स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 251–260

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 251 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २४१ प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्णं पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् । यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्ती रज्ज्वां भुजङ्गम इव प्रतिभासितं वै ॥ ३ ॥

श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् ।

प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥ ४ ॥

इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ परब्रह्मणः प्रातःस्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ( ख ) श्रीविष्णोः प्रातः स्मरामि भवभीतिमहार्तिशान्त्यै नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम् । ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम् ॥ १ ॥

प्रातर्नमामि मनसा वचसा च मूर्ध्ना पादारविन्दयुगलं परमस्य पुंसः । अच्युतको अग्रय ( आदि ) पुरुष कहते हैं, मैं उसका प्रातःकाल भजन करता हूँ ॥ २॥ जिस सर्वस्वरूप परमेश्वरमें यह समस्त संसार रज्जुमें सर्पके समान

प्रतिभासित हो रहा है, उस अज्ञानातीत, दिव्यतेजोमय, पूर्ण सनातन पुरुषोत्तमको मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ ये तीनों श्लोक तीनों

लोकोंके भूषण हैं, इन्हें जो कोई प्रातःकालके समय पढ़ता है, उसे परमपदकी प्राप्ति होती है ॥४ ॥

गरुडवाहन, कमलनाभ, ग्राहसे ग्रसित गजेन्द्रकी मुक्तिके कारण, सुदर्शनचक्रधारी नवविकसित कमलपत्र - से नेत्रवाले नारायणका भव - भयरूपी महान् दुःखकी शान्तिके लिये, मैं प्रातः स्मरण करता हूँ ॥१ ॥ वेदोंका

स्वाध्याय करनेवाले विप्रोंके परम आश्रय, नरकरूप संसारसमुद्रसे तारनेवाले,

पृष्ठ 252

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 252 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४२ ** स्तोत्ररत्नावली * नारायणस्य नरकार्णवतारणस्य ************* पारायणप्रवणविप्रपरायणस्य प्रातर्भजामि भजतामभयङ्करं तं प्राक्सर्वजन्मकृतपापभयापहत्यै यो ग्राहवक्त्रपतिताङ्घ्रिगजेन्द्रघोर-॥२ ॥

शोकप्रणाशनकरो धृतशङ्खचक्रः ॥ ३ ॥

॥ इति श्रीविष्णोः प्रातःस्मरणम् ॥ ( ग ) श्रीरामस्य प्रातः स्मरामि रघुनाथमुखारविन्दं मन्दस्मितं मधुरभाषि विशालभालम् । कर्णावलम्बिचलकुण्डलशोभिगण्डं कर्णान्तदीर्घनयनं नयनाभिरामम् ॥ १ ॥

उस परमपुरुषके चरणारविन्दयुगलमें सिर झुकाकर मैं मन - वचनसे प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जिसने शङ्ख - चक्र धारण करके ग्राहके मुखमें पड़े

हुए चरणवाले गजेन्द्रके घोर संकटका नाश किया, भक्तको अभय करनेवाले उन भगवान्‌को मैं अपने पूर्वजन्मोंके सब पापोंका नाश करनेके लिये प्रातःकाल भजता हूँ ॥ ३ ॥

जो मधुर मुसकानयुक्त, मधुरभाषी और विशाल भालसे सुशोभित हैं; कानोंमें लटके हुए चञ्चल कुण्डलोंसे जिनके दोनों कपोल शोभित हो रहे हैं तथा जो कर्णपर्यन्त विस्तृत बड़े - बड़े नेत्रोंसे शोभायमान और नेत्रोंको आनन्द देनेवाले हैं, श्रीरघुनाथजीके ऐसे मुखारविन्दका मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ ॥ १ ॥

पृष्ठ 253

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 253 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रकीर्णस्तोत्राणि * २४३ प्रातर्भजामि रघुनाथकरारविन्दं रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्यः । यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमङ्गलमाप सद्यः ॥ २ ॥

प्रातर्नमामि रघुनाथपदारविन्दं वज्राङ्कशादिशुभरेखि सुखावहं मे । योगीन्द्रमानसमधुव्रतसेव्यमानं शापापहं सपदि गौतमधर्मपत्न्याः ॥ ३ ॥

प्रातर्वदामि वचसा रघुनाथनाम वाग्दोषहारि सकलं शमलं निहन्ति । यत्पार्वती स्वपतिना सह भोक्तुकामा प्रीत्या सहस्त्रहरिनामसमं जजाप ॥ ४ ॥

मैं प्रातःकाल श्रीरघुनाथजीके करकमलोंका स्मरण करता हूँ, जो राक्षसोंको भय देनेवाले और भक्तोंके वरदायक हैं तथा जिन्होंने राजसभामें शङ्करका धनुष तोड़कर शीघ्र ही सीताका मङ्गलमय पाणिग्रहण किया था ॥ २ ॥ मैं प्रातःकाल श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंको नमस्कार करता हूँ, जो

