श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 41–50

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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औरकुछभी नहीं जानता ॥ ६८ ॥

दुर्वासाजी! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ । जिसका अनिष्ट करनेसे आपको इस विपत्तिमें पड़ना पड़ा है, आप उसीके पास जाइये । निरपराध साधुओंके अनिष्टकी चेष्टासे अनिष्ट करनेवालेका ही अमंगल होता है ॥६९ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं । परन्तु यदि ब्राह्मण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं ॥७० ॥

दुर्वासाजी! आपका कल्याण हो । आप नाभाग- नन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीषके

पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये । तब आपको शान्ति मिलेगी ॥७१ ॥

इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धेऽम्बरीषचरिते चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

१. शेषणम् । १. भिः स्वर्धुन्यभिस्रोतवतीं सर० । २. वेष्टिताः । ३. पश्यताम् । १. जिवस्तुषु । २. भूताभि० । ३. षुर्विष्णुं । ४. र्लब्ध० । ५. गुणवन्मधु । १. तद्वाक्यं । २. निर्म० । ३. शुचौ । १. श्रिया मत्तस्य । २. स्येष्टमानिनः । ३. तपसा नि० । ४. लन्तीमसि० । ५. द्रवमुद्वी० । १. थावसक्तं । १. मामव विश्व । १. दर्शिनः । २. ह्यहम्। ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 42

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अथ पञ्चमोऽध्यायः दुर्वासाजीकी दुःखनिवृत्ति श्रीशुक उवाच

एवं भगवताऽऽदिष्टो दुर्वासाश्चक्रतापितः ।

अम्बरीषमुपावृत्य तत्पादौ दुःखितोऽग्रहीत् ॥ १

तस्य सोद्यमनं” वीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जितः ।

अस्तावीत् तद्धरेरस्त्रं कृपया पीडितो भृशम् ॥२

अम्बरीष उवाच

त्वमग्निर्भगवान् सूर्यस्त्वं सोमो ज्योतिषां पतिः ।

त्वमापस्त्वं क्षितिर्व्योम वायुर्मात्रेन्द्रियाणि च ॥३

सुदर्शन नमस्तुभ्यं सहस्राराच्युतप्रिय ।

सर्वास्त्रघातिन् विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते ॥४

त्वं धर्मस्त्वमृतं सत्यं त्वं यज्ञोऽखिलयज्ञभुक् ।

त्वं लोकपालः सर्वात्मा त्वं तेजः पौरुषं परम् ॥५

नमः सुनाभाखिलधर्मसेतवे ह्यधर्मशीलासुरधूमकेतवे ।

त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे ।

मनोजवायाद्भुतकर्मणे गृणे ॥६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब भगवान्ने इस प्रकार आज्ञा दी तब सुदर्शन चक्रकी ज्वालासे जलते हुए दुर्वासा लौटकर राजा अम्बरीषके पास आये और उन्होंने अत्यन्त दुःखी होकर राजाके पैर पकड़ लिये ॥१ ॥

दुर्वासाजीकी यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़नेसे लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान्‌के चक्रकी स्तुति करने लगे । उस समय उनका हृदय दयावश अत्यन्त पीड़ित हो रहा था ॥२ ॥

अम्बरीषने कहा - प्रभो सुदर्शन! आप अग्निस्वरूप हैं । आप ही परम समर्थ सूर्य हैं । समस्त नक्षत्रमण्डलके अधिपति चन्द्रमा भी आपके स्वरूप हैं । जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, पंचतन्मात्रा और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके रूपमें भी आप ही हैं ॥३ ॥

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पृष्ठ 43

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भगवान्‌के प्यारे, हजार दाँतवाले चक्रदेव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। समस्त अस्त्र-शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले एवं पृथ्वीके रक्षक! आप इन ब्राह्मणकी रक्षा कीजिये ॥४ ॥

आप ही धर्म हैं, मधुर एवं सत्य वाणी हैं; आप ही समस्त यज्ञोंके अधिपति और स्वयं यज्ञ भी हैं । आप समस्त लोकोंके रक्षक एवं सर्वलोकस्वरूप भी हैं । आप परमपुरुष परमात्माके श्रेष्ठ तेज हैं ॥५ ॥

