वामन पुराण — पृष्ठ 51–60
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति - कथा, प्रह्लाद -च्यवन उवाच
पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम् ।
चक्रतीर्थं महाबाहो रसातलतले विदुः ॥ ३७
पुलस्त्य उवाच
श्रुत्वा तद्भार्गववचो दैत्यराजो महामुने ।
नैमिषं गन्तुकामस्तु दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३८
प्रह्लाद उवाच
उत्तिष्ठध्वं गमिष्यामः स्नातुं तीर्थं हि नैमिषम् ।
द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् ॥ ३ ९
पुलस्त्य उवाच
इत्युक्ता दानवेन्द्रेण सर्वे ते दैत्यदानवाः ।
चक्रुरुद्योगमतुलं निर्जग्मुश्च रसातलात् ॥ ४०
ते समभ्येत्य दैतेया दानवाश्च महाबलाः ।
नैमिषारण्यमागत्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥ ४१
ततो दितीश्वरः श्रीमान् मृगव्यां स चचार ह ।
चरन् सरस्वतीं पुण्यां ददर्श विमलोदकाम् ॥ ४२
तस्यादूरे महाशाखं शालवृक्षं शरैश्चितम् ।
ददर्श बाणानपरान् मुखे लग्नान् परस्परम् ॥ ४३
ततस्तानद्भुताकारान् बाणान् नागोपवीतकान् ।
दृष्ट्वाऽतुलं तदा चक्रे क्रोधं दैत्येश्वरः किल ॥ ४४
स ददर्श ततो दूरात्कृष्णाजिनधरौ मुनी ।
समुन्नतजटाभारौ तपस्यासक्तमानसौ ॥ ४५
तयोश्च पार्श्वयोर्दिव्ये धनुषी लक्षणान्विते ।
शार्ङ्गमाजगवं चैव अक्षय्यौ च महेषुधी ॥ ४६
तौ दृष्ट्वाऽमन्यत तदा दाम्भिकाविति दानवः ।
ततः प्रोवाच वचनं तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ४७
किं भवद्भ्यां समारब्धं दम्भं धर्मविनाशनम् ।
क्व तपः क्व जटाभारः क्व चेमौ प्रवरायुधौ ॥ ४८
अथोवाच नरो दैत्यं का ते चिन्ता दितीश्वर ।
सामर्थ्ये सति यः कुर्यात् तत्संपद्येत तस्य हि ॥ ४ ९
प्रसंग - नर - नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ४१ ( प्रह्लादके वचनको सुनकर ) च्यवनजीने कहा-महाबाहो! पृथ्वीमें नैमिषारण्यतीर्थ, अन्तरिक्षमें पुष्कर, । और पातालमें चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हैं ॥३७ ॥
पुलस्त्यजीने कहा- महामुने! भार्गवकी इसी बातको सुनकर दैत्यराज प्रह्लादने नैमिषतीर्थमें जानेके लिये इच्छा प्रकट की और दानवोंसे यह बात कही ॥ ३८ ॥
प्रह्लाद बोले- उठो, हम सभी नैमिष-तीर्थमें स्नान करने जायँगे तथा वहाँ पीताम्बरधारी एवं कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत ( विष्णु ) - के दर्शन करेंगे ॥ ३ ९ ॥ पुलस्त्यजीने कहा — दैत्यराज प्रह्लादके ऐसा कहनेपर वे सभी दैत्य और दानव रसातलसे बाहर निकले एवं अतुलनीय उद्योगमें लग गये । उन महाबलवान् दितिपुत्रों एवं दानवोंने नैमिषारण्यमें आकर आनन्दपूर्वक स्नान किया । इसके बाद श्रीमान् दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद मृगया । ( आखेट या शिकार ) के लिये वनमें घूमने लगे । वहाँ घूमते हुए उन्होंने पवित्र एवं निर्मल जलवाली सरस्वती नदीको देखा । वहीं समीप ही बाणोंसे खचाखच बिंधे बड़ी - बड़ी शाखाओंवाले एक शाल वृक्षको देखा । वे सभी बाण एक - दूसरेके मुखसे लगे हुए थे ॥ ४० – ४३ ॥ तब उन अद्भुत आकारवाले नागोपवीत ( साँपोंसे । लिपटे ) बाणोंको देखकर दैत्येश्वरको बड़ा क्रोध हुआ । फिर उन्होंने दूरसे ही काले मृगचर्मको धारण किये हुए बड़ी - बड़ी जटाओंवाले तथा तपस्यामें लगे दो मुनियोंको देखा । उन दोनोंके बगलमें सुलक्षण शार्ङ्ग और आजगव नामक दो दिव्य धनुष एवं दो अक्षय तथा बड़े - बड़े तरकस वर्तमान थे । उन दोनोंको इस प्रकार देखकर दानवराज प्रह्लादने उन्हें दम्भसे युक्त समझा । फिर उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंसे कहा - ॥ ४४–४७ ॥ आप दोनों यह धर्मविनाशक दम्भपूर्ण कार्य क्यों कर रहे हैं? कहाँ तो आपकी यह तपस्या और जटाभार, कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ अस्त्र? इसपर नरने उनसे कहा-दैत्येश्वर! तुम उसकी चिन्ता क्यों कर रहे हो? सामर्थ्य | रहनेपर कोई भी व्यक्ति जो कर्म करता है, उसे वही
