वामन पुराण — पृष्ठ 21–30
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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अध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १ ९
सव्यादन्या द्वितीया च असिरित्येव विश्रुता ।
ते उभे तु सरिच्छ्रेष्ठे लोकपूज्ये बभूवतुः ॥
ताभ्यां मध्ये तु यो देशस्तत्क्षेत्रं योगशायिनः ।
त्रैलोक्यप्रवरं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् ।
न तादृशोऽस्ति गगने न भूम्यां न रसातले ॥
तत्रास्ति नगरी पुण्या ख्याता वाराणसी शुभा ।
यस्यां हि भोगिनोऽपीश प्रयान्ति भवतो लयम् ॥
विलासिनीनां रशनास्वनेन श्रुतिस्वनैर्ब्राह्मणपुंगवानाम् 1 शुचिस्वरत्वं निशम्य हास्यादशासन्त मुहुर्मुहुस्तान् ॥ व्रजत्सु चतुष्पथेषु पदान्यलक्तारुणितानि दृष्ट्वा । ययौ शशी विस्मयमेव यस्यां तुङ्गानि दिवाऽपि भृङ्गाश्च किंस्वित् प्रयाता स्थलपद्मिनीयम् ॥ यस्यां सुरमन्दिराणि
रुन्धन्ति चन्द्रं रजनीमुखेषु ।
सूर्यं पवनाप्लुताभि-दीर्घाभिरेवं सुपताकिकाभिः ॥
यस्यां शशिकान्तभित्तौ
प्रलोभ्यमानाः प्रतिबिम्बितेषु ।
आलेख्ययोषिद्विमलाननाब्जे-स्वीयुर्भ्रमान्नैव च पुष्पकान्तरम् ॥
परिभ्रमंश्चापि पराजितेषु नरेषु संमोहनलेखनेन । यस्यां जलक्रीडनसंगतासु न स्त्रीषु शंभो गृहदीर्घिकासु ॥ न चैव कश्चित् परमन्दिराणि रुणद्धि शंभो सहसा ऋतेऽक्षान् । न चाबलानां तरसा पराक्रमं करोति यस्यां सुरतं हि मुक्त्वा ॥
पाशग्रन्थिर्गजेन्द्राणां दानच्छेदो मदच्युतौ ।
यस्यां मानमदौ पुंसां करिणां यौवनागमे ॥
* ' यहाँ सर्वत्र परिसंख्यालंकार है । परिसंख्यालंकार स्थानमें स्थापन हो । ऐसा वर्णन आनन्दरामायणके अयोध्या -सब पापोंको हरनेवाली एवं पवित्र है । वहीं उनके वाम २८ | पादसे ' असि नामसे ' प्रसिद्ध एक दूसरी नदी भी निकली है । ये दोनों नदियाँ श्रेष्ठ एवं लोकपूज्य हैं ॥ २५ – २८ ॥ उन दोनोंके मध्यका प्रदेश योगशायीका क्षेत्र है । वह तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा सभी पापोंसे छुड़ा २ ९ देनेवाला तीर्थ है । उसके समान अन्य कोई तीर्थ आकाश, पृथ्वी एवं रसातलमें नहीं है । ईश! वहाँ पवित्र ३० शुभप्रद विख्यात वाराणसी नगरी है, जिसमें भोगी लोग भी आपके लोकको प्राप्त करते हैं । श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी वेदध्वनि विलासिनी स्त्रियोंकी करधनीकी ध्वनिसे मिश्रित होकर मङ्गल स्वरका रूप धारण करती है । उस ३१ ध्वनिको सुनकर गुरुजन बारंबार उपहासपूर्वक उनका शासन करते हैं । जहाँ चौराहोंपर भ्रमण करनेवाली स्त्रियोंके अलक्त ( महावर ) - से अरुणित चरणोंको देखकर ३२ चन्द्रमाको स्थल- पद्मिनीके चलनेका भ्रम हो जाता है और जहाँ रात्रिका आरम्भ होनेपर ऊँचे - ऊँचे देवमन्दिर चन्द्रमाका ( मानो ) अवरोध करते हैं एवं दिनमें पवनान्दोलित ( हवासे फहरा रही ) दीर्घ पताकाओंसे सूर्य भी छिपे ३३ रहते हैं ॥ २ ९ - ३३ ॥ जिस ( वाराणसी ) - में चन्द्रकान्तमणिकी भित्तियोंपर प्रतिबिम्बित चित्रमें निर्मित स्त्रियोंके निर्मल मुख-कमलोंको देखकर भ्रमर उनपर भ्रमवश लुब्ध हो जाते हैं और दूसरे पुष्पोंकी ओर नहीं जाते । हे शम्भो! वहाँ ३४ सम्मोहनलेखनसे पराजित पुरुषोंमें तथा घरकी बावलियोंमें जलक्रीड़ाके लिये एकत्र हुई स्त्रियोंमें ही ' भ्रमण ' देखा जाता है, अन्यत्र किसीको ' भ्रमण ' ( चक्कर रोग ) नहीं होता * । द्यूतक्रीडा ( जुआके खेल ) - के पासोंके सिवाय अन्य कोई भी दूसरेके ' पाश ' ( बन्धन ) - में नहीं डाला ३५ जाता तथा सुरत - समयके सिवाय स्त्रियोंके साथ कोई आवेगयुक्त पराक्रम नहीं करता । जहाँ हाथियोंके बन्धनमें ही पाशग्रन्थि ( रस्सीकी गाँठ होती है, उनकी मदच्युतिमें ( मदके चूनेमें ) ही ' दानच्छेद ' ( मदकी धाराका टूटना ) एवं नर हाथियोंके यौवनागममें ही ' मान ' और ' मद ' ३६ होते हैं, अन्यत्र नहीं; तात्पर्य यह कि दान देनेकी धारा निरन्तर चलती रहती है और अभिमानी एवं मदवाले ३७ | लोग नहीं हैं॥३४–३७ ॥ वहाँ होता है, जहाँ किसी वस्तुका एक स्थानसे निषेध करके उसका दूसरे वर्णनमें, कादम्बरीमें, काशीखण्डमें काशी आदिके वर्णनमें भी प्राप्त होता है ।
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२० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३
प्रियदोषाः सदा यस्यां कौशिका नेतरे जनाः ।
तारागणेऽकुलीनत्वं गद्ये वृत्तच्युतिर्विभो ॥
भूतिलुब्धा विलासिन्यो भुजंगपरिवारिताः ।
चन्द्रभूषितदेहाश्च यस्यां त्वमिव शंकर ॥
ईदृशायां सुरेशान वाराणस्यां महाश्रमे ।
वसते भगवाँल्लोलः सर्वपापहरो रविः ॥
दशाश्वमेधं यत्प्रोक्तं मदंशो यत्र केशवः ।
तत्र गत्वा सुरश्रेष्ठ पापमोक्षमवाप्स्यसि ॥
