श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1441–1450
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1441–1450
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ऋते कृष्णप्रकाशं तु स्वात्मबोधो न कस्यचित् ।
तत्प्रकाशस्तु जीवानां मायया पिहितः सदा ॥९
अष्टाविंशे द्वापरान्ते स्वयमेव यदा हरिः ।
उत्सारयेन्निजां मायां तत्प्रकाशो भवेत्तदा ॥१०
बड़े सौभाग्यकी बात है कि श्रीकृष्णकी पत्नियोंके प्रति तुम्हारी भक्ति और वज्रनाभपर तुम्हारा प्रेम है । तात! तुम जो कुछ कर रहे हो, सब तुम्हारे अनुरूप ही है । क्यों न हो, श्रीकृष्णने ही तुम्हें शरीर और वैभव प्रदान किया है; अतः तुम्हारा उनके प्रपौत्रपर प्रेम होना स्वाभाविक ही है ॥३ ॥ इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि समस्त द्वारकावासियोंमें ये लोग
सबसे बढ़कर धन्य हैं, जिन्हें व्रजमें निवास करानेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको आज्ञा की थी ॥४ ॥ श्रीकृष्णका मनरूपी चन्द्रमा राधाके मुखकी प्रभारूप चाँदनीसे युक्त हो उनकी
लीलाभूमि वृन्दावनको अपनी किरणोंसे सुशोभित करता हुआ यहाँ सदा प्रकाशमान रहता है || ५ || श्रीकृष्णचन्द्र नित्य परिपूर्ण हैं, प्राकृत चन्द्रमाकी भाँति उनमें वृद्धि और क्षयरूप विकार नहीं होते । उनकी जो सोलह कलाएँ हैं, उनसे सहस्रों चिन्मय किरणें निकलती रहती हैं; इससे उनके सहस्रों भेद हो जाते हैं । इन सभी कलाओंसे युक्त, नित्य परिपूर्ण श्रीकृष्ण इस व्रजभूमिमें सदा ही विद्यमान रहते हैं; इस भूमिमें और उनके स्वरूपमें कुछ अन्तर नहीं है ॥६ ॥ राजेन्द्र परीक्षित्! इस प्रकार विचार करनेपर सभी व्रजवासी भगवान्के अंगमें स्थित
हैं । शरणागतोंका भय दूर करनेवाले जो ये वज्र हैं, इनका स्थान श्रीकृष्णके दाहिने चरणमें है ॥७ ॥ इस अवतारमें भगवान् श्रीकृष्णने इन सबको अपनी योगमायासे अभिभूत कर लिया
है, उसीके प्रभावसे ये अपने स्वरूपको भूल गये हैं और इसी कारण सदा दुःखी रहते हैं । यह बात निस्सन्देह ऐसी ही है || ८ || श्रीकृष्णका प्रकाश प्राप्त हुए बिना किसीको भी अपने स्वरूपका बोध नहीं हो सकता । जीवोंके अन्तःकरणमें जो श्रीकृष्णतत्त्वका प्रकाश है, उसपर सदा मायाका पर्दा पड़ा रहता है ॥९ ॥ अट्ठाईसवें द्वापरके अन्तमें जब भगवान् श्रीकृष्ण
स्वयं ही सामने प्रकट होकर अपनी मायाका पर्दा उठा लेते हैं, उस समय जीवोंको उनका प्रकाश प्राप्त होता है ॥१० ॥ किन्तु अब वह समय तो बीत गया; इसलिये उनके प्रकाशकी
प्राप्तिके लिये अब दूसरा उपाय बतलाया जा रहा है, सुनो । अट्ठाईसवें द्वापरके अतिरिक्त समयमें यदि कोई श्रीकृष्णतत्त्वका प्रकाश पाना चाहे तो उसे वह श्रीमद्भागवतसे ही प्राप्त हो सकता है ॥११ ॥
