श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1071–1080
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080
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जिसका अज्ञान निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, वह यदि मनमाने ढंगसे वेदोक्त कर्मोंका परित्याग कर देता है, तो वह विहित कर्मोंका आचरण न करनेके कारण विकर्मरूप अधर्म ही करता है। इसलिये वह मृत्युके बाद फिर मृत्युको प्राप्त होता है ॥४५ ॥
इसलिये फलकी अभिलाषा छोड़कर और विश्वात्मा भगवान्को समर्पित कर जो वेदोक्त कर्मका ही अनुष्ठान करता है, उसे कर्मोंकी निवृत्तिसे प्राप्त होनेवाली ज्ञानरूप सिद्धि मिल जाती है । जो वेदोंमें स्वर्गादिरूप फलका वर्णन है, उसका तात्पर्य फलकी सत्यतामें नहीं है, वह तो कर्मोंमें रुचि उत्पन्न करानेके लिये है ॥४६ ॥
राजन्! जो पुरुष चाहता है कि शीघ्र से शीघ्र मेरे ब्रह्मस्वरूप आत्माकी हृदय-ग्रन्थि— मैं और मेरेकी कल्पित गाँठ खुल जाय, उसे चाहिये कि वह वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियोंसे भगवान्की आराधना करे ॥४७ ॥
पहले सेवा आदिके द्वारा गुरुदेवकी दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके द्वारा अनुष्ठानकी विधि सीखे; अपनेको भगवान्की जो मूर्ति प्रिय लगे, अभीष्ट जान पड़े, उसीके द्वारा पुरुषोत्तम भगवान्की पूजा करे ॥४८ ॥
पहले स्नानादिसे शरीर और सन्तोष आदिसे अन्तः- करणको शुद्ध करे, इसके बाद भगवान्की मूर्तिके सामने बैठकर प्राणायाम आदिके द्वारा भूतशुद्धि–नाडी- शोधन करे, तत्पश्चात् विधिपूर्वक मन्त्र, देवता आदिके न्याससे अंगरक्षा करके भगवान्की पूजा करे ॥४९ ॥
अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकैः ।
द्रव्यक्षित्यात्मलिंगानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥५०
पाद्यादीनुपकल्प्याथ सन्निधाप्य समाहितः ।
हृदादिभिः कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत् ॥५१
सांगोपांगां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रतः ।
पाद्यार्ध्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः ॥ ५२
गन्धमाल्याक्षतस्रग्भिर्धूपदीपोपहारकैः ।
सांगं सम्पूज्य विधिवत् स्तवैः स्तुत्वा नमेद्धरिम् ॥५३
आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः ।
शेषामाधाय शिरसि स्वधाम्नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥५४
एवमग्न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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यजतीश्वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥५५ पहले पुष्प आदि पदार्थोंका जन्तु आदि निकालकर, पृथ्वीको सम्मार्जन आदिसे, अपनेको अव्यग्र होकर और भगवान्की मूर्तिको पहलेहीकी पूजाके लगे हुए पदार्थोंके क्षालन आदिसे पूजाके योग्य बनाकर फिर आसनपर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जल छिड़ककर पाद्य, अर्घ्य आदि पात्रोंको स्थापित करे । तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर हृदयमें भगवान्का ध्यान करके फिर उसे सामनेकी श्रीमूर्तिमें चिन्तन करे । तदनन्तर हृदय, सिर, शिखा (हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा) इत्यादि मन्त्रोंसे न्यास करे और अपने इष्टदेवके मूलमन्त्रके द्वारा देश, काल आदिके अनुकूल प्राप्त पूजा- सामग्रीसे प्रतिमा आदिमें अथवा हृदयमें भगवान्की पूजा करे ॥५०-५१ ॥ अपने - अपने उपास्यदेवके विग्रहकी हृदयादि अंग, आयुधादि उपांग और पार्षदोंसहित उसके मूलमन्त्रद्वारा पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, पुष्प, दधि- अक्षतके * तिलक, माला, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे विधिवत् पूजा करे तथा फिर स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके सपरिवार भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करे ॥ ५२-५३ ॥ अपने - आपको भगवन्मय ध्यान करते हुए ही भगवान्की मूर्तिका पूजन करना चाहिये । निर्माल्यको अपने सिरपर रखे और आदरके साथ भगवद्विग्रहको यथास्थान स्थापित कर पूजा समाप्त करनी चाहिये ॥५४ ॥
इस प्रकार जो पुरुष अग्नि, सूर्य, जल, अतिथि और अपने हृदयमें आत्मरूप श्रीहरिकी पूजा करता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है ॥५५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः ॥३ ॥
* जिसमें शब्दार्थ कुछ और मालूम दे और तात्पर्यार्थ कुछ और हो — उसे परोक्षवाद कहते हैं । * विष्णुभगवान्की पूजामें अक्षतोंका प्रयोग केवल तिलकालंकारमें ही करना चाहिये, पूजामें नहीं - 'नाक्षतैरर्चयेद् विष्णुं न केतक्या महेश्वरम | ' ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ चतुर्थोऽध्यायः भगवान्के अवतारोंका वर्णन राजोवाच
यानि यानीह कर्माणि यैर्यैः स्वच्छन्दजन्मभिः ।
चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तु नः ॥१
द्रुमिल उवाच यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ता- ननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धिः । रजांसि भूमेर्गणयेत् कथंचित् कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्नः ॥२ भूतैर्यदा पंचभिरात्मसृष्टैः
पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।
स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधान- मवाप नारायण आदिदेवः ॥३
यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानं स्वतः श्वसनतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥४ आदावभूच्छतधृती रजसास्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥५ राजा निमिने पूछा- योगीश्वरो! भगवान् स्वतन्त्रतासे अपने भक्तोंकी भक्तिके वश होकर अनेकों प्रकारके अवतार ग्रहण करते हैं और अनेकों लीलाएँ करते हैं । आपलोग कृपा करके भगवान्की उन लीलाओंका वर्णन कीजिये, जो वे अबतक कर चुके हैं, कर रहे हैं या करेंगे ॥१ ॥
अब सातवें योगीश्वर द्रुमिलजीने कहा- राजन्! भगवान् अनन्त हैं । उनके गुण भी अनन्त हैं । जो यह सोचता है कि मैं उनके गुणोंको गिन लूँगा, वह मूर्ख है, बालक है । यह तो सम्भव है कि कोई किसी प्रकार पृथ्वीके धूलि- कणोंको गिन ले, परन्तु समस्त शक्तियोंके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आश्रय भगवान्के अनन्त गुणोंका कोई कभी किसी प्रकार पार नहीं पा सकता ॥२ ॥
भगवान्ने ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश-इन पाँच भूतोंकी अपने - आपसे अपने-आपमें सृष्टि की है । जब वे इनके द्वारा विराट् शरीर, ब्रह्माण्डका निर्माण करके उसमें लीलासे अपने अंश अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करते हैं, ( भोक्तारूपसे नहीं, क्योंकि भोक्ता तो अपने पुण्योंके फलस्वरूप जीव ही होता है ) तब उन आदिदेव नारायणको ' पुरुष ' नामसे कहते हैं, यही उनका पहला अवतार है ॥३ ॥ उन्हींके इस विराट् ब्रह्माण्ड शरीरमें तीनों लोक स्थित हैं ।
