श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 871–880
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880
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सर्वथा मिथ्या है । यही नहीं, हमें कर्मके फल स्वर्गादि लोकोंकी भी, जो मरनेके बाद मिलते हैं, इच्छा नहीं है । क्योंकि हम जानते हैं कि वे निस्सार हैं, केवल सुननेमें ही आकर्षक जान पड़ते हैं ॥१४ ॥ अब हमें कृपा करके आप वह उपाय बतलाइये, जिससे आपके चरणकमलोंकी
विस्मृति कभी न हो, सर्वदा स्मृति बनी रहे । चाहे हमें संसारकी किसी भी योनिमें जन्म क्यों न लेना पड़े ॥१५ ॥ प्रणाम करनेवालोंके क्लेशका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण, वासुदेव, हरि,
परमात्मा एवं गोविन्दके प्रति हमारा बार- बार नमस्कार है ॥१६ ॥
राज्यैश्वर्यमदोन्नद्धो न श्रेयो विन्दते नृपः ।
त्वन्मायामोहितोऽनित्या मन्यते सम्पदोऽचलाः ॥१०
मृगतृष्णां यथा बाला मन्यन्त उदकाशयम् ।
एवं वैकारिकीं मायामयुक्ता वस्तु चक्षते ॥११
वयं पुरा श्रीमदनष्टदृष्टयो जिगीषयास्या इतरेतरस्पृधः । घ्नन्तः प्रजाः स्वा अतिनिर्घृणाः प्रभो मृत्युं पुरस्त्वाविगणय्य दुर्मदाः ॥ १२ त एव कृष्णाद्य गभीररंहसा दुरन्तवीर्येण विचालिताः श्रियः । कालेन तन्वा भवतोऽनुकम्पया विनष्टदर्पाश्चरणौ स्मराम ते ॥१३ अथो न राज्यं मृगतृष्णिरूपितं देहेन शश्वत् पतता रुजां भुवा । उपासितव्यं स्पृहयामहे विभो क्रियाफलं प्रेत्य च कर्णरोचनम् ॥१४
तं नः समादिशोपायं येन ते चरणाब्जयोः ।
स्मृतिर्यथा न विरमेदपि संसरतामिह ॥१५
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥१६
श्रीशुक उवाच संस्तूयमानो भगवान् राजभिर्मुक्तबन्धनैः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तानाह करुणस्तात शरण्यः श्लक्ष्णया गिरा ॥१७ श्रीभगवानुवाच
अद्यप्रभृति वो भूपा मय्यात्मन्यखिलेश्वरे ।
सुदृढा जायते भक्तिर्बाढमाशंसितं तथा ॥१८
दिष्ट्या व्यवसितं भूपा भवन्त ऋतभाषिणः ।
श्रियैश्वर्यमदोन्नाहं पश्य उन्मादकं नृणाम् ॥१९
हैहयो नहुषो वेनो रावणो नरकोऽपरे ।
श्रीमदाद भ्रंशिताः स्थानाद् देवदैत्यनरेश्वराः ॥२०
भवन्त एतद् विज्ञाय देहाद्युत्पाद्यमन्तवत् ।
मां यजन्तोऽध्वरैर्युक्ताः प्रजा धर्मेण रक्षथ ॥२१
सन्तन्वन्तः प्रजातन्तून् सुखं दुःखं भवाभवौ ।
प्राप्तं प्राप्तं च सेवन्तो मच्चित्ता विचरिष्यथ ॥२२
उदासीनाश्च देहादावात्मारामा धृतव्रताः ।
मय्यावेश्य मनः सम्यङ् मामन्ते ब्रह्म यास्यथ ॥२३
श्रीशुक उवाच
इत्यादिश्य नृपान् कृष्णो भगवान् भुवनेश्वरः ।
तेषां न्ययुंक्त पुरुषान् स्त्रियो मज्जनकर्मणि ॥२४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कारागारसे मुक्त राजाओंने जब इस प्रकार करुणावरुणालय भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की, तब शरणागतरक्षक प्रभुने बड़ी मधुर वाणीसे उनसे कहा ॥१७ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- नरपतियो! तुम लोगोंने जैसी इच्छा प्रकट की है, उसके अनुसार आजसे मुझमें तुमलोगोंकी निश्चय ही सुदृढ़ भक्ति होगी। यह जान लो कि मैं सबका आत्मा और सबका स्वामी हूँ ॥ १८ ॥ नरपतियो! तुमलोगोंने जो निश्चय किया है, वह सचमुच
