वामन पुराण — पृष्ठ 411–420

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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अध्याय ८१ ] प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान ४०१ एवम्प्रभावो देवान् महर्षीन् नृपतीन् समग्रान् । आबाधमानो विचचार भू सर्वाः क्रिया नाशयदुग्रमूर्तिः ॥ भूमिभवाः सभूपाः जग्मुः शरण्यं हरिमीशितारम् । तैश्चापि सार्द्ध भगवाञ्जगाम हिमालयं यत्र हरस्त्रिनेत्रः ॥ सम्मन्त्र्य देवर्षिहितं च कार्यं मतिं च कृत्वा निधनाय शत्रोः । निजायुधानां च विपर्ययं तौ देवाधिप चक्रतुरुग्रकर्मिणौ ॥ दानवो समायातौ तज्जिघांसू सुरेशौ । मत्वाऽजेयौ शत्रुभिर्घोररूप भयात्तोये निम्नगायां विवेश ॥ ज्ञात्वा प्रनष्टं त्रिदिवेन्द्रशत्रुं नदीं विशालां मधुमत्सुपुण्याम् । द्वयोः सशस्त्रौ तयोर्हरीशौ प्रच्छन्नमूर्ती सहसा बभूवतुः ॥ जलोद्भवश्चापि जलं ज्ञात्वा गतौ शङ्करवासुदेवौ । दिशस्समीक्ष्य भयकातराक्षो दुर्गं हिमाद्रिं च तदारुरोह ॥ मही शृङ्गो विष्णुशम्भू चञ्चूर्यमाणं स्वरिपुं च दृष्ट्वा । दुद्रुवतुः सशस्त्रौ विष्णुस्त्रिशूली गिरिशश्च चक्री ॥ ताभ्यां स दृष्टस्त्रिदशोत्तमाभ्यां चक्रेण शूलेन च भिन्नदेहः । पपात शैलात् तपनीयवर्णो यथाऽन्तरिक्षाद् विमला च तारा ॥ एवं त्रिशूलं च दधार विष्णु-श्चक्रं त्रिनेत्रोऽप्यरिसूदनार्थम् । यत्रान्त्री ह्यभवद् वितस्ता हराङ्घ्रिपाताच्छिशिराचलात्तु ॥ तत्प्राप्य तीर्थं त्रिदशाधिपाभ्यां पूजां च कृत्वा हरिशङ्कराभ्याम् । उपोष् भक्त्या हिमवन्तमागाद् द्रष्टुं गिरीशं शिवविष्णुगुप्तम् ॥ इस प्रकारका प्रभावशाली वह दनुश्रेष्ठ सभी देवताओं, महर्षियों और राजाओंको कष्ट पहुँचाता हुआ पृथ्वीपर विचरण करने लगा । ( फिर तो ) उस क्रूरने समस्त २२ कर्मोंका विनाश कर दिया ॥ १ ९ –२२ ॥ उसके बाद पृथ्वीपर आविर्भूत हुए देवगण राजाओंके साथ शरण देनेवाले एवं ( सबके ) नियामक २३ विष्णुकी शरणमें गये । भगवान् भी उन सभीके साथ हिमालयपर गये, जहाँ त्रिनेत्र हर अवस्थित थे । देवता और ऋषियोंके कल्याणकारी कार्यकी मन्त्रणा करनेके बाद शत्रुको मारनेका निश्चय कर उन दोनों उग्रकर्मी २४ देवाधिपोंने अपने आयुधोंका परिवर्तन कर लिया । फिर मारनेकी इच्छासे आ रहे देवाधिप शंकर एवं विष्णुको देखकर और उन भयंकर मूर्तिधारियों को २५ शत्रुओंसे अजेय जानकर वह दानव भयसे नदीके जलमें पैठ गया । देवशत्रुको पुण्यशालिनी मधुमती विशाला नदीमें उसे छिपा हुआ जानकर शस्त्रसहित शंकर और २६ विष्णु सहसा नदीके दोनों तटोंपर छिप गये॥२३–२६ ॥ शंकर और वासुदेवको गया हुआ जानकर जलोद्भव भी जलसे बाहर निकला तथा भयसे चञ्चल २७ नेत्रोंसे दिशाओं में ( इधर - उधर ) देखकर दुर्गम हिमालय पर्वतपर चढ़ गया । पर्वतकी चोटीपर अपने शत्रुको विचरण करते हुए देखकर त्रिशूलधारी विष्णु एवं २८ चक्रधारी शिव शस्त्र लिये हुए तुरंत दौड़ पड़े । उन सुरोत्तमोंने उसे देखकर चक्र और शूलसे उसके शरीरका भेदन कर दिया । वह सुवर्णके समान कान्तिवाला अन्तरिक्षसे गिरनेवाले विमल तारेके समान २ ९ पर्वतसे गिर पड़ा । इस प्रकार शत्रुके विनाशके लिये विष्णुने त्रिशूल तथा शंकरने चक्र धारण किया था । जहाँ शंकरका चरण गिरा था, उस हिमालय पर्वतसे ३० पापविनाशिनी वितस्ता उत्पन्न हुई । उस तीर्थमें पहुँचकर प्रह्लादने उन विष्णु एवं शंकर- इन दोनों देवोंकी अर्चा की तथा भक्तिसे वहाँ निवास कर वे शिव एवं विष्णुसे ३१ । रक्षित गिरिराज हिमालयका दर्शन करने चले गये ।

पृष्ठ 412

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४०२

तं समभ्यर्च्य विधिवद् दत्त्वा दानं द्विजातिषु ।

विस्तृते हिमवत्पादे भृगुतुङ्गं जगाम सः ॥

यत्रेश्वरो देववरस्य विष्णोः प्रादाद्रथाङ्गप्रवरायुधं वै । येन प्रचिच्छेद त्रिधैव शङ्करं जिज्ञासमानोऽस्त्रबलं महात्मा श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८२ प्रह्लाद वहाँ विधिके अनुसार उसकी पूजा करनेके ३२ बाद ब्राह्मणोंको दान देकर हिमालयके विस्तृत चरणमें ( उपत्यकामें विद्यमान ) भृगुतुङ्गतीर्थमं गये । वहाँ भगवान् शंभुने देवश्रेष्ठ विष्णुको श्रेष्ठ अस्त्र दिया था । उस अस्त्र- चक्रके बलको जाननेकी इच्छासे उन महात्माने उससे शंकरको तीन टुकड़ों में ॥ ३३ | काट दिया था ॥ २७–३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८१ ॥

बयासीवाँ अध्याय चक्रदानके कथा - प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना, हरका विरूपाक्ष हो जाना और श्रीदाम - वध नारद उवाच