वज्र, अङ्कुश आदि शुभ रेखाओंसे युक्त, मेरे लिये सुखदायी, योगियों के मन - मधुपद्वारा सेवित और गौतमपत्नी अहल्याके शापको दूर करनेवाले हैं ॥ ३ ॥ मैं प्रातःकाल अपनी वाणीसे श्रीरघुनाथजीके नामका जप करता हूँ,

जो वाणीके दोषोंको नाश करनेवाला और सर्व पापोंको हरनेवाला है तथा जिसे पार्वतीजीने अपने पति ( शङ्कर ) के साथ भोजन करनेकी इच्छासे, भगवान्के सहस्रनामके सदृश प्रीतिसहित जपा था ॥४ ॥

पृष्ठ 254

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 254 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४४ ** स्तोत्ररत्नावली * प्रातः श्रये श्रुतिनुतां रघुनाथमूर्तिं FFFFF नीलाम्बुजोत्पलसितेतररत्ननीलाम् । आमुक्तमौक्तिकविशेषविभूषणाढ्यां ध्येयां समस्तमुनिभिर्जनमुक्तिहेतुम् ॥ ५ ॥

यः श्लोकपञ्चकमिदं प्रयतः पठेद्धि नित्यं प्रभातसमये पुरुषः प्रबुद्धः । श्रीरामकिङ्करजनेषु स एव मुख्यो भूत्वा प्रयाति हरिलोकमनन्यलभ्यम् ॥ ६ ॥

॥ इति श्रीरामस्य प्रातःस्मरणम् ॥ ( घ ) श्रीशिवस्य प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् । खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥ १ ॥

मैं प्रातःकाल श्रीरघुनाथजीकी वेदवन्दित मूर्तिका आश्रय लेता हूँ, जो नीलकमल और नीलमणिके समान नीलवर्ण, लटकते हुए मोतियोंकी मालासे विभूषित, समस्त मुनियोंकी ध्येय तथा भक्तोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है ॥ ५॥ जो पुरुष प्रातःकाल नींदसे जगकर जितेन्द्रियभावसे इन पाँचों

श्लोकोंका नित्य पाठ करता है, वह श्रीरामजीके सेवकोंमें मुख्य होकर

श्रीहरिके लोकको, जो दूसरोंके लिये दुर्लभ है, प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

जो सांसारिक भयको हरनेवाले और देवताओंके स्वामी हैं, जो गङ्गाजीको धारण करते हैं, जिनका वृषभ वाहन है, जो अम्बिकाके ईश हैं तथा जिनके

पृष्ठ 255

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 255 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रकीर्णस्तोत्राणि * २४५ प्रातर्नमामि गिरिशं गिरजार्द्धदेहं सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोऽभिरामं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं नामादिभेदरहितं षड्भावशून्यं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य

श्लोकत्रयं नुदिनं

ते दुःखजातं बहुजन्मसञ्चितं हित्वा पदं यान्ति तदेव ॥ इति श्रीशिवस्य प्रातःस्मरणम् ॥ ॥ २ ॥

महान्तम् ।

॥३ ॥

पठन्ति ।

शम्भोः ॥ ४ ॥

हाथमें खट्वाङ्ग, त्रिशूल और वरद तथा अभयमुद्रा है, उन संसार - रोगको हरनेके निमित्त अद्वितीय औषधरूप ' ईश ' ( महादेवजी ) को मैं प्रातः समयमें स्मरण करता हूँ ॥ १ ॥ भगवती पार्वती जिनका आधा अङ्ग हैं, जो संसारकी सृष्टि, स्थिति और

प्रलयके कारण हैं, आदिदेव हैं, विश्वनाथ हैं, विश्व - विजयी और मनोहर हैं, सांसारिक रोगको नष्ट करनेके लिये अद्वितीय औषधरूप उन गिरीश ( शिव ) को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो अन्तसे रहित आदिदेव हैं, वेदान्तसे जाननेयोग्य, पापरहित

एवं महान् पुरुष हैं तथा जो नाम आदि भेदोंसे रहित, छः भाव - विकारों ( जन्म, वृद्धि, स्थिरता, परिणमन, अपक्षय और विनाश ) से शून्य, संसाररोगको हरनेके निमित्त अद्वितीय औषध हैं, उन एक शिवजीको मैं प्रातःकाल भजता हूँ ॥ ३ ॥ जो मनुष्य

उठकर शिवका ध्यान कर प्रतिदिन इन तीनों श्लोकोंका पाठ करते हैं, वे प्रातःकाल

पृष्ठ 256

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 256 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४६ * स्तोत्ररत्नावली * ( ङ ) श्रीदेव्याः चाञ्चल्यारुणलोचनाञ्चितकृपां चन्द्रार्कचूडामणिं चारुस्मेरमुखां चराचरजगत्संरक्षणीं सत्पदाम् । चञ्चञ्च्चम्पकनासिकाग्रविलसन्मुक्तामणीरञ्जितां श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ १ ॥

