वामन पुराण — पृष्ठ 341–350

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350

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अध्याय ६८ ] भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश ३३१ हत्वा कुजम्भं मुसलेन नन्दी वज्रेण वीरः शतशो जघान । ते वध्यमाना गणनायकेन दुर्योधनं वै शरणं प्रपन्नाः ॥ दुर्योधनः प्रेक्ष्य गणाधिपेन वज्रप्रहारैर्निहतान् दितीशान् । प्रासं समाविध्य प्रकाश नन्दिं प्रचिक्षेप हतोऽसि वै ब्रुवन् ॥ तमापतन्तं कुलिशेन नन्दी बिभेद गुह्यं पिशुनो यथा नरः । तत्प्रासमालक्ष्य तदा निकृत्तं संवर्त्य मुष्टिं गणमाससाद ॥ ततोऽस्य नन्दी कुलिशेन तूर्णं शिरोऽच्छिनत् तालफलप्रकाशम् । हतोऽथ भूमौ निपपात वेगाद् दैत्याश्च भीता विगता दिशो दश ॥ ततो हतं स्वं तनयं निरीक्ष्य हस्ती तदा नन्दिनमाजगाम । प्रगृह्य बाणासनमुग्रवेगं बिभेद बाणैर्यमदण्डकल्पैः ॥ गणान् सनन्दीन् वृषभध्वजांस्तान् धाराभिरेवाम्बुधरास्तु शैलान् । ते छाद्यमानासुरबाणजालै-विनायकाद्या बलिनो ऽपि वीराः । सिंहप्रणुन्ना वृषभा यथैव भयातुरा दुगुविरे समन्तात् ॥ पराङ्मुखान् वीक्ष्य गणान् कुमारः शक्त्या पृषत्कानथ वारयित्वा । तूर्णं समभ्येत्य रिपुं समीक्ष्य प्रगृह्य शक्त्या हृदये बिभेद ॥

शक्तिनिर्भिन्नहृदयो हस्ती भूम्यां पपात ह ।

ममार चारिपृतना जाता भूयः पराङ्मुखी ॥

अमरारिबलं दृष्ट्वा भग्नं क्रुद्धा गणेश्वराः ।

पुरतो नन्दिनं कृत्वा जिघांसन्ति स्म दानवान् ॥

वध्यमानाः प्रमथैर्दैत्याश्चापि पराङ्मुखाः ।

भूयो निवृत्ता बलिनः कार्त्तस्वरपुरोगमाः ॥

तान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन् ।

नन्दिषेणो व्याघ्रमुखो निवृत्तश्चापि वेगवान् ॥

वीर नन्दीने कुजम्भको मुसलसे मारकर वज्रद्वारा सैकड़ों दानवोंको भी मार डाला । गणनायकद्वारा मारे जा रहे वे सभी दानव दुर्योधनकी शरणमें गये । दुर्योधनने ४५ गणाधिपद्वारा वज्रके आघातसे दैत्योंको मारा हुआ देखकर बिजलीके सदृश प्रकाशसे युक्त प्रास ले लिया तथा ' तुम मारे गये ' ऐसा कहते हुए उसे नन्दीकी ओर ४६ फेंका । नन्दीने आ रहे उस ( प्रास ) - को वज्रसे इस प्रकार टुकड़े - टुकड़े काट दिया, जैसे चुगलखोर व्यक्ति गुप्त विषयका भेदन कर देता है । उसके बाद उस प्रासको विदीर्ण हुआ देख ( दुर्योधन ) मुट्ठी बाँधकर गण ४७ ( नन्दी ) - के पास पहुँचा । उसके बाद ही नन्दीने शीघ्रता से तालके समान उसके मस्तकको कुलिशसे काट डाला । मारे जानेपर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा और भयभीत हुए ४८ । सभी दैत्य तेजीसे दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ४५-४८ ॥ हस्ती ( नामक असुर ) अपने पुत्रको मारा गया देखकर नन्दीके समीप आ गया । उसने धनुष लेकर तीव्र वेगसे यमदण्डके समान बाणोंसे वार किया । ४ ९ बादल जिस प्रकार जलकी धाराओंसे पर्वतोंको ढँक लेता है, उसी प्रकार उसने नन्दीके साथ वृषभध्वजके उन गणोंको ढँक दिया । असुरके बाणसमूहसे घिरे वे विनायक आदि बलशाली वीर सिंहके द्वारा आक्रमण किये जानेपर वृषभोंकी भाँति भयसे व्याकुल होकर ५० चारों ओर भागने लगे । कुमारने गणोंको विमुख होते देख शक्तिद्वारा बाणोंको रोक दिया और तुरन्त ही शत्रुके पास पहुँचकर शक्तिसे उसके हृदयको बेध डाला । ५१ शक्तिसे हृदयके बिंध जानेपर हस्ती भूमिपर गिर पड़ा तथा मर गया और शत्रुसेना फिर पीठ दिखाकर विमुख ५२ हो गयी । दैत्यसेनाको छिन्न - भिन्न हुई देखकर कुपित ५३ हुए गणेश्वर नन्दीको आगे कर दानवोंको और मारने लगे; किंतु प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे सभी विमुख ५४ बलशाली कार्त्तस्वरादि दैत्य फिर लौट पड़े ॥ ४ ९ - ५४ ॥ उन्हें लौटकर आते देख वेगशाली व्याघ्रमुख ५५ | नन्दिषेण भी क्रोधसे आँखें लाल कर हाँफता हुआ लौट

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३३२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६८ तस्मिन् निवृत्ते गणपे पट्टिशाग्रकरे तदा । पड़ा । नारदजी! उसके बाद हाथके अग्रभागमें पट्टिश कार्त्तस्वरो निववृते गदामादाय नारद ॥ ५६ लिये हुए उस गणाधिपके लौटनेपर कार्त्तस्वर भी गदा तमापतन्तं ज्वलनप्रकाशं लेकर लौट पड़ा । अग्निके समान प्रकाशवाले उस गणः समीक्ष्यैव महासुरेन्द्रम् । तं पट्टिशं भ्राम्य जघान मूर्ध्नि महासुरेन्द्रको आते देखकर गणपतिने पट्टिश घुमाकर कार्त्तस्वरं विस्वरमुन्नदन्तम् ॥५७ उसके मस्तकपर मारा । कार्त्तस्वर चीत्कार करता हुआ तस्मिन् हते भ्रातरि मातुलेये पाशं समाविध्य तुरङ्गकन्धरः । बबन्ध वीरः सह पट्टिशेन गणेश्वरं चाप्यथ नन्दिषेणम् ॥ नन्दिषेणं तथा बद्धं समीक्ष्य बलिनां वरः । विशाखः कुपितोऽभ्येत्य शक्तिपाणिरवस्थितः तं दृष्ट्वा बलिनां श्रेष्ठः पाशपाणिरयः शिराः संयोधयामास बली विशाखं कुक्कुटध्वजम् मर गया । उस ममेरे भाईके मारे जानेपर वीर तुरङ्गकन्धरने पाशको लेकर पट्टिशके सहित नन्दिषेण गणेश्वरको बाँध लिया । नन्दिषेणको बँधा देखकर बलवानोंमें श्रेष्ठ ५८ विशाख क्रुद्ध होकर उसके पास गये और हाथमें शक्ति ॥ ५ ९ लिये हुए ( उसके सामने ) खड़े हो गये । उन्हें देखकर । बलवानोंमें श्रेष्ठ अयः शिरा हाथमें पाश लेकर कुक्कुटध्वज ॥ ६० विशाखके साथ संग्राम करने लगा ॥ ५५–६० ॥