भगवँल्लोकनाथाय विष्णवे विषमेक्षणः ।

किमर्थमायुधं चक्रं दत्तवाँल्लोकपूजितम् ॥

पुलस्त्य उवाच

शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् ।

चक्रप्रदानसम्बद्धां शिवमाहात्म्यवर्धिनीम् ॥

आसीद् द्विजातिप्रवरो वेदवेदाङ्गपारगः ।

गृहाश्रमी महाभागो वीतमन्युरिति स्मृतः ॥

तस्यात्रेयी महाभागा भार्यासीच्छीलसम्मता ।

पतिव्रता पतिप्राणा धर्मशीलेति विश्रुता ॥

तस्यामस्य महर्षेस्तु ऋतुकालाभिगामिनः ।

सम्बभूव सुतः श्रीमान् उपमन्युरिति स्मृतः ॥

तं माता मुनिशार्दूल शालिपिष्टरसेन वै ।

घोषयामास वदती क्षीरमेतत् सुदुर्गता ॥

नारदजीने पूछा – भगवन्! तीन नेत्रोंवाले शंकरने जगत्पति विष्णुको समस्त लोकोंमें पूजित चक्र नामका १ आयुध क्यों दिया था? ॥१ ॥

पुलस्त्यजी बोले – ( नारदजी! ) आप चक्रके प्रदान करनेसे सम्बद्ध और शिवकी महिमाको २ बढ़ानेवाली इस प्राचीन कथाको सावधान होकर सुनिये – वेद - वेदाङ्ग - पारङ्गत, गृहस्थ और महा-भाग्यशाली वीतमन्यु नामके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे । ३ उनकी महाभाग्यशालिनी, शीलसे सम्पन्न, पतिव्रता एवं पतिमें ही अपने प्राणोंको निहित किये रहनेवाली ४ आत्रेयी नामकी पत्नी थी । वह धर्मशीला नामसे प्रसिद्ध थी । ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करनेवाले उन महर्षिके उससे उपमन्यु नामका एक ५ सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ॥२–५ ॥ मुनिश्रेष्ठ! अत्यन्त दरिद्रतासे जर्जर हुई उसकी माता पिसे हुए चावलके जलको यह दूध है - ऐसा ६ । कहकर उससे उस ( पुत्र ) - का पालन करती थी ।

पृष्ठ 413

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अध्याय ८२ ] चक्रदानके कथा - प्रसङ्गमें उपमन्यु

सोऽजानानोऽथ क्षीरस्य स्वादुतां पय इत्यथ ।

सम्भावनामप्यकरोच्छालिपिष्टरसेऽपि हि ॥

सत्वेकदा समं पित्रा कुत्रचिद् द्विजवेश्मनि ।

क्षीरौदनं च बुभुजे सुस्वादु प्राणपुष्टिदम् ॥

स लब्ध्वानुपमं स्वादं क्षीरस्य ऋषिदारकः ।

मात्रा दत्तं द्वितीयेऽह्नि नादत्ते पिष्टवारि तत् ॥

रुरोदाथ ततो बाल्यात् पयोऽर्थी चातको यथा ।

तं माता रुदती प्राह वाष्पगद्गदया गिरा ॥

उमापतौ पशुपतौ शूलधारिणि शङ्करे ।

अप्रसन्ने विरूपाक्षे कुतः क्षीरेण भोजनम् ॥

यदीच्छसि पयो भोक्तुं सद्यः पुष्टिकरं सुत ।

तदाराधय देवेशं विरूपाक्षं त्रिशूलिनम् ॥

तस्मिंस्तुष्टे जगद्धानि सर्वकल्याणदायिनि ।

प्राप्यतेऽमृतपायित्वं किं पुनः क्षीरभोजनम् ॥

तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा वीतमन्युसुतोऽब्रवीत् ।

कोऽयं विरूपाक्ष इति त्वयाराध्यस्तु कीर्तितः ॥

ततः सुतं धर्मशीला धर्माढ्यं वाक्यमब्रवीत् ।

योऽयं विरूपाक्ष इति श्रूयतां कथयामि ते ॥

आसीन्महासुरपतिः श्रीदाम इति विश्रुतः ।

तेनाक्रम्य जगत्सर्वं श्रीनता स्ववशं पुरा ॥

निःश्रीकास्तु त्रयो लोकाः कृतास्तेन दुरात्मना ।

श्रीवत्सं वासुदेवस्य हर्तुमैच्छन्महाबलः ॥

तमस्य दुष्टं भगवानभिप्रायं जनार्दनः ।

ज्ञात्वा तस्य वधाकाङ्क्षी महेश्वरमुपागमत् ॥

एतस्मिन्नन्तरे शम्भुर्योगमूर्तिधरोऽव्ययः ।

तस्थौ हिमाचलप्रस्थमाश्रित्य श्लक्ष्णभूतलम् ॥

अथाभ्येत्य जगन्नाथं सहस्रशिरसं विभुम् ।

आराधयामास हरिः स्वयमात्मानमात्मना ॥

तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना ४०३ दूधके स्वादसे अपरिचित होनेके कारण वह पिसे ७ चावलके रस ( जल ) - में ही दूधकी संभावना करता था । एक दिन उसने अपने पिताके साथ किसी ब्राह्मणके घर प्राणको स्वस्थ बनानेवाली मधुर खीरका ८ भोजन किया । ऋषिके उस पुत्रने दूधके अद्भुत स्वादको पाकर दूसरे दिन माताके द्वारा दिये गये पिसे ९ हुए चावलके उस रसको ग्रहण नहीं किया ॥ ६ - ९ ॥ उसके बाद दूध चाहनेवाला वह बालक बचपनके १० कारण प्यासे चातककी भाँति रोने लगा । रोती हुई माताने आँखोंमें आँसू भरे गद्गद वाणीमें उससे कहा— शूल धारण करनेवाले पार्वतीपति पशुपति ११ विरूपाक्ष शंकरके असंतुष्ट रहते दूधसे मिला भोजन कहाँसे प्राप्त हो सकता है? पुत्र! यदि तुम तत्काल स्वास्थ्यकर दूध पीना चाहते हो तो त्रिशूल धारण १२ करनेवाले विरूपाक्ष महादेवकी सेवा करो । संसारके आधार, सभी प्रकारसे कल्याण करनेवाले उन शंकरके संतुष्ट होनेपर अमृत पीनेको मिल सकता है, दूध १३ पीनेकी तो बात ही क्या है॥१०–१३ ॥ माताके उस वचनको सुनकर वीतमन्युके पुत्रने १४ कहा- आप जिनकी सेवा - पूजा करनेको कहती हैं, वे विरूपाक्ष कौन हैं? उसके बाद धर्मशीलाने पुत्रसे धर्मसे युक्त वचन कहा – ( बेटा! ) सुनो, मैं तुम्हें १५ बतलाती हूँ कि ये विरूपाक्ष कौन हैं? प्राचीन कालमें श्रीदामा नामसे विख्यात एक महान् असुरोंका राजा था । उसने सारे संसारको अपने अधीन करके लक्ष्मीको अपने वशमें कर लिया । ( सारे विश्वपर अपना १६ अधिकार जमा लिया । ) ( फिर तो ) उस दुष्टात्माने तीनों लोकोंको ही श्रीसे रहित कर दिया । उसके बाद उस महाबलशाली असुरने वासुदेवके श्रीवत्सको छीन १७ लेनेकी कामना की ॥१४- १७ ॥ उसकी उस दूषित इच्छाको जानकर भगवान् १८ जनार्दन उसके मारनेकी इच्छासे महेश्वरके पास गये । उस समय योगमूर्तिके धारण करनेवाले अविनाशी १ ९ शंकर हिमालयकी ऊँची चोटीके चिकने भूतलपर स्थित थे । उसके बाद सहस्रशीर्षा सर्वसमर्थ जगन्नाथजीके पास २० जाकर विष्णुने अपने द्वारा स्वयं अपनी ही अर्चना की ।

