स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 261–270
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २५१
सुजनरञ्जन मङ्गलमन्दिरं भजति ते पुरुषः परमं पदम् ।
भवति तस्य सुखं परमद्भुतं शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ३ ॥
जय युधिष्ठिरवल्लभ भूपते जय जयार्जितपुण्यपयोनिधे ।
जय कृपामय कृष्ण नमोऽस्तु ते शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ४ ॥
भवविमोचन माधव मापते सुकविमानसहंस शिवारते ।
जनकजारत राघव रक्ष मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ५ ॥
अवनिमण्डलमङ्गल मापते जलदसुन्दर राम रमापते ।
निगमकीर्तिगुणार्णव गोपते शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ६ ॥
पतितपावन नाममयी लता तव यशो विमलं परिगीयते ।
तदपि माधव मां किमुपेक्षसे शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ७ ॥
हे सज्जन - मनरञ्जन! जो पुरुष तुम्हारे मङ्गलमन्दिर ( शिव और विष्णुरूप ) परमपदका आश्रय लेते हैं, उन्हें परम दिव्य सुख प्राप्त होता है; अतएव हे शिव! हे हरे! मेरा वर विजय - साधन करो ॥ ३ ॥ हे युधिष्ठिरके प्रियतम! हे भूपते!
आप विजयी हों । हे पुण्यमहासागरके उपार्जन करनेवाले! आपकी जय हो, जय हो; हे दयामय कृष्ण! आपकी जय हो, आपको नमस्कार है; हे शिव! हे हरे! आप मेरी कल्याणमय विजय करें ॥ ४ ॥ हे भवभयहारी माधव! हे
लक्ष्मीपते! हे सुकवि - मानस - हंस! हे पार्वतीप्रिय! हे जानकीजीवन राघव! मेरी रक्षा करो, हे शिव! हे हरे! मेरा वर विजयसम्पादन करो ॥ ५ ॥ हे
भूमिमण्डलके मङ्गलस्वरूप! हे श्रीपते! हे घनश्याम सुन्दर! हे राम! हे रमापते! हे वेदवर्णित गुण - सागर! हे गोपते! हे शिव! हे हरे! मेरी कल्याणमय विजय करो ॥ ६ ॥ हे पतितपावन! तुम्हारा नाम कल्पलता है,
तुम्हारा यश नित्य सर्वत्र गाया जाता है तथापि हे माधव! तुम मेरी उपेक्षा क्यों कर रहे हो? हे शिव! हे हरे! मेरा शुभ विजय - साधन करो ॥ ७ ॥
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२५२ * स्तोत्ररत्नावली *
अमरतापरदेव रमापते विजयतस्तव नामधनोपमा ।
मयि कथं करुणार्णव जायते शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ८ ॥
हनुमतः प्रिय चापकर प्रभो सुरसरिद्धृतशेखर हे गुरो ।
मम विभो किमु विस्मरणं कृतं शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ९ ॥
अहरहर्जनरञ्जनसुन्दरं पठति यः शिवरामकृतं स्तवम् ।
विशति रामरमाचरणाम्बुजे शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ १० ॥
प्रातरुत्थाय यो भक्त्या पठेदेकाग्रमानसः ।
विजयो जायते तस्य विष्णुमाराध्यमाप्नुयात् ॥ ११ ॥
इति श्रीरामानन्दस्वामिना विरचितं श्रीशिवरामाष्टकं सम्पूर्णम् । हे देवोंमें श्रेष्ठ देव! हे दयासागर रमापते! सर्वत्र विजय पानेवाले तुझ परमेश्वरके नामरूपी धनका आदर्श कोष मेरे पास किस प्रकार सञ्चित हो जायगा? हे शिव! हे हरे! मेरा परम विजय - साधन करो ॥ ८॥ हे
हनुमत्प्रिय! हे चापधारी प्रभो! हे शीशपर गङ्गाजीको धारण करनेवाले गुरुदेव! विभो! तुम क्यों मुझे भूल गये? हे शिव! हे हरे! मेरा परम जय - साधन करो ॥ ९ ॥ जो मनुष्य इस लोकप्रिय सुन्दर रामानन्द स्वामीके
विरचित शिवराम - स्तवका पाठ करता है, वह राम - रमाके चरण - कमलोंमें प्रवेश करनेमें समर्थ होता है । हे शिव! हे शिव! हे हरे! मेरा श्रेष्ठ विजय - साधन करो ॥ १० ॥ जो प्रातःकाल उठकर एकाग्रचित्तसे इस