विशाखं संनिरुद्धं वै दृष्ट्वाऽयः शिरसा रणे ।

शाखश्च नैगमेयश्च तूर्णमाद्रवतां रिपुम् ॥

एकतो नैगमेयेन भिन्नः शक्त्या त्वयः शिराः ।

एकतश्चैव शाखेन विशाखप्रियकाम्यया ॥

स त्रिभिः शङ्करसुतैः पीड्यमानो जहौ रणम् ।

ते प्राप्ताः शम्बरं तूर्णं प्रेक्ष्यमाणा गणेश्वराः ॥

पाशं शक्त्या समाहत्य चतुर्भिः शङ्करात्मजैः ।

जगाम विलयं तूर्णमाकाशादिव भूतलम् ॥

पाशे निराशतां याते शम्बरः कातरेक्षणः ।

दिशोऽथ भेजे देवर्षे कुमारः सैन्यमर्दयत् ॥

तैर्वध्यमाना पृतना महर्षे सा दानवी रुद्रसुतैर्गणैश्च । विषण्णरूपा भयविह्वलाङ्गी जगाम शुक्रं शरणं भयार्ता ॥ विशाखको अयः शिराके द्वारा युद्धमें घिरा हुआ ६१ देखकर शाख तथा नैगमेय नामके गण शीघ्रतासे शत्रुकी ओर दौड़ पड़े । विशाखको प्रसन्न करनेकी इच्छासे एक ६२ ओरसे नैगमेयने और दूसरी ओरसे शाखने शक्तिद्वारा अयःशिराको मारा । शंकरके तीनों पुत्रोंद्वारा ग्रस्त होनेपर ६३ । उस अय: शिराने युद्ध छोड़ दिया । वे गणेश्वर शम्बरको । देखकर शीघ्र ही उसके समीप पहुँचे । शम्बरने पाशको ६४ घुमाकर उनपर चलाया । शंकरके चार पुत्रोंने पाशपर वार किया, ( इससे वह पाश ) आकाशसे भूमिपर ६५ गिरकर नष्ट हो गया । पाशके नष्ट हो जानेपर भयभीत होकर शम्बर ( इधर - उधर ) दिशाओंमें भाग गया और कुमार सेनाको रौंदने लगे । महर्षे! उन रुद्र- पुत्रों एवं गणोंद्वारा मारी जा रही वह दानवी सेना दुःखी एवं भयसे ६६ व्याकुल होकर शुक्रकी शरणमें गयी ॥ ६१–६६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६८ ॥

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अध्याय ६ ९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश ३३३ उनहत्तरवाँ अध्याय शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि- दानव - युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ - देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव - वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास, पुनः दैत्य- देव और इन्द्र- जम्भ- युद्ध, मातलिका जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ - कुजम्भ - वध पुलस्त्य उवाच ततः स्वसैन्यमालक्ष्य निहतं प्रमथैरथ । अन्धकोऽभ्येत्य शुक्रं भगवंस्त्वां समाश्रित्य अथान्यानपि विप्रर्षे तदियं पश्य भगवन् अनाथेव यथा नारी कुजम्भाद्याश्च निहता अक्षयाः प्रमथाश्चामी तु इदं वचनमब्रवीत् ॥ १

वयं बाधाम देवताः ।

गन्धर्वसुरकिन्नरान् ॥ २

मया गुप्ता वरूथिनी ।

प्रमथैरपि काल्यते ॥ ३

भ्रातरो मम भार्गव ।

कुरुक्षेत्रफलं यथा ॥ ४

तस्मात् कुरुष्व श्रेयो नो न जयेम यथा परैः ।

जयेम च परान् युद्धे तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥ ५

शुक्रोऽन्धकवचः श्रुत्वा सान्त्वयन् परमाद्भुतम् ।

वचनं प्राह देवर्षे ब्रह्मर्षिदानवेश्वरम् ।

त्वद्धितार्थं यतिष्यामि करिष्यामि तव प्रियम् ॥ ६

इत्येवमुक्त्वा वचनं विद्यां संजीवनीं कविः ।

आवर्तयामास तदा विधानेन शुचिव्रतः ॥ ७

तस्यामावर्त्यमानायां विद्यायामसुरेश्वराः ।

ये हताः प्रथमं युद्धे दानवास्ते समुत्थिताः ॥ ८

कुजम्भादिषु दैत्येषु भूय एवोत्थितेष्वथ ।

युद्धायाभ्यागतेष्वेव नन्दी शङ्करमब्रवीत् ॥ ९

महादेव वचो मह्यं शृणु त्वं परमाद्भुतम् ।

अविचिन्त्यमसह्यं च मृतानां जीवनं पुनः ॥ १०

ये हताः प्रमथैर्दैत्या यथाशक्त्या रणाजिरे ।

समुज्जीविता भूयो भार्गवेणाथ विद्यया ॥ ११

तदिदं तैर्महादेव महत्कर्मकृतं रणे ।

संजातं स्वल्पमेवेश शुक्रविद्याबलाश्रयात् ॥ १२

पुलस्त्यजी बोले - ( नारदजी! ) उसके बाद अन्धकने अपनी सेनाको प्रमथोंद्वारा मारी गयी जान करके शुक्राचार्यके निकट जाकर यह वचन कहा – भगवन्! विप्रर्षे! हम आपके ही बलपर देवता, गन्धर्व, असुर, किन्नर एवं अन्य प्राणियोंको बाधित ( पराभूत ) करते हैं । परंतु भगवन्! आप देखिये कि मेरे द्वारा संरक्षित ( हमारी ) यह सेना अनाथिनी नारी - सी होकर प्रमथोंद्वारा कालके मुखमें भेजी जा रही है । भार्गव! कुजम्भ आदि मेरे भाई तो मारे गये और ये प्रमथगण ( अबतक ) कुरुक्षेत्रतीर्थ फलके सदृश अक्षय बने हुए हैं॥१-४ ॥ अतः आप हमलोगोंके लिये कल्याणका विधान करें, जिससे हमलोग शत्रुओंके द्वारा जीते न जायँ और ऐसा भी उपाय करें जिससे हमलोग युद्धमें दूसरोंको जीत सकें । देवर्षे! ब्रह्मर्षि शुक्राचार्यने अन्धककी बातको सुनकर दानवेश्वरको आश्वासन देते हुए उससे कहा- मैं तुम्हारे कल्याणके लिये उद्योग करूँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा । ऐसा कहकर पवित्र व्रतवाले शुक्राचार्यने विधानके अनुसार संजीवनी विद्याको प्रकट किया | उस विद्या प्रकट होनेपर युद्धमें पहले मारे गये ( सभी ) असुरेश्वर और दानव जी उठे ॥ ५–८ ॥ उसके बाद कुम्भ आदि दैत्योंके फिर उठ खड़े होने तथा युद्ध करनेके लिये उपस्थित होनेपर नन्दीने शंकरसे कहा - महादेव! आप मेरा अत्यन्त अद्भुत वचन सुनिये । मरे हुए लोगोंका फिर भी जी उठना कल्पनासे परे तथा असहनीय है । संग्राममें प्रमथोंने जिन दैत्योंको बलपूर्वक मारा था, उन्हें भार्गवने संजीवनी विद्याद्वारा पुनः जीवित कर दिया । अतः हे महादेव! हे ईश! उन सभीने युद्धमें जो उत्कृष्ट कार्य किया था, वह शुक्रकी विद्याके बलसे महत्त्वहीन । हो गया है - सबपर पानी फिर गया है ॥ ९ -१२ ॥

