वामन पुराण — पृष्ठ 361–370

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370

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अध्याय ७० ] अन्धकका शिव - शूलसे भेदन, भैरवादिकी

ततस्तान् प्राह भगवान् सम्परिष्वज्य देवताः ।

गच्छध्वं स्वानि धिष्ण्यानि भुञ्जध्वं त्रिदिवं सुखम् ॥ ७७

सहस्त्राक्षोऽपि संयातु पर्वतं मलयं शुभम् ।

तत्र स्वकार्यं कृत्वैव पश्चाद् यातु त्रिविष्टपम् ॥ ७८

इत्येवमुक्त्वा त्रिदशान् समाभाष्य व्यसर्जयत् ।

पितामहं नमस्कृत्य परिष्वज्य जनार्दनम् ।

ते विसृष्टा महेशेन सुरा जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥ ७ ९

महेन्द्रो मलयं गत्वा कृत्वा कार्यं दिवं गतः ।

गतेषु शक्रप्राग्र्येषु देवेषु भगवाञ्छिवः ॥ ८०

विसर्जयामास गणाननुमान्य यथार्हतः ।

गणाश्च शङ्करं दृष्ट्वा स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ ८१

जग्मुस्ते शुभलोकानि महाभोगानि नारद ।

यत्र कामदुघा गावः सर्वकामफलद्रुमाः ॥ ८२

नद्यस्त्वमृतवाहिन्यो ह्रदाः पायसकर्दमाः ।

स्वां स्वां गतिं प्रयातेषु प्रमथेषु महेश्वरः ॥ ८३

समादायान्धकं हस्ते सनन्दिः शैलमभ्यगात् ।

द्वाभ्यां वर्षसहस्त्राभ्यां पुनरागाद्धरो गृहम् ॥ ८४

ददृशे च गिरेः पुत्रीं श्वेतार्ककुसुमस्थिताम् ।

समायातं निरीक्ष्यैव सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ ८५

त्यक्त्वाऽर्कपुष्पं निर्गत्य सखीस्ताः समुपाह्वयत् ।

समाहूताश्च देव्या ता जयाद्यास्तूर्णमागमन् ॥ ८६ ।

ताभिः परिवृता तस्थौ हरदर्शनलालसा ।

ततस्त्रिनेत्रो गिरिजां दृष्ट्वा प्रेक्ष्य च दानवम् ॥ ८७

नन्दिनं च तथा हर्षादालिलिङ्गे गिरेः सुताम् ।

अथोवाचैष दासस्ते कृतो देवि मयाऽन्धकः ॥ ८८

पश्यस्व प्रणतिं यातं स्वसुतं चारुहासिनि ।

इत्युच्चार्यान्धकं चैव पुत्र एह्येति सत्वरम् ॥ ८ ९ ।

उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्व ३५१ करने लगे । उसके बाद भगवान् शंकरने उन देवोंको गले लगाकर कहा- देवताओ! आपलोग अपने - अपने स्थानको जाइये और स्वर्ग - सुखका उपभोग कीजिये । इन्द्र भी सुखद मलयपर्वतपर जायँ तथा वहाँ अपना काम समाप्त करके ही स्वर्ग चले जायँ । ऐसा कहकर देवोंसे वार्तालाप कर देवोंको विदा कर दिया । महेशने पितामहको नमस्कार तथा जनार्दनको गले लगाकर उन सभीको विदा कर दिया । ( महेशसे विदा किये गये ) वे देवगण स्वर्गको चले गये॥७६–७९ ॥ महेन्द्र भी मलयाचलपर जा करके ( अपना ) कार्य सम्पन्नकर स्वर्ग चले गये । शिवने इन्द्र आदि देवोंके चले जानेपर गणोंको यथायोग्य सम्मानित कर विदा कर दिया । [ पुलस्त्यजी कहते हैं कि ] नारदजी! गण भी शंकरका दर्शन कर अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो विशाल भोगसे सम्पन्न उन सुखद लोकोंको चले गये, जहाँकी गौएँ इच्छित वस्तु प्रदान करनेवाली थीं, वृक्ष समस्त कर्मरूपी फलोंके दाता थे, नदियाँ अमृतकी धारा बहानेवाली थीं और सरोवर दूधके पङ्कसे भरे थे । महेश्वर प्रमथोंके अपने - अपने स्थानपर चले जानेपर अन्धकका हाथ पकड़कर ( उसे साथ लिये हुए ) नन्दीसहित पर्वतपर चले गये । ( वे ) शंकर दो हजार वर्षोंके बाद फिर अपने घर लौटे । उन्होंने सफेद अर्क ( आक या मन्दार ) - के फूलमें स्थित गिरिजाको देखा । पार्वती समस्त चिह्नोंसे युक्त शंकरको आया हुआ देखते ही अर्कके फूलको छोड़कर बाहर निकल आय और उन्होंने ( अपनी जयादि ) सखियोंको पुकारा । पुकारी गयीं वे जया आदि सभी देवियाँ शीघ्र वहाँ चली आयीं ॥ ८० - ८६ ॥ उन ( अपनी सहेली जयादि देवियों ) से घिरी हुई पार्वतीजी शिवके दर्शनकी अभिलाषासे ( प्रतीक्षामें ) खड़ी रहीं । त्रिनेत्रधारी शंकरने गिरिजाको देखकर दानव एवं नन्दीके ऊपर भी दृष्टिपात किया; फिर प्रसन्नतापूर्वक गिरिसुताको गले लगा लिया । उसके बाद उन्होंने कहा - देवि! मैंने अन्धकको तुम्हारा दास बना लिया है । चारुहासिनि! प्रणाम कर रहे अपने पुत्रको देखो । ऐसा कहनेके बाद उन्होंने कहा -पुत्र!

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३५२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७०

व्रजस्व शरणं मातुरेषा श्रेयस्करी तव ।

इत्युक्तो विभुना नन्दी अन्धकश्च गणेश्वरः ॥ ९ ०

समागम्याम्बिकापादौ ववन्दतुरुभावपि ।

अन्धकोऽपि तदा गौरीं भक्तिनम्रो महामुने ।

स्तुतिं चक्रे महापुण्यां पापघ्नीं श्रुतिसम्मिताम् ॥ ९ १

अन्धक उवाच ॐ नमस्ये भवानीं भूतभव्यप्रियां लोकधात्रीं जनित्रीं स्कन्दमातरं महादेवप्रियां धारिणीं स्यन्दिनीं चेतनां त्रैलोक्यमातरं धरित्रीं देवमातरमथेज्यां श्रुतिं स्मृतिं दयां लज्जां कान्तिमग्र्यामसूयां मतिं सदापावनीं दैत्यसैन्यक्षयकरीं महामायां वैजयन्तीं सुशुभां कालरात्रिं गोविन्दभगिनीं शैलराजपुत्र सर्वदेवार्चितां सर्वभूतार्चितां विद्यां सरस्वतीं त्रिनयनमहिषीं नमस्यामि मृडानीं शरण्यां शरणमुपागतोऽहं नमो नमस्ते ॥

