वामन पुराण — पृष्ठ 381–390
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390
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अध्याय ७५ ] त्रैलोक्य- लक्ष्मीका बलिके तं प्राह भगवान् योगी स्वभावं जगतोऽपि हि । न केवलं हि भवतो हृतं तेन बलीयसा
पश्यस्व तिष्य देवेन्द्रं वरुणं च समारुतम् ।
भास्करोऽपि हि दीनत्वं प्रयातो हि बलाद् बलेः ॥
न तस्य कश्चित् त्रैलोक्ये प्रतिषेद्धाऽस्ति कर्मणः ।
ऋते सहस्त्रं शिरसं हरिं दशशताङ्घ्रिकम् ॥
सभूमिं च तथा नाकं राज्यं लक्ष्मीं यशोऽव्ययः ।
समाहरिष्यति बलेः कर्तुः सद्धर्मगोचरम् ॥
इत्येवमुक्तो देवेन ब्रह्मणा कलिरव्ययः ।
दीनान् दृष्ट्वा स शक्रादीन् विभीतकवनं गतः ॥
कृतः प्रावर्त्तत तदा कलेर्नाशाज्जगत्त्रये ।
धर्मोऽभवच्चतुष्पादश्चातुर्वर्ण्य नारद ॥
ततोऽहिंसा च सत्यं च शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
दया दानं त्वानृशंस्यं शुश्रूषा यज्ञकर्म च ॥
एतानि सर्वजगतः परिव्याप्य स्थितानि हि ।
बलिना बलवान् ब्रह्मन् तिष्योऽपि हि कृतः कृतः ॥
स्वधर्मस्थायिनो वर्णा ह्याश्रमांश्चाविशन् द्विजाः ।
प्रजापालनधर्मस्थाः सदैव मनुजर्षभाः ॥
धर्मोत्तरे वर्तमाने ब्रह्मन्नस्मिञ्जगत्त्रये ।
त्रैलोक्यलक्ष्मीर्वरदा त्वायाता दानवेश्वरम् ॥
तामागतां निरीक्ष्यैव सहस्त्राक्षश्रियं बलिः ।
पप्रच्छ काऽसि मां ब्रूहि केनास्यर्थेन चागता ॥
सा तद्वचनमाकर्ण्य प्राह श्रीः पद्ममालिनी ।
बले शृणुष्व याऽस्मि त्वामायाता महिषी बलात् ॥
अप्रमेयबलो देवो योऽसौ चक्रगदाधरः । तेन त्यक्तस्तु मघवा ततोऽहं त्वामिहागता ।
स निर्ममे युवतयश्चतस्त्रो रूपसंयुताः ।
श्वेताम्बरधरा चैव श्वेतस्त्रगनुलेपना ॥
श्वेतवृन्दारकारूढा सत्त्वाढ्या श्वेतविग्रहा ।
रक्ताम्बरधरा चान्या रक्तस्रगनुलेपना ॥
यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति ३७१ योगी भगवान् ब्रह्माने उससे कहा- केवल तुम्हारा ॥ ५ ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण लोकका स्वभाव उस बलशालीने हरण कर लिया है । कले! मरुत्के साथ वरुण और ६ देवेन्द्रको देखो । बलिके पराक्रमसे सूर्य भी निस्तेज - से हो गये हैं । सहस्रशीर्षा तथा सहस्रपाद् ( विष्णु ) - के सिवा तीनों लोकोंमें उसके कर्मको बंद करनेवाला कोई ७ नहीं दीखता है । वे अविनाशी बलिद्वारा किये गये सद्धर्मके हेतु मिली हुई उसकी भूमि, स्वर्ग, राज्य, ८ लक्ष्मी एवं यशका अपहरण करेंगे ॥ ५–८ ॥ भगवान् ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर अव्यय ९ कलि, इन्द्र आदि देवताओंको चिन्तित हुआ देखकर विभीतक वनमें चला गया । नारदजी! कलिके अदृश्य हो जानेसे तीनों लोकोंमें सत्ययुग प्रवर्तित हो गया । १० चारों वर्णोंमें चारों चरणोंसे धर्म व्याप्त हो गया । तपस्या, अहिंसा, सत्य, पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, दया, ११ दान, मृदुता, सेवा और यज्ञकार्य – ये सभी समस्त जगत् में छा गये । ब्रह्मन्! बलिने बलशाली कलिको भी १२ सत्ययुग बना दिया ॥ ९ –१२ ॥ सभी वर्ण अपने - अपने धर्ममें स्थित हो गये । १३ द्विजगण अपने - अपने आश्रमोंका पालन करने लगे तथा राजा प्रजापालनरूपी धर्मका आचरण करने लगे । ब्रह्मन्! इन तीनों लोकोंके धर्म - परायण होनेपर वरदायिनी १४ त्रैलोक्यलक्ष्मी दानवराज बलिके पास आयीं । इन्द्रकी लक्ष्मीको उपस्थित हुई देखकर बलिने पूछा- मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो और किस उद्देश्यसे आयी १५ हो । कमलकी मालासे अलंकृत लक्ष्मीने उसकी बात सुनकर कहा- बले! मैं हठात् तुम्हारे पास आयी हूँ; मैं १६ जो ( स्त्री ) हूँ उसे सुनो –॥१३–१६ ॥ अमित शक्तिशाली चक्र और गदाको धारण १७ करनेवाले देव विष्णुने इन्द्रको छोड़ दिया है । अतः मैं यहाँ तुम्हारे पास आयी हूँ । उन्होंने ( विष्णुने ) रूपसे सम्पन्न चार युवतियोंकी सृष्टि की । ( पहली युवती ) सत्त्वप्रधाना, श्वेतवर्णकी शरीरवाली, श्वेतवर्णका वस्त्र १८ धारण करनेवाली, श्वेतमाल्य और अनुलेपनसे युक्त एवं श्वेत गजपर आरूढ़ थी । ( दूसरी युवती ) रजोगुणप्रधाना, रक्तवर्णकी शरीरवाली, रक्तवर्णके वस्त्रको धारण १ ९ | करनेवाली, रक्तवर्णके माल्य और अनुलेपनसे युक्त
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३७२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७५
रक्तवाजिसमारूढा रक्ताङ्गी राजसी हि सा ।
पीताम्बरा पीतवर्णा पीतमाल्यानुलेपना ॥
सौवर्णस्यन्दनचरा तामसं गुणमाश्रिता ।
नीलाम्बरा नीलमाल्या नीलगन्धानुलेपना ॥
नीलवृषसमारूढा त्रिगुणा सा प्रकीर्तिता ।
या साश्वेताम्बरा श्वेता सत्त्वाढ्या कुञ्जरस्थिता ॥
सा ब्रह्माणं समायाता चन्द्रं चन्द्रानुगानपि ।
या रक्ता रक्तवसना वाजिस्था रजसान्विता ॥