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इत्येवमुक्ते वचने नन्दिना कुलनन्दिना ।

प्रत्युवाच प्रभुः प्रीत्या स्वार्थसाधनमुत्तमम् ॥

गच्छ शुक्रं गणपते ममान्तिकमुपानय ।

अहं तं संयमिष्यामि यथायोगं समेत्य हि ॥

इत्येवमुक्तो रुद्रेण नन्दी गणपतिस्ततः ।

समाजगाम दैत्यानां चमूं शुक्रजिघृक्षया ॥

तं ददर्शासुरश्रेष्ठो बलवान् हयकन्धरः ।

संरुरोध तदा मार्गं सिंहस्येव पशुर्वने ॥

समुपेत्याहनन्नन्दी वज्रेण शतपर्वणा ।

स पपाताथ निःसंज्ञो ययौ नन्दी ततस्त्वरन् ॥

ततः कुम्भो जम्भश्च बलो वृत्रस्त्वयः शिराः ।

पञ्च दानवशार्दूला नन्दिनं समुपाद्रवन् ॥

तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयह्लादपुरोगमाः ।

नानाप्रहरणा युद्धे गणनाथमभिद्रवन् ॥

ततो गणानामधिपं कुट्यमानं महाबलैः ।

समपश्यन्त देवास्तं पितामहपुरोगमाः ॥

तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा प्राह शक्रपुरोगमान् ।

साहाय्यं क्रियतां शम्भोरेतदन्तरमुत्तमम् ॥

पितामहोक्तं वचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः ।

समापतन्त वेगेन शिवसैन्यमथाम्बरात् ॥

तेषामापततां वेगः प्रमथानां बले बभौ । आपगानां महावेगं पतन्तीनां महार्णवे ततो हलहलाशब्दः समजायत चोभयोः । बलयोर्घोरसंकाशो सुरप्रमथयोरथ तमन्तरमुपागम्य नन्दी संगृह्य वेगवान् । रथाद् भार्गवमाक्रामत् सिंहः क्षुद्र मृगं यथा तमादाय हराभ्याशमागमद् गणनायकः । निपात्य रक्षिणः सर्वानथ शुक्रं न्यवेदयत् तमानीतं कविं शर्वः प्राक्षिपद् वदने प्रभुः भार्गवं त्वावृततनुं जठरे स न्यवेशयत् ॥ स शम्भुना कविश्रेष्ठ ग्रस्तो जठरमास्थितः तुष्टाव भगवन्तं तं मुनिर्वाग्भिरथादरात् श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ ९ कुलको आनन्द देनेवाले नन्दीके इस प्रकार कहने पर १३ महादेवने स्नेहपूर्वक स्वार्थसिद्ध करनेवाला उत्तम वचन कहा - गणपते! तुम जाओ और शुक्रको मेरे समीप लिवा लाओ । ( फिर तो ) मैं उन्हें पाकर योगक्रियासे १४ संयमित कर दूँगा । रुद्रके ऐसा कहनेपर गणपति नन्दी शुक्राचार्यको पकड़ लानेकी कामनासे दैत्योंकी सेनामें १५ गये । हयकन्धर नामके बलवान् श्रेष्ठ असुरने उन्हें सेनामें आते हुए देखा और जिस प्रकार साधारण पशु ( दुस्साहससे ) वनमें सिंहका मार्ग रोक दे, उसी प्रकार उनके मार्गको १६ उसने रोका । नन्दीने समीप जाकर शतपर्व ( वज्र ) -से उसे मारा और वह अचेत होकर गिर पड़ा । उसके बाद १७ नन्दी तुरंत वहाँसे चल दिये ॥ १३-१७ ॥ उसके बाद कुम्भ, जम्भ, बल, वृत्र और अय शिरा : १८ नामके पाँच श्रेष्ठ दानव नन्दीकी ओर दौड़े । इसी प्रकार युद्धमें भाँति - भाँतिके अस्त्र - शस्त्रोंको धारण करनेवाले १ ९ मय एवं ह्लाद आदि दानवश्रेष्ठोंने भी नन्दीका पीछा किया । फिर पितामहादि देवोंने महाबली दानवोंके द्वारा कूटे जा २० रहे गणाधिपको देखा । भगवान् ब्रह्माने उसे देखकर इन्द्र आदि देवताओंसे कहा- आपलोग इस उत्तम ( उपयुक्त ) २१ अवसरपर शम्भुकी सहायता करें ॥ १८-२१ ॥ पितामहके कहे हुए वचनको सुनकर इन्द्र आदि २२ देवता आकाशमार्गसे जल्दी ही शिवकी सेनामें आ गये । समुद्रमें जाती हुई नदियोंके महावेगके सदृश प्रमथोंकी ॥ २३ सेनामें ( आकाशसे ) आते हुए देवताओंका वेग सुशोभित हुआ । उसके बाद प्रमथों और असुरों – दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें भीषण ‘ हलहला ' शब्द उत्पन्न हुआ । उसी ॥ २४ समय अवसर पाकर तीव्र गतिवाले नन्दी, जिस प्रकार सिंह क्षुद्र मृगको दबोच लेता है, उसी प्रकार भार्गवको ॥ २५ लेकर रथसे भाग चले । गणनायक उन्हें लेकर सभी रक्षा करनेवालोंको मारते हुए शंकरके पास पहुँच गये । ॥ २६ शुक्राचार्यको उन्होंने उनके निकट निवेदित कर दिया । समर्थ शंकरने लाये गये उन शुक्रको अपने मुखमें फेंका । और अक्षुण्ण शरीरवाले भार्गवको अपने उदरमें ( ज्यों-२७ का - त्यों ) रख लिया । शम्भुसे ग्रस्त होकर उनके उदरमें । स्थित हुए वे मुनिश्रेष्ठ शुक्र प्रेमपूर्वक उन भगवान्‌की ॥ २८ | स्तुति करने लगे॥२२–२८ ॥

