श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1461–1470

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1461–1470

पृष्ठ 1461

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श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कीरेण भाषितम् ॥४८

प्रतिदिन कथाके अन्तमें कीर्तन करे और कथासमाप्तिके दिन रात्रिमें जागरण करे ।

समाप्ति होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणासे सन्तुष्ट करे ॥ ४५ ॥

कथावाचक गुरुको वस्त्र, आभूषण आदि देकर गौ भी अर्पण करे । इस प्रकार विधि-विधान पूर्ण करनेपर मनुष्यको स्त्री, घर, पुत्र, राज्य और धन आदि जो - जो उसे अभीष्ट होता है, वह सब मनोवांछित फल प्राप्त होता है । परन्तु सकामभाव बहुत बड़ी विडम्बना है, वह श्रीमद्भागवतकी कथामें शोभा नहीं देता ॥ ४६-४७ ॥ श्रीशुकदेवजीके मुखसे कहा हुआ यह श्रीमद्भागवतशास्त्र तो कलियुगमें साक्षात् श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाला और नित्य प्रेमानन्दरूप फल प्रदान करनेवाला है ॥४८ ॥

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्रयां संहितायां द्वितीये वैष्णवखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये भागवतश्रोतृवक्तृलक्षणश्रवणविधि - निरूपणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥

॥ समाप्तमिदं श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् ॥ ॥हरिः ॐ तत्सत् ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1462

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श्रीमद्भागवत - पाठके विभिन्न प्रयोग' भागवत - महिमा

श्लोकार्द्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतं पठेत् ।

यः पुमान् सोऽपि संसारान्मुच्यते किमुताखिलात् ॥

आधा श्लोक या चौथाई श्लोकका भी नित्य जो मनुष्य पाठ करता है, उसकी भी संसारसे मुक्ति हो जाती है; फिर सम्पूर्ण पाठ करनेवालेकी तो बात ही क्या है ।

एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्यद् भागवतमादरात् ।

नित्यं पठेद् यथाशक्ति यतः स्यात् संसृतिक्षयः ॥

बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता यही है कि संसारभयनाशक श्रीमद्भागवतका आदरपूर्वक यथाशक्ति पाठ करे ।

अशक्तो नित्य पठने मासे वर्षेऽपि वैकदा ।

पालयन् नियमान् भक्त्या श्रीमद्भागवतं पठेत् ॥

यदि नित्य पाठ न कर सकता हो तो महीने या वर्षमें एक बार नियमपूर्वक भक्तिसहित भागवतका पाठ अवश्य करना चाहिये ।

एकाहे नैव शक्तस्तु द्वयहेनाथ त्र्यहेण वा ।

पंचभिर्दिवसैः षड्भिः सप्तभिर्वा पठेत् पुमान् ॥

दशाहेनाथ पक्षेण मासेन ऋतुनापि वा ।

पठेद् भागवतं यस्तु भुक्तिं मुक्तिं स विन्दते ॥

जो एक दिनमें पाठ न कर सकता हो वह दो, तीन, पाँच, छः, सात, दस, पंद्रह, तीस या साठ दिनमें श्रीमद्भागवतका पाठ करे। इससे भोग एवं मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति होती है ।

एषोऽप्यत्युत्तमः पक्षः सप्ताहो बहुसम्मतः ।

श्रीवासुदेवप्रीत्यर्थं पठतः पुंस आदरात् ॥

सर्वे पक्षाः सन्ति तुल्या विशेषो नास्ति कश्चन ।

विशेषोऽस्ति सकामानां कामनाफलभेदतः ॥

बहुत- से ऋषियोंने सप्ताहपारायणका भी उत्तम पक्ष माना है । केवल भगवान्की प्रीतिके लिये सम्पूर्ण पक्ष बराबर हैं । कोई न्यूनाधिक नहीं हैं । फल चाहने - वालोंके लिये फलभेदसे पारायणभेद कहा गया है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1463

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( १ ) निष्कामपारायण भगवत्प्रीत्यर्थ पाठकर्ता ब्राह्मण १ या ५, पारायण - संख्या १०० या १०८ विशेष नियम — करानेवाला फलाहार या हविष्य भोजन करे । योग अध्याय दिन विश्रामस्थल-स्कन्ध अध्याय १ ३ २० ४९ २ २३ ६७ ३ ७ १५ * ३७ ४x ९ २४ * ४८ ५ 5 १० १२ १२ aa ६w १० ८२ ७० 9 १२ १३ * ५२ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1464

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( २ ) सप्ताहपारायण ( सात दिनका ) भगवत्प्रीत्यर्थ निष्कामपारायण- अध्याय योग अध्याय दिन विश्रामस्थल स्कन्ध १ ३ २० ४९ २ ५ २३ ६७ mr ७ १५ * ३७ x ९ २४ * ४८ ५ 3 १० ४२ ४२ ६w १० ९० * ४८ 9 १२ १३ * ४४ ( ३ ) सप्ताहपारायण ( सात दिनका ) मोक्षप्राप्तिके लिये दिन विश्रामस्थल -स्कन्ध अध्याय योग अध्याय १ ३ १८ ४७ २ ५ ८ ५४ I ७ ३ ५ ९ १० ३ ४४ ५ 3 १० ५३ ५० ६w ११ ९ ४६ 99 १२ १३ * ३५ ( ४ ) आरम्भ किये हुए कार्यमें विघ्ननाशके लिये पाठकर्ता ब्राह्मण ९, पारायण - संख्या १४० विशेष नियम - प्रतिदिन चतुर्थ स्कन्धके उन्नीसवें अध्याय ( पृथुविजय) का र ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1465

