वामन पुराण — पृष्ठ 11–20

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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॥ श्रीहरिः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते त्रिविक्रमाय ॥ अथ श्रीवामनपुराणम् पहला अध्याय श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे लीलाचरित्र और

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

त्रैलोक्यराज्यमाक्षिप्य बलेरिन्द्राय यो ददौ ।

श्रीधराय नमस्तस्मै छद्मवामनरूपिणे ॥ १

पुलस्त्यमृषिमासीनमाश्रमे वाग्विदां वरम् ।

नारदः परिपप्रच्छ पुराणं वामनाश्रयम् ॥ २

कथं भगवता ब्रह्मन् विष्णुना प्रभविष्णुना ।

वामनत्वं धृतं पूर्वं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ३

कथं च वैष्णवो भूत्वा प्रह्लादो दैत्यसत्तमः ।

त्रिदशैर्युयुधे सार्धमत्र मे संशयो महान् ॥ ४

वामनाश्रयी प्रश्न; शिवजीका जीमूतवाहन होना भगवान् श्रीनारायण, मनुष्योंमें श्रेष्ठ नर, भगवती सरस्वतीदेवी और ( पुराणोंके कर्ता ) महर्षि व्यासजीको नमस्कार करके जय ( पुराणों तथा महाभारत आदि ग्रन्थों ) - का उच्चारण ( पठन ) करना चाहिये * । जिन्होंने बलिसे ( भूमि, स्वर्ग और पाताल - इन ) तीनों लोकोंके राज्यको छीनकर इन्द्रको दे दिया, उन मायामय वामनरूपधारी और लक्ष्मीको हृदयमें धारण करनेवाले विष्णुको नमस्कार है । ( एक बारकी बात है कि - ) वाग्मियोंमें श्रेष्ठ विद्वद्वर पुलस्त्य ऋषि अपने आश्रममें बैठे हुए थे; ( वहीं ) नारदजीने उनसे वामनपुराणकी कथा – ( इस प्रकार ) पूछी । उन्होंने कहा – ब्रह्मन्! महाप्रभावशाली भगवान् विष्णुने कैसे वामनका अवतार ग्रहण किया था, इसे आप मुझ जिज्ञासुको बतलायें । एक तो मेरी यह शङ्का है कि दैत्यवर्य प्रह्लादने विष्णुभक्त होकर भी * ' महाभारतके उल्लेखानुसार नर - नारायण ब्रह्मर्षिरूपमें विभक्त परमात्मा ही हैं, जो बादमें अर्जुन और कृष्ण हुए । ये ही नारायणीय या भागवतधर्मके प्रधान प्रचारक हैं, अतः भागवतीय ग्रन्थोंमें सर्वत्र इन दोनोंको नमस्कार किया गया है । पुराण-प्रवचनमें भी इस श्लोकको माङ्गलिक रूपमें पढ़नेकी प्राचीन प्रथा है । महाभारतका प्राचीन नाम ' जय ' है; पर उपलक्षणसे पुराणोंका भी ग्रहण किया जाता है । भविष्यपुराणका वचन है-अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा । कार्त्यं वेदपञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः ॥ जयेति नाम चैतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ( भविष्यपुराण १ । १ । ५-६ ) अर्थात् – अठारहों पुराण, रामायण और सम्पूर्ण ( वेदार्थ ) पाँचवाँ वेद, जिसे महाभारत- रूपमें जानते हैं — इन सबको मनीषीलोग ' जय ' कहते हैं ।

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१० श्रीवामनपुराण [ अध्याय १ श्रूयते च द्विजश्रेष्ठ दक्षस्य दुहिता सती शंकरस्य प्रिया भार्या बभूव वरवर्णिनी किमर्थं सा परित्यज्य स्वशरीरं वरानना जाता हिमवतो गेहे गिरीन्द्रस्य महात्मनः पुनश्च देवदेवस्य पत्नीत्वमगमच्छुभा एतन्मे संशयं छिन्धि सर्ववित् त्वं मतोऽसि मे तीर्थानां चैव माहात्म्यं दानानां चैव सत्तम व्रतानां विविधानां च विधिमाचक्ष्व मे द्विज एवमुक्तो नारदेन पुलस्त्यो मुनिसत्तमः । प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो नारदं तपसो निधिम् पुलस्त्य उवाच पुराणं वामनं वक्ष्ये क्रमान्निखिलमादितः अवधानं स्थिरं कृत्वा शृणुष्व मुनिसत्तम ॥

पुरा हैमवती देवी मन्दरस्थं महेश्वरम् ।

उवाच वचनं दृष्ट्वा ग्रीष्मकालमुपस्थितम् ॥

ग्रीष्मः प्रवृत्तो देवेश न च ते विद्यते गृहम् यत्र वातातपौ ग्रीष्मे स्थितयोन गमिष्यतः एवमुक्तो भवान्या तु शंकरो वाक्यमब्रवीत् निराश्रयोऽहं सुदति सदारण्यचरः शुभे इत्युक्ता शंकरेणाथ वृक्षच्छायासु नारद निदाघकालमनयत् समं शर्वेण सा सती निदाघान्ते समुद्भूतो निर्जनाचरितोऽद्भुतः घनान्धकारिताशो वै प्रावृट्कालोऽतिरागवान् तं दृष्ट्वा दक्षतनुजा प्रावृट्कालमुपस्थितम् ॥ | देवताओंके साथ युद्ध कैसे किया और ब्राह्मणश्रेष्ठ! ॥ ५ दूसरी जिज्ञासा यह है कि दक्षप्रजापतिकी पुत्री भगवती सती, जो भगवान् शंकरकी प्रिय पत्नी थीं, उन श्रेष्ठ । मुखवाली ( सती ) - ने अपना शरीर त्यागकर पर्वतराज ॥ ६ हिमालयके घरमें किसलिये जन्म लिया? और पुनः वे । कल्याणी देवदेव ( महादेव ) की पत्नी कैसे बनीं? मैं ॥ ७ मानता हूँ कि आपको सब कुछका ज्ञान है, अतः आप । मेरी इस शंकाको दूर कर दें । साथ ही सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ । हे द्विज! तीर्थों तथा दानोंकी महिमा और विविध ॥ ८ व्रतोंकी अनुष्ठान - विधि भी मुझे बताइये ॥ १–८ ॥ नारदजीके इस प्रकार कहनेपर मुनियोंमें मुख्य तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ तपोधन पुलस्त्यजी नारदजीसे कहने ॥ ९ लगे ॥ ९ ॥