स तु कालो व्यतिक्रान्तस्तेनेदमपरं शृणु ।
अन्यदा तत्प्रकाशस्तु श्रीमद्भागवताद् भवेत् ॥ ११
श्रीमद्भागवतं शास्त्रं यत्र भागवतैर्यदा ।
कीर्त्यते श्रूयते चापि श्रीकृष्णस्तत्र निश्चितम् ॥१२
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श्रीमद्भागवतं यत्र श्लोकं श्लोकार्द्धमेव च ।
तत्रापि भगवान् कृष्णो बल्लवीभिर्विराजते ॥१३
भारते मानवं जन्म प्राप्य भागवतं न यैः ।
श्रुतं पापपराधीनैरात्मघातस्तु तैः कृतः ॥१४
श्रीमद्भागवतं शास्त्रं नित्यं यैः परिसेवितम् ।
पितुर्मातुश्च भार्यायाः कुलपङ्क्तिः सुतारिता ॥ १५
विद्याप्रकाशो विप्राणां राज्ञां शत्रुजयो विशाम् ।
धनं स्वास्थ्यं च शूद्राणां श्रीमद्भागवताद् भवेत् ॥१६
योषितामपरेषां च सर्ववांछितपूरणम् ।
अतो भागवतं नित्यं को न सेवेत भाग्यवान् ॥१७
अनेकजन्मसंसिद्धः श्रीमद्भागवतं लभेत् ।
प्रकाशो भगवद्भक्तेरुद्भवस्तत्र जायते ॥१८
सांख्यायनप्रसादाप्तं श्रीमद्भागवतं पुरा ।
बृहस्पतिर्दत्तवान् मे तेनाहं कृष्णवल्लभः ॥ १ ९
भगवान्के भक्त जहाँ जब कभी श्रीमद्भागवत शास्त्रका कीर्तन और श्रवण करते हैं, वहाँ उस समय भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् रूपसे विराजमान रहते हैं ॥१२ ॥
जहाँ श्रीमद्भागवतके एक या आधे श्लोकका ही पाठ होता है, वहाँ भी श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमा गोपियोंके साथ विद्यमान रहते हैं ॥१३ ॥
इस पवित्र भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाकर भी जिन लोगोंने पापके अधीन होकर श्रीमद्भागवत नहीं सुना, उन्होंने मानो अपने ही हाथों अपनी हत्या कर ली ॥१४ ॥
जिन बड़भागियोंने प्रतिदिन श्रीमद्भागवत शास्त्रका सेवन किया है, उन्होंने अपने पिता, माता और पत्नी — तीनोंके ही कुलका भलीभाँति उद्धार कर दिया ॥१५ ॥
श्रीमद्भागवतके स्वाध्याय और श्रवणसे ब्राह्मणोंको विद्याका प्रकाश ( बोध) प्राप्त होता है, क्षत्रियलोग शत्रुओंपर विजय पाते हैं, वैश्योंको धन मिलता है और शूद्र स्वस्थ — नीरोग बने रहते हैं ॥१६ ॥
स्त्रियों तथा अन्त्यज आदि अन्य लोगोंकी भी इच्छा श्रीमद्भागवतसे पूर्ण होती है; अतः कौन ऐसा भाग्यवान् पुरुष है, जो श्रीमद्भागवतका नित्य ही सेवन न करेगा ॥१७ ॥
अनेकों जन्मोंतक साधना करते - करते जब मनुष्य पूर्ण सिद्ध हो जाता है, तब उसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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श्रीमद्भागवतकी प्राप्ति होती है । भागवतसे भगवान्का प्रकाश मिलता है, जिससे भगवद्भक्ति उत्पन्न होती है ॥१८ ॥