तुम्हारे लिये बड़े सौभाग्य और आनन्दकी बात है । तुमलोगोंने मुझसे जो कुछ कहा है, वह बिलकुल ठीक है । क्योंकि मैं देखता हूँ, धन- सम्पत्ति और ऐश्वर्यके मदसे चूर होकर बहुत - से लोग उच्छृंखल और मतवाले हो जाते हैं ॥ १ ९ ॥ हैहय, नहुष, वेन, रावण, नरकासुर आदि अनेकों देवता, दैत्य और नरपति श्रीमदके कारण अपने स्थानसे, पदसे च्युत हो गये ॥२० ॥
तुमलोग यह समझ लो कि शरीर और इसके सम्बन्धी पैदा होते हैं, इसलिये उनका नाश भी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अवश्यम्भावी है । अतः उनमें आसक्ति मत करो । बड़ी सावधानीसे मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करो और धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो || २१ || तुमलोग अपनी वंश- परम्पराकी रक्षाके लिये, भोगके लिये नहीं, सन्तान उत्पन्न करो और प्रारब्धके अनुसार जन्म- मृत्यु, सुख-दुःख, लाभ-हानि- जो कुछ भी प्राप्त हों, उन्हें समानभावसे मेरा प्रसाद समझकर सेवन करो और अपना चित्त मुझमें लगाकर जीवन बिताओ || २२ || देह और देहके सम्बन्धियोंसे किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर उदासीन रहो; अपने - आपमें, आत्मामें ही रमण करो और भजन तथा आश्रमके योग्य व्रतोंका पालन करते रहो । अपना मन भलीभाँति मुझमें लगाकर अन्तमें तुमलोग मुझ ब्रह्मस्वरूपको ही प्राप्त हो जाओगे ॥२३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भुवनेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने राजाओंको यह आदेश देकर उन्हें स्नान आदि करानेके लिये बहुत से स्त्री - पुरुष नियुक्त कर दिये ॥२४ ॥
सपर्यां कारयामास सहदेवेन भारत ।
नरदेवोचितैर्वस्त्रैर्भूषणैः स्रग्विलेपनैः ॥ २५
भोजयित्वा वरान्नेन सुस्नातान् समलंकृतान् ।
भोगैश्च विविधैर्युक्तांस्ताम्बूलाद्यैर्नृपोचितैः ॥ २६
ते पूजिता मुकुन्देन राजानो मृष्टकुण्डलाः ।
विरेजुर्मोचिताः क्लेशात् प्रावृडन्ते यथा ग्रहाः ॥ २७
रथान् सदश्वानारोप्य मणिकांचनभूषितान् ।
प्रीणय्य सूनृतैर्वाक्यैः स्वदेशान् प्रत्ययापयत् ॥ २८
त एवं मोचिताः कृच्छ्रात् कृष्णेन सुमहात्मना ।
ययुस्तमेव ध्यायन्तः कृतानि च जगत्पतेः ॥२९
जगदुः प्रकृतिभ्यस्ते महापुरुषचेष्टितम् ।
यथान्वशासद् भगवांस्तथा चक्रुरतन्द्रिताः ॥३०
जरासन्धं घातयित्वा भीमसेनेन केशवः ।
पार्थाभ्यां संयुतः प्रायात् सहदेवेन पूजितः ॥ ३१
गत्वा ते खाण्डवप्रस्थं शंखान् दध्मुर्जितारयः ।
हर्षयन्तः स्वसुहृदो दुर्हृदां चासुखावहाः ॥ ३२
तच्छ्रुत्वा प्रीतमनस इन्द्रप्रस्थनिवासिनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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मेनिरे मागधं शान्तं राजा चाप्तमनोरथः ॥३३
अभिवन्द्याथ राजानं भीमार्जुनजनार्दनाः ।
सर्वमाश्रावयांचक्रुरात्मना यदनुष्ठितम् ॥ ३४
परीक्षित्! जरासन्धके पुत्र सहदेवसे उनको राजोचित वस्त्र आभूषण, माला-चन्दन आदि दिलवाकर उनका खूब सम्मान करवाया ॥ २५ ॥ जब वे स्नान करके वस्त्राभूषणसे सुसज्जित
हो चुके, तब भगवान्ने उन्हें उत्तम उत्तम पदार्थोंका भोजन करवाया और पान आदि विविध प्रकारके राजोचित भोग दिलवाये || २६|| भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार उन बंदी राजाओंको सम्मानित किया । अब वे समस्त क्लेशोंसे छुटकारा पाकर तथा कानोंमें झिलमिलाते हुए सुन्दर- सुन्दर कुण्डल पहनकर ऐसे शोभायमान हुए, जैसे वर्षाऋतुका अन्त हो जानेपर तारे ॥२७ ॥ फिर भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें सुवर्ण और मणियोंसे भूषित एवं श्रेष्ठ घोड़ोंसे युक्त