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२
अथोवाच दितीशस्तौ का शक्तिर्युवयोरिह ।
मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके ॥
नरस्तं प्रत्युवाचाथ आवाभ्यां शक्तिरूर्जिता ।
न कश्चिच्छक्नुयाद् योद्धुं नरनारायणौ युधि ॥
दैत्येश्वरस्ततः क्रुद्धः प्रतिज्ञामारुरोह च ।
यथा कथंचिज्जेष्यामि नरनारायणौ रणे ॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा वितत्य मुमोच छिन्नान् क्रुद्धः एकं नरस्तु दितीश्वरः स्थाप्य बलं वनान्ते । चापं गुणमाविकृष्य तलध्वनिं घोरतरं चकार ॥
नरस्त्वाजगवं चाप-मानम्य बाणान् सुबहूशिताग्रान् ।
तानप्रतिमैः पृषत्कै-श्चिच्छेद दैत्यस्तपनीयपुङ्खैः ॥
समीक्ष्याथ नरः पृषत्कान् दैत्येश्वरेणाप्रतिमेन संख्ये । समानम्य महाधनुस्ततो मुमोच चान्यान् विविधान् पृषत्कान् ॥ नरो द्वौ दितिजेश्वरश्च त्रीन् धर्मसूनुश्चतुरो दितीशः । बाणान् प्रमुमोच पञ्च षड् दैत्यनाथो निशितान् पृषत्कान् ॥ मुख् द्विचतुश्च दैत्यो नरस्तु षट् त्रीणि च दैत्यमुख्ये । षट्त्रीणि चैकं च दितीश्वरेण मुक्तानि बाणानि नराय विप्र ॥ एकं च षट् पञ्च नरेण मुक्ता-स्त्वष्टौ शराः सप्त च दानवेन । षट् सप्त चाष्टौ नव षण्नरेण द्विसप्ततिं दैत्यपतिः ससर्ज ॥ शतं नरस्त्रीणि शतानि दैत्यः षड् धर्मपुत्रो दश दैत्यराजः । ततोऽप्यसंख्येयतरान् हि बाणान् मुमोचतुस्तौ सुभृशं हि कोपात् ॥
नरो बाणगणैरसंख्यै-वास्तरद्भूमिमथो दिशः खम् ।
स चापि दैत्यप्रवरः पृषत्कै -श्चिच्छेद वेगात् तपनीयपुङ्खैः ॥
श्री वामनपुराण अध्याय ७ शोभा देता है । तब दितीश्वर प्रह्लादने उन दोनोंसे कहा-५० धर्मसेतुके स्थापित करनेवाले मुझ दैत्येन्द्रके रहते यहाँ आपलोग ( सामर्थ्य - बलसे ) क्या कर सकते हैं? इसपर | नरने उन्हें उत्तर दिया – हमने पर्याप्त शक्ति प्राप्त कर ली है । हम नर और नारायण – दोनोंसे कोई भी युद्ध नहीं ५१ कर सकता ॥ ४८–५१ ॥ इसपर दैत्येश्वरने क्रुद्ध होकर प्रतिज्ञा कर दी कि ५२ मैं युद्धमें जिस किसी भी प्रकार आप नर और नारायण दोनोंको जीतूंगा । ऐसी प्रतिज्ञाकर दैत्येश्वर प्रह्लादने वनकी सीमापर अपनी सेना खड़ी कर दी और ५३ धनुषको फैलाकर उसपर डोरी चढ़ायी तथा घोरतर करतल ध्वनि की - ताल ठोंकी । इसपर नरने भी आजगव धनुषको चढ़ाकर बहुत - से तेज बाण छोड़े । परंतु प्रह्लादने अनेक स्वर्ण - पुंखवाले अप्रतिम बाणोंसे ५४ उन बाणोंको काट डाला । फिर नरने युद्धमें अप्रतिम दैत्येश्वरके द्वारा बाणोंको नष्ट हुआ देख क्रुद्ध होकर अपने महान् धनुषको चढ़ाकर पुनः अन्य अनेक तीक्ष्ण ५५ बाण छोड़े ॥ ५२-५५ ॥ नरके एक बाण छोड़नेपर प्रह्लादने दो बाण छोड़े; नरके तीन बाण छोड़नेपर प्रह्लादने चार बाण छोड़े । ५६ | इसके बाद पुन: नरने पाँच बाण और फिर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादने छ: तेज बाण छोड़े । विप्र! नरके सात बाण छोड़नेपर दैत्यने आठ बाण छोड़े । नरके नव बाण ५७ छोड़नेपर प्रह्लादने उनपर दस बाण छोड़े । नरके बारह बाण छोड़नेपर दानवने पंद्रह बाण छोड़े । नरके छत्तीस बाण छोड़नेपर दैत्यपतिने बहत्तर बाण चलाये । नरके ५८ । सौ बाणोंपर दैत्यने तीन सौ बाण चलाये । धर्मपुत्रके छः सौ बाणोंपर दैत्यराजने एक हजार बाण छोड़े । फिर तो उन दोनोंने अत्यन्त क्रोधसे ( एक - दूसरेपर ) असंख्य ५ ९ बाण छोड़े॥५६–५९ ॥ उसके बाद नरने असंख्य बाणोंसे पृथ्वी, आकाश और दिशाओंको ढक दिया । फिर दैत्यप्रवर प्रह्लादने ६० | स्वर्णपुंखवाले बाणोंको बड़े वेगसे छोड़कर उनके