इत्थं स्तुता सान्धकेन पुरितुष्टा विभावरी ।

प्राह पुत्र प्रसन्नाऽस्मि वृणुष्व वरमुत्तमम् ॥ ९ २

भृङ्गिरुवाच

पापं प्रशममायातु त्रिविधं मम पार्वति ।

तथेश्वरे च सततं भक्तिरस्तु ममाम्बिके ॥ ९ ३

पुलस्त्य उवाच बाढमित्यब्रवीद् गौरी हिरण्याक्षसुतं ततः । स चास्ते एवं कृत्वैव एतत् पूजयञ्शर्वं गणानामधिपोऽभवत् ॥ ९ ४ पुरा दानवसत्तमं तं महेश्वरेणाथ विरूपदृष्ट्या । रूपं भयदं च भैरवं भृङ्गित्वमीशेन कृतं स्वभक्त्या ॥ ९ ५ तवोक्तं हरकीर्तिवर्धनं पुण्यं पवित्रं शुभदं महर्षे । संकीर्तनीयं द्विजसत्तमेषु धर्मायुरारोग्यधनैषिणा सदा ॥ ९ ६ शीघ्र यहाँ आओ । अपनी इस माताकी शरणमें जाओ! ये तुम्हारा कल्याण करेंगी । प्रभुके इस प्रकार कहनेपर गणेश्वर नन्दी एवं अन्धक दोनोंने जाकर अम्बिका चरणोंमें प्रणाम किया । महामुने! उसके बाद श्रद्धापूर्वक नम्र होकर अन्धकने गौरीकी पाप नाश करनेवाली एवं अत्यन्त पवित्र वेद - सम्मत स्तुति की ॥ ८७ – ९ १ ॥ अन्धकने कहा — ॐ मैं भवानीको प्रणाम करता हूँ । मैं भूतभव्य - शङ्करकी प्रिया, लोकधात्री, जनित्री, कार्तिकेयकी जननी, महादेवकी प्रिया, लोकोंको धारण करनेवाली, स्यन्दिनी, चेतना, त्रैलोक्यजननी, धरित्री, देवमाता, इज्या, श्रुति, स्मृति, दया, लज्जा, श्रेष्ठ कान्ति, अया, असूया, मति, सदापावनी, दैत्योंकी सेनाओंका विनाश करनेवाली, महामाया वैजयन्ती, अत्यन्त शोभावाली, कालरात्रि, गोविन्दभगिनी, शैलराजपुत्री, सर्वदेवोंसे पूजित, सर्वभूतोंसे पूजित, विद्या, सरस्वती, शंकरकी महारानीको प्रणाम करता हूँ । मैं शरणागतोंकी रक्षा करनेवाली मृडानीकी शरणमें आया हूँ । ( देवि! ) आपको बार - बार प्रणाम है । अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर भवानीने प्रसन्न होकर कहा - पुत्र! मैं प्रसन्न हूँ । तुम उत्तम वर माँगो॥९ २ ॥ भृङ्गिने कहा - पार्वति! अम्बिके! मेरे त्रिविध-मानसिक, कायिक, वाचिक पाप दूर हो जायँ एवं भगवान् शिवमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे ॥ ९ ३ ॥ पुलस्त्यजी बोले- उसके बाद गौरीने हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा- ऐसा ही हो । वह वहाँ रहकर शिवकी पूजा करते हुए गणाधिप हो गया । इस प्रकार पहले समयमें महेश्वरने उस दानवश्रेष्ठको अपनी विरूपदृष्टिसे भयदायक भीषण रूप प्रदानकर अपनी भक्तिसे ' भृङ्गी ' बना दिया । महर्षे ( नारदजी )! मैंने आपसे शिवकी कीर्तिको बढ़ानेवाला यह पुण्य पवित्र एवं शुभद आख्यान कहा । धर्म, आयु, आरोग्य एवं धनको चाहनेवालोंको श्रेष्ठ द्विजातियोंमें इसका कीर्तन सदा करना | चाहिये ॥ ९ ४ - ९ ६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७० ॥

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अध्याय ७१ ] * इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा * ३५३ एकहत्तरवाँ अध्याय इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, उनका ' पाकशासन ' और ' गोत्रभिद् ' होनेका हेतु; मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा नारद उवाच

मलयेऽपि महेन्द्रेण यत्कृतं ब्राह्मणर्षभ ।

निष्पादितं स्वकं कार्यं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १

पुलस्त्य उवाच

श्रूयतां यन्महेन्द्रेण मलये पर्वतोत्तमे ।

कृतं लोकहितं ब्रह्मन्नात्मनश्च तथा हितम् ॥ २

अन्धासुरस्यानुचरा मयतारपुरोगमाः ।

ते निर्जिताः सुरगणैः पातालगमनोत्सुकाः ॥ ३

ददृशुर्मलयं शैलं सिद्धाध्युषितकन्दरम् ।

लतावितानसंछन्नं मत्तसत्त्वसमाकुलम् ॥४

चन्दनैरुरगाक्रान्तैः सुशीतैरभिसेवितम् ।

माधवीकुसुमामोदं ऋष्यर्चितहरं गिरिम् ॥ ५

तं दृष्ट्वा शीतलच्छायं श्रान्ता व्यायामकर्षिताः ।

मयतारपुरोगास्ते निवासं समरोचयन् ॥ ६

तेषु तत्रोपविष्टेषु प्राणतृप्तिप्रदोऽनिलः ।

विवाति शीतः शनकैर्दक्षिणो गन्धसंयुतः ॥ ७

तत्रैव च रतिं चक्रुः सर्व एव महासुराः ।

कुर्वन्तो लोकसम्पूज्ये विद्वेषं देवतागणे ॥ ८

ताञ्ज्ञात्वा शङ्करः शक्रं प्रेषयन्मलयेऽसुरान् ।

स चापि ददृशे गच्छन् पथि गोमातरं हरिः ॥ ९

तस्याः प्रदक्षिणां कृत्वा दृष्ट्वा शैलं च सुप्रभम् ।

ददृशे दानवान् सर्वान् संहृष्टान् भोगसंयुतान् ॥ १०

अथाजुहाव बलहा सर्वानेव महासुरान् ।

ते चाप्याययुरव्यग्रा विकिरन्तः शरोत्करान् ॥ ११

तानागतान् बाणजालैः रथस्थोऽद्भुतदर्शनः ।

छादयामास विप्रर्षे गिरीन् वृष्ट्या यथा घनः ॥ १२

ततो बाणैरवच्छाद्य मयादीन् दानवान् हरिः ।

पाकं जघान तीक्ष्णाग्रैमार्गणैः कङ्कवाससैः ॥ १३

नारदने कहा- द्विजश्रेष्ठ! महेन्द्रने मलयपर्वतपर भी अपना जो कार्य पूरा किया उसे आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥

पुलस्त्यजी बोले- ब्रह्मन्! महेन्द्रने श्रेष्ठ मलयपर्वतपर जगत्के हित तथा अपने कल्याणके लिये जो कार्य किया था, उसे सुनिये । मय, तार आदि अन्धकासुरके अनुचर दैत्य देवताओंसे पराजित होकर पाताललोकमें जानेके लिये अत्यन्त उत्सुक होने लगे । उन लोगोंने सिद्धोंसे भरे कन्दराओंवाले तथा लतासमूहसे ढके, आमोदभरे प्राणियोंसे व्याप्त, साँपोंसे घिरे सुशीतल चन्दनसे युक्त तथा सुगन्धित माधवी लताके फूलोंकी सुगन्धिसे पूर्ण ऋषियोंद्वारा पूजित शंकरके मलयगिरिको देखा ॥ २–५ ॥ परिश्रमसे थके - माँदे तथा शक्तिहीन मय, तार आदि दानवोंने शीतल छायावाले उस पर्वतको देखकर वहाँ निवास करनेकी इच्छा की । उन लोगोंके वहाँ ठहर जानेपर प्राणोंको संतुष्टि प्रदान करनेवाली सुगन्धसे पूर्ण तथा शीतल दक्षिणी हवा मन्द मन्द बहने लगी । जगत्-पूज्य देवताओंसे शत्रुता करते हुए सभी श्रेष्ठ दैत्य सुखसे वहीं रहने लगे । शंकरने उन असुरोंको मलयपर्वतपर रहते हुए जानकर इन्द्रको वहाँ भेजा । मार्गमें जाते हुए इन्द्रने गोमाताको देखा ॥ ६ - ९ ॥ उसकी प्रदक्षिणा करनेके बाद उन्होंने सुकान्तिसे सम्पन्न पर्वतपर भोगसे संयुत तथा हर्षित सभी दानवोंको देखा । उसके बाद इन्द्रने सभी महासुरोंको ललकारा । वे भी बिना किसी हिचकके बाणोंकी वर्षा करते हुए आ गये । विप्रर्षे! रथपर बैठे हुए अद्भुत दिखायी पड़नेवाले इन्द्रने आये हुए उन दानवोंको बाणोंके समूहोंसे इस प्रकार ढक दिया जिस प्रकार बादल जलकी वर्षासे पर्वतोंको ढक देता है । उसके बाद इन्द्रने मय आदि दानवोंको बाणोंसे ढककर कङ्क पक्षीके पंख लगे तेज – नुकीली धारवाले बाणोंसे पाक । नामके दानवका वध कर दिया ॥१०–१३ ॥

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३५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७१

तत्र नाम विभुर्लेभे शासनत्वात् शरैर्दृढैः ।

पाकशासनतां शक्रः सर्वामरपतिर्विभुः ॥

तथाऽन्यं पुरनामानं बाणासुरसुतं शरैः ।

सुपुङ्खैर्दारयामास ततोऽभूत् स पुरन्दरः ॥

हत्वेत्थं समरेऽजैषीद् गोत्रभिद् दानवं बलम् ।

तच्चापि विजितं ब्रह्मन् रसातलमुपागमत् ॥

एतदर्थं सहस्राक्षः प्रेषितो मलयाचलम् ।

त्र्यम्बकेन मुनिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥

नारद उवाच

किमर्थं दैवतपतिर्गोत्रभित् कथ्यते हरिः ।

एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि सम्परिवर्तते ॥

पुलस्त्य उवाच

श्रूयतां गोत्रभिच्छक्रः कीर्तितो हि यथा मया ।

हते हिरण्यकशिपौ यच्चकारारिमर्दनः ॥

दितिर्विनष्टपुत्रा कश्यपं प्राह नारद ।

विभो नाथोऽसि मे देहि शक्रहन्तारमात्मजम् ॥

कश्यपस्तामुवाचाथ यदि त्वमसितेक्षणे ।

शौचाचारसमायुक्ता स्थास्यसे दशतीर्दश ॥

संवत्सराणां दिव्यानां ततस्त्रैलोक्यनायकम् ।

जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शत्रुघ्नं नान्यथा प्रिये ॥

इत्येवमुक्ता सा भर्त्रा दितिर्नियममास्थिता ।

गर्भाधानमृषिः कृत्वा जगामोदयपर्वतम् ॥

गते तस्मिन् मुनिश्रेष्ठे सहस्त्राक्षोऽपि सत्वरम् ।

तमाश्रममुपागम्य दितिं वचनमब्रवीत् ॥

करिष्याम्यनुशुश्रूषां भवत्या यदि मन्यसे ।

बाढमित्यब्रवीद् देवी भाविकर्मप्रचोदिता ॥

समिदाहरणादीनि तस्याश्चक्रे पुरन्दरः ।

विनीतात्मा च कार्यार्थी छिद्रान्वेषी भुजङ्गवत् ॥

एकदा सा तपोयुक्ता शौचे महति संस्थिता । दशवर्षशतान्ते तु शिरःस्नाता तपस्विनी मजबूत बाणोंसे पाकको दण्डित ( शासित ) करनेके १४ कारण सभी अमरोंके पति विभु इन्द्रको पाकशासनताकी प्राप्ति हुई । इसी प्रकार उन्होंने सुन्दर पुंख लगे वाणोंसे १५ दूसरे पुर नामक बाणासुरके पुत्रका ( भी ) वध कर दिया । इसीसे वे पुरन्दर हुए । ब्रह्मन्! इस प्रकार उन दानवोंका नाश कर इन्द्रने युद्धमें दानव सेनाको जीत लिया । हारा १६ हुआ वह दानवोंका सेना - समूह रसातलमें चला गया । मुनिश्रेष्ठ! इसीलिये शंकरने इन्द्रको मलयपर्वतपर भेजा १७ था । अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १४–१७ ॥ संदेह १८ जाता कहा १ ९ इन्द्रने मृत्यु नारदने कहा ( पूछा ) - ब्रह्मन्! मेरे हृदयमें यह है कि देवपति ( इन्द्र ) - को गोत्रभिद् क्यों कहा है ॥ १८ ॥

