श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1211–1220

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220

पृष्ठ 1211

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1211 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

खजाना है ॥४२-४३ ॥ जिसके चित्तमें असन्तोष है, अभावका बोध है, वही ' दरिद्र ' है । जो जितेन्द्रिय नहीं है, वही ' कृपण' है । समर्थ, स्वतन्त्र और 'ईश्वर' वह है, जिसकी चित्तवृत्ति विषयोंमें आसक्त नहीं है । इसके विपरीत जो विषयोंमें आसक्त है, वही सर्वथा ' असमर्थ’ है ॥४४ ॥ प्यारे उद्धव! तुमने जितने प्रश्न पूछे थे, उनका उत्तर मैंने दे दिया; इनको समझ

लेना मोक्ष - मार्गके लिये सहायक है । मैं तुम्हें गुण और दोषोंका लक्षण अलग- अलग कहाँतक बताऊँ? सबका सारांश इतनेमें ही समझ लो कि गुणों और दोषोंपर दृष्टि जाना ही सबसे बड़ा दोष है और गुण- दोषोंपर दृष्टि न जाकर अपने शान्त निःसंकल्प स्वरूपमें स्थित रहे — वही सबसे बड़ा गुण है ॥४५ ॥

श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्याः सुखं दुःखसुखात्ययः ।

दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित् ॥४१

मूर्खो देहाद्यहंबुद्धिः पन्था मन्निगमः स्मृतः ।

उत्पथश्चित्तविक्षेपः स्वर्गः सत्त्वगुणोदयः ॥४२

नरकस्तमउन्नाहो बन्धुर्गुरुरहं सखे ।

गृहं शरीरं मानुष्यं गुणाढ्यो ह्याढ्य उच्यते ॥४३

दरिद्रो यस्त्वसन्तुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः ।

गुणेष्वसक्तधीरीशी गुणसंगो विपर्ययः ॥ ४४

एत उद्धव ते प्रश्नाः सर्वे साधु निरूपिताः ।

किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयोः ।

गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ॥४५

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः ॥१९ ॥

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1212

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1212 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ विंशोऽध्यायः ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग उद्धव उवाच

विधिश्च प्रतिषेधश्च निगमो हीश्वरस्य ते ।

अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम् ॥१

उद्धवजीने कहा — कमलनयन श्रीकृष्ण! आप सर्वशक्तिमान् हैं। आपकी आज्ञा ही वेद है; उसमें कुछ कर्मोंको करनेकी विधि है और कुछके करनेका निषेध है । यह विधि-निषेध कर्मोंके गुण और दोषकी परीक्षा करके ही तो होता है ॥१ ॥ वर्णाश्रम- भेद, प्रतिलोम और

अनुलोमरूप वर्णसंकर, कर्मोंके उपयुक्त और अनुपयुक्त द्रव्य, देश, आयु और काल तथा स्वर्ग और नरकके भेदोंका बोध भी वेदोंसे ही होता है ॥२ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि आपकी वाणी

ही वेद है, परन्तु उसमें विधि -निषेध ही तो भरा पड़ा है। यदि उसमें गुण और दोषमें भेद करनेवाली दृष्टि न हो, तो वह प्राणियोंका कल्याण करनेमें समर्थ ही कैसे हो? ॥३ ॥

सर्वशक्तिमान् परमेश्वर! आपकी वाणी वेद ही पितर देवता और मनुष्योंके लिये श्रेष्ठ मार्ग-दर्शकका काम करता है; क्योंकि उसीके द्वारा स्वर्ग- मोक्ष आदि अदृष्ट वस्तुओंका बोध होता है और इस लोकमें भी किसका कौन -सा साध्य है और क्या साधन - इसका निर्णय भी उसीसे होता है ॥४ ॥ प्रभो! इसमें सन्देह नहीं कि गुण और दोषोंमें भेददृष्टि आपकी वाणी वेदके ही

अनुसार है, किसीकी अपनी कल्पना नहीं; परन्तु प्रश्न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेदका निषेध भी करती है । यह विरोध देखकर मुझे भ्रम हो रहा है । आप कृपा करके मेरा यह भ्रम मिटाइये ॥५ ॥

वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम् ।

द्रव्यदेशवयःकालान् स्वर्गं नरकमेव च ॥२

गुणदोषभिदादृष्टिमन्तरेण वचस्तव ।

निःश्रेयसं कथं नॄणां निषेधविधिलक्षणम् ॥३

पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुस्तवेश्वर ।

श्रेयस्त्वनुपलब्धेऽर्थे साध्यसाधनयोरपि ॥ ४

गुणदोषभिदादृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वतः ।

निगमेनापवादश्च भिदाया इति ह भ्रमः ॥५

श्रीभगवानुवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1213

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1213 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया ।

ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥६

निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु ।

तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम् ॥७

यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान् न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः ॥८ भगवान् श्रीकृष्णने कहा– प्रिय उद्धव! मैंने ही वेदोंमें एवं अन्यत्र भी मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये अधिकारिभेदसे तीन प्रकारके योगोंका उपदेश किया है । वे हैं— ज्ञान, कर्म और भक्ति । मनुष्यके परम कल्याणके लिये इनके अतिरिक्त और कोई उपाय कहीं नहीं है ॥६ ॥ उद्धवजी! जो लोग कर्मों तथा उनके फलोंसे विरक्त हो गये हैं और उनका त्याग कर

चुके हैं, वे ज्ञानयोगके अधिकरी हैं । इसके विपरीत जिनके चित्तमें कर्मों और उनके फलोंसे वैराग्य नहीं हुआ है, उनमें दुःखबुद्धि नहीं हुई है, वे सकाम व्यक्ति कर्मयोगके अधिकारी हैं ॥७ ॥ जो पुरुष तो अत्यन्त विरक्त है और न अत्यन्त आसक्त ही है तथा किसी

पूर्वजन्मके शुभकर्मसे सौभाग्यवश मेरी लीला- कथा आदिमें उसकी श्रद्धा हो गयी है, वह भक्तियोगका अधिकारी है। उसे भक्तियोगके द्वारा ही सिद्धि मिल सकती है || ८ || कर्मके सम्बन्धमें जितने भी विधि- निषेध हैं, उनके अनुसार तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक कर्ममय जगत् और उससे प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि सुखोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला- कथाके श्रवण- कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय ॥९ ॥ उद्धव! इस प्रकार अपने

वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें स्थित रहकर यज्ञोंके द्वारा बिना किसी आशा और कामनाके मेरी आराधना करता रहे और निषिद्ध कर्मोंसे दूर रहकर केवल विहित कर्मोंका ही आचरण करे तो उसे स्वर्ग या नरकमें नहीं जाना पड़ता ॥ १० ॥ अपने धर्ममें निष्ठा रखनेवाला

पुरुष इस शरीरमें रहते - रहते ही निषिद्ध कर्मका परित्याग कर देता है और रागादि मलोंसे भी मुक्त- पवित्र हो जाता है । इसीसे अनायास ही उसे आत्मसाक्षात्काररूप विशुद्ध तत्त्वज्ञान अथवा द्रुत - चित्त होनेपर मेरी भक्ति प्राप्त होती है ॥११ ॥ यह विधि- निषेधरूप कर्मका

अधिकारी मनुष्य - शरीर बहुत ही दुर्लभ है । स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकोंमें रहनेवाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं; क्योंकि इसी शरीरमें अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ज्ञान अथवा भक्तिकी प्राप्ति हो सकती है, स्वर्ग अथवा नरकका भोगप्रधान शरीर किसी भी साधनके उपयुक्त नहीं है । बुद्धिमान् पुरुषको न तो स्वर्गकी अभिलाषा करनी चाहिये और न नरककी ही । और तो क्या, इस मनुष्य -शरीरकी भी कामना न करनी चाहिये; क्योंकि किसी भी शरीरमें गुणबुद्धि और अभिमान हो जानेसे अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्तिके साधनमें परन्तु,प्रमाद होने लगता है ॥ १२-१३ ॥ यद्यपि यह मनुष्य शरीर है तो मृत्युग्रस्त ही इसकेद्वारा परमार्थकी— सत्य वस्तुकी प्राप्ति हो सकती है । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि यह बात जानकर मृत्यु होनेके पूर्व ही सावधान होकर ऐसी साधना कर ले, जिससे वह जन्म- मृत्युके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1214

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1214 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चक्करसे सदाके लिये छूट जाय - मुक्त हो जाय ॥१४ ॥ यह शरीर एक वृक्ष है । इसमें घोंसला

बनाकर जीवरूप पक्षी निवास करता है । इसे यमराजके दूत प्रतिक्षण काट रहे हैं । जैसे पक्षी कटते हुए वृक्षको छोड़कर उड़ जाता है, वैसे ही अनासक्त जीव भी इस शरीरको छोड़कर मोक्षका भागी बन जाता है । परन्तु आसक्त जीव दुःख ही भोगता रहता है ॥१५ ॥ प्रिय