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४०४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८२

साग्रं वर्षसहस्त्रं तु पादाङ्गुष्ठेन तस्थिवान् ।

गृणंस्तत्परमं ब्रह्म योगिज्ञेयमलक्षणम् ॥ २१

ततः प्रीतः प्रभुः प्रादाद् विष्णवे परमं वरम् ।

प्रत्यक्षं तैजसं श्रीमान् दिव्यं चक्रं सुदर्शनम् ॥ २२

तद् दत्त्वा देवदेवाय सर्वभूतभयप्रदम् ।

कालचक्रनिभं चक्रं शङ्करो विष्णुमब्रवीत् ॥ २३

वरायुधोऽयं देवेश सर्वायुधनिबर्हणः ।

सुदर्शनो द्वादशारः षण्णाभिर्द्वियुगो जवी ॥ २४

आरासंस्थास्त्वमी चास्य देवा मासाश्च राशयः ।

शिष्टानां रक्षणार्थाय संस्थिता ऋतवश्च षट् ॥ २५

अग्निः सोमस्तथा मित्रो वरुणोऽथ शचीपतिः ।

इन्द्राग्नी चाप्यथो विश्वे प्रजापतय एव च ॥ २६

हनूमांश्चाथ बलवान् देवो धन्वन्तरिस्तथा ।

तपश्चैव तपस्यश्च द्वादशैते प्रतिष्ठिताः ।

चैत्राद्याः फाल्गुनान्ताश्च मासास्तत्र प्रतिष्ठिताः ॥ २७

त्वमेवमाधाय विभो वरायुधं शत्रुं सुराणां जहि माविशङ्किथाः । अमोघ राजपूजितो धृतो मया नेत्रगतस्तपोबलात् ॥ २८

इत्युक्तः शम्भुना विष्णुः भवं वचनमब्रवीत् ।

कथं शम्भो विजानीयाममोघो मोघ एव वा ॥ २ ९

यद्यमोघो विभो चक्रः सर्वत्राप्रतिघस्तव ।

जिज्ञासार्थं तवैवेह प्रक्षेप्स्यामि प्रतीच्छ भोः ॥ ३०

तद्वाक्यं वासुदेवस्य निशम्याह पिनाकधृक् ।

यद्येवं प्रक्षिपस्वेति निर्विशङ्केन चेतसा ॥ ३१

तन्महेशानवचनं श्रुत्वा विष्णुः सुदर्शनम् ।

मुमोच तेजो जिज्ञासुः शङ्करम्प्रति वेगवान् ॥३२

मुरारिकरविभ्रष्टं चक्रमभ्येत्य शूलिनम् ।

त्रिधा चकार विश्वेशं यज्ञेशं यज्ञयाजकम् ॥ ३३

हरं हरिस्त्रिधाभूतं दृष्ट्वा कृत्तं महाभुजः ।

व्रीडोपप्लुतदेहस्तु प्रणिपातपरोऽभवत् ॥ ३४

पादप्रणामावनतं वीक्ष्य दामोदरं भवः ।

प्राह प्रीतिपरः श्रीमानुत्तिष्ठेति पुनः पुनः ॥ ३५

योगियोंद्वारा जाननेयोग्य उस अव्यक्त परम ब्रह्मका जप करते हुए वे एक हजार वर्षसे अधिक समयतक पैरके अँगूठेपर खड़े रहे ॥ १८ –२१ ॥ उसके बाद श्रीमान् महादेवने संतुष्ट होकर विष्णुको परमश्रेष्ठ प्रत्यक्ष तेजसे युक्त दिव्य सुदर्शनचक्र प्रदान किया । सभी प्राणियोंके लिये भयदायक कालचक्रके समान वह चक्र देवाधिदेव विष्णुको देकर शंकरने | उनसे कहा- देवेश! बारह अरों, छः नाभियों एवं दो युगोंसे युक्त तीव्रगतिशील और समस्त आयुधोंका नाश करनेवाला सुदर्शन नामका यह श्रेष्ठ आयुध है । सज्जनोंकी | रक्षा करनेके लिये इसके अरोंमें देवता, मास, राशियाँ, छः ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, अग्नि, विश्वेदेव, प्रजापति, बलवान् हनूमान्, धन्वन्तरि देव, तप एवं तपस्या —ये तथा चैत्रसे लेकर फाल्गुनतकके बारह महीने प्रतिष्ठित हैं ॥ २२ - २७ ॥ विभो! आप इस श्रेष्ठ आयुधको ले करके निर्भीक होकर देवोंके शत्रुका संहार करें । मैंने असुर-राजसे आराधित इस अमोघ आयुधको तपके बलसे अपने नेत्रमें स्थित कर लिया था । शम्भुके इस प्रकार कहनेपर विष्णुने शंकरसे यह वचन कहा— शम्भो! मुझे यह कैसे मालूम होगा कि यह अस्त्र अमोघ या मोघ है? विभो! यदि आपका यह चक्र अमोघ तथा सर्वत्र बिना किसी बाधाके निरन्तर गतिशील है तो इसको जाननेके लिये मैं आपके ही ऊपर इसे चलाता हूँ । आप इसे स्वीकार करें । वासुदेवके उस वचनको सुनकर पिनाकधारीने कहा- यदि ऐसा है तो निश्चिन्त होकर मेरे ऊपर इसे चलाइये॥२८–३१ ॥ महेशके उस वचनको सुनकर विष्णुने सुदर्शनके तेजको जाननेकी अभिलाषासे उसे वेगसे शंकरके ऊपर चलाया । विष्णुके हाथसे छोड़ा गया वह चक्र शंकरके निकट गया और उन्हें काटकर विश्वेश, यज्ञेश तथा यज्ञयाजकके रूपमें तीन भागोंमें अलग कर दिया । शंकरको तीन खण्डोंमें कटा हुआ देखकर महाबाहु विष्णु संकुचित हो गये । वे ( शंकरको ) प्रणाम करने लगे । चरणोंमें प्रणत हुए दामोदरको देखकर श्रीमान् भव ( शंकर ) - ने प्रसन्नतापूर्वक बार - बार । ' उठो - उठो ' कहते हुए ( यह ) कहा— ॥३२–३५ ॥

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अध्याय ८२ ] चक्रदानके कथा - प्रसङ्गमें उपमन्यु