पूर्वकालमें सांख्यायनकी कृपासे श्रीमद्भागवत बृहस्पतिजीको मिला और बृहस्पतिजीने मुझे दिया; इसीसे मैं श्रीकृष्णका प्रियतम सखा हो सका हूँ ॥१९ ॥
आख्यायिकां च तेनोक्तां विष्णुरात निबोध ताम् ।
ज्ञायते सम्प्रदायोऽपि यत्र भागवतश्रुतेः ॥२०
बृहस्पतिरुवाच
ईक्षांचक्रे यदा कृष्णो मायापुरुषरूपधृक् ।
ब्रह्मा विष्णुः शिवश्चापि रजःसत्त्वतमोगुणैः ॥२१
पुरुषास्त्रय उत्तस्थुरधिकारांस्तदादिशत् ।
उत्पत्तौ पालने चैव संहारे प्रक्रमेण तान् ॥२२
ब्रह्मा तु नाभिकमलादुत्पन्नस्तं व्यजिज्ञपत् । ब्रह्मोवाच नारायणादिपुरुष परमात्मन् नमोऽस्तु ते ॥२३
त्वया सर्गे नियुक्तोऽस्मि पापीयान् मां रजोगुणः ।
त्वत्स्मृतौ नैव बाधेत तथैव कृपया प्रभो ॥२४
बृहस्पतिरुवाच
यदा तु भगवांस्तस्मै श्रीमद्भागवतं पुरा ।
उपदिश्याब्रवीद् ब्रह्मन् सेवस्वैनत् स्वसिद्धये ॥ २५
ब्रह्मा तु परमप्रीतस्तेन कृष्णाप्तयेऽनिशम् ।
सप्तावरणभंगाय सप्ताहं समवर्तयत् ॥२६
श्री भागवतसप्ताहसेवनाप्तमनोरथः ।
सृष्टिं वितनुते नित्यं ससप्ताहः पुनः पुनः ॥२७
परीक्षित्! बृहस्पतिजीने मुझे एक आख्यायिका भी सुनायी थी, उसे तुम सुनो । इस आख्यायिकासे श्रीमद्भागवतश्रवणके सम्प्रदायका क्रम भी जाना जा सकता है ॥२० ॥
बृहस्पतिजीने कहा था- अपनी मायासे पुरुषरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने जब सृष्टिके लिये संकल्प किया, तब उनके दिव्य विग्रहसे तीन पुरुष प्रकट हुए । इनमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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रजोगुणकी प्रधानतासे ब्रह्मा, सत्त्वगुणकी प्रधानतासे विष्णु और तमोगुणकी प्रधानतासे रुद्र प्रकट हुए । भगवान्ने इन तीनोंको क्रमशः जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेका अधिकार प्रदान किया ॥२१-२२ ॥ तब भगवान्के नाभि - कमलसे उत्पन्न हुए ब्रह्माजीने उनसे अपना मनोभाव यों प्रकट किया । ब्रह्माजीने कहा- परमात्मन्! आप नार अर्थात् जलमें शयन करनेके कारण ‘ नारायण ’ नामसे प्रसिद्ध हैं, सबके आदि कारण होनेसे आदिपुरुष हैं; आपको नमस्कार है ॥२३ ॥
प्रभो! आपने मुझे सृष्टिकर्ममें लगाया है, मगर मुझे भय है कि सृष्टिकालमें अत्यन्त पापात्मा रजोगुण आपकी स्मृतिमें कहीं बाधा न डालने लग जाय । अतः कृपा करके ऐसी कोई बात बतायें, जिससे आपकी याद बराबर बनी रहे ॥२४ ॥
बृहस्पतिजी कहते हैं- जब ब्रह्माजीने ऐसी प्रार्थना की, तब पूर्वकालमें भगवान्ने उन्हें श्रीमद्भागवतका उपदेश देकर कहा -' ब्रह्मन्! तुम अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये सदा ही इसका सेवन करते रहो' ॥२५ ॥