इत्येवमुक्तो गरुडध्वजेन वृषध्वजस्तं शिरसा प्रणम्य । जगाम वेगाद् गरुडो यथाऽसौ वाराणसी पापविमोचनाय ॥ गत्वा सुपुण्यां नगरीं सुतीर्थां दृष्ट्वा च लोलं सदशाश्वमेधम् । स्नात्वा च तीर्थेषु विमुक्तपापः स केशवं द्रष्टुमुपाजगाम ॥
केशवं शंकरो दृष्ट्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत् ।
त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश ब्रह्महत्या क्षयं गता ॥
नेदं कपालं देवेश मद्धस्तं परिमुञ्चति ।
कारणं वेद्मि न च तदेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥
पुलस्त्य उवाच
महादेववचः श्रुत्वा केशवो वाक्यमब्रवीत् ।
विद्यते कारणं रुद्र तत्सर्वं कथयामि ते ॥
योऽसौ ममाग्रतो दिव्यो ह्रदः पद्मोत्पलैर्युतः ।
एष तीर्थवरः पुण्यो देवगन्धर्वपूजितः ॥
एतस्मिन्प्रवरे तीर्थे स्नानं शंभो समाचर ।
स्नातमात्रस्य चाद्यैव कपालं परिमोक्ष्यति ॥
विभो! जहाँ उलूक ही सदा दोषा ( रात्रि ) - प्रिय ३८ होते हैं, अन्य लोग दोषोंके प्रेमी नहीं हैं । तारागणोंमें ही अकुलीनता ( पृथ्वीमें न छिपना ) है, लोगों में कहीं अकुलीनताका नाम नहीं है; गद्यमें ही वृत्तच्युति ( छन्दोभङ्ग ) होती है, अन्यत्र वृत्त ( चरित्र ) - च्युति नहीं दीखती । शंकर! जहाँकी विलासिनियाँ आपके सदृश ३ ९ ( भस्म ) ' भूतिलुब्धा ' ' भुजंग ( सर्प ) - परिवारिता ' एवं ' चन्द्रभूषितदेहा ' होती हैं । ( यहाँ पक्षान्तरमें - विलासिनियोंके पक्षमें – संगतिके लिये, ' भूति ' पद ' भस्म ' और ' धन ' के अर्थमें, ' भुजङ्ग ' पद ' सर्प ' एवं ' जार ' के अर्थमें ४० तथा ‘ चन्द्र ' पद ‘ चन्द्राभूषण ' के अर्थमें प्रयुक्त हैं । ) सुरेशान! इस प्रकारकी वाराणसीके महान् आश्रममें सभी पापोंको दूर करनेवाले भगवान् ' लोल ' नामके सूर्य निवास करते हैं । सुरश्रेष्ठ! वहीं दशाश्वमेध नामका स्थान है तथा वहीं मेरे अंशस्वरूप केशव स्थित हैं । वहाँ ४१ जाकर आप पापसे छुटकारा प्राप्त करेंगे ॥ ३८–४१ ॥ भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर शिवजीने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया । फिर वे पाप छुड़ानेके लिये गरुड़के समान तेज वेगसे वाराणसी गये । वहाँ ४२ परमपवित्र तथा तीर्थभूत नगरीमें जाकर दशाश्वमेधके साथ ‘ असी ' स्थानमें स्थित भगवान् लोलार्कका * दर्शन किया तथा ( वहाँके ) तीर्थोंमें स्नान कर और पाप-मुक्त होकर वे ( वरुणासंगमपर ) केशवका दर्शन करने ४३ गये । उन्होंने केशवका दर्शन करके प्रणामकर कहा-हृषीकेश! आपके प्रसादसे ब्रह्महत्या तो नष्ट हो गयी, ४४ पर देवेश! यह कपाल मेरे हाथको नहीं छोड़ रहा है । इसका कारण मैं नहीं जानता । आप ही मुझे यह बतला ४५ सकते हैं ॥ ४२–४५ ॥ पुलस्त्यजी बोले- महादेवका वचन सुनकर केशवने यह वाक्य कहा – रुद्र! इसके समस्त कारणोंको मैं तुम्हें ४६ बतलाता हूँ । मेरे सामने कमलोंसे भरा यह जो दिव्य सरोवर है, यह पवित्र तथा तीर्थोंमें श्रेष्ठ है एवं देवताओं ४७ तथा गन्धर्वोंसे पूजित है । शिवजी! आप इस परम श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करें । स्नान करनेमात्रसे आज ही यह कपाल ४८ । ( आपके हाथको ) छोड़ देगा । इससे रुद्र! संसारमें आप * लोलार्कके सम्बन्धमें विशेष जानकारीके लिये देखिये सूर्याङ्कके ३०८ वें से ३१० वें पृष्ठतक प्रकाशित विवरण ।
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अध्याय ४ ] विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष यक्षकी वार्ता, एवं सतीका प्राण त्याग २१
ततः कपाली लोके च ख्यातो रुद्र भविष्यसि ।
कपालमोचनेत्येवं तीर्थं चेदं भविष्यति ॥ ४ ९
पुलस्त्य उवाच
एवमुक्तः सुरेशेन केशवेन महेश्वरः ।
कपालमोचने सस्नौ वेदोक्तविधिना मुने ॥ ५०
स्नातस्य तीर्थे त्रिपुरान्तकस्य परिच्युतं हस्ततलात् कपालम् । नाम्ना बभूवाथ कपालमोचनं तत्तीर्थवर्यं भगवत्प्रसादात् ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें ' कपाली ' नामसे प्रसिद्ध होंगे तथा यह तीर्थ भी ' कपालमोचन ' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ४६–४९ ॥ पुलस्त्यजी बोले- मुने! सुरेश्वर केशवके ऐसा कहनेपर महेश्वरने कपालमोचनतीर्थमें वेदोक्त विधिसे स्नान किया । उस तीर्थमें स्नान करते ही उनके हाथसे ब्रह्म - कपाल गिर गया । तभीसे भगवान्की कृपासे उस उत्तम तीर्थका नाम ' कपालमोचन ' पड़ा * ॥ ५०- ५१ ॥ तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष यज्ञकी वार्ता, सतीका प्राण त्याग; शिवका क्रोध एवं उनके गणोंद्वारा पुलस्त्य उवाच
एवं कपाली संजातो देवर्षे भगवान् हरः ।
अनेन कारणेनासौ दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १
कपालिजायेति सतीं विज्ञायाथ प्रजापतिः ।