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ८ ] प्रह्लाद और नारायणका
ततः पतत्त्रिभिर्वीरौ सुभृशं नरदानवौ ।
युद्धे वरास्त्रैर्युध्येतां घोररूपैः परस्परम् ॥ ६१
ततस्तु दैत्येन वरास्त्रपाणिना चापे नियुक्तं तु पितामहास्त्रम् । महेश्वरास्त्रं पुरुषोत्तमेन समं समाहत्य निपेतुस्तौ ॥ ६२
ब्रह्मास्त्रे तु प्रशमिते प्रह्लादः क्रोधमूर्च्छितः ।
गदां प्रगृह्य तरसा प्रचस्कन्द रथोत्तमात् ॥ ६३
गदापाणिं समायान्तं दैत्यं नारायणस्तदा ।
दृष्ट्वाऽथ पृष्ठतश्चक्रे नरं योद्धुमनाः स्वयम् ॥ ६४
ततो दितीशः सगदः समाद्रवत् सशार्ङ्गपाणिं तपसां निधानम् । ख्यातं पुराणर्षिमुदारविक्रमं नारायणं नारद लोकपालम् ॥ ६५ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४३ को काट दिया । तब नर और दानव दोनों वीर बाणों तथा भयंकर श्रेष्ठ अस्त्रोंसे परस्पर युद्ध करने लगे । इसके बाद दैत्यने हाथमें ब्रह्मास्त्र लेकर उस धनुषपर नियोजित कर चला दिया एवं उन पुरुषोत्तमने भी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग कर दिया । वे दोनों अस्त्र परस्पर एक - दूसरे से टक्कर खाकर गिर गये । ब्रह्मास्त्रके व्यर्थ होनेपर क्रोधसे मूच्छित हुए प्रह्लाद वेगसे गदा लेकर उत्तम रथसे कूद पड़े ॥ ६०-६३ ॥ ऋषि नारायणने उस समय दैत्यको हाथमें गदा लिये अपनी ओर आते देखकर स्वयं युद्ध करनेकी इच्छासे नरको पीछे हटा दिया । नारदजी! तब प्रह्लादजी गदा लेकर तपोनिधान, शार्ङ्गधनुषको धारण करनेवाले, प्रसिद्ध पुरातन ऋषि, महापराक्रमशाली, लोकपति नारायणकी ओर दौड़ पड़े ॥ ६४-६५ ॥ सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥७ ॥
आठवाँ अध्याय प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय पुलस्त्य उवाच
शार्ङ्गपाणिनमायान्तं दृष्ट्वाऽग्रे दानवेश्वरः ।
परिभ्राम्य गदां वेगान्मूर्ध्नि साध्यमताडयत् ॥
ताडितस्याथ गदया धर्मपुत्रस्य नारद ।
नेत्राभ्यामपतद् वारि वह्निवर्षनिभं भुवि ॥
मूर्ध्नि नारायणस्यापि सा गदा दानवार्पिता ।
जगाम शतधा ब्रह्मञ्शैलशृङ्गे यथाऽशनिः ॥
ततो निवृत्य दैत्येन्द्रः समास्थाय रथं द्रुतम् ।
आदाय कार्मुकं वीरस्तूणाद् बाणं समाददे ॥
आनम्य चापं वेगेन गार्द्धपत्राशिलीमुखान् ।
मुमोच साध्याय तदा क्रोधान्धकारिताननः ॥
तानापतत एवाशु बाणांश्चन्द्रार्द्धसन्निभान् ।
चिच्छेद बाणैरपरैर्निर्बिभेद च दानवम् ॥
पुलस्त्यजी बोले- प्रह्लादने जब हाथमें शार्ङ्गधनुष लिये भगवान् नारायणको सामनेसे आते देखा तो अपनी १ गदा घुमाकर वेगसे उनके सिरपर प्रहार कर दिया । नारदजी! गदासे प्रताडित होनेपर नारायणके नेत्रोंसे आग २ स्फुलिंगके समान आँसू पृथ्वीपर गिरने लगे । ब्रह्मन्! पर्वतकी चोटीपर गिरकर जैसे वज्र टूट जाता है, उसी प्रकार दानवद्वारा नारायणके सिरपर चलायी गयी वह ३ गदा भी सैकड़ों टुकड़े हो गयी । उसके बाद शीघ्रतापूर्वक लौटकर वीर दैत्येन्द्रने रथपर आरूढ़ हो धनुष लेकर ४ । अपनी तरकससे बाण निकाल लिया ॥ १–४ ॥ फिर क्रोधान्ध प्रह्लादने शीघ्रतासे धनुषको चढ़ाकर ५ गृध्रके पंखवाले अनेक बाणोंको नारायणकी ओर चलाया । नारायणने भी बड़ी शीघ्रतासे अपनी ओर आ रहे उन अर्धचन्द्र - तुल्य बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला ६ । और कुछ दूसरे बाणोंसे प्रह्लादको विद्ध कर दिया ।
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४४
ततो नारायणं दैत्यो दैत्यं नारायणः शरैः ।
आविध्येतां तदाऽन्योन्यं मर्मभिद्भिरजिह्मगैः ॥
ततोऽम्बरे संनिपातो देवानामभवन्मुने ।
दिदृक्षूणां तदा युद्धं लघु चित्रं च सुष्ठु च ॥
