श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 381–390

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽऽचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता ॥३६ न नाकपृष्ठं न च सार्वभौमं न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा वाञ्छन्ति यत्पादरजःप्रपन्नाः ॥३७ तदेष नाथाप दुरापमन्यै- स्तमोजनिः क्रोधवशोऽप्यहीशः । संसारचक्रे भ्रमतः शरीरिणो यदिच्छतः स्याद् विभवः समक्षः ॥३८ आपने हमलोगोंपर यह बड़ा ही अनुग्रह किया। यह तो आपका कृपा-प्रसाद ही है । क्योंकि आप जो दुष्टोंको दण्ड देते हैं, उससे उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इस सर्पके अपराधी होनेमें तो कोई सन्देह ही नहीं है । यदि यह अपराधी न होता तो इसे सर्पकी योनि ही क्यों मिलती? इसलिये हम सच्चे हृदयसे आपके इस क्रोधको भी आपका अनुग्रह ही समझती हैं ॥३४ ॥

अवश्य ही पूर्वजन्ममें इसने स्वयं मानरहित होकर और दूसरोंका सम्मान करते हुए कोई बहुत बड़ी तपस्या की है । अथवा सब जीवोंपर दया करते हुए इसने कोई बहुत बड़ा धर्म किया है तभी तो आप इसके ऊपर सन्तुष्ट हुए हैं । क्योंकि सर्व- जीवस्वरूप आपकी प्रसन्नताका यही उपाय है ॥३५ ॥

भगवन्! हम नहीं समझ पातीं कि यह इसकी किस साधनाका फल है, जो यह आपके चरणकमलोंकी धूलका स्पर्श पानेका अधिकारी हुआ है । आपके चरणोंकी रज इतनी दुर्लभ है कि उसके लिये आपकी अर्द्धांगिनी लक्ष्मीजीको भी बहुत दिनोंतक समस्त भोगोंका त्याग करके नियमोंका पालन करते हुए तपस्या करनी पड़ी थी ॥ ३६ ॥

प्रभो! जो आपके चरणोंकी धूलकी शरण ले लेते हैं, वे भक्तजन स्वर्गका राज्य या पृथ्वीकी बादशाही नहीं चाहते। न वे रसातलका ही राज्य चाहते और न तो ब्रह्माका पद ही लेना चाहते हैं । उन्हें अणिमादि योग- सिद्धियोंकी भी चाह नहीं होती । यहाँतक कि वे जन्म- मृत्युसे छुड़ानेवाले कैवल्य- मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते ॥ ३७ ॥

स्वामी! यह नागराज तमोगुणी योनिमें उत्पन्न हुआ है और अत्यन्त क्रोधी है । फिर भी इसे आपकी वह परम पवित्र चरणरज प्राप्त हुई, जो दूसरोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है; तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छा- मात्र से ही संसारचक्रमें पड़े हुए जीवको संसारके वैभव - सम्पत्तिकी तो बात ही क्या- मोक्षकी भी प्राप्ति हो जाती है ॥ ३८ ॥

नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 382

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भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने ॥३९

ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।

अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च ॥४०

कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे ।

विश्वाय तदुपद्रष्ट्रे तत्कर्त्रे विश्वहेतवे ॥४१

भूतमात्रेन्द्रियप्राणमनोबुद्धयाशयात्मने ।

त्रिगुणेनाभिमानेन गूढस्वात्मानुभूतये ॥ ४२

नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय कूटस्थाय विपश्चिते ।

नानावादानुरोधाय वाच्चवाचकशक्तये ॥४३

नमः प्रमाणमूलाय कवये शास्त्रयोनये ।

प्रवृत्ताय निवृत्ताय निगमाय नमो नमः ॥४४

प्रभो! हम आपको प्रणाम करती हैं । आप अनन्त एवं अचिन्त्य ऐश्वर्यके नित्य निधि हैं । आप सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान होनेपर भी अनन्त हैं । आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंके आश्रय तथा सब पदार्थोंके रूपमें भी विद्यमान हैं । आप प्रकृतिसे परे स्वयं परमात्मा हैं ॥३९ ॥ आप सब प्रकारके ज्ञान और अनुभवोंके खजाने हैं । आपकी महिमा और शक्ति

