श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1191–1200

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1191–1200

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नैष्ठिक ब्रह्मचारी ब्राह्मण इन नियमोंका पालन करनेसे अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है । तीव्र तपस्याके कारण उसके कर्म - संस्कार भस्म हो जाते हैं, अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और वह मेरा भक्त होकर मुझे प्राप्त कर लेता है ॥३६ ॥

प्यारे उद्धव! यदि नैष्ठिक ब्रह्मचर्य ग्रहण करनेकी इच्छा न हो– गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहता हो, तो विधिपूर्वक वेदाध्ययन समाप्त करके आचार्यको दक्षिणा देकर और उनकी अनुमति लेकर समावर्तन संस्कार करावे - स्नातक बनकर ब्रह्मचर्याश्रम छोड़ दे ॥३७ ॥

ब्रह्मचारीको चाहिये कि ब्रह्मचर्य- आश्रमके बाद गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ आश्रममें प्रवेश करे । यदि ब्राह्मण हो तो संन्यास भी ले सकता है । अथवा उसे चाहिये कि क्रमशः एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें प्रवेश करे। किन्तु मेरा आज्ञाकारी भक्त बिना आश्रमके रहकर अथवा विपरीत क्रमसे आश्रम- परिवर्तन कर स्वेच्छाचारमें न प्रवृत्त हो ॥ ३८ ॥

प्रिय उद्धव! यदि ब्रह्मचर्याश्रमके बाद गृहस्थाश्रम स्वीकार करना हो तो ब्रह्मचारीको चाहिये कि अपने अनुरूप एवं शास्त्रोक्त लक्षणोंसे सम्पन्न कुलीन कन्यासे विवाह करे । वह अवस्थामें अपनेसे छोटी और अपने ही वर्णकी होनी चाहिये । यदि कामवश अन्य वर्णकी कन्यासे और विवाह करना हो तो क्रमशः अपनेसे निम्न वर्णकी कन्यासे विवाह कर सकता है ॥३९ ॥ यज्ञ- यागादि, अध्ययन और दान करनेका अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्योंको

समान -रूपसे है । परन्तु दान लेने, पढ़ाने और यज्ञ करानेका अधिकार केवल ब्राह्मणोंको ही है ॥४० ॥ ब्राह्मणको चाहिये कि इन तीनों वृत्तियोंमें प्रतिग्रह अर्थात् दान लेनेकी वृत्तिको

तपस्या, तेज और यशका नाश करनेवाली समझकर पढ़ाने और यज्ञ करानेके द्वारा ही अपना जीवन- निर्वाह करे और यदि इन दोनों वृत्तियोंमें भी दोषदृष्टि हो- परावलम्बन, दीनता आदि दोष दीखते हों –तो अन्न कटनेके बाद खेतोंमें पड़े हुए दाने बीनकर ही अपने जीवनका निर्वाह कर ले ॥४१ ॥ उद्धव! ब्राह्मणका शरीर अत्यन्त दुर्लभ है । यह इसलिये नहीं है कि

इसके द्वारा तुच्छ विषय - भोग ही भोगे जायँ । यह तो जीवन पर्यन्त कष्ट भोगने, तपस्या करने और अन्तमें अनन्त आनन्दस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति करनेके लिये है ॥४२ ॥

ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते ।

कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥४२

शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो

धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः ।

मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठ- नातिप्रसक्तः समुपैति शान्तिम् ॥४३

समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम् ।

तानुद्धरिष्ये नचिरादापद्भ्यो नौरिवार्णवात् ॥४४

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सर्वाः समुद्धरेद् राजा पितेव व्यसनात् प्रजाः ।

आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान् ॥४५

एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा ।

विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते ॥४६

सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत् ।

खड्गेन वाऽऽपदाक्रान्तो न श्ववृत्त्या कथंचन ॥४७

वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययाऽऽपदि ।

चरेद् वा विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कथंचन ॥४८

जो ब्राह्मण घरमें रहकर अपने महान् धर्मका निष्कामभावसे पालन करता है और खेतोंमें तथा बाजारोंमें गिरे - पड़े दाने चुनकर सन्तोषपूर्वक अपने जीवनका निर्वाह करता है, साथ ही अपना शरीर, प्राण, अन्तःकरण और आत्मा मुझे समर्पित कर देता है और कहीं भी अत्यन्त आसक्ति नहीं करता, वह बिना संन्यास लिये ही परमशान्तिस्वरूप परमपद प्राप्त कर लेता है ॥४३ ॥ जो लोग विपत्तिमें पड़े कष्ट पा रहे मेरे भक्त ब्राह्मणको विपत्तियोंसे बचा लेते हैं,