उद्धव! ये दिन और रात क्षण-क्षणमें शरीरकी आयुको क्षीण कर रहे हैं । यह जानकर जो भयसे काँप उठता है, वह व्यक्ति इसमें आसक्ति छोड़कर परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है और फिर इसके जीवन - मरणसे निरपेक्ष होकर अपने आत्मामें ही शान्त हो जाता है ॥१६ ॥

यह मनुष्य- शरीर समस्त शुभ फलोंकी प्राप्तिका मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी अनायास सुलभ हो गया है । इस संसार सागरसे पार जानेके लिये यह एक सुदृढ़ नौका है । शरण- ग्रहणमात्रसे ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवारका संचालन करने लगते हैं और स्मरणमात्रसे ही मैं अनुकूल वायुके रूपमें इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ाने लगता हूँ । इतनी सुविधा होनेपर भी जो इस शरीरके द्वारा संसार- सागरसे पार नहीं हो जाता, वह तो अपने हाथों अपने आत्माका हनन – अधःपतन कर रहा है ॥१७ ॥

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता ।

मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ ९

स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीःकाम उद्धव ।

न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्न समाचरेत् ॥१०

अस्मिँल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोऽनघः शुचिः ।

ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया ॥११

स्वर्गिणोऽप्येतमिच्छन्ति लोकं निरयिणस्तथा ।

साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकम् ॥१२

न नरः स्वर्गतिं कांक्षेन्नारकीं वा विचक्षणः ।

नेमं लोकं च कांक्षेत देहावेशात् प्रमाद्यति ॥१३

एतद् विद्वान् पुरा मृत्योरभवाय घटेत सः ।

अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम् ॥१४

छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडं वनस्पतिम् ।

खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पटः ॥ १५

अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1215

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1215 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मुक्तसंगः परं बुद्ध्वा निरीह उपशाम्यति ॥ १६ नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ॥१७

यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः ।

अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः ॥ १८

धार्यमाणं मनो यहि भ्राम्यदाश्वनवस्थितम् ।

अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत् ॥१९

मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रियः ।

सत्त्वसम्पन्नया बुद्धया मन आत्मवशं नयेत् ॥२०

एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः ।

हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवार्वतो मुहुः ॥२१

प्रिय उद्धव! जब पुरुष दोषदर्शनके कारण कर्मोंसे उद्विग्न और विरक्त हो जाय, तब जितेन्द्रिय होकर वह योगमें स्थित हो जाय और अभ्यास- आत्मानुसन्धानके द्वारा अपना मन मुझ परमात्मामें निश्चलरूपसे धारण करे || १८ || जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर- उधर भटकने लगे, तब झटपट बड़ी सावधानीसे उसे मनाकर, समझा-बुझाकर, फुसलाकर अपने वशमें कर ले ॥१९ ॥ इन्द्रियों और प्राणोंको अपने वशमें रखे और मनको

एक क्षणके लिये भी स्वतन्त्र न छोड़े। उसकी एक-एक चाल, एक -एक हरकतको देखता रहे । इस प्रकार सत्त्वसम्पन्न बुद्धिके द्वारा धीरे- धीरे मनको अपने वशमें कर लेना चाहिये ॥२० ॥

जैसे सवार घोड़ेको अपने वशमें करते समय उसे अपने मनोभावकी पहचान कराना चाहता है —अपनी इच्छाके अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार- बार फुसलाकर उसे अपने वशमें कर लेता है, वैसे ही मनको फुसलाकर, उसे मीठी- मीठी बातें सुनाकर वशमें कर लेना भी परम योग है ॥२१ ॥ सांख्यशास्त्रमें प्रकृतिसे लेकर शरीरपर्यन्त सृष्टिका जो क्रम बतलाया

गया है, उसके अनुसार सृष्टि - चिन्तन करना चाहिये और जिस क्रमसे शरीर आदिका प्रकृतिमें लय बताया गया है, उस प्रकार लय-चिन्तन करना चाहिये । यह क्रम तबतक जारी रखना चाहिये, जबतक मन शान्त- स्थिर न हो जाय || २२ || जो पुरुष संसारसे विरक्त हो गया है और जिसे संसारके पदार्थोंमें दुःख- बुद्धि हो गयी है, वह अपने गुरुजनोंके उपदेशको भलीभाँति समझकर बार- बार अपने स्वरूपके ही चिन्तनमें संलग्न रहता है । इस अभ्याससे बहुत शीघ्र ही उसका मन अपनी वह चंचलता, जो अनात्मा शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करनेसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1216