अनन्त है । आपका स्वरूप अप्राकृत - दिव्य चिन्मय है, प्राकृतिक गुणों एवं विकारोंका आप कभी स्पर्श ही नहीं करते । आप ही ब्रह्म हैं, हम आपको नमस्कार कर रही हैं ॥४० ॥ आप

प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले काल हैं, कालशक्तिके आश्रय हैं और कालके क्षण- कल्प आदि समस्त अवयवोंके साक्षी हैं । आप विश्वरूप होते हुए भी उससे अलग रहकर उसके द्रष्टा हैं । आप उसके बनानेवाले निमित्तकारण तो हैं ही, उसके रूपमें बननेवाले उपादानकारण भी हैं ॥४१ ॥ प्रभो! पंचभूत, उनकी तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और इन सबका

खजाना चित्त — ये सब आप ही हैं। तीनों गुण और उनके कार्योंमें होनेवाले अभिमानके द्वारा आपने अपने साक्षात्कारको छिपा रखा है ॥४२ ॥ आप देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे

बाहर — अनन्त हैं । सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और कार्य- कारणोंके समस्त विकारोंमें भी एकरस, विकाररहित और सर्वज्ञ हैं । ईश्वर हैं कि नहीं हैं, सर्वज्ञ हैं कि अल्पज्ञ इत्यादि अनेक मतभेदोंके अनुसार आप उन उन मतवादियोंको उन्हीं -उन्हीं रूपोंमें दर्शन देते हैं । समस्त शब्दोंके अर्थके रूपमें तो आप हैं ही, शब्दोंके रूपमें भी हैं तथा उन दोनोंका सम्बन्ध जोड़नेवाली शक्ति भी आप ही हैं । हम आपको नमस्कार करती हैं ॥ ४३ ॥ प्रत्यक्ष अनुमान आदि जितने भी प्रमाण

हैं, उनको प्रमाणित करनेवाले मूल आप ही हैं । समस्त शास्त्र आपसे ही निकले हैं और आपका ज्ञान स्वतःसिद्ध है । आप ही मनको लगानेकी विधिके रूपमें और उसको सब कहींसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 383

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हटा लेनेकी आज्ञाके रूपमें प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग हैं । इन दोनोंके मूल वेद भी स्वयं आप ही हैं । हम आपको बार- बार नमस्कार करती हैं ॥४४ ॥

नमः कृष्णाय रामाय वसुदेवसुताय च ।

प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥४५

नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मच्छादनाय च ।

गुणवृत्त्युपलक्ष्याय गुणद्रष्ट्रे स्वसंविदे ॥४६

अव्याकृतविहाराय सर्वव्याकृतसिद्धये ।

हृषीकेश नमस्तेऽस्तु मुनये मौनशीलिने ॥४७

परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः ।

अविश्वाय च विश्वाय तद्द्द्रष्ट्रेऽस्य च हेतवे ॥४८

त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् प्रभो गुणैरनहोऽकृत कालशक्तिधृक् । तत्तत्स्वभावान् प्रतिबोधयन् सतः समीक्षयामोघविहार ईहसे ॥४९ तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां शान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः । शान्ताः प्रियास्ते ह्यधुनावितुं सतां स्थातुश्च ते धर्मपरीप्सयेहतः ॥ ५० आप शुद्धसत्त्वमय वसुदेवके पुत्र वासुदेव, संकर्षण एवं प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी हैं । इस प्रकार चतुर्व्यूहके रूपमें आप भक्तों तथा यादवोंके स्वामी हैं । श्रीकृष्ण! हम आपको नमस्कार करती हैं ॥४५ ॥ आप अन्तःकरण और उसकी वृत्तियोंके प्रकाशक हैं और उन्हींके द्वारा