ततः सुराणां दुन्दुभ्यस्त्ववाद्यन्त महास्वनाः ।
पुष्पवर्षमनौपम्यं मुमुचुः साध्यदैत्ययोः ॥
ततः पश्यत्सु देवेषु गगनस्थेषु तावुभौ ।
अयुध्येतां महेष्वासौ प्रेक्षकप्रीतिवर्द्धनम् ॥
बबन्धतुस्तदाकाशं तावुभौ शरवृष्टिभिः ।
दिशश्च विदिशश्चैव छादयेतां शरोत्करैः ॥
ततो नारायणश्चापं समाकृष्य महामुने ।
बिभेद मार्गणैस्तीक्ष्णैः प्रह्लादं सर्वमर्मसु ॥
तथा दैत्येश्वरः क्रुद्धश्चापमानम्य वेगवान् ।
बिभेद हृदये बाह्वोर्वदने च नरोत्तमम् ॥
ततोऽस्यतो दैत्यपतेः कार्मुकं मुष्टिबन्धनात् ।
चिच्छेदैकेन बाणेन चन्द्रार्धाकारवर्चसा ॥
अपास्यत धनुश्छिन्नं चापमादाय चापरम् ।
अधिज्यं लाघवात् कृत्वा ववर्ष निशिताञ्शरान् ॥
तानप्यस्य शरान् साध्यश्छित्त्वा बाणैरवारयत् ।
कार्मुकं च क्षुरप्रेण चिच्छेद पुरुषोत्तमः ॥
छिन्नं छिन्नं धनुर्दैत्यस्त्वन्यदन्यत्समाददे ।
समादत्ते तदा साध्यो मुने चिच्छेद लाघवात् ॥
संछिन्नेष्वथ चापेषु जग्राह दितिजेश्वरः ।
परिघं दारुणं दीर्घं सर्वलोहमयं दृढम् ॥
परिगृह्याथ परिघं भ्रामयामास दानवः ।
भ्राम्यमाणं स चिच्छेद नाराचेन महामुनिः ॥
छिन्ने तु परिघे श्रीमान् प्रह्लादो दानवेश्वरः ।
मुद्गरं भ्राम्य वेगेन प्रचिक्षेप नराग्रजे ॥
तमापतन्तं बलवान् मार्गणैर्दशभिर्मुने । चिच्छेद दशधा साध्यः स छिन्नो न्यपतद् भुवि श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८ तब दैत्यने नारायणको और नारायणने दैत्यको - एक-७ दूसरेको - मर्मभेदी एवं सीधे चलनेवाले बाणोंसे वेध दिया । मुने! उस समय शीघ्रतापूर्वक हो रहे इस कौशलयुक्त विचित्र एवं सुन्दर युद्धको देखनेकी इच्छावाले ८ देवताओंका समूह आकाशमें एकत्र हो गया॥५-८ ॥ उसके बाद बड़े जोरसे बजनेवाले नगाड़ोंको बजाकर ९ देवताओंने भगवान् नारायणके और दैत्यके ऊपर अनुपमरूपमें पुष्पोंकी वर्षा की । फिर उन दोनों धनुर्धारियोंने आकाशमें १० स्थित देवताओंके सामने दर्शकोंको आनन्द देनेवाला ( दिलचस्प ) अनूठा युद्ध किया । उस समय उन दोनोंने बाणोंकी वृष्टिसे आकाशको मानो वाँध दिया और बाणवृष्टि ११ दिशाओं एवं विदिशाओंको ढक दिया । महामुनि नारदजी! तब नारायणने धनुषको खींचकर तेज बाणोंसे प्रह्लादके १२ सभी मर्मस्थलोंमें प्रहार किया और फुर्तीवाले दैत्येश्वरने क्रोधपूर्वक धनुषको चढ़ाकर नरोत्तमके हृदय, दोनों भुजाओं १३ और मुँहको भी ( बाणोंसे ) बेध दिया ॥ ९ –१३ ॥ उसके बाद नारायणने बाण चला रहे प्रह्लाद १४ धनुषके मुष्टिबन्धको अर्धचन्द्रके आकारवाले एक तेजस्वी बाणसे काट दिया । प्रह्लादने भी कटे धनुषको झट फेंककर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और शीघ्र ही १५ उसकी प्रत्यञ्चा ( डोरी ) चढ़ाकर तेज बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी । पर उसके उन शरोंको भी नारायणने बाणोंसे काटकर निवारित कर दिया और उन पुरुषोत्तमने १६ तीक्ष्ण बाणसे उसके धनुषको भी काट डाला । नारदजी! एक धनुषके छिन्न होनेपर दैत्यराजने बारम्बार दूसरा धनुष ग्रहण किया, किंतु नारायणने लिये हुए उन - उन १७ धनुषोंको भी तुरंत काटकर गिरा दिया ॥ १४–१७ ॥ फिर धनुषोंके कट जानेपर दैत्यपति प्रह्लादने एक १८ भयंकर, मजबूत और लौह ( फौलाद ) - से बने ' परिघ ’ नामक अस्त्रको उठा लिया । उसे लेकर वे दानव ( प्रह्लाद ) चारों ओर घुमाने लगे । उस घुमाये जाते हुए १ ९ परिघको भी महामुनि नारायणने बाणसे काट दिया । उसके कट जानेपर श्रीमान् दनुजेश्वर प्रह्लादने पुनः एक २० मुद्गरको वेगसे घुमाकर उसे नारायणके ऊपर फेंका । नारदजी! उस आते हुए मुद्गरको भी बलवान् नारायणने दस बाणोंसे दस भागोंमें काट दिया; वह नष्ट होकर ॥ २१ । पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १८–२१ ॥