पुलस्त्यजी बोले – नारद! आपसे मैं सम्पूर्ण वामनपुराणकी कथा आदिसे ( अन्ततक ) वर्णन करूँगा ॥ मुनिश्रेष्ठ! आप मनको स्थिर कर ध्यानसे सुनें! * प्राचीन १० समयमें देवी हैमवती ( सती ) - ने ग्रीष्म ऋतुका आगमन देखकर मन्दर पर्वतपर बैठे हुए भगवान् शंकरसे कहा-११ | देवेश! ग्रीष्म ऋतु तो आ गयी है, परंतु आपका कोई घर नहीं है, जहाँ हम दोनों ग्रीष्मकालमें निवास करते । हुए वायु और ताजनित कठिन समयको बिता सकेंगे । ॥ १२ सतीके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर बोले- हे सुन्दर । दाँतोंवाली सति! मेरा कभी कोई घर नहीं रहा । मैं तो ॥ १३ । सदा वनोंमें ही घूमता रहता हूँ॥१०–१३ ॥ । नारदजी! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सती-॥। १४ देवीने उनके साथ वृक्षोंकी छायामें ( जैसे - तैसे रहकर ) निदाघ ( गर्मी ) - का समय बिताया । फिर ग्रीष्मके अन्तमें अद्भुत वर्षा ऋतु आ गयी, जो अत्यधिक रागको । बढ़ानेवाली होती है और जिसमें प्रायः सबका आवागमन ॥ १५ अवरुद्ध हो जाता है । ( उस समय ) मेघोंसे आवृत हो जानेसे दिशाएँ अन्धकारमय हो जाती हैं । उस वर्षा -ऋतुको आयी देखकर दक्ष- पुत्री सतीने प्रेमसे महादेवजी से

प्रोवाच वाक्यं देवेशं सती सप्रणयं तदा ॥ १६ । यह वचन कहा – ॥ १४–१६ ॥

+ भविष्यपुराणके प्रमाणानुसार वामनपुराणके वक्ता चतुर्मुख ( ब्रह्माजी ) हैं, पर यहाँ पुलस्त्यजी ऐसा उल्लेख नहीं करते कि ' पुराणं वामनं वक्ष्ये ब्रह्मणा च मया श्रुतम् । ' इससे प्रतीत होता है कि एतत् सम्बन्धी श्लोक अनुपलब्ध है । मत्स्यपुराणमें भी चतुर्मुख ( ब्रह्मा ) - के वक्ता होनेका उल्लेख है— ' त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः । त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम् ॥ '

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अध्याय १ विवहन्ति स्फुरन्ति पतन्ति ] श्रीनारदजीका पुलस्य ऋषिसे वामनाश्रयी वाता हृदयावदारणा गर्जन्त्यमी तोयधरा महेश्वर । नीलाभ्रगणेषु विद्यु वाशन्ति केकारवमेव बर्हिणः ॥ १७ धारा गगनात् परिच्युता बका बलाकाश्च सरन्ति तोयदान् । कदम्बसज्जार्जुनकेतकीद्रुमाः पुष्पाणि मुञ्चन्ति सुमारुताहताः ॥ १८ श्रुत्वैव मेघस्य दृढं तु गर्जितं त्यजन्ति हंसाश्च सरांसि तत्क्षणात् । यथाश्रयान् योगिगणाः समन्तात् प्रवृद्धमूलानपि संत्यजन्ति ॥ १ ९ इमानि यूथानि वने मृगाणां चरन्ति धावन्ति रमन्ति शंभो । तथाचिराभाः सुतरां स्फुरन्ति पश्येह नीलेषु घनेषु देव । नूनं समृद्धिं सलिलस्य दृष्ट्वा चरन्ति शूरास्तरुणद्रुमेषु ॥ २० उद्वृत्तवेगाः सहसैव निम्नगा किमत्र नीलैश्च फलैश्च इतीदृशे गृहं इत्थं जाताः शशाङ्काङ्कितचारुमौले । चित्रं यदनुज्ज्वलं जनं निषेव्य योषिद् भवति त्वशीला ॥ २१ मेघैश्च समावृतं नभः पुष्पैश्च सज्जा मुकुलैश्च नीपाः । बिल्वाः पयसा तथापगाः पत्रैः सपद्यैश्च महासरांसि ॥ २२ शंकर काले सुरौद्रे ननु ते ब्रवीमि । कुरुष्वात्र महाचलोत्तमे सुनिर्वृता येन भवामि शंभो ॥ २३ त्रिनेत्र: श्रुतिरामणीयकं श्रुत्वा वचो वाक्यमिदं बभाषे । न sa वित्तं गृहसंचयार्थे मृगारिचर्मावरणं मम प्रिये ॥ २४ ममोपवीतं भुजगेश्वरः शुभे

कर्णेऽपि पद्मश्च तथैव पिङ्गलः ।

केयूरमेकं मम कम्बलस्त्वहि-द्वितीयमन्यो भुजगो धनंजयः ॥ २५

प्रश्न, शिवजीका लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना ११ महेश्वर! हृदयको विदीर्ण करनेवाली वायु वेगसे चल रही है । ये मेघ भी गर्जन कर रहे हैं, नीले मेघोंमें बिजलियाँ कौंध रही हैं और मयूरगण केकाध्वनि कर रहे हैं । आकाशसे गिरती हुई जलधाराएँ नीचे आ रही हैं । बगुले तथा बगुलोंकी पंक्तियाँ जलाशयोंमें तैर रही हैं । प्रबल वायुके झोंके खाकर कदम्ब, सर्ज, अर्जुन तथा केतकीके वृक्ष पुष्पोंको गिरा रहे हैं - वृक्षोंसे फूल झड़ रहे हैं । मेघका गम्भीर गर्जन सुनकर हंस तुरंत जलाशयोंको छोड़कर चले जा रहे हैं, जिस प्रकार | योगिजन अपने सब प्रकारसे समृद्ध घरको भी छोड़ देते हैं । शिवजी! वनमें मृगोंके ये यूथ आनन्दित होकर इधर - उधर दौड़ लगाकर, खेल - कूदकर आनन्दित हो रहे हैं और देव! देखिये, नीले बादलोंमें विद्युत् भलीभाँति चमक रही है । लगता है, जलकी वृद्धिको देखकर वीरगण हरे - भरे सुपुष्ट नये वृक्षोंपर विचरण कर । रहे हैं । नदियाँ सहसा उद्दाम ( बड़े ) वेगसे बहने लगीं हैं । चन्द्रशेखर! ऐसे उत्तेजक समयमें यदि असुवृत्त व्यक्तिके फंदेमें आकर स्त्री दुःशील हो जाती है तो इसमें क्या आश्चर्य ॥ १७–२१ ॥ आकाश नीले बादलोंसे घिर गया है । इसी प्रकार पुष्पोंके द्वारा सर्ज, मुकुलों ( कलियों ) के द्वारा नीप ( कदम्ब ), फलोंके द्वारा बिल्व वृक्ष एवं जलके द्वारा | नदियाँ और कमल - पुष्पों एवं कमल - पत्रोंसे बड़े - बड़े सरोवर भी ढक गये हैं । हे शंकरजी! ऐसी दु: सह, अद्भुत तथा भयंकर दशामें आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस महान् तथा उत्तम पर्वतपर गृह निर्माण कीजिये; हे शंभो! जिससे मैं सर्वथा निश्चिन्त हो जाऊँ । कानोंको प्रिय लगनेवाले सतीके इन वचनोंको सुनकर तीन नयनवाले भगवान् शंकरजी बोले- प्रिये! घर बनानेके लिये ( और उसकी साज - सज्जाके लिये ) मेरे पास धन । नहीं है । मैं व्याघ्रके चर्ममात्रसे अपना शरीर ढकता हूँ । शुभे! ( सूत्रोंके अभाव में ) सर्पराज ही मेरा उपवीत ( जनेऊ ) बना है । पद्म और पिंगल नामके दो सर्प मेरे दोनों कानोंमें ( कुण्डलका काम करते हैं । कंबल और | धनंजय नामके ये दो सर्प मेरी दोनों बाँहोंके बाजूबंद