रथोंपर चढ़ाया, मधुर वाणीसे तृप्त किया और फिर उन्हें उनके देशोंको भेज दिया ॥ २८ ॥
इस प्रकार उदारशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने उन राजाओंको महान् कष्टसे मुक्त किया । अब वे जगत्पति भगवान् श्रीकृष्णके रूप, गुण और लीलाओंका चिन्तन करते हुए अपनी - अपनी राजधानीको चले गये ॥२९ ॥ वहाँ जाकर उन लोगोंने अपनी-अपनी प्रजासे परमपुरुष
भगवान् श्रीकृष्णकी अद्भुत कृपा और लीला कह सुनायी और फिर बड़ी सावधानीसे भगवान्के आज्ञानुसार वे अपना जीवन व्यतीत करने लगे ॥३० ॥
परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भीमसेनके द्वारा जरासन्धका वध करवाकर भीमसेन और अर्जुनके साथ जरासन्धनन्दन सहदेवसे सम्मानित होकर इन्द्र- प्रस्थके लिये चले । उन विजयी वीरोंने इन्द्रप्रस्थके पास पहुँचकर अपने - अपने शंख बजाये, जिससे उनके इष्टमित्रोंको सुख और शत्रुओंको बड़ा दुःख हुआ ॥३१-३२ ॥ इन्द्रप्रस्थनिवासियोंका मन उस शंखध्वनिको सुनकर खिल उठा । उन्होंने समझ लिया कि जरासन्ध मर गया और अब राजा युधिष्ठिरका राजसूय - यज्ञ करनेका संकल्प एक प्रकारसे पूरा हो गया || ३३ || भीमसेन, अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णने राजा युधिष्ठिरकी वन्दना की और वह सब कृत्य कह सुनाया, जो उन्हें जरासन्धके वधके लिये करना पड़ा था ॥३४ ॥
निशम्य धर्मराजस्तत् केशवेनानुकम्पितम् ।
आनन्दाश्रुकलां मुंचन् प्रेम्णा नोवाच किंचन ॥ ३५
धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके इस परम अनुग्रहकी बात सुनकर प्रेमसे भर गये, उनके नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी बूँदें टपकने लगीं और वे उनसे कुछ भी कह न सके ॥३५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे कृष्णाद्यागमने त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥७३ ॥
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अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः भगवान्की अग्रपूजा और शिशुपालका उद्धार श्रीशुक उवाच
एवं युधिष्ठिरो राजा जरासन्धवधं विभोः ।
कृष्णस्य चानुभावं तं श्रुत्वा प्रीतस्तमब्रवीत् ॥१
युधिष्ठिर उवाच
ये स्युस्त्रैलोक्यगुरवः सर्वे लोकमहेश्वराः ।
वहन्ति दुर्लभं लब्ध्वा शिरसैवानुशासनम् ॥ २
स भवानरविन्दाक्षो दीनानामीशमानिनाम् ।
धत्तेऽनुशासनं भूमंस्तदत्यन्तविडम्बनम् ॥३
न ह्येकस्याद्वितीयस्य ब्रह्मणः परमात्मनः ।
कर्मभिर्वर्धते तेजो ह्रसते च यथा रवेः ॥४
न वै तेऽजित भक्तानां ममाहमिति माधव ।
त्वं तवेति च नानाधीः पशूनामिव वैकृता ॥५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! धर्मराज युधिष्ठिर जरासन्धका वध और सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णकी अद्भुत महिमा सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और उनसे बोले ॥१ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरने कहा – सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! त्रिलोकीके स्वामी ब्रह्मा, शंकर आदि और इन्द्रादि लोकपाल – सब आपकी आज्ञा पानेके लिये तरसते रहते हैं और यदि वह मिल जाती है तो बड़ी श्रद्धासे उसको शिरोधार्य करते हैं ॥२ ॥ अनन्त! हमलोग हैं