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ८ ] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४५
मुद्गरे वितथे जाते प्रासमाविध्य वेगवान् ।
प्रचिक्षेप नराग्र्याय तं च चिच्छेद धर्मजः ॥
प्रासे छिन्ने ततो दैत्यः शक्तिमादाय चिक्षिपे ।
तां च चिच्छेद बलवान् क्षुरप्रेण महातपाः ॥
छिन्नेषु तेषु शस्त्रेषु दानवोऽन्यन्महद्धनुः ।
समादाय ततो बाणैरवतस्तार नारद ॥
ततो नारायणो देवो दैत्यनाथं जगद्गुरुः । नाराचेन जघानाथ हृदये सुरतापसः ।
संभिन्नहृदयो ब्रह्मन् देवेनाद्भुतकर्मणा ।
निपपात रथोपस्थे तमपोवाह सारथिः ॥
स संज्ञां सुचिरेणैव प्रतिलभ्य दितीश्वरः ।
सुदृढं चापमादाय भूयो योद्धुमुपागतः ॥
तमागतं संनिरीक्ष्य प्रत्युवाच नराग्रजः ।
गच्छ दैत्येन्द्र योत्स्यामः प्रातस्त्वाह्निकमाचर ॥
एवमुक्तो दितीशस्तु साध्येनाद्भुतकर्मणा ।
जगाम नैमिषारण्यं क्रियां चक्रे तदाह्निकीम् ॥
एवं युध्यति देवे च प्रह्लादो ह्यसुरो मुने ।
रात्रौ चिन्तयते युद्धे कथं जेष्यामि दाम्भिकम् ॥
एवं नारायणेनाऽसौ सहायुध्यत नारद ।
दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु दैत्यो देवं न चाजयत् ॥
ततो वर्षसहस्त्रान्ते ह्यजिते पुरुषोत्तमे ।
पीतवाससमभ्येत्य दानवो वाक्यमब्रवीत् ॥
किमर्थं देवदेवेश साध्यं नारायणं हरिम् ।
विजेतुं नाऽद्य शक्नोमि एतन्मे कारणं वद ॥
पीतवासा उवाच
दुर्जयोऽसौ महाबाहुस्त्वया प्रह्लाद धर्मजः ।
साध्यो विप्रवरो धीमान् मृधे देवासुरैरपि ॥
प्रह्लादने मुद्गरके विफल हो जानेपर ' प्राश ' नामक २२ अस्त्र लेकर बड़े जोरसे नरके बड़े भाई नारायणके ऊपर चला दिया; पर उन्होंने उसे भी काट डाला । प्राशके नष्ट हो जानेपर दैत्यने तेज ' शक्ति ' फेंकी, पर बलवान् २३ महातपा नारायणने उसे भी अपने क्षुरप्रके द्वारा काट डाला । नारदजी! उन सभी अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर २४ प्रह्लाद दूसरे विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे । तब परम तपस्वी जगद्गुरु नारायणदेवने प्रह्लादके २५ हृदयमें नाराचसे प्रहार किया । २२ - २५ ॥ नारदजी! अद्भुत पराक्रमी नारायणके प्रहारसे २६ प्रह्लादका हृदय बिंध गया, फलतः वे बेहोश होकर रथके पिछले भागमें गिर पड़े । यह देखकर सारथी उन्हें वहाँसे हटाकर दूर ले गया । बहुत देरके बाद जब उन्हें २७ चेतना प्राप्त हुई - होश आया, तब वे पुनः सुदृढ़ धनुष लेकर नर - नारायणसे युद्ध करनेके लिये संग्रामभूमिमें आ गये । उन्हें आया देख नारायणने कहा – दैत्येन्द्र! अब २८ हम कल प्रातः युद्ध करेंगे; तुम भी जाओ, इस समय अपना नित्य कर्म करो । अद्भुत पराक्रमी श्रीनारायणके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद नैमिषारण्य चले गये और वहाँ २ ९ अपने नित्य कर्म सम्पन्न किये ॥ २६-२९ ॥ नारदजी! इस प्रकार भगवान् नारायण एवं ३० दानवेन्द्र प्रह्लाद - दोनोंमें युद्ध चलता रहा । रात्रिमें प्रह्लाद यह विचार किया करते थे कि मैं युद्धमें इन दम्भ करनेवाले ऋषिको कैसे जीतूंगा? नारदजी! इस प्रकार प्रह्लादने भगवान् नारायणके साथ एक हजार ३१ दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया, परंतु वे उन्हें ( नारायणको ) जीत न पाये । फिर हजार दिव्य वर्षोंके बीत जानेपर भी पुरुषोत्तम नारायणको न जीत सकनेपर ३२ प्रह्लादने वैकुण्ठमें जाकर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णुसे कहा - देवेश! मैं ( सरलतासे ) साध्य नारायणको आजतक क्यों न जीत पाया, आप मुझे इसका ३३ | कारण बतलायें ॥ ३०–३३ ॥ इसपर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णु बोले-प्रह्लाद! महाबाहु धर्मपुत्र नारायण तुम्हारे द्वारा दुर्जेय हैं । वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ ऋषि परम ज्ञानी हैं । वे सभी देवताओं ३४ । एवं असुरोंसे भी युद्धमें नहीं जीते जा सकते ॥ ३४ ॥