प्राकृतोऽयं महाबाहो विकारश्चक्रनेमिना ।

निकृत्तो न स्वभावो मे सोऽच्छेद्यो ऽदाह्य एव च ॥

तद्यदेतानि चक्रेण त्रीणि भागानि केशव ।

कृतानि तानि पुण्यानि भविष्यन्ति न संशयः ॥

हिरण्याक्षः स्मृतो ह्येकः सुवर्णाक्षस्तथा परः ।

तृतीयश्च विरूपाक्षस्त्रयोऽमी पुण्यदा नृणाम् ॥

उत्तिष्ठ गच्छस्व विभो निहन्तुममरार्दनम् ।

श्रीदानि निहते विष्णो नन्दयिष्यन्ति देवताः ॥

इत्येवमुक्तो भगवान् हरेण गरुडध्वजः ।

गत्वा सुरगिरिप्रस्थं श्रीदामानं ददर्श ह ॥

तं दृष्ट्वा देवदर्पघ्नं दैत्यं देववरो हरिः ।

मुमोच चक्रं वेगाढ्यं हतोऽसीति ब्रुवन्मुहुः ॥

ततस्तु तेनाप्रतिपौरुषेण चक्रेण दैत्यस्य शिरो निकृत्तम् । संछिन्नशीर्षो निपपात शैलाद् वज्राहतं शैलशिरो यथैव ॥ तस्मिन् हते देवरिपौ मुरारि-रीशं समाराध्य विरूपनेत्रम् । लब्ध्वा च चक्रं प्रवरं महायुधं जगाम देवो निलयं पयोनिधिम् ॥

सोऽयं पुत्र विरूपाक्षो देवदेवो महेश्वरः ।

तमाराधय चेत् साधो क्षीरेणेच्छसि भोजनम् ॥

तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा वीतमन्युसुतो बली ।

तमाराध्य विरूपाक्षं प्राप्तः क्षीरेण भोजनम् ॥

एवं तवोक्तं परमं पवित्रं संछेदनं शर्वतनोः पुरा वै । तत्तीर्थवर्यं स महासुरो वै समाससादाथ सुपुण्यहेतोः ॥ तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना ४०५ महाबाहो! चक्रकी नेमिद्वारा मेरा यह प्राकृत ३६ विकार ही काटा गया है । इसके द्वारा मेरा स्वभाव नहीं क्षत हुआ है । वह तो अच्छेद्य एवं अदाह्य है । केशव! चक्रद्वारा किये गये ये तीनों अंश निस्सन्देह पुण्य ३७ प्रदान करनेवाले होंगे । एक अंश हिरण्याक्ष नामधारी, दूसरा सुवर्णाक्ष नामधारी और तीसरा विरूपाक्ष नामका होगा । ये तीनों अंश मनुष्योंके लिये पुण्यप्रदाता होंगे । ३८ विभो! उठिये और देव शत्रुका वध करनेके लिये जाइये । विष्णो! श्रीदामाके वध किये जानेपर देवता ३ ९ प्रसन्न होंगे । शंकरके इस प्रकार कहनेपर भगवान् गरुडध्वजने पर्वतकी ऊँची चोटीपर जाकर श्रीदामाको देखा । देवताओंके दर्पका विनाश करनेवाले उस ४० दैत्यको देखकर देव - श्रेष्ठ विष्णुने बार - बार ( यह लो ) ' तुम मारे गये ' ऐसा कहते हुए तीव्र गतिसे चक्र ४१ | चलाया ॥ ३६-४१ ॥ फिर तो अनुपम पौरुषवाले उस चक्रने दैत्यका मस्तक काट डाला । मस्तक कट जानेपर दैत्य पर्वतके ऊपरसे इस प्रकार गिरा जैसे वज्रसे आहत होकर ४२ । पर्वतकी ऊँची चोटी गिरती है । उस देव - शत्रुके मारे | जानेपर मुरारिने विरूपाक्ष शंकरकी आराधना की और चक्ररूपी श्रेष्ठ महायुध लेकर वे देव क्षीरसागरमें स्थित अपने गृहको चले गये । [ वीतमन्युकी धर्मशीला पत्नी ४३ आत्रेयी कहती हैं - ] पुत्र! ये वही देव - देव महेश्वर विरूपाक्ष हैं । साधो! यदि तुम दूधके साथ भोजन करना चाहते हो तो उनकी सेवा - पूजा करो । माताके ४४ उस वचनको सुनकर वीतमन्युके बलवान् पुत्रने उन विरूपाक्ष शंकरकी आराधनाकर दुग्धसे युक्त भोजन ४५ प्राप्त किया । [ पुलस्त्यजी कहते हैं - ] इस प्रकार प्राचीन कालमें घटित हुई शंकरके शरीर छेदनसे सम्बद्ध परम पवित्र कथाको मैंने तुमसे कहा । उसी श्रेष्ठ तीर्थमें वे महान् असुर प्रह्लाद सुन्दर पुण्य प्राप्तिके ४६ | लिये गये॥४२–४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बयासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८२ ॥

पृष्ठ 416

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४०६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८३ तिरासीवाँ अध्याय प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ - यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व पुलस्त्य उवाच

तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं त्रिलोचनम् ।

पूजयित्वा सुवर्णाक्षं नैमिषं प्रययौ ततः ॥

तत्र तीर्थसहस्राणि त्रिंशत्पापहराणि च ।

गोमत्याः काञ्चनाक्ष्याश्च गुरुदायाश्च मध्यतः ॥

तेषु स्नात्वार्च्य देवेशं पीतवाससमच्युतम् ।

ऋषीनपि च सम्पूज्य नैमिषारण्यवासिनः ॥

देवदेवं तथेशानं सम्पूज्य विधिना ततः ।

गयायां गोपतिं द्रष्टुं जगाम स महासुरः ॥

तत्र ब्रह्मध्वजे स्नात्वा कृत्वा चास्य प्रदक्षिणाम् ।

पिण्डनिर्वपणं पुण्यं पितॄणां स चकार ह ॥

उदपाने तथा स्नात्वा तत्राभ्यर्च्य पितॄन् वशी ।

गदापाणिं समभ्यर्च्य गोपतिं चापि शङ्करम् ॥

इन्द्रतीर्थे तथा स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः ।

महानदीजले स्नात्वा सरयूमाजगाम सः ॥

तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य गोप्रतारे कुशेशयम् ।

उपोष्य रजनीमेकां विरजां नगरीं ययौ ॥

स्नात्वा विरजसे तीर्थे दत्त्वा पिण्डं पितॄंस्तथा ।

दर्शनार्थं ययौ श्रीमानजितं पुरुषोत्तमम् ॥

तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षमक्षरं परमं शुचिः ।

षड्रात्रमुष्य तत्रैव महेन्द्रं दक्षिणं ययौ ॥

तत्र देववरं शम्भुमर्द्धनारीश्वरं हरम् ।

दृष्ट्वार्च्य सम्पूज्य पितॄन् महेन्द्रं चोत्तरं गतः ॥

तत्र देववरं शम्भुं गोपालं सोमपायिनम् ।

दृष्ट्वा स्नात्वा सोमतीर्थे सह्याचलमुपागतः ॥

तत्र स्नात्वा महोदक्यां वैकुण्ठं चार्च्य भक्तितः ।

सुरान् पितॄन् समभ्यर्च्य पारियात्रं गिरिं गतः ॥

तत्र स्नात्वा लाङ्गलिन्यां पूजयित्वाऽपराजितम् ।

कशेरुदेशं चाभ्येत्य विश्वरूपं ददर्श सः ॥

पुलस्त्यजी बोले- प्रह्लादने उस उत्तम तीर्थमें स्नान कर त्रिनयन महादेवका दर्शन किया और सुवर्णाक्षकी १ पूजाकर वे नैमिषारण्य चले गये । वहाँ गोमती, काञ्चनाक्षी और गुरुदाके मध्यमें पाप नाश करनेवाले तीस हजार २ तीर्थ हैं । उनमें स्नानकर उन्होंने पीताम्बर धारण करनेवाले । देवेश्वर अच्युतकी पूजा की । नैमिषारण्यमें रहनेवाले ३ ऋषियोंकी पूजा करनेके पश्चात् देवाधिदेव महेशका विधिपूर्वक पूजन कर वे महासुर गोपतिका दर्शन ४ करनेके लिये गयातीर्थमें चले गये ॥ १- ४ ॥ वहाँ ब्रह्मध्वजमें स्नान और उसकी प्रदक्षिणा कर ५ उन्होंने पितरोंके निमित्त पवित्र पिण्डदान किया । ( फिर ) उदपानमें स्नानकर जितेन्द्रिय ( प्रह्लाद ) - ने पितरों, गदापाणि ६ ( विष्णु ) एवं गोपति शंकरकी पूजा की । इन्द्र-तीर्थ ( भी ) स्नानकर उन्होंने पितरों एवं देवोंका तर्पण किया तथा महानदीके जलमें स्नानकर वे सरयूके समीप ७ पहुँचे । उसमें स्नानकर उन्होंने गोप्रतारमें कुशेशयकी पूजा की एवं वहाँ एक रात्रि निवास कर वे विरजा नगरीमें ८ | गये ॥ ५–८ ॥ विरजातीर्थमें स्नान करनेके बाद पितरोंको पिण्ड-९ दान कर वे श्रीमान् पुरुषोत्तम अजितका दर्शन करने चले गये । वे निष्पाप प्रह्लाद अविनाशी पुण्डरीकाक्षका दर्शन करनेके पश्चात् छः रातोंतक वहाँ निवासकर १० दक्षिण दिशामें स्थित महेन्द्रपर्वतपर चले गये । ( वे ) वहाँ देवश्रेष्ठ अर्धनारीश्वर महादेवका दर्शन तथा ११ पूजनकर पितरोंकी अर्चना करके उत्तर दिशाकी ओर चले गये । वहाँ देववर शम्भु और सोमपायी | गोपालका दर्शन करनेके पश्चात् सोमतीर्थमें स्नानकर वे १२ सह्याचलपर गये ॥ ९ - १२ ॥ वहाँ महोदकीमें स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक १३ | विष्णु देवताओं एवं पितरोंका पूजन कर वे पारियात्रपर्वतपर चले गये । वहाँ लाङ्गलिनी में स्नान करनेके बाद उन्होंने अपराजितका पूजन किया १४ । और कशेरुदेशमें जाकर विश्वरूपका दर्शन किया ।

पृष्ठ 417

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अध्याय ८३ ] प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ - यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व ४०७

