वामन पुराण — पृष्ठ 401–410
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410
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अध्याय ७ ९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और
मद्रदेश इति ख्यातो देशो वै ब्रह्मणः सुत ।
शाकलं नाम नगरं ख्यातं स्थानीयमुत्तमम् ॥ १२
तस्मिन् विपणिवृत्तिस्थः सुधर्माख्योऽभवद् वणिक् ।
धनाढ्यो गुणवान् भोगी नानाशास्त्रविशारदः ॥ १३
सत्वेकदा निजाद् राष्ट्रात् सुराष्ट्रं गन्तुमुद्यतः ।
सार्थेन महता युक्तो नानाविपणपण्यवान् ॥ १४
गच्छतः पथि तस्याथ मरुभूमौ कलिप्रिय ।
अभवद् दस्युतो रात्रौ अवस्कन्दोऽतिदुःसहः ॥ १५
ततः स हृतसर्वस्वो वणिग्दुःखसमन्वितः ।
असहायो मरौ तस्मिंश्चचारोन्मत्तवद् वशी ॥ १६
चरता तदरण्यं वै दुःखाक्रान्तेन नारद ।
आत्मा इव शमीवृक्षो मरावासादितः शुभः ॥ १७
तं मृगैः पक्षिभिश्चैवं हीनं दृष्ट्वा शमीतरुम् ।
श्रान्तः क्षुत्तृट्परीतात्मा तस्याधः समुपाविशत् ॥ १८
सुप्तश्चापि सुविश्रान्तो मध्याह्ने पुनरुत्थितः ।
समपश्यदथायान्तं प्रेतं प्रेतशतैर्वृतम् ॥ १ ९ ।
उद्वाह्यन्तमथान्येन प्रेतेन प्रेतनायकम् ।
पिण्डाशिभिश्च पुरतो धावद्भी रूक्षविग्रहैः ॥ २० ।
अथाजगाम प्रेतोऽसौ पर्यटित्वा वनानि च ।
उपागम्य शमीमूले वणिक्पुत्रं ददर्श सः ॥ २१
स्वागतेनाभिवाद्यैनं समाभाष्य परस्परम् ।
सुखोपविष्टश्छायायां पृष्ट्वाकुशलमाप्तवान् ॥ २२
ततः प्रेताधिपतिना पृष्टः स तु वणिक्सखः ।
कुत आगम्यते ब्रूहि क्व साधो वा गमिष्यसि ॥ २३ ।
कथं चेदं महारण्यं मृगपक्षिविवर्जितम् ।
समापन्नोऽसि भद्रं ते सर्वमाख्यातुमर्हसि ॥ २४
एवं प्रेताधिपतिना वणिक् पृष्टः समासतः ।
सर्वमाख्यातवान् ब्रह्मन् स्वदेशधनविच्युतिम् ॥ २५
तस्य श्रुत्वा स वृत्तान्तं तस्य दुःखेन दुःखितः ।
वणिक्पुत्रं ततः प्राह प्रेतपालः स्वबन्धुवत् ॥ २६
एवं गतेऽपि मा शोकं कर्तुमर्हसि सुव्रत ।
भूयोऽप्यर्थाः भविष्यन्ति यदि भाग्यबलं तव ॥ २७ ।
उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट ३ ९ १ कहता हूँ । ब्रह्मपुत्र! प्रसिद्ध मद्रदेशमें शाकल नामसे प्रसिद्ध उत्तम नगर । वहाँ सुधर्मा नामका एक धनी, गुणशाली, भोगी एवं नाना शास्त्रोंमें निपुण व्यापारी रहता था । एक समय वह अपने देशसे सुराष्ट्र जानेको तैयार हुआ । कलिप्रिय! अनेक बेंची जानेवाली वस्तुओंसे युक्त व्यापारियोंके भारी समुदायके साथ जाते समय मार्गमें मरुभूमिमें रातमें ( उसके ऊपर ) डाकुओंका अत्यन्त उग्र असहनीय आक्रमण हुआ ॥ ११–१५ ॥ उसके बाद सब कुछ लुट जानेसे दुखी हुआ वह असहाय वणिक् मरुभूमिमें पागलकी भाँति इधर - उधर घूमने लगा । नारदजी! दुःखसे ग्रसित होकर उस वनमें घूमते हुए उसे मरुभूमिमें अपने जनके समान एक सुन्दर शमीका वृक्ष मिला । थका तथा भूख - प्यास से अभिभूत हुआ वह वणिक् उस शमीवृक्षको पशु - पक्षियोंसे रहित देखकर उसके नीचे बैठ गया और सो गया तथा पूर्ण विश्राम कर दोपहरको जगा । उसके बाद उसने सैकड़ों प्रेतोंसे घिरे एक प्रेतको आते हुए देखा॥१६–१९ ॥ प्रेतनायकको एक दूसरा प्रेत ढो रहा था और आगे रूखे शरीरवाले प्रेत दौड़ रहे थे । वनोंमें घूमनेके बाद वह प्रेत लौट रहा था । शमीवृक्षके नीचे आकर उसने वणिक्पुत्रको देखा । स्वागतके साथ उसे अभिवादन किया । फिर ( दोनोंने ) परस्पर वार्तालाप किया । इसके बाद वह प्रेत छायामें सुखपूर्वक बैठ गया और उसने उससे कुशल पूछी और जानी । उसके बाद प्रेताधिपतिने वणिक्- बन्धुसे पूछा- साधो! यह बतलाओ कि तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे? ॥ २० - २३ ॥ तुम्हारा कल्याण हो । मुझे यह बताओ कि पशु एवं पक्षियोंसे रहित इस बड़े जंगलमें तुम कैसे आये? ( पुलस्त्यजी कहते हैं— ) ब्रह्मन्! प्रेतराजके इस प्रकार पूछनेपर वणिक्ने थोड़ेमें उसे अपने देशका एवं धन-नाशका पूरा विवरण कह सुनाया । उसका पूरा वृत्तान्त सुन लेनेके बाद उसके दुःखसे दुखी होकर प्रेतपालने अपने बन्धुके समान ( उसे मानते हुए ) उस वणिक्-पुत्रसे कहा - सुव्रत! ऐसा होनेपर भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये । यदि तुम्हारा भाग्य प्रबल होगा तो धन फिर हो जायगा ॥ २४–२७ ॥
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३ ९ २ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७ ९
भाग्यक्षयेऽर्थाः क्षीयन्ते भवन्त्यभ्युदये पुनः ।
क्षीणस्यास्य शरीरस्य चिन्तया नोदयो भवेत् ॥
इत्युच्चार्य समाहूय स्वान् भृत्यान् वाक्यमब्रवीत् ।
अद्यातिथिरयं पूज्यः सदैव स्वजनो मम ॥
अस्मिन् दृष्टे वणिक्पुत्रे यथा स्वजनदर्शनम् ।
अस्मिन् समागते प्रेताः प्रीतिर्जाता ममातुला ॥
एवं हि वदतस्तस्य मृत्पात्रं सुदृढं नवम् ।
दध्योदनेन सम्पूर्णमाजगाम यथेप्सितम् ॥
