श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 361–370
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370
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समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्यदं पुण्ययशो मुरारेः । भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद् विपदां न तेषाम् ॥५८
एतत्ते सर्वमाख्यातं यत् पृष्टोऽहमिह त्वया ।
यत् कौमारे हरिकृतं पौगण्डे परिकीर्तितम् ॥५९
एतत् सुहृद्भिश्चरितं मुरारे- रघार्दनं शाद्वलजेमनं च । व्यक्तेतरद् रूपमजोर्वभिष्टवं शृण्वन् गृणन्नेति नरोऽखिलार्थान् ॥६० नृपश्रेष्ठ! जो लोग देहको ही आत्मा मानते हैं, वे भी अपने शरीरसे जितना प्रेम करते हैं, उतना प्रेम शरीरके सम्बन्धी पुत्र मित्र आदिसे नहीं करते ॥ ५२ ॥ जब विचारके द्वारा यह
मालूम हो जाता है कि ' यह शरीर मैं नहीं हूँ, यह शरीर मेरा है ' तब इस शरीरसे भी आत्माके समान प्रेम नहीं रहता । यही कारण है कि इस देहके जीर्ण- शीर्ण हो जानेपर भी जीनेकी आशा प्रबल रूपसे बनी रहती है ॥ ५३ ॥ इससे यह बात सिद्ध होती है कि सभी प्राणी अपने
आत्मासे ही सबसे बढ़कर प्रेम करते हैं और उसीके लिये इस सारे चराचर जगत्से भी प्रेम करते हैं ॥५४ ॥ इन श्रीकृष्णको ही तुम सब आत्माओंका आत्मा समझो । संसारके
कल्याणके लिये ही योगमायाका आश्रय लेकर वे यहाँ देहधारीके समान जान पड़ते हैं ॥ ५५ ॥ जो लोग भगवान् श्रीकृष्णके वास्तविक स्वरूपको जानते हैं, उनके लिये तो इस
जगत्में जो कुछ भी चराचर पदार्थ हैं, अथवा इससे परे परमात्मा, ब्रह्म, नारायण आदि जो भगवत्स्वरूप हैं, सभी श्रीकृष्णस्वरूप ही हैं। श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कोई प्राकृत-अप्राकृत वस्तु है ही नहीं ॥ ५६ ॥ सभी वस्तुओंका अन्तिम रूप अपने कारणमें स्थित होता
है । उस कारणके भी परम कारण हैं भगवान् श्रीकृष्ण । तब भला बताओ, किस वस्तुको श्रीकृष्णसे भिन्न बतलायें ॥ ५७ ॥ जिन्होंने पुण्यकीर्ति मुकुन्द मुरारीके पदपल्लवकी नौकाका
आश्रय लिया है, जो कि सत्पुरुषोंका सर्वस्व है, उनके लिये यह भवसागर बछड़ेके खुरके गढ़के समान है । उन्हें परमपदकी प्राप्ति हो जाती है और उनके लिये विपत्तियोंका निवासस्थान — यह संसार नहीं रहता ॥ ५८ ॥
परीक्षित्! तुमने मुझसे पूछा था कि भगवान्के पाँचवें वर्षकी लीला ग्वालबालोंने छठे वर्षमें कैसे कही, उसका सारा रहस्य मैंने तुम्हें बतला दिया ॥ ५ ९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी ग्वालबालोंके साथ वनक्रीड़ा, अघासुरको मारना, हरी - हरी घाससे युक्त भूमिपर बैठकर भोजन करना, अप्राकृतरूपधारी बछड़ों और ग्वालबालोंका प्रकट होना और ब्रह्माजीके द्वारा की हुई इस महान् स्तुतिको जो मनुष्य सुनता और कहता है - उस- उसको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ६० ॥
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एवं विहारैः कौमारैः कौमारं जहतुर्व्रजे ।
निलायनैः सेतुबन्धैर्मर्कटोत्प्लवनादिभिः ॥६१
