वामन पुराण — पृष्ठ 31–40
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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अध्याय ५ ] दक्ष यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २ ९
कर्कः कुलीरेण समः सलिलस्थः प्रकीर्तितः ।
केदारवापीपुलिने विविक्तावनिरेव च ॥५१
सिंहस्तु पर्वतारण्यदुर्गकन्दरभूमिषु ।
वसते व्याधपल्लीषु गह्वरेषु गुहासु च ॥ ५२
ब्रीहिप्रदीपिककरा नावारूढा च कन्यका ।
चरते स्त्रीरतिस्थाने वसते नड्वलेषु च ॥५३
तुलापाणिश्च पुरुषो वीथ्यापणविचारकः ।
नगराध्वानशालासु वसते तत्र नारद ॥ ५४
श्वभ्रवल्मीकसंचारी वृश्चिको वृश्चिकाकृतिः ।
विषगोमयकीटादिपाषाणादिषु संस्थितः ॥ ५५
धनुस्तुरङ्गजघनो दीप्यमानो धनुर्धरः ।
वाजिशूरास्त्रविद्वीरः स्थायी गजरथादिषु ॥ ५६
मृगास्यो मकरो ब्रह्मन् वृषस्कन्थेक्षणाङ्गजः ।
मकरोऽसौ नदौचारी वसते च महौदधौ ॥ ५७
रिक्तकुम्भश्च पुरुषः स्कन्धधारी जलाप्लुतः ।
द्यूतशालाचरः कुम्भः स्थायी शौण्डिकसद्मसु ॥ ५८
मीनद्वयमथासक्तं मीनस्तीर्थाब्धिसंचरः ।
वसते पुण्यदेशेषु देवब्राह्मणसद्मसु ॥ ५ ९
लक्षणा गदितास्तुभ्यं मेषादीनां महामुने ।
न कस्यचित् त्वयाख्येयं गुह्यमेतत्पुरातनम् ॥ ६०
एतन् मया ते कथितं सुरर्षे
यथा त्रिनेत्रः प्रममाथ यज्ञम् ।
पुण्यं पुराणं परमं पवित्र-माख्यातवान्पापहरं शिवं च ॥ ६१ ।
विहार - भूमियोंमें होता है । कर्क राशि केकड़ेके रूपके समान रूपवाली है एवं जलमें रहनेवाली है । जलसे पूर्ण क्यारी एवं नदी - तीर अथवा बालुका एवं एकान्त भूमि इसके रहनेके स्थान हैं । सिंह राशिका निवास वन, पर्वत, दुर्गमस्थान, कन्दरा, व्याधोंके स्थान, गुफा आदि होता है ॥ ४ ९ -५२ ॥ कन्या राशि अन्न एवं दीपक हाथमें लिये हुए है तथा नौकापर आरूढ़ है । यह स्त्रियोंके रतिस्थान और सरपत, कण्डा आदिमें विचरण करती है । नारद! तुला राशि हाथमें तुला लिये हुए पुरुषके रूपमें गलियों और | बाजारोंमें विचरण करती है तथा नगरों, मार्गों एवं भवनोंमें निवास करती है । वृश्चिक राशिका आकार बिच्छू - जैसा है । यह गड्ढे एवं वल्मीक आदिमें विचरण करती है । यह विष, गोबर, कीट एवं पत्थर आदिमें भी निवास करती है । धनु राशिकी जंघा घोड़ेके समान है । यह ज्योतिःस्वरूप एवं धनुष लिये है । यह घुड़सवारी, वीरताके कार्य एवं अस्त्र - शस्त्रोंका ज्ञाता तथा शूर है । गज एवं रथ आदिमें इसका निवास होता है ॥ ५३–५६ ॥ ब्रह्मन्! मकर राशिका मुख मृगके मुख- सदृश एवं कंधे वृषके कन्धोंके तुल्य तथा नेत्र हाथीके नेत्रके समान हैं । यह राशि नदीमें विचरण करती तथा समुद्रमें विश्राम करती है । कुम्भ राशि रिक्त घड़ेको कंधेपर लिये जलसे भीगे पुरुषके समान है । इसका संचार - स्थान द्यूतगृह एवं सुरालय ( मद्यशाला ) है । मीन राशि दो संयुक्त मछलियोंके आकारवाली है । यह तीर्थस्थान एवं समुद्र - देशमें संचरण करती है । इसका निवास पवित्र देशों, देवमन्दिरों एवं ब्राह्मणोंके घरोंमें होता है । महामुने! मैंने आपको मेषादि राशियोंका लक्षण बतलाया । आप इस प्राचीन रहस्यको किसी अपात्रसे न बतलाइयेगा । देवर्षे! भगवान् शिवने जिस प्रकार यज्ञको प्रमथित किया, उसका मैंने आपसे वर्णन कर दिया । इस प्रकार मैंने आपको श्रेयस्कर, परम पवित्र, पापहारी एवं कल्याणकारी अत्यन्त पुराना पुराण - आख्यान सुनाया ॥ ५७–६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