यज्ञे चापि दुहिता दक्षेण न निमन्त्रिता ॥ २
एतस्मिन्नन्तरे देवीं द्रष्टुं गौतमनन्दिनी ।
जया जगाम शैलेन्द्रं मन्दरं चारुकन्दरम् ॥ ३
तामागतां सती दृष्ट्वा जयामेकामुवाच ह ।
किमर्थं विजया नागाज्जयन्ती चापराजिता ॥ ४
सा देव्या वचनं श्रुत्वा उवाच परमेश्वरीम् ।
गता निमन्त्रिताः सर्वा मखे मातामहस्य ताः ॥ ५
समं पित्रा गौतमेन मात्रा चैवाप्यहल्यया ।
अहं समागता द्रष्टुं त्वां तत्र गमनोत्सुका ॥ ६
किं त्वं न व्रजसे तत्र तथा देवो महेश्वरः ।
नामन्त्रिताऽसि तातेन उताहोस्विद् व्रजिष्यसि ॥ ७
गतास्तु ऋषयः सर्वे ऋषिपल्यः सुरास्तथा ।
मातृष्वसः शशाङ्कश्च सपत्नीको गतः क्रतुम् ॥ ८ ।
चतुर्दशेषु लोकेषु जन्तवो ये चराचराः ।
निमन्त्रिताः क्रतौ सर्वे किं नासि त्वं निमन्त्रिता ॥ ९ ।
* कपालमोचन तीर्थ काशीके परिसरमें बकरियाकुण्डसे दक्ष यज्ञका विध्वंस पुलस्त्यजी बोले- देवर्षे! भगवान् शिव इस प्रकार कपाली नामसे ख्यात हुए और इसी कारण वे दक्षके द्वारा निमन्त्रित नहीं हुए । प्रजापति दक्षने सतीको अपनी पुत्री होनेपर भी कपालीकी पत्नी समझकर निमन्त्रणके योग्य न मानकर उन्हें यज्ञमें नहीं बुलाया । इसी बीच देवीका दर्शन करनेके लिये गौतम - पुत्री जया सुन्दर गुफावाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दरपर गयी । जयाको वहाँ अकेली आयी देखकर सती बोलीं- विजये! जयन्ती और अपराजिता यहाँ क्यों नहीं आयीं? ॥ १-४ ॥ देवीके वचनको सुनकर विजयाने उन सती परमेश्वरीसे कहा - अपने पिता गौतम और माता अहल्याके साथ वे मातामहके सत्र ( यज्ञ ) - में निमन्त्रित होकर चली गयी हैं । वहाँ जानेके लिये उत्सुक मैं आपसे मिलने आयी हूँ । क्या आप तथा भगवान् शिव वहाँ नहीं जा रहे हैं? क्या पिताजीने आपको नहीं बुलाया है? अथवा आप वहाँ जायेंगी? सभी ऋषि ऋषि - पत्नियाँ तथा देवगण वहाँ गये हैं । हे मातृष्वसः ( मौसी )! पत्नीके सहित शशाङ्क भी उस यज्ञमें गये हैं । चौदहों लोकोंके समस्त चराचर प्राणी उस यज्ञमें
निमन्त्रित हुए हैं । क्या आप निमन्त्रित नहीं हैं? ॥ ५ – ९ ॥
१ मीलपर स्थित है ।
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२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४ पुलस्त्य उवाच जयायास्तद्वचः श्रुत्वा वज्रपातसमं सती मन्युनाऽभिप्लुता ब्रह्मन् पञ्चत्वमगमत् ततः जया मृतां सतीं दृष्ट्वा क्रोधशोकपरिप्लुता मुञ्चती वारि नेत्राभ्यां सस्वरं विललाप ह आक्रन्दितध्वनिं श्रुत्वा शूलपाणिस्त्रिलोचनः आः किमेतदितीत्युक्त्वा जयाभ्याशमुपागतः आगतो ददृशे देवीं लतामिव वनस्पतेः कृत्तां परशुना भूमौ श्लथाङ्गीं पतितां सतीम् देवीं निपतितां दृष्ट्वा जयां पप्रच्छ शंकरः किमियं पतिता भूमौ निकृत्तेव लता सती सा शंकरवचः श्रुत्वा जया वचनमब्रवीत् श्रुत्वा मखस्था दक्षस्य भगिन्यः पतिभिः सह आदित्याद्यास्त्रिलोकेश समं शक्रादिभिः सुरैः मातृष्वसा विपन्नेयमन्तर्दुःखेन दह्यती पुलस्त्य उवाच एतच्छ्रुत्वा वचो रौद्रं रुद्रः क्रोधाप्लुतो बभौ क्रुद्धस्य सर्वगात्रेभ्यो निश्चेरुः सहसार्चिषः ततः क्रोधात् त्रिनेत्रस्य गात्ररोमोद्भवा मुने गणा: सिंहमुखा जाता वीरभद्रपुरोगमाः गणैः परिवृतस्तस्मान्मन्दराद्धिमसाह्वयम् गतः कनखलं तस्माद् यत्र दक्षोऽयजत् क्रतुम् ततो गणानामधिपो वीरभद्रो महाबलः दिशि प्रतीच्युत्तरायां तस्थौ शूलधरो मुने या क्रोधाद् गदां गृह्य पूर्वदक्षिणतः स्थिता मध्ये त्रिशूलधृक् शर्वस्तस्थौ क्रोधान्महामुने मृगारिवदनं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ऋषयो यक्षगन्धर्वाः किमिदं त्वित्यचिन्तयन् ततस्तु धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान् द्वारपालस्तदा धर्मो वीरभद्रमुपाद्रवत् तमापतन्तं सहसा धर्मं दृष्ट्वा गणेश्वरः करेणैकेन जग्राह त्रिशूलं वह्निसन्निभम् कार्मुकं च द्वितीयेन तृतीयेनाथ मार्गणान् चतुर्थेन गदां गृह्य धर्ममभ्यद्रवद् गणः पुलस्त्यजी बोले- ब्रह्मन्! ( नारदजी! ) वज्रपातके । समान जयाकी उस बातको सुनकर क्रोध एवं दुःखसे ॥ १० भरकर सतीने प्राण छोड़ दिये । सतीको मरी हुई देखकर । क्रोध एवं दुःखसे भरी जया आँसू बहाते हुए जोर-॥ ११ जोरसे विलाप करने लगी । रोनेकी करुणध्वनि सुनकर शूलपाणि भगवान् शिव ' अरे क्या हुआ, क्या हुआ'-। ऐसा कहकर उसके पास गये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने ॥ १२ फरसे से कटी वृक्षपर चढ़ी लताकी तरह सतीको भूमिपर । मरी पड़ी देखा तो जयासे पूछा – ये सती कटी लताकी ॥ १३ तरह भूमिपर क्यों पड़ी हुई हैं? शिवके वचनको । सुनकर जया बोली - हे त्रिलोकेश्वर! दक्षके यज्ञमें अपने-॥ १४ अपने पतिके साथ बहनोंका एवं इन्द्र आदि देवोंके साथ । आदित्य आदिका निमन्त्रित होकर उपस्थित होना ॥ १५ सुनकर आन्तरिक दुःख ( की ज्वाला ) - से दग्ध हो । गयीं । इससे मेरी माताकी बहन ( सती ) - के प्राण निकल ॥ १६ | गये॥१०–१६ ॥ पुलस्त्यजीने कहा— जयाके इस भयंकर । ( अमङ्गल ) वचनको सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रुद्ध हो ॥ १७ गये । उनके शरीरसे सहसा अग्निकी तेज ज्वालाएँ निकलने । लगीं । मुने! इसके बाद क्रोधके कारण त्रिनेत्र भगवान् शिवके शरीरके लोमोंसे सिंहके समान मुखवाले वीरभद्र ॥ १८ आदि बहुत - से रुद्रगण उत्पन्न हो गये । अपने गणोंसे घिरे । भगवान् शिव मंदरपर्वतसे हिमालयपर गये और वहाँसे ॥ १ ९ कनखल चले गये, जहाँ दक्ष यज्ञ कर रहे थे । इसके बाद । सभी गणोंमें अग्रणी महाबली वीरभद्र शूल धारण किये ॥ २० पश्चिमोत्तर ( वायव्य ) दिशामें चले गये ॥ १७ - २० ॥ । महामुने! क्रोधसे गदा लेकर जया पूर्व - दक्षिण ॥ २१ दिशा ( अग्निकोण ) - में खड़ी हो गयी और मध्यमें । क्रोधसे भरे त्रिशूल लिये शंकर खड़े हो गये । सिंहवदन ॥ २२ ( वीरभद्र ) को देखकर इन्द्र आदि देवता, ऋषि, यक्ष । एवं गन्धर्वलोग सोचने लगे कि यह क्या है? तदनन्तर ॥ २३ द्वारपाल धर्म धनुष एवं सर्पके समान बाणोंको लेकर । वीरभद्रकी ओर दौड़े । सहसा धर्मको आता हुआ देखकर ॥ २४ गणेश्वर एक हाथमें अनिके सदृश त्रिशूल, दूसरे हाथमें । धनुष, तीसरे हाथमें बाण और चौथे हाथमें गदा लेकर ॥ २५ | उनकी ओर दौड़ पड़े ॥ २१ - २५ ॥
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अध्याय ४ ] विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष
ततश्चतुर्भुजं दृष्ट्वा धर्मराजो गणेश्वरम् ।
तस्थावष्टभुजो भूत्वा नानायुधधरोऽव्ययः ॥ २६ ।
खड्गचर्मगदाप्रासपरश्वधवराङ्कुशैः I चापमार्गणभृत्तस्थौ हन्तुकामो गणेश्वरम् ॥ २७
गणेश्वरोऽपि संक्रुद्धो हन्तुं धर्मं सनातनम् ।
ववर्ष मार्गणांस्तीक्ष्णान् यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २८
तावन्योन्यं महात्मानौ शरचापधरौ मुने ।
रुधिरारुणसिक्ताङ्गौ किंशुकाविव रेजतुः ॥ २ ९
वरास्त्रैर्गणनायकेन जितः स धर्मः तरसा प्रसह्य । पराङ्मुखोऽभूद्विमना मुनीन्द्र स वीरभद्रः प्रविवेश यज्ञम् ॥ ३०
यज्ञवाटं प्रविष्टं तं वीरभद्रं गणेश्वरम् ।
दृष्ट्वा तु सहसा देवा उत्तस्थुः सायुधा मुने ॥ ३१ ।
वसवोऽष्टौ महाभागा ग्रहा नव सुदारुणाः ।
इन्द्राद्या द्वादशादित्या रुद्रास्त्वेकादशैव हि ॥ ३२
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च सिद्धगन्धर्वपन्नगाः ।
यक्षाः किंपुरुषाश्चैव खगाश्चक्रधरास्तथा ॥ ३३
राजा वैवस्वताद् वंशाद् धर्मकीर्तिस्तु विश्रुतः ।
सोमवंशोद्भवश्चोग्रो भोजकीर्तिर्महाभुजः ॥ ३४
दितिजा दानवाश्चान्ये येऽन्ये तत्र समागताः ।
ते सर्वेऽभ्यद्रवन् रौद्रं वीरभद्रमुदायुधाः ॥ ३५
तानापतत एवाशु चापबाणधरो गणः ।
अभिदुद्राव वेगेन सर्वानेव शरोत्करैः ॥ ३६ ।
ते शस्त्रवर्षमतुलं गणेशाय समुत्सृजन् ।
गणेशोऽपि वरास्त्रैस्तान् प्रचिच्छेद बिभेद च ॥ ३७
शरैः शस्त्रैश्च सततं वध्यमाना महात्मना ।
वीरभद्रेण देवाद्या अवहारमकुर्वत ॥ ३८ ।
ततो विवेश गणपो यज्ञमध्यं सुविस्तृतम् ।
जुह्वाना ऋषयो यत्र हवींषि प्रवितन्वते ॥ ३ ९ ।
यज्ञकी वार्ता एवं सतीका प्राण त्याग २३ इसके बाद धर्मराजने चतुर्भुज गणेश्वरको देख और नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे सज्जित हो तथा आठ भुजाओंको धारणकर उनका सामना किया और गणोंके स्वामी वीरभद्रपर प्रहार करनेकी इच्छासे वे अपने हाथोंमें ढाल, तलवार, गदा, भाला, फरसा, अंकुश, धनुष एवं बाण लेकर खड़े हो गये । गणेश्वर वीरभद्र भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर धर्मको मारनेके लिये वर्षाकालिक मेघके सदृश उनके ऊपर तीक्ष्ण बाणोंकी वर्षा करने लगे । मुने! धनुषको लिये रुधिरसे लथपथ ( अतएव ) लाल शरीरवाले वे दोनों महात्मा पलाश - पुष्पके समान दीखने लगे ॥ २६-२९ ॥ मुनिराज! इसके बाद श्रेष्ठ शस्त्रास्त्रोंके कारण वीरभद्रसे पराजित होकर धर्मराज खिन्न होकर पीछे हट गये । इधर वीरभद्र यज्ञशालामें घुस गये । मुने! गणेश्वर वीरभद्रको यज्ञमण्डपमें घुसते देखकर सहसा सभी देवता अस्त्र - शस्त्र लेकर उठ खड़े हुए । महाभाग आठों वसु, अत्यन्त दारुण नवों ग्रह, इन्द्र आदि दिक्पाल, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, विश्वेदेव, साध्यगण, सिद्ध, गन्धर्व, पन्नग, यक्ष, किंपुरुष, महाबाहु, विहंगम, चक्रधर, वैवस्वत - वंशीय प्रसिद्ध राजा धर्मकीर्ति, चन्द्रवंशीय महाबाहु, उग्र बलशाली राजा भोजकीर्ति, दैत्य - दानव तथा वहाँ आये हुए अन्य सभी लोग आयुध लेकर रौद्र वीरभद्रकी ओर दौड़ पड़े॥३०–३५ ॥ धनुष - बाण धारण किये गणोंने उन देवताओंके आते ही उनपर वेगपूर्वक शस्त्रोंद्वारा आक्रमण कर दिया । इधर देवताओंने भी वीरभद्रके ऊपर अतुलनीय बाणोंकी वर्षा की । गणनायक वीरभद्रने देवताओंके अस्त्रोंको छिन्न - भिन्न कर डाला । महात्मा वीरभद्रद्वारा विविध बाणों और अस्त्रोंसे आहत होकर देवता आदि रणभूमिसे भाग चले । तब गणपति वीरभद्र सुविस्तृत यज्ञके मध्यमें प्रविष्ट हुए जहाँ मुनिगण यज्ञकुण्डमें हविकी आहुति दे रहे थे॥३६–३९ ॥