शिवरामस्तोत्रका पाठ करता है, उसकी सर्वत्र जय होती है और वह अपने आराध्यदेव विष्णुको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २५३ ७२ – कैवल्याष्टकम्
मधुरं मधुरेभ्योऽपि मङ्गलेभ्योऽपि मङ्गलम् ।
पावनं पावनेभ्यो ऽपि हरेर्नामैव केवलम् ॥ १ ॥
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्वं मायामयं जगत् ।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं हरेर्नामैव केवलम् ॥ २ ॥
स गुरुः स पिता चापि सा माता बान्धवोऽपि सः ।
शिक्षयेच्चेत्सदा स्मर्तु हरेर्नामैव केवलम् ॥ ३ ॥
निःश्वासे न हि विश्वासः कदा रुद्धो भविष्यति ।
कीर्तनीयमतो बाल्याद्धरेनमैव केवलम् ॥ ४ ॥
हरिः सदा वसेत्तत्र यत्र भागवता जनाः ।
गायन्ति भक्तिभावेन हरेर्नामैव केवलम् ॥५ ॥
अहो दुःखं महादुःखं दुःखाद् दुःखतरं यतः ।
काचार्थं विस्मृतं रत्नं हरेर्नामैव केवलम् ॥ ६ ॥
केवल हरिका नाम ही मधुरसे भी मधुर, मङ्गलमयसे भी मङ्गलमय और पवित्रसे भी पवित्र है ॥ १ ॥ ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सारा संसार मायामय है,
केवल एक हरिका नाम ही सत्य है; नाम ही सत्य है, फिर भी [ कहता हूँ कि ] नाम ही सत्य है ॥ २ ॥ जो सर्वदा केवल हरिनाम स्मरण करना ही सिखलाता है,
वही गुरु है, वही पिता है, वही माता है और बन्धु भी वही है ॥ ३ ॥ श्वासका कुछ
विश्वास नहीं, न मालूम कब रुक जायगा, इसलिये बाल्यावस्थासे ही केवल हरिनामका ही कीर्तन करना चाहिये ॥ ४ ॥ जहाँ भक्तजन भक्तिभावसे केवल
हरिनामका ही गान करते हैं, वहाँ सर्वदा भगवान् विराजते हैं ॥ ५ ॥ अहो!
महान् दुःख है! भयङ्कर कष्ट है!! सबसे बढ़कर शोक है!!! जो विषयरूपी काचके लिये हरिनामरूपी रत्नको बिसार दिया ॥ ६ ॥
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२५४ * स्तोत्ररत्नावली *
दीयतां दीयतां कर्णो नीयतां नीयतां वचः ।
गीयतां गीयतां नित्यं हरेर्नामैव केवलम् ॥ ७ ॥
तृणीकृत्य जगत्सर्वं राज सकलोपर I चिदानन्दमयं शुद्धं हरेर्नामैव केवलम् ॥ ८ ॥
इति श्रीकैवल्याष्टकं सम्पूर्णम् । ७३ – साधनपञ्चकम् वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां तेनेशस्य विधीयतामपचितिः काम्ये मतिस्त्यज्यताम् । पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयता-मात्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम् ॥ १ ॥
सङ्गः सत्सु विधीयतां भगवतो भक्तिर्दृढा धीयतां शान्त्यादिः परिचीयतां दृढतरं कर्माशु सन्त्यज्यताम् । केवल एक हरिनामके ही श्रवणमें कान लगाओ, वाणीसे बोलो और उसीका निरन्तर गान करो ॥ ७ ॥ सम्पूर्ण जगत्को तृणतुल्य करके, सबके
ऊपर केवल एक हरिका शुद्ध सच्चिदानन्दघन नाम ही विराजता है ॥ ८ ॥
सर्वदा वेदाध्ययन करो, इसके बताये हुए कर्मोंका भलीभाँति अनुष्ठान करो, उनके द्वारा भगवान्की पूजा करो और काम्यकर्मोंमें चित्तको मत जाने दो, पापसमूहका परिमार्जन करो, संसारसुखमें दोषानुसन्धान करो, आत्मजिज्ञासाके लिये प्रयत्न करो और शीघ्र ही गृहका त्याग कर दो ॥ १ ॥ सज्जनोंका सङ्ग करो,
भगवान्की दृढ़ भक्तिका आश्रय लो, शम - दमादिका भलीभाँति सञ्चय करो
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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २५५ सद्विद्वानुपसर्प्यतां प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां ब्रह्मकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम् ॥ २ ॥