परीक्षित्! इस प्रकार श्रीकृष्ण और बलरामने कुमार- अवस्थाके अनुरूप आँखमिचौनी, सेतु- बन्धन, बन्दरोंकी भाँति उछलना- कूदना आदि अनेकों लीलाएँ करके अपनी कुमार-अवस्था व्रजमें ही त्याग दी ॥६१ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे ब्रह्मस्तुतिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
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अथ पञ्चदशोऽध्यायः धेनुकासुरका उद्धार और ग्वालबालोंको कालियनागके विषसे बचाना श्रीशुक उवाच ततश्च पौगण्डवयःश्रितौ व्रजे
बभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ ।
गाश्चारयन्तौ सखिभिः समं पदै- र्वृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुः ॥१
तन्माधवो वेणुमुदीरयन् वृतो गोपैर्गृणद्भिः स्वयशो बलान्वितः । पशून् पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद् विहर्तुकामः कुसुमाकरं वनम् ॥२ तन्मंजुघोषालिमृगद्विजाकुलं महन्मनःप्रख्यपयःसरस्वता । वातेन जुष्ठं शतपत्रगन्धिना निरीक्ष्य रन्तुं भगवान् मनो दधे ॥३ स तत्र तत्रारुणपल्लवश्रिया फलप्रसूनोरुभरेण पादयोः । स्पृशच्छिखान् वीक्ष्य वनस्पतीन् मुदा स्मयन्निवाहाग्रजमादिपूरुषः ॥४ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अब बलराम और श्रीकृष्णने पौगण्ड- अवस्थामें अर्थात् छठे वर्षमें प्रवेश किया था । अब उन्हें गौएँ चरानेकी स्वीकृति मिल गयी । वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावनमें जाते और अपने चरणोंसे वृन्दावनको अत्यन्त पावन करते ॥ १ ॥ यह वन गौओंके लिये हरी- हरी घाससे युक्त एवं रंग- बिरंगे
पुष्पोंकी खान हो रहा था । आगे- आगे गौएँ, उनके पीछे - पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर, तदनन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्णके यशका गान करते हुए ग्वालबाल - इस प्रकार विहार करनेके लिये उन्होंने उस वनमें प्रवेश किया ॥२ ॥ उस वनमें कहीं तो भौंरे बड़ी मधुर गुंजार
कर रहे थे, कहीं झुंड- के -झुंड हरिन चौकड़ी भर रहे थे और कहीं सुन्दर- सुन्दर पक्षी चहक रहे थे । बड़े ही सुन्दर - सुन्दर सरोवर थे, जिनका जल महात्माओंके हृदयके समान स्वच्छ और निर्मल था । उनमें खिले हुए कमलोंके सौरभसे सुवासित होकर शीतल- मन्द- सुगन्ध वायु उस वनकी सेवा कर रही थी । इतना मनोहर था वह वन कि उसे देखकर भगवान्ने मन- ही-मन- म ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उसमें विहार करनेका संकल्प किया || ३ || पुरुषोत्तम भगवान्ने देखा कि बड़े - बड़े वृक्ष फल और फूलोंके भारसे झुककर अपनी डालियों और नूतन कोंपलोंकी लालिमासे उनके चरणोंका स्पर्श कर रहे हैं, तब उन्होंने बड़े आनन्दसे कुछ मुसकरात हुए- से अपने बड़े भाई बलरामजीसे कहा ॥४ ॥
श्रीभगवानुवाच अहो अमी देववरामरार्चितं
पादाम्बुजं ते सुमनःफलार्हणम् ।
नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन- स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम् ॥५