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२४
ततो महर्षयो दृष्ट्वा मृगेन्द्रवदनं गणम् ।
भीता होत्रं परित्यज्य जग्मुः शरणमच्युतम् ॥
तानाश्चक्रभृद् दृष्ट्वा महर्षींस्त्रस्तमानसान् ।
न भेतव्यमितीत्युक्त्वा समुत्तस्थौ वरायुधः ॥
समानम्य ततः शार्ङ्ग शरानग्निशिखोपमान् ।
मुमोच वीरभद्राय कायावरणदारणान् ॥
ते तस्य कायमासाद्य अमोघा वै हरेः शराः ।
निपेतुर्भुवि भग्नाशा नास्तिकादिव याचकाः ॥
शरांस्त्वमोघान्मोघत्वमापन्नान्वीक्ष्य केशवः ।
दिव्यैरस्त्रैर्वीरभद्रं प्रच्छादयितुमुद्यतः ॥
तानस्त्रान् वासुदेवेन प्रक्षिप्तान् गणनायकः ।
वारयामास शूलेन गदया मार्गर्णैस्तथा ॥
दृष्ट्वा विपन्नान्यस्त्राणि गदां चिक्षेप माधवः । त्रिशूलेन समाहत्य पातयामास भूतले
मुशलं वीरभद्राय प्रचिक्षेप हलायुधः ।
लाङ्गलं च गणेशोऽपि गदया प्रत्यवारयत् ॥
मुशलं सगदं दृष्ट्वा लाङ्गलं च निवारितम् । वीरभद्राय चिक्षेप चक्रं क्रोधात् खगध्वजः तमापतन्तं सूर्यकल्पं सुदर्शनं वीक्ष्य गणेश्वरस्तु शूलं परित्यज्य जग्राह चक्रं यथा मधुं मीनवपुः सुरेन्द्रः चक्रे निगीर्णे गणनायकेन क्रोधातिरक्तोऽसितचारुनेत्रः मुरारिरभ्येत्य गणाधिपेन्द्र-मुत्क्षिप्य वेगाद् भुवि निष्पिपेष हरिबाहूरुवेगेन विनिष्पिष्टस्य भूतले सहितं रुधिरोद्गारैर्मुखाच्चक्रं विनिर्गतम् ॥ ततो निःसृतमालोक्य चक्रं कैटभनाशनः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४ तब वे महर्षि सिंहमुख वीरभद्रको देखकर भयसे ४० हवन छोड़कर विष्णुकी शरणमें चले गये । चक्रधारी विष्णुने भयभीत महर्षियोंको दुःखी देखकर ' डरो मत ' ऐसा कहकर अपने श्रेष्ठ अस्त्र लेकर खड़े हो गये और ४१ | अपने शार्ङ्ग धनुषको चढ़ाकर वीरभद्रके ऊपर शरीरको विदीर्ण करनेवाले अग्रिशिखाके तुल्य बाणोंकी वर्षा करने लगे । पर श्रीहरिके वे अमोघ ( सफल ) बाण ४२ | वीरभद्रके शरीरपर पहुँचकर भी पृथ्वीपर ऐसे ( यों ही व्यर्थ होकर ) गिर पड़े, जैसे कि याचक नास्तिकके पाससे ४३ विफल - निराश होकर लौट जाते हैं ॥ ४०–४३ ॥ अपने ( अव्यर्थ ) बाणोंको व्यर्थ होते देखकर भगवान् ४४ विष्णु पुनः वीरभद्रको दिव्य अस्त्रोंसे ढक देनेके लिये तैयार हो गये । वासुदेवके द्वारा प्रयुक्त उन बाणोंको ४५ गणश्रेष्ठ वीरभद्र शूल, गदा और बाणोंसे रोककर विफल कर दिया । भगवान् विष्णुने अपने अस्त्रोंको नष्ट होते देखकर उसपर कौमोदकी गदा फेंकी । किंतु वीरभद्रने ॥ ४६ उसे भी अपने त्रिशूलसे काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया । हलायुध वीरभद्रकी ओर मूसल और हल फेंका जिसे ४७ वीरभद्रने गदासे निवारित कर दिया । गदाके सहित मूसल और हलको नष्ट हुआ देखकर गरुडध्वज विष्णुने क्रोध ॥ ४८ वीरभद्रके ऊपर सुदर्शनचक्र चला दिया ॥ ४४–४८ ॥ गणेश्वर वीरभद्रने सैकड़ों सूर्यके सदृश सुदर्शन । चक्रको अपनी ओर आते देखा तो शूलको छोड़कर चक्रको वह ऐसे निगल लिया जैसे मीनशरीरधारी विष्णु ॥ ४ ९ मधुदैत्यको निगल गये थे । वीरभद्रद्वारा चक्रके निगल लिये जानेपर विष्णुके सुन्दर काले नेत्र क्रोधसे लाल 1 । हो गये । वे उसके निकट पहुँच गये और उसे वेगसे उठा लिया तथा पृथ्वीपर पटककर उसे पीसने लगे । ॥ ५० भगवान् विष्णुकी भुजाओं और जाँघोंके प्रबल वेगसे । भूतलमें पटके गये वीरभद्रके मुखसे रुधिरके फौहारेके ५१ साथ चक्र बाहर निकल आया । चक्रको मुखसे निकला । देखकर भगवान् विष्णुने उसे ले लिया और वीरभद्रको
समादाय हृषीकेशो वीरभद्रं मुमोच ह ॥ ५२ । छोड़ दिया ॥ ४ ९ –५२ ॥
हृषीकेशेन मुक्तस्तु वीरभद्रो जटाधरम् । भगवान् विष्णुद्वारा छोड़ दिये जानेपर वीरभद्रने गत्वा निवेदयामास वासुदेवात्पराजयम् ॥ ५३ जटाधारी शिवके निकट जाकर वासुदेवसे हुई अपनी ततो जटाधरो दृष्ट्वा गणेशं शोणिताप्लुतम् । पराजयका वर्णन किया । फिर वीरभद्रको खूनसे लथ-निःश्वसन्तं यथा नागं क्रोधं चक्रे तदाव्ययः ॥ ५४ | पथ तथा सर्पके सदृश निःश्वास लेते देख अव्यय
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अध्याय ५ ] दक्ष - यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २५
ततः क्रोधाभिभूतेन वीरभद्रोऽथ शंभुना ।
पूर्वोद्दिष्टे तदा स्थाने सायुधस्तु निवेशितः ॥ ५५
वीरभद्रमथादिश्य भद्रकालीं च शंकरः ।
विवेश क्रोधताम्राक्षो यज्ञवाटं त्रिशूलभृत् ॥ ५६