उन्हें मैं शीघ्र ही समस्त आपत्तियोंसे उसी प्रकार बचा लेता हूँ, जैसे समुद्रमें डूबते हुए प्राणीको नौका बचा लेती है ॥ ४४ ॥ राजा पिताके समान सारी प्रजाका कष्टसे उद्धार करे – उन्हें

बचावे, जैसे गजराज दूसरे गजोंकी रक्षा करता है और धीर होकर स्वयं अपने - आपसे अपना उद्धार करे ॥४५ ॥ जो राजा इस प्रकार प्रजाकी रक्षा करता है, वह सारे पापोंसे मुक्त होकर

अन्त समयमें सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकमें जाता है और इन्द्रके साथ सुख भोगता है ॥४६ ॥ यदि ब्राह्मण अध्यापन अथवा यज्ञ-यागादिसे अपनी जीविका न चला

सके, तो वैश्य - वृत्तिका आश्रय ले ले, और जबतक विपत्ति दूर न हो जाय तबतक करे। यदि बहुत बड़ी आपत्तिका सामना करना पड़े तो तलवार उठाकर क्षत्रियोंकी वृत्तिसे भी अपना काम चला ले, परन्तु किसी भी अवस्थामें नीचोंकी सेवा-जिसे 'श्वानवृत्ति' कहते हैं— न करे ॥४७ ॥ इसी प्रकार यदि क्षत्रिय भी प्रजापालन आदिके द्वारा अपने जीवनका निर्वाह न

कर सके तो वैश्यवृत्ति व्यापार आदि कर ले । बहुत बड़ी आपत्ति हो तो शिकारके द्वारा अथवा विद्यार्थियोंको पढ़ाकर अपनी आपत्तिके दिन काट दें, परन्तु नीचोंकी सेवा, 'श्वानवृत्ति’ का आश्रय कभी न ले ॥४८ ॥ वैश्य भी आपत्तिके समय शूद्रोंकी वृत्ति सेवासे अपना जीवन-निर्वाह कर ले और शूद्र चटाई बुनने आदि कारुवृत्तिका आश्रय ले ले; परन्तु उद्धव! ये सारी

बातें आपत्तिकालके लिये ही हैं । आपत्तिका समय बीत जानेपर निम्नवर्णोंकी वृत्तिसे जीविकोपार्जन करनेका लोभ न करे ॥ ४९ ॥ गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि वेदाध्ययनरूप

ब्रह्मयज्ञ, तर्पणरूप पितृयज्ञ, हवनरूप देवयज्ञ, काकबलि आदि भूतयज्ञ और अन्नदानरूप अतिथियज्ञ आदिके द्वारा मेरे स्वरूपभूत ऋषि, देवता, पितर, मनुष्य एवं अन्य समस्त प्राणियोंकी यथाशक्ति प्रतिदिन पूजा करता रहे ॥५० ॥

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शूद्रवृत्तिं भजेद् वैश्यः शूद्रः कारुकटक्रियाम् ।

कृच्छ्रान्मुक्तो न गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा ॥ ४ ९

वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम् ।

देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपण्यन्वहं यजेत् ॥ ५०

यदृच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा ।

धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून् ॥५१

कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि ।

विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत् ॥५२

पुत्रदाराप्तबन्धूनां संगमः पान्थसंगमः ।

अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा ॥५३

इत्थं परिमृशन्मुक्तो गृहेष्वतिथिवद् वसन् ।

न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहंकृतः ॥५४

कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान् ।

तिष्ठेद् वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेद् ॥५५

गृहस्थ पुरुष अनायास प्राप्त अथवा शास्त्रोक्त रीतिसे उपार्जित अपने शुद्ध धनसे अपने भृत्य, आश्रित प्रजाजनको किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचाते हुए न्याय और विधिके साथ ही यज्ञ करे ॥ ५१ ॥