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१२ नागस्तथैवाश्वतरो हि कङ्कणं सव्येतरे तक्षक उत्तरे तथा । नीलोऽपि नीलाञ्जनतुल्यवर्णः श्रोणीतटे राजति सुप्रतिष्ठः ॥ पुलस्त्य उवाच इति वचनमथोग्रं शंकरात्सा मृडानी ऋतमपि तदसत्यं श्रीमदाकर्ण्य भीता । अवनितलमवेक्ष्य स्वामिनो वासकृच्छ्रात् परिवदति सरोषं लज्जयोच्छ्वस्य चोष्णम् ॥ देव्युवाच कथं हि देवदेवेश प्रावृट्कालो गमिष्यति । वृक्षमूले स्थिताया मे सुदुःखेन वदाम्यतः शंकर उवाच

घनावस्थितदेहायाः प्रावृट्कालः प्रयास्यति ।

यथाम्बुधारा न तव निपतिष्यन्ति विग्रहे ॥

पुलस्त्य उवाच हरस्तद्घनखण्डमुन्नत-मारुह्य तस्थौ सह दक्षकन्यया । ततोऽभवन्नाम महेश्वरस्य जीमूतकेतुस्त्विति विश्रुतं दिवि श्रीवामनपुराण [ अध्याय २ हैं । मेरे दाहिने और बाँयें हाथोंमें भी क्रमशः अश्वतर तथा तक्षक नाग कङ्कण बने हुए हैं । इसी प्रकार मेरी कमर में नीलाञ्जनके वर्णवाला नील नामका सर्प अवस्थित २६ होकर सुशोभित हो रहा है ॥ २२–२६ ॥ पुलस्त्यजी बोले- महादेवजीसे इस प्रकार कठोर तथा ओजस्वी एवं सत्य होनेपर भी असत्य प्रतीत हो रहे वचनको सुनकर सतीजी बहुत डर गयीं और स्वामीके निवासकष्टको देखकर गरम साँस छोड़ती हुई और पृथ्वीकी ओर देखती हुई ( कुछ ) क्रोध और २७ लज्जासे इस प्रकार कहने लगीं – ॥२७ ॥

सतीदेवी बोलीं- देवेश! वृक्षके मूलमें दुःखपूर्वक रहकर भी मेरा वर्षाकाल कैसे व्यतीत होगा! इसीलिये ॥ २८ तो मैं आपसे ( गृहके निर्माणकी बात ) कहती हूँ ॥ २८ ॥

शंकरजी बोले- देवि! मेघ - मण्डलके ऊपर अपने शरीरको स्थित कर तुम वर्षाकाल भलीभाँति व्यतीत कर सकोगी । इससे वर्षाकी जलधाराएँ तुम्हारे २ ९ शरीरपर नहीं गिर पायेंगी ॥२ ९ ॥ पुलस्त्यजी बोले – उसके बाद महादेवजी दक्षकन्या सतीके साथ आकाशमें उन्नत मेघमण्डलके ऊपर चढ़कर बैठ गये । तभीसे स्वर्गमें उन महादेवजीका नाम ' जीमूतकेतु ' या ' जीमूतवाहन ' विख्यात हो ॥ ३० गया ॥ ३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पहला अध्याय समाप्त हुआ ॥१ ॥

दूसरा अध्याय शरदागम होनेपर शंकरजीका पुलस्त्य उवाच

ततस्त्रिनेत्रस्य गतः प्रावृट्कालो घनोपरि ।

लोकानन्दकरी रम्या शरत् समभवन्मुने ॥

त्यजन्ति नीलाम्बुधरा नभस्तलं वृक्षांश्च कङ्काः सरितस्तटानि । पद्माः सुगन्धं निलयानि वायसा रुरुर्विषाणं कलुषं जलाशयाः ॥ मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ पुलस्त्यजी बोले- इस प्रकार तीन नयनवाले भगवान् शिवका वर्षाकाल मेघोंपर बसते हुए ही व्यतीत १ हो गया । हे मुने! तत्पश्चात् लोगोंको आनन्द देनेवाली रमणीय शरद् ऋतु आ गयी । इस ऋतुमें नीले मेघ आकाशको और बगुले वृक्षोंको छोड़कर अलग हो जाते हैं । नदियाँ भी तटको छोड़कर बहने लगती हैं । इसमें कमलपुष्प सुगन्ध फैलाते हैं, कौवे भी घोसलोंको छोड़ २ । देते हैं । रुरुमृगोंके शृङ्ग गिर पड़ते हैं और जलाशय

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अध्याय २ ] शरदागम होनेपर शंकरजीका विकासमायान्ति च पङ्कजानि चन्द्रांशवो भान्ति लताः सुपुष्पाः । नन्दन्ति हृष्टान्यपि गोकुलानि सन्तश्च संतोषमनुव्रजन्ति ॥ ३ सरःसु पद्मा गगने च तारका जलाशयेष्वेव तथा पयांसि । सतां च चित्तं हि दिशां मुखैः समं वैमल्यमायान्ति शशाङ्ककान्तयः ॥ ४