यत्र देववरः शम्भुर्गणानां तु सुपूजितम् ।

विश्वरूपमथात्मानं दर्शयामास योगवित् ॥

तत्र मकुणिकातोये स्नात्वाभ्यर्च्य महेश्वरम् ।

जगामाद्रिं स सौगन्धिं प्रह्लादो मलयाचलम् ॥

महाह्रदे ततः स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम् ।

ततो जगाम योगात्मा द्रष्टुं विन्ध्ये सदाशिवम् ॥

ततो विपाशासलिले स्नात्वाभ्यर्च्य सदाशिवम् ।

त्रिरात्रं समुपोष्याथ अवन्तीं नगरीं ययौ ॥

तत्र शिप्राजले स्नात्वा विष्णुं सम्पूज्य भक्तितः ।

श्मशानस्थं ददर्शाथ महाकालवपुर्धरम् ॥

तस्मिन् हि सर्वसत्त्वानां तेन रूपेण शङ्करः ।

तामसं रूपमास्थाय संहारं कुरुते वशी ॥

तत्रस्थेन सुरेशेन श्वेतकिर्नाम भूपतिः ।

रक्षितस्त्वन्तकं दग्ध्वा सर्वभूतापहारिणम् ॥

तत्रातिहृष्टो वसति नित्यं शर्वः सहोमया ।

वृतः प्रमथकोटीभिर्बहुभिस्त्रिदशार्चितः ॥

तं दृष्ट्वाथ महाकालं कालकालान्तकान्तकम् ।

यमसंयमनं मृत्योर्मृत्युं चित्रविचित्रकम् ॥

श्मशाननिलयं शम्भुं भूतनाथं जगत्पतिम् ।

पूजयित्वा शूलधरं जगाम निषधान् प्रति ॥

तत्रामरेश्वरं देवं दृष्ट्वा सम्पूज्य भक्तितः ।

महोदयं समभ्येत्य हयग्रीवं ददर्श सः ॥

अश्वतीर्थे ततः स्नात्वा दृष्ट्वा च तुरगाननम् ।

श्रीधरं चैव सम्पूज्य पञ्चालविषयं ययौ ॥

तत्रेश्वरगुणैर्युक्तं पुत्रमपतेरथ ।

पाञ्चालिकं वशी दृष्ट्वा प्रयागं परतो ययौ ॥

स्नात्वा सन्निहिते तीर्थे यामुने लोकविश्रुते ।

दृष्ट्वा वटेश्वरं रुद्रं माधवं योगशायिनम् ॥

द्वावेव भक्तितः पूज्यौ पूजयित्वा महासुरः ।

माघमासमथोपोष्य ततो वाराणसीं गतः ॥

ततोऽस्यां वरणायां च तीर्थेषु च पृथक् पृथक् ।

सर्वपापहराद्येषु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः ॥

प्रदक्षिणीकृत्य पुरीं पूज्याविमुक्तकेशवौ ।

लोलं दिवाकरं दृष्ट्वा ततो मधुवनं ययौ ॥

वहाँ योगवित् देववर शम्भुने गणोंसे पूजित अपना १५ विश्वरूप प्रकट किया था; वहाँ मकुणिकाके जलमें स्नान करनेके बाद महेश्वरका पूजनकर प्रह्लाद सुगन्धियुक्त १६ मलयपर्वतपर गये॥१३–१६ ॥ उसके बाद महाह्रदमें स्नान करनेके पश्चात् शंकरकी १७ पूजाकर योगात्मा प्रह्लाद सदाशिवका दर्शन करनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर गये । उसके बाद विपाशाके जलमें उन्होंने स्नान किया और सदाशिवका पूजन किया । १८ उसके पश्चात् तीन रातोंतक वहाँ निवास करके वे अवन्ती नगरीमें गये । वहाँ शिप्राके जलमें स्नान करनेके १ ९ बाद श्रद्धापूर्वक विष्णुका पूजनकर उन्होंने श्मशानमें स्थित महाकाल - शरीरधारीका दर्शन किया । वहाँ उस रूपमें स्थित आत्मवशी शंकर तामसरूप धारण करके २० समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं ॥ १७–२० ॥ वहाँपर स्थित हुए सुरेशने सर्वभूतापहारी ( समस्त २१ भूतोंका अपहरण करनेवाले ) अन्तकको जलाकर श्वेतकि नामक राजाकी रक्षा की थी । करोड़ों गणोंसे घिरे हुए एवं देवोंसे पूजित भगवान् शंकर उमाके साथ अत्यन्त २२ प्रसन्नतापूर्वक वहाँ नित्य निवास करते हैं । उन कालोंके काल, अन्तकोंके अन्तक, यमोंके नियामक, मृत्युके २३ मृत्यु चित्रविचित्र श्मशानके वासी, भूतपति, जगत्पति, शूल धारण करनेवाले शंकरका दर्शन एवं पूजनकर वे २४ निषधदेशकी ओर चले गये ॥ २१ - २४ ॥ वहाँ श्रद्धापूर्वक अमरेश्वर देवका दर्शन एवं अर्चन २५ करनेके बाद उन्होंने महोदयमें जाकर हयग्रीवका दर्शन किया । उसके बाद अश्वतीर्थमें स्नान कर अश्वमुखका २६ दर्शन तथा श्रीधरका अर्चन कर वे पाञ्चाल देशमें गये । जितेन्द्रिय प्रह्लाद वहाँ ईश्वरीय गुणोंसे सम्पन्न धनपति कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकका दर्शनकर प्रयाग चले गये । २७ निकटमें रहनेवाले यमुनाके विख्यात तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् वटेश्वर रुद्र तथा योगशायी माधवका दर्शन एवं २८ श्रद्धापूर्वक उन दोनों पूजनीयोंका अर्चन कर उन महासुरने माघमासमें वहाँ निवास किया । उसके बाद वे २ ९ वाराणसी चले गये ॥ २५-२९ ॥ उसके बाद समस्त पापोंका अपहरण करनेवाले ३० असी और वरुणाके विभिन्न तीर्थोंमें स्नानके बाद पितरों एवं देवोंका अर्चनकर उन्होंने ( वाराणसी ) पुरीकी प्रदक्षिणा की । उसके बाद अविमुक्तेश्वर एवं केशवकी ३१ । पूजा तथा लोलार्कका दर्शन करके वे मधुवन चले गये ।

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४०८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८३