अपने - आपको ढक रखते हैं। उन अन्तःकरण और वृत्तियोंके द्वारा ही आपके स्वरूपका कुछ - कुछ संकेत भी मिलता है। आप उन गुणों और उनकी वृत्तियोंके साक्षी तथा स्वयंप्रकाश हैं। हम आपको नमस्कार करती हैं || ४६ || आप मूलप्रकृतिमें नित्य विहार करते रहते हैं । समस्त स्थूल और सूक्ष्म जगत्की सिद्धि आपसे ही होती है । हृषीकेश! आप मननशील आत्माराम हैं । मौन ही आपका स्वभाव है । आपको हमारा नमस्कार है ॥४७ ॥ आप स्थूल,

सूक्ष्म समस्त गतियोंके जाननेवाले तथा सबके साक्षी हैं । आप नामरूपात्मक विश्वप्रपंचके निषेधकी अवधि तथा उसके अधिष्ठान होनेके कारण विश्वरूप भी हैं । आप विश्वके अध्यास तथा अपवादके साक्षी हैं एवं अज्ञानके द्वारा उसकी सत्यत्वभ्रान्ति एवं स्वरूपज्ञानके द्वारा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 384

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उसकी आत्यन्तिक निवृत्तिके भी कारण हैं । आपको हमारा नमस्कार है ॥४८ ॥

प्रभो! यद्यपि कर्तापन न होनेके कारण आप कोई भी कर्म नहीं करते, निष्क्रिय हैं-तथापि अनादि कालशक्तिको स्वीकार करके प्रकृतिके गुणोंके द्वारा आप इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करते हैं। क्योंकि आपकी लीलाएँ अमोघ हैं । आप सत्यसंकल्प हैं । इसलिये जीवोंके संस्काररूपसे छिपे हुए स्वभावोंको अपनी दृष्टिसे जाग्रत् कर देते हैं ॥४९ ॥ त्रिलोकीमें तीन प्रकारकी योनियाँ हैं— सत्त्वगुणप्रधान शान्त,

रजोगुणप्रधान अशान्त और तमोगुणप्रधान मूढ । वे सब की - सब आपकी लीला - मूर्तियाँ हैं । फिर भी इस समय आपको सत्त्वगुणप्रधान शान्तजन ही विशेष प्रिय हैं । क्योंकि आपका यह अवतार और ये लीलाएँ साधुजनोंकी रक्षा तथा धर्मकी रक्षा एवं विस्तारके लिये ही हैं ॥५० ॥

शान्तात्मन्! स्वामीको एक बार अपनी प्रजाका अपराध सह लेना चाहिये । यह मूढ है, आपको पहचानता नहीं है, इसलिये इसे क्षमा कर दीजिये ॥ ५१ ॥ भगवन्! कृपा कीजिये;

अब यह सर्प मरने ही वाला है । साधुपुरुष सदासे ही हम अबलाओंपर दया करते आये हैं । अतः आप हमें हमारे प्राणस्वरूप पतिदेवको दे दीजिये ॥ ५२ ॥ हम आपकी दासी हैं । हमें

आप आज्ञा दीजिये, आपकी क्या सेवा करें? क्योंकि जो श्रद्धाके साथ आपकी आज्ञाओंका पालन — आपकी सेवा करता है, वह सब प्रकारके भयोंसे छुटकारा पा जाता है ॥५३ ॥

