सुश्रुत संहिता चौखम्बा — पृष्ठ 1441–1450
सुश्रुत संहिता चौखम्बा · Chaukhamba · पृष्ठ 1441–1450
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 11 ait: 11 संक्षेपतः यन्त्रों का परिचय । ( १ ) ऋक्षमुखयन्त्र ( ३ ) कङ्कमुखयन्त्र ( २ ) कङ्कमुखयन्त्र ( ४ ) भृङ्गमुखयन्त्र ( १-४ ) ऋक्षमुख, कङ्कमुख और भृङ्गमुख नामक ये यन्त्र स्वस्तिक यन्त्र के अन्तर्गत हैं । इनका उपयोग अस्थि - निमग्न शल्योंका उद्धरण करने में होता था । आधुनिक शल्यचिकित्सा में हड्डी पकड़ने, बन्दूक की गोली निकालने दाँत निकालने, कर्णनासागत शल्य निकालने तथा अन्य कामों के लिये अनेक पशु - पक्षियों के मुखानुकारी स्वस्तिकयन्त्र प्रयुक्त होते हैं । इनके नाम कहीं अन्वेषकानुसार, अधिकतर स्थानिककार्यानुसार रक्खे गये हैं । यथा-Ferguson's Forceps; Tarabeuf's Forceps; Bedfords ' Forceps इत्यादि नाम अन्वेषकानुसार रक्खे हैं | Aural Forceps, Deutal Forceps; Bone Forceps इत्यादि नाम स्थानिककार्यानुसार रक्खे गये हैं । कतिपय नाम प्राणियों के अङ्गसादृश्यानुसार रक्खे गये हैं । यथा सिहमुख Lion Forceps, शशघातीमुख Dental Hawk Bill Forceps, मूषिकमुख Mouse teeth Forceps, मकरमुख Crocodile Forceps. श्वामुख Bull. dog Volsalla ete. CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ( ५ ) सन्देशयन्त्र ( ५ ) सन्दंश - यन्त्र दो प्रकारका होता है । इनका उपयोग त्वचा, मांस, सिरा और स्नायु - गत शल्योंका उद्धरण करने में था । ( ६ ) मुचुण्डीयन्त्र ( ६ ) मुचुण्डीयन्त्र अष्टाङ्गसङ्ग्रह के अनुसार सन्देशयन्त्रका भेद है ' तद्वच्च मुचुण्डी, सा तु ऋजुश्लक्ष्णा सूक्ष्मदन्ता सक्तद्विभुजा मूले रुचकनद्धा वलयापीडनाच्छिन्नामशेषगम्भीरवणाधि मां सहरणे - " ( ७ ) नाड़ीयन्त्र ( ७ ) नाडीयन्त्र अनेक प्रकारके होते थे । इनकी संख्या २० थी । इन-का उपयोग स्रोतोंमें फँसे हुये शल्यको देखने एवं निकालने में, आशयोंका निरीक्षण करने में, कार्य में सुगमता प्राप्तिके लिये, आशय में भरे द्रव्य के आचूषण करने में होता था । ये यन्त्र स्रोतज्ञों के आदेशानुसार बनाये जाते थे । इसी से इनकी लम्बाई और चौड़ाई निश्चित नहीं थी । आधुनिक शल्यचिकित्सा में बहुत नाडी यन्त्र व्यवहृत होते हैं । इनको डायरेक्टर Director, कहते हैं । यथा - Probe director, Hernia_director. Lithotomy director; Fistula director इत्यादि । CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Arya Sama and eGangotri Found Foundation ion Chennai ( ८ ) अर्शोयन्त्र ( १० ) बस्तियन्त्र ( ९ ) बस्तियन्त्र CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar ने I t ) ' क्त B I me II पल स-IT I दि कोष्ठ ससे का दूषित दूध निकालने के लिये ( ब्रेस्ट पम्प ' - Breast Pump ) नामक art यन्त्र का उपयोग होता है । छाती में जब जलसंचय ( Pleurisy with effusion ) होता है, तब जल निकालने के लिये ( पोटेन्स अस्पिरे-टर, Potains Aspirator ) नामक नाडीयन्त्र और पथरी फोड़ने के पश्चात् उसमें कण | निकालने के लिये ( इवैक्युएटर Evacuator, ) नाडीयन्त्र संप्रति व्यवहृत होते हैं । ( ८ ) अशयन्त्र नाडीयन्त्रान्तर्गत है । यह लोहे, हाथीदांत, सींग या लकड़ी से निर्मित किया जाता था । आकार गौके स्तनके समान होता था, एवं बीच में खोखला रहता था । पुरुषोंके लिये इनका