एतादृशे हरः काले मेघपृष्ठाधिवासिनीम् ।

सतीमादाय शैलेन्द्रं मन्दरं समुपाययौ ॥ ५

ततो मन्दरपृष्ठेऽसौ स्थितः समशिलातले ।

रराम शंभुर्भगवान् सत्या सह महाद्युतिः ॥ ६

ततो व्यतीते शरदि प्रतिबुद्धे च केशवे ।

दक्षः प्रजापति श्रेष्ठो यष्टुमारभत क्रतुम् ॥ ७

द्वादशैव स चादित्याञ्शक्रादींश्च सुरोत्तमान् ।

सकश्यपान् समामन्त्र्य सदस्यान् समचीकरत् ॥ ८

अरुन्धत्या च सहितं वसिष्ठं शंसितव्रतम् ।

सहानसूययात्रिं च सह धृत्या च कौशिकम् ॥ ९

अहल्यया गौतमं च भरद्वाजममायया ।

चन्द्रया सहितं ब्रह्मन्नृषिमङ्गिरसं तथा ॥ १०

आमन्त्र्य कृतवान्दक्षः सदस्यान् यज्ञसंसदि ।

विद्वान् गुणसंपन्नान् वेदवेदाङ्गपारगान् ॥११

धर्मं च स समाहूय भार्ययाऽहिंसया सह ।

निमन्त्र्य यज्ञवाटस्य द्वारपालत्वमादिशत् ॥ १२

अरिष्टनेमिनं चक्रे इध्माहरणकारिणम् ।

भृगुं च मन्त्रसंस्कारे सम्यग् दक्षः प्रयुक्तवान् ॥ १३

तथा चन्द्रमसं देवं रोहिण्या सहितं शुचिम् ।

धनानामाधिपत्ये च युक्तवान् हि प्रजापतिः ॥ १४

जामातृदुहितृश्चैव दौहित्रांश्च प्रजापतिः ।

सशंकरां सतीं मुक्त्वा मखे सर्वान् न्यमन्त्रयत् ॥ १५

नारद उवाच

किमथ लोकपतिना धनाध्यक्षो महेश्वरः ।

ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि न निमन्त्रितः ॥ १६

मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ १३ सर्वथा स्वच्छ हो जाते हैं । इस समय कमल विकसित होते हैं, शुभ्र चन्द्रमाकी किरणें आनन्ददायिनी होकर फैल जाती पुष्ट होकर मिलता है । निर्मल जल चित्त तथा निर्मल हो ऐसी करनेवाली हैं, लताएँ पुष्पित हो जाती हैं, गौवें हृष्ट-आनन्दसे विहरती हैं तथा संतोंको बड़ा सुख तालाबोंमें कमल, गगनमें तारागण, जलाशयोंमें और दिशाओंके मुखमण्डलके साथ सज्जनोंका चन्द्रमाकी ज्योति भी सर्वथा स्वच्छ एवं जाती है॥१-४ ॥ शरद् ऋतुमें शंकरजी मेघके ऊपर वास सतीको साथ लेकर श्रेष्ठ मन्दरपर्वतपर पहुँचे और महातेजस्वी ( महाकान्तिमान् ) भगवान् शंकर मन्दराचलके ऊपरी भागमें एक समतल शिलापर अवस्थित होकर सतीके साथ विश्राम करने लगे । उसके बाद शरद् ऋतुके बीत जानेपर तथा भगवान् विष्णुके जाग जानेपर प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ दक्षने एक विशाल यज्ञका आयोजन किया । उन्होंने द्वादश आदित्यों तथा कश्यप आदि ( ऋषियों ) के साथ ही इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंको भी निमन्त्रित कर उन्हें यज्ञका सदस्य बनाया ॥ ५ - ८ ॥ नारदजी! उन्होंने अरुन्धतीसहित प्रशस्तव्रतधारी वसिष्ठको, अनसूयासहित अत्रिमुनिको धृतिके सहित कौशिक ( विश्वामित्र ) मुनिको अहल्याके साथ गौतमको, अमायाके सहित भरद्वाजको और चन्द्राके साथ अङ्गिरा ऋषिको आमन्त्रित किया । विद्वान् दक्षने इन गुणसम्पन्न वेद - वेदाङ्गपारगामी विद्वान् ऋषियोंको निमन्त्रितकर उन्हें अपने यज्ञमें सदस्य बनाया । और, उन्होंने ( प्रजापति दक्षने ) यज्ञमें धर्मको भी उनकी पत्नी अहिंसाके साथ निमन्त्रितकर यज्ञमण्डपका द्वारपाल नियुक्त किया ॥ ९ –१२ ॥ दक्षने अरिष्टनेमिको समिधा लानेका कार्य सौंपा और भृगुको समुचित मन्त्र - पाठमें नियुक्त किया । फिर दक्ष-प्रजापतिने रोहिणीसहित ' अर्थशुचि ' चन्द्रमाको कोषाध्यक्षके । पदपर नियुक्त किया । इस प्रकार दक्षप्रजापतिने केवल शंकरसहित सतीको छोड़कर अपने सभी जामाताओं, पुत्रियों एवं दौहित्रोंको यज्ञमें आमन्त्रित किया ॥ १३-१५ ॥ नारदजीने कहा ( पूछा ) - ( पुलस्त्यजी महाराज! ) लोकस्वामी दक्षने महेश्वरको सबसे बड़े, श्रेष्ठ, वरिष्ठ, सबके आदिमें रहनेवाले एवं समग्र ऐश्वर्योंके स्वामी । होनेपर भी ( यज्ञमें ) क्यों नहीं निमन्त्रित किया? ॥ १६ ॥