अपराधः सकृद् भर्त्रा सोढव्यः स्वप्रजाकृतः ।

क्षन्तुमर्हसि शान्तात्मन् मूढस्य त्वामजानतः ॥ ५१

अनुगृह्णीष्व भगवन् प्राणांस्त्यजति पन्नगः ।

स्त्रीणां नः साधुशोच्यानां पतिः प्राणः प्रदीयताम् ॥५२

विधेहि ते किंकरीणामनुष्ठेयं तवाज्ञया ।

यच्छ्रद्धयानुतिष्ठन् वै मुच्यते सर्वतोभयात् ॥५३

श्रीशुक उवाच

इत्थं स नागपत्नीभिर्भगवान् समभिष्टुतः ।

मूर्च्छितं भग्नशिरसं विससर्जाङ्घ्रिकुट्टनैः ॥५४

प्रतिलब्धेन्द्रियप्राणः कालियः शनकैर्हरिम् ।

कृच्छ्रात् समुच्छ्वसन् दीनः कृष्णं प्राह कतांजलिः ॥५५

कालिय उवाच

वयं खलाः सहोत्पत्त्या तामसा दीर्घमन्यवः ।

स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसद्ग्रहः ॥५६

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पृष्ठ 385

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त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातर्गुणविसर्जनम् ।

नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥५७

वयं च तत्र भगवन् सर्पा जात्युरुमन्यवः ।

कथं त्यजामस्त्वन्मायां दुस्त्यजां मोहिताः स्वयम् ॥५८

भवान् हि कारणं तत्र सर्वज्ञो जगदीश्वरः ।

अनुग्रहं निग्रहं वा मन्यसे तद् विधेहि नः ॥५९

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान्के चरणोंकी ठोकरोंसे कालिय नागके फण छिन्न- भिन्न हो गये थे । वह बेसुध हो रहा था । जब नागपत्नियोंने इस प्रकार भगवान्की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया ॥ ५४ ॥ धीरे - धीरे कालिय नागकी इन्द्रियों और

प्राणोंमें कुछ - कुछ चेतना आ गयी । वह बड़ी कठिनतासे श्वास लेने लगा और थोड़ी देरके बाद बड़ी दीनतासे हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोला ॥ ५५ ॥

कालिय नागने कहा – नाथ! हम जन्मसे ही दुष्ट, तमोगुणी और बहुत दिनोंके बाद भी बदला लेनेवाले — बड़े क्रोधी जीव हैं । जीवोंके लिये अपना स्वभाव छोड़ देना बहुत कठिन है । इसीके कारण संसारके लोग नाना प्रकारके दुराग्रहोंमें फँस जाते हैं ॥ ५६ ॥ विश्वविधाता!

आपने ही गुणोंके भेदसे इस जगत्में नाना प्रकारके स्वभाव, वीर्य, बल, योनि, बीज, चित्त और आकृतियोंका निर्माण किया है ॥ ५७ ॥ भगवन्! आपकी ही सृष्टिमें हम सर्प भी हैं । हम

जन्मसे ही बड़े क्रोधी होते हैं । हम इस मायाके चक्कर में स्वयं मोहित हो रहे हैं । फिर अपने प्रयत्नसे इस दुस्त्यज मायाका त्याग कैसे करें ॥ ५८ ॥ आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण जगत्के

स्वामी हैं । आप ही हमारे स्वभाव और इस मायाके कारण हैं । अब आप अपनी इच्छासे— जैसा ठीक समझें – कृपा कीजिये या दण्ड दीजिये ॥५९ ॥

श्रीशुक उवाच इत्याकर्ण्य वचः प्राह भगवान् कार्यमानुषः ।

नात्र स्थेयं त्वया सर्प समुद्रं याहि मा चिरम् ।

स्वज्ञात्यपत्यदाराढ्यो गोनृभिर्भुज्यतां नदी ॥ ६०

य एतत् संस्मरेन्मर्त्यस्तुभ्यं मदनुशासनम् ।

कीर्तयन्नुभयोः सन्ध्योर्न युष्मद् भयमाप्नुयात् ॥६१

योऽस्मिन् स्नात्वा मदाक्रीडे देवादींस्तर्पयेज्जलैः ।

उपोष्य मां स्मरन्नर्चेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ६२

द्वीपं रमणकं हित्वा हृदमेतमुपाश्रितः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 386