तथा नवा च सुदृढा सम्पूर्णा परमाम्भसा ।
वारिधानी च सम्प्राप्ता प्रेतानामग्रतः स्थिता ॥
तमागतं ससलिलमन्नं वीक्ष्य महामतिः ।
प्राहोत्तिष्ठ वणिक्पुत्र त्वमाह्निकमुपाचर ॥
ततस्तु वारिधान्यास्तौ सलिलेन विधानतः ।
कृताह्निकावुभौ जातौ वणिक् प्रेतपतिस्तथा ॥
ततो वणिक्सुतायादौ दध्योदनमथेच्छया ।
दत्त्वा तेभ्यश्च सर्वेभ्यः प्रेतेभ्यो व्यददात् ततः ॥
भुक्तवत्सु च सर्वेषु कामतोऽम्भसि सेविते ।
अनन्तरं स बुभुजे प्रेतपालो वराशनम् ॥
प्रकामतृप्ते प्रेते च वारिधान्योदनं तथा ।
अन्तर्धानमगाद् ब्रह्मन् वणिक्पुत्रस्य पश्यतः ॥
ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा स मतिमान् वणिक् ।
पप्रच्छ तं प्रेतपालं कौतूहलमना वशी ॥
अरण्ये निर्जने साधो कुतोऽन्नस्य समुद्भवः ।
कुतश्च वारिधानीयं सम्पूर्णा परमाम्भसा ॥
तथामी तव ये भृत्यास्त्वत्तस्ते वर्णतः कृशाः ।
भवानपि च तेजस्वी किंचित्पुष्टवपुः शुभः ॥
शुक्लवस्त्रपरीधानो बहूनां परिपालकः ।
सर्वमेतन्ममाचक्ष्व को भवान् का शमी त्वियम् ॥
इत्थं वणिक्सुतवचः श्रुत्वाऽसौ प्रेतनायकः ।
शशंस सर्वमस्याद्यं यथावृत्तं पुरातनम् ॥
अहमासं पुरा विप्रः शाकले नगरोत्तमे ।
सोमशर्मेति विख्यातो बहुलागर्भसम्भवः ॥
( देखो, ) भाग्यके क्षय होनेपर धनोंका क्षय हो २८ जाता है और फिर भाग्योदय हो जानेपर पुनः धन प्राप्त हो जाते हैं । चिन्तासे क्षीण हुए शरीरका उत्थान ( वृद्धि ) नहीं होता । ऐसा कहकर उसने अपने सेवकोंको बुलाया २ ९ और उनसे कहा- मेरे अपने जनके समान इस अतिथिका सब प्रकारसे सत्कार करो । प्रेतो! स्वजनदर्शनके समान ३० ही मुझे इस वणिक्पुत्रका दर्शन हुआ है । इसके मिलनेसे मुझे अत्यधिक प्रीति प्राप्त हुई है । उसके ऐसा कहने पर इच्छाभर ( भोजन योग्य ) दही और भातसे भरा अत्यन्त ३१ दृढ़ एक नया मिट्टीका पात्र आ गया । इसी प्रकार निर्मल शीतल जलसे भरा एक पानीका पात्र भी उन प्रेतोंके ३२ सामने उपस्थित हो गया ॥ २८–३२ ॥ उस अन्न एवं जलको प्रस्तुत हुए देखकर ३३ महामति प्रेतने कहा - वणिक्पुत्र! तुम उठो एवं दैनिक ( नित्य ) कृत्य करो । उसके बाद वणिक् एवं प्रेतपति-३४ दोनोंने घड़ेके जलसे विधिपूर्वक नित्य - क्रिया सम्पन्न की । उसके बाद ( प्रेतपतिने ) पहले वणिक्पुत्रको ३५ पर्याप्त दही और भात दिया और तब उन प्रेतोंको दिया । सभीके इच्छाभर भोजन एवं जलपान करनेके ३६ बाद प्रेतनायकने उत्तम भोजन किया ॥ ३३ –३६ ॥ ( पुलस्त्यजी कहते हैं कि ) ब्रह्मन्! प्रेतके ३७ | भलीभाँति तृप्त हो जानेपर वणिक्पुत्रके देखते - ही - देखते जलपात्र और ओदन आँखोंसे ओझल हो गये । तब उस अत्यन्त ही आश्चर्यजनक दृश्यको देखकर उस बुद्धिमान् ३८ संयमी वणिक्ने उत्सुकतापूर्वक उस प्रेतपतिसे पूछा— साधो! इस निर्जन वनमें अन्न एवं उत्तम जलसे भरा ३ ९ घड़ा कहाँसे आ गया? अपेक्षाकृत तुम्हारे वर्णकी दृष्टिसे दुबले ये तुम्हारे भृत्य कौन हैं? कुछ हृष्ट - पुष्ट शरीरवाले सुन्दर, तेजसे सम्पन्न और शुक्लवस्त्रधारी ( हमारे-४० जैसे ) बहुतोंकी परिरक्षा करनेवाले आप भी कौन हैं? आप मुझे यह सम्पूर्ण विवरण बतलाएँ कि आप कौन ४१ हैं एवं यह शमीवृक्ष कौन है? ॥३७–४१ ॥ वणिक्पुत्रके ऐसे वचनको सुनकर उस प्रेतनायकने ४२ उससे सारे पुराने वृत्तान्तको कहा । ( उसने कहा— ) प्राचीन कालमें उत्तम शाकल नामके श्रेष्ठ नगरमें ४३ | बहुलाके गर्भ से उत्पन्न हुआ मैं सोमशर्मा — इस नामसे
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अध्याय ७ ९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट ३ ९ ३
ममास्ति च वणिक् श्रीमान् प्रातिवेश्यो महाधनः ।
स तु सोमश्रवा नाम विष्णुभक्तो महायशाः ॥ ४४
सोऽहं कदर्यो मूढात्मा धनेऽपि सति दुर्मतिः ।
न ददामि द्विजातिभ्यो न चाश्नाम्यन्नमुत्तमम् ॥ ४५
प्रमादाद् यदि भुञ्जामि दधिक्षीरघृतान्वितम् ।
ततो रात्रौ नृभिर्घोरैस्ताड्यते मम विग्रहः ॥ ४६
प्रातर्भवति मे घोरा मृत्युतुल्या विषूचिका ।
न च कश्चिन्ममाभ्यासे तत्र तिष्ठति बान्धवः ॥ ४७
कथं कथमपि प्राणा मया सम्प्रति धारिताः ।
एवमेतादृशः पापी निवसाम्यतिनिर्घृणः ॥ ४८
सौवीरतिलपिण्याकसक्तुशाकादिभोजनैः ।
क्षपयामि कदन्नाद्यैरात्मानं कालयापनैः ॥ ४ ९
एवं तत्रासतो मह्यं महान् कालोऽभ्यगादथ ।
श्रवणद्वादशी नाम मासि भाद्रपदेऽभवत् ॥ ५०
ततो नागरिको लोको गतः स्नातुं हि सङ्गमम् ।
इरावत्या नड्वलाया ब्रह्मक्षत्रपुरस्सरः ॥ ५१
प्रातिवेश्यप्रसङ्गेन तत्राप्यनुगतोऽस्म्यहम् ।
कृतोपवासः शुचिमानेकादश्यां यतव्रतः ॥ ५२
ततः सङ्गमतोयेन वारिधानीं दृढां नवाम् ।
सम्पूर्णां वस्तुसंवीतां छत्रोपानहसंयुताम् ॥ ५३
मृत्पात्रमपि मिष्टस्य पूर्णं दध्योदनस्य ह ।
प्रदत्तं ब्राह्मणेन्द्राय शुचये ज्ञानधर्मिणे ॥ ५४
तदेव जीवतो दत्तं मया दानं वणिक्सुत ।