तां प्रादाद् देवराजाय मनवे तत्समेषु च ।
पीताम्बरा या सुभगा रथस्था कनकप्रभा ॥
प्रजापतिभ्यस्तां प्रादाच्छुक्राय च विशःसु च ।
नीलवस्त्राऽलिसदृशी या चतुर्थी वृषस्थिता ॥
सा दानवान् नैर्ऋतांश्च शूद्रान् विद्याधरानपि ।
विप्राद्याः श्वेतरूपां तां कथयन्ति सरस्वतीम् ॥
स्तुवन्ति ब्रह्मणा सार्धं मखे मन्त्रादिभिः सदा ।
क्षत्रिया रक्तवर्णां ता जयश्रीमिति शंसिरे ॥
सा चेन्द्रेणासुरश्रेष्ठ मनुना च यशस्विनी ।
वैश्यास्तां पीतवसनां कनकाङ्गीं सदैव हि ॥
स्तुवन्ति लक्ष्मीमित्येवं प्रजापालास्तथैव हि ।
शूद्रास्तां नीलवर्णाङ्गीं स्तुवन्ति च सुभक्तितः ॥
श्रिया देवीति नाम्ना तां समं दैत्यैश्च राक्षसैः ।
एवं विभक्तास्ता नार्यस्तेन देवेन चक्रिणा ॥
एतासां च स्वरूपस्थास्तिष्ठन्ति निधयोऽव्ययाः ।
इतिहासपुराणानि वेदाः साङ्गास्तथोक्तयः ॥
चतुःषष्टिकलाः श्वेता महापद्मो निधिः स्थितः ।
मुक्तासुवर्णरजतं रथाश्वगजभूषणम् ॥
शस्त्रास्त्रादिकवस्त्राणि रक्ता पद्मो निधिः स्मृतः ।
गोमहिष्यः खरोष्ट्रं च सुवर्णाम्बरभूमयः ॥
ओषध्यः पशवः पीता महानीलो निधिः स्थितः ।
सर्वासामपि जातीनां जातिरेका प्रतिष्ठिता ॥
तथा रक्तवर्णके अश्वपर आरूढ़ थी । ( तीसरी युवती ) २० तमोगुण - प्रधाना, पीतवर्णके शरीरवाली, पीतवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली, पीतवर्णकी माला और अनुलेपनसे युक्त तथा सुवर्णके बने रथपर आरूढ़ थी । २१ ( चौथी युवती ) त्रिगुण - प्रधाना, नील शरीरवाली, नीलेवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली एवं नीले वर्णकी माला, चन्दन और अनुलेपनसे युक्त तथा नील वर्णके २२ वृषपर आरूढ़ थी । सत्त्वप्रधाना, श्वेतवर्णकी शरीरवाली, श्वेतवस्त्र धारण करनेवाली हाथीपर आरूढ़ ( युवती ) ब्रह्मा, चन्द्रमा एवं चन्द्रमाके अनुयायियोंके पास चली २३ गयी । रजोगुणसे युक्त, रक्तवर्णकी शरीरवाली, रक्तवस्त्र धारण करनेवाली एवं घोड़ेपर आरूढ़ युवतीको ( उन्होंने ) इन्द्र, मनु तथा उनके समानवाले लोगोंको २४ प्रदान किया । कनकवर्णकी शरीरवाली, पीतवर्णके वस्त्र धारण करनेवाली, सौभाग्यवती, रथपर आरूढ़ा युवतीको ( उन्होंने ) प्रजापतियों, शुक्र एवं वैश्योंको २५ दिया । नीलवर्णके वस्त्रको धारण करनेवाली, भ्रमरके समान, वृषपर स्थित चौथी ( युवती ) दानवों, नैर्ऋतों, शूद्रों एवं विद्याधरोंके पास चली गयी । उस श्वेतरूपाको २६ विप्र आदि सरस्वती कहते हैं ॥ १७–२६ ॥ यज्ञमें वे ब्रह्माके सहित उसका मन्त्रादिसे सदा २७ स्तुति करते हैं । क्षत्रियजन उस रक्तवर्णाको जयश्री कहते हैं । असुरश्रेष्ठ! वह इन्द्र तथा मनुके साथ यशोमती २८ हुई । वैश्य तथा प्रजापतिगण उस पीतवसना कनकाङ्गीकी स्तुति सदा लक्ष्मीके नामसे करते हैं । दैत्यों एवं राक्षसोंके साथ शूद्रगण श्रीदेवीके नामसे भक्तिपूर्वक उस २ ९ नीलवर्णाङ्गीकी स्तुति करते हैं । इस प्रकार उन चक्र धारण करनेवाले देवने उन नारियोंका विभाजन ३० | किया ॥ २७–३० ॥ अक्षय निधियाँ इनके स्वरूपमें स्थित हैं । इतिहास, ३१ | पुराण, साङ्ग वेद, स्मृतियाँ, चौंसठ कलाएँ तथा महापद्म निधि श्वेताङ्गीके अन्तर्गत हैं । मुक्ता, सुवर्ण, रजत, रथ, ३२ | अश्व, गज, भूषण, शस्त्र, अस्त्र एवं वस्त्रस्वरूप पद्मनिधि रक्ताङ्गीके अन्तर्गत हैं । गौ, भैंस, गर्दभ, उष्ट्र, ३३ | सुवर्ण, वस्त्र, भूमि, ओषधियाँ एवं पशुस्वरूप महानील निधि पीताङ्गीमें स्थित हैं । अन्य सभी जातियोंको अपनेमें ३४ | समाविष्ट करनेवाली सारी जातियोंमें सर्वश्रेष्ठ जाति
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अध्याय ७५ ] त्रैलोक्य- लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति ३७३ अन्येषामपि संहर्त्री नीला शङ्खो निधिः स्थितः ।
एतासु संस्थितानां च यानि रूपाणि दानव ।
भवन्ति पुरुषाणां वै तान् निबोध वदामि ते ॥
सत्यशौचाभिसंयुक्ता मखदानोत्सवे रताः ।
भवन्ति दानवपते महापद्माश्रिता नराः ॥
यज्वनः सुभगा दृप्ता मानिनो बहुदक्षिणाः ।
सर्वसामान्यसुखिनो नराः पद्माश्रिताः स्मृताः ॥
सत्यानृतसमायुक्ता दानाहरणदक्षिणाः ।
न्यायान्यायव्ययोपेता महानीलाश्रिता नराः ॥
नास्तिकाः शौचरहिताः कृपणा भोगवर्जिताः ।
स्तेयानृतकथायुक्ता नराः शङ्खश्रिता बले ॥
इत्येवं कथितस्तुभ्यं तेषां दानव निर्णयः ॥
अहं सा रागिणी नाम जयश्रीस्त्वामुपागता ।
ममास्ति दानवपते प्रतिज्ञा साधुसम्मता ॥
समाश्रयामि शौर्याढ्यं न च क्लीबं कथंचन ।
न चास्ति भवतस्तुल्यो त्रैलोक्येऽपि बलाधिकः ॥
त्वया बलविभूत्या हि प्रीतिर्मे जनिता ध्रुवा ।
यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराजो विनिर्जितः ॥
अतो मम पुरा प्रीतिर्जाता दानव शाश्वती ।
दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं सर्वेभ्योऽपि बलाधिकम् ॥