सुनाभ! आप समस्त धर्मोकी मर्यादाके रक्षक हैं । अधर्मका आचरण करनेवाले असुरोंको भस्म करनेके लिये आप साक्षात् अग्नि हैं। आप ही तीनों लोकोंके रक्षक एवं विशुद्ध तेजोमय हैं । आपकी गति मनके वेगके समान है और आपके कर्म अद्भुत हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ६ ॥

त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहृतं तमः प्रकाशश्च धृतो महात्मनाम् । दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पते त्वद्रूपमेतत् सदसत् परावरम् ॥७ यदा विसृष्टस्त्वमनंजनेन वै बलं प्रविष्टोऽजित दैत्यदानवम् । बाहूदरोर्वङ्घ्रिशिरोधराणि वृक्णन्नजस्रं प्रधने विराजसे ॥८ स त्वं जगत्त्राण खलप्रहाणये निरूपितः सर्वसहो गदाभृता । विप्रस्य चास्मत्कुलदैवहेतवे विधेहि भद्रं तदनुग्रहो हि नः ॥ ९

यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः ।

कुलं नो विप्रदैवं चेद् द्विजो भवतु विज्वरः ॥ १०

यदि नो भगवान् प्रीत एकः सर्वगुणाश्रयः ।

सर्वभूतात्मभावेन द्विजो भवतु विज्वरः ॥ ११

श्रीशुक उवाच

इति संस्तुवतो राज्ञो विष्णुचक्रं सुदर्शनम् ।

अशाम्यत् सर्वतो विप्रं प्रदहद् राजयाच्ञया ॥१२

मुक्तोऽस्त्राग्नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमांस्ततः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 44

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प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः ॥१३ दुर्वासा उवाच

अहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे ।

कृतागसोऽपि यद् राजन् मंगलानि समीहसे ॥१४

वेदवाणीके अधीश्वर! आपके धर्ममय तेजसे अन्धकारका नाश होता है और सूर्य आदि महापुरुषोंके प्रकाशकी रक्षा होती है । आपकी महिमाका पार पाना अत्यन्त कठिन हैं । ऊँचे-नीचे और छोटे- बड़ेके भेदभावसे युक्त यह समस्त कार्य-कारणात्मक संसार आपका ही स्वरूप है ॥७ ॥ सुदर्शन चक्र! आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता । जिस समय

निरंजनभगवान् आपको चलाते हैं और आप दैत्य एवं दानवोंकी सेनामें प्रवेश करते हैं, उस समय युद्धभूमिमें उनकी भुजा, उदर, जंघा, चरण और गरदन आदि निरन्तर काटते हुए आप अत्यन्त शोभायमान होते हैं II ८ II विश्वके रक्षक! आप रणभूमिमें सबका प्रहार सह लेते हैं, आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता । गदाधारी भगवान्‌ने दुष्टोंके नाशके लिये ही आपको नियुक्त किया है । आप कृपा करके हमारे कुलके भाग्योदयके लिये दुर्वासाजीका कल्याण कीजिये । हमारे ऊपर यह आपका महान् अनुग्रह होगा ॥ ९ ॥ यदि मैंने कुछ भी दान किया

हो, यज्ञ किया हो अथवा अपने धर्मका पालन किया हो, यदि हमारे वंशके लोग ब्राह्मणोंको ही अपना आराध्यदेव समझते रहे हों, तो दुर्वासाजीकी जलन मिट जाय ॥१० ॥ भगवान् समस्त

गुणोंके एक मात्र आश्रय हैं । यदि मैंने समस्त प्राणियोंके आत्माके रूपमें उन्हें देखा हो और वे मुझपर प्रसन्न हों तो दुर्वासाजीके हृदयकी सारी जलन मिट जाय ॥११ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— जब राजा अम्बरीषने दुर्वासाजीको सब ओरसे जलानेवाले भगवान्‌के सुदर्शन चक्रकी इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्रार्थनासे चक्र शान्त हो गया ॥१२ ॥ जब दुर्वासा चक्रकी आगसे मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे

राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे ॥१३ ॥

दुर्वासाजीने कहा — धन्य है! आज मैंने भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका महत्त्व देखा । राजन्! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मंगल कामना ही कर रहे हैं ॥१४ ॥

दुष्करः को'नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम् ।

यैः संगृहीतो भगवान् सात्वतामृषभो हरिः ॥१५

यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः ।

तस्य तीर्थपदः किं वा दासानामवशिष्यते ॥१६

राजन्ननुगृहीतोऽहं” त्वयातिकरुणात्मना ।

मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः ॥१७

राजा तमकृताहारः प्रत्यागमनकाङ्क्षया । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 45

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चरणावुपसंगृह्य प्रसाद्य समभोजयत् ॥१८

सोऽशित्वाऽऽदृतमानीतमातिथ्यं सार्वकामिकम् ।

तृप्तात्मा नृपतिं प्राह भुज्यतामिति सादरम् ॥१९

प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै ।

दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥ २०

कर्मावदातमेतत् ते गायन्ति स्वःस्त्रियो मुहुः ।

कीर्तिं परमपुण्यां च कीर्तयिष्यति भूरियम् ॥२१

श्रीशुक उवाच

एवं संकीर्त्य राजानं दुर्वासाः परितोषितः ।

ययौ विहायसाऽऽमन्त्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम् ॥२२

जिन्होंने भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरिके चरण- कमलोंको दृढ़ प्रेमभावसे पकड़ लिया है-उन साधुपुरुषोंके लिये कौन- सा कार्य कठिन है? जिनका हृदय उदार है, वे महात्मा भला, किस वस्तुका परित्याग नहीं कर सकते? ॥ १५ ॥ जिनके मंगलमय नामोंके श्रवणमात्रसे जीव

निर्मल हो जाता है— उन्हीं तीर्थपाद भगवान्‌के चरणकमलोंके जो दास हैं, उनके लिये कौन- सा कर्तव्य शेष रह जाता है? ॥१६ ॥

महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणाभावसे परिपूर्ण है । आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह'किया । अहो, आपने मेरे अपराधको भुलाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा की है! ॥१७ ॥

परीक्षित्! जबसे दुर्वासाजी भागे थे, तबसे अबतक राजा अम्बरीषने भोजन नहीं किया था। वे उनके लौटनेकी बाट देख रहे थे । अब उन्होंने दुर्वासाजीके चरण पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्न करके विधिपूर्वक भोजन कराया ॥ १८ ॥

राजा अम्बरीष बड़े आदरसे अतिथिके योग्य सब प्रकारकी भोजन -सामग्री ले आये । दुर्वासाजी भोजन करके तृप्त हो गये । अब उन्होंने आदरसे कहा — ' राजन्! अब आप भी भोजन कीजिये ॥१९ ॥ अम्बरीष! आप भगवान्के परम प्रेमी भक्त हैं । आपके दर्शन, स्पर्श,

बातचीत और मनको भगवान्‌की ओर प्रवृत्त करनेवाले आतिथ्यसे मैं अत्यन्त प्रसन्न और अनुगृहीत हुआ हूँ || २० || स्वर्गकी देवांगनाएँ बार- बार आपके इस उज्ज्वल चरित्रका गान करेंगी । यह पृथ्वी भी आपकी परम पुण्यमयी कीर्तिका संकीर्तन करती रहेगी ' ॥२१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - दुर्वासाजीने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीषके गुणोंकी प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है ॥२२ ॥

संवत्सरोऽत्यगात् तावद् यावता नागतो गतः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 46

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मुनिस्तद्दर्शनाकांक्षो राजाऽब्भक्षो बभूव ह ॥२३ गते ' च दुर्वाससि सोऽम्बरीषो द्विजोपयोगातिपवित्रमाहरत् । ऋषेर्विमोक्षं व्यसनं च बुद्ध्वा मेने स्ववीर्यं च परानुभावम् ॥२४ एवंविधानेकगुणः स राजा परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे । क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं ययाऽऽविरिञ्च्यान् निरयांश्चकार ॥२५ अथाम्बरीषस्तनयेषु राज्यं समानशीलेषु विसृज्य धीरः४ । वनं विवेशात्मनि वासुदेवे मनो दधद् ध्वस्तगुणप्रवाहः ॥२६