तो अत्यन्त दीन, परन्तु मानते हैं अपनेको भूपति और नरपति । ऐसी स्थितिमें हैं तो हम दण्डके पात्र, परन्तु आप हमारी आज्ञा स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं । सर्वशक्तिमान् कमलनयन भगवानके लिये यह मनुष्य- लीलाका अभिनयमात्र है ॥३ ॥ जैसे
उदय अथवा अस्तके कारण सूर्यके तेजमें घटती या बढ़ती नहीं होती, वैसे ही किसी भी प्रकारके कर्मोंसे न तो आपका उल्लास होता है और न तो ह्रास ही । क्योंकि आप सजातीय, विजातीय और स्वगतभेदसे रहित स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं || ४ || किसीसे पराजित न होनेवाले माधव! ' यह मैं हूँ और यह मेरा है तथा यह तू है और यह तेरा' — इस प्रकारकी विकारयुक्त भेदबुद्धि तो पशुओंकी होती है । जो आपके अनन्य भक्त हैं, उनके चित्तमें ऐसे पागलपनके विचार कभी नहीं आते । फिर आपमें तो होंगे ही कहाँसे? ( इसलिये आप जो कुछ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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र रहे हैं, वह लीला -ही - लीला है ) ॥५ ॥
श्रीशुक उवाच
इत्युक्त्वा यज्ञिये काले वव्रे युक्तान् स ऋत्विजः ।
कृष्णानुमोदितः पार्थो ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः ॥६
द्वैपायनो भरद्वाजः सुमन्तुर्गौतमोऽसितः ।
वसिष्ठश्श्र्यवनः कण्वो मैत्रेयः कवषस्त्रितः ॥७
विश्वामित्रो वामदेवः सुमतिर्जेमिनिः क्रतुः ।
पैलः पराशरो गर्गो वैशम्पायन एव च ॥८
अथर्वा कश्यपो धौम्यो रामो भार्गव आसुरिः ।
वीतिहोत्रो मधुच्छन्दा वीरसेनोऽकृतव्रणः ॥ ९
उपहूतास्तथा चान्ये द्रोणभीष्मकृपादयः ।
धृतराष्ट्रः सहसुतो विदुरश्च महामतिः ॥१०
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा यज्ञदिदृक्षवः ।
तत्रेयुः सर्वराजानो राज्ञां प्रकृतयो नृप ॥११
ततस्ते देवयजनं ब्राह्मणाः स्वर्णलांगलैः ।
कृष्ट्वा तत्र यथाम्नायं दीक्षयांचक्रिरे नृपम् ॥१२
हैमाः किलोपकरणा वरुणस्य यथा पुरा ।
इन्द्रादयो लोकपाला विरिञ्चभवसंयुताः ॥१३
सगणाः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः ।
मुनयो यक्षरक्षांसि खगकिन्नरचारणाः ॥१४
राजानश्च समाहूता राजपत्न्यश्च सर्वशः ।
राजसूयं समीयुः स्म राज्ञः पाण्डुसुतस्य वैवै ॥१५
मेनिरे कृष्णभक्तस्य सूपपन्नमविस्मिताः । अयाजयन् महाराजं याजका देववर्चसः *****ebook converter DEMO Watermarks *******
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राजसूयेन विधिवत् प्राचेतसमिवामराः ॥ १६ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार कहकर धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे यज्ञके योग्य समय आनेपर यज्ञके कर्मोंमें निपुण वेदवादी ब्राह्मणोंको ऋत्विज्, आचार्य आदिके रूपमें वरण किया ॥६ ॥
उनके नाम ये हैं— श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासदेव, भरद्वाज, सुमन्तु, गौतम, असित, वसिष्ठ, च्यवन, कण्व, मैत्रेय, कवष, त्रित, विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिनि, क्रतु, पैल, पराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, परशुराम, शुक्राचार्य, आसुरि, वीतिहोत्र, मधुच्छन्दा, वीरसेन और अकृतव्रण ॥७- ९ ॥ इनके अतिरिक्त धर्मराजने द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र और उनके दुर्योधन आदि पुत्रों और महामति विदुर आदिको भी बुलवाया || १० || राजन्! राजसूय-यज्ञका दर्शन करनेके लिये देशके सब राजा, उनके मन्त्री तथा कर्मचारी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — सब - के - सब वहाँ आये ॥११ ॥