वर्षाणां सप्ततीनां वै नान्यद् दत्तं हि किंचन ॥ ५५
मृतः प्रेतत्वमापन्नो दत्त्वा प्रेतान्नमेव हि ।
अमी चादत्तदानास्तु मदन्नेनोपजीविनः ॥ ५६
एतत्ते कारणं प्रोक्तं यत्तदन्नं मयाम्भसा ।
दत्तं तदिदमायाति मध्याह्नेऽपि दिने दिने ॥५७
यावन्नाहं च भुञ्जामि न तावत् क्षयमेति वै ।
मयि भुक्ते च पीते च सर्वमन्तर्हितं भवेत् ॥ ५८ ।
प्रसिद्ध ब्राह्मण था । मेरा एक पड़ोसी बहुत धनवान्, लक्ष्मीवान् वणिक् था, जिसका नाम था सोमश्रवा । वह महान् यशस्वी और विष्णुका भक्त था । मैं कृपण एवं दुर्मति था । अतः धन होते हुए भी न तो ब्राह्मणों को दान करता था और न अच्छे अन्नका भोजन ही करता था ॥ ४२-४५ ॥ यदि मैं कभी भूलसे दही, दूध एवं घीसे युक्त पदार्थ भोजन कर लेता था तो रात्रिमें भयङ्कर मनुष्य मेरे शरीरको पीड़ित करते थे । प्रातः काल मुझे मरणके समान ( कष्ट देनेवाली ) भयङ्कर विषूचिका ( हैजा ) हो जाया करती थी । उस समय मेरे पास कोई भी बन्धु नहीं रहता था । मैं किसी - किसी प्रकार अपने प्राणोंको धारण करता था । इस प्रकार मैं अति निर्लज्ज पापयुक्त जीवन बिताता रहा । बेर, तिलपिण्याक, सत्तू, शाकादि एवं बुरे अन्नों ( मोटे अन्न - ) कोदो, साँवा आदिको खाकर समय बिताते हुए मैं स्वयंको दुर्बल कर रहा था ॥ ४६–४९ ॥ मुझे वहाँ इस ढंगसे रहते हुए बहुत समय बीत गया । ( एक बार ) भाद्रपदमासमें श्रवणद्वादशीकी तिथि आयी । तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक लोग इरावती और नड्वला नदियोंके संगममें स्नान करनेके लिये गये । पड़ोसी होनेके कारण मैं भी उनके पीछे-पीछे चला गया । एकादशीके दिन मैंने व्रत रहकर पवित्रतासे उपवास किया । उसके बाद मैंने अनेक वस्तुओं - छाता, जूता और साथ ही सङ्गमके जलसे भरा नवीन दृढ़ जलपात्र एवं मिष्टान्न, दधि तथा ओदनसे पूर्ण मिट्टीका पात्र ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रदान किया ॥ ५०–५४ ॥ वणिक्पुत्र! मैंने अपने सत्तर वर्षोंके ( पूरे ) जीवनमें ( केवल ) वही दान दिया था । इसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं दान किया । प्रेतान्न दान करके मृत्युके बाद मैं प्रेत हो गया । मेरे अन्नसे जीवन धारण करनेवाले इन लोगोंने भी दान कभी नहीं किया है । मैंने तुम्हें वह कारण बतलाया जिससे मेरे द्वारा दिये गये अन्न - जल प्रतिदिन दोपहरके समय ( मेरे समीप ) आ जाते हैं । जबतक मैं नहीं खाता, तबतक उनका क्षय नहीं होता । मेरे खाने और पीनेके बाद सभी कुछ अदृश्य हो जाता है ॥ ५५-५८ ॥
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३ ९ ४
यच्चातपत्रमददं सोऽयं जातः शमीतरुः ।
उपानद्युगले दत्ते प्रेतो मे वाहनोऽभवत् ॥
इयं तवोक्ता धर्मज्ञ मया कीनाशतात्मनः ।
श्रवणद्वादशीपुण्यं तवोक्तं पुण्यवर्धनम् ॥
इत्येवमुक्ते वचने वणिक्पुत्रोऽब्रवीद् वचः ।
यन्मया तात कर्त्तव्यं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा वणिक्पुत्रस्य नारद ।
प्रेतपालो वचः प्राह स्वार्थसिद्धिकरं ततः ॥
यत् त्वया तात कर्त्तव्यं मद्धितार्थं महामते ।
कथयिष्यामि तत् सम्यक् तव श्रेयस्करं मम ॥
गयायां तीर्थजुष्टायां स्नात्वा शौचसमन्वितः ।
मम नाम समुद्दिश्य पिण्डनिर्वपणं कुरु ॥
तत्र पिण्डप्रदानेन प्रेतभावादहं सखे ।
मुक्तस्तु सर्वदातॄणां यास्यामि सहलोकताम् ॥
यथेयं द्वादशी पुण्या मासि प्रौष्ठपदे सिता । बुधश्रवणसंयुक्ता साऽतिश्रेयस्करी स्मृता इत्येवमुक्त्वा वणिजं प्रेतराजोऽनुगैः सह स्वनामानि यथान्यायं सम्यगाख्यातवाञ्छुचिः ॥ प्रेतस्कन्धे समारोप्य त्याजितो मरुमण्डलम् । रम्येऽथ शूरसेनाख्ये देशे प्राप्तः स वै वणिक् स्वकर्मधर्मयोगेन धनमुच्चावचं बहु उपार्जयित्वा प्रययौ गयाशीर्षमनुत्तमम् पिण्डनिर्वपणं तत्र प्रेतानामनुपूर्वशः चकार स्वपितॄणां च दायादानामनन्तरम् ॥ आत्मनश्च महाबुद्धिर्महाबोध्यं तिलैर्विना पिण्डनिर्वपणं चक्रे तथान्यानपि गोत्रजान् एवं प्रदत्तेष्वथ वै पिण्डेषु प्रेतभावतः विमुक्तास्ते द्विज प्रेता ब्रह्मलोकं ततो गताः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७ ९ मैंने जो छाताका दान किया था, वही इस ५ ९ शमीवृक्षके रूपमें उत्पन्न हुआ है । एक जोड़ा जूताका दान करनेसे प्रेत मेरा वाहन बना है । धर्मज्ञ! अपने प्रेतत्व - प्राप्तिका यह समस्त विवरण मैंने तुमसे कह ६० सुनाया तथा परम पवित्र और पुण्यको बढ़ानेवाली श्रवणद्वादशीका भी वर्णन कर दिया । प्रेतके ऐसा कहनेपर वणिक्पुत्रने कहा - तात! मुझे जो करना हो ६१ उसकी आज्ञा दें । ( पुलस्त्यजी कहते हैं कि ) नारदजी! वणिक्पुत्रका वह वचन सुनकर प्रेतपति अपनी ६२ स्वार्थसिद्धिकी बात कहने लगा — ॥५ ९ –६२ ॥ महामते! मेरे हितके लिये तुम्हें करने योग्य कर्म ६३ मैं बतलाता हूँ । उसे अच्छी तरह सम्पन्न कर लेने से तुम्हारा और मेरा ( दोनोंका ) कल्याण होगा । ( देखो, ) गया- तीर्थमें ( जाकर और ) स्नानसे पवित्र होकर मेरे ६४ नाम ( उद्देश्य ) - से तुम पिण्डदान करो । सखे! वहाँ पिण्डदान करनेसे मैं प्रेतभावसे मुक्त होकर सर्वस्व दान करनेवालोंको मिलनेवाले लोकको प्राप्त कर लूँगा । ६५ भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी बुधवार एवं श्रवण नक्षत्रसे युक्त पुण्य बढ़ानेवाली अत्यन्त माङ्गलिक यह द्वादशी ॥ ६६ | ( तिथि ) कही गयी है ॥ ६३ –६६ ॥ । वणिक्से ऐसा कहकर प्रेतराजने अपने अनुचरोंसहित ६७ पवित्रतापूर्वक यथोचित क्रमसे अपने ( पितरोंके ) नामोंको बताया । उसे प्रेतके कन्धेपर चढ़ाकर मरुभूमिसे बाहर छोड़ दिया गया । इस प्रकार वह वणिक् शूरसेन नामके ॥ ६८ सुन्दर देशमें पहुँच गया । अपने कर्म तथा धर्मसे उसने अधिक मात्रामें उत्कृष्ट एवं हीन धन उपार्जित कर । ॥ ६ ९ लिया । उसके बाद वह उत्तम गयाशीर्ष नामके तीर्थमें गया । वहाँ क्रमशः प्रेतोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करनेके । बाद उसने अपने पितरों एवं दायादोंको भी पिण्डदान ७० | किया ॥ ६७ – ७० ॥ । उस महाबुद्धि ( वणिक् ) ने अपने लिये तिलसे ॥ ७१ । रहित महाबोध्य नामका पिण्डदान किया । उसके बाद अन्य गोत्रोंमें उत्पन्न हुओंके उद्देश्यसे भी पिण्डदान । किया । द्विज! इस प्रकार पिण्डदान करनेपर वे प्रेत ॥ ७२ । प्रेत - योनिसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको चले गये ।
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अध्याय ७ ९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति
स चापि हि वणिक्पुत्रो निजमालयमाव्रजत् ।
श्रवणद्वादशीं कृत्वा कालधर्ममुपेयिवान् ॥
गन्धर्वलोके सुचिरं भोगान् भुक्त्वा सुदुर्लभान् ।
मानुष्यं जन्ममासाद्य स बभौ शाकले विराट् ॥
स्वधर्मकर्मवृत्तिस्थः श्रवणद्वादशीरतः ।
कालधर्ममवाप्यासौ गुह्यकावासमाश्रयत् ॥
तत्रोष्य सुचिरं कालं भोगान् भुक्त्वाऽथ कामतः । और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट ३ ९ ५ वह वणिक्पुत्र भी अपने घर चला गया और ७३ | श्रवणद्वादशीका ( यथोचित रीतिसे ) ( व्रत ) पालन करते हुए वह भी समय आनेपर स्वर्गीय हो गया । गन्धर्वलोकमें चिरकालतक अत्यन्त दुर्लभ भोगोंका उपभोग करनेके बाद मनुष्य - जन्म प्राप्त कर वह शाकलपुरीका सम्राट् ७४ | बना ॥ ७१–७४ ॥ अपने धर्म तथा कर्ममें स्थित रहता हुआ वह ७५ श्रवणद्वादशी ( व्रत ) - में रत रहता रहा । ( समय आनेपर ) मृत्युके बाद उसने गुह्यकोंका लोक प्राप्त कर लिया । | वहाँ बहुत कालतक ठहरकर और इच्छानुकूल भाँति-भाँतिके भोग्य पदार्थोंका भोग करनेके बाद वह मर्त्यलोकमनुप्राप्य राजन्यतनयोऽभवत् ॥७६ मृत्युलोकमें आकर राजपुत्र बना । वहाँ भी क्षत्रिय-तत्रापि क्षत्रवृत्तिस्थो दानभोगरतो वशी ।
गोग्रहेऽरिगणाञ्जित्वा कालधर्ममुपेयिवान् ।
शक्रलोकं स सम्प्राप्य देवैः सर्वैः सुपूजितः ॥
पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टः शाकले सोऽभवद् द्विजः ।
ततो विकटरूपोऽसौ सर्वशास्त्रार्थपारगः ॥
विवाहयद् द्विजसुतां रूपेणानुपमां द्विज ।
साऽवमेने च भर्त्तारं सुशीलमपि भामिनी ॥
विरूपमिति मन्वाना ततः सोऽभूत् सुदुःखितः ।
ततो निर्वेदसंयुक्तो गत्वाश्रमपदं महत् ॥
इरावत्यास्तटे श्रीमान् रूपधारिणमासदत् ।
तमाराध्य जगन्नाथं नक्षत्रपुरुषेण हि ॥
सुरूपतामवाप्याग्र्यां तस्मिन्नेव च जन्मनि ।
ततः प्रियोऽभूद् भार्याया भोगवांश्चाभवद् वशी ।
श्रवणद्वादशीभक्तः पूर्वाभ्यासादजायत ॥
एवं पुराऽसौ द्विजपुङ्गवस्तु कुरूपरूपो भगवत्प्रसादात् । अनङ्गरूपप्रतिमो बभूव मृतश्च राजा स पुरूरवाऽभूत् ॥ । वृत्तिसे निर्वाह करते हुए वह दान और भोगमें लगा रहा । गौओंके अपहरणमें उसने शत्रुओंको जीतकर कालधर्म ( मृत्यु ) - को प्राप्त हुआ । फिर वह इन्द्रलोकमें गया और सभी देवोंसे पूजित हुआ । पुण्यका क्षय होनेसे ७७ ‘ क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' – नियमसे स्वर्गच्युत होकर वह फिर शाकल देशमें ब्राह्मण हुआ । उसका रूप तो अत्यन्त विद्रूप ( भयङ्कर ) था, परंतु वह ७८ ( विद्यासे ) सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारङ्गत था ॥ ७५–७८ ॥ द्विज! उसने अनुपम सुन्दरी ब्राह्मण- कन्यासे ७ ९ । विवाह किया । वह ललना ( अपने ) अत्यन्त शीलवान् पतिको भी कुरूप मानकर निरादर करती रहती । इससे ८० वह बहुत दुःखित हो गया । उसके बाद ग्लानिसे भरकर वह इरावतीके तीरपर स्थित महान् आश्रममें पहुँचा और नक्षत्र - पुरुषके द्वारा स्थापित सुन्दर रूप ८१ धारण करनेवाले जगन्नाथ भगवान्की आराधना की । इस प्रकार उसी जन्ममें परम सुन्दर रूप प्राप्त कर वह अपनी भार्याका प्यारा एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गया । ८२ पूर्वके अभ्याससे संयत रहनेवाला वह श्रवणद्वादशीका भक्त बना रहा । इस प्रकार पहले कुरूप रहनेपर भी भगवान् की कृपासे वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कामदेवके समान सुन्दर रूपवाला हो गया और स्वर्गीय होकर दूसरे ८३ । जन्ममें राजा पुरूरवा हुआ ॥ ७ ९ –८३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्नासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७ ९ ॥