उन्हींकी इन्द्रियोंसे समस्त देहधारियोंकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ बनी हैं । उनके स्वरूपसे ही स्वतःसिद्ध ज्ञानका संचार होता है। उनके श्वास-प्रश्वाससे सब शरीरोंमें बल आता है तथा इन्द्रियोंमें ओज ( इन्द्रियोंकी शक्ति) और कर्म करनेकी शक्ति प्राप्त होती है । उन्हींके सत्त्व आदि गुणोंसे संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय होते हैं । इस विराट् शरीरके जो शरीरी हैं, वे ही आदिकर्ता नारायण हैं ॥४ ॥ पहले -पहल जगत्की उत्पत्तिके लिये उनके रजोगुणके
अंशसे ब्रह्मा हुए, फिर वे आदिपुरुष ही संसारकी स्थितिके लिये अपने सत्त्वांशसे धर्म तथा ब्राह्मणोंके रक्षक यज्ञपति विष्णु बन गये । फिर वे ही तमोगुणके अंशसे जगत्के संहारके लिये रुद्र बने । इस प्रकार निरन्तर उन्हींसे परिवर्तनशील प्रजाकी उत्पत्ति- स्थिति और संहार होते रहते हैं ॥५ ॥
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां नारायणो नर ऋषिप्रवरः प्रशान्तः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्म योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ इन्द्रो विशङ्क्य मम धाम जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप्रेक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥७ विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेवः प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान् । मा भैष्ट भो मदन मारुत देववध्वो गृह्णीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम् ॥८ इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवाः सव्रीडनम्रशिरसः सघृणं तमूचुः । नैतद् विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे ॥९ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम था मूर्ति । वह धर्मकी पत्नी थी । उसके गर्भसे भगवान्ने ऋषिश्रेष्ठ शान्तात्मा ' नर' और ' नारायण ' के रूपमें अवतार लिया । उन्होंने आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले उस भगवदाराधनरूप कर्मका उपदेश किया, जो वास्तवमें कर्मबन्धनसे छुड़ानेवाला और नैष्कर्म्य स्थितिको प्राप्त करानेवाला है । उन्होंने स्वयं भी वैसे ही कर्मका अनुष्ठान किया । बड़े - बड़े ऋषि- मुनि उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं । वे आज भी बदरिकाश्रममें उसी कर्मका आचरण करते हुए विराजमान हैं ॥६ ॥ ये
अपनी घोर तपस्याके द्वारा मेरा धाम छीनना चाहते हैं – इन्द्रने ऐसी आशंका करके स्त्री, वसन्त आदि दल- बलके साथ कामदेवको उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये भेजा । कामदेवको भगवान्की महिमाका ज्ञान न था; इसलिये वह अप्सरागण, वसन्त तथा मन्द- सुगन्ध वायुके साथ बदरिकाश्रममें जाकर स्त्रियोंके कटाक्ष बाणोंसे उन्हें घायल करनेकी चेष्टा करने लगा ॥७ ॥ आदिदेव नर-नारायणने यह जानकर कि यह इन्द्रका कुचक्र है, भयसे
काँपते हुए काम आदिकोंसे हँसकर कहा - उस समय उनके मनमें किसी प्रकारका अभिमान या आश्चर्य नहीं था । 'कामदेव, मलय- मारुत और देवांगनाओ! तुमलोग डरो मत; हमारा आतिथ्य स्वीकार करो । अभी यहीं ठहरो, हमारा आश्रम सूना मत करो ' ॥ ८ ॥ राजन्! जब
नर- नारायण ऋषिने उन्हें अभयदान देते हुए इस प्रकार कहा, तब कामदेव आदिके सिर लज्जासे झुक गये । उन्होंने दयालु भगवान् नर- नारायणसे कहा – ' प्रभो! आपके लिये यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । क्योंकि आप मायासे परे और निर्विकार हैं । बड़े - बड़े आत्माराम और धीर पुरुष निरन्तर आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करते रहते हैं ॥९ ॥ आपके भक्त