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१४ पुलस्त्य उवाच

ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि भगवाञ्शिवः ।

कपालीति विदित्वेशो दक्षेण न निमन्त्रितः ॥

नारद उवाच

किमर्थं देवता श्रेष्ठः शूलपाणिस्त्रिलोचनः ।

कपाली भगवान् जातः कर्मणा केन शंकरः ॥

पुलस्त्य उवाच

शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् ।

प्रोक्तामादिपुराणे च ब्रह्मणाऽव्यक्तमूर्त्तिना ॥

पुरा त्वेकार्णवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।

नष्टचन्द्रार्कनक्षत्रं प्रणष्टपवनानलम् ॥

अप्रतर्क्यमविज्ञेयं भावाभावविवर्जितम् ।

निमग्नपर्वततरू भू सुदुर्दशम् ॥

तस्मिन् स शेते भगवान् निद्रां वर्षसहस्त्रिकीम् ।

रात्र्यन्ते सृजते लोकान् राजसं रूपमास्थितः ॥

राजसः पञ्चवदनो वेदवेदाङ्गपारगः ।

स्रष्टा चराचरस्यास्य जगतोऽद्भुतदर्शनः ॥

तमोमयस्तथैवान्यः समुद्भूतस्त्रिलोचनः ।

शूलपाणिः कपर्दी च अक्षमालां च दर्शयन् ॥

ततो महात्मा ह्यसृजदहंकारं सुदारुणम् ।

येनाक्रान्तावुभौ देवौ तावेव ब्रह्मशंकरौ ॥

अहंकारावृतो रुद्रः प्रत्युवाच पितामहम् ।

को भवानिह संप्राप्तः केन सृष्टोऽसि मां वद ॥

पितामहो ऽप्यहंकारात् प्रत्युवाचाथ को भवान् ।

भवतो जनकः कोऽत्र जननी वा तदुच्यताम् ॥

इत्यन्योन्यं पुरा ताभ्यां ब्रह्मेशाभ्यां कलिप्रिय ।

परिवादोऽभवत् तत्र उत्पत्तिर्भवतोऽभवत् ॥

भवानप्यन्तरिक्षं हि जातमात्रस्तदोत्पतत् ।

धारयन्नतुलां वीणां कुर्वन् किलकिलाध्वनिम् ॥

श्रीवामनपुराण [ अध्याय २ पुलस्त्यजीने कहा - ( नारदजी! ) ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, वरिष्ठ तथा अग्रगणी होनेपर भी भगवान् शिवको कपाली जानकर १७ प्रजापति दक्षने उन्हें ( यज्ञमें ) निमन्त्रित नहीं किया ॥ १७ ॥

नारदजीने ( फिर ) पूछा - ( महाराज! ) देवश्रेष्ठ शूलपाणि, त्रिलोचन भगवान् शंकर किस कर्मसे और १८ । किस प्रकार कपाली हो गये, यह बतलायें ॥ १८ ॥

पुलस्त्यजीने कहा – नारदजी! आप ध्यान देकर सुनें । यह पुरानी कथा आदिपुराणमें अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके १ ९ द्वारा कही गयी है । ( मैं उसी प्राचीन कथाको आपसे कहता हूँ । ) प्राचीन समयमें समस्त स्थावर - जङ्गमात्मक जगत् एकीभूत महासमुद्रमें निमग्न ( डूबा हुआ ) था । चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, वायु एवं अग्नि – किसीका भी कोई २० ( अलग ) अस्तित्व नहीं था । ' भाव ' एवं ' अभाव ' से रहित जगत्की उस समयकी अवस्थाका कोई ठीक-ठीक ज्ञान, विचार, तर्कना या वर्णन सम्भव नहीं है । सभी पर्वत एवं वृक्ष जलमें निमग्र थे तथा सम्पूर्ण जगत् २१ । अन्धकारसे व्याप्त एवं दुर्दशाग्रस्त था । ऐसे समयमें भगवान् विष्णु हजारों वर्षोंकी निद्रामें शयन करते हैं एवं रात्रिके अन्तमें राजस रूप ग्रहणकर वे सभी लोकोंकी २२ रचना करते हैं ॥ १ ९ –२२ ॥ इस चराचरात्मक जगत्का स्रष्टा भगवान् विष्णुका २३ वह अद्भुत राजस स्वरूप पञ्चमुख एवं वेद - वेदाङ्गोंका ज्ञाता था । उसी समय तमोमय, त्रिलोचन, शूलपाणि, कपर्दी तथा रुद्राक्षमाला धारण किया हुआ एक अन्य २४ पुरुष भी प्रकट हुआ । उसके बाद भगवान्ने अतिदारुण अहंकारकी रचना की, जिससे ब्रह्मा तथा शंकर - वे दोनों ही देवता आक्रान्त हो गये । अहंकारसे व्याप्त २५ शिवने ब्रह्मासे कहा – तुम कौन हो और यहाँ कैसे आये हो? तुम मुझे यह भी बतलाओ कि तुम्हारी सृष्टि २६ | किसने की है? ॥ २३–२६ ॥ ( फिर ) इसपर ब्रह्माने भी अहंकारसे उत्तर दिया-२७ आप भी बतलाइये कि आप कौन हैं तथा आपके माता-पिता कौन हैं? लोक - कल्याणके लिये कलहको प्रिय | माननेवाले नारदजी! इस प्रकार प्राचीनकालमें ब्रह्मा और २८ शंकरके बीच एक - दूसरेसे दुर्विवाद हुआ । उसी समय आपका भी प्रादुर्भाव हुआ । आप उत्पन्न होते ही अनुपम वीणा धारण किये किलकिला शब्द करते हुए अन्तरिक्षकी २ ९ । ओर ऊपर चले गये । इसके बाद भगवान् शिव मानो

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अध्याय २ ] शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ १५ ततो विनिर्जितः शंभुर्मानिना पद्मयोनिना । तस्थावधोमुखो दीनो ग्रहाक्रान्तो यथा शशी ।

पराजिते लोकपतौ देवेन परमेष्ठिना ।

क्रोधान्धकारितं रुद्रं पञ्चमोऽथ मुखोऽब्रवीत् ॥

अहं ते प्रतिजानामि तमोमूर्ते त्रिलोचन ।

दिग्वासा वृषभारूढो लोकक्षयकरो भवान् ॥

इत्युक्तः शंकरः क्रुद्धो वदनं घोरचक्षुषा ।

निर्दग्धुकामस्त्वनिशं ददर्श भगवानजः ॥

ततस्त्रिनेत्रस्य समुद्भवन्ति वक्त्राणि पञ्चाथ सुदर्शनानि । श्वेतं च रक्तं कनकावदातं नीलं तथा पिङ्गजटं च शुभ्रम् ॥ दृष्ट्वाऽर्कसमानि सद्यः पैतामहं वक्त्रमुवाच वाक्यम् । समाहतस्याथ जलस्य बुदबुदा भवन्ति किं तेषु पराक्रमोऽस्ति ॥

तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तेन शंकरेण महात्मना ।

नखाग्रेण शिरश्छिन्नं ब्राह्मं परुषवादिनम् ॥

तच्छिन्नं शंकरस्यैव सव्ये करतलेऽपतत् ।

पतते न कदाचिच्च तच्छंकरकराच्छिरः ॥

अथ क्रोधावृतेनापि ब्रह्मणाद्भुतकर्मणा ।

सृष्टस्तु पुरुषो धीमान् कवची कुण्डली शरी ॥

धनुष्पाणिर्महाबाहुर्बाणशक्तिधरोऽव्ययः 1 चतुर्भुजो महातूणी आदित्यसमदर्शनः ॥

स प्राह गच्छ दुर्बुद्धे मा त्वां शूलिन् निपातये ।

भवान् पापसमायुक्तः पापिष्ठं को जिघांसति ॥

इत्युक्तः शंकरस्तेन पुरुषेण महात्मना ।

त्रपायुक्तो जगामाथ रुद्रो बदरिकाश्रमम् ॥

नरनारायणस्थानं पर्वते हि हिमाश्रये ।

सरस्वती यत्र पुण्या स्यन्दते सरितां वरा ॥

तत्र गत्वा च तं दृष्ट्वा नारायणमुवाच ह ।

भिक्षां प्रयच्छ भगवन् महाकापालिकोऽस्मि भोः ॥

इत्युक्तो धर्मपुत्रस्तु रुद्रं वचनमब्रवीत् ।

सव्यं भुजं ताडयस्व त्रिशूलेन महेश्वर ॥

ब्रह्माद्वारा पराजित - से होकर राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान ३० दीन एवं अधोमुख होकर खड़े हो गये ॥ २७–३० ॥ ( ब्रह्माके द्वारा ) लोकपति ( शंकर ) - के पराजित ३१ हो जानेपर क्रोधसे अन्धे हुए रुद्रसे ( श्रीब्रह्माजीके ) पाँचवें मुखने कहा – तमोमूर्ति त्रिलोचन! मैं आपको ३२ जानता हूँ । आप दिगम्बर, वृषारोही एवं लोकोंको नष्ट करनेवाले ( प्रलयंकारी ) हैं । इसपर अजन्मा भगवान् ३३ शंकर अपने तीसरे घोर नेत्रद्वारा भस्म करनेकी इच्छासे ब्रह्माके उस मुखको एकटक देखने लगे । तदनन्तर श्रीशंकरके श्वेत, रक्त, स्वर्णिम, नील एवं पिंगल वर्णके ३४ सुन्दर पाँच मुख समुद्भूत हो गये ॥ ३१–३४ ॥ सूर्यके समान दीप्त ( उन ) मुखोंको देखकर पितामहके मुखने कहा- जलमें आघात करनेसे बुबुद तो उत्पन्न होते हैं, पर क्या उनमें कुछ शक्ति भी होती है? यह सुनकर क्रोधभरे भगवान् शंकरने ब्रह्माके ३५ कठोर भाषण करनेवाले सिरको अपने नखके अग्रभागसे काट डाला; पर वह कटा हुआ ब्रह्माजीका सिर ३६ शंकरजीके ही वाम हथेलीपर जा गिरा एवं वह कपाल श्रीशंकरके उस हथेलीसे ( इस प्रकार चिपक गया कि ३७ गिरानेपर भी ) किसी प्रकार न गिरा । इसपर अद्भुतकर्मी ब्रह्माजी अत्यन्त क्रुद्ध हो गये । उन्होंने कवच - कुण्डल एवं शर धारण करनेवाले धनुर्धर विशाल बाहुवाले एक ३८ पुरुषकी रचना की । वह अव्यय, चतुर्भुज बाण, शक्ति और भारी तरकस धारण किये था तथा सूर्यके समान ३ ९ तेजस्वी दीख पड़ता था ॥ ३५–३९ ॥ उस नये पुरुषने शिवजीसे कहा – दुर्बुद्धि ४० शूलधारी शंकर! तुम शीघ्र ( यहाँसे ) चले जाओ, अन्यथा मैं तुम्हें मार डालूँगा । पर तुम पापयुक्त हो; भला, इतने बड़े पापीको कौन मारना चाहेगा? जब ४ ९ उस महापुरुषने शंकरसे इस प्रकार कहा, तब शिवजी लज्जित होकर हिमालय पर्वतपर स्थित बदरिकाश्रमको चले गये, जहाँ नर - नारायणका स्थान है और जहाँ ४२ नदियोंमें श्रेष्ठ पवित्र सरस्वती नदी बहती है । वहाँ जाकर और उन नारायणको देखकर शंकरने कहा-४३ भगवन्! मैं महाकापालिक हूँ । आप मुझे भिक्षा दें । ऐसा कहनेपर धर्मपुत्र ( नारायण ) - ने रुद्रसे कहा— महेश्वर! तुम अपने त्रिशूलके द्वारा मेरी बायीं भुजापर ४४ | ताड़ना करो ॥ ४०–४४ ॥

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१६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २

नारायणवचः श्रुत्वा त्रिशूलेन त्रिलोचनः ।

सव्यं नारायणभुजं ताडयामास वेगवान् ॥ ४५

त्रिशूलाभिहतान्मार्गात् तिस्रो धारा विनिर्ययुः ।

एका गगनमाक्रम्य स्थिता ताराभिमण्डिता ॥ ४६

द्वितीया न्यपतद् भूमौ तां जग्राह तपोधनः ।

अत्रिस्तस्मात् समुद्भूतो दुर्वासा शंकरांशतः ॥ ४७

तृतीया न्यपतद्धारा कपाले रौद्रदर्शने ।

तस्माच्छिशुः समभवत् संनद्धकवचो युवा ॥ ४८

श्यामावदातः शरचापपाणि-गर्जन्यथा प्रावृषि तोयदोऽसौ । इत्थं ब्रुवन् कस्य विशातयामि स्कन्धाच्छिरस्तालफलं यथैव ॥ ४ ९ तं शंकरोऽभ्येत्य वचो बभाषे चरं हि नारायणबाहुजातम् । निपातयैनं नर दुष्टवाक्यं ब्रह्मात्मजं सूर्यशतप्रकाशम् ॥५० इत्येवमुक्तः स तु शंकरेण जग्राह ततः दिव्यं आद्यं धनुस्त्वाजगवं प्रसिद्धम् । तूणानि तथाऽक्षयाणि युद्धाय वीरः स मतिं चकार ॥ ५१ प्रयुद्धौ सुभृशं महाबलौ ब्रह्मात्मजो बाहुभवश्च शार्वः । सहस्त्रं परिवत्सराणां ततो हरोऽभ्येत्य विरञ्चिमूचे ॥ ५२ जितस्त्वदीयः पुरुषः पितामहं