शौण्डीर्यमानिनं वीरं ततोऽहं स्वयमागता ।
नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले ॥
प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्म यदीदृशम् ।
विशेषितस्त्वया राजन् दैतेयः प्रपितामहः ॥
विजितं विक्रमाद् येन त्रैलोक्यं वै परैर्हतम् ।
इत्येवमुक्त्वा वचनं दानवेन्द्रं तदा बलिम् ॥
जयश्रीश्चन्द्रवदना प्रविष्टाऽद्योतयच्छुभा ।
तस्यां चाथ प्रविष्टायां विधवा इव योषितः ॥
समाश्रयन्ति बलिनं ह्री श्रीधीधृतिकीर्त्तयः ।
प्रभा मतिः क्षमा भूतिर्विद्या नीतिर्दया तथा ॥
( परसामान्यात्मक ) स्वरूप देवी स्थिति है । दानव! इन अन्तर्गत पुरुषोंके जो लक्षण ३५ कर रही हूँ, उन्हें समझो -दानवपते! महापद्मके ३६ सत्य और शौचसे युक्त तथा करनेमें लीन रहते हैं । पद्मके यज्ञ करनेवाले, सौभाग्यशाली, ३७ शङ्खनिधिकी नीलाङ्गी ( निधियों ) के स्वरूपके होते मैं उनका वर्णन ॥ ३१–३५ ॥ आश्रित रहनेवाले मनुष्य यजन, दान और उत्सव आश्रित रहनेवाले मनुष्य अहङ्कारी, मानप्रिय, बहुत दक्षिणा देनवाले तथा सर्वसाधारण लोगोंसे सुखी होते हैं । महानीलके आश्रित रहनेवाले व्यक्ति सत्य तथा असत्यसे ३८ युक्त, देने और लेनेमें चतुर तथा न्याय, अन्याय और व्यय करनेवाले होते हैं । बले! शङ्खके आश्रित रहनेवाले ३ ९ पुरुष नास्तिक, अपवित्र, कृपण, भोगहीन, चोरी करनेवाले एवं असत्य बोलनेवाले होते हैं । दानव! मैंने इस प्रकार ४० । आपसे उनके स्वरूपका वर्णन किया ॥ ३६-४० ॥ वही रागिणी नामकी जयश्री मैं आपके पास ४१ । आयी हूँ । दानवपते! मेरी साधुजनोंसे अनुमोदित एक प्रतिज्ञा है । मैं वीर पुरुषका आश्रयण करती हूँ । नपुंसकके पास कभी नहीं जाती । तीनों लोकोंमें आपके ४२ सदृश बलवान् दूसरा कोई नहीं है । अपनी बल-सम्पत्तिसे तुमने मेरेमें दृढ़ प्रीति उत्पन्न की है, क्योंकि ४३ संग्राममें पराक्रम कर तुमने देवराजको जीता है । दानव! इसीसे आपके श्रेष्ठ सत्त्व एवं सभीसे अधिक बलको देखकर ( आपके प्रति ) मेरी स्थायी एवं उत्तम प्रीति ४४ उत्पन्न हो गयी है ॥ ४१–४४ ॥ अतः मैं अत्यन्त बलशाली तथा मानी वीर आपके ४५ पास अपने आप ही आयी हूँ । दानवश्रेष्ठ! हिरण्यकशिपुके वंशमें उत्पन्न आप असुरेन्द्रके लिये इस प्रकारके कर्मों ४६ करनेमें कोई आश्चर्य नहीं है । राजन्! शत्रुओंद्वारा अधिकृत त्रैलोक्यको अपने पराक्रमसे जीतकर आपने दितिके पुत्र ४७ अपने प्रपितामहको और विशिष्ट कर दिया है । दानवेन्द्र बलिसे इस प्रकार कहकर चन्द्रवदना शुभा जयश्री ४८ ( बलिमें ) प्रवेश करके ( उन्हें ) प्रकाशित करने लगी । उनके प्रवेश कर जानेपर ही, श्री, धी ( बुद्धि ), धृति, कीर्ति, ४ ९ प्रभा, मति, क्षमा, भूति ( समृद्धि ), विद्या, नीति, दया,
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३७४ श्रुतिः स्मृतिर्धृतिः कीर्तिर्मूर्तिः शान्तिः क्रियान्विताः ।
पुष्टिस्तुष्टी रुचिस्त्वन्या तथा सत्त्वाश्रिता गुणाः ।
ताः सर्वा बलिमाश्रित्य व्यश्राम्यन्त यथासुखम् ॥
एवं गुणोऽभूद् दनुपुङ्गवोऽसौ बलिर्महात्मा शुभबुद्धिरात्मवान् । तपस्वी मृदुरेव सत्यवाग् दाता विभर्ता स्वजनाभिगोप्ता ॥ त्रिविष्टपं शासति दानवेन्द्रे नासीत् क्षुधार्तो मलिनो न दीनः सोज्ज्वलो धर्मरतोऽथ दान्तः कामोपभोक्ता मनुजोऽपि जातः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७६ श्रुति, स्मृति, धृति, कीर्ति, मूर्ति, शान्ति, क्रिया, पुष्टि, तुष्टि, रुचि एवं अन्य सभी सत्त्वगुणके आश्रित अन्य देवियाँ ५० भी विधवा स्त्रियोंकी भाँति बलिकी छत्रछायामें आनन्दपूर्वक रहने लगीं । अच्छी बुद्धिवाले, आत्मनिष्ठ, यज्ञ करनेवाले, तपस्वी, कोमल स्वभाववाले, सत्यवक्ता, दानी, अभावग्रस्तोंके अभावको दूरकर पालन - पोषण एवं स्वजनोंकी रक्षा करनेवाले दैत्यश्रेष्ठ महात्मा बलि ५१ इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न थे । दानवेन्द्र बलिके स्वर्गका शासन करते समय कोई भूखसे दुखी, मलिन । एवं अभावग्रस्त नहीं था । मनुष्य भी सदा शुद्ध धर्म-परायण, इन्द्रियविजयी एवं इच्छानुकूल भोगसे सम्पन्न ॥ ५२ हो गये ॥ ४५–५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७५ ॥
छिहत्तरवाँ अध्याय प्रायश्चित्त - हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति, वासुदेवका अदितिके पुत्र बननेका आश्वासन और स्वतेजसे अदिति के गर्भमें प्रवेश पुलस्त्य उवाच
गते त्रैलोक्यराज्ये तु दानवेषु पुरन्दरः ।
जगाम ब्रह्मसदनं सह देवैः शचीपतिः ॥
तत्रापश्यत् स देवेशं ब्रह्माणं कमलोद्भवम् ।
ऋषिभिः सार्धमासीनं पितरं स्वं च कश्यपम् ॥
ततो ननाम शिरसा शक्रः सुरगणैः सह ।
ब्रह्माणं कश्यपं चैव तांश्च सर्वांस्तपोधनान् ॥
प्रोवाचेन्द्रः सुरैः सार्धं देवनाथं पितामहम् ।
पितामह हृतं राज्यं बलिना बलिना मम ॥