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1216 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हुई है, छोड़ देता है ॥ २३ ॥ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि

आदि योगमार्गोंसे, वस्तुतत्त्वका निरीक्षण- परीक्षण करनेवाली आत्मविद्यासे तथा मेरी प्रतिमाकी उपासनासे— अर्थात् कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे मन परमात्माका चिन्तन करने लगता है; और कोई उपाय नहीं है ॥२४ ॥

सांख्येन सर्वभावानां प्रतिलोमानुलोमतः ।

भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत् प्रसीदति ॥२२

निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः ।

मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया ॥२३

यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया ।

ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मनः ॥२४

यदि कुर्यात् प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम् ।

योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन ॥२५

स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।

कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः ।

गुणदोषविधानेन संगानां त्याजनेच्छया ॥२६

जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्णः सर्वकर्मसु ।

वेद दुःखात्मकान् कामान् परित्यागेऽप्यनीश्वरः ॥२७

उद्धवजी! वैसे तो योगी कभी कोई निन्दित कर्म करता ही नहीं; परन्तु यदि कभी उससे प्रमादवश कोई अपराध बन जाय तो योगके द्वारा ही उस पापको जला डाले, कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि दूसरे प्रयश्चित कभी न करे ॥ २५ ॥ अपने - अपने अधिकारमें जो निष्ठा है,

वही गुण कहा गया है । इस गुण -दोष और विधि- निषेधके विधानसे यही तात्पर्य निकलता है कि किसी प्रकार विषयासक्तिका परित्याग हो जाय; क्योंकि कर्म तो जन्मसे ही अशुद्ध हैं, अनर्थके मूल हैं । शास्त्रका तात्पर्य उनका नियन्त्रण, नियम ही है । जहाँतक हो सके प्रवृत्तिका संकोच ही करना चाहिये ॥२६ ॥

जो साधक समस्त कर्मोंसे विरक्त हो गया हो, उनमें दुःखबुद्धि रखता हो, मेरी लीलाकथाके प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग और भोगवासनाएँ दुःखरूप हैं, किन्तु इतना सब जानकर भी जो उनके परित्यागमें समर्थ न हो, उसे चाहिये कि उन भोगोंको तो भोग ले; परन्तु उन्हें सच्चे हृदयसे दुःखजनक समझे और मन - ही - मन उनकी निन्दा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य ही समझे। साथ ही इस दुविधाकी स्थितिसे छुटकारा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1217

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1217 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पानेके लिये श्रद्धा, दृढ़ निश्चय और प्रेमसे मेरा भजन करे ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार मेरे बतलाये हुए भक्तियोगके द्वारा निरन्तर मेरा भजन करनेसे मैं उस साधकके हृदयमें आकर बैठ जाता हूँ और मेरे विराजमान होते ही उसके हृदयकी सारी वासनाएँ अपने संस्कारोंके साथ नष्ट हो जाती हैं ॥२९ ॥ इस तरह जब उसे मुझ सर्वात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब तो उसके

हृदयकी गाँठ टूट जाती है, उसके सारे संशय छिन्न- भिन्न हो जाते हैं और कर्म- वासनाएँ सर्वथा क्षीण हो जाती हैं ॥ ३० ॥ इसीसे जो योगी मेरी भक्तिसे युक्त और मेरे चिन्तनमें मग्न रहता है,

उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती । उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है ॥ ३१ ॥ कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म और

दूसरे कल्याणसाधनोंसे जो कुछ स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है, वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोगके प्रभावसे ही, यदि चाहे तो, अनायास प्राप्त कर लेता है ॥३२-३३ ॥ मेरे अनन्यप्रेमी एवं धैर्यवान् साधु भक्त स्वयं तो कुछ चाहते ही नहीं; यदि मैं उन्हें देना चाहता हूँ और देता भी हूँ तो भी दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या — वे कैवल्य-मोक्ष भी नहीं लेना चाहते ॥३४ ॥ उद्धवजी! सबसे श्रेष्ठ एवं महान् निःश्रेयस ( परम कल्याण )