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८ प्रह्लाद उवाच
यद्यसौ दुर्जयो देव मया साध्यो रणाजिरे ।
तत्कथं यत्प्रतिज्ञातं तदसत्यं भविष्यति ॥
हीनप्रतिज्ञो देवेश कथं जीवेत मादृशः ।
तस्मात्तवाग्रतो विष्णो करिष्ये कायशोधनम् ॥
पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्त्वा वचनं देवाग्रे दानवेश्वरः ।
शिरः स्नातस्तदा तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥
ततो दैत्यपतिं विष्णुः पीतवासाऽब्रवीद्वचः ।
गच्छ जेष्यसि भक्त्या तं न युद्धेन कथंचन ॥
प्रह्लाद उवाच
मया जितं देवदेव त्रैलोक्यमपि सुव्रत ।
जितोऽयं त्वत्प्रसादेन शक्रः किमुत धर्मजः ॥
असौ यद्यजयो देव त्रैलोक्येनापि सुव्रतः ।
न स्थातुं त्वत्प्रसादेन शक्यं किमु करोम्यज ॥
पीतवासा उवाच
सोऽहं दानवशार्दूल लोकानां हितकाम्यया ।
धर्मं प्रवर्त्तापयितुं तपश्चर्यां समास्थितः ॥
तस्माद्यदिच्छसि जयं तमाराधय दानव ।
तं पराजेष्यसे भक्त्या तस्माच्छुश्रूष धर्मजम् ॥
पुलस्त्य उवाच
इत्युक्तः पीतवासेन दानवेन्द्रो महात्मना ।
अब्रवीद्वचनं हृष्टः समाहूयाऽन्धकं मुने ॥
प्रह्लाद उवाच
दैत्याश्च दानवाश्चैव परिपाल्यास्त्वयान्धक ।
मयोत्सृष्टमिदं राज्यं प्रतीच्छस्व महाभुज ॥
इत्येवमुक्तो जग्राह राज्यं हैरण्यलोचनिः ।
प्रह्लादोऽपि तदाऽगच्छत् पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥
दृष्ट्वा नारायणं देवं नरं च दितिजेश्वरः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणौ तयोः ॥
तमुवाच महातेजा वाक्यं नारायणोऽव्ययः । किमर्थं प्रणतोऽसीह मामजित्वा महासुर प्रह्लादने कहा- देव! यदि वे साध्यदेव ( नारायण ) युद्धभूमिमें मुझसे जीते नहीं जा सकते हैं तो मैंने जो ३५ प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा? वह तो मिथ्या हो जायगी । देवेश! मुझ जैसा व्यक्ति हीनप्रतिज्ञ होकर कैसे जीवित रह सकेगा? इसलिये हे विष्णु! अब मैं आपके ३६ । सामने अपने शरीरकी शुद्धि करूँगा ॥ ३५-३६ ॥ पुलस्त्यजी बोले- भगवान्से ऐसा कहकर दानवेश्वर प्रह्लाद सिरसे पैरतक स्नानकर वहाँ बैठ गये और ३७ ' ब्रह्मगायत्री ' का जप करने लगे । उसके बाद पीताम्बरधारी विष्णुने प्रह्लादसे कहा - हाँ, तुम जाओ, तुम उन्हें भक्तिसे ३८ जीत सकोगे, युद्धसे कथमपि नहीं ॥ ३७-३८ ॥ प्रह्लादजी बोले – देवाधिदेव! सुव्रत! आपकी कृपासे मैंने तीनों लोकों तथा इन्द्रको भी जीत लिया ३ ९ है; इन धर्मपुत्रकी बात ही क्या है? हे अज! यदि ये सद्व्रती त्रिलोकीसे भी अजेय हैं तथा आपके प्रसादसे भी मैं उनके सामने नहीं ठहर सकता तो फिर मैं ४० क्या करूँ? ॥ ३ ९ -४० ॥ ( इसपर ) भगवान् विष्णु बोले- दानवश्रेष्ठ! वस्तुतः नारायणरूपमें वहाँ मैं ही हूँ । मैं ही जगत्की ४१ भलाईकी इच्छासे धर्मप्रवर्तनके लिये उस रूपमें तप कर रहा हूँ । इसलिये प्रह्लाद! यदि तुम विजय चाहते हो तो मेरे उस रूपकी आराधना करो । तुम नारायणको भक्तिद्वारा ही पराजित कर सकोगे । इसलिये धर्मपुत्र नारायणकी ४२ आराधना करो - इसी अर्थमें वे सुसाध्य हैं ॥ ४१-४२ ॥ पुलस्त्यजी बोले- मुने! भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद प्रसन्न हो गये । उन्होंने फिर अन्धकको ४३ बुलाकर इस प्रकार कहा ॥ ४३ ॥