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३ ९ ६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८० अस्सीवाँ अध्याय नक्षत्र- पुरुषके वर्णन - प्रसङ्गमें नक्षत्र - पुरुषकी पूजाका विधान और नक्षत्र - पुरुषके व्रतका माहात्म्य नारद उवाच
पुरूरवा द्विजश्रेष्ठ यथा देवं श्रियः पतिम् ।
नक्षत्रपुरुषाख्येन आराधयत तद् वद ॥
पुलस्त्य उवाच
श्रूयतां कथयिष्यामि नक्षत्रपुरुषव्रतम् ।
नक्षत्राङ्गानि देवस्य यानि यानीह नारद ॥
मूलर्क्ष चरणौ विष्णोर्जङ्खे द्वे रोहिणी स्मृते ।
द्वे जानुनी तथाश्विन्यौ संस्थिते रूपधारिणः ॥
आषाढे द्वे द्वयं चौर्वोर्गुह्यस्थं फाल्गुनीद्वयम् ।
कटिस्थाः कृत्तिकाश्चैव वासुदेवस्य संस्थिताः ॥
प्रोष्ठपद्याद्वयं पार्श्वे कुक्षिभ्यां रेवती स्थिता ।
उर: संस्था त्वनुराधा श्रविष्ठा पृष्ठसंस्थिता ॥
विशाखा भुजयोर्हस्तः करद्वयमुदाहृतम् ।
पुनर्वसुरथाङ्गुल्यो नखाः सार्पस्तथोच्यते ॥
ग्रीवास्थिता तथा ज्येष्ठा श्रवणं कर्णयोः स्थितम् ।
मुखसंस्थस्तथा पुष्यः स्वातिर्दन्ताः प्रकीर्तिताः ॥
हनू द्वे वारुणश्चोक्तो नासा पैत्र उदाहृतः ।
मृगशीर्षं नयनयो रूपधारिणि तिष्ठति ॥
चित्रा चैव ललाटे तु भरणी तु तथा शिरः ।
शिरोरुहस्था चैवार्द्रा नक्षत्राङ्गमिदं हरेः ॥
विधानं सम्प्रवक्ष्यामि यथायोगेन नारद ।
सम्पूजितो हरिः कामान् विदधाति यथेप्सितान् ॥
नारदजीने पूछा – द्विजश्रेष्ठ! पुरूरवाने नक्षत्र -पुरुष नामक व्रतके द्वारा लक्ष्मीपति वासुदेवकी जिस १ विधिसे आराधना की थी, उसे कहिये ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी बोले – नारदजी! मैं नक्षत्र - पुरुष -व्रत एवं देवके सभी नक्षत्ररूपी अङ्गोंका वर्णन करता २ हूँ; आप सुनें - मूल नक्षत्र भगवान् विष्णुके दोनों चरणों, रोहिणी नक्षत्र दोनों जंघाओं एवं अश्विनी नक्षत्र दोनों घुटनोंका रूप धारण करके स्थित हैं । पूर्वाषाढ़ा ३ और उत्तराषाढ़ा नामके दो नक्षत्र वासुदेवके दोनों ऊरुओंमें, पूर्वाफाल्गुनी तथा उत्तराफाल्गुनी नामवाले ४ दोनों नक्षत्र गुह्य प्रदेशमें और कृत्तिका नक्षत्र कटि-भागमें स्थित है । पूर्वाभाद्रपदा तथा उत्तराभाद्रपदा भगवान्के दोनों पार्श्वोमें, रेवती दोनों कुक्षियोंमें, अनुराधा हृदयमें ५ तथा धनिष्ठा नक्षत्र पृष्ठदेशमें स्थित है ॥ २-५ ॥ दोनों भुजाओंके स्थानमें विशाखा नक्षत्र है । हस्त ६ नक्षत्रको भगवान्का दोनों हाथ कहा गया है । पुनर्वसु नक्षत्र भगवान्की अंगुलियाँ और आश्लेषा नक्षत्र उनके नख हैं । ग्रीवामें ज्येष्ठा, दोनों कानोंमें श्रवण तथा ७ मुखमें पुष्य नक्षत्र स्थित है । दाँतोंको स्वाति नक्षत्र कहा गया है । शतभिषा नक्षत्र दोनों हनुएँ तथा मघाको नासिका कहा गया है । ( नक्षत्रोंका ) रूप धारण ८ करनेवाले भगवान्के दोनों नेत्रोंमें मृगशिरा नक्षत्रका निवास है । चित्रा ललाटमें, भरणी सिरमें तथा आर्द्रा
नक्षत्र केशमें रहता है । भगवान् विष्णुका यह नक्षत्र-९ । शरीर है ॥६ – ९ ॥
नारदजी! अब मैं उस व्रतके विधानका वर्णन करूँगा, जिस व्रतसे नियमपूर्वक आराधित होनेपर १० भगवान् विष्णु इच्छित फल प्रदान करते हैं ।
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अध्याय ८० ] नक्षत्र - पुरुषके वर्णन चैत्रमासे सिताष्टम्यां यदा मूलगतः शशी ।
तदा तु भगवत्पादौ पूजयेत् तु विधानतः ।
नक्षत्रसंनिधौ दद्याद् विप्रेन्द्राय च भोजनम् ॥
जानुनी चाश्विनीयोगे पूजयेदथ भक्तितः ।
दोहदे च हविष्यान्नं पूर्ववद् द्विजभोजनम् ॥
आषाढाभ्यां तथा द्वाभ्यां द्वा ऊरू पूजयेद् बुधः ।
सलिलं शिशिरं तत्र दोहदे च प्रकीर्तितम् ॥
फाल्गुनीद्वितीये गुह्यं पूजनीयं विचक्षणैः ।
दोहदे च पयो गव्यं देयं च द्विजभोजनम् ॥
कृत्तिकासु कटिः पूज्या सोपवासो जितेन्द्रियः ।
देयं च दोहदं विष्णोः सुगन्धकुसुमोदकम् ॥
पार्श्वे भाद्रपदायुग्मे पूजयित्वा विधानतः ।
गुडं सलेहकं दद्याद् दोहदे देवकीर्तितम् ॥
द्वे कुक्षी रेवतीयोगे दोहदे मुद्गमोदकाः ।
अनुराधासु जठरं षष्ठिकान्नं च दोहदे ॥
श्रविष्ठायां तथा पृष्ठं शालिभक्तं च दोहदे ।
भुजयुग्मं विशाखासु दोहदे परमोदनम् ॥
हस्ते हस्तौ तथा पूज्यौ यावकं दोहदे स्मृतम् ।
पुनर्वसावङ्गुलीश्च पटोलस्तत्र दोहदे ॥