आकार ४ अङ्गुल एवं परिधि ५ अङ्गुल की होती थी । स्त्रियों के लिये अधिक चौड़े और ६ अङ्गु-ल परिधिके बनाये जाते थे । इनमें दो छिद्र होते थे । पहला छिद्र रोग के निरीक्षणार्थं और दूसरा कार्यार्थ होता था । यह कार्य प्रायः क्षार और दाह द्वारा होता था । छिद्रकी लम्बाई ३ अङ्गुल और परिधि अङ्गुष्ठ के समान होती थी । छिद्रसे आध अङ्गुल की दूरीपर आधा अङ्गुलभर ऊँचा एक गोल उभार होता था । वाग्भटने उपरोक्त दोनों प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये भिन्न भिन्न यन्त्रों का उपयोग बताया है । इनकी लम्बाई एवं परिधि एक समान होती थी । ये दोनों इकट्ठे प्रयुक्त किये जाते थे । एकसे रोगपरीक्षण और दूसरे से क्रियासम्पादन होता था । ( ९ -१० ) बस्तियन्त्र में एक थैली और एक नली होती थी । यह नली किसी धातु या लकड़ी की बनाई जाती थी; जो कि चिकनी, साफ, दृढ और
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Found on Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri की पूँछकी भाँति जड़ से मोटी और आगे से पतलो होतो थी । इसके सिरे पर गोल मुख होता था । इनकी आकृति, लंबाई और परिधि में अव-स्थानुसार भेद होता था । बस्ति पशुओं के मूत्राशय से बनाई जाती थी । दुर्गन्ध को दूर करने के लिये चूने और पानी से अच्छी तरह साफ करके उसे खूब सुखा लेते थे । बस्ति स्वच्छ आर चिकनी होती थी । यदि मूत्राशय नही मिलता था, तो मेढक की त्वचा अथवा उदर - झिल्लीकी बनाई जाती थी । सबके अभाव में वस्त्र या चर्मकी बनाते थे । 1 ( ११ ) जलोदर यन्त्र ( ११ ) जलोदरयन्त्र नाडीयन्त्रान्तर्गत है । यह किसी धातु अथवा मोरके पंखके समान खोखली वस्तु से बनाया जाता था । इसके दोनों ओर मुख होता था । ( १२ ) अङ्गुलीयन्त्र ( १२ ) अंगुलीयन्त्र हाथीदांत या लकड़ीसे बनाया जाता था । लम्बाई ४ अङ्गुलकी होती थी । इसका उपयोग रोगी का मुख खोलने आर अङ्गु-लियों की रक्षा करने में होता था ( १३. ) दर्व्याकृतिशलाका ( १३ ) शलाकायन्त्र नाना प्रकार हैं । इनकी संख्या अठ्ठाइस है । पर यह संख्या अनिश्चित है । कार्य, कारण और आवश्यकतासे इनकी लम्बाई CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri एवं परिधि में भी भेद होता था । इनका उपयोग - एषण, व्यूहन ( अटकी हुई पूय को खींचने ) चालन, आहरण और स्रोतोगत शल्यके उद्धरण आदि में किया जाता था । ( १४ ) गर्भशङ्कयन्त्र ( १४ ) गर्भशङ्कुयन्त्रका अग्रभाग अङ्कुशके समान टेढ़ा होता था । इसका उपयोग मूढगर्भ में किया जाता था । यह शङ्कु मण्डलाग्रसे शिरोविदारण करने के पश्चात आहरण करने के लिये प्रयुक्त होता था । अंग्रेजी में इस यन्त्रको ( ब्लन्ट हुक एण्ड क्रोचेट Blunt hook and Crotchet ) कहते हैं । ( १५ ) अश्मरीहरयन्त्र ( १५ ) अश्मरीहरयन्त्र का उपयोग अश्मरी के शल्यकर्ममें और अश्मरी को मूत्राशय से निकालने में किया जाता था । संक्षेपतः शस्त्रोंका परिचय । ( १ ) मण्डलाग्रशस्त्र ( १ ) मण्डलाग्रशस्त्रका एक सिरा गोल तथा दूसरा सिरा उस्तरे के समान होता था । वाग्भट के अनुसार इसका आकार तर्जनीके नख की तरह होता था । इसका उपयोग - गलशुण्डिकारोग में, मढगर्भ में और आँख के रोग आदि में, तथा आँखकी वृद्धि ( अर्श ) में, एवं जिह्वा के अधि-जिह्वारोग में छेदन लेखन के लिये था । ( २ ) करपत्रशस्त्र ( २ ) करपत्र के शब्दार्थसे विदित होता है कि यह हाथ अङ्गु-CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar ने