पुलस्त्यजी बोले- मैंने इन्द्रको गोत्रभिद् जैसे तथा हिरण्यकशिपुके मार दिये जानेपर शत्रुमर्दन जो किया? आप ( सब ) सुनें । नारदजी! पुत्रकी हो जानेपर दितिने कश्यपसे कहा - प्रभो! आप २० मेरे पति हैं, मुझे इन्द्रका वध करनेवाला पुत्र दीजिये । | कश्यपने उससे कहा - असितनयने! यदि तुम सौ दिव्य २१ वर्षोंतक पवित्र आचरण करोगी तो तुम तीनों लोकोंका मार्गदर्शक एवं शत्रुसंहारकारी पुत्र उत्पन्न करोगी । प्रिये! २२ इसके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥ १ ९ –२२ ॥ पतिके ऐसा कहनेपर दितिने नियमका निर्वाह २३ करना प्रारम्भ कर दिया । कश्यप ऋषि गर्भाधान करके उदयगिरिपर चले गये । उन मुनिश्रेष्ठके उदयगिरिपर चले जानेके पश्चात् इन्द्रने शीघ्रतासे उस आश्रममें जाकर २४ दितिसे यह वचन कहा - यदि आप अनुमति प्रदान करें तो मैं आपकी सेवा करूँ । भवितव्यतासे प्रेरित होकर २५ देवीने कहा – ठीक है । विनीत बना हुआ इन्द्र अपने कार्यकी सिद्धिके लिये बिल खोजनेवाले सर्पकी भाँति अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए उस ( दिति ) - के लिये २६ । लकड़ी आदि लानेका कार्य करने लगे ॥ २३ - २६ ॥ एक हजार वर्ष बीत जानेपर मनोयोगसे पवित्रताका | पालन करनेमें लगी हुई वह तपस्विनी एक दिन सिरसे ॥ २७ । स्नान करनेके बाद बालोंको खोले हुए अपने घुटनोंपर

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अध्याय ७१ ] * इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा * ३५५

जानुभ्यामुपरि स्थाप्य मुक्तकेशा निजं शिरः ।

सुष्वाप केशप्रान्तैस्तु संश्लिष्टचरणाऽभवत् ॥

तमन्तरमशौचस्य ज्ञात्वा वेदः सहस्रदृक् ।

विवेश मातुरुदरं नासारन्ध्रेण नारद ॥

प्रविश्य जठरं क्रुद्धो दैत्यमातुः पुरन्दरः ।

ददर्शोर्ध्वमुखं बालं कटिन्यस्तकरं महत् ॥

तस्यैवास्तेऽथ ददृशे पेशीं मांसस्य वासवः ।

शुद्धस्फटिकसंकाशां कराभ्यां जगृहेऽथ ताम् ॥

ततः कोपसमाध्मातो मांसपेशीं शतक्रतुः ।

कराभ्यां मर्दयामास ततः सा कठिनाऽभवत् ॥

ऊर्ध्वेनार्धं च ववृधे त्वधोऽध ववृधे तथा ।

शतपर्वाऽथ कुलिशः संजातो मांसपेशितः ॥

तेनैव गर्भं दितिजं वज्रेण शतपर्वणा ।

चिच्छेद सप्तधा ब्रह्मन् स रुरोद च विस्वरम् ॥

ततोऽप्यबुध्यत दितिरजानाच्छक्रचेष्टितम् ।

शुश्राव वाचं पुत्रस्य रुदमानस्य नारद ॥

शक्रोऽपि प्राह मा मूढ रुदस्वेति सुघर्घरम् ।

इत्येवमुक्त्वा चैकैकं भूयश्चिच्छेद सप्तधा ॥

ते जाता मरुतो नाम देवभृत्याः शतक्रतोः ।

मातुरेवापचारेण चलन्ते ते पुरस्कृताः ॥

ततः सकुलिशः शक्रो निर्गम्य जठरात् तदा ।

दितिं कृताञ्जलिपुटः प्राह भीतस्तु शापतः ॥

ममास्ति नापराधोऽयं यच्छस्तस्तनयस्तव ।

तवैवापनयाच्छस्तस्तन्मे न क्रोद्धुमर्हसि ॥

दितिरुवाच

न तवात्रापराधोऽस्ति मन्ये दिष्टमिदं पुरा ।

सम्पूर्णे त्वपि काले वै याऽशौचत्वमुपागता ॥

सिर रखकर सो गयी । उसके बालोंके ऊपरी भाग २८ ( लटककर ) पैरोंसे लग गये । नारदजी! सहस्राक्ष इन्द्रदेव अपवित्रताके लिये उस अवसरको ( उपयुक्त ) जानकर नासिकाके छिद्रसे माताके उदरमें प्रवेश कर २ ९ गये । इन्द्रने दैत्यमाताकी विशाल कोखमें प्रवेश कर कमरपर हाथ रखे ऊपरको मुख किये हुए एक ३० बालकको देखा ॥ २७ –३० ॥ इन्द्रने उस बालकके मुँहमें एक शुद्ध स्फटिकके ३ ९ समान मांसपेशी देखी । इन्होंने उस मांसपेशीको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया । उसके बाद क्रोधकी आगसे संतप्त हुए शतक्रतुने अपने दोनों हाथोंसे उस मांसपेशीको मसल दिया जिससे वह कठोर हो गयी ( अब वह ३२ पिण्डके रूपमें हो गयी ) । उस पिण्डका आधा भाग ऊपरकी ओर और आधा भाग नीचेकी ओर बढ़ गया । इस प्रकार उस मांसपेशीसे सौ पोरोंवाला वज्र बन ३३ गया । ब्रह्मन्! ( इन्द्रने ) उन्हीं पोरोंवाले वज्रसे दितिके द्वारा धारण किये हुए गर्भको सात भागों में काट डाला । फिर वह गर्भमें रहनेवाला बालक बिलखते ३४ स्वरमें रोने लगा ॥ ३१–३४ ॥ [ पुलस्त्यजी कहते हैं - ] नारदजी! उसके बाद ३५ दिति जग गयी और उसने इन्द्रकी की हुई चेष्टाको जान लिया । उसने रोते हुए पुत्रकी वाणी सुनी । इन्द्रने भी कहा – मूर्ख! घर्घर शब्दसे मत रोओ । ऐसा ३६ कहकर उन्होंने प्रत्येक टुकड़ेको पुनः सात - सात टुकड़ोंमें काट डाला । वे ( कटे हुए टुकड़े ) इन्द्रके मरुत् नामके देवभृत्य हो गये । माताके ही अनुचित ३७ । कार्य करनेके कारण वे आगे चलते हैं । उसके बाद वज्र लिये हुए इन्द्रने जठरसे बाहर आकर एवं शापसे भयभीत होकर हाथ जोड़कर दितिसे कहा- आपके ३८ पुत्रको जो मैंने काटा है इसमें मेरा अपराध नहीं है । आपके ही अपचरण ( पवित्रताका पालन न करने ) -से वह काटा गया । अतः मेरे ऊपर आपको कुपित ३ ९ नहीं होना चाहिये ॥ ३५–३९ ॥ दितिने कहा- इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है । मैं इसे पूर्वनियोजित मानती हूँ । इसीसे समय पूरा होनेपर ४० । भी मैंने अपवित्रताका आचरण कर दिया ॥ ४० ॥