ब्रह्मा प्रोवाच शक्रैतद् भुज्यते स्वकृतं फलम् ।
शक्रः पप्रच्छ भो ब्रूहि किं मया दुष्कृतं कृतम् ॥
कश्यपोऽप्याह देवेशं भ्रूणहत्या कृता त्वया ।
दित्युदरात् त्वया गर्भः कृत्तो वै बहुधा बलात् ॥
पुलस्त्यजी बोले – ( नारदजी! ) तीनों लोकोंका राज्य दानवोंके अधीन हो जानेपर शचीपति इन्द्र देवोंके १ साथ ब्रह्मलोक गये । वहाँ उन्होंने ऋषियोंके साथ बैठे हुए कमलयोनि ब्रह्मा एवं अपने पिता कश्यपको देखा । २ उसके बाद इन्द्रने देवताओंके सहित ब्रह्मा, कश्यप एवं उन सभी तपोधनोंको सिर झुकाकर प्रणाम किया । देवोंके साथ इन्द्रने देवनाथ पितामहसे कहा - पितामह! ३ बलवान् बलिने मेरा राज्य छीन लिया है । ब्रह्माने कहा – इन्द्र! यह तुम अपने किये हुए कर्मका फल ४ भोग रहे हो । इन्द्रने पूछा- कृपया आप बतलाइये कि मैंने कौन - सा दुष्कर्म किया है । कश्यपने भी ( उत्तरमें ) ५ इन्द्रसे कहा- तुमने भ्रूण ( गर्भस्थित बालक ) - की हत्या की है । तुमने दितिके उदरमें स्थित गर्भको बलपूर्वक ६ । अनेक टुकड़ोंमें काट डाला है॥१–६ ॥
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अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७५ पितरं प्राह देवेन्द्रः स मातुर्दोषतो विभो । इन्द्र अपने पिता कश्यपसे कहा - विभो! जननीके कृन्तनं प्राप्तवान् गर्भो यदशौचा हि साभवत् ॥ ७ दोषसे वह गर्भ छिन्न हुआ था; क्योंकि वे अपवित्र हो ततोऽब्रवीत् कश्यपस्तु मातुर्दोषः स दासताम् । गयी थीं । उसके बाद कश्यपने कहा- माताके दोषसे गतस्ततो विनिहतो दासोऽपि कुलिशेन भो तच्छ्रुत्वा कश्यपवचः प्राह शक्रः पितामहम् विनाशं पाप्मनो ब्रूहि प्रायश्चित्तं विभो मम
ब्रह्मा प्रोवाच देवेशं वसिष्ठः कश्यपस्तथा ।
हितं सर्वस्य जगतः शक्रस्यापि विशेषतः ॥
शङ्खचक्रगदापाणिर्माधवः पुरुषोत्तमः ।
तं प्रपद्यस्व शरणं स ते श्रेयो विधास्यति ॥
सहस्राक्षोऽपि वचनं गुरूणां स निशम्य वै ।
प्रोवाच स्वल्पकालेन कस्मिन् प्राप्यो बहूदयः ।
तमूचुर्देवता मर्त्ये स्वल्पकाले महोदयः ॥
इत्येवमुक्तः सुरराड् विरिञ्चिना चित्रे च कश्यपेन । तथैव मित्रावरुणात्मजेन वेगान्महीपृष्ठमवाप्य तस्थौ ॥ कालिञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्य-स्तथा हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः । कुशस्थलात् पूर्वत एव विश्रुतो वसोः पुरात् पश्चिमतोऽवतस्थे ॥ पूर्वं येन वरेण यत्र यष्टोऽश्वमेधः शतकृत्सदक्षिणः । मनुष्यमेधः शतकृत्सहस्रकृन् नरेन्द्रसूयश्च सहस्रकृद् वै ॥ तथा पुरा दुर्यजन सुरासुरैः ख्यातो महामेध इति प्रसिद्धः । यत्रास्य चक्रे भगवान् मुरारिः वास्तव्यमव्यक्ततनुः खमूर्तिमत् । ख्यातिं जगामाथ गदाधरेति महाघवृक्षस्य शितः कुठारः ॥ यस्मिन् द्विजेन्द्राः श्रुतिशास्त्रवर्जिताः समत्वमायान्ति पितामहेन । सकृत् पितॄन् यत्र च सम्प्रपूज्य भक्त्या त्वनन्येन हि चेतसैव । फलं महामेधमखस्य मानवा लभन्त्यनन्त्यं भगवत्प्रसादात् ॥ महानदी यत्र सुरर्षिकन्या जलापदेशाद्धिमशैलमेत्य I वह दासताको प्राप्त हो चुका था, उसके बाद तुमने ॥ ८ दासको भी वज्रसे मारा । कश्यपके उस वचनको । सुनकर इन्द्रने पितामहसे कहा - विभो! मुझे पापका ॥ ९ नाश करनेवाला प्रायश्चित्त बतला दीजिये । ब्रह्मा, वसिष्ठ एवं कश्यपने देवेश ( इन्द्र ) - से सब जगत् के लिये-१० विशेषरूपसे इन्द्रके लिये हितकारी वचन कहा- तुम शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमभगवान् लक्ष्मीपति श्रीविष्णुकी शरणमें जाओ । वे तुम्हारा कल्याण ११ करेंगे । उन सहस्राक्षने गुरुजनोंका वचन सुनकर कहा— थोड़े समयमें अधिक - से - अधिक उन्नतिकी प्राप्ति कहाँ सम्भव है? देवोंने उनसे कहा - स्वल्प समयमें १२ महती उन्नति मर्त्यलोकमें सम्भव है॥७–१२ ॥ ब्रह्मा, मरीचिपुत्र कश्यप एवं वसिष्ठके ऐसा कहनेपर सुरराज इन्द्र तेजीसे पृथ्वीतलपर आ गये । वे १३ | कालिञ्जर पर्वतके उत्तर, हिमाद्रिके दक्षिण, कुशस्थलके पूर्व एवं वसुपुर पश्चिममें स्थित विख्यात पुण्य स्थानमें रहने लगे - जहाँ पहले राजा गयने दक्षिणाके साथ सौ १४ अश्वमेधयज्ञ, ग्यारह सौ नरमेधयज्ञ तथा एक हजार राजसूययज्ञका अनुष्ठान किया था । उसी प्रकार पहले ( उसने ) जहाँपर सुरों एवं असुरोंसे कठिनाईसे किया जा १५ | सकनेवाला महामेध नामक प्रसिद्ध यज्ञ अनुष्ठित किया था और उसके लिये जहाँ आकाशस्वरूप अव्यक्तशरीरी मुरारि ( विष्णु ) - ने वहाँ निवास किया था । इसके बाद वे गदाधर नामसे प्रसिद्ध हुए, जो महान् अघरूपी वृक्षके १६ । लिये तीक्ष्ण कुठारस्वरूप हैं ॥ १३–१६ ॥ जहाँ वेद - शास्त्रसे रहित होनेपर भी कुलीन श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्मकी समानता प्राप्त करते हैं एवं मनोयोग से भक्तिसहित मनुष्य एक बार भी पितरोंका पूजन भगवान् के अनुग्रहसे महामेध नामक यज्ञका अनन्त फल १७ प्राप्त कर लेते हैं, वहाँ देवर्षिकी कन्या श्रेष्ठ महानदी है, जो जलरूपसे हिमालयपर प्रवहमान होकर अपने दर्शन,