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अध्याय ६ ९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश ३३५ शुक्र उवाच

वरदाय नमस्तुभ्यं हराय गुणशालिने ।

शङ्कराय महेशाय त्र्यम्बकाय नमो नमः ॥ २ ९

जीवनाय नमस्तुभ्यं लोकनाथ वृषाकपे ।

मदनाग्ने कालशत्रो वामदेवाय ते नमः ॥ ३०

स्थाणवे विश्वरूपाय वामनाय सदागते ।

महादेवाय शर्वाय ईश्वराय नमो नमः ॥ ३१

त्रिनयन हर भव शङ्कर उमापते जीमूतकेतो गुहागृहश्मशाननिरत भूतिविलेपन शूलपाणे पशुपते गोपते तत्पुरुषसत्तम नमो नमस्ते । इत्थं स्तुतः कविवरेण हरोऽथ भक्त्या प्रीतो वरं वरय दद्मि तवेत्युवाच । स प्राह देववर देहि वरं ममाद्य यद्वै तवैव जठरात् प्रतिनिर्गमोऽस्तु ॥ ३२ ततो हरोऽक्षीणि तदा निरुध्य प्राह द्विजेन्द्राद्य विनिर्गमस्व । इत्युक्तमात्रो विभुना चचार देवोदरे भार्गवपुङ्गवस्तु ॥ ३३

परिभ्रमन् ददर्शाथ शम्भोरेवोदरे कविः ।

भुवनार्णवपातालान् वृतान् स्थावरजङ्गमैः ॥ ३४

आदित्यान् वसवो रुद्रान् विश्वेदेवान् गणांस्तथा ।

यक्षान् किंपुरुषाद्यादीन् गन्धर्वाप्सरसां गणान् ॥ ३५

मुनीन् मनुजसाध्यांश्च पशुकीटपिपीलिकान् ।

वृक्षगुल्मान् गिरीन् वल्ल्यः फलमूलौषधानि च ॥ ३६

स्थलस्थांश्च जलस्थांश्चानिमिषान्निमिषानपि ।

चतुष्पदान् सद्विपदान् स्थावराञ् जङ्गमानपि ॥ ३७

अव्यक्तांश्चैव व्यक्तांश्च सगुणान्निर्गुणानपि ।

स दृष्ट्वा कौतुकाविष्टः परिबभ्राम भार्गवः ।

तत्रासतो भार्गवस्य दिव्यः संवत्सरो गतः ॥ ३८

न चान्तमलभद् ब्रह्मंस्ततः श्रान्तोऽभवत् कविः ।

स श्रान्तं वीक्ष्य चात्मानं नालभन्निर्गमं वशी ।

भक्तिनम्रो महादेवं शरणं समुपागमत् ॥ ३ ९ ।

शुक्रने कहा - प्रभो! गुणसे सम्पन्न आप वरदानी हरको नमस्कार है । शंकर, महेश, त्रिनेत्रको बार - बार । नमस्कार है । लोकोंके स्वामिन्! वृषाकपे! आप जीवनस्वरूपको नमस्कार है । हे कामदेवके लिये अग्निस्वरूप! कालशत्रो! आप वामदेवको नमस्कार है । स्थाणु, विश्वरूप, वामन, सदागति, महादेव, शर्व और । ईश्वर! आपको बार - बार नमस्कार है । हे त्रिनयन! हे हर! हे भव! हे शङ्कर! हे उमापते! हे जीमूतकेतो! हे गुहागृह! हे श्मशाननिरत! हे भूतिविलेपन! हे शूलपाणे! हे पशुपते! हे गोपते! हे श्रेष्ठ परमपुरुष! आपको बार - बार नमस्कार है । इस प्रकार कविवर ( शुक्राचार्य ) - के भक्तिपूर्वक स्तुति करनेपर शंकरने कहा – मैं तुमसे प्रसन्न हूँ । तुम वर माँगो; मैं तुम्हें वर दूँगा । उन्होंने कहा - हे देववर! इस समय मुझे यही वर दीजिये कि मैं पुनः आपके उदरसे बाहर निकलूँ । उसके बाद शंकरने नेत्रोंको बंदकर कहा – हे द्विजेन्द्र! अब तुम बाहर निकल जाओ! ( परंतु ) शंकरके इस प्रकार कहनेपर भी वे भार्गव श्रेष्ठ । शुक्राचार्य उनके उदरमें विचरण करने लगे ॥ २ ९ –३३ ॥ ( भगवान् शंकरके उदरमें ) विचरण करते हुए शुक्राचार्यने शंकरके ही उदरमें चराचर प्राणियोंसे व्याप्त सारा जगत्, समुद्र एवं पातालोंको देखा । आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, गणों, यक्षों, किम्पुरुषों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मुनियों, मनुष्यों, साध्यों, पशुओं, कीटों, पिपीलिकाओं, वृक्षों, गुल्मों, पर्वतों, लताओं, फलों, मूलों, ओषधियों, स्थलपर रहनेवालों, जलमें रहनेवालों, अनिमिषों, निमिषों, चतुष्पदों, द्विपदों, स्थावरों, जङ्गमों, अव्यक्तों, व्यक्तों, सगुणों एवं निर्गुणोंको देखते हुए कुतूहलवश ( उसी उदरमें ही ) भार्गव चारों ओर घूमने लगे । भृगुवंशी शुक्राचार्यको वहाँ इस प्रकार रहते हुए एक दिव्य वर्ष बीत गया । परंतु ब्रह्मन्! शुक्रको अन्त नहीं मिला और वे थक गये । स्वयंको थका हुआ देखकर और बाहर निकलनेका मार्ग न पाकर आत्माको वशमें करनेवाले वे भक्तिसे नम्र होकर महादेवकी शरणमें आ गये ॥ ३४–३९ ॥

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३३६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ ९ शुक्र उवाच

विश्वरूप महारूप विश्वरूपाक्षसूत्रधृक् ।

सहस्त्राक्ष महादेव त्वामहं शरणं गतः ॥

नमोऽस्तु ते शङ्कर शर्व शम्भो सहस्रनेत्राङ्घ्रिभुजङ्गभूषण दृष्ट्वैव सर्वान् भुवनांस्तवोदरे श्रान्तो भवन्तं शरणं प्रपन्नः ॥ इत्येवमुक्ते वचने महात्मा शम्भुर्वचः प्राह ततो विहस्य । निर्गच्छ पुत्रोऽसि ममाधुना त्वं शिश्नेन भो भार्गववंशचन्द्र ॥ नाम्ना तु शुक्रेति चराचरास्त्वां स्तोष्यन्ति नैवात्र विचारमन्यत् । इत्येवमुक्त्वा भगवान् मुमोच शिश्नेन शुक्रं स च निर्जगाम ॥ विनिर्गतो भार्गववंशचन्द्रः शुक्रत्वमापद्य महानुभावः । प्रणम्य शम्भुं स जगाम तूर्णं महासुराणां बलमुत्तमौजाः ॥

भार्गवे पुनरायाते दानवा मुदिताभवन् ।

पुनर्युद्धाय विदधुर्मतिं सह गणेश्वरैः ॥

गणेश्वरास्तानसुरान् सहामरगणैरथ ।

युयुधुः संकुलं युद्धं सर्व एव जयेप्सवः ॥

ततोऽसुरगणानां च देवतानां च युध्यताम् ।

द्वन्द्वयुद्धं समभवद् घोररूपं तपोधन ॥

अन्धको नन्दिनं युद्धे शङ्कुकर्णं त्वयः शिराः ।

कुम्भध्वजं बलिर्धीमान् नन्दिषेणं विरोचनः ॥

अश्वग्रीवो विशाखं च शाखो वृत्रमयोधयत् ।

बाणस्तथा नैगमेयं बलं राक्षसपुङ्गवः ॥

विनायको महावीर्यः परश्वधधरो रणे ।

संक्रुद्धो राक्षसश्रेष्ठं तुहुण्डं समयोधयत् ।

दुर्योधनश्च बलिनं घण्टाकर्णमयोधयत् ॥

हस्ती च कुण्डजठरं ह्लादो वीरं घटोदरम् ।

एते हि बलिनां श्रेष्ठा दानवाः प्रमथास्तथा ।

संयोधयन्ति देवर्षे दिव्याब्दानां शतानि षट् ॥

शतक्रतुमथायान्तं वज्रपाणिमभिस्थितम् ।

वारयामास बलवाञ् जम्भो नाम महासुरः ॥

शुक्रने कहा- हे विश्वरूप! हे महारूप! हे विश्वरूपाक्ष! हे सूत्रधारिन्! हे सहस्राक्ष! हे महादेव! ४० मैं आपकी शरण में आया हूँ । हे शङ्कर! हे शर्व! हे शम्भो! हे सहस्रनेत्राङ्घ्रि! हे भुजङ्गभूषण! आपके उदरमें सभी भुवनोंको देखते - देखते थककर मैं ४१ आपकी शरणमें आया हूँ । इस प्रकारके वचन कहनेपर महात्मा शम्भुने हँसकर यह वचन कहा - अब तुम मेरे पुत्र हो गये हो । इसलिये हे भार्गववंशके चन्द्र! मेरे ४२ शिश्नसे बाहर निकलो । अब समस्त चराचर जगत् तुम्हारी स्तुति शुक्रके नामसे करेगा । इसमें किसी अन्य प्रकारके विचारका स्थान नहीं है । ऐसा कहकर ४३ भगवान्ने शिश्न मार्गसे शुक्रको मुक्त कर दिया और वे बाहर निकल आये । शुक्रत्व प्राप्तकर बाहर निकले ओजस्वी महानुभाव भार्गववंशचन्द्र शम्भुको प्रणामकर ४४ । शीघ्र महासुरोंकी सेनामें चले गये॥४०–४४ ॥ शुक्राचार्यके वापस आ जानेपर दानव प्रसन्न हो ४५ गये । उन्होंने गणेश्वरोंके साथ फिर युद्ध करनेका विचार किया । उसके बाद देवताओंसहित विजयकी कामनावाले सभी गणेश्वरोंने उन असुरोंसे भयंकर युद्ध किया । ४६ तपोधन! उसके बाद युद्ध करनेमें लगे हुए असुर-गणों एवं देवताओंमें भयानक द्वन्द्वयुद्ध हुआ । अन्धक ४७ नन्दीके साथ, अय: शिरा शंकुकर्णके साथ, बुद्धिमान् बलि कुम्भध्वजके साथ एवं विरोचन नन्दिषेणके साथ ४८ भिड़ गये ॥ ४५ - ४८ ॥ अश्वग्रीव विशाखके साथ और शाख वृत्रके साथ, ४ ९ | बाण नैगमेयके साथ और राक्षसपुंगव बलके साथ लड़ने लगा । युद्धमें कुपित होकर परशु धारण करनेवाले महापराक्रमी विनायक राक्षसश्रेष्ठ तुहुण्डके साथ भिड़ ५० गये और दुर्योधन बलशाली घण्टाकर्णके साथ युद्ध करने लगा । हस्ती कुण्डजठरके साथ और ह्लाद वीर घटोदरसे लड़ने लगा । देवर्षे! बलवानोंमें श्रेष्ठ ये सभी ५१ | दानव एवं प्रमथगण आपसमें छः सौ दिव्य वर्षोंतक संग्राम करते रहे । जम्भ नामके बलशाली असुरने सामने ५२ । आ रहे वज्रपाणि इन्द्रको रोक लिया ॥४ ९ –५२ ॥

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अध्याय ६ ९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग शम्भुनामाऽसुरपतिः स ब्रह्माणमयोधयत् महौजसं कुजम्भश्च विष्णुं दैत्यान्तकारिणम् विवस्वन्तं रणे शाल्वो वरुणं त्रिशिरास्तथा द्विमूर्धा पवनं सोमं राहुर्मित्रं विरूपधृक् अष्टौ ये वसवः ख्याता धराद्यास्ते महासुरान् अष्टावेव महेष्वासान् वारयामासुराहवे सरभः शलभः पाकः पुरोऽथ विपृथुः पृथुः वातापी चेल्वलश्चैव नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः विश्वेदेवगणान् सर्वान् विष्वक्सेनपुरोगमान् एक एव रणे रौद्रः कालनेमिर्महासुरः एकादशैव ये रुद्रास्तानेकोऽपि रणोत्कटः योधयामास तेजस्वी विद्युन्माली महासुरः द्वावश्विनौ च नरको भास्करानेव शम्बरः साध्यान् मरुद्गणांश्चैव निवातकवचादयः एवं द्वन्द्वसहस्राणि प्रमथामरदानवैः कृतानि च सुराब्दानां दशतीः षण्महामुने यदा न शकिता योद्धुं दैवतैरमरारयः । तदा मायां समाश्रित्य ग्रसन्तः क्रमशोऽव्ययान् ततोऽभवच्छैलपृष्ठं प्रावृडभ्रसमप्रभैः । आवृतं वर्जितं सर्वैः प्रमथैरमरैरपि दृष्ट्वा शून्यं गिरिप्रस्थं ग्रस्तांश्च प्रमथामरान् । क्रोधादुत्पादयामास रुद्रो जृम्भायिकां वशी तया स्पृष्टा दनुसुता अलसा मन्दभाषिणः । वदनं विकृतं कृत्वा मुक्तशस्त्रं विजृम्भिरे जृम्भमाणेषु च तदा दानवेषु गणेश्वराः । सुराश्च निर्ययुस्तूर्णं दैत्यदेहेभ्य आकुलाः मेघप्रभेभ्यो दैत्येभ्यो निर्गच्छन्तोऽमरोत्तमाः । शोभन्ते पद्मपत्राक्षा मेघेभ्य इव विद्युतः