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३५६ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्त्वा तान् बालान् परिसान्त्व्य दितिः स्वयम् देवराज्ञा सहैतांस्तु प्रेषयामास भामिनी एवं पुरा स्वानपि सोदरान् स गर्भस्थितानुज्जरितुं भयार्तः बिभेद वज्रेण ततः स गोत्रभित् ख्यातो महर्षे भगवान् महेन्द्रः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७२ पुलस्त्यजी बोले- भामिनी दितिने ऐसा कहनेके । बाद उन बालकोंको सान्त्वना देकर उन्हें देवराजके ॥। ४१ साथ ही भेज दिया । महर्षे! इस प्रकार पूर्वकालमें भयार्त्त । होकर महेन्द्रने गर्भस्थित अपने ही सहोदरोंके विनाशके लिये उन्हें वज्रद्वारा काट दिया । इसीसे वे ' गोत्रभित् ' ॥ ४२ । नामसे प्रसिद्ध हो गये ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें एकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥

बहत्तरवाँ अध्याय स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष - मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन नारद उवाच

यदमी भवता प्रोक्ता मरुतो दितिजोत्तमाः ।

तत् केन पूर्वमासन् वै मरुन्मार्गेण कथ्यताम् ॥

पूर्वमन्वन्तरेष्वेव समतीतेषु सत्तम ।

के त्वासन् वायुमार्गस्थास्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

पुलस्त्य उवाच

श्रूयतां पूर्वमरुतामुत्पत्तिं कथयामि ते ।

स्वायम्भुवं समारभ्य यावन्मन्वन्तरं त्विदम् ॥

स्वायम्भुवस्य पुत्रोऽभून्मनोर्नाम प्रियव्रतः ।

तस्यासीत् सवनो नाम पुत्रस्त्रैलोक्यपूजितः ॥

स चानपत्यो देवर्षे नृपः प्रेतगतिं गतः ।

ततोऽरुदत् तस्य पत्नी सुदेवा शोकविह्वला ॥

न ददाति तदा दग्धुं समालिङ्ग्य स्थिता पतिम् ।

नाथ नाथेति बहुशो विलपन्ती त्वनाथवत् ॥

तामन्तरिक्षादशरीरिणी वाक् प्रोवाच मा राजपत्नीह रोदीः । नारदजीने कहा – ( पुलस्त्यजी! ) आपने दितिसे उत्पन्न उत्तम मरुद्गणोंका जो वर्णन किया उसके १ विषयमें यह कहिये कि पहले वे मरुत् किस मार्गमें अवस्थित थे; सत्तम! आप मुझे विशेषरूपसे यह बतलाइये कि पूर्व मन्वन्तरके बीत जानेपर कौन २ ( मरुत् ) वायुमार्गमें स्थित थे? ॥ १-२ ॥ पुलस्त्यजी बोले - ( नारदजी! ) स्वायम्भुव मन्वन्तरसे लेकर इस मन्वन्तरतकके पहलेतकके ३ मरुद्गणोंकी उत्पत्ति आपसे कहता हूँ, उसे सुनिये— स्वायम्भुव मनुके पुत्रका नाम प्रियव्रत था । तीनों लोकोंमें सत्कार प्राप्त सवन उन प्रियव्रतके पुत्र थे । ४ देवर्षे! वे राजा पुत्रहीन ही मृत्युको प्राप्त हो गये । उसके बाद उनकी सुदेवा नामकी पत्नी शोकसे विह्वल ५ होकर रोने लगी । उसने उस मृत शरीरको दाह-संस्कार करनेके लिये नहीं दिया । पतिके गलेसे लिपटी हुई वह ' हा नाथ, हा नाथ ' कहती हुई असहायकी भाँति ६ अत्यधिक विलाप करने लगी ॥३–६ ॥ उस समय आकाशसे अशरीरिणीवाणीने उससे

पृष्ठ 367

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अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष - मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३५७ यद्यस्ति ते सत्यमनुत्तमं तदा भवत्वयं ते पतिना सहाग्निः सा तां वाणीमन्तरिक्षान्निशम्य प्रोवाचेदं राजपुत्री सुदेवा शोचाम्येनं पार्थिवं पुत्रहीनं नैवात्मानं मन्दभाग्यं विहङ्ग सोऽथाब्रवीन्मा रुदस्वायताक्षि पुत्रास्त्वत्तो भूमिपालस्य सप्त । भविष्यन्ति वह्निमारोह शीघ्रं सत्यं प्रोक्तं श्रद्दधत्स्व त्वमद्य इत्येवमुक्ता खचरेण बाला चितौ समारोप्य पतिं वरार्हम् । हुताशमासाद्य पतिव्रता तं संचिन्तयन्ती ज्वलनं प्रपन्ना ॥ ततो मुहूर्तान्नृपतिः श्रिया युतः समुत्तस्थौ सहितो भार्ययाऽसौ । खमुत्पपाताथ स कामचारी समं महिष्या च सुनाभपुत्र्या ॥ तस्याम्बरे नारद पार्थिवस्य जाता रजोगा महिषी तु गच्छतः । स दिव्ययोगात् प्रतिसंस्थितोऽम्बरे भार्यासहायो दिवसानि पञ्च ॥ ततस्तु षष्ठे ऽहनि पार्थिवेन रितुर्न वन्ध्योऽद्य भवेद् विचिन्त्य । रराम तन्व्या सह कामचारी ततोऽम्बरात् प्राच्यवतास्य शुक्रम् ॥

शुक्रोत्सर्गावसाने तु नृपतिर्भार्यया सह ।

जगाम दिव्यया गत्या ब्रह्मलोकं तपोधन ॥

तदम्बरात् प्रचलितमभ्रवर्ण शुक्रं समाना नलिनी वपुष्मती । चित्रा विशाला हरितालिनी च सप्तर्षियो ददृशुर्यथेच्छया ॥