आपकी भक्तिके प्रभावसे देवताओंकी राजधानी अमरावतीका उल्लंघन करके आपके परम-पदको प्राप्त होते हैं । इसलिये जब वे भजन करने लगते हैं, तब देवतालोग तरह - तरहसे उनकी साधनामें विघ्न डालते हैं । किन्तु जो लोग केवल कर्मकाण्डमें लगे रहकर यज्ञादिके द्वारा देवताओंको बलिके रूपमें उनका भाग देते रहते हैं, उन लोगोंके मार्गमें वे किसी प्रकारका विघ्न नहीं डालते। परन्तु प्रभो! आपके भक्तजन उनके द्वारा उपस्थित की हुई विघ्न - बाधाओंसे गिरते नहीं । बल्कि आपके करकमलोंकी छत्रछायामें रहते हुए वे विघ्नोंके सिरपर पैर रखकर आगे बढ़ जाते हैं, अपने लक्ष्यसे च्युत नहीं होते ॥१० ॥
त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः स्वौको विलङ्घ्य परमं व्रजतां पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददतः स्वभागान् धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि ॥ १०
क्षुत्तृत्रिकालगुणमारुतजैह्वयशैश्न्या- नस्मानपारजलधीनतितीर्य केचित् ।
क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गो- र्मज्जन्ति दुश्चरतपश्च वृथोत्सृजन्ति ॥११
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इति प्रगृणतां तेषां स्त्रियोऽत्यद्भुतदर्शनाः ।
दर्शयामास शुश्रूषां स्वर्चिताः कुर्वतीर्विभुः ॥ १२
ते देवानुचरा दृष्ट्वा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणीः ।
गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रियः ॥१३
तानाह देवदेवेशः प्रणतान् प्रहसन्निव ।
आसामेकतमां वृङ्क्ष्वं सवर्णां स्वर्गभूषणाम् ॥१४
ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिनः ।
उर्वशीमप्सरःश्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवं ययुः ॥१५
बहुत- से लोग तो ऐसे होते हैं जो भूख- प्यास, गर्मी - सर्दी एवं आँधी- पानीके कष्टोंको तथा रसनेन्द्रिय और जननेन्द्रियके वेगोंको, जो अपार समुद्रोंके समान हैं, सह लेते हैं- पार कर जाते हैं । परन्तु फिर भी वे उस क्रोधके वशमें हो जाते हैं, जो गायके खुरसे बने गड्ढेके समान है और जिससे कोई लाभ नहीं है— आत्मनाशक है । और प्रभो! वे इस प्रकार अपनी कठिन तपस्याको खो बैठते हैं ॥११ ॥ जब कामदेव, वसन्त आदि देवताओंने इस प्रकार स्तुति की
तब सर्वशक्तिमान् भगवान्ने अपने योगबलसे उनके सामने बहुत-सी ऐसी रमणियाँ प्रकट करके दिखलायीं, जो अद्भुत रूप लावण्यसे सम्पन्न और विचित्र वस्त्रालंकारोंसे सुसज्जित थीं तथा भगवान्की सेवा कर रही थीं ॥१२ ॥ जब देवराज इन्द्रके अनुचरोंने उन लक्ष्मीजीके
समान रूपवती स्त्रियोंको देखा, तब उनके महान् सौन्दर्यके सामने उनका चेहरा फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे निकलनेवाली दिव्य सुगन्धसे मोहित हो गये ॥ १३ ॥
अब उनका सिर झुक गया। देवदेवेश भगवान् नारायण हँसते हुए- से उनसे बोले — ' तुमलोग इनमेंसे किसी एक स्त्रीको, जो तुम्हारे अनुरूप हो, ग्रहण कर लो । वह तुम्हारे स्वर्ग- लोककी शोभा बढ़ानेवाली होगी ॥ १४ ॥ देवराज इन्द्रके अनुचरोंने ' जो आज्ञा' कहकर भगवान्के
आदेशको स्वीकार किया तथा उन्हें नमस्कार किया। फिर उनके द्वारा बनायी हुई स्त्रियोंमेंसे श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशीको आगे करके वे स्वर्गलोकमें गये ॥१५ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने इन्द्रको