तत्र स्वयम्भुवं देवं ददर्शासुरसत्तमः ।

तमभ्यर्च्य महातेजाः पुष्करारण्यमागमत् ॥

तेषु त्रिष्वपि तीर्थेषु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः ।

पुष्कराक्षमयोगन्धिं ब्रह्माणं चाप्यपूजयत् ॥

ततो भूयः सरस्वत्यास्तीर्थे त्रैलोक्यविश्रुते ।

कोटितीर्थे रुद्रकोटिं ददर्श वृषभध्वजम् ॥

नैमिषेया द्विजवरा मागधेयाः ससैन्धवाः ।

धर्मारण्याः पौष्करेया दण्डकारण्यकास्तथा ॥

चाम्पेया भारुकच्छेया देविकातीरगाश्च ये ।

ते तत्र शङ्करं द्रष्टुं समायाता द्विजातयः ॥

कोटिसंख्यास्तपःसिद्धा हरदर्शनलालसाः ।

अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं वादिनो मुने ॥

तान् संक्षुब्धान् हरो दृष्ट्वा महर्षीन् दग्धकिल्बिषान् ।

तेषामेवानुकम्पार्थं कोटिमूर्त्तिरभूद् भवः ॥

ततस्ते मुनयः प्रीताः सर्व एव महेश्वरम् ।

सम्पूजयन्तस्तस्थुर्वै तीर्थं कृत्वा पृथक् पृथक् ।

इत्येवं रुद्रकोटीति नाम्ना शम्भुरजायत ॥

तं ददर्श महातेजाः प्रह्लादो भक्तिमान् वशी ।

कोटितीर्थे ततः स्नात्वा तर्पयित्वा वसून् पितॄन् ।

रुद्रकोटिं समभ्यर्च्य जगाम कुरुजाङ्गलम् ॥

तत्र देववरं स्थाणुं शङ्करं पार्वतीप्रियम् ।

सरस्वतीजले मग्नं ददर्श सुरपूजितम् ॥

सारस्वतेऽम्भसि स्नात्वा स्थाणुं सम्पूज्य भक्तितः ।

स्नात्वा दशाश्वमेधे च सम्पूज्य च सुरान् पितॄन् ॥

सहस्त्रलिङ्गं सम्पूज्य स्नात्वा कन्याहृदे शुचिः ।

अभिवाद्य गुरुं शुक्रं सोमतीर्थं जगाम ह ॥

तत्र स्नात्वाऽर्च्य च पितॄन् सोमं सम्पूज्य भक्तितः ।

क्षीरिकावासमभ्येत्य स्नानं चक्रे महायशाः ॥

प्रदक्षिणीकृत्य तरुं वरुणं चार्च्य बुद्धिमान् ।

भूयः कुरुध्वजं दृष्ट्वा पद्माख्यां नगरीं गतः ॥

तत्रार्च्य मित्रावरुणौ भास्करौ लोकपूजितौ । कुमारधारामध्येत्य ददर्श स्वामिनं वशी महातेजस्वी असुरोत्तम प्रह्लाद वहाँ स्वयम्भू देवका दर्शन ३२ एवं पूजनकर पुष्करारण्यमें गये । उन तीनों तीर्थोंमें स्नान करनेके बाद पितरों एवं देवोंका पूजन कर उन्होंने ३३ अयोगन्धि, पुष्कराक्ष तथा ब्रह्माका अर्चन किया । उसके बाद उन्होंने कोटितीर्थमें सरस्वतीके तटपर स्थित लोकविख्यात ३४ रुद्रकोटि वृषभध्वजका दर्शन किया ॥ ३० – ३४ ॥ ( कथा है कि प्राचीन समयमें ) नैमिषारण्य, मगध, ३५ सिन्धुप्रदेश, धर्मारण्य, पुष्कर, दण्डकारण्य, चम्पा, भरुकच्छ एवं देविका तटपर रहनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ शंकरका ३६ दर्शन करने आये थे । मुने! शिवके दर्शनकी इच्छावाले करोड़ों सिद्ध तपस्वी ' मैं पहले दर्शन करूँगा ', ' मैं पहले ३७ दर्शन करूँगा ' इस प्रकारका विवाद करने लगे । उन निष्पाप महर्षियोंको विशेष अधीर हुआ देखकर शंकरने उनपर ३८ । कृपाकर करोड़ों मूर्तियाँ धारण कर लीं ॥ ३५-३८ ॥ उसके बाद वे सभी मुनि हर्षपूर्वक अलग - अलग तीर्थ बनाकर महेश्वरकी पूजा करते हुए निवास करने ३ ९ लगे । इस प्रकार शम्भुका नाम रुद्रकोटि हुआ । महातेजस्वी श्रद्धालु जितेन्द्रिय प्रह्लादने उनका दर्शन किया एवं कोटितीर्थमें स्नानकर वसुओं तथा पितरोंका तर्पण किया । उसके बाद रुद्रकोटिका अर्चनकर वे कुरुजाङ्गलमें ४० चले गये । उन्होंने वहाँ सरस्वतीके जलमें निमग्न हुए | देवताओंसे पूजित स्थाणु - पार्वतीपति भगवान् शंकरका ४१ दर्शन किया । सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्थाणुकी पूजा की तथा दशाश्वमेधमें स्नानकर देवों एवं ४२ पितरोंका अर्चन किया ॥ ३ ९ –४२ ॥ कन्याहृदमें स्नान करनेके बाद पवित्र होकर उन्होंने ४३ सहस्रलिङ्गका अर्चन किया । इसके बाद ( शुक्रतीर्थमें ) गुरु शुक्राचार्यको प्रणामकर वे सोमतीर्थ चले गये । वहाँ स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक पितरों एवं सोमका अर्चन ४४ करके उन महायशस्वीने क्षीरिकावासमें जाकर स्नान किया । | वहाँके वृक्षकी प्रदक्षिणाकर तथा वरुणकी पूजा करनेके ४५ पश्चात् बुद्धिमान् प्रह्लाद फिर कुरुध्वजका दर्शनकर पद्मा । नामकी नगरीमें चले गये । वहाँ लोकपूजित तेजस्वी मित्रावरुणका पूजन करनेके बाद कुमारधारामें जाकर ॥ ४६ जितेन्द्रिय प्रह्लादने स्वामी कार्तिकेयका दर्शन किया ।

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अध्याय ८३ ] प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ - यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व ४० ९

स्नात्वा कपिलधारायां संतर्प्यर्च्य पितॄन् सुरान् ।

दृष्ट्वा स्कन्दं समभ्यर्च्य नर्मदायां जगाम ह ॥ ४७

तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य वासुदेवं श्रियः पतिम् ।

जगाम भूधरं द्रष्टुं वाराहं चक्रधारिणम् ॥ ४८

स्नात्वा कोकामुखे तीर्थे सम्पूज्य धरणीधरम् ।

त्रिसौवर्णं महादेवमर्बुदेशं जगाम ह ॥ ४ ९

तत्र नारीह्रदे स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम् ।

कालिञ्जरं समभ्येत्य नीलकण्ठं ददर्श सः ॥ ५०

नीलतीर्थजले स्नात्वा पूजयित्वा ततः शिवम् ।

जगाम सागरानूपे प्रभासे द्रष्टुमीश्वरम् ॥ ५१

स्नात्वा च संगमे नद्याः सरस्वत्यार्णवस्य च ।

सोमेश्वरं लोकपतिं ददर्श स कपर्दिनम् ॥ ५२

यो दक्षशापनिर्दग्धः क्षयी ताराधिपः शशी ।

आप्यायितः शङ्करेण विष्णुना सकपर्दिना ॥ ५३

तावर्च्य देवप्रवरौ प्रजगाम महालयम् ।

तत्र रुद्रं समभ्यर्च्य प्रजगामोत्तरान् कुरून् ॥५४

पद्मनाभं स तत्रार्च्य सप्तगोदावरं ययौ ।

तत्र स्नात्वाऽर्च्य विश्वेशं भीमं त्रैलोक्यवन्दितम् ॥ ५५

गत्वा दारुवने श्रीमान् लिङ्गं स ददर्श ह ।

तमर्च्य ब्राह्मणीं गत्वा स्नात्वाऽर्च्य त्रिदशेश्वरम् ॥ ५६

प्लक्षावतरणं गत्वा श्रीनिवासमपूजयत् ।

ततश्च कुण्डिनं गत्वा सम्पूज्य प्राणतृप्तिदम् ॥ ५७

शूर्पारके चतुर्बाहुं पूजयित्वा विधानतः ।

मागधारण्यमासाद्य ददर्श वसुधाधिपम् ॥ ५८

तमर्चयित्वा विश्वेशं स जगाम प्रजामुखम् ।

महातीर्थे ततः स्नात्वा वासुदेवं प्रणम्य च ॥ ५ ९

शोणं सम्प्राप्य सम्पूज्य रुक्मवर्माणमीश्वरम् ।

महाकोश्यां महादेवं हंसाख्यं भक्तिमानथ ॥ ६०

पूजयित्वा जगामाथ सैन्धवारण्यमुत्तमम् ।

तत्रेश्वरं सुनेत्राख्यं शङ्खशूलधरं गुरुम् ।

पूजयित्वा महाबाहुः प्रजगाम त्रिविष्टपम् ॥ ६१

तत्र देवं महेशानं जटाधरमिति श्रुतम् ।

तं दृष्ट्वा हरिं चासौ तीर्थं कनखलं ययौ ॥ ६२

कपिलधारामें स्नान करके पितृतर्पण, देवपूजन एवं स्कन्दका दर्शन तथा अर्चन कर वे नर्मदाके निकट गये । उसमें स्नान करके लक्ष्मीपति वासुदेवकी अर्चना कर वे चक्र धारण करनेवाले भूधर वाराहदेवका दर्शन करने गये ॥ ४३–४८ ॥ वे कोकामुखतीर्थमें स्नान और धरणीधरकी पूजा करके अर्बुदेशमें त्रिसौवर्ण महादेवके पास गये । वहाँ उन्होंने नारीह्रदमें स्नान और शंकरकी अर्चना करनेके बाद कालिंजरमें आकर नीलकण्ठका दर्शन किया । नीलतीर्थके जलमें स्नान करनेके बाद शिवका पूजन कर वे समुद्रके तटपर प्रभासतीर्थमें भगवान्‌का दर्शन करने गये । वहाँ उन्होंने सरस्वती नदी और सागरके संगममें स्नानकर लोकपति कपर्दी सोमेश्वरका दर्शन किया । कपर्दी शंकर एवं विष्णुने दक्षके शापसे दग्ध हुए एवं क्षयरोग ग्रसित ताराधिप चन्द्रमाको पूर्ण किया था ॥ ४ ९ –५३ ॥ उन दोनों श्रेष्ठ देवोंका पूजनकर वे महालय गये; वहाँ रुद्रका पूजन कर वे उत्तरकुरु गये । वहाँ पद्मनाभका अर्चन कर वे सप्तगोदावरतीर्थमें गये । वहाँ स्नान करनेके बाद उन्होंने तीनों लोकोंसे वन्दित भीमविश्वेश्वरका पूजन किया । दारुवनमें जाकर श्रीमान् प्रह्लादने लिङ्गका दर्शन किया । उनकी पूजा करनेके पश्चात् ब्राह्मणी ( नदी ) में जाकर उन्होंने स्नान और त्रिदशेश्वर महादेवकी अर्चना की । उसके बाद प्लक्षावतरणमें जाकर उन्होंने श्रीनिवासकी अर्चना की । फिर कुण्डिनमें जाकर प्राणोंके तृप्तिदाता देवका अर्चन किया । उन्होंने शूर्पारकमें चतुर्भुज देवकी भलीभाँति पूजा करनेके बाद मागधारण्यमें जाकर वसुधाधिपका दर्शन किया । उन विश्वेशका पूजन कर वे प्रामुखमें गये । उसके बाद उन्होंने महातीर्थमें स्नानकर वासुदेवको प्रणाम किया । उन्होंने शोणतटपर जाकर स्वर्णकवच धारण करनेवाले ईश्वरका पूजन किया । उसके बाद श्रद्धालु ( प्रह्लाद ) - ने महाकोशी में हंस नामक महादेवका अर्चन किया एवं श्रेष्ठ सैन्धवारण्यमें जाकर शङ्ख तथा शूल धारण करनेवाले सुनेत्र नामक पूज्य ईश्वरका पूजन किया । उसके बाद वे महाबाहु त्रिविष्टप चले गये ॥ ५४–६१ ॥ वहाँ जटाधर नामसे प्रसिद्ध महेशान देवका दर्शन और विष्णुकी पूजा कर वे कनखलतीर्थमें गये ।