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यद्भयात् स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम् ॥६३ श्रीशुक उवाच

एवमुक्तो भगवता कृष्णनाद्भुतकर्मणा ।

तं पूजयामास मुदा नागपत्न्यश्च सादरम् ॥६४

दिव्याम्बरस्रङ्मणिभिः परार्यैरपि भूषणैः ।

दिव्यगन्धानुलेपैश्च महत्योत्पलमालया ॥ ६५

पूजयित्वा जगन्नाथं प्रसाद्य गरुडध्वजम् ।

ततः प्रीतोऽभ्यनुज्ञातः परिक्रम्याभिवन्द्य तम् ॥६६

सकलत्रसुहृत्पुत्रो द्वीपमब्धेर्जगाम ह ।

तदैव सामृतजला यमुना निर्विषाभवत् ।

अनुग्रहाद् भगवतः क्रीडामानुषरूपिणः ॥ ६७

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - कालिय नागकी बात सुनकर लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णने कहा — ‘ सर्प! अब तुझे यहाँ नहीं रहना चाहिये । तू अपने जाति- भाई, पुत्र और स्त्रियोंके साथ शीघ्र ही यहाँसे समुद्रमें चला जा । अब गौएँ और मनुष्य यमुना-जलका उपभोग करें ॥ ६० ॥

जो मनुष्य दोनों समय तुझको दी हुई मेरी इस आज्ञाका स्मरण तथा कीर्तन करे, उसे साँपोंसे कभी भय न हो || ६१ || मैंने इस कालियदहमें क्रीड़ा की है । इसलिये जो पुरुष इसमें स्नान करके जलसे देवता और पितरोंका तर्पण करेगा, एवं उपवास करके मेरा स्मरण करता हुआ मेरी पूजा करेगा– वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ ६२ ॥ मैं जानता हूँ कि तू गरुडके

भयसे रमणक द्वीप छोड़कर इस दहमें आ बसा था । अब तेरा शरीर मेरे चरणचिह्नोंसे अंकित हो गया है । इसलिये जा, अब गरुड तुझे खायेंगे नहीं ॥६३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - भगवान् श्रीकृष्णकी एक-एक लीला अद्भुत है । उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कालिय नाग और उसकी पत्नियोंने आनन्दसे भरकर बड़े आदरसे उनकी पूजा की ॥६४ ॥

उन्होंने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला, मणि, बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गन्ध, चन्दन और अति उत्तम कमलोंकी मालासे जगत्के स्वामी गरुडध्वज भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें प्रसन्न किया । इसके बाद बड़े प्रेम और आनन्दसे उनकी परिक्रमा की, वन्दना की और उनसे अनुमति ली । तब अपनी पत्नियों, पुत्रों और बन्धु - बान्धवोंके साथ रमणक द्वीपकी, जो समुद्रमें सर्पोंके रहनेका एक स्थान है, यात्रा की । लीला- मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे यमुनाजीका जल केवल विषहीन ही नहीं, बल्कि उसी समय अमृतके समान मधुर हो गया ॥६५-६७ ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 387

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श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे कालियमोक्षणं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६ ॥

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पृष्ठ 388

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अथ सप्तदशोऽध्यायः कालियके कालियदहमें आनेकी कथा तथा भगवान्का व्रजवासियोंको दावानलसे बचाना राजोवाच