एतेऽलिनस्तव यशोऽखिललोकतीर्थं गायन्त आदिपुरुषानुपदं भजन्ते । प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदैवम् ॥६ नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा हरिण्यः कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन । सूक्तैश्च कोकिलगणा गृहमागताय धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः ॥७
धन्येयमद्य धरणी तृणवीरुधस्त्वत्- पादस्पृशो द्रुमलताः करजाभिमृष्टाः ।
नद्योऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकै- गॊप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः ॥८
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- देवशिरोमणे! यों तो बड़े -बड़े देवता आपके चरणकमलोंकी पूजा करते हैं; परन्तु देखिये तो, ये वृक्ष भी अपनी डालियोंसे सुन्दर पुष्प और फलोंकी सामग्री लेकर आपके चरणकमलोंमें झुक रहे हैं, नमस्कार कर रहे हैं । क्यों न हो, इन्होंने इसी सौभाग्यके लिये तथा अपना दर्शन एवं श्रवण करनेवालोंके अज्ञानका नाश करनेके लिये ही तो वृन्दावनधाममें वृक्ष - योनि ग्रहण की है । इनका जीवन धन्य है || ५ || आदिपुरुष! यद्यपि आप इस वृन्दावनमें अपने ऐश्वर्यरूपको छिपाकर बालकोंकी - सी लीला कर रहे हैं, फिर भी आपके श्रेष्ठ भक्त मुनिगण अपने इष्टदेवको पहचानकर यहाँ भी प्रायः भौंरोंके रूपमें आपके भुवन- पावन यशका निरन्तर गान करते हुए आपके भजनमें लगे रहते हैं । वे एक क्षणके लिये भी आपको नहीं छोड़ना चाहते ॥ ६ ॥ भाईजी! वास्तवमें आप ही स्तुति करनेयोग्य हैं ।
देखिये, आपको अपने घर आया देख ये मोर आपके दर्शनोंसे आनन्दित होकर नाच रहे हैं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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हरिनियाँ मृगनयनी गोपियोंके समान अपनी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे आपके प्रति प्रेम प्रकट कर रही हैं, आपको प्रसन्न कर रही हैं । ये कोयलें अपनी मधुर कुहू कुहू ध्वनिसे आपका कितना सुन्दर स्वागत कर रही हैं! ये वनवासी होनेपर भी धन्य हैं । क्योंकि सत्पुरुषोंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे घर आये अतिथिको अपनी प्रिय- से - प्रिय वस्तु भेंट कर देते हैं ॥७ ॥ आज यहाँकी भूमि अपनी हरी - हरी घासके साथ आपके चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके
धन्य हो रही है । यहाँके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ आपकी अँगुलियोंका स्पर्श पाकर अपना अहोभाग्य मान रही हैं । आपकी दयाभरी चितवनसे नदी, पर्वत, पशु, पक्षी - सब कृतार्थ हो रहे हैं और व्रजकी गोपियाँ आपके वक्षःस्थलका स्पर्श प्राप्त करके, जिसके लिये स्वयं लक्ष्मी भी लालायित रहती हैं, धन्य- धन्य हो रही हैं ॥ ८ ॥
श्रीशुक उवाच
एवं वृन्दावनं श्रीमत् कृष्णः प्रीतमनाः पशून् ।
रेमे संचारयन्नद्रेः सरिद्रोधस्सु सानुगः ॥९
क्वचिद् गायति गायत्सु मदान्धालिष्वनुव्रतैः ।
उपगीयमानचरितः स्रग्वी संकर्षणान्वितः ॥१०
क्वचिच्च कलहंसानामनुकूजति कूजितम् ।