ब्रह्माजी श्रीमद्भागवतका उपदेश पाकर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीकृष्णकी नित्य प्राप्तिके लिये तथा सात आवरणोंका भंग करनेके लिये श्रीमद्भागवतका सप्ताहपारायण किया ॥२६ ॥
सप्ताहयज्ञकी विधिसे सात दिनोंतक श्रीमद्भागवतका सेवन करनेसे ब्रह्माजीके सभी मनोरथ पूर्ण हो गये । इससे वे सदा भगवत्स्मरणपूर्वक सृष्टिका विस्तार करते और बारंबार सप्ताहयज्ञका अनुष्ठान करते रहते हैं ॥ २७ ॥
विष्णुरप्यर्थयामास पुमांसं स्वार्थसिद्धये ।
प्रजानां पालने पुंसा यदनेनापि कल्पितः ॥२८
विष्णुरुवाच
प्रजानां पालनं देव करिष्यामि यथोचितम् ।
प्रवृत्त्या च निवृत्त्या च कर्मज्ञानप्रयोजनात् ॥२९
यदा यदैव कालेन धर्मग्लानिर्भविष्यति ।
धर्मं संस्थापयिष्यामि ह्यवतारैस्तदा तदा ॥३०
भोगार्थिभ्यस्तु यज्ञादिफलं दास्यामि निश्चितम् ।
मोक्षार्थिभ्यो विरक्तेभ्यो मुक्तिं पञ्चविधां तथा ॥३१
येऽपि मोक्षं न वाञ्छन्ति तान् कथं पालयाम्यहम् ।
आत्मानं च श्रियं चापि पालयामि कथं वद ॥ ३२
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तस्मा अपि पुमानाद्यः श्रीभागवतमादिशत् ।
उवाच च पठस्वैनत्तव सर्वार्थसिद्धये ॥३३
ततो विष्णुः प्रसन्नात्मा परमार्थकपालने ।
समर्थोऽभूच्छ्रिया मासि मासि भागवतं स्मरन् ॥३४
यदा विष्णुः स्वयं वक्ता लक्ष्मीश्च श्रवणे रता ।
तदा भागवतश्रावो मासेनैव पुनः पुनः ॥३५
यदा लक्ष्मीः स्वयं वक्त्री विष्णुश्च श्रवणे रतः ।
मासद्वयं रसास्वादस्तदातीव सुशोभते ॥३६
ब्रह्माजीकी ही भाँति विष्णुने भी अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये उन परमपुरुष परमात्मासे प्रार्थना की; क्योंकि उन पुरुषोत्तमने विष्णुको भी प्रजा - पालनरूप कर्ममें नियुक्त किया था ॥२८ ॥
विष्णुने कहा- देव! मैं आपकी आज्ञाके अनुसार कर्म और ज्ञानके उद्देश्यसे प्रवृत्ति और निवृत्तिके द्वारा यथोचित रूपसे प्रजाओंका पालन करूँगा || २९ || कालक्रमसे जब-जब धर्मकी हानि होगी, तब- तब अनेकों अवतार धारण कर पुनः धर्मकी स्थापना करूँगा ॥३० ॥
जो भोगोंकी इच्छा रखनेवाले हैं, उन्हें अवश्य ही उनके किये हुए यज्ञादि कर्मोंका फल अर्पण करूँगा; तथा जो संसारबन्धनसे मुक्त होना चाहते हैं, विरक्त हैं, उन्हें उनके इच्छानुसार पाँच प्रकारकी मुक्ति भी देता रहूँगा ॥ ३१ ॥ परन्तु जो लोग मोक्ष भी नहीं चाहते, उनका पालन मैं
कैसे करूँगा— यह बात समझमें नहीं आती । इसके अतिरिक्त मैं अपनी तथा लक्ष्मीजीकी भी रक्षा कैसे कर सकूँगा, इसका उपाय भी बताइये ॥३२ ॥