प्रिय उद्धव! गृहस्थ पुरुष कुटुम्बमें आसक्त न हो । बड़ा कुटुम्ब होनेपर भी भजनमें प्रमाद न करे । बुद्धिमान् पुरुषको यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि जैसे इस लोककी सभी वस्तुएँ नाशवान् हैं, वैसे ही स्वर्गादि परलोकके भोग भी नाशवान् ही हैं ॥ ५२ ॥ यह जो स्त्री-पुत्र,

भाई- बन्धु और गुरुजनोंका मिलना-जुलना है, यह वैसा ही है, जैसे किसी प्याऊपर कुछ बटोही इकट्ठे हो गये हों । सबको अलग- अलग रास्ते जाना है । जैसे स्वप्न नींद टूटनेतक ही रहता है, वैसे ही इन मिलने- जुलनेवालोंका सम्बन्ध ही बस, शरीरके रहनेतक ही रहता है; फिर तो कौन किसको पूछता है ॥५३ ॥ गृहस्थको चाहिये कि इस प्रकार विचार करके घर-गृहस्थीमें फँसे नहीं, उसमें इस प्रकार अनासक्तभावसे रहे मानो कोई अतिथि निवास कर रहा

हो । जो शरीर आदिमें अहंकार और घर आदिमें ममता नहीं करता, उसे घर- गृहस्थीके फंदे बाँध नहीं सकते ॥५४ ॥ भक्तिमान् पुरुष गृहस्थोचित शास्त्रोक्त कर्मोंके द्वारा मेरी आराधना

करता हुआ घरमें ही रहे, अथवा यदि पुत्रवान् हो तो वानप्रस्थ आश्रममें चला जाय या संन्यासाश्रम स्वीकार कर ले ॥ ५५ ॥ प्रिय उद्धव! जो लोग इस प्रकारका गृहस्थजीवन न

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बिताकर घर- गृहस्थीमें ही आसक्त हो जाते हैं, स्त्री, पुत्र और धनकी कामनाओंमें फँसकर हाय- हाय करते रहते और मूढ़तावश स्त्रीलम्पट और कृपण होकर मैं - मेरेके फेरमें पड़ जाते हैं, वे बँध जाते हैं ॥५६ ॥ वे सोचते रहते हैं - हाय! हाय! मेरे माँ- बाप बूढ़े हो गये; पत्नीके बाल-बच्चे अभी छोटे - छोटे हैं, मेरे न रहनेपर ये दीन, अनाथ और दुःखी हो जायँगे; फिर इनका

जीवन कैसे रहेगा? ' ॥५७ ॥ इस प्रकार घर- गृहस्थीकी वासनासे जिसका चित्त विक्षिप्त हो

रहा है, वह मूढ़बुद्धि पुरुष विषयभोगोंसे कभी तृप्त नहीं होता, उन्हींमें उलझकर अपना जीवन खो बैठता है और मरकर घोर तमोमय नरकमें जाता है ॥ ५८ ॥

यस्त्वासक्तमतिर्गेहे पुत्रवित्तैषणातुरः ।

स्त्रैणः कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते ॥५६

अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजाऽऽत्मजाः ।

अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः ॥ ५७

एवं गृहाशयाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम् ।

अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तमः ॥५८

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥

१. तन्ममा० । २. तत्त्वतः सर्व० । १. यस्मात्। २. त्रेतायुगे । ३. त्तत्र। ४. वक्षःस्थलाद्वने वासः संन्यासः शिरसि स्थितः । ५. चारिणीः । ६. आसन्वै गतयो नॄणां । १. विप्रसेवनम् । २. हर्षश्च। ३. न्त्यावसायिनान्। ४. चाग्रयतः । ५. मन्त्रोच्चारे । ६. न विकिरेत्। ७. वृद्धान् सुरानपि । १. च न्यसेद्देहम्। २. सन्ध्योपास्तिर्ममार्चनम् । १. शिल्पौः । १. शूद्रवृत्तिर्भवेद्वैश्यः । २. कारुकटक्रियः ।

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अथाष्टादशोऽध्यायः वानप्रस्थ और संन्यासीके धर्म श्रीभगवानुवाच

वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा ।

वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः ॥ १

कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत् ।

वसीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि च ॥२

केशरोमनखश्मश्रुमलानि बिभृयाद् दतः ।

न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशयः ॥३

ग्रीष्मे तप्येत पंचाग्नीन् वर्षास्वासारषाड् जले ।

आकण्ठमग्नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्चरेत् ॥४

अग्निपक्वं समश्नीयात् कालपक्वमथापि वा ।

उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा ॥ ५

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं – प्रिय उद्धव! यदि गृहस्थ मनुष्य वानप्रस्थ आश्रममें जाना चाहे, तो अपनी पत्नीको पुत्रोंके हाथ सौंप दे अथवा अपने साथ ही ले ले और फिर शान्त चित्तसे अपनी आयुका तीसरा भाग वनमें ही रहकर व्यतीत करे || १ || उसे वनके पवित्र कन्द- मूल और फलोंसे ही शरीर- निर्वाह करना चाहिये; वस्त्रकी जगह वृक्षोंकी छाल पहिने अथवा घास- पात और मृगछालासे ही काम निकाल ले ॥२ ॥ केश, रोएँ, नख और मूँछ-दाढ़ीरूप शरीरके मलको हटावे नहीं । दातुन न करे । जलमें घुसकर त्रिकाल स्नान करे और

धरतीपर ही पड़ रहे ॥३ ॥ ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्नि तपे, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें रहकर वर्षाकी

बौछार सहे । जाड़ेके दिनोंमें गलेतक जलमें डूबा रहे। इस प्रकार घोर तपस्यामय जीवन व्यतीत करे ॥४ ॥ कन्द-मूलोंको केवल आगमें भूनकर खा ले अथवा समयानुसार पके हुए

फल आदिके द्वारा ही काम चला ले । उन्हें कूटनेकी आवश्यकता हो तो ओखलीमें या सिलपर कूट ले, अन्यथा दाँतोंसे ही चबा- चबाकर खा ले || ५ || वानप्रस्थाश्रमीको चाहिये कि कौन- सा पदार्थ कहाँसे लाना चाहिये, किस समय लाना चाहिये, कौन- कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं— इन बातोंको जानकर अपने जीवन -निर्वाहके लिये स्वयं ही सब प्रकारके कन्द - मूल - फल आदि ले आवे । देश- काल आदिसे अनभिज्ञ लोगोंसे लाये हुए अथवा दूसरे समयके संचित पदार्थोंको अपने काममें न ले * || ६ || नीवार आदि जंगली अन्नसे ही चरु - पुरोडाश आदि तैयार करे और उन्हींसे समयोचित आग्रयण आदि वैदिक कर्म करे । वानप्रस्थ हो जानेपर

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वेदविहित पशुओंद्वारा मेरा यजन न करे ॥७ ॥ वेदवेत्ताओंने वानप्रस्थीके लिये अग्निहोत्र,

दर्श, पौर्णमास और चातुर्मास्य आदिका वैसा ही विधान किया है, जैसा गृहस्थोंके लिये है ॥८ ॥ इस प्रकार घोर तपस्या करते - करते मांस सूख जानेके कारण वानप्रस्थीकी एक-एक

नस दीखने लगती है । वह इस तपस्याके द्वारा मेरी आराधना करके पहले तो ऋषियोंके लोकमें जाता है और वहाँसे फिर मेरे पास आ जाता है; क्योंकि तप मेरा ही स्वरूप है ॥९ ॥

प्रिय उद्धव! जो पुरुष बड़े कष्टसे किये हुए और मोक्ष देनेवाले इस महान् तपस्याको स्वर्ग, ब्रह्मलोक आदि छोटे - मोटे फलोंकी प्राप्तिके लिये करता है, उससे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा? इसलिये तपस्याका अनुष्ठान निष्कामभावसे ही करना चाहिये ॥१० ॥

स्वयं संचिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम् ।

देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम् ॥६

वन्यैश्चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत् कालचोदितान् ।

न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी ॥७

अग्निहोत्रं च दर्शश्च पूर्णमासश्च पूर्ववत् ।

चातुर्मास्यानि च मुनेराम्नातानि च नैगमैः ॥८

एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसन्ततः ।

मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैति माम् ॥९

यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्चीर्णं तपो निःश्रेयसं महत् ।

कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद् बालिशः कोऽपरस्ततः ॥१०

यदासौ नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथुः ।

आत्मन्यग्नीन् समारोप्य मच्चित्तोऽग्निं समाविशेत् ॥११

प्यारे उद्धव! वानप्रस्थी जब अपने आश्रमोचित नियमोंका पालन करनेमें असमर्थ हो जाय, बुढ़ापेके कारण उसका शरीर काँपने लगे, तब यज्ञाग्नियोंको भावनाके द्वारा अपने अन्तःकरणमें आरोपित कर ले और अपना मन मुझमें लगाकर अग्निमें प्रवेश कर जाय । ( यह विधान केवल उनके लिये है, जो विरक्त नहीं हैं ) ॥११ ॥ यदि उसकी समझमें यह बात आ