इसके बाद ऋत्विज् ब्राह्मणोंने सोनेके हलोंसे यज्ञभूमिको जुतवाकर राजा युधिष्ठिरको शास्त्रानुसार यज्ञकी दीक्षा दी ॥१२ ॥ प्राचीन कालमें जैसे वरुणदेवके यज्ञमें सब- के - सब
यज्ञपात्र सोनेके बने हुए थे, वैसे ही युधिष्ठिरके यज्ञमें भी थे । पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिरके यज्ञमें निमन्त्रण पाकर ब्रह्माजी, शंकरजी, इन्द्रादि लोकपाल, अपने गणोंके साथ सिद्ध और गन्धर्व, विद्याधर, नाग, मुनि, यक्ष, राक्षस, पक्षी, किन्नर, चारण, बड़े - बड़े राजा और रानियाँ— ये सभी उपस्थित हुए ॥१३-१५ ॥ सबने बिना किसी प्रकारके कौतूहलके यह बात मान ली कि राजसूय - यज्ञ करना युधिष्ठिरके योग्य ही है । क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णके भक्तके लिये ऐसा करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है । उस समय देवताओंके समान तेजस्वी याजकोंने धर्मराज युधिष्ठिरसे विधिपूर्वक राजसूय- यज्ञ कराया; ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें देवताओंने वरुणसे करवाया था ॥१६ ॥
सोमलतासे रस निकालनेके दिन महाराज युधिष्ठिरने अपने परम भाग्यवान् याजकों और यज्ञकर्मकी भूल - चूकका निरीक्षण करनेवाले सदसस्पतियोंका बड़ी सावधानीसे विधिपूर्वक पूजन किया ॥१७ ॥
सौत्येऽहन्यवनीपालो याजकान् सदसस्पतीन् ।
अपूजयन् महाभागान् यथावत् सुसमाहितः ॥१७
सदस्याग्र्यार्हणार्हं वै विमृशन्तः सभासदः ।
नाध्यगच्छन्ननैकान्त्यात् सहदेवस्तदाब्रवीत् ॥१८
अर्हति ह्यच्युतः श्रैष्ठ्यं भगवान् सात्वतां पतिः ।
एष वै देवताः सर्वा देशकालधनादयः ॥१९
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यदात्मकमिदं विश्वं क्रतवश्च यदात्मकाः ।
अग्निराहुतयो मन्त्राः सांख्यं योगश्च यत्परः ॥२०
एक एवाद्वितीयोऽसावैतदात्म्यमिदं जगत् ।
आत्मनाऽऽत्माश्रयः सभ्याः सृजत्यवति हन्त्यजः ॥२१
विविधानीह कर्माणि जनयन् यदवेक्षया ईहते यदयं सर्वः श्रेयो धर्मादिलक्षणम् ॥२२
तस्मात् कृष्णाय महते दीयतां परमार्हणम् ।
एवं चेत् सर्वभूतानामात्मनश्चार्हणं भवेत् ॥२३
सर्वभूतात्मभूताय कृष्णायानन्यदर्शिने ।
देयं शान्ताय पूर्णाय दत्तस्यानन्त्यमिच्छता ॥२४
इत्युक्त्वा सहदेवोऽभूत् तूष्णीं कृष्णानुभाववित् ।
तच्छ्रुत्वा तुष्टुवुः सर्वे साधु साध्विति सत्तमाः ॥ २५
अब सभासद् लोग इस विषयपर विचार करने लगे कि सदस्योंमें सबसे पहले किसकी पूजा - अग्रपूजा होनी चाहिये । जितनी मति, उतने मत । इसलिये सर्वसम्मतिसे कोई निर्णय न हो सका । ऐसी स्थितिमें सहदेवने कहा– ॥ १८ ॥ ' यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल भगवान्
श्रीकृष्ण ही सदस्योंमें सर्वश्रेष्ठ और अग्रपूजाके पात्र हैं; क्योंकि यही समस्त देवताओंके रूपमें हैं; और देश, काल, धन आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सबके रूपमें भी ये ही हैं ॥१९ ॥ यह
सारा विश्व श्रीकृष्णका ही रूप है । समस्त यज्ञ भी श्रीकृष्णस्वरूप ही हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ही अग्नि, आहुति और मन्त्रोंके रूपमें हैं। ज्ञानमार्ग और कर्म- मार्ग - ये दोनों भी श्रीकृष्णकी प्राप्तिके ही हेतु हैं ॥ २० ॥ सभासदो! मैं कहाँतक वर्णन करूँ, भगवान् श्रीकृष्ण वह एकरस