इत्येतत् पुण्यमाख्यानमम्बरीषस्य भूपतेः ।

संकीर्तयन्ननुध्यायन् भक्तो भगवतो भवेत् ॥२७

परीक्षित्! जब सुदर्शन चक्र से भयभीत होकर दुर्वासाजी भगे थे, तबसे लेकर उनके लौटनेतक एक वर्षका समय बीत गया । इतने दिनोंतक राजा अम्बरीष उनके दर्शनकी आकांक्षासे केवल जल पीकर ही रहे ॥ २३ ॥

जब दुर्वासाजी चले गये, तब उनके भोजनसे बचे हुए अत्यन्त पवित्र अन्नका उन्होंने भोजन किया । अपने कारण दुर्वासाजीका दुःखमें पड़ना और फिर अपनी ही प्रार्थनासे उनका छूटना –इन दोनों बातोंको उन्होंने अपने द्वारा होनेपर भी भगवान्की ही महिमा समझा ॥२४ ॥ राजा अम्बरीषमें ऐसे - ऐसे अनेकों गुण थे । अपने समस्त कर्मोंके द्वारा वे

परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान्‌में भक्तिभावकी अभिवृद्धि करते रहते थे । उस भक्तिके प्रभावसे उन्होंने ब्रह्मलोकतकके समस्त भोगोंको नरकके समान समझा ॥२५ ॥

तदनन्तर राजा अम्बरीषने अपने ही समान भक्त पुत्रोंपर राज्यका भार छोड़ दिया और स्वयं वे वनमें चले गये । वहाँ वे बड़ी धीरताके साथ आत्मस्वरूप भगवान्‌में अपना मन लगाकर गुणोंके प्रवाहरूप संसारसे मुक्त हो गये ॥२६ ॥ परीक्षित्! महाराज अम्बरीषका यह

परम पवित्र आख्यान है । जो इसका संकीर्तन और स्मरण करता है, वह भगवान्का भक्त हो जाता है ॥२७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धेऽम्बरीषचरितं “ नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५ ॥

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पृष्ठ 47

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१. तद्व्यसनं । २. स्पर्शेन लज्जि० । १. तोऽस्मि । २. कीर्तिं तां परमां पुण्यां कीर्त ० । १. गतेऽथ। २. गाभिपवि० । ३. महानुभावम्। ४. वीरः । ५. चरिते । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 48

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अथ षष्ठोऽध्यायः इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन, मान्धाता और सौभरि ऋषिकी कथा श्रीशुक उवाच

विरूपः केतुमाञ्छम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः ।

विरूपात् पृषदश्वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः ॥ १

रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः ।

अंगिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान् ॥२

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अम्बरीषके तीन पुत्र थे - विरूप, केतुमान् और शम्भु । विरूपसे पृषदश्व और उसका पुत्र रथीतर हुआ ॥ १ ॥

रथीतर सन्तानहीन था । वंश परम्पराकी रक्षाके लिये उसने अंगिरा ऋषिसे प्रार्थना की, उन्होंने उसकी पत्नीसे ब्रह्मतेजसे सम्पन्न कई पुत्र उत्पन्न किये ॥२ ॥

एते क्षेत्रे' प्रसूता वै पुनस्त्वांगिरसाः स्मृताः ।

रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः ॥ ३

क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घाणतः सुतः ।

तस्य पुत्रशतज्येष्ठा विकुक्षिनिमिदण्डकाः ॥४

तेषां पुरस्तादभवन्नार्यावर्ते नृपा नृप ।

पंचविंशतिः पश्चाच्च त्रयो मध्ये परेऽन्यतः ॥५

स एकदाष्टका श्राद्धे इक्ष्वाकुः सुतमादिशत् ।

मांसमानीयतां मेध्यं विकुक्षे गच्छ माचिरम् ॥ ६

तथेति स वनं गत्वा मृगान् हत्वा क्रियार्हणान् ।

श्रान्तो बुभुक्षितो वीरः शशं चाददपस्मृतिः ॥७

शेषं निवेदयामास पित्रे तेन च तद्गुरुः ।

चोदितः प्रोक्षणायाह दुष्टमेतदकर्मकम् ॥८

ज्ञात्वा पुत्रस्य तत् कर्म गुरुणाभिहितं नृपः ।

देशान्निःसारयामास सुतं त्यक्तविधिं रुषा ॥९

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पृष्ठ 49

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स तु विप्रेण संवादं जापकेन समाचरन् ।