अभिनृत्यति नृत्यन्तं बर्हिणं हासयन् क्वचित् ॥ ११
मेघगम्भीरया वाचा नामभिर्दूरगान् पशून् ।
क्वचिदाह्वयति प्रीत्या गोगोपालमनोज्ञया ॥१२
चकोरक्रौञ्चचक्राह्वभारद्वाजांश्च बर्हिणः ।
अनुरौति स्म सत्त्वानां भीतवद् व्याघ्रसिंहयोः ॥ १३
क्वचित् क्रीडापरिश्रान्तं गोपोत्संगोपबर्हणम् ।
स्वयं विश्रमयत्यार्यं पादसंवाहनादिभिः ॥ १४
नृत्यतो गायतः क्वापि वल्गतो युध्यतो मिथः ।
गृहीतहस्तौ गोपालान् हसन्तौ प्रशशंसतुः ॥१५
क्वचित् पल्लवतल्पेषु नियुद्धश्रमकर्शितः ।
वृक्षमूलाश्रयः शेते गोपोत्संगोपबर्हणः ॥१६
पादसंवाहनं चक्रुः केचित्तस्य महात्मनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अपरे हतपाप्मानो व्यजनैः समवीजयन् ॥ १७ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार परम सुन्दर वृन्दावनको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही आनन्दित हुए । वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गोवर्धनकी तराईमें, यमुनातटपर गौओंको चराते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करने लगे ॥९ ॥ एक ओर
ग्वालबाल भगवान् श्रीकृष्णके चरित्रोंकी मधुर तान छेड़े रहते हैं, तो दूसरी ओर बलरामजीके साथ वनमाला पहने हुए श्रीकृष्ण मतवाले भौंरोंकी सुरीली गुनगुनाहटमें अपना स्वर मिलाकर मधुर संगीत अलापने लगते हैं ॥१० ॥
कभी- कभी श्रीकृष्ण कूजते हुए राजहंसोंके साथ स्वयं भी कूजने लगते हैं और कभी नाचते हुए मोरोंके साथ स्वयं भी ठुमुक ठुमुक नाचने लगते हैं और ऐसा नाचते हैं कि मयूरको उपहासास्पद बना देते हैं । | ११ || कभी मेघके समान गम्भीर वाणीसे दूर गये हुए पशुओंको उनका नाम ले - लेकर बड़े प्रेमसे पुकारते हैं । उनके कण्ठकी मधुर ध्वनि सुनकर गायों और ग्वालबालोंका चित्त भी अपने वशमें नहीं रहता ॥१२ ॥ कभी चकोर, क्रौंच ( कराँकुल ),
चकवा, भरदूल और मोर आदि पक्षियोंकी - सी बोली बोलते तो कभी बाघ, सिंह आदिकी गर्जनासे डरे हुए जीवोंके समान स्वयं भी भयभीतकी-सी लीला करते ॥१३ ॥ जब
बलरामजी खेलते - खेलते थककर किसी ग्वाल- बालकी गोदके तकियेपर सिर रखकर लेट जाते, तब श्रीकृष्ण उनके पैर दबाने लगते, पंखा झलने लगते और इस प्रकार अपने बड़े भाईकी थकावट दूर करते || १४ || जब ग्वालबाल नाचने - गाने लगते अथवा ताल ठोंक-ठोंककर एक- दूसरेसे कुश्ती लड़ने लगते, तब श्याम और राम दोनों भाई हाथमें हाथ डालकर खड़े हो जाते और हँस-हँसकर 'वाह- वाह ' करते ॥१५ ॥ कभी- कभी स्वयं श्रीकृष्ण भी
ग्वाल- बालोंके साथ कुश्ती लड़ते- लड़ते थक जाते तथा किसी सुन्दर वृक्षके नीचे कोमल पल्लवोंकी सेजपर किसी ग्वालबालकी गोदमें सिर रखकर लेट जाते ॥ १६ ॥ परीक्षित्! उस
समय कोई- कोई पुण्यके मूर्तिमान् स्वरूप ग्वालबाल महात्मा श्रीकृष्णके चरण दबाने लगते और दूसरे निष्पाप बालक उन्हें बड़े - बड़े पत्तों या अँगोछियोंसे पंखा झलने लगते ॥१७ ॥
किसी - किसीके हृदयमें प्रेमकी धारा उमड़ आती तो वह धीरे- धीरे उदारशिरोमणि परममनस्वी श्रीकृष्णकी लीलाओंके अनुरूप उनके मनको प्रिय लगनेवाले मनोहर गीत गाने लगता ॥१८ ॥ भगवान्ने इस प्रकार अपनी योगमायासे अपने ऐश्वर्यमय स्वरूपको छिपा