वाक्यार्थश्च विचार्यतां श्रुतिशिरः पक्षः समाश्रीयतां दुस्तर्कात्सुविरम्यतां श्रुतिमतस्तर्कोऽनुसन्धीयताम् । ब्रह्मैवास्मि विभाव्यतामहरहर्गर्वः परित्यज्यतां देहेऽहम्मतिरुज्झ्यतां बुधजनैर्वादः परित्यज्यताम् ॥ ३ ॥
क्षुद्व्याधिश्च चिकित्स्यतां प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां स्वाद्वन्नं न तु याच्यतां विधिवशात्प्राप्तेन सन्तुष्यताम् । शीतोष्णादि विषह्यतां न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यता-मौदासीन्यमभीप्स्यतां जनकृपा नैष्ठुर्यमुत्सृज्यताम् ॥ ४ ॥
एकान्ते सुखमास्यतां परतरे चेतः समाधीयतां पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यतां जगदिदं तद्बाधितं दृश्यताम् । और कर्मोंका शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक त्याग कर दो, सच्चे ( परमार्थ जाननेवाले ) विद्वान्के पास नित्य जाओ और उनकी चरणपादुकाका सेवन करो, उनसे एकाक्षरब्रह्मकी जिज्ञासा करो और वेदोंके महावाक्योंका श्रवण करो ॥ २ ॥
महावाक्यके अर्थका विचार करो, महावाक्यका आश्रय लो, कुतर्कसे दूर रहो और श्रुति - सम्मत तर्कका अनुसन्धान करो; ' मैं भी ब्रह्म ही हूँ ' – नित्य ऐसी भावना करो, अभिमानको त्याग दो, देहमें अहंबुद्धि छोड़ दो और विचारवान् पुरुषोंके साथ वाद - विवाद मत करो ॥ ३ ॥ क्षुधारूप व्याधिकी प्रतिदिन
चिकित्सा करो, भिक्षारूप औषधका सेवन करो, स्वादु अन्नकी याचना मत करो, दैवयोगसे जो मिल जाय उसीसे सन्तोष करो, सर्दी - गर्मी, सुख - दुःख आदि द्वन्द्वोंको सहन करो और व्यर्थ वाक्य मत उच्चारण करो, उदासीनता धारण करो, अन्य मनुष्योंकी कृपाकी इच्छा तथा निष्ठुरताको त्याग दो ॥ ४ ॥
एकान्तमें सुखसे बैठो, परब्रह्ममें चित्त लगा दो, पूर्णात्माको अच्छी तरह देखो,
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२५६ * स्तोत्ररत्नावली * प्राक्कर्म प्रविलाप्यतां चितिबलान्नाप्युत्तरैः श्लिष्यतां प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थीयताम् ॥ ५ ॥
यः श्लोकपञ्चकमिदं पठते मनुष्यः
सञ्चिन्तयत्यनुदिनं स्थिरतामुपेत्य ।
तस्याशु संसृतिदवानलतीव्रघोर-तापः प्रशान्तिमुपयाति चितिप्रसादात् ॥ ६ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं साधनपञ्चकं सम्पूर्णम् । ७४- - -धन्याष्टकम् तज्ज्ञानं प्रशमकरं यदिन्द्रियाणां तज्ज्ञेयं यदुपनिषत्सु निश्चितार्थम् । ते धन्या भुवि परमार्थनिश्चितेहाः शेषास्तु भ्रमनिलये परिभ्रमन्ति ॥ १ ॥
और इस जगत्को उसके द्वारा बाधित देखो, सञ्चित कर्मोंका नाश कर दो, ज्ञानके बलसे क्रियमाण कर्मोंसे लिप्त मत होओ; प्रारब्ध कर्मको यहीं भोग लो, इसके बाद परब्रह्मरूपसे ( एकीभाव होकर ) स्थित हो जाओ ॥ ५ ॥ जो मनुष्य
इन पाँचों श्लोकोंको पढ़ता है और स्थिरचित्तसे प्रतिदिन इनका मनन करता है, उसके संसारदावानलके तीव्र घोर ताप, आत्मप्रसादके होनेसे शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥
जो इन्द्रियोंको शान्त करनेवाला है, वही ज्ञान है । जो उपनिषदोंका निश्चितार्थ है, वही ज्ञेय है । जिनकी समस्त चेष्टाएँ परमार्थदृष्टिसे ही होती हैं, वे ही पृथ्वीतलमें धन्य हैं और सब तो भूलभुलैयेमें ही भटकते रहते हैं ॥ १ ॥