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६ ] Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri लियों के समान होता था और इससे छेदन और लेखन का कार्य लिया जाता था । कोई आचार्य इसे बढ़ई की आरीके समान स्वीकार करते हैं । इसका उपयोग हड्डियों के काटने में होता था । अंग्रेजीमें ( ' बोन सा ' Bone sow ) कहते हैं । ( ३ ) वृद्धिपत्रशस्त्र ( ३ ) वृद्धिपत्रशस्त्रका आकार ' वृद्धि ' वृक्ष के पत्ते की तरह होता था । इसके दो स्वरूप थे 1 । सीधा, जिससे त्वचा की विधियाँ खोली जाती थीं, वक्र, जिससे गम्भीरविद्रधियां खोली जाती थीं । इसका उपयोग- व्रणके पाससे बालोंको हटाने में, छेदन या लेखन करने में, वृद्धिरोगके शल्यकर्म में और सिर में काकपद करने में होता था । ( ४ ) नखशस्त्र ( ४ ) नखशस्त्र दो प्रकारका होता था । वक्रधार और ऋजुधार । इसका उपयोग – छेदन, भेदन, लेखन और विशेषतः आचूषण क्रिया में किया जाता था । ( नेलपेरर Nail Parer ) कहते हैं । ( ५ ) मुद्रिकाशस्त्र ( ५ ) मुद्रिका शस्त्रका आकार तर्जनीके प्रथमपर्वकी भाँति होता था । वाग्भटके अनुसार इसका दूसरा नाम ' अङ्गुलिशस्त्र ' था । इसका उपयोग -गलरोग और मूढगर्भ ( विषकुम्भक ) में छेदन भेदनके लिये होता था । अंग्रेजीमे ' इसे ( फिंगर नाइफ Finger Knife ) कह सकते हैं । CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ( ६ ) उत्पलपत्रशस्त्र ( ६ ) उत्पलपत्रशस्त्रका आकार कमल के पत्ते की भाँति होता था । इसका अग्रभाग नोकदार एवं तेज होता था । इसका उपयोग - काटने, छेदने और मुख्यतः सिरावेध में होता था । अंग्रेजी में इसको ( लान्सेट Lancet ) कह सकते हैं । ( ७ ) अ ' धारशस्त्र ( ७ ) अर्द्धशको कई आचार्य एक धारवाला मानते हैं । डल्हणने इसे लम्बाई में आधी धारवाला कहा है । इसका उपयोग शरीर को विभक्त करने में होता था । ( ८ ) सूचीशस्त्र ( ८ ) सूचीशस्त्र के तीन भेद थे । पहला, तीन अङ्गुल लम्बा, जो मांसल स्थानोंको सीने में प्रयुक्त किया जाता था । दूसरा, ढाई अङ्गुल लम्बा, जिस-का उपयोग जोड़ों के पास जहां कि मांसल -पेशियां कम हैं, वहां होता था । तीसरा, दो अंगुल लम्बा जिसका उपयोग आमाशय, आंत, अण्डकोश आदि थानों को सीने के लिये होता था । सीनेके अतिरिक्त इनका उपयोग कोष्ठ से द्रव निकालने में, गतिव्रण तथा अर्बुदों की चिकित्सा में होता था । इससे चिकित्सा में क्षारसूत्र प्रविष्ट करते थे । अथवा बन्ध देकर रक्तसञ्चार रोका जाता था । ये सब सूचीशस्त्र धनुषके समान अर्द्धगोल होते थे । CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ९ ) कुशपत्रशस्त्र ( ९ ) कुशपत्रशस्त्र कुश के पत्ते के समान बारीक, नोकदार पतला और तेजधारका होता था । इसका उपयोग विद्रधिसे पूय निकालनेके लिये था । इसे प्रायः कोमल स्थानों पर व्यवहार करते थे I । अंग्रेजी शल्यचिकित्सा में इसका सादृश्य ( ' पेजेटका नाइफ या 4 वस्तुरी ' Paget's Knife or Bistoury ) के साथ होता है । ( १० ) आटीमुखशस्त्रम् ( १० ) आटीमुखशस्त्र की आकृति ' आटी ' पक्षी के समान होती थी । इसका भी उपयोग पूय निकालने के लिये था । आटीमुख को ( ' हाकविलसी-ज़र्स ' Hawk Bill Scissors ) कहते हैं । ( ११ ) शरारी मुखशस्त्र ( ११ ) शरारीमुखशस्त्रका आकार शरारीपक्षी के समान होता था । यह पक्षी