प्रह्लादजी बोले – अन्धक! तुम दैत्यों और दानवोंका प्रतिपालन करो । महाबाहो! मैं यह राज्य छोड़ रहा हूँ । ४४ । इसे तुम ग्रहण करो । इस प्रकार कहनेपर जब हिरण्याक्षके पुत्रने राज्यको स्वीकार कर लिया, तब ४५ प्रह्लाद पवित्र बदरिकाश्रम चले गये । वहाँ उन्होंने भगवान् नारायण तथा नरको देखकर हाथ जोड़कर ४६ उनके चरणोंमें प्रणाम किया । महातेजस्वी भगवान् नारायणने उनसे कहा - महासुर! मुझे बिना जीते ही । ४७ अब तुम क्यों प्रणाम कर रहे हो? ॥ ४४ -४७ ॥
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ८ ] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४७ प्रह्लाद उवाच
कस्त्वां जेतुं प्रभो शक्तः कस्त्वत्तः पुरुषोऽधिकः ।
त्वं हि नारायणोऽनन्तः पीतवासा जनार्दनः ॥
त्वं देवः पुण्डरीकाक्षस्त्वं विष्णुः शार्ङ्गचापधृक् ।
त्वमव्ययो महेशानः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥
त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति चार्चयन्ति मनीषिणः । जपन्ति स्नातकास्त्वां च यजन्ति त्वां च याज्ञिकाः
त्वम हृषीकेशश्चक्रपाणिर्धराधरः ।
महामीनो हयशिरास्त्वमेव वरकच्छपः ॥
हिरण्याक्षरिपुः श्रीमान् भगवानथ सूकरः ।
मत्पितुर्नाशनकरो भवानपि नृकेसरी ॥
ब्रह्मा त्रिनेत्रोऽमरराड् हुताशः प्रेताधिपो नीरपतिः समीरः । सूर्यो मृगाङ्कोऽचलजङ्गमाद्यो भवान् विभो नाथ खगेन्द्रकेतो ॥
त्वं पृथ्वी ज्योतिराकाशं जलं भूत्वा सहस्रशः ।
त्वया व्याप्तं जगत्सर्वं कस्त्वां जेष्यति माधव ॥
भक्त्या यदि हृषीकेश तोषमेषि जगद्गुरो ।
नान्यथा त्वं प्रशक्योऽसि जेतुं सर्वगताव्यय ॥
भगवानुवाच
परितुष्टोऽस्मि ते दैत्य स्तवेनानेन सुव्रत ।
भक्त्या त्वनन्यया चाहं त्वया दैत्य पराजितः ॥
पराजितश्च पुरुषो दैत्य दण्डं प्रयच्छति ।
दण्डार्थं ते प्रदास्यामि वरं वृणु यमिच्छसि ॥
प्रह्लाद उवाच
नारायणं वरं याचे यं त्वं मे दातुमर्हसि ।
तन्मे पापं लयं यातु शारीरं मानसं तथा ॥
वाचिकं च जगन्नाथ यत्त्वया सह युध्यतः ।
नरेण यद्यप्यभवद् वरमेतत्प्रयच्छ मे ॥
नारायण उवाच
एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम् ।
द्वितीयं प्रार्थय वरं तं ददामि तवासुर ॥
प्रह्लाद उवाच
या या जायेत मे बुद्धिः सा सा विष्णो त्वदाश्रिता ।
देवार्चने च निरता त्वच्चित्ता त्वत्परायणा ॥
प्रह्लाद बोले- प्रभो! आपको भला कौन जीत सकता है? आपसे बढ़कर कौन हो सकता है? आप ४८ ही अनन्त नारायण पीताम्बरधारी जनार्दन हैं । आप ही कमलनयन शार्ङ्गधनुषधारी विष्णु हैं । आप अव्यय, महेश्वर तथा शाश्वत परम पुरुषोत्तम हैं । योगिजन आपका ४ ९ ही ध्यान करते हैं । विद्वान् पुरुष आपकी ही पूजा करते हैं । वेदज्ञ आपके नामका जप करते हैं तथा याज्ञिकजन ॥ ५० आपका यजन करते हैं । आप ही अच्युत, हृषीकेश, चक्रपाणि, धराधर, महामत्स्य, हयग्रीव तथा श्रेष्ठ कच्छप ५१ | ( कूर्म अवतारी हैं ॥ ४८–५१ ॥ आप हिरण्याक्ष दैत्यका वध करनेवाले ऐश्वर्य-५२ युक्त और भगवान् आदि वाराह हैं । आप ही मेरे पिताको मारनेवाले भगवान् नृसिंह हैं । आप ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण और वायु हैं । हे स्वामिन्! हे खगेन्द्रकेतु ( गरुड़ध्वज! ) आप सूर्य, चन्द्र तथा स्थावर और जंगमके आदि हैं । पृथ्वी, अग्नि, आकाश और ५३ जल आप ही हैं । सहस्रों रूपोंसे आपने समस्त जगत्को व्याप्त किया है । माधव! आपको कौन जीत सकेगा? ५४ जगद्गुरो! हृषीकेश! आप भक्तिसे ही संतुष्ट हो सकते हैं । हे सर्वगत! हे अविनाशिन्! आप दूसरे किसी भी ५५ अन्य प्रकारसे नहीं जीते जा सकते ॥ ५२–५५ ॥ श्रीभगवान् बोले- सुव्रत! दैत्य! तुम्हारी इस स्तुति से मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ । दैत्य! अनन्य भक्तिसे तुमने ५६ मुझे जीत लिया है । प्रह्लाद! पराजित पुरुष विजेताको दण्ड ( - के रूपमें कुछ ) देता है । परंतु मैं तुम्हारे दण्डके ५७ बदले तुम्हें वर दूँगा; तुम इच्छित वर माँगो ॥ ५६-५७ ॥ प्रह्लादजी बोले – हे नारायण! मैं आपसे वर माँग रहा हूँ; आप उसे देनेकी कृपा करें । हे जगन्नाथ! ५८ आपके तथा नरके साथ युद्ध करनेमें मेरे शरीर, मन और वाणीसे जो भी पाप ( अपकर्म ) हुआ हो वह सब