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३७६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७६ चक्रे जगत्पापविनष्टिमग्र्यां संदर्शनप्राशनमज्जनेन ॥
तत्र शक्रः समभ्येत्य महानद्यास्तटेऽद्भुते ।
आराधनाय देवस्य कृत्वाश्रममवस्थितः ॥
प्रातः स्नायी त्वधःशायी एकभुक्तस्त्वयाचितः ।
तपस्तेपे सहस्त्राक्षः स्तुवन् देवं गदाधरम् ॥
तस्यैवं तप्यतः सम्यग्जितसर्वेन्द्रियस्य हि ।
कामक्रोधविहीनस्य साग्रः संवत्सरो गतः ॥
ततो गदाधरः प्रीतो वासवं प्राह नारद ।
गच्छ प्रीतोऽस्मि भवतो मुक्तपापोऽसि साम्प्रतम् ॥
निजं राज्यं च देवेश प्राप्स्यसे नचिरादिव ।
यतिष्यामि तथा शक्र भावि श्रेयो यथा तव ॥
इत्येवमुक्तोऽथ गदाधरेण
विसर्जितः स्नाप्य मनोहरायाम् ।
स्नातस्य देवस्य तदैनसो नरा-स्तं प्रोचुरस्माननुशासयस्व ॥
प्रोवाच तान् भीषणकर्मकारान्
नाम्ना पुलिन्दान् मम पापसम्भवाः ।
वसध्वमेवान्तरमद्रिमुख्ययो-हिमाद्रिकालिञ्जरयोः पुलिन्दाः ॥
इत्येवमुक्त्वा सुरराट् पुलिन्दान् विमुक्तपापोऽमरसिद्धयक्षैः सम्पूज्यमानोऽनुजगाम चाश्रमं प्रणम्य पप्रच्छ मातुस्तदा धर्मनिवासमीड्यम् ॥ मूर्ध्नि कृताञ्जलिस्तु विनम्रमौलिः समुपाजगाम । पादौ कमलोदराभ निवेदयामास तपस्तदात्मनः ॥ सा कारणमीश्वरं त-माघ्राय चालिङ्ग्य सहाश्रुदृष्ट्या । स चाचचक्षे बलिना ' रणे जयं तदात्मनो देवगणैश्च सार्धम् ॥ श्रुत्वैव सा शोकपरिप्लुताङ्गी ज्ञात्वा जितं दैत्यसुतैः सुतं तम् । दुःखान्विता देवमनाद्यमीड्यं जगाम विष्णुं शरणं वरेण्यम् ॥ नारद उवाच कस्मिन् जनित्री सुरसत्तमानां
स्थाने हृषीकेशमनन्तमाद्यम् ।
चराचरस्य प्रभवं पुराण-माराधयामास शुभे वद त्वम् ॥
पान एवं मज्जन करनेसे जगत्के पापोंको विनष्ट करती १८ है । विष्णुकी आराधना करनेके लिये इन्द्र वहाँ महानदीके विचित्र तटपर गये और आश्रम बनाकर रहने लगे । वे १ ९ प्रात: काल स्नान, भूमिपर शयन एवं बिना माँगे मिले हुए पदार्थसे एक समय भोजन करते हुए गदाधारी देवकी स्तुति करते हुए तपस्या करने लगे । सर्वथा जितेन्द्रिय २० एवं काम - क्रोधादिसे रहित होकर इस प्रकार तपस्या करते हुए उनका एक वर्ष बीत गया । नारदजी! उसके २१ बाद गदा धारण करनेवाले विष्णुने प्रसन्न होकर इन्द्रसे कहा -जाओ, मैं प्रसन्न हूँ; अब तुम पापसे मुक्त हो २२ गये हो ॥ १७ –२२ ॥ देवेश! ( अब ) तुम शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त २३ कर लोगे । इन्द्र! जैसे तुम्हारा आगेका श्रेय ( कल्याण ) होगा, वैसा ही मैं प्रयत्न करूँगा । गदाधर श्रीविष्णुने ऐसा कहनेके बाद इन्द्रको मनोहरा नदीमें स्नान कराकर बिदा कर दिया । इन्द्र स्नान कर लेनेपर उनके पाप - पुरुषोंने २४ उनसे कहा- हमें अनुशासित कीजिये । ( इन्द्रने ) उन भयंकर कर्म करनेवाले लोगोंसे कहा- मेरे पापसे उत्पन्न तुम लोग पुलिन्द कहे जाओगे । तुम लोग हिमालय एवं कालिञ्जर नामके दोनों श्रेष्ठ पर्वतोंके २५ बीचकी भूमिमें निवास करो । पुलिन्दोंसे ऐसा कहनेके पश्चात् पापसे मुक्त हुए सुरराज देवों, सिद्धों एवं यक्षोंसे पूजित होते हुए माता धर्मके आश्रयरूप पूज्य आश्रममें २६ चले गये ॥ २३ - २६ ॥ अदितिका दर्शन कर हाथ जोड़ तथा सिर झुकाकर इन्द्र उनके समीप आये एवं उनके कमलकी कान्तिवाले चरणोंमें प्रणाम करनेके बाद उन्होंने अपनी तपस्याका २७ वर्णन किया । उन ( अदिति ) - ने अश्रुपूर्ण दृष्टिसे ( इन्द्रको ) सूँघा एवं उनको गले लगाकर ( तपस्याका कारण पूछा । इन्द्रने बलिद्वारा देवोंसहित अपने पराजित होनेका २८ पूरा समाचार कह सुनाया । यह सुननेके बाद अपने उस पुत्रको दितिके पुत्रोंद्वारा पराजित जान शोकसे भर गयीं एवं दुःखसे दुखी होकर ( अदिति ) वरेण्य एवं अनादि २ ९ देव विष्णुकी शरणमें गयीं ॥ २७–२९ ॥ नारदने कहा ( पूछा ) - ( कृपया ) आप यह बतलाइये कि देवोंकी माता अदितिने किस शुभ स्थानपर अनादि, अनन्त, चर और अचरके उत्पन्न करनेवाले ३० । एवं पुरातन हृषीकेशकी आराधना की? ॥ ३० ॥
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अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७७ पुलस्त्य उवाच सुरणि: शक्रमवेक्ष्य दीनं पराजितं दानवनायकेन । सितेऽथ पक्षे मकरर्क्षगेऽर्के घृतार्चिषः स्यादथ सप्तमेऽह्नि ॥ दृष्ट्वैव देवं त्रिदशाधिपं तं महोदये शक्रदिशाधिरूढम् । निराशना संयतवाक् सुचित्ता तदोपतस्थे शरणं सुरेन्द्रम् ॥ अदितिरुवाच जयस्व दिव्याम्बुजकोशचौर
जयस्व संसारतरोः कुठार ।
जयस्व पापेन्धनजातवेद-स्तमौघसंरोध नमो नमस्ते ॥