तद् दृष्ट्वा पुष्करे न्यस्तं प्रत्यैच्छन्त तपोधन ।

मन्यमानास्तदमृतं सदा यौवनलिप्सया ॥

ततः स्नात्वा च विधिवत् सम्पूज्य तान् निजान् पतीन् ।

पतिभिः समनुज्ञाताः पपुः पुष्करसंस्थितम् ॥

कहा - राजपत्रि! तुम रोओ मत । यदि तुम्हारा सत्य ॥ ७ ( पति - सेवा ) - व्रत श्रेष्ठ है तो यह अग्नि पतिके साथ तुम्हारे हितके लिये हो । आकाशसे हुई उस वाणीको । सुनकर राजपुत्री सुदेवाने कहा - आकाशचारिन्! मेँ इस सुत - हीन राजाके लिये सोच कर रही हूँ; न कि अपने ॥ ८ दुर्भाग्यके लिये । उस आकाशवाणीने फिर कहा— विशालनयने! तुम रोओ मत । तुम्हारे गर्भसे तो राजाको सात पुत्र होंगे । तुम शीघ्र चितापर चढ़ जाओ । मैं सच कहता हूँ । इसपर तुम आज विश्वास करो । आकाश-॥ ९ चारीके ऐसा कहनेपर उस बालाने श्रेष्ठ पतिको चितापर रखा और पतिका ध्यान करती हुई जलती चिता में प्रवेश कर वह पतिव्रता अग्रिकी शरणमें चली गयी १० ( जल मरी ) ॥ ७ – १० ॥ उसके बाद क्षणभरमें शोभासे सम्पन्न वह राजा पत्नीके साथ उठा और सुनाभकी पुत्री अपनी राजरानीके साथ आकाशमें जाकर स्वच्छन्दतासे भ्रमण करने लगा । ११ नारदजी! आकाशमें जाते हुए उस राजाकी रानी रजस्वला हो गयी । वह राजा दिव्ययोगसे आकाशमें भार्या ( सुदेवा ) - के साथ पाँच दिनोंतक रहा । उसके १२ बाद छठे दिन आज ऋतु व्यर्थ न हो जाय - ऐसा सोचकर कामचारी राजा भार्याके साथ विहार करने । लगा । उसके बाद आकाशसे उसका शुक्र स्खलित हो १३ गया । तपोधन! शुक्र - त्याग करनेके पश्चात् राजा पत्नीके १४ साथ दिव्यगतिसे ब्रह्मलोकको चला गया ॥ ११–१४ ॥ समाना, नलिनी, वपुष्मती, चित्रा, विशाला, हरिता एवं अलिनी - इन सात ऋषि पत्नियोंने आकाशसे गिरते हुए अभ्रकके समान वर्णवाले शुक्रको इच्छाभर देखा । १५ तपोधन! उसे देखकर उसको अमृत समझती हुई उ सबोंने स्थायी युवावस्था प्राप्त करनेकी लालसासे उसे १६ कमलमें रख लिया । उसके बाद वे स्नान करके अपने - अपने पतियोंका पूजनकर उन पतियोंकी अनुमतिसे १७ | कमलमें रखे राजाके उस शुक्रको अमृत मानती हुई

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३५८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७२

तच्छुक्रं पार्थिवेन्द्रस्य मन्यमानास्तदाऽमृतम् ।

पीतमात्रेण शुक्रेण पार्थिवेन्द्रोद्भवेन ताः ॥

ब्रह्मतेजोविहीनास्ता जाता: पल्यस्तपस्विनाम् ।

ततस्तु तत्यजुः सर्वे सदोषास्ताश्च पत्नयः ॥

सुषुवुः सप्त तनयान् रुदतो भरवं मुने ।

तेषां रुदितशब्देन सर्वमापूरितं जगत् ॥

अथाजगाम भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।

समभ्येत्याब्रवीद् बालान् मा रुदध्वं महाबलाः ॥

मरुतो नाम यूयं वै भविष्यध्वं वियच्चराः ।

इत्येवमुक्त्वा देवेशो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

तानादाय वियच्चारी मारुतानादिदेश ह ।

ते त्वासन् मरुतस्त्वाद्या मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥

स्वारोचिषे तु मरुतो वक्ष्यामि शृणु नारद ।

स्वारोचिषस्य पुत्रस्तु श्रीमानासीत् क्रतुध्वजः ॥

तस्य पुत्राभवन् सप्त सप्ताच्चि: प्रतिमा मुने ।

तपोऽर्थं ते गताः शैलं महामेरुं नरेश्वराः ॥

आराधयन्तो ब्रह्माणं पदमैन्द्रमथेप्सवः ।

ततो विपश्चिन्नामाथ सहस्त्राक्षो भयातुरः ॥

पूतनामप्सरोमुख्यां प्राह नारद वाक्यवित् ।

गच्छस्व पूतने शैलं महामेरुं विशालिनम् ॥

तत्र तप्यन्ति हि तपः क्रतुध्वजसुता महत् ।

यथा हि तपसो विघ्नं तेषां भवति सुन्दरि ॥

तथा कुरुष्व मा तेषां सिद्धिर्भवतु सुन्दरि ।

इत्येवमुक्ता शक्रेण पूतना रूपशालिनी ॥

तत्राजगाम त्वरिता यत्रातप्यन्त ते तपः ।

आश्रमस्याविदूरे तु नदी मन्दोदवाहिनी ॥

तस्यां स्त्रातुं समायाताः सर्व एव सहोदराः ।

साऽपि स्नातुं सुचार्वङ्गी त्ववतीर्णा महानदीम् ॥

ददृशुस्ते नृपाः स्त्रातां ततश्चक्षुभिरे मुने ।

तेषां च प्राच्यवच्छुक्रं तत्पपौ जलचारिणी ॥

शङ्खिनी ग्राहमुख्यस्य महाशङ्खस्य वल्लभा ।

तेऽपि विभ्रष्टतपसो जग्मू राज्यं तु पैतृकम् ॥

पान कर गयीं । राजाके शुक्रका पान करते ही तपस्वियों की १८ । वे पत्नियाँ ब्रह्मतेजसे रहित हो गयीं । उसके बाद उन तपस्वी लोगोंने अपनी उन दोषिणी पत्नियोंका त्याग १ ९ कर दिया ॥ १५–१९ ॥ मुने! उन ऋषिकी पत्नियोंने भयंकर रुदन करते २० हुए सात पुत्रोंको जन्म दिया । उनकी रुलाई सारे संसारमें भर गयी । उसके बाद भगवान् लोकपितामह ब्रह्मा आ गये । बालकोंके समीप जाकर उन्होंने २१ कहा - हे महाबलवानो! रोओ मत । तुम्हारा नाम मरुत् होगा । तुम आकाशमें विचरण करनेवाले होओगे । इतना कहकर लोकपितामह देवेश ब्रह्मा उन मरुतोंको २२ लेकर आकाशमें चले गये और उन्हें ( आकाशमें रहनेका ) आदेश दे दिया । वे ही स्वायम्भुव मनुके २३ समयमें ' आद्य मरुत् ' हुए ॥ २०–२३ ॥ नारदजी! अब मैं स्वारोचिष मन्वन्तरके मरुतोंका २४ वर्णन करता हूँ, ( उसे ) सुनो । स्वारोचिषके पुत्र श्रीमान् क्रतुध्वज थे । मुने! उनके अग्रिके समान सात पुत्र थे । वे सभी नरेश्वर तपस्या करनेके लिये महामेरुपर्वतपर २५ चले गये । वे इन्द्रपदको प्राप्त करनेकी इच्छासे ब्रह्माकी आराधना करने लगे । उसके बाद बुद्धिमान् इन्द्र भयभीत २६ हो गये । नारदजी! वक्ताके अभिप्रायको स्पष्टतः समझनेवाले इन्द्रने अप्सराओंमें प्रधान पूतनासे कहा- पूतने! तुम २७ । महान् विशाल मेरुपर्वतपर जाओ ॥ २४-२७ ॥ वहाँ क्रतुध्वजके पुत्र महान् तप कर रहे हैं । २८ सुन्दरि! उनके तपमें जिस प्रकार विघ्न हो तथा सुन्दरि! उन्हें सिद्धिकी प्राप्ति जैसे न हो सके- ऐसा २ ९ उपाय करो । इन्द्रके कहनेपर रूपवती पूतना शीघ्र वहाँ गयी, जहाँ वे तपस्या कर रहे थे । आश्रमके पास ही ३० मन्द जल - प्रवाहवाली नदी थी । सभी सगे भाई उस नदीमें स्नान करनेके लिये आये । वह सुन्दरी भी स्नान ३१ करनेके लिये उस महानदीमें उतरी ॥ २८-३१ ॥ मुने! उन राजपुत्रोंने स्नान करती हुई उस पूतनाको ३२ | देखा और वे क्षुभित हो गये; परिणामतः उनका शुक्रपात हो गया । मछलियोंमें प्रधान महाशङ्खकी प्रिया शङ्खिनीने ३३ । उसे पी लिया । तपके भ्रष्ट हो जानेपर वे भी अपने

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अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष - मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३५ ९

सा चाप्सराः शक्रमेत्य याथातथ्यं न्यवेदयत् ।

तो बहुतिथे काले सा ग्राही शङ्खरूपिणी ॥

समुद्धृता महाजालैर्मत्स्यबन्धेन मानिनी ।

सतां दृष्ट्वा महाशङ्ख स्थलस्थां मत्स्यजीविकः ॥

निवेदयामास तदा क्रतुध्वजसुतेषु वै ।

तथाऽभ्येत्य महात्मानो योगिनो योगधारिणः ॥

नीत्वा स्वमन्दिरं सर्वे पुरवाप्यां समुत्सृजन् ।

ततः क्रमाच्छङ्खिनी सा सुषुवे सप्त वै शिशून् ॥

जातमात्रेषु पुत्रेषु मोक्षभावमगाच्च सा ।

अमातृपितृका बाला जलमध्यविहारिणः ॥

स्तन्यार्थिनो वै रुरुदुरथाभ्यागात् पितामहः ।

मा रुदध्वमितीत्याह मरुतो नाम पुत्रकाः ॥

यूयं देवा भविष्यध्वं वायुस्कन्धविचारिणः ।

इत्येवमुक्त्वाथादाय सर्वांस्तान् दैवतान् प्रति ॥

नियोज्य च मरुन्मार्गे वैराजं भवनं गतः ।

एवमासंश्च मरुतो मनोः स्वारोचिषेऽन्तरे ॥

उत्तमे मरुतो ये च ताञ्छृणुष्व तपोधन ।

उत्तमस्यान्ववाये तु राजासीन्निषधाधिपः ॥

वपुष्मानिति विख्यातो वपुषा भास्करोपमः ।

तस्य पुत्रो गुणश्रेष्ठ ज्योतिष्मान् धार्मिकोऽभवत् ॥

स पुत्रार्थी तपस्तेपे नदीं मन्दाकिनीमनु ।

तस्य भार्या च सुश्रोणी देवाचार्यसुता शुभा ॥

तपश्चरणयुक्तस्य बभूव परिचारिका ।

सा स्वयं फलपुष्पाम्बुसमित्कुशं समाहरत् ॥

चकार पद्मपत्राक्षी सम्यक् चातिथिपूजनम् ।

पतिं शुश्रूषमाणा सा कृशा धमनिसंतता ॥

तेजोयुक्ता सुचार्वङ्गी दृष्टा सप्तर्षिभिर्वने ।

तां तथा चारुसर्वाङ्गीं दृष्ट्वाऽथ तपसा कृशाम् ॥

पप्रच्छुस्तपसो हेतुं तस्यास्तद्भर्तुरेव च ।

साऽब्रवीत् तनयार्थाय आवाभ्यां वै तपःक्रिया ॥

पिताके राज्यमें चले गये । उस अप्सराने भी इन्द्रके पास ३४ जाकर उनसे सत्य तथ्यको बतला दिया । उसके बाद बहुत समयके पश्चात् किसी धीवरने महाजालद्वारा उस शङ्खरूपिणी मानिनी बड़ी मछलीको पकड़ लिया । ३५ मछलीसे जीवनका निर्वाह करनेवाले ( धीवर ) - ने भूमिपर पड़ी हुई उस महाशङ्खीको देखकर क्रतुध्वजके पुत्रोंसे निवेदित किया । योगको धारण करनेवाले वे महात्मा ३६ | योगी उसके निकट गये ॥ ३२–३६ ॥ उन सभीने उसको अपने घर लाकर नगरके ३७ तालाबमें छोड़ दिया । उस शङ्खिनीने क्रमशः सात पुत्रोंको जन्म दिया । पुत्रोंका जन्म होते ही वह शङ्खिनी संसारसे बिदा हो गयी । अब बिना माता - पिताके वे ३८ बालक जलमें विचरण करने लगे । दूधके लिये वे विलखने लगे । उस समय वहाँ पितामह आ गये । ३ ९ उन्होंने ' मत रोओ ' ऐसा कहा । इसीलिये उनका नाम मरुत् हुआ । ' तुमलोग वायुके कंधेपर विचरण करनेवाले ' देवता होगे ' यह कहनेके बाद वे उन सभी देवताओंको ४० ले जाकर उन्हें वायुमार्गमें नियुक्त कर ब्रह्मलोकको चले गये । इस प्रकार स्वारोचिष मनुके समयमें मरुत् ४१ | हुए ॥ ३७ – ४१ ॥ तपोधन! उत्तम ( मन्वन्तर ) - में जो मरुत् थे, अब ४२ उनके विषयमें सुनिये । उत्तमके वंशमें शरीरसे सूर्यके सदृश वपुष्मान् नामके प्रसिद्ध निषधोंके एक राजा थे । ४३ उनका उत्तम गुणोंवाला ज्योतिष्मान् नामका एक धार्मिक पुत्र था । वह पुत्रकी कामनासे मन्दाकिनी नदीके किनारे तपस्या करने लगा । देवताओंके आचार्य बृहस्पतिकी ४४ सुन्दरी पुत्री उसकी कल्याणकारिणी पत्नी थी । वह उस तपस्वीकी सेविका बनी । वह स्वयं फल, पुष्प, जल, ४५ समिधा एवं कुश लाती थी॥४२–४५ ॥ कमलदलके समान नयनोंवाली वह अच्छी तरह ४६ अतिथियोंका सत्कार करती थी । पतिकी सेवा करते हुए उसका शरीर दुबला हो गया तथा नाड़ियाँ दिखायी देने लगीं । सप्तर्षियोंने उस तेजस्विनी सर्वाङ्गसुन्दरीको वनमें ४७ देखा । तपसे दुर्बल उस सर्वाङ्गसुन्दरीको देखकर उन लोगोंने उसकी तथा उसके पतिकी तपस्याका कारण पूछा । ४८ | उसने कहा- हम दोनों पुत्रके लिये तप कर रहे हैं 1 ।