कस्तूरीतिलकाञ्चितेन्दुविलसत्प्रोद्भासिभालस्थलीं कर्पूरद्रवमिश्रचूर्णखदिरामोदोल्लसद्वीटिकाम् लोलापाङ्गतरङ्गितैरधिकृपासारैर्नतानन्दिनीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ २ ॥

॥ इति श्रीदेव्याः प्रातःस्मरणम् ॥ लोग अनेक जन्मोंके सञ्चित दुःखसमूहसे मुक्त होकर शिवजीके उसी कल्याणमय पदको पाते हैं ॥ ४ ॥

जिनके चञ्चल और अरुण नेत्रोंसे करुणा प्रकट हो रही है, चन्द्रमा और सूर्य जिनके मस्तकके आभूषण हैं, जिनका मुख सुन्दर मुसकानसे सुशोभित है, जो चराचर जगत्की रक्षिका हैं, सत्पुरुष जिनके विश्रामस्थान हैं, शोभायमान चम्पाके समान सुन्दर नासिकाके अग्रभागमें मोतीकी बुलाक जिनकी शोभा बढ़ा रही है, उन श्रीशैलपर निवास करनेवाली भगवती श्रीमाताका मैं स्मरण करता हूँ ॥ १ ॥ जिनका ललाट कस्तूरीकी बेंदीसे

विभूषित और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान है, जिनके मुखमें कपूरके रससे युक्त चूना और खैरकी सुगन्धसे पूर्ण पानका बीड़ा शोभा दे रहा है, जो अपने चञ्चल कटाक्षोंसे तरंगायमान करुणाकी धारावाहिनी वृष्टिसे प्रणत भक्तोंको आनन्द देनेवाली हैं, श्रीशैलपर निवास करनेवाली उन भगवती श्रीमाताका स्मरण करता हूँ ॥ २ ॥ मैं

पृष्ठ 257

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 257 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २४७ ( च ) श्रीगणेशस्य प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम् उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड-माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम् ॥ १ ॥

प्रातर्नमामि चतुराननवन्द्यमान-मिच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम् । तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयोः शिवाय ॥। २ ॥ प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्तशोक-दावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम् । अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाह मुत्साहवर्धनमहं सुतमीश्वरस्य ॥ ३ ॥

जो इन्द्र आदि देवेश्वरोंके समूहसे वन्दनीय हैं, अनाथोंके बन्धु हैं, जिनके युगल कपोल सिन्दूरराशिसे अनुरञ्जित हैं, जो उद्दण्ड ( प्रबल ) विघ्नोंका खण्डन करनेके लिये प्रचण्ड दण्डस्वरूप हैं; उन श्रीगणेशजीको मैं प्रातः काल स्मरण करता हूँ ॥ १॥ जो ब्रह्मासे वन्दनीय हैं, अपने सेवकको उसकी

इच्छाके अनुकूल पूर्ण वरदान देनेवाले हैं, तुन्दिल हैं, सर्प ही जिनका यज्ञोपवीत है, उन क्रीडाकुशल शिव - पार्वतीके पुत्र ( श्रीगणेशजी ) को मैं कल्याण - प्राप्तिके लिये प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो अपने जनको

अभय प्रदान करनेवाले हैं, भक्तोंके शोकरूप वनके लिये दावानल ( वनाग्नि ) हैं, गणोंके नायक हैं, जिनका मुख हाथीके समान और सुन्दर है और जो

पृष्ठ 258

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 258 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४८ * स्तोत्ररत्नावली *

श्लोकत्रयमिदं पुण्यं सदा

सदा साम्राज्यदायकम् ।

प्रातरुत्थाय सततं यः पठेत्प्रयतः पुमान् ॥ ४ ॥

॥ इति श्रीगणेशप्रातःस्मरणम् ॥

( छ ) श्रीसूर्यस्य प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं ************************************* रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि । सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥ १ ॥

प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाङ्गनोभि-ब्रह्मेन्द्रपूर्वक सुरैर्नृतमर्चितं च । वृष्टिप्रमोचनविनिग्रहहेतुभूतं त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च ॥ २ ॥

अज्ञानरूप वनको नष्ट करने ( जलाने ) के लिये अग्नि हैं; उन उत्साह बढ़ानेवाले शिवसुत ( श्रीगणेशजी ) को मैं प्रातःकाल भजता हूँ ॥ ३ ॥ जो