जाय कि काम्य कर्मोंसे उनके फलस्वरूप जो लोक प्राप्त होते हैं, वे नरकोंके समान ही दुःखपूर्ण हैं और मनमें लोक- परलोकसे पूरा वैराग्य हो जाय तो विधिपूर्वक यज्ञाग्नियोंका परित्याग करके संन्यास ले ले ॥१२ ॥ जो वानप्रस्थी संन्यासी होना चाहे, वह पहले

वेदविधिके अनुसार आठों प्रकारके श्राद्ध और प्राजापत्य यज्ञसे मेरा यजन करे । इसके बाद अपना सर्वस्व ऋत्विजको दे दे । यज्ञाग्नियोंको अपने प्राणोंमें लीन कर ले और फिर किसी भी

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स्थान, वस्तु और व्यक्तियोंकी अपेक्षा न रखकर स्वच्छन्द विचरण करे ॥ १३ ॥ उद्धवजी! जब

ब्राह्मण संन्यास लेने लगता है, तब देवतालोग स्त्री- पुत्रादि सगे - सम्बन्धियोंका रूप धारण करके उसके संन्यास ग्रहणमें विघ्न डालते हैं । वे सोचते हैं कि ' अरे! यह तो हमलोगोंकी अवहेलना कर, हमलोगोंको लाँघकर परमात्माको प्राप्त होने जा रहा है ' ॥१४ ॥

यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु ।

विरागो जायते सम्यङ् न्यस्ताग्निः प्रव्रजेत्ततः ॥१२

इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे ।

अग्नीन् स्वप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ १३

विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः ।

विघ्नान् कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥१४

बिभृयाच्चेन्मुनिर्वासः कौपीनाच्छादनं परम् ।

त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत् किंचिदनापदि ॥१५

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम् ।

सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥१६

मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम् ।

न ह्येते यस्य सन्त्यंग वेणुभिर्न भवेद् यतिः ॥१७

भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्ह्यान् वर्जयंश्चरेत् ।

सप्तागारानसंक्लृप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता ॥ १८

यदि संन्यासी वस्त्र धारण करे तो केवल लँगोटी लगा ले और अधिक -से - अधिक उसके ऊपर एक ऐसा छोटा - सा टुकड़ा लपेट ले कि जिसमें लँगोटी ढक जाय । तथा आश्रमोचित दण्ड और कमण्डलुके अतिरिक्त और कोई भी वस्तु अपने पास न रखे । यह नियम आपत्तिकालको छोड़कर सदाके लिये है ॥ १५ ॥ नेत्रोंसे धरती देखकर पैर रखे, कपड़ेसे

छानकर जल पिये, मुँहसे प्रत्येक बात सत्यपूत- सत्यसे पवित्र हुई ही निकाले और शरीरसे जितने भी काम करे, बुद्धि - पूर्वक - सोच -विचार कर ही करे ॥१६ ॥ वाणीके लिये मौन,

शरीरके लिये निश्चेष्ट स्थिति और मनके लिये प्राणायाम दण्ड हैं । जिसके पास ये तीनों दण्ड नहीं हैं, वह केवल शरीरपर बाँसके दण्ड धारण करनेसे दण्डी स्वामी नहीं हो जाता ॥१७ ॥

संन्यासीको चाहिये कि जातिच्युत और गोघाती आदि पतितोंको छोड़कर चारों वर्णोंकी भिक्षा ले । केवल अनिश्चित सात घरोंसे जितना मिल जाय, उतनेसे ही सन्तोष कर ले ॥१८ ॥ इस

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प्रकार भिक्षा लेकर बस्तीके बाहर जलाशयपर जाय, वहाँ हाथ - पैर धोकर जलके द्वारा भिक्षा पवित्र कर ले; फिर शास्त्रोक्त पद्धतिसे जिन्हें भिक्षाका भाग देना चाहिये, उन्हें देकर जो कुछ बचे उसे मौन होकर खा ले । दूसरे समयके लिये बचाकर न रखे और न अधिक माँगकर ही लाये ॥१९ ॥ संन्यासीको पृथ्वीपर अकेले ही विचरना चाहिये । उसकी कहीं भी आसक्ति न