नरेण दिव्याद्भुतकर्मणा बली ।

महापृषत्कैरभिपत्य ताडित-स्तदद्भुतं चेह दिशो दशैव ॥ ५३

ब्रह्मा तमीशं वचनं बभाषे नेहास्य जन्मान्यजितस्य शंभो । पराजितश्चेष्यतेऽसौ नरो मदीयः पुरुषो महात्मा ॥ ५४ इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्र-श्चिक्षेप सूर्ये पुरुषं विरिचेः । नरं नरस्यैव तदा स विग्रहे चिक्षेप धर्मप्रभवस्य देवः ॥ ५५ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें शिवजीने नारायणकी बात सुनकर त्रिशूलद्वारा बड़े वेगसे उनकी वाम भुजापर आघात किया । त्रिशूलद्वारा ( भुजापर ) प्रताड़ित मार्गसे जलकी तीन धाराएँ निकल पड़ीं । एक धारा आकाशमें जाकर ताराओंसे मण्डित आकाशगङ्गा हुई; दूसरी धारा पृथ्वीपर गिरी, जिसे तपोधन अत्रिने ( मन्दाकिनीके रूपमें ) प्राप्त किया । शंकरके उसी अंशसे दुर्वासाका प्रादुर्भाव हुआ । तीसरी धारा भयानक दिखायी पड़नेवाले कपालपर गिरी, जिससे एक शिशु उत्पन्न हुआ । वह ( जन्म लेते ही ) कवच बाँधे, श्यामवर्णका युवक था । उसके हाथोंमें धनुष और बाण था । फिर वह वर्षाकालमें मेघ गर्जनके समान कहने लगा- ' मैं किसके स्कन्धसे सिरको तालफलके सदृश काट गिराऊँ? ' ॥ ४५ – ४ ९ ॥ श्रीनारायणकी बाहुसे उत्पन्न उस पुरुषके समीप जाकर श्रीशंकरने कहा – हे नर! तुम सूर्यके समान प्रकाशमान, पर कटुभाषी, ब्रह्मासे उत्पन्न इस पुरुषको मार डालो | शंकरजीके ऐसा कहनेपर उस वीर नरने प्रसिद्ध आजगव नामका धनुष एवं अक्षय तूणीर ग्रहणकर युद्धका निश्चय किया । उसके बाद ब्रह्मात्मज और नारायणकी भुजासे उत्पन्न दोनों नरोंमें सहस्र दिव्य वर्षोंतक प्रबल युद्ध होता रहा । तत्पश्चात् श्रीशंकरजीने ब्रह्माके पास जाकर कहा— पितामह! यह एक अद्भुत बात है कि दिव्य एवं अद्भुत कर्मवाले ( मेरे ) नरने दसों दिशाओंमें व्याप्त महान् बाणोंके प्रहारसे ताडित कर आपके पुरुषको जीत लिया । ब्रह्माने उस ईशसे कहा कि इस अजितका जन्म यहाँ दूसरोंद्वारा पराजित होनेके लिये नहीं हुआ है । यदि किसीको पराजित कहा जाना अभीष्ट है तो यह तेरा नर ही है । मेरा पुरुष तो महाबली है — ऐसा कहे जानेपर श्रीशंकरजीने ब्रह्माजीके पुरुषको सूर्यमण्डलमें फेंक दिया तथा उन्हीं शंकरने उस नरको धर्मपुत्र नरके । शरीरमें फेंक दिया ॥ ५०-५५ ॥ दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ २ ॥

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अध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १७ तीसरा अध्याय शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति; वाराणसीमें ब्रह्महत्यासे मुक्ति एवं कपाली नाम पड़ना पुलस्त्य उवाच

ततः करतले रुद्रः कपाले दारुणे स्थिते ।

संतापमगमद् ब्रह्मंश्चिन्तया व्याकुलेन्द्रियः ॥

ततः समागता रौद्रा नीलाञ्जनचयप्रभा ।

संरक्तमूर्द्धजा भीमा ब्रह्महत्या हरान्तिकम् ॥

तामागतां हरो दृष्ट्वा पप्रच्छ विकरालिनीम् ।

काऽसि त्वमागता रौद्रे केनाप्यर्थेन तद्वद ॥

कपालिनमथोवाच ब्रह्महत्या सुदारुणा ।

ब्रह्मवध्याऽस्मि सम्प्राप्ता मां प्रतीच्छ त्रिलोचन ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्महत्या विवेश ह ।

त्रिशूलपाणिनं रुद्रं सम्प्रतापितविग्रहम् ॥

ब्रह्महत्याभिभूतश्च शर्वो बदरिकाश्रमम् ।

आगच्छन्न ददर्शाथ नरनारायणावृषी ॥

अदृष्ट्वा धर्मतनयौ चिन्ताशोकसमन्वितः ।

जगाम यमुनां स्नातुं साऽपि शुष्कजलाऽभवत् ॥

कालिन्दीं शुष्कसलिलां निरीक्ष्य वृषकेतनः ।

प्लक्षजां स्नातुमगमदन्तर्द्धानं च सा गता ॥

ततो नु पुष्करारण्यं मागधारण्यमेव च ।

सैन्धवारण्यमेवासौ गत्वा स्नातो यथेच्छया ॥

तथैव नैमिषारण्यं धर्मारण्यं तथेश्वरः ।

स्नातो नैव च सा रौद्रा ब्रह्महत्या व्यमुञ्चत ॥

सरित्सु तीर्थेषु तथाश्रमेषु

पुण्येषु देवायतनेषु शर्वः ।

समा पापा-नावाप मोक्षं जलदध्वजोऽसौ ॥

ततो जगाम निर्विण्णः शंकरः कुरुजाङ्गलम् ।

तत्र गत्वा ददर्शाथ चक्रपाणिं खगध्वजम् ॥

तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम् ।

कृताञ्जलिपुटो भूत्वा हरः स्तोत्रमुदीरयत् ॥

पुलस्त्यजी बोले – नारदजी! तत्पश्चात् शिवजीको अपने करतलमें भयंकर कपालके सट जानेसे बड़ी ९ चिन्ता हुई । उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं । उन्हें बड़ा संताप हुआ । उसके बाद कालिखके समान नीले रंगकी, रक्तवर्णके केशवाली भयंकर ब्रह्महत्या २ शंकरके निकट आयी । उस विकराल रूपवाली स्त्रीको आयी देखकर शंकरजीने पूछा- ओ भयावनी स्त्री! ३ यह बतलाओ कि तुम कौन हो एवं किसलिये यहाँ आयी हो? इसपर उस अत्यन्त दारुण ब्रह्महत्याने उनसे कहा – मैं ब्रह्महत्या हूँ; हे त्रिलोचन! आप मुझे ४ स्वीकार करें - इसलिये यहाँ आयी हूँ ॥ १-४ ॥ ऐसा कहकर ब्रह्महत्या संतापसे जलते शरीरवाले ५ त्रिशूलपाणि शिवके शरीरमें समा गयी । ब्रह्महत्यासे अभिभूत होकर श्रीशंकर बदरिकाश्रममें आये; किंतु वहाँ नर ६ एवं नारायण ऋषियोंके उन्हें दर्शन नहीं हुए । धर्मके उन दोनों पुत्रोंको वहाँ न देखकर वे चिन्ता और शोकसे युक्त हो यमुनाजीमें स्नान करने गये; परंतु उसका जल ७ भी सूख गया । यमुनाजीको निर्जल देखकर भगवान् शंकर सरस्वतीमें स्नान करने गये; किंतु वह भी लुप्त ८ हो गयी ॥ ५-८ ॥ फिर पुष्करारण्य, मागधारण्य और सैन्धवारण्यमें ९ जाकर उन्होंने बहुत समयतक स्नान किया । उसी प्रकार वे नैमिषारण्य तथा सिद्धपुरमें भी गये और स्नान किये; १० फिर भी उस भयंकर ब्रह्महत्याने उन्हें नहीं छोड़ा । जीमूतकेतु शंकरने अनेक नदियों, तीर्थों, आश्रमों एवं पवित्र देवायतनोंकी यात्रा की; पर योगी होनेपर भी वे ११ पापसे मुक्ति न प्राप्त कर सके । तत्पश्चात् वे खिन्न होकर कुरुक्षेत्र गये । वहाँ जाकर उन्होंने गरुडध्वज १२ चक्रपाणि ( विष्णु ) को देखा और उन शङ्ख - चक्र-गदाधारी पुण्डरीकाक्ष ( श्रीनारायण ) का दर्शनकर वे १३ । हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे - ॥९ –१३ ॥