पुरुष प्रातःसमय उठकर संयतचित्तसे इन तीनों पवित्र श्लोकोंका नित्य पाठ करता है, उसको यह स्तोत्र सर्वदा साम्राज्यके समान सुख देता है ॥४ ॥

मैं सूर्यभगवान्के उस श्रेष्ठरूपको प्रातःसमय स्मरण करता हूँ; जिसका मण्डल ऋग्वेद है, तनु यजुर्वेद है और किरणें सामवेद हैं और जो ब्रह्माका दिन है, जगत्‌को उत्पत्ति, रक्षा और नाशका कारण है तथा लक्ष्य अचिन्त्यस्वरूप है ॥ १ ॥ मैं प्रातःसमय शरीर, वाणी और मनके द्वारा और

इन्द्र आदि देवताओंसे स्तुत और पूजित, वृष्टिके कारण एवं अवृष्टिके ब्रह्मा, लोकोंके पालनमें तत्पर और सत्त्व आदि त्रिगुणरूप हेतु, तीनों धारण करनेवाले तरणि

पृष्ठ 259

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 259 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २४ ९ ******* $ ££££££££ ******** 5555555 प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिं पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च । तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्ति गोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम् ॥ ३ ॥

श्लोकत्रयमिदं भानोः प्रातःकाले पठेत्तु यः ।

स सर्वव्याधिनिर्मुक्तः परं सुखमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥

॥ इति श्रीसूर्यप्रातःस्मरणम् ॥

( ज ) श्रीभगवद्भक्तानाम् प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-व्यासाम्बरीषशुकशौनक भीष्मदाल्भ्यान् रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन् पुण्यानिमान् परमभागवतान् स्मरामि ॥ १ ॥

( पाण्डवगीतायाः ) ( सूर्यभगवान् ) को नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो पापोंके समूह तथा शत्रुजनित

भय एवं रोगोंका नाश करनेवाले हैं, सबसे उत्कृष्ट हैं, सम्पूर्ण लोकोंके समयकी गणनाके निमित्तभूत कालस्वरूप हैं और गौओंके कण्ठबन्धन छुड़ानेवाले हैं, उन अनन्तशक्तिसम्पन्न आदिदेव सविता ( सूर्यभगवान् ) को मैं प्रातःकाल भजता हूँ ॥ ३ ॥ जो मनुष्य प्रातःकाल सूर्यके स्मरणरूप इन तीनों

श्लोकोंका पाठ करता है; वह सब रोगोंसे मुक्त होकर परम सुख प्राप्त कर

सकता है ॥ ४ ॥

प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुक, शौनक, भीष्म, दाल्भ्य, रुक्माङ्गद, अर्जुन, वसिष्ठ और विभीषण आदि इन परम पवित्र

पृष्ठ 260

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२५० * स्तोत्ररत्नावली * वाल्मीकिः सनकः सनन्दनतरुर्व्यासो वसिष्ठो भृगु-र्जाबालिर्जमदग्निकच्छजनको गर्गोऽङ्गिरा गौतमः । मान्धाता ऋतुपर्णवैन्यसगरा धन्यो दिलीपो नलः पुण्यो धर्मसुतो ययातिनहुषौ कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ २ ॥

( मङ्गलाष्टकात् ) ॥ इति प्रातःस्मरणम् ॥ -७१ – श्रीशिवरामाष्टकस्तोत्रम्

शिव हरे शिव राम सखे प्रभो त्रिविधतापनिवारण हे विभो ।

अज जनेश्वर यादव पाहि मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ १ ॥

कमललोचन राम दयानिधे हर गुरो गजरक्षक गोपते शिवतनो भव शङ्कर पाहि मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ २ ॥

वैष्णवोंका मैं ( प्रातःकाल ) स्मरण करता हूँ ॥ १ ॥ वाल्मीकि, सनक, सनन्दन,

तरु, व्यास, वसिष्ठ, भृगु, जाबालि, जमदग्नि, कच्छ, जनक, गर्ग, अङ्गिरा, गौतम, मान्धाता, ऋतुपर्ण, पृथु, सगर, धन्यवाद देनेयोग्य दिलीप और नल, पुण्यात्मा युधिष्ठिर, ययाति और नहुष - ये सब हमारा मङ्गल करें ॥ २ ॥

हे शिव! हे हरे, हे शिव, हे राम, हे सखे! हे प्रभो, हे त्रिविध तापनिवारण विभो! हे अज, हे जगन्नाथ, हे यादव! मेरी रक्षा करो; हे शिव! हे हरे! मेरी कल्याणमय विजय करो ॥ १ ॥ हे कमललोचन दयानिधे राम! हे हर! हे गुरो!

हे गजरक्षक! हे गोपते! हे कल्याणरूपधारी भव! हे शङ्कर! मेरी रक्षा करो; हे शिव! हे हरे! मेरा उत्तम विजयसाधन करो ॥ २ ॥