नागालयं रमणकं कस्मात्तत्याज कालियः ।

कृतं किं वा सुपर्णस्य तेनैकेनासमंजसम् ॥१

श्रीशुक उवाच

उपहार्यैः सर्पजनैर्मासि मासीह यो बलिः ।

वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राङ् निरूपितः ॥२

स्वं स्वं भागं प्रयच्छन्ति नागाः पर्वणि पर्वणि ।

गोपीथायात्मनः सर्वे सुपर्णाय महात्मने ॥३

विषवीर्यमदाविष्टः काद्रवेयस्तु कालियः ।

कदर्थीकृत्य गरुडं स्वयं तं बुभुजे बलिम् ॥४

तच्छ्रुत्वा कुपितो राजन् भगवान् भगवत्प्रियः ।

विजिघांसुर्महावेगः कालियं समुपाद्रवत् ॥५

तमापतन्तं तरसा विषायुधः प्रत्यभ्ययादुच्छ्रितनैकमस्तकः । दद्भिः सुपर्णं व्यदशद् द्दायुधः करालजिह्वोच्छ्वसितोग्रलोचनः ॥ ६ तं तार्क्ष्यपुत्रः स निरस्य मन्युमान् प्रचण्डवेगो मधुसूदनासनः । राजा परीक्षित्ने पूछा– भगवन्! कालिय नागने नागोंके निवासस्थान रमणक द्वीपको क्यों छोड़ा था? और उस अकेलेने ही गरुडजीका कौन - सा अपराध किया था? ॥१ ॥

श्रीशुकदेवीजीने कहा - परीक्षित्! पूर्वकालमें गरुडजीको उपहार स्वरूप प्राप्त होनेवाले सर्पोंने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मासमें निर्दिष्ट वृक्षके नीचे गरुडको एक सर्पकी भेंट दी जाय ॥२ ॥

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पृष्ठ 389

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इस नियमके अनुसार प्रत्येक अमावस्याको सारे सर्प अपनी रक्षाके लिये महात्मा गरुडजीको अपना- अपना भाग देते रहते थे* ॥३ ॥ उन सर्पोंमें कद्रूका पुत्र कालिय

नाग अपने विष और बलके घमंडसे मतवाला हो रहा था । उसने गरुडका तिरस्कार करके स्वयं तो बलि देना दूर रहा- दूसरे साँप जो गरुडको बलि देते, उसे भी खा लेता ॥४ ॥ परीक्षित्! यह सुनकर भगवान्‌के प्यारे पार्षद शक्तिशाली गरुडको बड़ा

क्रोध आया । इसलिये उन्होंने कालिय नागको मार डालनेके विचारसे बड़े वेगसे उसपर आक्रमण किया ॥५ ॥ विषधर कालिय नागने जब देखा कि गरुड बड़े वेगसे मुझपर

आक्रमण करने आ रहे हैं, तब वह अपने एक सौ एक फण फैलाकर डसनेके लिये उनपर टूट पड़ा । उसके पास शस्त्र थे केवल दाँत, इसलिये उसने दाँतोंसे गरुडको डस लिया । उस समय वह अपनी भयावनी जीभ लपलपा रहा था, उसकी साँस लंबी चल रही थी और आँखें बड़ी डरावनी जान पड़ती थीं || ६ || तार्क्ष्यनन्दन गरुडजी विष्णुभगवान्‌के वाहन हैं और उनका वेग तथा पराक्रम भी अतुलनीय है । कालिय नागकी यह ढिठाई देखकर उनका क्रोध और भी बढ़ गया तथा उन्होंने उसे अपने शरीरसे झटककर फेंक दिया एवं अपने सुनहले बायें पंखसे कालिय नागपर बड़े जोरसे प्रहार किया ॥७ ॥ उनके पंखकी चोटसे कालिय नाग घायल हो गया । वह घबड़ाकर

वहाँसे भगा और यमुनाजीके इस कुण्डमें चला आया । यमुनाजीका यह कुण्ड गरुडके लिये अगम्य था । साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे ॥८ ॥ इसी स्थानपर एक दिन क्षुधातुर गरुडने तपस्वी सौभरिके मना करनेपर भी

अपने अभीष्ट भक्ष्य मत्स्यको बलपूर्वक पकड़कर खा लिया || ९ || अपने मुखिया मत्स्यराजके मारे जानेके कारण मछलियोंको बड़ा कष्ट हुआ। वे अत्यन्त दीन और व्याकुल हो गयीं । उनकी यह दशा देखकर महर्षि सौभरिको बड़ी दया आयी । उन्होंने उस कुण्डमें रहनेवाले सब जीवोंकी भलाईके लिये गरुडको यह शाप दे दिया ॥१० ॥