विष्णुकी यह प्रार्थना सुनकर आदिपुरुष श्रीकृष्णने उन्हें भी श्रीमद्भागवतका उपदेश किया और कहा — ‘ तुम अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये इस श्रीमद्भागवत- शास्त्रका सदा पाठ किया करो ' ॥३३ ॥ उस उपदेशसे विष्णुभगवान्का चित्त प्रसन्न हो गया और वे लक्ष्मीजीके
साथ प्रत्येक मासमें श्रीमद्भागवतका चिन्तन करने लगे । इससे वे परमार्थका पालन और यथार्थरूपसे संसारकी रक्षा करनेमें समर्थ हुए ॥३४ ॥
जब भगवान् विष्णु स्वयं वक्ता होते हैं और लक्ष्मीजी प्रेमसे श्रवण करती हैं, उस समय प्रत्येक बार भागवतकथाका श्रवण एक मासमें ही समाप्त होता है ॥३५ ॥
किन्तु जब लक्ष्मीजी स्वयं वक्ता होती हैं और विष्णु श्रोता बनकर सुनते हैं, तब भागवतकथाका रसास्वादन दो मासतक होता रहता है; उस समय कथा बड़ी सुन्दर, बहुत ही रुचिकर होती है || ३६ || अधिकारे स्थितो विष्णुर्लक्ष्मीर्निश्चिन्तमानसा । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तेन भागवतास्वादस्तस्या भूरि प्रकाशते ॥३७
अथ रुद्रोऽपि तं देवं संहाराधिकृतः पुरा ।
पुमांसं प्रार्थयामास स्वसामर्थ्यविवृद्धये ॥३८
रुद्र उवाच
नित्ये नैमित्तिके चैव संहारे प्राकृते तथा ।
शक्तयो मम विद्यन्ते देवदेव मम प्रभो ॥ ३ ९
आत्यन्तिके तु संहारे मम शक्तिर्न विद्यते ।
महदुःखं ममैतत्तु तेन त्वां प्रार्थयाम्यहम् ॥ ४०
बृहस्पतिरुवाच
श्रीमद्भागवतं तस्मा अपि नारायणो ददौ ।
स तु संसेवनादस्य जिग्ये चापि तमोगुणम् ॥४१
कथा भागवती तेन सेविता वर्षमात्रतः ।
लये त्वात्यन्तिके तेनावाप शक्तिं सदाशिवः ॥४२
उद्धव उवाच
श्रीभागवतमाहात्म्य इमामाख्यायिकां गुरोः ।
श्रुत्वा भागवतं लब्ध्वा मुमुदेऽहं प्रणम्य तम् ॥४३
ततस्तु वैष्णवीं रीतिं गृहीत्वा मासमात्रतः ।
श्रीमद्भागवतास्वादो मया सम्यनिषेवितः ॥४४
तावतैव बभूवाहं कृष्णस्य दयितः सखा ।
कृष्णेनाथ नियुक्तोऽहं व्रजे स्वप्रेयसीगणे ॥ ४५
विरहार्त्तासु गोपीषु स्वयं नित्यविहारिणा ।
श्रीभागवतसन्देशो मन्मुखेन प्रयोजितः ॥४६
इसका कारण यह है कि विष्णु तो अधिकारारूढ हैं, उन्हें जगत्के पालनकी चिन्ता करनी पड़ती है; पर लक्ष्मीजी इन झंझटोंसे अलग हैं, अतः उनका हृदय निश्चिन्त है । इसीसे लक्ष्मीजीके मुखसे भागवतकथाका रसास्वादन अधिक प्रकाशित होता है । इसके पश्चात् रुद्रने भी, जिन्हें भगवान्ने पहले संहारकार्यमें लगाया था, अपनी सामर्थ्यकी वृद्धिके लिये उन परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना की ॥ ३७-३८ ॥ ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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रुद्रने कहा — मेरे प्रभु देवदेव! मुझमें नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत संहारकी शक्तियाँ तो हैं, पर आत्यन्तिक संहारकी शक्ति बिलकुल नहीं है । यह मेरे लिये बड़े दुःखकी बात है । इसी कमीकी पूर्तिके लिये मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ ॥३९-४० ॥ बृहस्पतिजी कहते हैं - रुद्रकी प्रार्थना सुनकर नारायणने उन्हें भी श्रीमद्भागवतका ही उपदेश किया । सदाशिव रुद्रने एक वर्षमें एक पारायणके क्रमसे भागवतकथाका सेवन किया । इसके सेवनसे उन्होंने तमोगुणपर विजय पायी और आत्यन्तिक संहार ( मोक्ष ) की शक्ति भी प्राप्त कर ली ॥४१-४२ ॥ उद्धवजी कहते हैं— श्रीमद्भागवतके माहात्म्यके सम्बन्धमें यह आख्यायिका मैंने अपने गुरु श्रीबृहस्पतिजीसे सुनी और उनसे भागवतका उपदेश प्राप्त कर उनके चरणोंमें प्रणाम करके मैं बहुत ही आनन्दित हुआ ॥४३ ॥ तत्पश्चात् भगवान् विष्णुकी रीति स्वीकार करके
मैंने भी एक मासतक श्रीमद्भागवतकथाका भलीभाँति रसास्वादन किया ॥४४ ॥ उतनेसे ही
मैं भगवान् श्रीकृष्णका प्रियतम सखा हो गया । इसके पश्चात् भगवान्ने मुझे व्रजमें अपनी प्रियतमा गोपियोंकी सेवामें नियुक्त किया || ४५ || यद्यपि भगवान् अपने लीलापरिकरोंके साथ नित्य विहार करते रहते हैं, इसलिये गोपियोंका श्रीकृष्णसे कभी भी वियोग नहीं होता; तथापि जो भ्रमसे विरहवेदनाका अनुभव कर रही थीं, उन गोपियोंके प्रति भगवान्ने मेरे मुखसे भागवतका सन्देश कहलाया ॥४६ ॥
तं यथामति लब्ध्वा ता आसन् विरहवर्जिताः ।
नाज्ञासिषं रहस्यं तच्चमत्कारस्तु लोकितः ॥४७
स्वर्वासं प्रार्थ्य कृष्णं च ब्रह्माद्येषु गतेषु मे ।
श्रीमद्भागवते कृष्णस्तद्रहस्यं स्वयं ददौ ॥४८
पुरतोऽश्वत्थमूलस्य चकार मयि तद् दृढम् ।
तेनात्र व्रजवल्लीषु वसामि बदरीं गतः ॥४९
तस्मान्नारदकुण्डेऽत्र तिष्ठामि स्वेच्छया सदा ।
कृष्णप्रकाशो भक्तानां श्रीमद्भागवताद् भवेत् ॥५०
तदेषामपि कार्यार्थं श्रीमद्भागवतं त्वहम् ।
प्रवक्ष्यामि सहायोऽत्र त्वयैवानुष्ठितो भवेत् ॥ ५१
सूत उवाच विष्णुरातस्तु श्रुत्वा तदुद्धवं प्रणतोऽब्रवीत् । परीक्षिदुवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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हरिदास त्वया कार्यं श्रीभागवतकीर्तनम् ॥ ५२ आज्ञाप्योऽहं यथा कार्यः सहायोऽत्र मया तथा । सूत उवाच श्रुत्वैतदुद्धवो वाक्यमुवाच प्रीतमानसः ॥ ५३ उद्धव उवाच
श्रीकृष्णेन परित्यक्ते भूतले बलवान् कलिः ।
करिष्यति परं विघ्नं सत्कार्ये समुपस्थिते ॥५४
उस सन्देशको अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण कर गोपियाँ तुरन्त ही विरहवेदनासे मुक्त हो गयीं । मैं भागवतके इस रहस्यको तो नहीं समझ सका, किन्तु मैंने उसका चमत्कार प्रत्यक्ष देखा ॥४७ ॥