गणामरेषु च समं निर्गतेषु तपोधन ।

अयुध्यन्त महात्मानो भूय एवातिकोपिताः ॥

, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश ३३७ । शम्भु नामका असुरराज ब्रह्मासे लड़ने लगा और ॥ ५३ कुजम्भ दैत्योंका अन्त करनेवाले महान् ओजस्वी । विष्णुसे युद्ध करने लगा । शाल्व सूर्यसे, त्रिशिरा ॥ ५४ वरुणसे, द्विमूर्धा पवनसे, राहु सोमसे और विरूपधृक् मित्रसे लड़ने लगा । धरादि नामसे विख्यात आठ । वसुओंने सरभ, शलभ, पाक, पुर, विपृथु पृथु, वातापी ॥ ५५ और इल्वल – इन आठ महान् धनुर्धारी असुरोंको । युद्धमें लड़कर ( पीछे ) हटा दिया । ये असुर भाँति-॥ ५६ भाँतिके शस्त्र और अस्त्र लेकर लड़ने लगे । कालनेमि । नामका भयंकर महासुर युद्धमें अकेला ही विष्वक्सेन ॥ ५७ । आदि विश्वेदेव गणोंसे युद्ध करने लगा ॥ ५३–५७ ॥ । रणमें उत्कट तेजवाले विद्युन्माली नामके महासुरने ॥ ५८ । अकेले ही एकादश रुद्रोंका ( डटकर ) सामना किया । नरकने दोनों अश्विनीकुमारोंसे, शम्बरने ( द्वादश ) । भास्करोंसे एवं निवातकवचादिने साध्यों तथा मरुद्रणोंसे ॥ ५ ९ युद्ध किया । महामुने! इस प्रकार आठ दिव्य वर्षोंतक । प्रमथों एवं दानवोंके हजारोंकी संख्यामें दो - दो लड़ाके ॥ ६० वीर आपसमें द्वन्द्वयुद्ध करते रहे । जब असुरगण इस प्रकार देवोंसे युद्ध करनेमें समर्थहीन हो गये, तब उन लोगोंने मायाका सहारा लेकर देवोंको क्रमशः निगलना ॥ ६१ प्रारम्भ कर दिया ॥ ५८–६१ ॥ उसके बाद सारे प्रमथों और देवोंसे रहित पर्वत ॥ ६२ वर्षाकालीन मेघके समान दानवोंसे ढक गया । पर्वतप्रान्तको शून्य और प्रमथों तथा देवोंको ग्रसित हुआ देखकर ॥ ६३ विजितेन्द्रिय रुद्रने क्रोधसे जृम्भायिकाको उत्पन्न किया । उसके स्पर्श करनेपर अस्त्रोंको छोड़कर धीरे - धीरे बोलते हुए आलस्यसे पूर्ण दानव मुखको विवर्ण ॥ ६४ बनाकर जँभाई लेने लगे । दानवोंके जँभाई लेते समय आकुल होकर गणेश्वर एवं देवतालोग दैत्योंकी देहसे ॥ ६५ । अविलम्ब बाहर निकल गये॥६२–६५ ॥ मेघ के समान दैत्योंके शरीरसे बाहर निकल रहे ॥ ६६ । कमलके सदृश आँखोंवाले श्रेष्ठ देवगण बादलसे निकलनेवाली बिजलीकी भाँति शोभित हो रहे थे । तपोधन! ६७ | गणों और देवोंके बाहर आ जानेपर वे महान् ( दैत्य )

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३३८

ततस्तु देवैः सगणैः दानवाः शर्वपालितैः ।

पराजीयन्त संग्रामे भूयो भूयस्त्वहर्निशम् ॥

ततस्त्रिनेत्रः स्वां संध्यां सप्ताब्दशतिके गते ।

कालेऽभ्युपासत तदा सोऽष्टादशभुजोऽव्ययः ॥

संस्पृश्यापः सरस्वत्यां स्नात्वा च विधिना हरः ।

कृतार्थो भक्तिमान् मूर्ध्ना पुष्पाञ्जलिमुपाक्षिपत् ॥

ततो ननाम शिरसा ततश्चक्रे प्रदक्षिणम् ।

हिरण्यगर्भेत्यादित्यमुपतस्थे जजाप ह ॥

त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु सम्यगुच्चार्य शूलधृक् ।

ननर्त भावगम्भीरं दोर्दण्डं भ्रामयन् बलात् ॥

परिनृत्यति देवेशे गणाश्चैवामरास्तथा । नृत्यन्ते भावसंयुक्ता हरस्यानुविलासिनः सन्ध्यामुपास्य देवेशः परिनृत्य यथेच्छया । युद्धाय दानवैः सार्द्धं मतिं भूयः समादधे ततोऽमरगणैः सर्वैस्त्रिनेत्रभुजपालितैः । दानवा निर्जिताः सर्वे बलिभिर्भयवर्जितैः