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३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ छठा अध्याय नर - नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम - दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन पुलस्त्य उवाच
हृद्भवो ब्रह्मणो योऽसौ धर्मो दिव्यवपुर्मुने ।
दाक्षायणी तस्य भार्या तस्यामजनयत्सुतान् ॥
हरिं कृष्णं च देवर्षे नारायणनरौ तथा ।
योगाभ्यासरत नित्यं हरिकृष्णौ बभूवतुः ॥
नरनारायणौ चैव जगतो हितकाम्यया ।
तप्येतां च तपः सौम्यौ पुराणावृषिसत्तमौ ॥
प्रालेयाद्रिं समागम्य तीर्थे बदरिकाश्रमे ।
गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे ॥
नरनारायणाभ्यां च जगदेतच्चराचरम् ।
तापितं तपसा ब्रह्मञ्शक्रः क्षोभं तदा ययौ ॥
संक्षुब्धस्तपसा ताभ्यां क्षोभणाय शतक्रतुः ।
रम्भाद्याप्सरसः श्रेष्ठाः प्रेषयत्स महाश्रमम् ॥
कन्दर्पश्च सुदुर्धर्षश्चताङ्कुरमहायुधः ।
समं सहचरेणैव वसन्तेनाश्रमं गतः ॥
ततो माधवकन्दर्पो ताश्चैवाप्सरसो वराः ।
बदर्याश्रममागम्य विचिक्रीडुर्यथेच्छया ॥
ततो वसन्ते संप्राप्ते किंशुका ज्वलनप्रभाः ।
निष्पत्राः सततं रेजुः शोभयन्तो धरातलम् ॥
शिशिरं नाम मातङ्गं विदार्य नखरैरिव ।
वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने ॥
मया तुषारौघकरी निर्जितः स्वेन तेजसा ।
तमेव हसतेत्युच्चैः वसन्तः कुन्दकुड्मलैः ॥
वनानि कर्णिकाराणां पुष्पितानि विरेजिरे ।
यथा नरेन्द्रपुत्राणि कनकाभरणानि हि ॥
पुलस्त्यजी बोले- मुने! ब्रह्माजीके हृदयसे जो दिव्यदेहधारी धर्म प्रकट हुआ था, उसने दक्षकी पुत्री १ ' मूर्ति ' नामकी भार्यासे हरि, कृष्ण, नर और नारायण नामक चार पुत्रोंको उत्पन्न किया । * देवर्षे! इनमें हरि २ और कृष्ण ये दो तो नित्य योगाभ्यासमें निरत हो गये और पुरातन ऋषि शान्तमना नर तथा नारायण संसारके ३ कल्याणके लिये हिमालय पर्वतपर जाकर बदरिकाश्रम तीर्थ गङ्गा निर्मल तटपर ( परब्रह्मका नाम ॐकारका ४ जप करते हुए ) तप करने लगे ॥ १-४ ॥ ब्रह्मन्! नर - नारायणकी दुष्कर तपस्यासे सारा ५ स्थावर - जंगमात्मक यह जगत् परितप्त हो गया । इससे इन्द्र विक्षुब्ध हो उठे । उन दोनोंकी तपस्यासे अत्यन्त व्यग्र इन्द्रने उन्हें मोहित करनेके लिये रम्भा आदि श्रेष्ठ ६ अप्सराओंको उनके विशाल आश्रम में भेजा । कामदेवके आयुधोंमें अशोक, आम्रादिकी मंजरियाँ विशेष प्रभावक हैं । इन्हें तथा अपने सहयोगी वसन्त ऋतुको साथ लेकर ७ वह भी उस आश्रममें गया । अब वे वसन्त, कामदेव तथा श्रेष्ठ अप्सराएँ – ये सब बदरिकाश्रममें जाकर ८ निर्बाध क्रीड़ा करने लग गये ॥ ५-८ ॥ तब वसन्त ऋतुके आ जानेपर अग्रि शिखाके ९ सदृश कान्तिवाले पलाश पत्रहीन होकर रात - दिन पृथ्वीकी शोभा बढ़ाते हुए सुशोभित होने लगे । मुने! वसन्तरूपी सिंह मानो पलाश - पुष्परूपी नखोंसे शिशिररूपी गजराजको १० विदीर्ण कर वहाँ अपना साम्राज्य जमा चुका था । वह सोचने लगा- मैंने अपने तेजसे शीतसमूहरूपी हाथीको ११ जीत लिया है और वह कुन्दकी कलियोंके बहाने उसका उपहास भी करने लगा है । इधर सुवर्णके अलंकारोंसे मण्डित राजकुमारोंके समान पुष्पित कचनार-१२ | अमलतासके वन सुशोभित होने लगे ॥ ९ –१२ ॥ * यह बात भागवत २।७।६ आदिमें विशेष स्पष्टरूपसे कही गयी है । जिज्ञासु वहाँ भी देखें ।
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अध्याय ६ ] नर - नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३१
तेषामनु तथा नीपाः किङ्करा इव रेजिरे ।
स्वामिसंलब्धसंमाना भृत्या राजसुतानिव ॥
रक्ताशोकवना भान्ति पुष्पिताः सहसोज्ज्वलाः ।
भृत्या वसन्तनृपतेः संग्रामे सृक्प्लुता इव ॥
मृगवृन्दाः पिञ्जरिता राजन्ते गहने वने ।
पुलकाभिर्वृता यद्वत् सज्जनाः सुहृदागमे ॥
मञ्जरीभिर्विराजन्ते नदीकूलेषु वेतसाः ।
वक्तुकामा इवाङ्गुल्या कोऽस्माकं सदृशो नगः ॥
रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका ।
नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना ॥
नीलेन्दीवरनेत्रा च ब्रह्मन् बिल्वफलस्तनी ।
प्रफुल्लकुन्ददशना मञ्जरीकरशोभिता ॥
बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्दुवारनखाद्भुता ।
पुंस्कोकिलस्वना दिव्या अङ्कोलवसना शुभा ॥
बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वरनूपुरा ।
प्राग्वंशरसना ब्रह्मन् मत्तहंसगतिस्तथा ॥
पुत्रजीवांशुका भृङ्गरोमराजिविराजिता ।
वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे ॥
ततो नारायणो दृष्ट्वा आश्रमस्यानवद्यताम् ।
समीक्ष्य च दिशः सर्वास्ततोऽनङ्गमपश्यत ॥
नारद उवाच
कोऽसावनङ्गो ब्रह्मर्षे तस्मिन् बदरिकाश्रमे ।
यं ददर्श जगन्नाथो देवो नारायणोऽव्ययः ॥
पुलस्त्य उवाच
कन्दर्पो हर्षतनयो योऽसौ कामो निगद्यते ।
स शंकरेण संदग्धो ह्यनङ्गत्वमुपागतः ॥
नारद उवाच
किमर्थं कामदेवोऽसौ देवदेवेन शंभुना ।
दग्धस्तु कारणे कस्मिन्नेतद्व्याख्यातुमर्हसि ॥
पुलस्त्य उवाच
यदा दक्षसुता ब्रह्मन् सती याता यमक्षयम् ।
विनाश्य दक्षयज्ञं तं विचचार त्रिलोचनः ॥
ततो वृषध्वजं दृष्ट्वा कन्दर्पः कुसुमायुधः ।
अपत्नीकं तदाऽस्त्रेण उन्मादेनाभ्यताडयत् ॥
जैसे राजपुत्रोंके पीछे उनके द्वारा सम्मानित सेवक १३ खड़े रहते हैं, वैसे ही उन ( वर्णित - वनों ) -के पीछे-पीछे कदम्बवृक्ष सुशोभित हो रहे थे । इसी प्रकार लाल अशोक आदिके समूह भी सहसा पुष्पित एवं उद्भासित १४ हो सुशोभित होने लगे । लगता था मानो ऋतुराज वसन्तके अनुयायी युद्धमें रक्तसे लथपथ हो रहे हों । घने वनमें पीले रंगके हरिण इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार सुहृद् आनेसे सज्जन ( आनन्दसे ) पुलकित १५ होकर सुशोभित होते हैं । नदीके तटोंपर अपनी मंजरियोंके द्वारा वेतस ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो अंगुलियोंके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि हमारे १६ सदृश अन्य कौन वृक्ष है ॥ १३–१६ ॥ देवर्षे! जो दिव्य पतली एवं यौवनसे भरी वसन्त-१७ लक्ष्मी उस बदरिकाश्रममें प्रकट हुई थी, उसके मानो रक्ताशोक ही हाथ, पलाश ही चरण, नीलाशोक केश-१८ पाश, विकसित कमल ही मुख और नीलकमल ही नेत्र थे । उसके बिल्वफल मानों स्तन, कुन्दपुष्प दन्त, मञ्जरी १ ९ हाथ, दुपहरियाफूल अधर, सिन्दुवार नख, नर कोयलकी काकली ( बोली ) स्वर, अंकोल वस्त्र, मयूरयूथ आभूषण, २० सारस नूपुरस्वरूप और आश्रमके शिखर करधनी थे । उसके मत्त हंस गति, पुत्रजीव ऊर्ध्व वस्त्र और भ्रमर २१ मानो रोमावलीरूपमें विराजित थे । तब नारायणने आश्रमकी अद्भुत रमणीयता देखकर सभी दिशाओंकी २२ ओर देखा और फिर कामदेवको भी देखा ॥ १७–२२ ॥ नारदजीने पूछा— ब्रह्मर्षे! जिसे अव्यय जगन्नाथ नारायणने बदरिकाश्रममें देखा था, वह अनङ्ग ( काम ) २३ | कौन है? ॥ २३ ॥
पुलस्त्यजीने कहा- यह कंदर्प हर्षका पुत्र है, इसे ही काम कहा जाता है । शंकर ( -की नेत्राग्नि ) - द्वारा २४ भस्म होकर वह ' अनङ्ग ' हो गया ॥२४ ॥
नारदजीने पूछा— पुलस्त्यजी! आप यह बतलायें कि देवाधिदेव शंकरने कामदेवको किस कारणसे २५ भस्म किया? ॥ २५ ॥
पुलस्त्यजीने कहा - ब्रह्मन्! दक्ष- पुत्री सती प्राण त्याग करनेपर शिवजी दक्ष यज्ञका ध्वंस कर २६ ( जहाँ - तहाँ विचरण करने लगे । तब शिवजीको स्त्री-रहित देखकर पुष्पास्त्रवाले कामदेवने उनपर अपना २७ । ' उन्मादन ' नामक अस्त्र छोड़ा । इस उन्मादन - बाणसे
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ततो हरः शरेणाथ उन्मादेनाशु ताडितः ।
विचचार मदोन्मत्तः काननानि सरांसि च ॥
स्मरन् सतीं महादेवस्तथोन्मादेन ताडितः ।
न शर्म लेभे देवर्षे बाणविद्ध इव द्विपः ॥
ततः पपात देवेशः कालिन्दीसरितं मुने ।
निमग्ने शंकरे आपो दग्धाः कृष्णत्वमागताः ॥
तदाप्रभृति कालिन्द्या भृङ्गाञ्जननिभं जलम् ।
आस्यन्दत् पुण्यतीर्था सा केशपाशमिवावनेः ॥
ततो नदीषु पुण्यासु सरस्सु च नदेषु च ।
पुलिनेषु च रम्येषु वापीषु नलिनीषु च ॥
पर्वतेषु च रम्येषु काननेषु च सानुषु ।
विचरन् स्वेच्छया नैव शर्म लेभे महेश्वरः ॥
क्षणं गायति देवर्षे क्षणं रोदिति शंकरः ।
क्षणं ध्यायति तन्वङ्गीं दक्षकन्यां मनोरमाम् ॥
ध्यात्वा क्षणं प्रस्वपिति क्षणं स्वप्नायते हरः ।
स्वप्ने तथेदं गदति तां दृष्ट्वा दक्षकन्यकाम् ॥
निर्घृणे तिष्ठ किं मूढे त्यजसे मामनिन्दिते ।
मुग्धे त्वया विरहितो दग्धोऽस्मि मदनाग्निना ॥
सति सत्यं प्रकुपिता मा कोपं कुरु सुन्दरि ।
पादप्रणामावनतमभिभाषितुमर्हसि ॥
श्रूयसे दृश्यसे नित्यं स्पृश्यसे वन्द्यसे प्रिये ।
आलिङ्ग्यसे च सततं किमर्थं नाभिभाषसे ॥
विलपन्तं जनं दृष्ट्वा कृपा कस्य न जायते ।
विशेषतः पतिं बाले ननु त्वमतिनिर्घृणा ॥
त्वयोक्तानि वचांस्येवं पूर्वं मम कृशोदरि ।
विना त्वया न जीवेयं तदसत्यं त्वया कृतम् ॥
एह्येहि कामसंतप्तं परिष्वज सुलोचने ।
नान्यथा नश्यते तापः सत्येनापि शपे प्रिये ॥
इत्थं विलप्य स्वप्नान्ते प्रतिबुद्धस्तु तत्क्षणात् ।