तो निरपेक्षताका ही दूसरा नाम है । इसलिये जो निष्काम और निरपेक्ष होता है, उसीको मेरी भक्ति प्राप्त होती है || ३५ || मेरे अनन्यप्रेमी भक्तोंका और उन समदर्शी महात्माओंका; जो बुद्धिसे अतीत परमतत्त्वको प्राप्त हो चुके हैं, इन विधि और निषेधसे होनेवाले पुण्य और पापसे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता || ३६ || इस प्रकार जो लोग मेरे बतलाये हुए इन ज्ञान, भक्ति और कर्ममार्गोंका आश्रय लेते हैं, वे मेरे परम कल्याण -स्वरूप धामको प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे परब्रह्मतत्त्वको जान लेते हैं ॥३७ ॥

ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्दृढनिश्चयः ।

जुषमाणश्च तान् कामान् दुःखोदर्कांश्च गर्हयन् ॥२८

प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मासकृन्मुनेः ।

कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते ॥२९

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ॥३०

तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः ।

न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥३१

यत् कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् ।

योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि ॥३२

सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1218

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1218 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथंचिद् यदि वाञ्छति ॥३३

न किंचित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम ।

वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥३४

नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमनल्पकम् ।

तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत् ॥३५

न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः ।

साधूनां समचित्तानां बुद्धेः परमुपेयुषाम् ॥३६

एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः ।

क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः ॥३७

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे विंशोऽध्यायः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1219

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1219 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथैकविंशोऽध्यायः गुण - दोष- व्यवस्थाका स्वरूप और रहस्य श्रीभगवानुवाच

य एतान् मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान् ।

क्षुद्रान् कामांश्चलैः प्राणैर्जुषन्तः संसरन्ति ते ॥१

स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।

विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्चयः ॥ २

शुद्धयशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु ।

द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ ॥३

धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ ।

दर्शितोऽयं मयाऽऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम् ॥४

भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पंच धातवः ।

आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुताः ॥ ५

वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि ।

धातुपूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये ॥६

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं -प्रिय उद्धव! मेरी प्राप्तिके तीन मार्ग हैं — भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग । जो इन्हें छोड़कर चंचल इन्द्रियोंके द्वारा क्षुद्र भोग भोगते रहते हैं, वे बार - बार जन्म- मृत्युरूप संसारके चक्करमें भटकते रहते हैं || १ || अपने - अपने अधिकारके अनुसार धर्ममें दृढ़ निष्ठा रखना ही गुण कहा गया है और इसके विपरीत अनधिकार चेष्टा करना दोष है । तात्पर्य यह कि गुण और दोष दोनोंकी व्यवस्था अधिकारके अनुसार की जाती है, किसी वस्तुके अनुसार नहीं ॥२ ॥ वस्तुओंके समान होनेपर भी शुद्धि - अशुद्धि, गुण-दोष

और शुभ- अशुभ आदिका जो विधान किया जाता है, उसका अभिप्राय यह है कि पदार्थका ठीक-ठीक निरीक्षण- परीक्षण हो सके और उनमें सन्देह उत्पन्न करके ही यह योग्य है कि अयोग्य, स्वाभाविक प्रवृत्तिको नियन्त्रित– संकुचित किया जा सके ॥३ ॥ उनके द्वारा धर्म-सम्पादन कर सके, समाजका व्यवहार ठीक- ठीक चला सके और अपने व्यक्तिगत जीवनके

निर्वाहमें भी सुविधा हो। इससे यह लाभ भी है कि मनुष्य अपनी वासनामुलक सहज प्रवृत्तियोंके द्वारा इनके जालमें न फँसकर शास्त्रानुसार अपने जीवनको नियन्त्रित और मनको वशीभूत कर लेता है । निष्पाप उद्धव! यह आचार मैंने ही मनु आदिका रूप धारण करके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1220

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1220 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

धर्मका भार ढोनेवाले कर्म जडोंके लिये उपदेश किया है || ४ || पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश - ये पंचभूत ही ब्रह्मासे लेकर पर्वत -वृक्षपर्यन्त सभी प्राणियोंके शरीरोंके मूलकारण हैं । इस तरह वे सब शरीरकी दृष्टिसे तो समान हैं ही, सबका आत्मा भी एक ही है || ५ || प्रिय उद्धव! यद्यपि सबके शरीरोंके पंचभूत समान हैं, फिर भी वेदोंने इनके वर्णाश्रम आदि अलग-अलग नाम और रूप इसलिये बना दिये हैं कि ये अपनी वासना मूलक प्रवृत्तियोंको संकुचित करके — नियन्त्रित करके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थोंको सिद्ध कर सकें ॥६ ॥ साधुश्रेष्ठ! देश, काल, फल, निमित्त, अधिकारी और धान्य आदि वस्तुओंके गुण-दोषोंका विधान भी मेरे द्वारा इसीलिये किया गया है कि कर्मोंमें लोगोंकी उच्छृंखल प्रवृत्ति न