इसके बहुत समयके बाद जब ब्रह्मादि देवता आकर भगवान्से अपने परमधाममें पधारनेकी प्रार्थना करके चले गये, उस समय पीपलके वृक्षकी जड़के पास अपने सामने खड़े हुए मुझे भगवान्ने श्रीमद्भागवत - विषयक उस रहस्यका स्वयं ही उपदेश किया और मेरी बुद्धिमें उसका दृढ़ निश्चय करा दिया । उसीके प्रभावसे मैं बदरिकाश्रममें रहकर भी यहाँ व्रजकी लताओं और बेलोंमें निवास करता हूँ ॥४८-४९ ॥ उसीके बलसे यहाँ नारदकुण्डपर सदा स्वेच्छानुसार विराजमान रहता हूँ । भगवान्के भक्तोंको श्रीमद्भागवतके सेवनसे श्रीकृष्णतत्त्वका प्रकाश प्राप्त हो सकता है ॥ ५० ॥
इस कारण यहाँ उपस्थित हुए इन सभी भक्तजनोंके कार्यकी सिद्धिके लिये मैं श्रीमद्भागवतका पाठ करूँगा; किन्तु इस कार्यमें तुम्हें ही सहायता करनी पड़ेगी ॥५१ ॥
सूतजी कहते हैं - यह सुनकर राजा परीक्षित् उद्धवजीको प्रणाम करके उनसे बोले । परीक्षित्ने कहा — हरिदास उद्धवजी! आप निश्चिन्त होकर श्रीमद्भागवतकथाका कीर्तन करें ॥५२ ॥ इस कार्यमें मुझे जिस प्रकारकी सहायता करनी आवश्यक हो, उसके लिये आज्ञा
दें । सूतजी कहते हैं — परीक्षित्का यह वचन सुनकर उद्धवजी मन - ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और बोले ॥५३ ॥
उद्धवजीने कहा — राजन्! भगवान् श्रीकृष्णने जबसे इस पृथ्वीतलका परित्याग कर दिया है, तबसे यहाँ अत्यन्त बलवान् कलियुगका प्रभुत्व हो गया है । जिस समय यह शुभ अनुष्ठान यहाँ आरम्भ हो जायगा, बलवान् कलियुग अवश्य ही इसमें बहुत बड़ा विघ्न डालेगा ॥५४ ॥
तस्माद् दिग्विजयं याहि कलिनिग्रहमाचर ।
अहं तु मासमात्रेण वैष्णवीं रीतिमास्थितः ॥ ५५
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श्रीमद्भागवतास्वादं प्रचार्य त्वत्सहायतः ।
एतान् सम्प्रापयिष्यामि नित्यधाम्नि मधुद्विषः ॥ ५६
सूत उवाच
श्रुत्वैवं तद्वचो राजा मुदितश्चिन्तयाऽऽतुरः ।
तदा विज्ञापयामास स्वाभिप्रायं तमुद्धवम् ॥५७
परीक्षिदुवाच
कलिं तु निग्रहीष्यामि तात ते वचसि स्थितः ।
श्रीभागवतसम्प्राप्तिः कथं मम भविष्यति ॥५८
अहं तु समनुग्राह्यस्तव पादतले श्रितः सूत उवाच श्रुत्वैतद् वचनं भूयोऽप्युद्धवस्तमुवाच ह ॥५९ उद्धव उवाच
राजंश्चिन्ता तु ते कापि नैव कार्या कथंचन ।
तवैव भगवच्छास्त्रे यतो मुख्याधिकारिता ॥६०
एतावत्कालपर्यन्तं प्रायो भागवतश्रुतेः ।
वार्तामपि न जानन्ति मनुष्याः कर्मतत्पराः ॥६१
त्वत्प्रसादेन बहवो मनुष्या भारताजिरे ।
श्रीमद्भागवतप्राप्तौ सुखं प्राप्स्यन्ति शाश्वतम् ॥ ६२
नन्दनन्दनरूपस्तु श्रीशुको भगवानृषिः ।
श्रीमद्भागवतं तुभ्यं श्रावयिष्यत्यसंशयम् ॥६३