ततस्तु aa जटाधरे त्रिशूलपाणौ त्रिपुरान्तकारिणि । दक्षस्य यज्ञं विशति क्षयंक जातो ऋषीणां प्रवरो हि साध्वसः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें जटाधर ( शंकर ) - ने क्रोध किया । इसके बाद क्रोधसे तिलमिलाये शंकरने अस्त्रसहित वीरभद्रको पहले बतलाये स्थानपर बैठा दिया । वे त्रिशूलधर शंकर वीरभद्र तथा भद्रकालीको आदेश देकर क्रोधसे लाल आँखें किये यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए । त्रिपुर नामक राक्षसको मारनेवाले उन त्रिशूलपाणि त्रिपुरारि देवश्रेष्ठ जटाधरके दक्ष यज्ञमें प्रवेश करते ही ऋषियोंमें भारी भय उत्पन्न हो गया ॥ ५३ - ५७ ॥ चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥४ ॥
पाँचवाँ अध्याय दक्ष - यज्ञका विध्वंस, देवताओंका प्रताड़न, शंकरके कालरूप और राश्यादि रूपोंमें स्वरूप कथन पुलस्त्य उवाच जटाधरं हरिर्दृष्ट्वा क्रोधादारक्तलोचनम् तस्मात् स्थानादपाक्रम्य कुब्जाग्रेऽन्तर्हितः स्थितः वसवोऽष्टौ हरं दृष्ट्वा सुस्रुवुर्वेगतो मुने सा तु जाता सरिच्छ्रेष्ठा सीता नाम सरस्वती एकादश तथा रुद्रास्त्रिनेत्रा वृषकेतनाः कान्दिशीका लयं जग्मुः समभ्येत्यैव शंकरम् विश्वेऽश्विनौ च साध्याश्च मरुतोऽनलभास्कराः समासाद्य पुरोडाशं भक्षयन्तो महामुने चन्द्रः सममृक्षगणैर्निशां समुपदर्शयन् उत्पत्यारुह्य गगनं स्वमधिष्ठानमास्थितः कश्यपाद्याश्च ऋषयो जपन्तः शतरुद्रियम् । पुष्पाञ्जलिपुटा भूत्वा प्रणताः संस्थिता मुने असकृद् दक्षदयिता दृष्ट्वा रुद्रं बलाधिकम् । शक्रादीनां सुरेशानां कृपणं विललाप ह ततः क्रोधाभिभूतेन शंकरेण महात्मना तल प्रहारैरमरा बहवो विनिपातिताः पुलस्त्यजी बोले – जटाधारी भगवान् शिवको । क्रोधसे आँखें लाल किये देखकर भगवान् विष्णु उस ॥ १ स्थानसे हटकर कुब्जाग्र ( ऋषिकेश ) - में छिप गये । मुने! । क्रुद्ध शिवको देखकर आठ वसु तेजीसे पिघलने लगे । ॥ २ इस कारण वहाँ सीता नामकी श्रेष्ठ नदी प्रवाहित हुई । वहाँ पूजाके लिये स्थित त्रिनेत्रधारी ग्यारहों रुद्र भयके । मारे इधर - उधर भागते हुए शंकरके निकट जाकर उनमें ॥ ३ ही लीन हो गये । महामुनि नारद! शंकरको निकट आते । देख विश्वेदेवगण, अश्विनीकुमार, साध्यवृन्द, वायु, अग्नि ॥ ४ एवं सूर्य पुरोडाश खाते हुए भाग गये ॥ १–४ ॥ । फिर तो ताराओंके साथ चन्द्रमा रात्रिको प्रकाशित ॥ ५ करते हुए आकाशमें ऊपर जाकर अपने स्थानपर स्थित हो गये । इधर कश्यप आदि ऋषि शतरुद्रिय ( मन्त्र ) -॥ ६ का जप करते हुए अञ्जलिमें पुष्प लेकर विनीतभावसे खड़े हो गये । इन्द्रादि सभी देवताओंसे अधिक बली रुद्रको देखकर दक्ष पत्नी अत्यन्त दीन होकर ॥७ बार - बार करुण विलाप करने लगी । इधर क्रुद्ध भगवान् । शंकरने थप्पड़ोंके प्रहारसे अनेक देवताओंको मार ॥ ८ | गिराया ॥ ५–८ ॥
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२६ पादप्रहारैरपरे त्रिशूलेनापरे मुने दृष्ट्यग्निना तथैवान्ये देवाद्याः प्रलयीकृताः
ततः पूषा हरं वीक्ष्य विनिघ्नन्तं सुरासुरान् ।
क्रोधाद् बाहू प्रसार्याथ प्रदुद्राव महेश्वरम् ॥
तमापतन्तं भगवान् संनिरीक्ष्य त्रिलोचनः ।
बाहुभ्यां प्रतिजग्राह करेणैकेन शंकरः ॥
कराभ्यां प्रगृहीतस्य शंभुनांशुमतोऽपि हि ।
कराङ्गुलिभ्यो निश्चेरुरसृग्धाराः समन्ततः ॥
ततो वेगेन महता अंशुमन्तं दिवाकरम् ।
भ्रामयामास सततं सिंहो मृगशिशुं यथा ॥
भ्रामितस्यातिवेगेन नारदांशुमतोऽपि हि ।
भुजौ ह्रस्वत्वमापन्नौ त्रुटितस्त्रायुबन्धनौ ॥
रुधिराप्लुतसर्वाङ्गमंशुमन्तं महेश्वरः । संनिरीक्ष्योत्ससर्जेनमन्यतोऽभिजगाम ह ।
ततस्तु पूषा विहसन् दशनानि विदर्शयन् ।
प्रोवाचैह्येहि कापालिन् पुनः पुनरथेश्वरम् ॥
ततः क्रोधाभिभूतेन पूष्णो वेगेन शंभुना ।
मुष्टिनाहत्य दशनाः पातिता धरणीतले ॥
भग्नदन्तस्तथा पूषा शोणिताभिप्लुताननः ।
पपात भुवि निःसंज्ञो वज्राहत इवाचलः ॥
भगोऽभिवीक्ष्य पूषाणं पतितं रुधिरोक्षितम् ।
नेत्राभ्यां घोररूपाभ्यां वृषध्वजमवैक्षत ॥
त्रिपुरघ्नस्ततः क्रुद्धस्तलेनाहत्य चक्षुषी ।
निपातयामास भुवि क्षोभयन् सर्वदेवताः ॥
ततो दिवाकराः सर्वे पुरस्कृत्य शतक्रतुम् ।
मरुद्भिश्च हुताशैश्च भयाज्जग्मुर्दिशो दश ॥