भास्कर दिव्यमूर्ते त्रैलोक्यलक्ष्मीतिलकाय ते नमः । त्वं कारणं सर्वचराचरस्य नाथोऽसि मां पालय विश्वमूर्ते ॥ त्वया जगन्नाथ जगन्मयेन नाथेन शक्रो निजराज्यहानिम् । अवाप्तवाञ् शत्रुपराभवं च ततो भवन्तं शरणं प्रपन्ना ॥ इत्येवमुक्त्वा सुरपूजितं सा आलिख्य रक्तेन हि चन्दनेन । सम्पूजयित्वा करवीरपुष्पैः संधूप्य धूपैः कणमर्कभोज्यम् ॥ निवेद्य चैवाज्य महा-मन्नं महेन्द्रस्य हिताय देवी । स्तवेन पुण्येन च संस्तुवती स्थिता निराहारमथोपवासम् ॥ ततो द्वितीयेऽह्नि कृतप्रणामा स्नात्वा विधानेन च पूजयित्वा । दत्त्वा द्विजेभ्यः कणकं तिलाज्यं ततोऽग्रतः सा प्रयता बभूव ॥
ततः प्रीतोऽभवद् भानुर्धृतार्चिः सूर्यमण्डलात् ।
विनिःसृत्याग्रतः स्थित्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥
व्रतेनानेन सुप्रीतस्तवाहं दक्षनन्दिनि ।
प्राप्स्यसे दुर्लभं कामं मत्प्रसादान्न संशयः ॥
राज्यं त्वत्तनयानां वै दास्ये देवि सुरारणि ।
दानवान् ध्वंसयिष्यामि सम्भूयैवोदरे तव ॥
पुलस्त्यजी बोले- दानव - नायकद्वारा पराजित हुए दीन बने इन्द्रको देखकर अदिति सूर्यके मकर-राशिमें स्थित हो जानेपर शुक्लपक्षकी सूर्य सप्तमीके ३१ दिन उन सुरोंके स्वामी सूर्यदेवको महान् उदयाचलपर पूर्व दिशामें उगनेपर देखकर उपवास करती हुई वाणी एवं मनको संयत करके उन सुरेन्द्र ( सूर्य ) - की ३२ | शरणमें गयीं ॥३१-३२ ॥ अदितिने कहा- हे दिव्य कमलकोशको अपनेमें छिपाकर रखनेवाले! आपकी जय हो । हे संसाररूपी वृक्षके कुठार! आपकी जय हो । हे पापरूपी इन्धनके लिये अग्रि! आपकी जय हो । हे अन्धकार ( अज्ञान ) -३३ के समूहके विनाश करनेवाले! आपको बारम्बार नमस्कार है । हे भास्कर! हे दिव्यमूर्ते! आपको नमस्कार है । हे त्रैलोक्य- लक्ष्मीके स्वामिन्! आपको ३४ नमस्कार है । आप समस्त चर और अचर जगत्के कारण तथा स्वामी हैं । हे विश्वमूर्ते! आप मेरी रक्षा कीजिये । हे जगन्नाथ! जगन्मय आप स्वामीके ही कारण इन्द्रको अपने राज्यकी हानि एवं शत्रुसे ३५ पराभवकी भी प्राप्ति हुई है । अतः मैं आपकी शरण में आयी हूँ । ऐसा कहनेके बाद रक्तचन्दनद्वारा देवोंसे पूजित सूर्यको चित्रितकर उन देवी ( अदिति ) - ने ३६ | कनैरके पुष्पोंसे उनका पूजन किया और धूपसे धूपित करनेके बाद महेन्द्रकी भलाईके लिये सूर्यके लिये घृतसे बने उत्तम अन्न अर्पित किया तथा निराहार रहकर पवित्र स्तोत्रोंसे स्तुति करती हुई ( साधनामें ) ३७ बैठी रहीं ॥ ३३-३७ ॥ दूसरे दिन प्रणाम करनेके बाद विधिसे स्नान एवं पूजा करके उन्होंने ब्राह्मणोंको कणक, तिल एवं घृत प्रदान किया और उसके बाद वे और अधिक संयत रहने लगीं । ३८ इससे घृतार्चि भानु प्रसन्न हो गये । ( वे ) सूर्य - मण्डलसे | निकले एवं अदिति के सामने खड़े होकर यह वचन बोले-३ ९ दक्षनन्दिनि! तुम्हारे इस व्रतसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ । अतः ४० मेरी कृपासे तुम निःसन्देह मनोवाञ्छित दुर्लभ वस्तु प्राप्त करोगी । देवि! देवजननि! मैं तुम्हारा पुत्र होकर देवपुत्रोंको ४१ । राज्य दूँगा और दानवोंका नाश करूँगा ॥ ३८ - ४१ ॥
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३७८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७७
तद्वाक्यं वासुदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मन् सुरारणिः ।
प्रोवाच जगतां योनिं वेपमाना पुनः पुनः ॥
कथं त्वामुदरेणाहं वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरम् ।
यस्योदरे जगत्सर्वं वसते स्थाणुजङ्गमम् ॥
कस्त्वां धारयितुं नाथ शक्तस्त्रैलोक्यधार्यसि ।
यस्य सप्तार्णवाः कुक्षौ निवसन्ति सहाद्रिभिः ॥
तस्माद् यथा सुरपतिः शक्रः स्यात् सुरराडिह ।
यथा च न मम क्लेशस्तथा कुरु जनार्दन ॥
विष्णुरुवाच
सत्यमेतन्महाभागे दुर्धरोऽस्मि सुरासुरैः ।
तथापि सम्भविष्यामि अहं देव्युदरे तव ॥
आत्मानं भुवनान् शैलांस्त्वाञ्च देवि सकश्यपाम् ।
धारयिष्यामि योगेन मा विषादं कृथाऽम्बिके ॥
तवोदरेऽहं दाक्षेयि सम्भविष्यामि वै यदा ।
तदा निस्तेजसो दैत्याः सम्भविष्यन्त्यसंशयम् ॥
इत्येवमुक्त्वा भगवान् विवेश तस्याश्च भूयोऽरिगणप्रमर्दी । स्वतेजसोंऽशेन विवेश देव्याः दोदरे शक्रहिताय विप्र ॥ [ पुलस्त्यजी कहते हैं - ] ब्रह्मन्! वासुदेवका वह ४२ वाक्य सुनकर बार - बार काँपती हुई देवोंकी माता अदितिने संसारको उत्पन्न करनेवाले विष्णुसे कहा – जिसके ( विशाल ) उदरमें स्थावर - जङ्गमात्मक समस्त संसार ४३ निवास करता है, ऐसे त्रिलोकीको धारण करनेवाले आपको मैं अपने उदरमें कैसे धारण कर सकूँगी? नाथ! आप तीनों लोकोंको धारण करनेवाले हैं । जिसकी ४४ कुक्षिमें पर्वतोंके साथ सातों समुद्र अवस्थित हैं ऐसे आपको कौन धारण कर सकता है? अतः हे जनार्दन! आप वैसा ही करें जिससे इन्द्र देवताओंके स्वामी बन ४५ जायँ और मुझे भी कष्ट न हो॥४२–४५ ॥ विष्णुने कहा - महाभागे! यह सत्य है कि मैं देवों और दैत्योंसे धृत नहीं हो सकता, फिर भी हे देवि! ४६ मैं आपके उदरसे उत्पन्न होऊँगा । देवि! स्वयंको, ( चौदहों ) भुवनों, पर्वतों एवं कश्यपसहित आपको भी मैं योगद्वारा ४७ धारण करूँगा । मातः! आप विषाद न करें । दक्षात्मजे! जब मैं आपके उदरमें आऊँगा तब दैत्य निस्सन्देह ४८ तेजोहीन हो जायँगे । [ पुलस्त्यजी कहते हैं - ] विप्र! ऐसा कहकर शत्रुओंके नाश करनेवाले भगवान् विष्णु इन्द्रकी भलाई के लिये अपने तेजके अंशमात्रसे उन ४ ९ देवीके उदरमें प्रविष्ट हो गये ॥ ४६ – ४ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७६ ॥