रखा था । वे ऐसी लीलाएँ करते, जो ठीक- ठीक गोपबालकोंकी - सी ही मालूम पड़तीं । स्वयं भगवती लक्ष्मी जिनके चरणकमलोंकी सेवामें संलग्न रहती हैं, वे ही भगवान् इन ग्रामीण बालकोंके साथ बड़े प्रेमसे ग्रामीण खेल खेला करते थे । परीक्षित्! ऐसा होनेपर भी कभी-कभी उनकी ऐश्वर्यमयी लीलाएँ भी प्रकट हो जाया करतीं ॥ १ ९ ॥
अन्ये तदनुरूपाणि मनोज्ञानि महात्मनः ।
गायन्ति स्म महाराज स्नेहक्लिन्नधियः शनैः ॥१८
एवं निगूढात्मगतिः स्वमायया ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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गोपात्मजत्वं चरितैर्विडम्बयन् । रेमे रमालालितपादपल्लवो ग्राम्यैः समं ग्राम्यवदीशचेष्टितः ॥१९
श्रीदामा नाम गोपालो रामकेशवयोः सखा ।
सुबलस्तोककृष्णाद्या गोपाः प्रेम्णेदमब्रुवन् ॥ २०
राम राम महाबाहो कृष्ण दुष्टनिबर्हण ।
इतोऽविदूरे सुमहद् वनं तालालिसंकुलम् ॥२१
फलानि तत्र भूरीणि पतन्ति पतितानि च ।
सन्ति किंत्ववरुद्धानि धेनुकेन दुरात्मना ॥२२
सोऽतिवीर्योऽसुरो राम हेकृष्ण खररूपधृक् ।
आत्मतुल्यबलैरन्यैर्ज्ञातिभिर्बहुभिर्वृतः ॥२३
तस्मात् कृतनराहाराद् भीतैर्नृभिरमित्रहन् ।
न सेव्यते पशुगणैः पक्षिसंघैर्विवर्जितम् ॥२४
विद्यन्तेऽभुक्तपूर्वाणि फलानि सुरभीणि च ।
एष वै सुरभिर्गन्धो विषूचीनोऽवगृह्यते ॥२५
बलरामजी और श्रीकृष्णके सखाओंमें एक प्रधान गोप-बालक थे श्रीदामा । एक दिन उन्होंने तथा सुबल और स्तोककृष्ण (छोटे कृष्ण) आदि ग्वालबालोंने श्याम और रामसे बड़े प्रेमके साथ कहा— || २० || 'हमलोगोंको सर्वदा सुख पहुँचानेवाले बलरामजी! आपके बाहुबलकी तो कोई थाह ही नहीं है । हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण! दुष्टोंको नष्ट कर डालना तो तुम्हारा स्वभाव ही है । यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक बड़ा भारी वन है । बस, उसमें पाँत- के - पाँत ताड़के वृक्ष भरे पड़े हैं ॥२१ ॥ वहाँ बहुत- से ताड़के फल पक- पककर गिरते रहते हैं और
बहुत - से पहलेके गिरे हुए भी हैं । परन्तु वहाँ धेनुक नामका एक दुष्ट दैत्य रहता है । उसने उन फलोंपर रोक लगा रखी है ॥२२ ॥ बलरामजी और भैया श्रीकृष्ण! वह दैत्य गधेके रूपमें
रहता है। वह स्वयं तो बड़ा बलवान् है ही, उसके साथी और भी बहुत - से उसीके समान बलवान् दैत्य उसी रूपमें रहते हैं || २३ || मेरे शत्रुघाती भैया! उस दैत्यने अबतक न जाने कितने मनुष्य खा डाले हैं । यही कारण है कि उसके डरके मारे मनुष्य उसका सेवन नहीं करते और पशु- पक्षी भी उस जंगलमें नहीं जाते ॥ २४ ॥ उसके फल हैं तो बड़े सुगन्धित,
परन्तु हमने कभी नहीं खाये । देखो न, चारों ओर उन्हींकी मन्द मन्द सुगन्ध फैल रही है । तनिक- सा ध्यान देनेसे उसका रस मिलने लगता है ॥ २५ ॥ श्रीकृष्ण! उनकी सुगन्धसे हमारा