प्रतियातेषु देवेषु प्रह्लादाद्या दितीश्वराः । श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५ । मुने! शंकरने इसी प्रकार कुछ देवताओंको पैरोंके ॥ ९ प्रहारसे, कुछको त्रिशूलसे और कुछको अपने तृतीय नेत्रकी अग्निद्वारा नष्ट कर दिया । उसके बाद देवों एवं असुरोंका १० संहार करते हुए शंकरको देखकर पूषादेवता ( अन्यतम सूर्य ) क्रोधपूर्वक दोनों बाँहोंको फैलाकर शिवजीकी ओर दौड़े । त्रिलोचन शिवने उन्हें अपनी ओर आते देख एक ११ ही हाथसे उनकी दोनों भुजाओंको पकड़ लिया । शिवद्वारा सूर्यके पकड़ी गयी दोनों भुजाओंकी अङ्गुलियोंसे चारों १२ ओर रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी॥९ –१२ ॥ फिर भगवान् शिव दिवाकर सूर्यदेवको अत्यन्त १३ वेगसे ऐसे घुमाने लगे जैसे सिंह हिरण - शावकको घुमाता ( दौड़ाता है । नारदजी! अत्यन्त वेगसे घुमाये गये १४ सूर्यकी भुजाओंके स्नायुबन्ध टूट गये और वे ( स्नायुएँ ) बहुत छोटी - नष्टप्राय हो गयीं । सूर्यके सभी अङ्गोंको रक्तसे लथपथ देखकर उन्हें छोड़कर शंकरजी दूसरी १५ । ओर चले गये । उसी समय हँसते एवं दाँत दिखलाते हुए पूषा देवता ( बारह आदित्योंमेंसे एक सूर्य ) कहने लगे-१६ ओ कपालिन्! आओ, इधर आओ ॥ १३–१६ ॥ इसपर क्रुद्ध रुद्रने वेगपूर्वक मुक्केसे मारकर पूषा १७ दाँतोंको धरतीपर गिरा दिया । इस प्रकार दाँत टूटने एवं | रक्तसे लथपथ होकर पूषा देवता वज्रसे नष्ट हुए पर्वत समान बेहोश होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । इस प्रकार गिरे १८ हुए पूषाको रुधिरसे लथपथ देखकर भग देवता ( तृतीय सूर्यभेद ) भयंकर नेत्रोंसे शिवजीको देखने लगे । इससे १ ९ क्रुद्ध त्रिपुरान्तक शिवने सभी देवताओंको क्षुब्ध करते हुए हथेलीसे पीटकर भगकी दोनों आँखें पृथ्वीपर २० गिरा दीं ॥ १७ - २० ॥ फिर क्या था? सभी दसों सूर्य इन्द्रको आगे कर २१ मरुद्गणों तथा अग्नियोंके साथ भयसे दसों दिशाओंमें भाग गये । मुने! देवताओंके चले जानेपर प्रह्लाद आदि नमस्कृत्य ततः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयो मुने ॥ २२ दैत्य महेश्वरको प्रणामकर अञ्जलि बाँधकर खड़े हो गये । | इसके बाद शंकर उस यज्ञमण्डपको तथा सभी देवासुरोंको ततस्तं यज्ञवाटं तु शंकरो घोरचक्षुषा । । दग्ध करनेके लिये क्रोधपूर्ण घोर दृष्टिसे देखने लगे । इधर ददर्श दग्धुं कोपेन सर्वांश्चैव सुरासुरान् ॥ २३ दूसरे वीर महादेवको देखकर भयसे जहाँ - तहाँ छिप ततो निलियिरे वीराः प्रणेमुर्दुद्रुवुस्तथा । गये । कुछ लोग प्रणाम करने लगे, कुछ भाग गये और भयादन्ये हरं दृष्ट्वा गता वैवस्वतक्षयम् ॥ २४ | कुछ तो भयसे ही सीधे यमपुरी पहुँच गये ॥ २१–२४ ॥
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अध्याय ५ ] दक्ष यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २७ त्रयोऽग्नयस्त्रिभिर्नेत्रैर्दुःसहं समवैक्षत दृष्टमात्रास्त्रिनेत्रेण भस्मीभूताभवन् क्षणात् ॥ अग्नौ प्रणष्टे यज्ञोऽपि भूत्वा दिव्यवपुर्मृगः दुद्राव विक्लवगतिर्दक्षिणासहितोऽम्बरे तमेवानुससारेशश्चापमानम्य वेगवान् शरं पाशुपतं कृत्वा कालरूपी महेश्वरः अर्द्धन यज्ञवाटान्ते जटाधर इति श्रुतः अर्द्धन गगने शर्वः कालरूपी च कथ्यते नारद उवाच कालरूपी त्वयाख्यातः शंभुर्गगनगोचरः लक्षणं च स्वरूपं च सर्वं व्याख्यातुमर्हसि पुलस्त्य उवाच स्वरूपं त्रिपुरघ्नस्य वदिष्ये कालरूपिणः येनाम्बरं मुनिश्रेष्ठ व्याप्तं लोकहितेप्सुना यत्राश्विनी च भरणी कृत्तिकायास्तथांशकः मेषो राशिः कुजक्षेत्रं तच्छिरः कालरूपिणः
आग्नेयांशास्त्रयो ब्रह्मन् प्राजापत्यं कवेर्गृहम् ।
सौम्यार्द्ध वृषनामेदं वदनं परिकीर्तितम् ॥
मृगार्द्धमार्द्रादित्याशांस्त्रयः सौम्यगृहं त्विदम् ।
मिथुनं भुजयोस्तस्य गगनस्थस्य शूलिनः ॥
आदित्यांशश्च पुष्यं च आश्लेषा शशिनो गृहम् ।
राशिः कर्कटको नाम पार्श्वे मखविनाशिनः ॥
पित्र्यर्क्ष भगदैवत्यमुत्तरांशश्च केसरी ।
सूर्यक्षेत्रं विभोर्ब्रह्मन् हृदयं परिगीयते ॥
उत्तरांशास्त्रयः पाणिश्चित्रार्थं कन्यका त्वियम् ।
सोमपुत्रस्य सद्यैतद् द्वितीयं जठरं विभोः ॥
चित्रांशद्वितयं स्वातिर्विशाखायांशकत्रयम् ।
द्वितीयं शुक्रसदनं तुला नाभिरुदाहृता ॥
। फिर भगवान् शिवने अपने तीनों नेत्रोंसे तीनों २५ अग्नियों ( आहवनीय, गार्हपत्य और शालाग्नियों ) -को देखा । उनके देखते ही वे अग्रियाँ क्षणभरमें नष्ट हो । गयीं । उनके नष्ट होनेपर यज्ञ भी मृगका शरीर धारण ॥ २६ कर आकाशमें दक्षिणाके साथ तीव्रगति से भाग गया । कालरूपी वेगवान् भगवान् शिव धनुषको झुकाकर ॥। २७ उसपर पाशुपत बाण संधानकर उस मृगके पीछे दौड़े और आधे रूपसे तो यज्ञशालामें स्थित हुए जिनका नाम । ' जटाधर ' पड़ा । इधर आधे दूसरे रूपसे वे आकाशमें ॥ २८ स्थित होकर ' काल ' कहलाये ॥ २५–२८ ॥ नारदजी बोले – ( मुने! ) आपने आकाशमें स्थित । शिवको कालरूपी कहा है । आप उनके सम्पूर्ण स्वरूप ॥ २ ९ और लक्षणोंकी भी व्याख्या कर दें ॥ २ ९ ॥ पुलस्त्यजीने कहा - मुनिवर! मैं त्रिपुरको । मारनेवाले कालरूपी उन शंकरके स्वरूपको ( वास्तविक रूपको ) बतलाता हूँ । उन्होंने लोककी भलाई की ॥ ३० इच्छासे ही आकाशको व्याप्त किया है । सम्पूर्ण । अश्विनी तथा भरणी नक्षत्र एवं कृत्तिकाके एक चरणसे ॥ ३१ युक्त भौमका क्षेत्र मेष राशि ही कालरूपी महादेवका सिर कही गयी है । ब्रह्मन्! इसी प्रकार कृत्तिका तीन चरण, सम्पूर्ण रोहिणी नक्षत्र एवं मृगशिराके दो ३२ चरण, यह शुक्रकी वृष राशि ही उनका मुख है । मृगशिराके शेष दो चरण, सम्पूर्ण आर्द्रा और पुनर्वसुके तीन चरण बुधकी ( प्रथम ) स्थितिस्थान मिथुन राशि ३३ । आकाशमें स्थित शिवकी दोनों भुजाएँ हैं ॥ ३०–३३ ॥ इसी प्रकार पुनर्वसुका अन्तिम चरण, सम्पूर्ण पुष्य ३४ और आश्लेषा नक्षत्रोंवाला चन्द्रमाका क्षेत्र कर्क राशि यज्ञविनाशक शंकरके दोनों पार्श्व ( बगल ) हैं । ब्रह्मन्! सम्पूर्ण मघा, सम्पूर्ण पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनीका ३५ प्रथम चरण, सूर्यकी सिंह राशि शंकरका हृदय कही जाती है । उत्तराफाल्गुनीके तीन चरण, सम्पूर्ण हस्त नक्षत्र ३६ एवं चित्राके दो पहले चरण, बुधकी द्वितीय राशि, कन्या राशि शंकरका जठर है । चित्राके शेष दो चरण, स्वातीके चारों चरण एवं विशाखाके तीन चरणोंसे युक्त शुक्रका ३७ दूसरा क्षेत्र तुला राशि महादेवकी नाभि है ॥ ३४-३७ ॥
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२८ विशाखांशमनूराधा ज्येष्ठा भौमगृहं त्विदम् । द्वितीयं वृश्चिको राशिर्में कालस्वरूपिणः
मूलं पूर्वोत्तरांशश्च देवाचार्यगृहं धनुः ।
ऊरुयुगलमीशस्य अमर प्रगीयते ॥
उत्तरांशास्त्रयो ऋक्षं श्रवणं मकरो मुने । धनिष्ठार्थं शनिक्षेत्रं जानुनी परमेष्ठिनः
धनिष्ठार्धं शतभिषा प्रौष्ठपद्यांशकत्रयम् ।
सौरेः सद्मापरमिदं कुम्भो ज च विश्रुते ॥
प्रौष्ठपद्यांशमेकं तु उत्तरा रेवती तथा । द्वितीयं जीवसदनं मीनस्तु चरणावुभौ एवं कृत्वा कालरूपं त्रिनेत्रो यज्ञं क्रोधान्मार्गणैराजघान । विद्धश्चासौ वेदनाबुद्धिमुक्तः खे संतस्थौ तारकाभिश्चिताङ्गः नारद उवाच राशयो गदिता ब्रह्मंस्त्वया द्वादश वै मम तेषां विशेषतो ब्रूहि लक्षणानि स्वरूपतः पुलस्त्य उवाच स्वरूपं तव वक्ष्यामि राशीनां शृणु नारद । यादृशा यत्र संचारा यस्मिन् स्थाने वसन्ति च मेषः समानमूर्तिश्च अजाविकधनादिषु । संचारस्थानमेवास्य धान्यरत्नाकरादिषु नवशाद्वलसंछन्नवसुधायां च सर्वशः नित्यं चरति फुल्लेषु सरसां पुलिनेषु च वृषः सदृशरूपो हि चरते गोकुलादिषु । तस्याधिवासभूमिस्तु कृषीवलधराश्रयः स्त्रीपुंसयोः समं रूपं शय्यासनपरिग्रहः । वीणावाद्यधृङ् मिथुनं गीतनर्तकशिल्पिषु स्थितः क्रीडारतिर्नित्यं विहारावनिरस्य तु मिथुनं नाम विख्यातं राशिद्वेधात्मकः स्थितः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५ विशाखाका एक चरण, सम्पूर्ण अनुराधा और ॥ ३८ ज्येष्ठा नक्षत्र, मङ्गलका द्वितीय क्षेत्र वृश्चिक राशि कालरूपी महादेवका उपस्थ है । सम्पूर्ण मूल, पूरा पूर्वाषाढ और उत्तराषाढकी प्रथम चरणवाली धनु राशि जो बृहस्पतिका ३ ९ क्षेत्र है, महेश्वरके दोनों ऊरु हैं । मुने! उत्तराषाढ़के शेष तीन चरण, सम्पूर्ण श्रवण नक्षत्र और धनिष्ठाके दो पूर्व चरणकी मकर राशि शनिका क्षेत्र और परमेष्ठी महेश्वरके ॥ ४० दोनों घुटने हैं । धनिष्ठाके दो चरण, सम्पूर्ण शतभिष और पूर्वभाद्रपदके तीन चरणवाली कुम्भ राशि शनिका ४१ द्वितीय गृह और शिवकी दो जंघाएँ हैं ॥ ३८ - ४१ ॥ पूर्वाभाद्रपदके शेष एक चरण, सम्पूर्ण उत्तरभाद्रपद ॥ ४२ और सम्पूर्ण रेवती नक्षत्रोंवाला बृहस्पतिका द्वितीय क्षेत्र एवं मीन राशि उनके दो चरण हैं । इस प्रकार कालरूप धारणकर शिवने क्रोधपूर्वक हरिणरूपधारी यज्ञको बाणोंसे मारा । उसके बाद बाणोंसे विद्ध होकर, किंतु वेदनाकी अनुभूति न करता हुआ, वह यज्ञ ताराओंसे घिरे ॥ ४३ शरीरवाला होकर आकाशमें स्थित हो गया ॥ ४२-४३ ॥ नारदजीने कहा – ब्रह्मन्! आपने मुझसे बारहों । राशियों का वर्णन किया । अब विशेषरूपसे उनके ॥ ४४ स्वरूपके अनुसार लक्षणोंको बतलायें ॥ ४४ ॥
पुलस्त्यजी बोले – नारदजी! आपको मैं राशियोंका स्वरूप बतलाता हूँ; सुनिये । वे जैसी हैं तथा जहाँ संचार और निवास करती हैं वह सभी ॥ ४५ वर्णित करता हूँ । मेष राशि भेड़के समान आकारवाली है । बकरी, भेड़, धन - धान्य एवं रत्नाकरादि इसके ॥ ४६ संचार - स्थान हैं तथा नवदुर्वासे आच्छादित समग्र पृथ्वी । एवं पुष्पित वनस्पतियोंसे युक्त सरोवरोंके पुलिनोंमें ॥ ४७ यह नित्य संचरण करती है । वृषभके समान रूपयुक्त वृषराशि गोकुलादिमें विचरण करती है तथा कृषकों की ॥ ४८ भूमि इसका निवास स्थान है ॥ ४५ - ४८ ॥ मिथुन राशि एक स्त्री और एक पुरुषके साथ - साथ ॥ ४ ९ रहनेके समान रूपवाली है । यह शय्या और आसनोंपर स्थित है । पुरुष - स्त्रीके हाथोंमें वीणा एवं ( अन्य ) वाद्य हैं । इस राशिका संचरण गानेवालों, नाचनेवालों । एवं शिल्पियोंमें होता है । इस द्विस्वभाव राशिको ॥ ५० । मिथुन कहते हैं । इस राशिका निवास क्रीडास्थल एवं