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३६०

ते चास्यै वरदा ब्रह्मन् जाताः सप्त महर्षयः ।

व्रजध्वं तनयाः सप्त भविष्यन्ति न संशयः ॥

युवयोर्गुणसंयुक्ता महर्षीणां प्रसादतः ।

इत्येवमुक्त्वा जग्मुस्ते सर्व एव महर्षयः ॥

स चापि राजर्षिरगात् सभार्यो नगरं निजम् ।

ततो बहुतिथे काले सा राज्ञो महिषी प्रिया ॥

अवाप गर्भं तन्वङ्गी तस्मान्नृपतिसत्तमात् ।

गुर्विण्यामथ भार्यायां ममारासौ नराधिपः ॥

सा चाप्यारोदुमिच्छन्ती भर्तारं वै पतिव्रता ।

निवारिता तदामात्यैर्न तथापि व्यतिष्ठत ॥

समारोप्याथ भर्त्तारं चितायामारुहच्च सा ।

ततोऽग्निमध्यात् सलिले मांसपेश्यपतन्मुने ॥

साऽम्भसा सुखशीतेन संसिक्ता सप्तधाऽभवत् ।

तेऽजायन्ताथ मरुत उत्तमस्यान्तरे मनोः ॥

तामसस्यान्तरे ये च मरुतोप्यभवन् पुरा ।

तानहं कीर्तयिष्यामि गीतनृत्यकलिप्रिय ॥

तामसस्य मनोः पुत्रो ऋतध्वज इति श्रुतः । स पुत्रार्थी जुहावाग्नौ स्वमांसं रुधिरं तथा अस्थीनि रोमकेशांश्च स्नायुमज्जायकृद्घनम् । शुक्रं च चित्रगौ राजा सुतार्थी इति नः श्रुतम् सप्तस्वेवार्चिषु ततः शुक्रपातादनन्तरम् मामा क्षिपस्वेत्यभवच्छब्दः सोऽपि मृतो नृपः ततस्तस्माद्भुतवहात् सप्त तत्तेजसोपमाः शिशवः समजायन्त ते रुदन्तोऽभवन् मुने तेषां तु ध्वनिमाकर्ण्य भगवान् पद्मसम्भवः समागम्य निवार्य्याथ स चक्रे मरुतः सुतान् ॥ ते त्वासन् मरुतो ब्रह्मंस्तामसे देवतागणाः येऽभवन् रैवते तांश्च शृणुष्व त्वं तपोधन रैवतस्यान्ववाये तु राजासीद् रिपुजिद् वशी श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७२ ब्रह्मन्! सातों महर्षियोंने उसे वर दिया - तुम जाओ; ४ ९ महर्षियोंकी कृपासे तुम दोनोंको निःसन्देह सात गुणवान् पुत्र होंगे । इस प्रकार कहकर वे सभी महर्षि ५० चले गये ॥ ४६–५० ॥ वे राजर्षि भी अपनी पत्नीके सहित नगरमें गये । ५१ उसके बाद बहुत समय बीत जानेपर राजाकी उस प्रिय रानीने उन नृपतिश्रेष्ठसे गर्भ धारण किया । भार्याके ५२ गर्भिणी होनेपर वे राजा संसारसे चल बसे । उस | पतिव्रताने अपने पतिके साथ चितापर आरूढ़ होनेकी ५३ इच्छा की । मन्त्रियोंने उसे रोका, परंतु वह रुकी नहीं । पतिको चितापर रखकर वह भी उसपर चढ़ गयी । मुने! उसके बाद अनि बीचसे जलमें एक मांसपेशी गिरी । ५४ अत्यन्त शीतल जलसे संसिक्त होनेपर वह ( मांसपेशी ) सात टुकड़ोंमें अलग - अलग हो गयी । वे ही टुकड़े ५५ उत्तम मनुके कालमें मरुत् हुए ॥ ५१–५५ ॥ हे गीतनृत्यकलिप्रिय ( नारदजी )! पहले तामस ५६ मन्वन्तरमें जो मरुत् हुए ( अब मैं ) उनका वर्णन करूँगा । तामस मनुके पुत्र ऋतध्वज नामसे विख्यात थे । उन्होंने पुत्रकी अभिलाषासे अग्रिमें अपने शरीरके ॥ ५७ मांस और रक्तका हवन किया । हमलोगोंने सुना है कि पुत्रके अभिलाषी ( उन ) राजाने अस्थि, रोम, केश, स्नायु, मज्जा, यकृत् और घने शुक्रकी अग्निमें ॥ ५८ आहुति दी ॥ ५६-५८ ॥ । उसके बाद सातों अग्नियोंमें शुक्रपात होनेपर ॥ ५ ९ ' मत फेंको, मत फेंको ' इस प्रकारका शब्द होने लगा । वे राजा भी मर गये । मुने! उसके बाद उस अग्निसे । सात तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुए और वे रोने लगे । ॥ ६० उनके रोनेकी ध्वनि सुनकर भगवान् कमलयोनि । ( ब्रह्मा ) ने आकर मना किया और उन पुत्रोंको मरुत् ६१ नामका देवता बना दिया । ब्रह्मन्! वे ही तामस मन्वन्तरमें ( मरुद्गण ) नामक देवता हुए । हे तपोधन! । रैवत मन्वन्तरमें जो ( मरुद्गण ) हुए उनका विवरण ॥ ६२ आगे सुनिये –॥५ ९ –६२ ॥ । रैवतके वंशमें शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेवाले रिपुजिन्नामतः ख्यातो न तस्यासीत् सुतः किल ॥ ६३ | संयमी रिपुजित् नामसे विख्यात एक राजा थे । उनको