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मन मोहित हो गया है और उन्हें पानेके लिये मचल रहा है । तुम हमें वे फल अवश्य खिलाओ । दाऊ दादा! हमें उन फलोंकी बड़ी उत्कट अभिलाषा है । आपको रुचे तो वहाँ अवश्य चलिये ॥२६ ॥
प्रयच्छ तानि नः कृष्ण गन्धलोभितचेतसाम् ।
वाञ्छास्ति महती राम गम्यतां यदि रोचते ॥२६
एवं सुहृद्वचः श्रुत्वा सुहृत्प्रियचिकीर्षया ।
प्रहस्य जग्मतुर्गोपैर्वृतौ तालवनं प्रभू ॥२७
बलः प्रविश्य बाहुभ्यां तालान् सम्परिकम्पयन् ।
फलानि पातयामास मतंगज इवौजसा ॥२८
फलानां पततां शब्दं निशम्यासुररासभः अभ्यधावत् क्षितितलं सनगं परिकम्पयन् ॥२९
समेत्य तरसा प्रत्यग् द्वाभ्यां पद्भ्यां बलं बली ।
निहत्योरसि काशब्दं मुंचन् पर्यसरत् खलः ॥३०
पुनरासाद्य संरब्ध उपक्रोष्टा पराक् स्थितः ।
चरणावपरौ राजन् बलाय प्राक्षिपद् रुषा ॥३१
सतं गृहीत्वा प्रपदोर्भ्रामयित्वैकपाणिना ।
चिक्षेप तृणराजाग्रे भ्रामणत्यक्तजीवितम् ॥३२
तेनाहतो महातालो वेपमानो बृहच्छिराः ।
पार्श्वस्थं कम्पयन् भग्नः स चान्यं सोऽपि चापरम् ॥३३
बलस्य लीलयोत्सृष्टखरदेहहताहताः ।
तालाश्चकम्पिरे सर्वे महावातेरिता इव ॥३४
अपने सखा ग्वालबालोंकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों हँसे और फिर उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उनके साथ तालवनके लिये चल पड़े ॥२७ ॥ उस वनमें
पहुँचकर बलरामजीने अपनी बाँहोंसे उन ताड़के पेड़ोंको पकड़ लिया और मतवाले हाथीके बच्चेके समान उन्हें बड़े जोरसे हिलाकर बहुत से फल नीचे गिरा दिये || २८ || जब गधेके रूपमें रहनेवाले दैत्यने फलोंके गिरनेका शब्द सुना, तब वह पर्वतोंके साथ सारी पृथ्वीको ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कँपाता हुआ उनकी ओर दौड़ा ॥ २ ९ ॥ वह बड़ा बलवान् था । उसने बड़े वेगसे बलरामजीके सामने आकर अपने पिछले पैरोंसे उनकी छातीमें दुलत्ती मारी और इसके बाद वह दुष्ट बड़े जोरसे रेंकता हुआ वहाँसे हट गया || ३० || राजन्! वह गधा क्रोधमें भरकर फिर रेंकता हुआ दूसरी बार बलरामजीके पास पहुँचा और उनकी ओर पीठ करके फिर बड़े क्रोधसे अपने पिछले पैरोंकी दुलत्ती चलायी ॥ ३१ ॥ बलरामजीने अपने एक ही हाथसे उसके दोनों पैर
पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाकर एक ताड़के पेड़पर दे मारा । घुमाते समय ही उस गधेके प्राणपखेरू उड़ गये थे ॥३२ ॥
उसके गिरनेकी चोटसे वह महान् ताड़का वृक्ष- जिसका ऊपरी भाग बहुत विशाल था— स्वयं तो तड़तड़ाकर गिर ही पड़ा, सटे हुए दूसरे वृक्षको भी उसने तोड़ डाला । उसने तीसरेको तीसरेने चौथेको इस प्रकार दूसरेको गिराते हुए बहुत से तालवृक्ष गिर , ॥ बलरामजीके लिये— तो यह एक एक-खेल था । परन्तु उनके द्वारा-पड़े ॥३३ फेंके हुए गधेशरीरसे चोट खा- खाकर वहाँ सब- के - सब ताड़ हिल गये । ऐसा जान पड़ा, मानो सबको झंझावातने झकझोर दिया हो ॥ ३४ ॥
नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्वरे ।
ओतप्रोतमिदं यस्मिंस्तन्तुष्वंग यथा पटः ॥३५
ततः कृष्णं च रामं च ज्ञातयो धेनुकस्य ये ।
क्रोष्टारोऽभ्यद्रवन् सर्वे संरब्धा हतबान्धवाः ॥३६
तांस्तानापततः कृष्णो रामश्च नृप लीलया ।