आश्लेषासु नखान् पूज्य दोहदे तित्तिरामिषम् ।
ज्येष्ठायां पूजयेद् ग्रीवां दोहदे तिलमोदकम् ॥
श्रवणे श्रवणौ पूज्यौ दधिभक्तं च दोहदे ।
पुष्ये मुखं पूजयेत दोहदे घृतपायसम् ॥
स्वातियोगे च दशना दोहदे तिलशष्कुली ।
दातव्या केशवप्रीत्यै ब्राह्मणस्य च भोजनम् ॥
- प्रसङ्गमें नक्षत्र - पुरुषकी पूजाका विधान ३ ९ ७ चैत्रमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिमें चन्द्रमाके मूल नक्षत्र में स्थित होनेपर भगवान्के दोनों पैरोंकी विधिपूर्वक ११ पूजा करनी चाहिये । नक्षत्रकी संनिधिमें ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये । अश्विनी नक्षत्रके योगमें श्रद्धापूर्वक भगवान्के दोनों घुटनोंकी अर्चना करनी चाहिये एवं ' दोहद ' में ( यात्रा-दोषकी शान्तिके लिये खाये - पिये जानेवाले निश्चित १२ पदार्थ में ) हविष्यान्न समर्पित करना एवं पूर्ववत् ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये । विद्वान् मनुष्य पूर्वाषाढ तथा उत्तराषाढके योगमें विष्णुके दोनों ऊरुओंकी पूजा करे । ( इसमें देय ) १३ दोहदमें शीतल जलका विधान है ॥ १०–१३ ॥ [ अनुक्रान्त विधानमें पुलस्त्यजी कहते हैं - ] विद्वान् १४ पुरुष दोनों फाल्गुनी नक्षत्रोंमें भगवान्के गुह्य - देशकी पूजा करे । दोहदके लिये दूध और घी दे और ब्राह्मण-भोजन कराये । कृत्तिका नक्षत्रमें उपवासपूर्वक जितेन्द्रिय १५ रहकर भगवान्के कटि- देशकी अर्चना करे और सुगन्धित कुसुमसे युक्त जलका ' दोहद ' दान करे । दोनों भाद्रपदाओंमें कहे हुए विधानसे भगवान्की दोनों बगलोंकी अर्चना करके ' दोहद ' में देवद्वारा कथित - शास्त्रानुमोदित चाटनेवाली १६ वस्तुसे युक्त गुड़ देना चाहिये । रेवती नक्षत्रके योगमें भगवान्की दोनों कुक्षियोंकी पूजाके बाद दोहदमें मूँगके लड्ड प्रदान करने चाहिये । अनुराधा नक्षत्रमें उदरकी पूजा १७ करके दोहदमें साठीका चावल देना चाहिये ॥ १४–१७ ॥ धनिष्ठा नक्षत्रमें पृष्ठकी पूजा करके दोहदमें १८ शालिका भात देना चाहिये । विशाखा नक्षत्रमें भगवान्की दोनों भुजाओंकी पूजा कर दोहदमें उत्तम अन्न देना चाहिये । हस्त नक्षत्रमें भगवान्के दोनों करोंकी पूजा १ ९ करके दोहदमें जौसे बना पक्वान्न देना चाहिये । पुनर्वसु नक्षत्र में अंगुलियोंकी पूजा करके दोहदमें रेशमी वस्त्र या परवल प्रदान करना चाहिये । आश्लेषा नक्षत्रमें नखकी पूजा कर दोहदमें तित्तिरकी आकृति प्रदान करे । २० ज्येष्ठामें ग्रीवाकी पूजा करके दोहदमें तिलका लड्डू प्रदान । करे । श्रवण नक्षत्रमें दोनों कानोंकी पूजा करके दोहदमें दही और भात प्रदान करे । पुष्य नक्षत्रमें मुखकी पूजा करे और २१ दोहदमें घी मिला हुआ पायस प्रदान करे ॥ १८–२१ ॥ स्वाति नक्षत्रके योगमें भगवान्के दाँतोंका पूजन करके तिल और शष्कुली ( पूड़ी ) का दोहद दे एवं २२ केशवको प्रसन्न करनेके लिये ब्राह्मणको भोजन कराये ।
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३ ९ ८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८०
हनू शतभिषायोगे पूजयेच्च प्रयत्नतः ।
प्रियङ्गुरक्तशाल्यन्नं दोहदं मधुविद्विषः ॥
मघासु नासिका पूज्या मधु दद्याच्च दोहदे ।
मृगोत्तमाङ्गे नयने मृगमांसं च दोहदे ॥
चित्रायोगे ललाटं च दोहदे चारुभोजनम् ।
भरणीषु शिरः पूज्यं चारु भक्तं च दोहदे ॥
सम्पूजनीया विद्वद्धिरार्द्रायोगे शिरोरुहाः ।
विप्रांश्च भोजयेद् भक्त्या दोहदे च गुडार्द्रकम् ॥
नक्षत्रयोगेष्वेतेषु सम्पूज्य जगतः पतिम् ।
पारिते दक्षिणां दद्यात् स्त्रीपुंसोश्चारुवाससी ॥
छत्रोपानत् श्वेतयुगं सप्तधान्यानि काञ्चनम् ।
घृतपात्रं च मतिमान् ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥
प्रतिनक्षत्रयोगेन पूजनीया द्विजातयः ।
नक्षत्रमय एवैष पुरुषः शाश्वतो मतः ॥
नक्षत्रपुरुषाख्यं हि व्रतानामुत्तमं व्रतम् ।
पूर्वं कृतं हि भृगुणा सर्वपातकनाशनम् ॥
अङ्गोपाङ्गानि देवर्षे पूजयित्वा जगद्गुरोः ।
सुरूपाण्यभिजायन्ते प्रत्यङ्गाङ्गानि चैव हि ॥
सप्तजन्मकृतं पापं कुलसंगागतं च यत् ।
पितृमातृसमुत्थं च तत्सर्वं हन्ति केशवः ॥
सर्वाणि भद्राण्याप्नोति शरीरारोग्यमुत्तमम् ।
अनन्तां मनसः प्रीतिं रूपं चातीव शोभनम् ॥
वाङ्माधुर्यं तथा कान्तिं यच्चान्यदभिवाञ्छितम् ।
ददाति नक्षत्रपुमान् पूजितस्तु जनार्दनः ॥
उपोष्य सम्यगेतेषु क्रमेणर्क्षेषु नारद ।
अरुन्धती महाभागा ख्यातिमग्र्यां जगाम ह ॥
आदित्यस्तनयार्थाय नक्षत्राङ्गं जनार्दनम् ।
सम्पूजयित्वा गोविन्दं रेवन्तं पुत्रमाप्तवान् ॥