हो, सब इन्द्रियाँ अपने वशमें हों । वह अपने - आपमें ही मस्त रहे, आत्म-प्रेममें ही तन्मय रहे, प्रतिकूल - से - प्रतिकूल परिस्थितियोंमें भी धैर्य रखे और सर्वत्र समानरूपसे स्थित परमात्माका अनुभव करता रहे ॥२० ॥ संन्यासीको निर्जन और निर्भय एकान्त स्थानमें रहना चाहिये ।

उसका हृदय निरन्तर मेरी भावनासे विशुद्ध बना रहे । वह अपने - आपको मुझसे अभिन्न और अद्वितीय, अखण्डके रूपमें चिन्तन करे ॥२१ ॥ वह अपनी ज्ञाननिष्ठासे चित्तके बन्धन और

मोक्षपर विचार करे तथा निश्चय करे कि इन्द्रियोंका विषयोंके लिये विक्षिप्त होना— चंचल होना बन्धन है और उनको संयममें रखना ही मोक्ष है ॥ २२ ॥ इसलिये संन्यासीको चाहिये कि

मन एवं पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको जीत ले, भोगोंकी क्षुद्रता समझकर उनकी ओरसे सर्वथा मुँह मोड़ ले और अपने - आपमें ही परम आनन्दका अनुभव करे। इस प्रकार वह मेरी भावनासे भरकर पृथ्वीमें विचरता रहे || २३ || केवल भिक्षाके लिये ही नगर, गाँव, अहीरोंकी बस्ती या यात्रियोंकी टोलीमें जाय । पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन और आश्रमोंसे पूर्ण पृथ्वीमें बिना कहीं ममता जोड़े घूमता-फिरता रहे ॥२४ ॥ भिक्षा भी अधिकतर वानप्रस्थियोंके आश्रमसे ही

ग्रहण करे; क्योंकि कटे हुए खेतोंके दानेसे बनी हुई भिक्षा शीघ्र ही चित्तको शुद्ध कर देती है और उससे बचा - खुचा मोह दूर होकर सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥२५ ॥

बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः ।

विभज्य पावितं शेषं भुंजीताशेषमाहृतम् ॥१९

एकश्चरेन्महीमेतां निःसंगः संयतेन्द्रियः ।

आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः ॥ २०

विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाशयः ।

आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनिः ॥२१

अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया ।

बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः ॥ २२

तस्मान्नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनिः ।

विरक्तः क्षुल्लकामेभ्यो लब्ध्वाऽऽत्मनि सुखं महत् ॥२३

पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्चरेत् ।

पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम् ॥२४

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वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत् ।

संसिध्यत्याश्वसंमोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा ॥ २५

नैतद् वस्तुतया पश्येद् दृश्यमानं विनश्यति ।

असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात् ॥२६

विचारवान् संन्यासी दृश्यमान जगत्‌को सत्य वस्तु कभी न समझे; क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही नाशवान् है । इस जगत् में कहीं भी अपने चित्तको लगाये नहीं । इस लोक और परलोकमें जो कुछ करने - पानेकी इच्छा हो, उससे विरक्त हो जाय ॥२६ ॥

यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम् ।

सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत् ॥२७

ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः ।

सलिंगानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः ॥२८

बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत् ।

वदेदुन्मत्तवद् विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत् ॥ २ ९

वेदवादरतो न स्यान्न पाखण्डी न हैतुकः ।

शुष्कवादविवादे न कंचित् पक्षं समाश्रयेत् ॥ ३०

नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्न तु ।

अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचन ।

देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्न केनचित् ॥ ३१

एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः ।

यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च ॥३२

अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्वचित् ।

लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम् ॥३३

संन्यासी विचार करे कि आत्मामें जो मन, वाणी और प्राणोंका संघातरूप यह जगत् है, वह सारा- का - सारा माया ही है । इस विचारके द्वारा इसका बाध करके अपने स्वरूपमें स्थित मुमुक्षु,,होमोक्षकीजाय भीऔरअपेक्षाफिर कभीन रखनेवालाउसका स्मरणमेरा भक्तभी आश्रमोंकीन करे ॥ २७मर्यादामें॥ ज्ञाननिष्ठबद्ध नहींविरक्तहै । वह चाहेऔरतो आश्रमों और उनके चिह्नोंको छोड़-छाड़कर, वेद- शास्त्रके विधि -निषेधोंसे परे होकर स्वच्छन्द