गृहीतपश्चाच्चरणान् प्राहिणोत्तृणराजसु ॥३७
फलप्रकरसंकीर्णं दैत्यदेहैर्गतासुभिः ।
रराज भूः सतालाग्रैर्घनैरिव नभस्तलम् ॥३८
तयोस्तत् सुमहत् कर्म निशाम्य विबुधादयः ।
मुमुचुः पुष्पवर्षाणि चक्रुर्वाद्यानि तुष्टुवुः ॥३९
अथ तालफलान्यादन् मनुष्या गतसाध्वसाः ।
तृणं च पशवश्चेरुर्हतधेनुककानने ॥४०
कृष्णः कमलपत्राक्षः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
स्तूयमानोऽनुगैर्गोपैः साग्रजो व्रजमाव्रजत् ॥४१
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तं गोरजश्छुरितकुन्तलबद्धबर्ह- वन्यप्रसूनरुचिरेक्षणचारुहासम् । वेणुं क्वणन्तमनुगैरनुगीतकीर्ति गोप्यो दिदृक्षितदृशोऽभ्यगमन् समेताः ॥४२ भगवान् बलराम स्वयं जगदीश्वर हैं । उनमें यह सारा संसार ठीक वैसे ही ओतप्रोत है, जैसे सूतोंमें वस्त्र। तब भला, उनके लिये यह कौन आश्चर्यकी बात है ॥३५ ॥ उस समय
धेनुकासुरके भाई-बन्धु अपने भाईके मारे जानेसे क्रोधके मारे आगबबूला हो गये । सब - के-सब गधे बलरामजी और श्रीकृष्णपर बड़े वेगसे टूट पड़े ॥ ३६ ॥ राजन्! उनमेंसे जो - जो पास
आया, उसी - उसीको बलरामजी और श्रीकृष्णने खेल- खेलमें ही पिछले पैर पकड़कर तालवृक्षोंपर दे मारा ॥ ३७ ॥ उस समय वह भूमि ताड़के फलोंसे पट गयी और टूटे हुए वृक्ष
तथा दैत्योंके प्राणहीन शरीरोंसे भर गयी । जैसे बादलोंसे आकाश ढक गया हो, उस भूमिकी वैसी ही शोभा होने लगी ॥ ३८ ॥ बलरामजी और श्रीकृष्णकी यह मंगलमयी लीला देखकर
देवतागण उनपर फूल बरसाने लगे और बाजे बजा- बजाकर स्तुति करने लगे ॥३९ ॥ जिस
दिन धेनुकासुर मरा, उसी दिनसे लोग निडर होकर उस वनके तालफल खाने लगे तथा पशु भी स्वच्छन्दताके साथ घास चरने लगे ॥ ४० ॥
इसके बाद कमलदललोचन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ व्रजमें आये । उस समय उनके साथी ग्वालबाल उनके पीछे - पीछे चलते हुए उनकी स्तुति करते जाते थे । क्यों न हो; भगवान्की लीलाओंका श्रवण - कीर्तन ही सबसे बढ़कर पवित्र जो है ॥४१ ॥ उस
समय श्रीकृष्णकी घुँघराली अलकोंपर गौओंके खुरोंसे उड़- उड़कर धूलि पड़ी हुई थी, सिरपर मोरपंखका मुकुट था और बालोंमें सुन्दर- सुन्दर जंगली पुष्प गुँथे हुए थे । उनके नेत्रोंमें मधुर चितवन और मुखपर मनोहर मुसकान थी । वे मधुर- मधुर मुरली बजा रहे थे और साथी ग्वालबाल उनकी ललित कीर्तिका गान कर रहे थे । वंशीकी ध्वनि सुनकर बहुत- सी गोपियाँ एक साथ ही व्रजसे बाहर निकल आयीं । उनकी आँखें न जाने कबसे श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तरस रही थीं ॥४२ ॥
पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षिभृङ्गै- स्तापं जहुर्विरहजं व्रजयोषितोऽह्नि । तत्सत्कृतिं समधिगम्य विवेश गोष्ठं सव्रीडहासविनयं यदपांगमोक्षम् ॥४३
तयोर्यशोदारोहिण्यौ पुत्रयोः पुत्रवत्सले ।
यथाकामं यथाकालं व्यधत्तां परमाशिषः ॥४४
गताध्वानश्रमौ तत्र मज्जनोन्मर्दनादिभिः ।
नीवीं वसित्वा रुचिरां दिव्यस्रग्गन्धमण्डितौ ॥४५
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