इसलिये तुम दिग्विजयके लिये जाओ और कलियुगको जीतकर अपने वशमें करो । इधर मैं तुम्हारी सहायतासे वैष्णवी रीतिका सहारा लेकर एक महीनेतक यहाँ श्रीमद्भागवतकथाका रसास्वादन कराऊँगा और इस प्रकार भागवतकथाके रसका प्रसार करके इन सभी श्रोताओंको भगवान् मधुसूदनके नित्य गोलोकधाममें पहुँचाऊँगा ॥ ५५-५६ ॥ सूतजी कहते हैं – उद्धवजीकी बात सुनकर राजा परीक्षित् पहले तो कलियुगपर विजय पानेके विचारसे बड़े ही प्रसन्न हुए; परन्तु पीछे यह सोचकर कि मुझे भागवतकथाके श्रवणसे वंचित ही रहना पड़ेगा, चिन्तासे व्याकुल हो उठे । उस समय उन्होंने उद्धवजीसे अपना अभिप्राय इस प्रकार प्रकट किया ॥ ५७ ॥
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राजा परीक्षित्ने कहा - हे तात! आपकी आज्ञाके अनुसार तत्पर होकर मैं कलियुगको तो अवश्य ही अपने वशमें करूँगा, मगर श्रीमद्भागवतकी प्राप्ति मुझे कैसे होगी ॥५८ ॥
मैं भी आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ, अतः मुझपर भी आपको अनुग्रह करना
चाहिये ।
सूतजी कहते हैं - उनके इस वचनको सुनकर उद्धवजी पुनः बोले ॥५९ ॥
उद्धवजीने कहा- राजन्! तुम्हें तो किसी भी बातके लिये किसी प्रकार भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि इस भागवतशास्त्रके प्रधान अधिकारी तो तुम्हीं हो ॥ ६० ॥ संसारके
मनुष्य नाना प्रकारके कर्मोंमें रचे - पचे हुए हैं, ये लोग आजतक प्रायः भागवत - श्रवणकी बात भी नहीं जानते ॥६१ ॥ तुम्हारे ही प्रसादसे इस भारतवर्षमें रहनेवाले अधिकांश मनुष्य
श्रीमद्भागवतकथाकी प्राप्ति होनेपर शाश्वत सुख प्राप्त करेंगे || ६२|| महर्षि भगवान् श्रीशुकदेवजी साक्षात् नन्दनन्दन श्रीकृष्णके स्वरूप हैं, वे ही तुम्हें श्रीमद्भागवतकी कथा सुनायेंगे; इसमें तनिक भी सन्देहकी बात नहीं है ॥६३ ॥
तेन प्राप्स्यसि राजंस्त्वं नित्यं धाम व्रजेशितुः ।
श्रीभागवतसंचारस्ततो भुवि भविष्यति ॥ ६४
तस्मात्त्वं गच्छ राजेन्द्र कलिनिग्रहमाचर । सूत उवाच इत्युक्तस्तं परिक्रम्य गतो राजा दिशां जये ॥ ६५
वज्रस्तु निजराज्येशं प्रतिबाहुं विधाय च ।
तत्रैव मातृभिः साकं तस्थौ भागवताशया ॥६६
अथ वृन्दावने मासं गोवर्धनसमीपतः ।
श्रीमद्भागवतास्वादस्तूद्धवेन प्रवर्तितः ॥ ६७
तस्मिन्नास्वाद्यमाने तु सच्चिदानन्दरूपिणी ।
प्रचकाशे हरेर्लीला सर्वतः कृष्ण एव च ॥६८
आत्मानं च तदन्तःस्थं सर्वेऽपि ददृशुस्तदा ।
वज्रस्तु दक्षिणे दृष्ट्वा कृष्णपादसरोरुहे ॥६९
स्वात्मानं कृष्णवैधुर्यान्मुक्तस्तद्भव्यशोभत ।
ताश्च तन्मातरः कृष्णे रासरात्रिप्रकाशिनि ॥७०
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