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पाठके आरम्भ एवं समाप्तिमें करना चाहिये । योग अध्याय दिन विश्रामस्थल-स्कन्ध अध्याय १ ३ १ ९ ४९ २ ५ ६ ५१ ३ ७ १० ४९ ९ २४ * ५३ ५ ४९ ÷ ४९ 10 ६w १० ९ ० * ४१ 10 9 १२ १३ * ४४ 10 ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1466

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( ५ ) सप्ताहपारायण ( सात दिनका ) विघ्ननाशके लिये योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध अध्याय १ ३ १९ ४९ २ ५ १६ ६१ ३ ७ १० ३ ९ ४ ९ २४ * ५३ ५ 3 १० ४९ ÷ ४९ ६w १० ९० * ४१ 9 ४४ १२ १३ * ( ६ ) सप्ताहपारायण ( सात दिनका ) धनप्राप्तिके लिये योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध अध्याय १ ९ ७१ २ ६ १३ ६१ ३ ९ ५२ ४ १० ३४ ५१ ५ १० ७३ ३ ९ ६ w १० ९ ० * १७ ७9 १२ १३ * ४४ ( ७ ) सप्ताहपारायणके प्रयोग ( सात दिनके ) ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1467

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बान्धवपीडानिवृत्ति और संकटनाशके लिये पाठकर्ता ब्राह्मण ४, पारायण - संख्या १ ९ ६ विशेष नियम – प्रतिदिन पाठके आरम्भ एवं समाप्तिमें षष्ठ स्कन्धकी देवस्तुति ( अ० ९, श्लो० ३१-४५ ) का पाठ करना चाहिये । पाठविधि— दिन विश्रामस्थल-स्कन्ध अध्याय योग अध्याय १ ३ ३३ * ६२ २ ५ २६ * ५७ mr ७ १५ * ३४ x ९ २४ * ४८ ५3 १० ९० * ९० ६w ११ ३१ * ३१ 9 १२ १३ * १३ ( ८ ) कैदसे छुड़ानेके लिये पाठकर्ता ब्राह्मण ७, पारायण - संख्या १४३ विशेष नियम - प्रतिदिन पाठके आरम्भ एवं अन्तमें दशम स्कन्धके १०।२ ९; १ ९।९; २५।१३; २७।१ ९; ४ ९ ।११ और ७०।२५– इन ६ श्लोकोंका पाठ करना चाहिये । दिन विश्रामस्थल-स्कन्ध अध्याय योग अध्याय १ ३ ३३ * ६२ २ ५ २६ * ५७ ३ १५ * ३४ ९ २४ * ४८ ५ १० ९० * ९० ६ ११ ३१ * ३१ १२ १३ * १३ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1468

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( ९ ) शत्रुपराजयके लिये पाठकर्ता ब्राह्मण ६, पारायण - संख्या १ ९ ४ विशेष नियम — प्रतिदिन पाठके प्रारम्भ एवं समाप्तिमें अष्टम स्कन्धके ‘ यज्ञेश यज्ञपुरुष ' ( अ० १७, श्लो० ८ ) आदि ३ श्लोकोंका पाठ करे । दिन विश्रामस्थल-स्कन्ध अध्याय योग अध्याय १ ४८ ३ १९ योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध अध्याय २ ५ १५ ६० ३mr ७ १५ * ४५ ४x १० १२ ६० ५ 3 १० ८४ ७२ ६w ११ ३१ * ३७ ७9 १२ १३ * १३ ( १० ) रोगमुक्तिके लिये पाठकर्ता ब्राह्मण ३, पारायण - संख्या १५७ विशेष नियम — प्रतिदिन प्रत्येक अध्यायके आरम्भमें पंचम स्कन्धके नारसिंह मन्त्र (अ० १८, श्लो० ८) का पाठ करे । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1469

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योग अध्याय - दिन विश्रामस्थल स्कन्ध अध्याय १ ३ २० ४९ २ ५ ६ ५० ३mr १ ९ * ३ ९ ४x २० ५ ९ ५ 3 १० ३५ ३ ९ ६ w १० ८५ ५० ७9 १२ १३ * ४९ ( ११ ) पुत्र और स्त्रीप्राप्तिके लिये पाठकर्ता ब्राह्मण ५, पारायण - संख्या १४५ विशेष नियम — प्रतिदिन प्रत्येक अध्यायके आरम्भ एवं अन्तमें पंचम स्कन्धके काममन्त्र ( अ० १८, श्लो० १८ ) का पाठ करे । दिन विश्रामस्थल-स्कन्ध अध्याय योग अध्याय १ ३ २४ ५३ २ ५ ३ ४३ ३ ८ ५० १० ५ ९ 3 ५ १० ५५ ५१ ६w ११ ६ ४१ १२ १३ * ३८ ( १२ ) निष्कण्टक राज्यके लिये पाठकर्ता ब्राह्मण १०, पारायण - संख्या १ ९ ८ विशेष नियम– प्रतिदिन पाठके आरम्भ एवं समाप्तिमें चतुर्थ स्कन्धकी ध्रुवस्तुति ( अ० ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1470

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९ ) का पाठ करे । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******