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१८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३ हर उवाच

नमस्ते देवतानाथ नमस्ते गरुडध्वज ।

शङ्खचक्रगदापाणे वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥

नमस्ते निर्गुणानन्त अप्रतर्क्याय वेधसे ।

ज्ञानाज्ञान निरालम्ब सर्वालम्ब नमोऽस्तु ते ॥

रजोयुक्त नमस्तेऽस्तु ब्रह्ममूर्ते सनातन ।

त्वया सर्वमिदं नाथ जगत्सृष्टं चराचरम् ॥

सत्त्वाधिष्ठित लोकेश विष्णुमूर्ते अधोक्षज ।

प्रजापाल महाबाहो जनार्दन नमोऽस्तु ते ॥

तमोमूर्ते अहं ह्येष त्वदंशक्रोधसंभवः ।

गुणाभियुक्त देवेश सर्वव्यापिन् नमोऽस्तु ते ॥

भूरियं त्वं जगन्नाथ जलाम्बरहुताशनः ।

वायुर्बुद्धिर्मनश्चापि शर्वरी त्वं नमोऽस्तु ते ॥

धर्मो यज्ञस्तपः सत्यमहिंसा शौचमार्जवम् ।

क्षमा दानं दया लक्ष्मीर्ब्रह्मचर्यं त्वमीश्वर ॥

त्वं साङ्गाश्चतुरो वेदास्त्वं वेद्यो वेदपारगः ।

उपवेदा भवानीश सर्वोऽसि त्वं नमोऽस्तु ते ॥

नमो नमस्तेऽच्युत चक्रपाणे नमोऽस्तु ते माधव मीनमूर्ते । लोके भवान् कारुणिको मतो मे त्रायस्व मां केशव पापबन्धात् ॥ ममाशुभं नाशय विग्रहस्थं यद् ब्रह्महत्याऽभिभवं बभूव । नष्टोऽस्म्यसमीक्ष्यकारी पुनीहि तीर्थोऽसि नमो नमस्ते ॥ पुलस्त्य उवाच

इत्थं स्तुतश्चक्रधरः शंकरेण महात्मना ।

प्रोवाच भगवान् वाक्यं ब्रह्महत्याक्षयाय ॥

हरिरुवाच

महेश्वर शृणुष्वेमां मम वाचं कलस्वनाम् ।

ब्रह्महत्याक्षयकरीं शुभदां पुण्यवर्धनीम् ॥

योऽसौ प्राङ्मण्डले पुण्ये मदंशप्रभवोऽव्ययः ।

प्रयागे वसते नित्यं योगशायीति विश्रुतः ॥

चरणाद् दक्षिणात्तस्य विनिर्याता सरिद्वरा ।

विश्रुता वरणेत्येव सर्वपापहरा शुभा ॥

भगवान् शंकर बोले- हे देवताओंके स्वामी! आपको नमस्कार है । गरुडध्वज! आपको प्रणाम है । १४ शङ्ख - चक्र - गदाधारी वासुदेव! आपको नमस्कार है । निर्गुण, अनन्त एवं अतर्कनीय विधाता! आपको नमस्कार १५ है । ज्ञानाज्ञानस्वरूप, स्वयं निराश्रय किंतु सबके आश्रय! आपको नमस्कार है । रजोगुण, सनातन, ब्रह्ममूर्ति! आपको नमस्कार है । नाथ! आपने इस सम्पूर्ण चराचर १६ विश्वकी रचना की है । सत्त्वगुणके आश्रय लोकेश! विष्णुमूर्ति, अधोक्षज, प्रजापालक, महाबाहु, जनार्दन! १७ आपको नमस्कार है । हे तमोमूर्ति! मैं आपके अंशभूत क्रोधसे उत्पन्न हूँ । हे महान् गुणवाले सर्वव्यापी देवेश! १८ आपको नमस्कार है॥१४–१८ ॥ जगन्नाथ! आप ही पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, १ ९ वायु, बुद्धि, मन एवं रात्रि हैं; आपको नमस्कार है । ईश्वर! आप ही धर्म, यज्ञ, तप, सत्य, अहिंसा, पवित्रता, २० सरलता, क्षमा, दान, दया, लक्ष्मी एवं ब्रह्मचर्य हैं । हे ईश! आप अङ्गोंसहित चतुर्वेदस्वरूप, वेद्य एवं वेदपारगामी २१ हैं । आप ही उपवेद हैं आपको नमस्कार है । बारंबार नमस्कार है । माधव! आपको नमस्कार २२ मानता हूँ । केशव! आप उत्पन्न अशुभको नष्ट कर बिना विचार किये कार्य हो गया हूँ । आप साक्षात् तथा सभी कुछ आप ही हैं; अच्युत! चक्रपाणि! आपको मीनमूर्तिधारी ( मत्स्यावतारी ) है । मैं आपको लोकमें दयालु मेरे शरीरमें स्थित ब्रह्महत्यासे मुझे पाप - बन्धनसे मुक्त करें । करनेवाला मैं दग्ध एवं नष्ट तीर्थ हैं, अतः आप मुझे पवित्र २३ करें । आपको बारंबार नमस्कार है ॥ १ ९ –२३ ॥ पुलस्त्यजीने कहा - भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार स्तुत होनेपर चक्रधारी भगवान् विष्णु शंकरकी ब्रह्महत्याको २४ नष्ट करनेके लिये उनसे वचन बोले - ॥ २४ ॥

भगवान् विष्णु बोले- महेश्वर! आप ब्रह्महत्याको नष्ट करनेवाली मेरी मधुर वाणी सुनें । यह शुभप्रद एवं २५ पुण्यको बढ़ानेवाली है । यहाँसे पूर्व प्रयागमें मेरे अंशसे उत्पन्न ' योगशायी ' २६ नामसे विख्यात देवता हैं । वे अव्यय - विकाररहित पुरुष हैं । वहाँ उनका नित्य निवास है । वहींसे उनके दक्षिण २७ । चरणसे ' वरणा ' नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ नदी निकली है । वह