नमस्कार किया तथा भरी सभामें देवताओंके सामने भगवान् नर- नारायणके बल और प्रभावका वर्णन किया । उसे सुनकर देवराज इन्द्र अत्यन्त भयभीत और चकित हो गये ॥१६ ॥
इन्द्रायानम्य सदसि शृण्वतां त्रिदिवौकसाम् ।
ऊचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मितः ॥१६
हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विष्णुः शिवाय जगतां कलयावतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥१७ गुप्तोऽप्यये मनुरिलौषधयश्च मात्स्ये क्रौडे हतो दितिज उद्धरताम्भसः क्ष्माम् । कौर्मे धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे ग्राहात् प्रपन्नमिभराजममुञ्चदार्तम् ॥१८ संस्तुन्वतोऽब्धिपतिताञ्छ्रमणानृषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥१९ भगवान् विष्णुने अपने स्वरूपमें एकरस स्थित रहते हुए भी सम्पूर्ण जगत्के कल्याणके लिये बहुत- से कलावतार ग्रहण किये हैं । विदेहराज! हंस, दत्तात्रेय, सनक- सनन्दन- सनातन-सनत्कुमार और हमारे पिता ऋषभके रूपमें अवतीर्ण होकर उन्होंने आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका उपदेश किया है । उन्होंने ही हयग्रीव अवतार लेकर मधु- कैटभ नामक असुरोंका संहार करके उन लोगोंके द्वारा चुराये हुए वेदोंका उद्धार किया है ॥१७ ॥ प्रलयके समय
मत्स्यावतार लेकर उन्होंने भावी मनु सत्यव्रत, पृथ्वी और ओषधियोंकी – धान्यादिकी रक्षा की और वराहावतार ग्रहण करके पृथ्वीका रसातलसे उद्धार करते समय हिरण्याक्षका संहार किया । कूर्मावतार ग्रहण करके उन्हीं भगवान्ने अमृत-मन्थनका कार्य सम्पन्न करनेके लिये अपनी पीठपर मन्दराचल धारण किया और उन्हीं भगवान् विष्णुने अपने शरणागत एवं आर्त भक्त गजेन्द्रको ग्राहसे छुड़ाया ॥१८ ॥
एक बार वालखिल्य ऋषि तपस्या करते - करते अत्यन्त दुर्बल हो गये थे । वे जब कश्यप ऋषिके लिये समिधा ला रहे थे तो थककर गायके खुरसे बने हुए गड्ढे में गिर पड़े, मानो समुद्रमें गिर गये हों । उन्होंने जब स्तुति की, तब भगवान्ने अवतार लेकर उनका उद्धार किया । वृत्रासुरको मारनेके कारण जब इन्द्रको ब्रह्महत्या लगी और वे उसके भयसे भागकर छिप गये, तब भगवान्ने उस हत्यासे इन्द्रकी रक्षा की; और जब असुरोंने अनाथ देवांगनाओंको बंदी बना लिया, तब भी भगवान्ने ही उन्हें असुरोंके चंगुलसे छुड़ाया । जब हिरण्यकशिपुके कारण प्रह्लाद आदि संत पुरुषोंको भय पहुँचने लगा तब उनको निर्भय करनेके लिये भगवान्ने नृसिंहावतार ग्रहण किया और हिरण्यकशिपुको मार डाला ॥ १ ९ ॥ उन्होंने देवताओंकी रक्षाके लिये देवासुर संग्राममें दैत्यपतियोंका वध किया और विभिन्न मन्वन्तरोंमें अपनी शक्तिसे अनेकों कलावतार धारण करके त्रिभुवनकी रक्षा की । फिर वामन-अवतार ग्रहण करके उन्होंने याचनाके बहाने इस पृथ्वीको दैत्यराज बलिसे छीन लिया और अदितिनन्दन देवताओंको दे दिया || २० || परशुराम अवतार ग्रहण करके उन्होंने ही पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियहीन किया । परशुरामजी तो हैहय वंशका प्रलय करनेके लिये मानो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भृगुवंशमें अग्नि रूपसे ही अवतीर्ण हुए थे । उन्हीं भगवान्ने रामावतारमें समुद्रपर पुल बाँधा एवं रावण और उसकी राजधानी लंकाको मटियामेट कर दिया । उनकी कीर्ति समस्त लोकोंके मलको नष्ट करनेवाली है । सीतापति भगवान् राम सदा- सर्वदा, सर्वत्र विजयी- ही विजयी हैं ॥२१ ॥ राजन्! अजन्मा होनेपर भी पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वे ही भगवान् यदुवंशमें