‘ यदि गरुड फिर कभी इस कुण्डमें घुसकर मछलियोंको खायेंगे, तो उसी क्षण प्राणोंसे

हाथ धो बैठेंगे । मैं यह सत्य- सत्य कहता हूँ' ॥११ ॥

पक्षेण सव्येन हिरण्यरोचिषा जघान कद्रूसुतमुग्रविक्रमः ॥७

सुपर्णपक्षाभिहतः कालियोऽतीव विह्वलः ।

ह्रदं विवेश कालिन्द्यास्तदगम्यं दुरासदम् ॥८

तत्रैकदा जलचरं गरुडो भक्ष्यमीप्सितम् ।

निवारितः सौभरिणा प्रसह्य क्षुधितोऽहरत् ॥९

मीनान् सुदुःखितान् दृष्ट्वा दीनान् मीनपतौ हते । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 390

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कृपया सौभरिः प्राह तत्रत्यक्षेममाचरन् ॥१०

अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति ।

सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥११

तं कालियः परं वेद नान्यः कश्चन लेलिहः ।

अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः ॥१२

कृष्णं ह्रदाद् विनिष्क्रान्तं दिव्यस्रग्गन्धवाससम् ।

महामणिगणाकीर्णं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ॥ १३

उपलभ्योत्थिताः सर्वे लब्धप्राणा इवासवः ।

प्रमोदनिभृतात्मानो गोपाः प्रीत्याभिरेभिरे ॥१४

यशोदा रोहिणी नन्दो गोप्यो गोपाश्च कौरव ।

कृष्णं समेत्य लब्धेहा आसँल्लब्धमनोरथाः ॥१५

रामश्चाच्युतमालिंगय जहासास्यानुभाववित् ।

नगा गावो वृषा वत्सा लेभिरे परमां मुदम् ॥१६

नन्दं विप्राः समागत्य गुरवः सकलत्रकाः ।

ऊचुस्ते कालियग्रस्तो दिष्ट्या मुक्तस्तवात्मजः ॥१७

परीक्षित्! महर्षि सौभरिके इस शापकी बात कालिय नागके सिवा और कोई साँप नहीं जानता था । इसलिये वह गरुडके भयसे वहाँ रहने लगा था और अब भगवान् श्रीकृष्णने उसे निर्भय करके वहाँसे रमणक द्वीपमें भेज दिया ॥ १२ ॥

परीक्षित्! इधर भगवान् श्रीकृष्ण दिव्य माला, गन्ध, वस्त्र, महामूल्य मणि और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस कुण्डसे बाहर निकले ॥ १३ ॥ उनको देखकर

सब-के-- सब व्रजवासी इस प्रकार उठ खड़े हुए, जैसे प्राणोंको पाकर इन्द्रियाँ सचेत हो जाती हैं। सभी गोपोंका हृदय आनन्दसे भर गया। वे बड़े प्रेम और प्रसन्नतासे अपने कन्हैयाको हृदयसे लगाने लगे ॥१४ ॥ परीक्षित्! यशोदारानी, रोहिणीजी, नन्दबाबा,

गोपी और गोप — सभी श्रीकृष्णको पाकर सचेत हो गये । उनका मनोरथ सफल हो गया ॥१५ ॥ बलरामजी तो भगवान्‌का प्रभाव जानते ही थे । वे श्रीकृष्णको हृदयसे

लगाकर हँसने लगे । पर्वत, वृक्ष, गाय, बैल, बछड़े – सब- के - सब आनन्दमग्न हो गये ॥१६ ॥

गोपोंके कुलगुरु ब्राह्मणोंने अपनी पत्नियोंके साथ नन्दबाबाके पास आकर कहा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******