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* प्रकीर्णस्तोत्राणि: * २५७ आदौ विजित्य विषयान्मदमोहराग-द्वेषादिशत्रुगणमाहृतयोगराज्याः ज्ञात्वामृतं समनुभूतपरात्मविद्या-कान्तासुखा बत गृहे विचरन्ति धन्याः ॥ २ ॥
त्यक्त्वा गृहे रतिमधोगतिहेतुभूता-मात्मेच्छयोपनिषदर्थरसं पिबन्तः । वीतस्पृहा विषयभोगपदे विरक्ता धन्याश्चरन्ति विजनेषु विरक्तसङ्गाः ॥ ३ ॥
त्यक्त्वा ममाहमिति बन्धकरे पदे द्वे मानावमानसदृशाः समदर्शिनश्च । कर्तारमन्यमवगम्य तदर्पितानि कुर्वन्ति कर्मपरिपाकफलानि धन्याः ॥ ४ ॥
प्रथम विषय - समूह तथा मद, मोह, राग और द्वेष आदि शत्रुओंको जीतकर, योगसाम्राज्यको पाकर, अमृतपदका ज्ञान प्राप्तकर, ब्रह्मविद्यारूपिणी कान्ताका सुखानुभव करते हुए, मानो घरमें ही विचरण करते हैं, वे योगीजन धन्य हैं ॥ २ ॥ अधोगतिके हेतुभूत घरके मोहको छोड़कर, आत्मजिज्ञासासे
उपनिषदर्थभूत ब्रह्मानन्दका पान करते हुए, निःस्पृह होकर, विषय - भोगोंसे विरक्त हो, जो निःसंगभावसे जनशून्य स्थानोंमें विचरते हैं, वे धन्य हैं ॥ ३ ॥
जो मैं और मेरा रूप दोनों बन्धनकारी भावोंको छोड़कर, मानापमानको समान समझते हुए, समदर्शी होकर तथा अपनेसे पृथग्भूत कर्ताको जानकर सम्पूर्ण कर्मफल उसको समर्पण करते हैं, वे पुरुष धन्य हैं ॥४ ॥
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२५८ E स्तोत्ररत्नावली * **** KKKKKKKKKKKKKKKKK त्यक्त्वैषणात्रयमवेक्षितमोक्षमार्गा भैक्षामृतेन परिकल्पितदेहयात्राः । ज्योतिः परात्परतरं परमात्मसंज्ञं धन्या द्विजा रहसि हृद्यवलोकयन्ति ॥ ५ ॥
नासन्न सन्न सदसन्न महन्न चाणु न स्त्री पुमान्न च नपुंसकमेकबीजम् । यैर्ब्रह्म तत्समनुपासितमेकचित्ता धन्या विरेजुरितरे भवपाशबद्धाः ॥ ६ ॥
अज्ञानपङ्कपरिमग्नमपेतसारं दुःखालयं मरणजन्मजरावसक्तम् । संसारबन्धनमनित्यमवेक्ष्य धन्या ज्ञानासिना तदवशीर्य विनिश्चयन्ति ॥ ७ ॥
लोकैषणा, पुत्रैषणा तथा वित्तैषणा – तीनोंको छोड़कर मुक्तिमार्गका अनुशीलन करके भिक्षामृतसे शरीरयात्राका निर्वाह करते हुए; जो परमात्मसंज्ञक परात्पर ज्योतिको एकान्तदेशमें अपने हृदयमें अवलोकन करते हैं, वे द्विज धन्य हैं ॥ ५ ॥ जो न असत् है, न सत् है और न सदसत् है; न महान् है, न अणु है;
न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक है; संसारका एकमात्र कारण है, उस ब्रह्मकी जिन्होंने उपासना की है, एकाग्रचित्त वे ही धन्य पुरुष सुशोभित होते हैं, और तो सब संसारबन्धनमें बँधे हुए हैं ॥ ६ ॥ जो पङ्कमें सने हुए, अज्ञान, निःसार,
दुःखरूप, जन्मजरामरणादिसमन्वित, संसारबन्धनको अनित्य देखकर उसको ज्ञानरूपी खड्गसे काटकर आत्मतत्त्वका निश्चय करते हैं, वे पुरुष धन्य हैं ॥ ७ ॥
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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * शान्तैरनन्यमतिभिर्मधुरस्वभावै-रेकत्वनिश्चितमनोभिरपेतमोहैः साकं वनेषु विजितात्मपदस्वरूपं शास्त्रेषु सम्यगनिशं विमृशन्ति अहिमिव जनयोगं सर्वदा वर्जयेद्यः कुणपमिव सुनारीं त्यक्तुकामो २५ ९ धन्याः ॥ ८ ॥
विरागी । विषमिव विषयान्यो मन्यमानो दुरन्ताञ् जयति परमहंसो मुक्तिभावं समेति ॥ ९ ॥।