जन्म लेंगे और ऐसे - ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े- बड़े देवता भी नहीं कर सकते । फिर आगे चलकर भगवान् ही बुद्धके रूपमें प्रकट होंगे और यज्ञके अनधिकारियोंको यज्ञ करते देखकर अनेक प्रकारके तर्क - वितर्कोंसे मोहित कर लेंगे और कलियुगके अन्तमें कल्कि अवतार लेकर वे ही शूद्र राजाओंका वध करेंगे || २२ || महाबाहु विदेहराज! भगवान्की कीर्ति अनन्त है । महात्माओंने जगत्पति भगवान्के ऐसे- ऐसे अनेकों जन्म और कर्मोंका प्रचुरतासे गान भी किया है ॥२३ ॥
देवासुरे युधि च दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वान्तरेषु भुवनान्यदधात् कलाभिः । भूत्वाथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां याच्ञाच्छलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥२० निःक्षत्रियामकृत गां च त्रिः सप्तकृत्वो रामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्गवाग्निः । सोऽब्धिं बबन्ध दशवक्त्रमहन् सलङकं सीतापतिर्जयति लोकमलघ्नकीर्तिः ॥२१ भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि । वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान् कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते ॥ २२
एवंविधानि कर्माणि जन्मानि च जगत्पतेः ।
भूरीणि भूरियशसो वर्णितानि महाभुज ॥ २३
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥
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अथ पञ्चमोऽध्यायः भक्तिहीन पुरुषोंकी गति और भगवान्की पूजाविधिका वर्णन राजोवाच
भगवन्तं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमाः ।
तेषामशान्तकामानां का निष्ठाविजितात्मनाम् ॥१
राजा निमिने पूछा — योगीश्वरो! आपलोग तो श्रेष्ठ आत्मज्ञानी और भगवान्के परमभक्त हैं । कृपा करके यह बतलाइये कि जिनकी कामनाएँ शान्त नहीं हुई हैं, लौकिक-पारलौकिक भोगोँकी लालसा मिटी नहीं है और मन एवं इन्द्रियाँ भी वशमें नहीं हैं तथा जो प्रायः भगवान्का भजन भी नहीं करते, ऐसे लोगोंकी क्या गति होती है? ॥१ ॥
चमस उवाच
मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह ।
चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥२
य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम् ।
न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद् भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥३
दूरेहरिकथाः केचिद् दूरेचाच्युतकीर्तनाः ।
स्त्रियः शूद्रादयश्चैव तेऽनुकम्प्या भवादृशाम् ॥४
विप्रो राजन्यवैश्यौ च हरेः प्राप्ताः पदान्तिकम् ।
श्रौतेन जन्मनाथापि मुह्यन्त्याम्नायवादिनः ॥५
कर्मण्यकोविदाः स्तब्धा मूर्खाः पण्डितमानिनः ।
वदन्ति चाटुकान् मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुकाः ॥६
रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अहिमन्यवः ।
दाम्भिका मानिनः पापा विहसन्त्यच्युतप्रियान् ॥७
वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितस्त्रियो गृहेषु मैथुन्यपरेषु चाशिषः । अब आठवें योगीश्वर चमसजीने कहा- राजन्! विराट् पुरुषके मुखसे सत्त्वप्रधान ब्राह्मण, भुजाओंसे सत्त्व-रजप्रधान क्षत्रिय, जाँघोंसे रज-तम-प्रधान वैश्य और चरणोंसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तमःप्रधान शूद्रकी उत्पत्ति हुई है । उन्हींकी जाँघोंसे गृहस्थाश्रम, हृदयसे ब्रह्मचर्य, वक्षःस्थलसे वानप्रस्थ और मस्तकसे संन्यास – ये चार आश्रम प्रकट हुए हैं । इन चारों वर्णों और आश्रमोंके जन्मदाता स्वयं भगवान् ही हैं । वही इनके स्वामी, नियन्ता और आत्मा भी हैं । इसलिये इन वर्ण और आश्रममें रहनेवाला जो मनुष्य भगवान्का भजन नहीं करता, बल्कि उलटा उनका अनादर करता है, वह अपने स्थान, वर्ण, आश्रम और मनुष्य योनिसे भी च्युत हो जाता है; उसका अधःपतन हो जाता है ॥