101–1110
- तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः । ५६ कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते । अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्युः सन्निधौ सती… 1111–1120
- विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्नहमेकैव मूढधीः । यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात् । ३४ सुहृत् प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्… 1121–1130
- अथ दशमोऽध्यायः लौकिक तथा पारलौकिक भोगोंकी असारताका निरूपण श्रीभगवानुवाच मयोदितेष्ववहितः स्वधर्मेषु मदाश्रयः । वर्णाश्रमकुलाचारमकामात्मा समाचरेत्… 1131–1140
- गृह्यमाणेष्वहं कुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः । ९ दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा । वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्धयते… 1141–1150
- भगवान् श्रीकृष्णने कहा – प्रिय उद्धव! जिस परमात्माका परोक्षरूपसे वर्णन किया जाता है, वे साक्षात् अपरोक्ष- प्रत्यक्ष ही हैं, क्योंकि वे ही निखिल वस्तुओंको… 1151–1160
- परायणं द्विजश्रेष्ठाः श्रियः कीर्तेर्दमस्य च । ३ ९ मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् । सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासंगादयोऽगुणाः… 1161–1170
- अथ पञ्चदशोऽध्यायः भिन्न- भिन्न सिद्धियोंके नाम और लक्षण श्रीभगवानुवाच जितेन्द्रियस्य युक्तस्य जितश्वासस्य योगिनः । मयि धारयतश्चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः… 1171–1180
- स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग्रण्यां भगवानजः । २२ यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं व्रतानामविहिंसनम् । वाय्वग्न्यर्काम्बुवागात्मा शुचीनामप्यहं शुचिः… 1181–1190
- नैष्ठिक ब्रह्मचारी ब्राह्मण इन नियमोंका पालन करनेसे अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है । तीव्र तपस्याके कारण उसके कर्म - संस्कार भस्म हो जाते हैं, अन्तःकरण… 1191–1200
- न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता । आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया । ३७ दुःखोदर्केषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्… 1201–1210
- खजाना है । ४२-४३ । जिसके चित्तमें असन्तोष है, अभावका बोध है, वही ' दरिद्र ' है । जो जितेन्द्रिय नहीं है, वही ' कृपण' है… 1211–1220
- काल, पदार्थ, कर्ता, मन्त्र और कर्म– इन छहोंके शुद्ध होनेसे धर्म और अशुद्ध होनेसे अधर्म होता है । १५… 1221–1230
- शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः । १६ सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी… 1231–1240
- भगवान् श्रीकृष्णने कहा- देवगुरु बृहस्पतिके शिष्य उद्धवजी! इस संसारमें प्रायः ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते, जो दुर्जनोंकी कटुवाणीसे बिंधे हुए अपने हृदयको सँभाल… 1241–1250
- शत्रुके भेद अज्ञानकल्पित हैं । ६० । इसलिये प्यारे उद्धव! अपनी वृत्तियोंको मुझमें तन्मय कर दो और इस प्रकार अपनी सारी शक्ति लगाकर मनको वशमें कर लो और फिर… 1251–1260
- तामसं द्यूतसदनं मन्निकेतं तु निर्गुणम् । २५ सात्त्विकः कारकोऽसंगी रागान्धो राजसः स्मृतः । तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः… 1261–1270
- संक्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः । ६ वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः । त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मां समर्चयेत्… 1271–1280
- भी है, वही रक्षक है और रक्षित भी वही है । सर्वात्मा भगवान् ही इसका संहार करते हैं और जिसका संहार होता है, वह भी वे ही हैं || ६ || अवश्य ही व्यवहारदृष्टिसे… 1281–1290
- अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः भागवतधर्मोंका निरूपण और उद्धवजीका बदरिकाश्रमगमन उद्धव उवाच सुदुश्चरामिमां मन्ये योगचर्यामनात्मनः… 1291–1300
- अथ त्रिंशोऽध्यायः यदुकुलका संहार राजोवाच ततो महाभागवत उद्धवे निर्गतेवनम् । द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः । १ ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः… 1301–1310
- देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि । अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिताः । ८ सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्या हित्वाभ्रमण्डलम्… 1311–1320
- सिन्धोस्तटं चन्द्रभागां कौन्तीं काश्मीरमण्डलम् । भोक्ष्यन्ति शूद्रा व्रात्याद्या म्लेच्छाश्चाब्रह्मवर्चसः… 1321–1330
- अथ तृतीयोऽध्यायः राज्य, युगधर्म और कलियुगके दोषोंसे बचनेका उपाय - नामसंकीर्तन श्रीशुक उवाच दृष्ट्वाऽऽत्मनि जये व्यग्रान् नृपान् हसति भूरियम्… 1331–1340
- अथ चतुर्थोऽध्यायः चार प्रकारके प्रलय श्रीशुक उवाच कालस्ते परमाण्वादिर्द्विपरार्धावधिर्नृप । कथितो युगमानं च शृणु कल्पलयावपि… 1341–1350
- पासतक न फटक सकेंगे || १० || तुम इस प्रकार अनुसंधान -चिन्तन करो कि ' मैं ही सर्वाधिष्ठान परब्रह्म हूँ । सर्वाधिष्ठान ब्रह्म मैं ही हूँ… 1351–1360
- बाष्कलाय च सोऽप्याह शिष्येभ्यः संहितां स्वकाम् । ५४ चतुर्धा व्यस्य बोध्याय याज्ञवल्क्याय भार्गव । पराशरायाग्निमित्रे इन्द्रप्रमितिरात्मवान्… 1361–1370
- प्रसंग सुनने और पढ़नेवालोंके ब्रह्मतेजकी अभिवृद्धि करता इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः… 1371–1380
- यत् सात्वताः पुरुषरूपमुशन्ति सत्त्वं लोको यतोऽभयमुतात्मसुखं न चान्यत् । ४६ तस्मै नमो भगवते पुरुषाय भूम्ने विश्वाय विश्वगुरवे परदेवतायै… 1381–1390
- व्याघ्रचर्माम्बरधरं शूलखट्वांगचर्मभिः । अक्षमालाडमरुककपालासिधनुः सह । १२ बिभ्राणं सहसा भातं विचक्ष्य हृदि विस्मितः । किमिदं कुत एवेति समाधेर्विरतो मुनिः… 1391–1400
- श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिधु- ग्राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य । गोविन्द गोपवनिताव्रजभृत्यगीत- तीर्थश्रवः श्रवणमंगल पाहि भृत्यान्… 1401–1410
- गोवर्द्धनधारणकी लीला करनेपर इन्द्र और कामधेनुने आकर भगवान्का यज्ञाभिषेक किया । शरद् ऋतुकी रात्रियोंमें व्रजसुन्दरियोंके साथ रास- क्रीडा की । ३२… 1411–1420
- चौबीस हजार है । ४ । श्रीमद्भागवतमें अठारह हजार, नारदपुराणमें पचीस हजार, मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा अग्निपुराणमें पन्द्रह हजार चार सौ श्लोक हैं || ५ ||… 1421–1430
- एकमात्र भगवान्को पानेकी इच्छा रखते हैं - उनकी अन्तरंग- लीलामें अपना प्रवेश चाहते हैं । तीसरी श्रेणीमें देवता आदि हैं… 1431–1440
- ऋते कृष्णप्रकाशं तु स्वात्मबोधो न कस्यचित् । तत्प्रकाशस्तु जीवानां मायया पिहितः सदा । ९ अष्टाविंशे द्वापरान्ते स्वयमेव यदा हरिः… 1441–1450
- चन्द्रे कलाप्रभारूपमात्मानं वीक्ष्य विस्मिताः । स्वप्रेष्ठविरहव्याधिविमुक्ताः स्वपदं ययुः । ७१ येऽन्ये च तत्र ते सर्वे नित्यलीलान्तरं गताः… 1451–1460
- श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कीरेण भाषितम् । ४८ प्रतिदिन कथाके अन्तमें कीर्तन करे और कथासमाप्तिके दिन रात्रिमें जागरण करे… 1461–1470
- अध्याय योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध १ or ४ ९ ७१ २r ६ १३ ६१ ३mr ९ ७ ५२ ४x १० ३४ ५१ 5 १० ७३ ३ ९ w १० ९ ० * १७ 9 १२ १३ * ४४ ( १३ ) एकाहपारायण ( एक… 1471–1480
- अध्याय योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध ३mr ५ ९ ३३ ४x ६ १ ९ * ३६ ५5 ८ २४ * ३ ९ w १० ११ ३५ 9 १० ४५ ३४ ८vr १० ७९ ३४ ९ ११ २३ ३४ १० १२ १३ * २१ ( ३४ )… 1481–1490
- अध्याय योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध ७ ५ २६ * २० ८ ६ १३ १३ ९ १३ १ ९ १० ८ १६ १८ ११ ९ १३ २१ १२ १० ८ १ ९ १३ १० २५ १७ १४ ४६ २१ १५ १० ६४ १८ १६ १० ७७ १३… 1491–1500
- अध्याय योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध १३ ८ ११ १३ १४ ८ २२ ११ १५ ९ १६ १८ १६ १० ७ १५ १७ १० १९ १२ १८ १० ३५ १६ १ ९ १० ४८ १३ २० १० ५ ९ ११ २१ १० ७२ १३ २२ १०… 1501–1510
- विश्रामस्थल -स्कन्ध अध्याय योग अध्याय ३MY २३ ११ ४x ९ १ ९ ४x २०22 ११ ४x २२ १२ ५5 १ १० ५5 १० ९ I5 २० १० w १५ w १६ I ७9 ७99 १० ८ v ९ १५ १४ ९ १३ 2 १० ६ १० ६… 1511–1520