सम्पूर्णं जगदेव नन्दनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमा गाङ्गं वारि समस्तवारिनिवहाः पुण्याः समस्ताः क्रियाः । वाचः प्राकृतसंस्कृताः श्रुतिशिरो वाराणसी मेदिनी सर्वावस्थितिरस्य वस्तु विषया दृष्टे परब्रह्मणि ॥ १० ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं धन्याष्टकं सम्पूर्णम् । जिन्होंने मनके द्वारा एकत्वका निश्चय किया है और मोहको त्याग दिया है ऐसे शान्त, अनन्यमति और कोमलचित्त महात्माओंके साथ, जो लोग वनमें शास्त्रोंद्वारा आत्मतत्त्वका निरन्तर विचार करते हैं, वे धन्य हैं ॥ ८ ॥ जो जनसमूहको सदा
सर्प - सहवासके समान त्यागता है, सुन्दर स्त्रीकी वैराग्यभावसे शवके समान उपेक्षा करता है, दुस्त्यज विषयोंको विषके समान छोड़ता है, उस परमहंसकी जय हो, जय हो । वही मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ जिसने परब्रह्मका साक्षात्कार कर लिया है,
उसके लिये सारा संसार नन्दनवन है, समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, सम्पूर्ण जल गङ्गाजल है, उसकी सारी क्रियाएँ पवित्र हैं, उसकी वाणी प्राकृत हो अथवा संस्कृत हो वेदकी सारभूत है, उसके लिये सम्पूर्ण भूमण्डल काशी ( मुक्तिक्षेत्र ) ही है तथा और भी उसकी जो - जो चेष्टाएँ हैं, सब परमार्थमयी ही हैं ॥ १० ॥
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२६० * स्तोत्ररत्नावली * ***** ७५ – कौपीनपञ्चकं स्तोत्रम्
वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः ।
अशोकवन्तः करुणैकवन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ १ ॥
मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः पाणिद्वये भोक्तुममत्रयन्तः ।
कन्थामपि स्त्रीमिव कुत्सयन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ २ ॥
देहाभिमानं परिहृत्य दूरादात्मानमात्मन्यवलोकयन्तः ।
अहर्निशं ब्रह्मणि ये रमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ ३ ॥
स्वानन्दभावे परितुष्टिमन्तः स्वशान्तसर्वेन्द्रियवृत्तिमन्तः ।
नान्तं न मध्यं न बहिः स्मरन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ ४ ॥
पञ्चाक्षरं पावनमुच्चरन्तः पतिं पशूनां हृदि भावयन्तः ।
भिक्षाशना दिक्षु परिभ्रमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ ५ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कौपीनपञ्चकं ( यतिपञ्चकं ) सम्पूर्णम् । सदैव उपनिषद् - वाक्योंमें रमते हुए, भिक्षाके अन्नमात्रमें ही सन्तोष रखते हुए, शोकरहित तथा दयावान्, कौपीन धारण करनेवाले ही भाग्यवान् हैं ॥ १ ॥
केवल वृक्षतलोंमें रहनेवाले, दोनों हाथोंको ही भोजनपात्र बनानेवाले, गुदड़ीको भी स्त्रीकी भाँति तुच्छ बुद्धिसे देखनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं ॥ २ ॥
देहाभिमानको दूरसे ही छोड़कर, अपनी आत्माको अपनेमें ही देखते हुए रात - दिन ब्रह्ममें रमण करनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं ॥ ३ ॥ आत्मानन्दमें ही सन्तुष्ट
रहनेवाले, अपने भीतर ही सारी इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ शान्त कर लेनेवाले, अन्त, मध्य और बाहरकी स्मृतिसे शून्य रहनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं ॥ ४ ॥
पवित्र पञ्चाक्षरमन्त्र ( नमः शिवाय ) का जप करते हुए, हृदयमें परमेश्वरकी भावना करते तथा भिक्षाका भोजन करते हुए सब दिशाओंमें विचरनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं ॥ ५ ॥