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विचरे ॥२८ ॥ वह बुद्धिमान् होकर भी बालकोंके समान खेले। निपुण होकर भी जडवत् रहे,

विद्वान् होकर भी पागलकी तरह बातचीत करे और समस्त वेद - विधियोंका जानकार होकर भी पशुवृत्तिसे ( अनियत आचारवान्) रहे ॥ २ ९ ॥ उसे चाहिये कि वेदोंके कर्मकाण्ड - भागकी व्याख्यामें न लगे, पाखण्ड न करे, तर्क - वितर्कसे बचे और जहाँ कोरा वाद - विवाद हो रहा हो, वहाँ कोई पक्ष न ले ॥ ३० ॥ वह इतना धैर्यवान् हो कि उसके मनमें किसी भी प्राणीसे उद्वेग न

हो और वह स्वयं भी किसी प्राणीको उद्विग्न न करे । उसकी कोई निन्दा करे, तो प्रसन्नतासे सह ले; किसीका अपमान न करे । प्रिय उद्धव! संन्यासी इस शरीर के लिये किसीसे भी वैर न करे । ऐसा वैर तो पशु करते हैं ॥३१ ॥ जैसे एक ही चन्द्रमा जलसे भरे हुए विभिन्न पात्रोंमें

अलग- अलग दिखायी देता है, वैसे ही एक ही परमात्मा समस्त प्राणियोंमें और अपनेमें भी स्थित है । सबकी आत्मा तो एक है ही, पंचभूतोंसे बने हुए शरीर भी सबके एक ही हैं, क्योंकि सब पांचभौतिक ही तो हैं । ( ऐसी अवस्थामें किसीसे भी वैर- विरोध करना अपना ही वैर-विरोध है ) ॥३२ ॥

प्रिय उद्धव! संन्यासीको किसी दिन यदि समयपर भोजन न मिले, तो उसे दुःखी नहीं होना चाहिये और यदि बराबर मिलता रहे, तो हर्षित न होना चाहिये । उसे चाहिये कि वह धैर्य रखे । मनमें हर्ष और विषाद दोनों प्रकारके विकार न आने दे; क्योंकि भोजन मिलना और न मिलना दोनों ही प्रारब्धके अधीन हैं || ३३ || भिक्षा अवश्य माँगनी चाहिये, ऐसा करना उचित ही है; क्योंकि भिक्षासे ही प्राणोंकी रक्षा होती है । प्राण रहनेसे ही तत्त्वका विचार होता है और तत्त्वविचारसे तत्त्वज्ञान होकर मुक्ति मिलती है ॥३४ ॥ संन्यासीको प्रारब्धके अनुसार अच्छी

या बुरी—– जैसी भी भिक्षा मिल जाय, उसीसे पेट भर ले । वस्त्र और बिछौने भी जैसे मिल जायँ, उन्हींसे काम चला ले । उनमें अच्छेपन या बुरेपनकी कल्पना न करे ॥३५ ॥ जैसे मैं

परमेश्वर होनेपर भी अपनी लीलासे ही शौच आदि शास्त्रोक्त नियमोंका पालन करता हूँ, वैसे ही ज्ञाननिष्ठ पुरुष भी शौच, आचमन, स्नान और दूसरे नियमोंका लीलासे ही आचरण करे । वह शास्त्रविधिके अधीन होकर- विधि -किंकर होकर न करे || ३६ || क्योंकि ज्ञाननिष्ठ पुरुषको भेदकी प्रतीति ही नहीं होती । जो पहले थी, वह भी मुझ सर्वात्माके साक्षात्कारसे नष्ट हो गयी । यदि कभी - कभी मरणपर्यन्त बाधित भेदकी प्रतीति भी होती है, तब भी देहपात हो जानेपर वह मुझसे एक हो जाता है ॥३७ ॥

आहारार्थं समीहेत युक्तं तत् प्राणधारणम् ।

तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते ॥३४

यदृच्छयोपपन्नान्नमद्याच्छ्रेष्ठमुतापरम् ।

तथा वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनिः ॥३५

शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत् ।

अन्यांश्च नियमान् ज्ञानी यथाहं लीलयेश्वरः ॥३६