अद्वितीय ब्रह्म हैं, जिसमें सजातीय, विजातीय और स्वगतभेद नाममात्रका भी नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींका स्वरूप है । वे अपने - आपमें ही स्थित और जन्म, अस्तित्व, वृद्धि आदि छः भावविकारोंसे रहित हैं । वे अपने आत्मस्वरूप संकल्पसे ही जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं ॥२१ ॥ सारा जगत् श्रीकृष्णके ही अनुग्रहसे अनेकों प्रकारके कर्मका अनुष्ठान
करता हुआ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप पुरुषार्थोंका सम्पादन करता है ॥२२ ॥ इसलिये
सबसे महान् भगवान् श्रीकृष्णकी ही अग्रपूजा होनी चाहिये । इनकी पूजा करनेसे समस्त प्राणियोंकी तथा अपनी भी पूजा हो जाती है || २३ || जो अपने दान धर्मको अनन्त भावसे युक्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि समस्त प्राणियों और पदार्थोंके अन्तरात्मा, भेदभावरहित, परम शान्त और परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्णको ही दान करे ॥२४ ॥ परीक्षित्!
सहदेव भगवान्की महिमा और उनके प्रभावको जानते थे । इतना कहकर वे चुप हो गये । उस ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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समय धर्मराज युधिष्ठिरकी यज्ञसभामें जितने सत्पुरुष उपस्थित थे, सबने एक स्वरसे ' बहुत ठीक, बहुत ठीक' कहकर सहदेवकी बातका समर्थन किया || २५ || धर्मराज युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंकी यह आज्ञा सुनकर तथा सभासदोंका अभिप्राय जानकर बड़े आनन्दसे प्रेमोद्रेकसे विह्वल होकर भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की ॥ २६ ॥ अपनी पत्नी, भाई, मन्त्री और
कुटुम्बियोंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरने बड़े प्रेम और आनन्दसे भगवान्के पाँव पखारे तथा उनके चरणकमलोंका लोकपावन जल अपने सिरपर धारण किया ॥२७ ॥ उन्होंने भगवान्को
पीले - पीले रेशमी वस्त्र और बहुमूल्य आभूषण समर्पित किये । उस समय उनके नेत्र प्रेम और आनन्दके आँसुओंसे इस प्रकार भर गये कि वे भगवान्को भलीभाँति देख भी नहीं सकते थे ॥२८ ॥
श्रुत्वा द्विजेरितं राजा ज्ञात्वा हार्दं सभासदाम् ।
समर्हयद्धृषीकेशं प्रीतः प्रणयविह्वलः ॥ २६
तत्पादाववनिज्यापः शिरसा लोकपावनीः ।
सभार्यः सानुजामात्यः१ सकुटुम्बोऽवहन्मुदा ॥ २७
वासोभिः पीतकौशेयैर्भूषणैश्च महाधनैः ।
अर्हयित्वाश्रुपूर्णाक्षो नाशकत् समवेक्षितुम् ॥२८
इत्थं सभाजितं वीक्ष्य सर्वे प्रांजलयो जनाः ।
नमो जयेति नेमुस्तं निपेतुः पुष्पवृष्टयः ॥२९
इत्थं निशम्य दमघोषसुतः स्वपीठा- दुत्थाय कृष्णगुणवर्णनजातमन्युः । उत्क्षिप्य बाहुमिदमाह सदस्यमर्षी संश्रावयन् भगवते परुषाण्यभीतः ॥३०
ईशो दुरत्ययः काल इति सत्यवती श्रुतिः ।
वृद्धानामपि यद् बुद्धिर्बालवाक्यैर्विभिद्यते ॥३१
यूयं पात्रविदां श्रेष्ठा मा मन्ध्वं बालभाषितम् ।
सदसस्पतयः सर्वे कृष्णो यत् सम्मतोऽर्हणे ॥३२
तपोविद्याव्रतधरान् ज्ञानविध्वस्तकल्मषान् ।
परमर्षीन् ब्रह्मनिष्ठान् लोकपालैश्च पूजितान् ॥३३
यज्ञसभामें उपस्थित सभी लोग भगवान् श्रीकृष्णको इस प्रकार पूजित, सत्कृत देखकर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******