शतभिषा नक्षत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्के ठुड्डीकी पूजा २३ करे और विष्णुको अत्यन्त प्रिय लगनेवाला प्रियङ्गु ( कँगनी ) एवं लाल चावलका दोहद दे । मघामें नासिकाकी पूजा करनी चाहिये एवं दोहदमें मधु देना चाहिये । मृगशिरा नक्षत्रमें मस्तकमें स्थित दोनों नेत्रोंकी २४ पूजा करके दोहदमें मृगके मानका फलका गूदा चाहिये । चित्रा नक्षत्रके योगमें ललाटकी पूजा करके दोहदमें सुन्दर भोजन देना चाहिये । भरणी नक्षत्रमें सिरकी पूजा करनी चाहिये और दोहदमें सुन्दर भात २५ प्रदान करना चाहिये ॥ २२-२५ ॥ आर्द्राके योगमें विद्वान् लोगोंको ( भगवान्के ) २६ केशोंकी पूजा करनी चाहिये और श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना तथा दोहदमें गुड़ एवं अदरखका दान करना चाहिये । इन नक्षत्रोंके योगोंमें जगत्पति ( विष्णु ) -२७ की पूजा करनेके बाद पारणकर स्त्री और पुरुषके लिये दो सुन्दर वस्त्र दे । बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणको सफेद २८ छाता, एक जोड़ा जूता, सप्तधान्य, स्वर्ण एवं घीसे भरे पात्रका दान करे । प्रत्येक नक्षत्रके योगमें ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये । यही नक्षत्रमय नित्य सनातन पुरुष २ ९ माने गये हैं ॥ २६ - २ ९ ॥ नक्षत्र - पुरुष नामका व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ है । ३० प्राचीन समयमें भृगुने समस्त पापोंके विनाश करनेवाले इस व्रतको किया था । देवर्षे! भगवान्के अङ्गों और उपाङ्गोंकी पूजा करनेसे मनुष्यके सभी अङ्ग - प्रत्यङ्ग ३१ सुन्दर होते हैं । सात जन्मोंमें ( अपने स्वयंके ) किये हुए, कुलक्रमसे प्राप्त एवं माता - पिताके कारण प्राप्त पापों-सब प्रकारके पापोंको केशव पूर्णतया नष्ट कर देते हैं; ३२ | और इस प्रकार भगवान्का पूजन करनेसे समस्त प्रकारके कल्याण प्राप्त होते हैं; शरीर उत्तम आरोग्यसे सम्पन्न होता है, मनमें अनन्त प्रसन्नता प्राप्त होती है और ३३ अत्यन्त सुन्दर रूप भी प्राप्त हो जाता है॥३०–३३ ॥ इस प्रकार पूजित होनेपर नक्षत्र - पुरुष जनार्दन ३४ भगवान् मधुर वाणी, कान्ति तथा अन्य मनोऽभिलषित पदार्थ प्रदान करते हैं । नारदजी! इन नक्षत्रोंके योगमें क्रमशः ३५ उपवासकर महाभाग्यशालिनी अरुन्धतीने उत्तम प्रसिद्धि प्राप्त की थी । आदित्यने पुत्रकी इच्छासे नक्षत्र - पुरुष ३६ । जनार्दनकी अर्चनाकर रेवन्त - नामक पुत्र प्राप्त किया था ।
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अध्याय ८१ ] प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान ३ ९९
रम्भा रूपमवापाग्र्यं वाङ्माधुर्यं च मेनका ।
कान्तिं विधुरवापाग्र्यां राज्यं राजा पुरूरवाः ॥
एवं विधानतो ब्रह्मन्नक्षत्राङ्गो जनार्दनः ।
पूजितो रूपधारी यैस्तैः प्राप्ता तु सुकामिता ॥
एतत् तवोक्तं परमं पवित्रं धन्यं यशस्यं शुभरूपदायि । नक्षत्रपुंसः परमं विधान शृणुष्व पुण्यामिह तीर्थयात्राम् ॥ ( नक्षत्राङ्ग जनार्दनकी पूजा करके ) रम्भाने श्रेष्ठ रूप, ३७ मेनकाने वाणीकी मधुरता, चन्द्रने उत्तम कान्ति तथा पुरूरवाने राज्य प्राप्त किया था । [ पुलस्त्यजी कहते हैं कि ] ब्रह्मन्! इस प्रकार जिसने नक्षत्राङ्ग-३८ रूपधारी जनार्दनकी पूजा की, उसने अपने मनोरथोंकी भलीभाँति पूर्ति कर ली । मैंने आपसे भगवान् नक्षत्र - पुरुषके परम पवित्र धन देनेवाले, कीर्ति बढ़ानेवाले और सुन्दर रूपको देनेवाले व्रतके विधानका वर्णन कर दिया । अब पवित्र तीर्थयात्राका वर्णन ३ ९ सुनिये ॥ ३४–३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अस्सीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८० ॥
इक्यासीवाँ अध्याय प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भवका आख्यान पुलस्त्य उवाच
इरावतीमनुप्राप्य पुण्यां तामृषिकन्यकाम् ।
स्नात्वा सम्पूजयामास चैत्राष्टम्यां जनार्दनम् ॥
नक्षत्रपुरुषं चीर्त्वा व्रतं पुण्यप्रदं शुचिः ।
जगाम स कुरुक्षेत्रं प्रह्लादो दानवेश्वरः ॥
ऐरावतेन मन्त्रेण चक्रतीर्थं सुदर्शनम् ।
उपामन्त्र्य ततः सस्त्रौ वेदोक्तविधिना मुने ॥
उपोष्य क्षणदां भक्त्या पूजयित्वा कुरुध्वजम् ।
कृतशौचो जगामाथ द्रष्टुं पुरुषकेसरिम् ॥
स्नात्वा तु देविकायां च नृसिंहं प्रतिपूज्य च ।
तत्रोष्य रजनीमेकां गोकर्णं दानवो ययौ ॥
तस्मिन् स्नात्वा तथा प्राचीं पूज्येशं विश्वकर्मिणम् ।
प्राचीने चापरे दैत्यो द्रष्टुं कामेश्वरं ययौ ॥
तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च पूजयित्वा च शङ्करम् ।
द्रष्टुं ययौ च प्रह्लादः पुण्डरीकं महाम्भसि ॥