२-३ ॥ बहुत- सी स्त्रियाँ और शूद्र आदि भगवान्की कथा और उनके नामकीर्तन आदिसे कुछ दूर पड़ गये हैं । वे आप- जैसे भगवद्भक्तोंकी दयाके पात्र हैं । आपलोग उन्हें कथा - कीर्तनकी सुविधा देकर उनका उद्धार करें || ४ || ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जन्मसे, वेदाध्ययनसे तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारोंसे भगवान्के चरणोंके निकटतक पहुँच चुके हैं । फिर भी वे वेदोंका असली तात्पर्य न समझकर अर्थवादमें लगकर मोहित हो जाते हैं || ५ || उन्हें कर्मका रहस्य मालूम नहीं है । मूर्ख होनेपर भी वे अपनेको पण्डित मानते हैं और अभिमानमें अकड़े रहते हैं । वे मीठी- मीठी बातोंमें भूल जाते हैं और केवल वस्तु- शून्य शब्द - माधुरीके मोहमें पड़कर चटकीली - भड़कीली बातें कहा करते हैं ॥६ ॥
रजोगुणकी अधिकताके कारण उनके संकल्प बड़े घोर होते हैं । कामनाओंकी तो सीमा ही नहीं रहती, उनका क्रोध भी ऐसा होता है जैसे साँपका, बनावट और घमंडसे उन्हें प्रेम होता है । वे पापीलोग भगवान्के प्यारे भक्तोंकी हँसी उड़ाया करते हैं ॥७ ॥ वे मूर्ख बड़े - बूढ़ोंकी
नहीं, स्त्रियोंकी उपासना करते हैं । यही नहीं, वे परस्पर इकट्ठे होकर उस घर - गृहस्थीके सम्बन्धमें ही बड़े - बड़े मनसूबे बाँधते हैं, जहाँका सबसे बड़ा सुख स्त्री- सहवासमें ही सीमित है । वे यदि कभी यज्ञ भी करते हैं तो अन्न-दान नहीं करते, विधिका उल्लंघन करते और दक्षिणातक नहीं देते । वे कर्मका रहस्य न जाननेवाले मूर्ख केवल अपनी जीभको सन्तुष्ट करने और पुष्टकरनेके लिये बेचारे —धन - वैभवपेटकीभूख, कुलीनतामिटाने, विद्याशरीरको, दान, सौन्दर्य, बल और कर्म आदिकेपशुओंकीघमंडसेहत्या अंधेकरतेहोहैंजाते॥८ ॥हैं
तथा वे दुष्ट उन भगवत्प्रेमी संतों तथा ईश्वरका भी अपमान करते रहते हैं ॥९ ॥ राजन्! वेदोंने
इस बातको बार- बार दुहराया है कि भगवान् आकाशके समान नित्य- निरन्तर समस्त शरीरधारियोंमें स्थित हैं । वे ही अपने आत्मा और प्रियतम हैं । परन्तु वे मूर्ख इस वेदवाणीको तो सुनते ही नहीं और केवल बड़े -बड़े मनोरथोंकी बात आपसमें कहते - सुनते रहते हैं ॥१० ॥
( वेद विधिके रूपमें ऐसे ही कर्मोंके करनेकी आज्ञा देता है कि जिनमें मनुष्यकी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं होती । ) संसारमें देखा जाता है कि मैथुन, मांस और मद्यकी ओर प्राणीकी स्वाभाविक प्रवृति हो जाती है । तब उसे उसमें प्रवृत्त करनेके लिये विधान तो हो ही नहीं सकता । ऐसी स्थितिमें विवाह, यज्ञ और सौत्रामणि यज्ञके द्वारा ही जो उनके सेवनकी व्यवस्था दी गयी है, उसका अर्थ है लोगोंकी उच्छृंखल प्रवृत्तिका नियन्त्रण, उनका मर्यादामें स्थापन । वास्तवमें उनकी ओरसे लोगोंको हटाना ही श्रुतिको अभीष्ट है ॥११ ॥ धनका
एकमात्र फल है धर्म; क्योंकि धर्मसे ही परम तत्त्वका ज्ञान और उसकी निष्ठा- अपरोक्ष अनुभूति सिद्ध होती है और निष्ठामें ही परम शान्ति है । परन्तु यह कितने खेदकी बात है कि लोग उस धनका उपयोग घर- गृहस्थीके स्वार्थोंमें या कामभोगमें ही करते हैं और यह नहीं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******