स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा मत्वाऽजेयं च शङ्करम् ।

अन्धकः सुन्दमाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥

सुन्द भ्रातासि मे वीर विश्वास्यः सर्ववस्तुषु । तद्वदाम्यद्य यद्वाक्यं तच्छ्रुत्वा यत्क्षमं कुरु दुर्जयोऽसौ रणपटुर्धर्मात्मा कारणान्तरैः समासते हि हृदये पद्माक्षी शैलनन्दिनी तदुत्तिष्ठस्व गच्छामो यत्रास्ते चारुहासिनी तत्रैनां मोहयिष्यामि हररूपेण दानव भवान् भवस्यानुचरो भव नन्दी गणेश्वरः ततो गत्वाऽथ भुक्त्वा तां जेष्यामि प्रमथान् सुरान् इत्येवमुक्ते वचने बाढं सुन्दोऽभ्यभाषत श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ ९ अत्यन्त कुपित होकर युद्ध करने लगे । उसके बाद ६८ शम्भुसे पालित गणों एवं देवोंने युद्धमें दानवोंको दिन-रात बारम्बार हराया । उसके बाद सात सौ वर्षोंका समय बीत जानेपर अठारह भुजाओंवाले अविनाशी त्र्यम्बक शंकर ६ ९ । अपनी नित्यक्रियाकी सन्ध्या करने लगे॥६६–६९ ॥ उन भक्तिमान् शंकरने जलका स्पर्शकर ७० ( आचमनकर ) विधिपूर्वक सरस्वतीमें स्नान किया । वे कृतार्थ हो गये । उन्होंने पुष्पाञ्जलि सिरसे लगाकर समर्पित की । उसके बाद उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम एवं उसके ७१ | पश्चात् प्रदक्षिणा कर ' हिरण्यगर्भ ' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यकी वन्दना की और जप किया । उसके बाद ' त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु ' इसका स्पष्टरूपसे उच्चारण कर शूलपाणि ७२ शंकर बलपूर्वक अपना बाहुदण्ड घुमाते हुए भाव - गम्भीर होकर नाचने लगे । देवेश्वरके नाचनेपर उनके अनुगामी गण और देवता भी ( वैसे ही ) भाव - विभोर होकर नाचने ॥ ७३ | लगे ॥ ७० – ७३ ॥ सन्ध्योपासन करके इच्छानुकूल नृत्य करनेके ॥ ७४ बाद शंकरने फिर दानवोंसे संग्राम करनेका विचार किया । फिर तो शंकरकी भुजाओंसे रक्षित बलशाली और निर्भय सम्पूर्ण देवताओंने सारे दानवोंको जीत लिया । अपनी ॥ ७५ सेनाको पराजित देखकर तथा महादेवको पराजित करनेमें कठिनाई जान करके अन्धकने सुन्दको बुलाकर ७६ यह वचन कहा – वीर सुन्द! तुम मेरे भाई हो और सभी विषयोंमें तुम मेरे विश्वासी हो । इसलिये आज मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे सुनकर यथाशक्ति उसे पूर्ण ॥ ७७ | करो ॥ ७४–७७ ॥ । किन्हीं मुख्य कारणोंसे युद्ध करनेमें परम चतुर ॥ ७८ ये धर्मात्मा दुर्जेय हैं । मेरे हृदयमें कमलनयनी पार्वती बसी हुई है । अतः उठो; हम वहाँ चलें, जहाँ वह मधुर । मुसकानवाली स्थित है । दानव! वहाँ मैं शंकरका रूप ॥ ७ ९ धारण करके उसे मुग्ध कर दूँगा ( भुलावेमें डाल । दूँगा ) । तुम शंकरका अनुचर गणेश्वर नन्दी बनो । तब ॥ ८० वहाँ पहुँच करके और उसका सुख भोगकर प्रमथों एवं | देवोंको जीतूंगा । ऐसा कहनेपर सुन्दने कहा- ठीक है ॥ उसके बाद वह शैलादि ( नन्दी ) बन गया और अन्धक समजायत शैलादिरन्धकः शङ्करोऽप्यभूत् ॥ ८१ शिव बन गया ॥ ७८- ८१ ॥ नन्दिरुद्रौ ततो भूत्वा महासुरचमूपती । उसके बाद महासुर ( अन्धक ) और सेनापति ( सुन्द ) शस्त्रास्त्रोंकी मारसे अधिक घायल हुए शरीरवाले सम्प्राप्तौ मन्दरगिरिं प्रहारैः क्षतविग्रहौ ॥ ८२ रुद्र और नन्दीका रूप धारण कर मन्दरगिरिपर पहुँचे ।

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अध्याय ६ ९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग,

हस्तमालम्ब्य सुन्दस्य अन्धको हरमन्दिरम् ।

विवेश निर्विशङ्केन चित्तेनासुरसत्तमः ॥

ततो गिरिसुता दूरादायान्तं वीक्ष्य चान्धकम् ।

महेश्वरवपुश्छन्नं प्रहारैर्जर्जरच्छविम् ॥

सुन्दं शैलादिरूपस्थमवष्टभ्याविशत् ततः ।

तं दृष्ट्वा मालिनीं प्राह सुयशां विजयां जयाम् ॥

जये पश्यस्व देवस्य मदर्थे विग्रहं कृतम् ।

शत्रुभिर्दानववरैस्तदुत्तिष्ठस्व सत्वरम् ॥

घृतमानय पौराणं बीजिकां लवणं दधि ।

व्रणभङ्गं करिष्यामि स्वयमेव पिनाकिनः ॥

कुरुष्व शीघ्रं सुयशे स्वभर्तुर्व्रणनाशनम् ।

इत्येवमुक्त्वा वचनं समुत्थाय वरासनात् ॥

अभ्युद्ययौ तदा भक्त्या मन्यमाना वृषध्वजम् ।

शूलपाणेस्ततः स्थित्वा रूपं चिह्नानि यत्नतः ॥

अन्वियेष ततो ब्रह्मन्नोभौ पार्श्वस्थितौ वृषौ ।

सा ज्ञात्वा दानवं रौद्रं मायाच्छादितविग्रहम् ॥

अपयानं तदा चक्रे गिरिराजसुता मुने ।

देव्याश्चिन्तितमाज्ञाय सुन्दं त्यक्त्वान्धकोऽसुरः ॥

समाद्रवत वेगेन हरकान्तां विभावरीम् ।

समाद्रवत दैतेयो येन मार्गेण साऽगमत् ॥

अपस्कारान्तरं भञ्जन् पादप्लुतिभिराकुलः ।

तमापतन्तं दृष्ट्वैव गिरिजा प्राद्रवद् भयात् ॥

गृहं त्यक्त्वा ह्युपवनं सखीभिः सहिता तदा ।

तत्राप्यनुजगामासौ मदान्धो मुनिपुङ्गव ॥

तथापि न शशापैनं तपसो गोपनाय तु ।

तद्भयादाविशद् गौरी श्वेतार्ककुसुमं शुचि ॥

विजयाद्या महागुल्मे सम्प्रयाता लयं मुने ।

नष्टायामथ पार्वत्यां भूयो हैरण्यलोचनिः ॥

सुन्दं हस्ते समादाय स्वसैन्यं पुनरागमत् ।

अन्धके पुनरायाते स्वबलं मुनिसत्तम ॥

शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश ३३ ९ असुरश्रेष्ठ अन्धक सुन्दका हाथ पकड़कर निडर होकर ८३ महादेवके मन्दिरमें घुस गया । उसके बाद शैलादि नन्दीके ८४ रूपमें स्थित सुन्दको पकड़कर मारोंसे जर्जर महादेवके शरीरमें छिपे अन्धकको दूरसे आते देखकर पार्वतीने यशस्विनी ८५ मालिनी, विजया तथा जयासे कहा – ॥ ८२–८५ ॥ जये! देखो, मेरे स्वामीके शरीरको मेरे लिये ८६ दानव- शत्रुओंने किस प्रकार जर्जरित कर डाला है । इसलिये अविलम्ब उठो । पुराना घी, बीजिका, लवण और दही ले आओ । पिनाक धारण करनेवाले शंकरके ८७ घावोंको मैं स्वयं ही भरूँगी । यशस्विनि! शीघ्र अपने स्वामीके घावोंको भरो ऐसा कहते हुए आसनसे ८८ उठकर उसे वृषध्वज शंकर समझती हुई वे भक्तिपूर्वक उसके पास गयीं । उसके बाद खड़ी होकर वे शंकरके रूप एवं चिह्नोंको भलीभाँति देखने लगीं । ब्रह्मन्! ८ ९ उन्होंने देखा कि उसकी बगलमें स्थित दोनों वृष नहीं हैं । इसलिये उन्हें यह मालूम हो गया कि यह मायासे ९ ० छिपे शरीरवाला भयानक दानव है ॥ ८६ – ९ ० ॥ मुने! उसके बाद गिरिराजकी कन्या भाग चलीं । ९९ देवीके विचारको समझकर अन्धकासुर सुन्दको छोड़कर शीघ्रतापूर्वक शंकरप्रिया विभावरीके पीछे उसी रास्तेसे ९ २ दौड़ा, जिससे वे गयी थीं । चरणके चपेटोंसे राहकी रुकावटोंको चूर - चूर करते हुए वह अधीरतापूर्वक दौड़ पड़ा । उसे आते देखकर गिरितनया भयसे ( और ) भाग ९ ३ चलीं । मुनिवर! उसके बाद देवी सखियोंके साथ घर छोड़कर उपवनमें चली गयीं । वहाँ भी मदान्ध ( अन्धक ) - ने उनका ९ ४ पीछा किया । इतनेपर भी अपने तपकी रक्षाके लिये उन्होंने उसे शाप नहीं दिया । किंतु गौरी स्वयं उसके डरसे ९ ५ पवित्र सफेद अर्कके फूलमें छिप गयीं ॥ ९ १ - ९ ५ ॥ मुने! विजया आदि भी घनी झाड़ियोंमें छिप ९ ६ गयीं । उसके बाद पार्वतीके अदृश्य हो जानेपर हिरण्याक्षका पुत्र ( अन्धक ) सुन्दका हाथ पकड़कर पुनः अपनी सेनामें वापस आ गया । मुनिसत्तम! अन्धकके अपनी ९ ७ | सेनामें पुनः लौट आनेपर प्रमथों और असुरोंमें घमासान