पुलस्त्यजी बोले- ( नारदजी! ) प्रह्लादने परम पवित्र ऋषिकन्या उस इरावती नदीके पास जाकर स्नान किया १ और चैत्रमासकी अष्टमी तिथिमें जनार्दनकी पूजा की । वहाँ पवित्र पुण्यदायक नक्षत्र- पुरुषके व्रतका अनुष्ठान कर २ दानवेश्वर प्रह्लाद कुरुक्षेत्र चले गये । मुने! उन्होंने ऐरावत-मन्त्र से सुदर्शनचक्र तीर्थका आवाहन करके वेद - विहित ३ विधिसे स्नान किया । वहाँ एक रात्रि निवास कर श्रद्धासे कुरुध्वजका पूजन किया और शौचाचारसे शुद्ध होकर ४ नृसिंहका दर्शन करनेके लिये चले गये॥१-४ ॥ दानव ( प्रह्लाद ) - ने वहाँ देविकामें स्नान कर नृसिंहकी ५ पूजा की और एक रात वहाँ निवासकर गोकर्ण - तीर्थ चले गये । वहाँ प्राची ( पूज्य - पूजकके मध्य स्थान ) - में स्नान कर पहले उन्होंने विश्वकर्मा भगवान्की पूजा की । ६ उसके बाद दूसरे प्राचीन ( परकोटा या चहारदीवारी ) -में कामेश्वरका दर्शन करनेके लिये गये । वहाँ स्नान करनेके बाद शंकरभगवान्का दर्शन और पूजनकर प्रह्लाद ७ । श्रेष्ठ जलमें स्थित पुण्डरीकका दर्शन करने चले गये ।
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४०० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८१
तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च संतर्प्य पितृदेवताः ।
पुण्डरीकं च सम्पूज्य उवास दिवसत्रयम् ॥
विशाखयूपे तदनु दृष्ट्वा देवं तथाजितम् ।
स्नात्वा तथा कृष्णतीर्थे त्रिरात्रं न्यवसच्छुचिः ॥
ततो हंसपदे हंसं दृष्ट्वा सम्पूज्य चेश्वरम् ।
जगामासौ पयोष्णायामखण्डं द्रष्टुमीश्वरम् ॥
स्नात्वा पयोष्ण्याः सलिले पूज्याखण्डं जगत्पतिम् ।
द्रष्टुं जगाम मतिमान् वितस्तायां कुमारिलम् ॥
तत्र स्नात्वाऽर्च्य देवेशं बालखिल्यैर्मरीचिपैः ।
आराध्यमानं यद्यत्र कृतं पापप्रणाशनम् ॥
यत्र सा सुरभिर्देवी स्वसुतां कपिलां शुभाम् ।
देवप्रियार्थमसृजद्धितार्थं जगतस्तथा ॥
तत्र देवह्रदे स्नात्वा शम्भुं सम्पूज्य भक्तितः ।
विधिवद्दधि च प्राश्य मणिमन्तं ततो ययौ ॥
तत्र तीर्थवरे स्नात्वा प्राजापत्ये महामतिः ।
ददर्श शम्भुं ब्रह्माणं देवेशं च प्रजापतिम् ॥
विधानतस्तु तान् देवान् पूजयित्वा तपोधन ।
षड्रात्रं तत्र च स्थित्वा जगाम मधुनन्दिनीम् ॥
मधुमत्सलिले स्नात्वा दैवं चक्रधरं हरम् ।
शूलबाहुं च गोविन्दं ददर्श दनुपुङ्गवः ॥
नारद उवाच
किमर्थं भगवान् शम्भुर्दधाराथ सुदर्शनम् ।
शूलं तथा वासुदेवो ममैतद् ब्रूहि पृच्छतः ॥
पुलस्त्य उवाच
श्रूयतां कथयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम् ।
कथयामास यां विष्णुर्भविष्यमनवे पुरा ॥
जलोद्भवो नाम महासुरेन्द्र घोरं स तप्त्वा तप उग्रवीर्यः । आराधयामास विरञ्चिमारात् स तस्य तुष्टो वरदो बभूव ॥ देवासुराणामजयो महाहवे निजैश्च शस्त्रैरमरैरवध्यः । निरीप्सितार्थो ब्रह्मर्षिशापैश्च जले च वह्नौ स्वगुणोपहर्ता । वहाँ भी स्नानकर उन्होंने पितरोंका तर्पण और पुण्डरीकका ८ दर्शन - पूजन किया । तीन दिनोंतक वहाँ निवास किया । उसके बाद विशाखयूपमें देव अजितका दर्शनकर उन्होंने कृष्णतीर्थमें स्नान किया और तीन रात्रितक वहाँ भी ९ पवित्रतापूर्वक निवास किया ॥ ५ - ९ ॥ उसके बाद हंसपदमें भगवान् हंसका दर्शन एवं १० पूजन कर वे पयोष्णीके समीपमें अखण्डेश्वरका दर्शन करने चले गये । पयोष्णीके जलमें स्नानकर उन्होंने जगत्पति अखण्डेश्वरकी पूजा की । उसके बाद बुद्धिमान् ११ ( प्रह्लादजी ) वितस्तामें कुमारिलके दर्शनार्थ चले गये । वहाँ स्नान करनेके पश्चात् ( सूर्यकी ) किरणोंका पान करनेवाले बालखिल्योंसे आराधित किये जा रहे पापों को १२ नष्ट करनेवाले देवेशका पूजन किया । जहाँ देवी सुरभिने देवकी प्रीति एवं जगत्की भलाईके लिये अपनी पुत्री १३ कल्याणी कपिलाका त्याग किया था ॥ १०-१३ ॥ वहाँ देवह्रदमें स्नानकर उन्होंने भक्तिपूर्वक शंभुका १४ पूजन किया और विधिपूर्वक दही खानेके बाद मणिमान्-तीर्थमें गये । प्रजापतिके उस उत्तम तीर्थमें स्नानकर महामति ( प्रह्लाद ) - ने शंकर, ब्रह्मा एवं देवेश प्रजापतिका १५ दर्शन किया । ( पुलस्त्यजी कहते हैं— ) तपोधन! विधिपूर्वक उन देवोंका पूजन करनेके बाद वहाँ छः १६ रात्रियोंतक निवासकर ( वे ) मधुनन्दिनीमें चले गये । मधुमत्के जलमें स्नानकर दानवश्रेष्ठ ( प्रह्लाद ) - ने चक्रधारी १७ । शिव और शूलधारी गोविन्दका दर्शन किया ॥ १४ – १७ ॥ नारदजीने पूछा- मुझ प्रश्नकर्त्ताको आप ( कृपया ) यह बतलाइये कि भगवान् शिवने सुदर्शन और वासुदेवने १८ शूल क्यों धारण किया था? ॥१८ ॥
पुलस्त्यजी बोले – ( नारदजी! ) सुनिये; मैं इस पुरानी कथाको कहता हूँ । पहले समयमें इसे १ ९ भगवान् विष्णुने भावी मनुसे कहा था । जलोद्भव नामका एक महान् दैत्यपति था । उस शक्तिशाली दैत्यने घोर तपकर परिश्रमसे ब्रह्माकी आराधना की । २० संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे वर दिया कि युद्धमें उसे देवता एवं दैत्य नहीं जीत सकेंगे । देवोंके अपने शस्त्रोंसे भी उसका वध नहीं हो सकेगा । ब्रह्मर्षि ( जनों ) के शापोंका भी उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं २१ । पड़ेगा और जल एवं अग्निका भी प्रभाव नहीं होगा ।