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४१० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८३ तत्रार्च्य भद्रकालीशं वीरभद्रं च दानवः । दानव प्रह्लाद वहाँ भद्रकालीश और वीरभद्र तथा धनाधिपं च मेघाङ्कं ययावथ गिरिव्रजम् ॥ ६३ | धनाधिप मेघाङ्ककी पूजा कर गिरिव्रज चले गये । वहाँ तत्र देवं पशुपतिं लोकनाथं महेश्वरम् । लोकनाथ महेश्वर पशुपति देवका विधिवत् अर्चन कर सम्पूजयित्वा विधिवत्कामरूपं जगाम ह ॥ ६४ शशिप्रभं देववरं त्रिनेत्रं सम्पूजयित्वा सह वै मृडान्या । जगाम तीर्थप्रवरं महाख्यं तस्मिन् महादेवमपूजयत् सः ॥ ततस्त्रिकूटं गिरिमत्रिपुत्रं जगाम द्रष्टुं स हि चक्रपाणिनम् । तमीड्य भक्त्या तु गजेन्द्रमोक्षणं जजाप जप्यं परमं पवित्रम् ॥ दैत्येश्वरसूनुरादरा-न्मासत्रयं मूलफलाम्बुभक्षी । निवेद्य विप्रप्रवरेषु काञ्चनं जगाम घोरं स हि दण्डकं वनम् ॥

तत्र दिव्यं महाशाखं वनस्पतिवपुर्धरम् ।

ददर्श पुण्डरीकाक्षं महाश्वापदवारणम् ॥

तस्याधस्थात् त्रिरात्रं स महाभागवतोऽसुरः स्थितः स्थण्डिलशायी तु पठन् सारस्वतं स्तवम्

तस्मात् तीर्थवरं विद्वान् सर्वपापप्रमोचनम् ।

जगाम दानवो द्रष्टुं सर्वपापहरं हरिम् ॥

तस्याग्रतो जजापासौ स्तवौ पापप्रणाशनौ यौ पुरा भगवान् प्राह क्रोडरूपी जनार्दनः तस्मादथागाद् दैत्येन्द्रः शालग्रामं महाफलम् यत्र संनिहितो विष्णुश्चरेषु स्थावरेषु च तत्र सर्वगतं विष्णुं मत्वा चक्रे रतिं बली पूजयन् भगवत्पादौ महाभागवतो मुने इयं तवक्ता मुनिसंघजुष्टा प्रह्लादतीर्थानुगतिः सुपुण्या यत्कीर्त्तनाच्छ्रवणात् स्पर्शनाच्च विमुक्तपापा मनुजा भवन्ति वे कामरूप चले गये । वहाँ चन्द्रकी कान्तिसे युक्त देवश्रेष्ठ त्रिनेत्र शंकरकी मृडानी ( पार्वती ) के साथ विधिवत् अर्चना कर प्रह्लाद श्रेष्ठ महाख्यतीर्थमें गये और वहाँपर ६५ ( भी ) उन्होंने महादेवकी अर्चना की॥६२–६५ ॥ उसके बाद वे अत्रिपुत्र चक्रपाणि विष्णुका दर्शन | करनेके लिये त्रिकूट पर्वतपर चले गये और श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा कर उन्होंने परम पवित्र जपनेयोग्य गजेन्द्र-६६ मोक्षणस्तवका पाठ किया । मूल, फल एवं जलका भक्षण करते हुए दैत्येश्वर - पुत्र प्रह्लादने वहाँ तीन मासतक श्रद्धापूर्वक निवास किया । उसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुवर्ण दान कर वे घोर दण्डकवन चले गये । ६७ वहाँ उन्होंने महान् हिंस्र पशुओंके निवारक, महान् शाखाओंसे युक्त वनस्पतिका शरीर धारण करनेवाले पुण्डरीकाक्षका ६८ दर्शन किया । सारस्वतस्तोत्रका पाठ करते हुए महान् । विष्णुभक्त असुर प्रह्लादने तीन रातोंतक उसके नीचे ॥ ६ ९ बिना विस्तरके चबूतरेपर शयन किया ॥ ६६ –६ ९ ॥ विद्वान् दानव ( प्रह्लादजी ) वहाँसे सर्वपापहारी ७० हरिका दर्शन करनेके लिये सर्वपापनाशक श्रेष्ठ तीर्थमें । चले गये । उन्होंने उनके सामने प्राचीन कालमें क्रोडरूपी ॥ ७१ जनार्दनसे कथित पापनाश करनेवाले दो स्तोत्रोंका पाठ किया । उसके बाद वे वहाँसे दैत्येन्द्र ( प्रह्लाद ) । महाफलदायक शालग्रामतीर्थमें गये । वहाँ विष्णु समस्त ॥ ७२ चर और स्थावर पदार्थोंमें विराजमान हैं । ( पुलस्त्यजी । कहते हैं - ) मुने! वहाँ महान् विष्णुभक्त बलवान् प्रह्लाद ॥ ७३ विष्णुको सर्वव्यापी जानकर भगवान्के चरणोंकी पूजा करते हुए उन ( - की भक्ति ) - में परायण हो गये । मैंने । तुमसे मुनियोंके समूहोंसे सेवित अत्यन्त पवित्र प्रह्लादकी तीर्थयात्राका वर्णन कर दिया, जिसके कीर्तन, श्रवण एवं ॥ ७४ । स्पर्शसे मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं॥७०–७४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८३ ॥