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३४०

प्रावर्तत महायुद्धं प्रमथासुरयोरथ ।

ततोऽमरगणश्रेष्ठो विष्णुश्चक्रगदाधरः ॥

निजघानासुरबलं शङ्करप्रियकाम्यया ।

शार्ङ्गचापच्युतैर्बाणैः संस्यूता दानवर्षभाः ॥

पञ्च षट् सप्त चाष्टौ वा ब्रपादैर्घना इव ।

गदया कांश्चिदवधीच्चक्रेणान्याञ् जनार्दनः ॥

खड्गेन च चकर्तान्यान् दृष्टयान्यान् भस्मसाद् व्यधात् ।

हलेनाकृष्य चैवान्यान् मुसलेन व्यचूर्णयत् ॥

गरुडः पक्षपाताभ्यां तुण्डेनाप्युरसाऽहनत् ।

स चादिपुरुषो धाता पुराणः प्रपितामहः ॥

भ्रामयन् विपुलं पद्ममभ्यषिञ्चत वारिणा ।

संस्पृष्टा ब्रह्मतोयेन सर्वतीर्थमयेन हि ॥

गणामरगणाश्चासन् नवनागशताधिकाः ।

दानवास्तेन तोयेन संस्पृष्टाश्चाघहारिणा ॥

सवाहनाः क्षयं जग्मुः कुलिशेनेव पर्वताः ।

दृष्ट्वा ब्रह्महरी युद्धे घातयन्तौ महासुरान् ॥

शतक्रतुश्च दुद्राव प्रगृह्य कुलिशं बली । तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलो दानवसत्तमः । मुक्त्वा देवं गदापाणिं विमानस्थं च पद्मजम् ।

शक्रमेवाद्रवद् योद्धुं मुष्टिमुद्यम्य नारद ।

बलवान् दानवपतिरजेयो देवदानवैः ॥

तमापतन्तं त्रिदशेश्वरस्तु दोष्णां सहस्रेण यथाबलेन । वज्रं परिभ्राम्य बलस्य मूर्ध्नि चिक्षेप हे मूढ हतोऽस्युदीर्य ॥ स तस्य मूर्ध्नि प्रवरोऽपि वज्रो जगाम तूर्णं हि सहस्त्रधा मुने । बलोऽद्रवद् देवपतिश्च भीतः पराङ्मुखोऽभूत् समरान्महर्षे ॥ तं चापि जम्भो विमुखं निरीक्ष्य भूत्वाऽग्रतः प्राह न युक्तमेतत् । तिष्ठस्व राजाऽसि चराचरस्य न राजधर्मे गदितं पलायनम् ॥ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ ९ लड़ाई होने लगी । उसके बाद अमरगणोंमें श्रेष्ठ चक्र ९ ८ एवं गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवान् शंकरका प्रिय करनेकी इच्छासे असुर सेनाका संहार करने लगे । | शार्ङ्ग नामक धनुषसे निकले हुए बाणोंसे पाँच - पाँच, ९९ छः - छः, सात - सात, आठ - आठ श्रेष्ठ दानव उसी प्रकार विदीर्ण होने लगे जैसे सूर्यकी किरणोंसे ' घन ' ( अन्धकार ) विदीर्ण हो जाते हैं । जनार्दनने कुछको गदासे तथा १०० कुछको चक्रसे मार डाला । किन्हींको तलवारसे काट डाला और किन्हींको देखकर ही भस्म कर दिया तथा कुछ असुरोंको हलद्वारा खींचकर मूसलसे चूर्ण - विचूर्ण १०१ कर दिया ॥ ९ ६ - १०१ ॥ गरुड़ने अपने दोनों डैनोंकी मारसे चोंच तथा १०२ छातीके बलसे अनेक दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया । पुरातन आदिपुरुष धाता प्रपितामहने विशाल कमलको घुमाते हुए सभी ( देवगणों ) - को जलसे १०३ अभिषिञ्चित किया । सर्वतीर्थरूप ब्रह्म जलका स्पर्श होनेसे गण तथा देवतालोग नौजवान हाथियोंसे भी १०४ अधिक पराक्रमवाले हो गये । और सौ, पाप दूर करनेवाले उस जलके स्पर्शके प्रभावसे सवारीके साथ दानव ऐसे नष्ट होने लगे जैसे वज्रसे पर्वत नष्ट हो जाते १०५ हैं । ब्रह्मा और विष्णुको संग्राममें महासुरोंको मारते देखकर ( उत्साहमें आकर ) बलशाली इन्द्र भी अपना १०६ वज्र लेकर दौड़ पड़े । [ पुलस्त्यजी कहते हैं- ] नारदजी! उन्हें आते देखकर देवों तथा दानवोंसे अजेय शक्तिशाली श्रेष्ठ दानवपति बल, गदाधर विष्णु और विमानारूढ़ ब्रह्मासे लड़ना छोड़कर मुट्ठी तानकर इन्द्रसे १०७ ही युद्ध करनेके लिये दौड़ पड़ा ॥ १०२ - १०७ ॥ उसे आते देखकर देवताओंके स्वामी इन्द्रने हजारों भुजाओंसे अपनी शक्तिभर वज्रको घुमाते हुए उसे १०८ बलके सिरपर ' हे मूढ़! अब तुम मारे गये ' – कहकर फेंक दिया । मुने! वह श्रेष्ठ वज्र भी उसके सिरपर शीघ्र ही हजारों टुकड़ोंमें टूक- टूक हो गया । ( फिर ) बल ( इन्द्रकी ओर दौड़ा । महर्षे! देवराज भयभीत होकर १० ९ युद्धसे विमुख हो गये – भाग गये । उन्हें विमुख होकर भागते देख जम्भने आगे आकर कहा कि यह उचित नहीं है । रुकिये; आप समस्त स्थावर - जङ्गमके राजा हैं । ११० । राजधर्ममें लड़ाईके मैदानसे भागनेका नियम नहीं है ।