धवलस्कन्ध और रक्तशीर्षक भेदसे दो प्रकारका होता है । दोनों में से प्रथमको शरारी कहते हैं । शरारींमुखी सुश्रुतमें केंची कही गई है । वाग्भट में ' शरार्यास्य ' और ' कर्तरी ' ये दोनों शस्त्र पृथक पृथक् कहे गये हैं । इसका भी उपयोग विस्रावणमें होता था । ( १२ ) अन्तर्मुखकर्त्तरिकाशस्त्र CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri [ ९ ] ( १२ ) अन्तर्मुखशस्त्र भी एक प्रकारकी कर्तरी का ही भेद है । वाग्भट में इसका आकार अर्धचन्द्राकार लिखा है । और इसका उपयोग विधियों में से पूय निकालने को बताया है । ' अथवा अर्धचन्द्रेण शस्त्रेणैव मृतगर्भस्य बाहुयुगलं सच्छिद्य बाहू निस्सारयेत् ' हारीत के इस उक्ति से इस शस्त्रका उपयोग मूढगर्भ में बाहुच्छेदन करने का भी है । अंग्रेजी में कर्तरी को ( पेयर औफ सीज़र्स Pair of Scissors ) कहते हैं । ( १३ ) त्रिकूर्च कशस्त्र ( १३ ) त्रिकूर्चकशस्त्र लकड़ी या धातुके मूठ में तीन कूर्चक ( नोकदार कूचियां ) लगाकर बनाया जाता था । इन कूचंकों के बीच का अन्तरे एक चावलका रहता था । इसका उपयोग कुष्ठरोग में और नासार्शस में लेखन कर्म से रक्त निकालने में होता था । वाग्भटमें इसी प्रकारके दो अन्यशस्त्रों का वर्णन है । पहला ' कू ' है । लकड़ी के सात या आठसूइयाँ लगाकर इसका निर्माण किया एक मूठ जाता था । इसका उपयोग उपरि त्वचा के लेखन करने में होता था । दूसरे का नाम ' ख ' है । इसमें डेढ़ अङ्गुल लम्बी आठ तेज सूइयाँ लगी रोहत थीं । इसका उपयोग नासार्शस में रक्त निकालने का था । ( १४ ) कुठारिकाशस्त्र ( १४ ) कुठारिका शस्त्र के लकड़ी के बने हत्थेकी लंबाई साढ़े सात की होती थी । इसका फलक गौके दांतके आकार का एक अङ्गुल अङ्गु लंबा होता था । और उपयोग अस्थिस्थित सिराओं के वेध में किया जाता था । अंग्रेजी में कुठारिका को ( ' एक्सशे पडनाइफ ' Axe - shaped Knife ) कहते हैं । CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Afya Sama Foundation Chennai and eGangotri ( १५ ) त्रीहिमुखशस्त्र ( १५ ) व्रीहिमुखशस्त्रका मुख व्रीहि के समान आगे से तेज होता था । इसका उपयोग मांसल प्रदेशीय सिराओं के वेध करने में, वृद्धि, जलोदर, गुल्म और विद्रधि आदिके वेधन एवं भेदन करने में किया जाता था । इसका प्रयोग करते समय शस्त्रको इस प्रकार पकड़ा जाता था कि इलका मूठ करतलके मध्यमें और नोक अंगुष्ठ तथा तर्जनी अंगुलियोंके मध्य में आ जाय । अंग्रेजी में इसे ( ट्रोकार Trocar ) कहते हैं 1 ( १६ ) आराशस्त्रम् ( १६ ) आराशख लकड़ी के मूठ में मोटी सूई लगाकर बनाया जाता गौके पूँछ के समान पीछे से मोटा होता था । इसका सिरा तेजः था । मूठ नोकदार रहता था । आकृति चमारोंके सूये जैसी मिलती थी । इसका उपयोग- शोथ पक्कापक्कका निश्चय करने में कर्णपाली रोग में, वेधन करने में तथा अस्थि आदिके वेधन करनेमें किया जाता था । अंग्रेजी में आरा को ( ' आल ' Awl ) कहते हैं । ( १७ ) वेतपत्र शस्त्र ( १७ ) वेतपत्र शस्त्रवेतके पत्ते की भांति तेज शस्त्र था । इसका मूठ और शस्त्र दोनों चार चार अंगुलका होता था और चौड़ाई एक अंगुलकी होती थी । इसका उपयोग वेधन करने में किया जाता था । अंग्रेजी में इसको ( ' नैरो क्लेडेडनाइफ या स्कालपेल Narrow Cladod Knife or Scalpel ) कह सकते हैं । ( १८ ) बडिशशस्त्र CC - 0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar