वामन पुराण — पृष्ठ 1–10
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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॥ श्रीहरिः ॥ 1432 श्रीमद्वैपायनमुनि वेदव्यासप्रणीत श्रीवामनपुराण सचित्र, हिन्दी - अनुवादसहित वृजेन्द्र गीताप्रेस गोरखपुर गीताप्रेस, गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR
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॥ श्रीहरिः ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीमद्वैपायनमुनि वेदव्यासप्रणीत श्रीवामनपुराण ( सचित्र, हिन्दी - अनुवादसहित ) त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ गीताप्रेस, गोरखपुर
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सं ० २०७४ ग्यारहवाँ पुनर्मुद्रण ३,००० कुल मुद्रण ३ ९, ००० * मूल्य - I १५० ( एक सौ पचास रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर - २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३३०३० web: gitapress.org e - mail: booksales@gitapress.org गीताप्रेस प्रकाशन gitapressbookshop.in से online खरीदें ।
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॥ श्रीहरिः ॥ नम्र - निवेदन भारतीय संस्कृतिके मूलाधाररूपमें वेदोंके अनन्तर पुराणोंका ही सम्मानपूर्ण स्थान है । वेदोंमें वर्णित अगम रहस्योंतक जन - सामान्यकी पहुँच नहीं हो पाती, परंतु भक्तिरस - परिप्लुत पुराणोंकी मङ्गलमयी, शोकनिवारिणी, ज्ञानप्रदायिनी दिव्य कथाओंका श्रवण - मनन, पठन - पाठन कर जन - साधारण भी भक्तितत्त्वका अनुपम रहस्य सहज ही हृदयङ्गम कर लेते हैं । महाभारतमें कहा गया है — ‘ पुराणसंहिताः पुण्याः कथा धर्मार्थसंश्रिताः । ' ( आदिपर्व १ । १६ ) अर्थात् पुराणोंकी पवित्र कथाएँ धर्म और अर्थको देनेवाली हैं । परमात्म - दर्शन अथवा शारीरिक एवं मानसिक आधि-व्याधिसे छुटकारा प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त कल्याणकारी पुराणोंका श्रद्धापूर्वक पारायण करना चाहिये । वामनपुराण मुख्यरूपसे भगवान् त्रिविक्रम विष्णुके दिव्य माहात्म्यका व्याख्याता है । इसमें कुरुक्षेत्र, कुरुजाङ्गल, पृथूदक आदि तीर्थोंका विस्तारसे विवेचन किया गया है । इस पुराणके अनुसार बलिका यज्ञ कुरुक्षेत्रमें ही हुआ था । इसके आदिवक्ता महर्षि पुलस्त्य हैं और आदि प्रश्नकर्ता तथा श्रोता देवर्षि नारद हैं । नारदजीने व्यासको, व्यासने अपने शिष्य लोमहर्षण सूतको और सूतजीने नैमिषारण्यमें शौनक आदि मुनियोंको इस पुराणकी कथा सुनायी थी । इसमें भगवान् वामन, नर-नारायण तथा भगवती दुर्गाके उत्तम चरित्रके साथ प्रह्लाद तथा श्रीदामा आदि भक्तोंके बड़े रम्य आख्यान हैं । मुख्यतः वैष्णवपुराण होते हुए भी इसमें शैव तथा शाक्तादि धर्मोकी श्रेष्ठता एवं ऐक्यभावकी प्रतिष्ठा की गयी है । इस पुराणके उपक्रममें देवर्षि नारदके द्वारा प्रश्न और उसके उत्तरके रूपमें पुलस्त्यजीका वामनावतारका कथन, शिवजीका लीला - चरित्र, जीमूतवाहन - आख्यान, ब्रह्माका मस्तक - छेदन तथा कपालमोचन - आख्यानका वर्णन है । तदनन्तर दक्षयज्ञ - विध्वंस, हरिका कालरूप, कामदेव - दहन, अंधक- वध, बलिका आख्यान, लक्ष्मी - चरित्र, प्रेतोपाख्यान आदिका विस्तारसे निरूपण किया गया है । इसके अतिरिक्त इसमें प्रह्लादका नर - नारायणसे युद्ध, देवों, असुरोंके भिन्न - भिन्न वाहनोंका वर्णन, वामनके विविध स्वरूपों तथा निवास - स्थानोंका वर्णन, विभिन्न व्रत, स्तोत्र और अन्तमें विष्णुभक्तिके उपदेशोंके साथ इस पुराणका उपसंहार हुआ है । विभिन्न दृष्टियोंसे लोककल्याणकारी इस पुराणका प्रकाशन ' कल्याण ' वर्ष ५६, सन् १ ९ ८२ के विशेषाङ्करूपमें गीताप्रेसद्वारा किया गया था । पाठकों तथा जिज्ञासुओंके द्वारा इसके पुनर्मुद्रणका बार - बार आग्रह किया जा रहा था । तदनुसार गीताप्रेसके द्वारा इसका पुनर्मुद्रण ऑफसेटकी सुन्दर छपाईद्वारा मोटे टाइपोंमें किया गया । आशा है, पाठकगण गीताप्रेससे प्रकाशित अन्य पुराणोंकी भाँति इस पुराणको भी अपनाकर इसकी उपयोगी सामग्रीसे लाभ उठायेंगे । - प्रकाशक
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॥ श्रीहरिः ॥ विषय अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या १ - श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनाश्रयी प्रश्न, शिवजीका लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना... ९ २- शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ १२ ३- शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति; वाराणसीमें ब्रह्महत्यासे मुक्ति एवं कपाली नाम पड़ना. १७ ४ - विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष यज्ञकी वार्ता, सतीका प्राण त्याग; शिवका क्रोध एवं उनके गणोंद्वारा दक्ष यज्ञका विध्वंस. २१ ५- दक्ष यज्ञका विध्वंस, देवताओंका प्रताड़न, शंकरके कालरूप और राश्यादि रूपोंमें स्वरूप-कथन २५ ६- नर - नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम - दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन. ३० ७- उर्वशीकी उत्पत्ति - कथा, प्रह्लाद - प्रसंग-नर - नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ३८ ८- प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय.......... ४३ ९- अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन. ४ ९ १०- अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५३ ११ - सुकेशिकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन............... . ५८ १२- सुकेशिका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन....... ६२ १३ - सुकेशिके प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू-- सूची अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन ६६ १४- दशाङ्ग - धर्म, आश्रम - धर्म और सदाचार - स्वरूपका वर्णन ७० १५ - दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान - पतन, वरुणा असीकी महिमा, लोलार्क - प्रसंग. ८१ १६- देवताओंका शयन - तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव - पूजनका वर्णन ८५ १७- देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत - विधान, विष्णु - पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९ ० १८- महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति ९ ६ १ ९- चण्ड - मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम. १०० २०- भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर - वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना....... १०५ २१- देवीके पुनराविर्भाव - सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्गः संवरण- तपतीका विवाह.. १० ९ २२ - कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण - प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य. ११५ २३- वामन - चरितका उपक्रम, बलिका दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य लक्ष्मीका वर्णन... १२० २४ - वामन - चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोक जाना..१२२ २५ - वामन - चरितके संदर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना. १२४
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[ ५ ] क्रमाङ्क विषय पृष्ठ - संख्या २६- कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति......... १२७ २७- भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना........ १२८ २८ - अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्का प्रकट होना तथा भगवान्का अदितिको वर देना.. १३२ २ ९ - बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु महिमाका कथन तथा स्तवन..१३३ ३० - बलिका प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदिति के गर्भ से वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना १३८ ३१ - वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना और बलिका पातालमें जाना १४१ ३२- सरस्वती नदीका वर्णन - उसका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना. १४ ९ ३३ - सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करने तथा तीर्थमें स्नान करनेका महत्त्व., १५१ ३४- कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवंसम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य..... १५३ ३५ - कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन.... १५६ ३६ - कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६० ३७- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन, १६६ ३८- मङ्कणक - प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति.. १६ ९ ३ ९ - कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन. १७१ ४० - वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति - प्रसङ्ग १७४ ४१ - कुरुक्षेत्रके तीर्थों - शतसाहस्रिक, शतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन. १७८ ४२- काम्यकवन तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन.......१८० ४३- स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके क्रमाङ्क विषय पृष्ठ - संख्या सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर..... १८३ ४४ - ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान........ १ ९ ० ४५ - सांनिहितसर – स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थालिङ्गका माहात्म्य वर्णन. १ ९ ३ ४६ - स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन - अर्चनका माहात्म्य..... १ ९ ६ ४७ - स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक, वेनके उद्धारके लिये पृथुका प्रयत्न और वेनकी शिव - स्तुति २०० ४८ - वेन - कृत शिव - स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, वेन आदिकी सुगतिका वर्णन. २१२ ४ ९ - चार मुखोंकी उत्पत्ति - कथा, ब्रह्म - कृत शिवकी स्तुति और स्थाणुतीर्थका माहात्म्य..२१४ ५० - कुरुक्षेत्रके पृथूदकतीर्थके सन्दर्भमें अक्षय-तृतीया महत्त्वकी कथा. २१८ ५१ - मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, कुटिला और रागिणीको शाप, उमाकी तपस्या, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन......२१ ९ ५२ - शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना, महर्षियोंका हिमवान्से शिवके लिये उमाकी याचना, हिमालयकी स्वीकृति और सप्तर्षियोंद्वारा शिवको स्वीकृति - सूचना..२२५ ५३ - हिमालय पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति. २३० ५४ - भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण, शिवका यज्ञकर्म करना, पार्वतीकी तपस्यासे ब्रह्माका वर देना, कौशिकीकी स्थापना, शिवके प्राङ्गणमें अग्नि प्रवेश, देवोंकी प्रार्थना आदि और गजाननकी उत्पत्ति. २३५ ५५ - देवीद्वारा नमुचिका वध; शुम्भ - निशुम्भका वृत्तान्त, धूम्रलोचनका वध, देवीका चण्ड - मुण्डसे युद्ध और असुरसैन्यसहित चण्ड - मुण्डका विनाश २४१ ५६ - चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज - निशुम्भ - शुम्भ - वध, देवताओंके द्वारा
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[ ६ क्रमाङ्क विषय पृष्ठ- संख्या । देवीकी स्तुति, देवीद्वारा वरदान और भविष्य में प्रादुर्भावका कथन २४८ ५७ - कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका सेनापति होना तथा उनका गण, मयूर, शक्ति और दण्डादिका पाना.......... २५५ ५८ सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, तारक - विजयके लिये प्रस्थान, पाताल-केतुका वृत्तान्त, तारक महिषासुर वध तथा सुचक्राक्षको वर....... २६२ ५ ९- ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना २७२ ६० पुनः तेजः प्रातिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थ-की उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसङ्ग और सनत्कुमारका प्रसङ्ग. २७६ ६१ - पुनाम नरकोंका वर्णन, पुत्र- शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार ब्रह्माका प्रसङ्ग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु - वध.२८२ ६२ - शिवके अभिषेक और तप्त - कृच्छ्र- व्रतका उपदेश, हरि - हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य २८८ ६३ - अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त कथन... २ ९ ३ ६४- चित्राङ्गदा सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन- मोचन... २ ९९ ६५ - गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा - वेदवती - - वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची वृत्तान्त, जाबालिको जटाओंसे मुक्ति, विश्वकर्माकी शाप - मुक्ति, इन्द्रद्युम्नादिका सप्तगोदावरमें आना, शिव स्तुति, सप्तगोदावरमें सम्मेलन, कन्याओंका विवाह...... ३०४ ६६ दण्डक - अरजाके प्रसङ्ग शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक - शिव-सन्दर्भ...... ३१७ ६७- नन्दिद्वारा आहूत गणका वर्णन, उनसे हरि और हरका एकत्व प्रतिपादन, गणको सदाशिवका दर्शन ] क्रमाङ्क विषय पृष्ठ संख्या और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२३ ६८- भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश. ३२७ ६ ९ - शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि - दानव युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ- देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव - वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास पुनः दैत्य- देव और इन्द्र- जम्भ- युद्ध, मातलिका जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ - कुजम्भ - वध ३३३ ७० - अन्धकका शिव - शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्व, देवादिकोंका भेजना, अर्द्धकुसुमसे पार्वतीका प्राकट्य और अन्धकद्वारा उनकी स्तुति., ३४५ ७१ इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, उनका ' पाकशासन ' और ' गोत्रभिद् ' होनेका हेतु मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा. ३५३ ७२ - स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष- मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन...... ३५६ ७३ - बलि, मय - प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध, कालनेमिके साथ विष्णुभगवान्का युद्ध और कालनेमिका वध........... ३६२ ७४- बलि बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना, बलिको प्रह्लादका उपदेश ३६६ ७५- त्रैलोक्य - लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिको उत्पत्ति, निधियोंका वर्णन, जयश्रीका बलिमें मिलना और बलिको समृद्धिका वर्णन.... ३७० ७६- प्रायश्चित्त - हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रम में आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति, वासुदेवका अदितिके पुत्र बननेका आश्वासन और स्वतेजसे अदितिके गर्भमें प्रवेश ३७४ ७७ - प्रह्लादसे अदिति के गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन, प्रह्लादद्वारा बलिको शाप और अनुनय करनेपर उपदेश...... ३७८ ७८- प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन - प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान, वामनका प्रादुर्भाव और उनके लिये दान
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[ ७ ] क्रमाङ्क विषय पृष्ठ संख्या देनेका धुन्धुका निश्चय, वामनका त्रिविक्रम होना और धुन्धुका वध ३८३ ७ ९- पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट तथा परस्पर वृत्तान्तका कहना एवं श्रवण - द्वादशीका माहात्म्य, गयामें श्राद्ध करनेसे प्रेत - योनिसे मुक्ति और पुरूरवाको सुरूपकी प्राप्ति ३ ९ ० ८०- नक्षत्र - पुरुषके वर्णन - प्रसङ्गमें नक्षत्र- पुरुषकी पूजाका विधान और नक्षत्र - पुरुषके व्रतका माहात्म्य. ३ ९ ६ ८१ - प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भवका आख्यान.....३ ९९ ८२ - चक्रदानके कथा प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना, हरका विरूपाक्ष हो जाना और श्रीदाम वध........४०२ ८३ - प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ - यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व.. ४०६ ८४- प्रह्लादके तीर्थयात्रा - प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना, गजेन्द्रद्वारा विष्णुकी स्तुति, गज ग्राहका उद्धार एवं ' गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र ' की फलश्रुति ४११ ८५- सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपारस्तोत्र, सारस्वतस्तव - कथन - प्रसङ्गमें राक्षस - वृत्तान्त, राक्षसग्रस्त मुनिकी अग्नि प्रार्थना, सारस्वतस्तोत्र और मुनिद्वारा राक्षसको उपदेश...... ४१८ ८६- स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र...४२७ ८७- अगस्त्यद्वारा कथित पापप्रशमनस्तोत्र........... ४३२ क्रमाङ्क विषय पृष्ठ संख्या ८८- बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँकै मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव, उनकी स्तुति, बलिके यज्ञमें जानेकी उत्कण्ठा और भरद्वाजसे स्वस्थानका कथन, ४३४ ८ ९- वामनभगवान्का विविध स्थानोंमें निवास - वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना............ ४३ ९ ९०- भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता, बलि और शुक्र के संवाद - प्रसङ्गमें कोशकारकी कथा....... ४४३ ९ १ - वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना, वामनका विराट्रूप ग्रहण करना एवं त्रिविक्रमत्व, वामनका बलिबन्धन विषयक प्रश्न, बलिको वर, बलिका पाताल और वामनका स्वर्ग - गमन..४५३ ९२- ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति और वामनरूपमें विष्णुका स्वर्गमें निवास........४५ ९ ९३- बलिका पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति, प्रह्लादद्वारा विष्णुभक्तिकी प्रशंसा.४६३ ९ ४ - बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि - विधि, मासानुसार विविध दान - विधान, विष्णु - मन्दिर-निर्माण और विष्णुभक्त एवं वृद्धवाक्यकी महिमाका वर्णन ------... ४७० ९ ५ - पुराण वाचन, श्रावण - श्रवण और पठनकी फलश्रुति ४७६
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