हो, मर्यादाका भंग न होने पावे || ७ || देशोंमें वह देश अपवित्र है, जिसमें कृष्णसार मृग न हों और जिसके निवासी ब्राह्मण- भक्त न हों । कृष्णसार मृगके होनेपर भी, केवल उन प्रदेशोंको छोड़कर जहाँ संत पुरुष रहते हैं, कीकट देश अपवित्र ही है । संस्काररहित और ऊसर आदि स्थान भी अपवित्र ही होते हैं ॥८ ॥ समय वही पवित्र है, जिसमें कर्म करने योग्य सामग्री

आगन्तुक,मिल सके तथा कर्म भी हो सके । जिसमें कर्म करनेकी सामग्री न मिले दोषोंसेअथवा स्वाभाविक दोषके कारण जिसमें कर्म ही न हो सके, वह समय अशुद्ध है || ९ || पदार्थोंकी शुद्धि और अशुद्धि द्रव्य, वचन, संस्कार, काल, महत्त्व अथवा अल्पत्वसे भी होती है । ( जैसे कोई पात्र जलसे शुद्ध और मूत्रादिसे अशुद्ध हो जाता है । किसी वस्तुकी शुद्धि अथवा अशुद्धिमें शंका होनेपर ब्राह्मणोंके वचनसे वह शुद्ध हो जाती है अन्यथा अशुद्ध रहती है । पुष्पादि जल छिड़कनेसे शुद्ध और सूँघनेसे अशुद्ध माने जाते हैं । तत्कालका पकाया हुआ अन्न शुद्ध और बासी अशुद्ध माना जाता है । बड़े सरोवर और नदी आदिका जल शुद्ध और छोटे गड्ढोंका अशुद्ध माना जाता है । इस प्रकार क्रमसे समझ लेना चाहिये । ) ॥१० ॥ शक्ति,

अशक्ति, बुद्धि और वैभवके अनुसार भी पवित्रता और अपवित्रताकी व्यवस्था होती है । उसमें भी स्थान और उपयोग करनेवालेकी आयुका विचार करते हुए ही अशुद्ध वस्तुओंके व्यवहारका दोष ठीक तरहसे आँका जाता है । ( जैसे धनी- दरिद्र, बलवान्-निर्बल, बुद्धिमान्-मूर्ख, उपद्रवपूर्ण और सुखद देश तथा तरुण एवं वृद्धावस्थाके भेदसे शुद्धि और अशुद्धिकी व्यवस्थामें अन्तर पड़ जाता है । ) ॥११ ॥ अनाज, लकड़ी, हाथीदाँत आदि हड्डी, सूत, मधु,

नमक, तेल, घी आदि रस, सोना- पारा आदि तैजस पदार्थ, चाम और घड़ा आदि मिट्टीके बने पदार्थ समयपर अपने - आप हवा लगनेसे, आगमें जलानेसे, मिट्टी लगानेसे अथवा जलमें धोनेसे शुद्ध हो जाते हैं। देश, काल और अवस्थाके अनुसार कहीं जल- मिट्टी आदि शोधक सामग्रीके संयोगसे शुद्धि करनी पड़ती है तो कहीं -कहीं एक-एकसे भी शुद्धि हो जाती है ॥१२ ॥ यदि किसी वस्तुमें कोई अशुद्ध पदार्थ लग गया हो तो छीलनेसे या मिट्टी आदि

मलनेसे जब उस पदार्थकी गन्ध और लेप न रहे और वह वस्तु अपने पूर्वरूपमें आ जाय, तब उसको शुद्ध समझना चाहिये ॥१३ ॥ स्नान, दान, तपस्या, वय, सामर्थ्य, संस्कार, कर्म और

मेरे स्मरणसे चित्तकी शुद्धि होती है । इनके द्वारा शुद्ध होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको विहित कर्मोंका आचरण करना चाहिये || १४ || गुरुमुखसे सुनकर भलीभाँति हृदयंगम कर लेनेसे मन्त्रकी और मुझे समर्पित कर देनेसे कर्मकी शुद्धि होती है । उद्धवजी! इस प्रकार देश, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******