त्यक्त्वा कलेवरं योगी स तेनावाप यत् परम् ॥१०

पितर्युपरतेऽभ्येत्य विकुक्षिः पृथिवीमिमाम् ।

शासदीजे हरिं यज्ञैः शशाद इति विश्रुतः ॥ ११

यद्यपि ये सब रथीतरकी भार्यासे उत्पन्न हुए थे, इसलिये इनका गोत्र वही होना चाहिये था जो रथीतरका था, फिर भी वे आंगिरस ही कहलाये । ये ही रथीतर- वंशियोंके प्रवर ( कुलमें सर्वश्रेष्ठ पुरुष) कहलाये । क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे - क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों गोत्रोंसे इनका सम्बन्ध था ॥३ ॥

परीक्षित्! एक बार मनुजीके छींकनेपर उनकी नासिकासे इक्ष्वाकु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ । इक्ष्वाकुके सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े तीन थे - विकुक्षि, निमि और दण्डक ॥४ ॥

परीक्षित्! उनसे छोटे पचीस पुत्र आर्यावर्तके पूर्वभागके और पचीस पश्चिमभागके तथा उपर्युक्त तीन मध्यभागके अधिपति हुए । शेष सैंतालीस दक्षिण आदि अन्य प्रान्तोंके अधिपति हुए ॥५ ॥ एक बार राजा इक्ष्वाकुने अष्टका श्राद्धके समय अपने बड़े पुत्रको आज्ञा दी

— ' विकुक्षे! शीघ्र ही जाकर श्राद्धके योग्य पवित्र पशुओंका मांस लाओ ' ॥६ ॥ वीर

विकुक्षिने ' बहुत अच्छा' कहकर वनकी यात्रा की । वहाँ उसने श्राद्धके योग्य बहुत - से पशुओंका शिकार किया । वह थक तो गया ही था, भूख भी लग आयी थी; इसलिये यह बात भूल गया कि श्राद्धके लिये मारे हुए पशुको स्वयं न खाना चाहिये । उसने एक खरगोश खा लिया ॥७ ॥ विकुक्षिने बचा हुआ मांस लाकर अपने पिताको दिया । इक्ष्वाकुने अब अपने

गुरुसे उसे प्रोक्षण करनेके लिये कहा, तब गुरुजीने बताया कि यह मांस तो दूषित एवं श्राद्धके अयोग्य है ॥८ ॥ परीक्षित्! गुरुजीके कहनेपर राजा इक्ष्वाकुको अपने पुत्रकी करतूतका पता

चल गया । उन्होंने शास्त्रीय विधिका उल्लंघन करनेवाले पुत्रको क्रोधवश अपने देशसे निकाल दिया ॥९ ॥ तदनन्तर राजा इक्ष्वाकुने अपने गुरुदेव वसिष्ठसे ज्ञानविषयक चर्चा की । फिर

योगके द्वारा शरीरका परित्याग करके उन्होंने परमपद प्राप्त किया ॥१० ॥ पिताका देहान्त हो

जानेपर विकुक्षि अपनी राजधानीमें लौट आया और इस पृथ्वीका शासन करने लगा । उसने बड़े - बड़े यज्ञोंसे भगवान्‌की आराधना की और संसारमें शशादके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥११ ॥

विकुक्षिके पुत्रका नाम था पुरंजय । उसीको कोई ' इन्द्रवाह ' और कोई ' ककुत्स्थ' कहते हैं । जिन कर्मोंके कारण उसके ये नाम पड़े थे, उन्हें सुनो ॥१२ ॥

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पृष्ठ 50

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Mitro गीताप्रेस, गोरखपुर राजा भगीरथकी प्रार्थनापर भगवान् शिवका गङ्गाको अपने सिरपर धारण करना Entreated by Bhagiratha Lord Siva holds Ganga on his head ******ebook converter DEMO Watermarks *******