सतहत्तरवाँ अध्याय प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन, प्रह्लादद्वारा बलिको शाप और अनुनय करनेपर उपदेश पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजी बोले – ( नारदजी ) संसारके उत्पन्न देवमातुः स्थिते देवे उदरे वामनाकृतौ । करनेवाले भगवान्के वचनानुसार देवमाता अदितिके निस्तेजसोऽसुरा जाता यथोक्तं विश्वयोनिना ॥ १ गर्भमें वामनरूपमें देवके स्थित हो जानेपर असुर निस्तेज निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा प्रह्लादं दानवेश्वरम् । हो गये । असुरोंको निस्तेज देखकर दानवोंमें श्रेष्ठ बलिने बलिर्दानवशार्दूल इदं वचनमब्रवीत् ॥ २ दानवेश्वर प्रह्लादसे यह वचन कहा — ॥१-२ ॥
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अध्याय ७७ ] प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट बलिरुवाच
तात निस्तेजसो दैत्याः केन जातास्तु हेतुना ।
कथ्यतां परमज्ञोऽसि शुभाशुभविशारद ॥ ३
पुलस्त्य उवाच
तत्पौत्रवचनं श्रुत्वा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः ।
किमर्थं तेजसो हानिरिति कस्मादतीव च ॥ ४
स ज्ञात्वा वासुदेवोत्थं भयं दैत्येष्वनुत्तमम् ।
चिन्तयामास योगात्मा क्व विष्णुः साम्प्रतं स्थितः ॥ ५
अधो नाभेः स पातालान् सप्त संचिन्त्य नारद ।
नाभेरुपरि भूरादींल्लोकांश्चर्तुमियाद् वशी ॥ ६
भूमिं स पङ्कजाकारां तन्मध्ये पङ्कजाकृतिम् ।
मेरुं ददर्श शैलेन्द्रं शातकौम्भं महर्द्धिमत् ॥ ७
तस्योपरि महापुर्यस्त्वष्टौ लोकपतींस्तथा ।
तेषामुपरि वैराजीं ददृशे ब्रह्मणः पुरीम् ॥ ८
तदधस्तान्महापुण्यमाश्रमं सुरपूजितम् ।
देवमातुः स ददृशे मृगपक्षिगणैर्वृतम् ॥ ९
तां दृष्ट्वा देवजननीं सर्वतेजोऽधिकां मुने ।
विवेश दानवपतिरन्वेष्टुं मधुसूदनम् ॥ १०
स दृष्टवाञ्जगन्नाथं माधवं वामनाकृतिम् ।
सर्वभूतवरेण्यं तं देवमातुरथोदरे ॥ ११
तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
सुरासुरगणैः सर्वैः सर्वतो व्याप्तविग्रहम् ॥ १२
तेनैव क्रमयोगेन दृष्ट्वा वामनतां गतम् ।
दैत्यतेजोहरं विष्णुं प्रकृतिस्थोऽभवत् ततः ॥ १३
अथोवाच महाबुद्धिर्विरोचनसुतं बलिम् ।
प्रह्लादो मधुरं वाक्यं प्रणम्य मधुसूदनम् ॥ १४
प्रह्लाद उवाच
श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये यतो वो भयमागतम् ।
येन निस्तेजसो दैत्या जाता दैत्येन्द्र हेतुना ॥ १५
भवता निर्जिता देवाः सेन्द्ररुद्रार्कपावकाः ।
प्रयाताः शरणं देवं हरिं त्रिभुवनेश्वरम् ॥ १६ ।
होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन ३७ ९ बलिने कहा - तात! आप यह बतलानेकी कृपा करें कि दानव किस कारणसे निस्तेज हो गये हैं? शुभ और अशुभके जाननेवाले आप महान् ज्ञानी हैं ॥३ ॥
पुलस्त्यजी बोले- अपने पौत्र ( बलि ) - के उस वचनको सुनकर ( दानवोंके ) तेजकी अत्यधिक हानि क्यों और किससे हुई है- ( यह जाननेके लिये ) प्रह्लादने क्षणभर ध्यान किया और दैत्योंके लिये वासुदेवद्वारा उत्पन्न हुए अतुलनीय भयको जानकर उन योगात्माने यह सोचा कि इस समय विष्णु कहाँपर स्थित हैं? नारदजी! नाभिके नीचेके स्थानमें सात पातालोंका चिन्तन करनेके बाद ( सातों पातालोंमें पता लगानेके बाद ) सभीको अपने वशमें करनेवाले वे नाभिके ऊपर भूः आदि लोकमें देखनेके लिये ( पता लगाने लिये ) पहुँचे । उन्होंने कमलके आकारकी भूमि और उसके बीच महान् समृद्धिसे सम्पन्न सुवर्णमय कमलके आकार - जैसे पर्वतश्रेष्ठ मेरुको देखा । उसके ऊपर महापुरियोंमें आठ लोक-पति तथा उनके ऊपर ब्रह्माकी वैराजपुरीको देखा ॥ ४–८ ॥ उसके नीचे उन्होंने महान् पुण्यसे युक्त देवताओंसे पूजित तथा पशु - पक्षियोंसे भरे देवमाता अदितिके आश्रमको देखा । मुने! समस्त तेजोंसे भी अधिक तेजस्विनी उस देवमाता अदितिको देखकर दानवपति प्रह्लादने मधुसूदनको ढूँढ़नेके लिये ( उनके उदरमें ) प्रवेश किया । उन्होंने सभी प्राणियोंमें श्रेष्ठ वामनके रूपमें उन जगत्पति माधवको देवमाताके उदरमें देखकर सारे सुरों और असुरोंसे चारों ओर व्याप्त शरीरवाले शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले उन पुण्डरीकनयन भगवान्को देखा । उसी योगके क्रममें वामनरूपको प्राप्त हुए दैत्योंके तेजको हरण करनेवाले विष्णुको जानकर वे प्रकृति - भावमें स्थित हो गये । उसके बाद मधुसूदनको प्रणाम कर महाबुद्धिमान् प्रह्लादने विरोचनपुत्र बलिसे मधुर वचन कहा ॥ ९ –१४ ॥ प्रह्लादने कहा – दैत्येन्द्र! आपलोगोंको जिससे भय प्राप्त हुआ है और जिस कारण दैत्यगण तेजसे रहित हो गये हैं, वह सब मैं कहता हूँ, सुनो । आपके द्वारा जीते गये इन्द्रसहित रुद्र, सूर्य तथा अग्नि आदि देवता