उत्कूजति तथारण्ये मुक्तकण्ठं पुनः पुनः ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ आहत होकर शिवजी उन्मत्त होकर वनों और सरोवरोंमें २८ घूमने लगे । देवर्षे! बाणविद्ध गजके समान उन्मादसे व्यथित महादेव सतीका स्मरण करते हुए बड़े अशान्त २ ९ हो रहे थे – उन्हें चैन नहीं था ॥ २६–२९ ॥ मुने! उसके बाद शिवजी यमुना नदीमें कूद पड़े । ३० उनके जलमें निमज्जन करनेसे उस नदीका जल काला हो गया । उस समयसे कालिन्दी नदीका जल भृंग और अंजनके सदृश कृष्णवर्णका हो गया एवं वह पवित्र ३१ तीर्थोंवाली नदी पृथ्वीके केशपाशके सदृश प्रवाहित होने लगी । उसके बाद पवित्र नदियों, सरोवरों, नदों, रमणीय नदी - तटों, वापियों, कमलवनों, पर्वतों, मनोहर ३२ काननों तथा पर्वत शृङ्गोंपर स्वेच्छापूर्वक विचरण करते हुए भगवान् शिव कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त ३३ कर सके ॥ ३०-३३ । देवर्षे! वे कभी गाते, कभी रोते और कभी ३४ कृशाङ्गी सुन्दरी सतीका ध्यान करते । ध्यान करके कभी सोते और कभी स्वप्न देखने लगते थे; स्वप्नकालमें ३५ सतीको देखकर वे इस प्रकार कहते थे – निर्दये! रुको, हे मूढे! मुझे क्यों छोड़ रही हो? हे अनिन्दिते! हे मुग्धे! तुम्हारे विरह मैं कामाग्निसे दग्ध हो रहा हूँ । हे सति! ३६ क्या तुम वस्तुतः क्रुद्ध हो? सुन्दरि! क्रोध मत करो । मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत होकर प्रणाम करता हूँ । तुम्हें ३७ । मेरे साथ बात तो करनी ही चाहिये ॥ ३४–३७ ॥ प्रिये! मैं सतत तुम्हारी ध्वनि सुनता हूँ, तुम्हें ३८ देखता हूँ, तुम्हारा स्पर्श करता हूँ, तुम्हारी वन्दना करता हूँ और तुम्हारा परिषङ्ग करता हूँ । तुम मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो? बाले! विलाप करनेवाले व्यक्तिको ३ ९ | देखकर किसे दया नहीं उत्पन्न होती? विशेषतः अपने पतिको विलाप करता देखकर तो किसे दया नहीं आती? निश्चय ही तुम अति निर्दयी हो । सूक्ष्मकटिवाली! तुमने पहले मुझसे कहा था कि तुम्हारे बिना मैं जीवित ४० नहीं रहूँगी । उसे तुमने असत्य कर दिया । सुलोचने! आओ, आओ; कामसन्तप्त मुझे आलिङ्गित करो । प्रिये! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि अन्य किसी ४१ प्रकार मेरा ताप नहीं शान्त होगा ॥ ३८–४१ ॥ इस प्रकार वे विलाप कर स्वप्नके अन्तमें उठकर ४२ । वनमें बार- बार रोने लगे । इस प्रकार मुक्तकण्ठसे
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गीताप्रेस, गोरखपुर भगवान् वामन
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90 शिव पृष्ठ कूर्म स्कन्द त्वया वामन नारद भा 15 Odouan0 ब्रह्मवै 666350 भविष्य लिङ्ग - मार्कण्डेय गीताप्रेस, गोरखपुर वामनवतारी भगवान् विष्णु
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गोरखपुर , माताप्रस
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Deolaliker गीताप्रेस, गोरखपुर चतुर्मुख ब्रह्मा
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गोरखपुर , गीताप्रेस विवाह शिव
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गीताप्रेस, गोरखपुर मङ्गलायतन भगवान् विनायक