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३८०
स तेषामभयं दत्त्वा शक्रादीनां जगद्गुरुः ।
अवतीर्णो महाबाहुरदित्या जठरे हरिः ॥
हृतानि वस्तेन बले तेजांसीति मतिर्मम ।
नालं तमो विषहितुं स्थातुं सूर्योदयं बले ॥
पुलस्त्य उवाच
प्रह्लादवचनं श्रुत्वा क्रोधप्रस्फुरिताधरः ।
प्रह्लादमाहाथ बलिर्भाविकर्मप्रचोदितः ॥
बलिरुवाच
तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम् ।
सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः ॥
सहस्रशो यैरमराः सेन्द्ररुद्राग्निमारुताः ।
निर्जित्य त्याजिताः स्वर्गं भग्नदर्पा रणाजिरे ॥
ये सूर्यरथाद् वेगाच्चक्रं कृष्टं महाजवम् ।
स विप्रचित्तिर्बलवान् मम सैन्यपुरस्सरः ॥
अयःशङ्कुः शिवः शम्भुरसिलोमा विलोमकृत् । त्रिशिरा मकराक्षश्च वृषपर्वा नतेक्षणः
एते चान्ये च बलिनो नानायुधविशारदाः ।
येषामेकैकशो विष्णुः कलां नार्हति षोडशीम् ॥
पुलस्त्य उवाच
पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादः क्रोधमूर्च्छितः ।
धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम् ॥
धिक् त्वां पापसमाचारं दुष्टबुद्धिं सुबालिशम् हरिं निन्दयतो जिह्वा कथं न पतिता तव ॥ शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्धे निन्दनीयश्च साधुभिः । यत् त्रैलोक्यगुरुं विष्णुमभिनिन्दसि दुर्मते शोच्यश्चास्मि न संदेहो येन जातः पिता तव यस्य त्वं कर्कशः पुत्रो जातो देवावमान्यकः भवान् किल विजानाति तथा चामी महासुराः यथा नान्यः प्रियः कश्चिन्मम तस्माज्जनार्दनात् जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम सर्वेश्वरेश्वरं देवं कथं निन्दितवानसि गुरुः पूज्यस्तव पिता पूज्यस्तस्याप्यहं गुरुः ममापि पूज्यो भगवान् गुरुर्लोकगुरुर्हरिः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७७ त्रिभुवनके स्वामी देव हरिकी शरणमें गये । वे लोकगुरु १७ महाबाहु हरि इन्द्र आदि देवताओंको अभय देकर अदिति उदरमें अवतीर्ण हुए हैं । बले! मेरा ऐसा विचार है कि उन्होंने तुम लोगोंके तेजको हरण कर लिया है । बले! ( जैसे कि ) सूर्योदयके होते ही १८ अन्धकार ठहर नहीं सकता है ॥ १५ - १८ ॥ पुलस्त्यजी बोले – प्रह्लादके वचनको सुनकर क्रोधसे ओठ फड़फड़ाते हुए बलिने होनहारसे प्रेरित १ ९ होकर प्रह्लादसे कहा ॥१ ९ ॥ बलिने कहा - तात! ये हरि कौन हैं जिनके कारण हमें भय प्राप्त हुआ है? हमारे पास वासुदेवसे २० अधिक बलवान् सैकड़ों दैत्य हैं । उन लोगोंने इन्द्रसहित रुद्र, अग्नि तथा वायु आदि हजारों देवोंको युद्धमें जीतकर उनके अहंकारको नष्ट किया एवं उन्हें २१ स्वर्गसे खदेड़ दिया । वह बलशाली विप्रचित्ति मेरी सेनाका अगुआ है, जिसने धावा बोलकर सूर्यके रथसे २२ । महान् तीव्रगामी चक्रको खींच लिया था । अयःशङ्कु, शिव, शम्भु, असिलोमा, विलोमकृत्, त्रिशिरा, मकराक्ष, वृषपर्वा एवं नतेक्षण – ये तथा अन्य बहुत से भाँति-॥ २३ भाँतिके आयुधोंको चलानेमें निपुण बलवान् ( दैत्य मेरे सहायक हैं, ) जिनमें हर एककी सोलहवीं कलाके भी २४ समान विष्णु नहीं हैं ॥२०–२४ ॥ पुलस्त्यने कहा - पौत्रके इस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए उन प्रह्लादने विष्णुकी निन्दा २५ करनेवाले बलिसे कहा- पापकर्मा दुष्टबुद्धि तुम मूर्खको । धिक्कार है । विष्णुकी निन्दा करते हुए तुम्हारी जीभ क्यों नहीं गिर गयी? दुर्बुद्धे! दुर्मते! तुम शोक करने २६ लायक और सज्जनोंद्वारा निन्दा किये जाने योग्य हो । क्योंकि तुम तीनों लोकोंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे ॥ २७ हो । निस्सन्देह मैं भी शोक किये जाने लायक हूँ, जिसने । तुम्हारे उस पिताको जन्म दिया, जिससे तुम देवताओंकी ॥ २८ निन्दा करनेवाले तथा उग्र पुत्र हुए ॥ २५–२८ ॥ । निश्चय ही तुम और ये महासुर भी जानते हैं कि ॥ २ ९ जनार्दनसे अधिक दूसरा कोई मेरा प्रिय नहीं है । विष्णु । मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, यह जानते हुए भी ॥ ३० । तुमने सर्वेश्वरेश्वर देवकी निन्दा किस प्रकार की? तुम्हारे । । पिता ( तुम्हारे लिये ) गुरु एवं पूजनीय हैं । उनका भी गुरु ॥ ३१ । तथा पूजनीय मैं हूँ । लोकगुरु भगवान् विष्णु मेरे भी