५ ९ नष्ट हो जाय । आप मुझे यही वर दें ॥ ५८-५९ ॥
नारायणने कहा- दैत्येन्द्र! ऐसा ही होगा । तुम्हारा पाप नष्ट हो जाय । अब प्रह्लाद! तुम दूसरा एक ६० वर और माँग लो, मैं उसे भी तुम्हें दूँगा ॥ ६० ॥
प्रह्लादजी बोले - हे भगवन्! मेरी जो भी बुद्धि हो, वह आपसे ही सम्बद्ध हो, वह देवपूजामें लगी रहे । मेरी बुद्धि, आपका ही ध्यान करे और आपके चिन्तनमें ६१ लगी रहे ॥ ६१ ॥
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४८ नारायण उवाच
एवं भविष्यत्यसुर वरमन्यं यमिच्छसि ।
तं वृणीष्व महाबाहो प्रदास्याम्यविचारयन् ॥
प्रह्लाद उवाच
सर्वमेव मया लब्धं त्वत्प्रसादादधोक्षज ।
त्वत्पादपङ्कजाभ्यां हि ख्यातिरस्तु सदा मम ॥
नारायण उवाच
एवमस्त्वपरं चास्तु नित्यमेवाक्षयोऽव्ययः ।
अजरश्चामरश्चापि मत्प्रसादाद् भविष्यसि ॥
गच्छस्व दैत्यशार्दूल स्वमावासं क्रियारतः ।
न कर्मबन्धो भवतो मच्चित्तस्य भविष्यति ॥
प्रशासयदमून् दैत्यान् राज्यं पालय शाश्वतम् ।
स्वजातिसदृशं दैत्य कुरु धर्ममनुत्तमम् ॥
पुलस्त्य उवाच
इत्युक्तो लोकनाथेन प्रह्लादो देवमब्रवीत् ।
कथं राज्यं समादास्ये परित्यक्तं जगद्गुरो ॥
तमुवाच जगत्स्वामी गच्छ त्वं निजमाश्रयम् ।
हितोपदेष्टा दैत्यानां दानवानां तथा भव ॥
नारायणेनैवमुक्तः स तदा दैत्यनायकः ।
प्रणिपत्य विभुं तुष्टो जगाम नगरं निजम् ॥
दृष्टः सभाजितश्चापि दानवैरन्धकेन च । निमन्त्रितश्च राज्याय न प्रत्यैच्छत्स नारद राज्यं परित्यज्य महासुरेन्द्र नियोजयन् सत्पथि दानवेन्द्रान् ध्यायन् स्मरन् केशवमप्रमेयं तस्थौ तदा योगविशुद्धदेहः एवं पुरा नारद दानवेन्द्रो नारायणेनोत्तमपूरुषेण पराजितश्चापि विमुच्य राज्यं तस्थौ मनो धातरि सन्निवेश्य श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८ नारायणने कहा – प्रह्लाद! ऐसा ही होगा । पर हे महाबाहो! तुम एक और अन्य वर भी, जो तुम चाहो, माँगो । मैं बिना विचारे ही - बिना देय - अदेयका विचार ६२ किये ही - वह भी तुम्हें दूँगा ॥६२ ॥
प्रह्लादने कहा- अधोक्षज! आपके अनुग्रहसे मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया । आपके चरणकमलोंसे मैं सदा लगा रहूँ और ऐसी ही मेरी प्रसिद्धि भी हो अर्थात् ६३ मैं आपके भक्तके रूपमें ही चर्चित होऊँ ॥६३ ॥
नारायणने कहा- ऐसा ही होगा । इसके अतिरिक्त मेरे प्रसादसे तुम अक्षय, अविनाशी, अजर और अमर ६४ होगे । दैत्यश्रेष्ठ! अब तुम अपने घर जाओ और सदा ( धर्म ) कार्यमें रत रहो । मुझमें मन लगाये रखनेसे तुम्हें कर्मबन्धन नहीं होगा । इन दैत्योंपर शासन करते ६५ हुए तुम शाश्वत ( सदा बने रहनेवाले ) राज्यका पालन करो । दैत्य! अपनी जातिके अनुकूल श्रेष्ठ धर्मोंका ६६ | अनुष्ठान करो ॥ ६४–६६ ॥ पुलस्त्यजी बोले- लोकनाथके ऐसा कहनेपर | प्रह्लादने भगवान् से कहा - – जगद्गुरो! अब मैं छोड़े हुए ६७ राज्यको कैसे ग्रहण करूँ? इसपर भगवान्ने उनसे कहा – तुम अपने घर जाओ तथा दैत्यों एवं दानवोंको ६८ कल्याणकारी बातोंका उपदेश करो । नारायणके ऐसा कहनेपर वे दैत्यनायक ( प्रह्लाद ) परमेश्वरको प्रणाम कर ६ ९ । प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर निवास स्थानको चले गये । नारदजी! अन्धक तथा दानवोंने प्रह्लादको देखा एवं ॥ ७० उनका सम्मान किया और उन्हें राज्य स्वीकार करने के लिये अनुरोधित किया; किंतु उन्होंने राज्य स्वीकार नहीं । किया । दैत्येश्वर प्रह्लाद राज्यको छोड़ अपने उपदेशोंसे दानव- श्रेष्ठोंको शुभ मार्गमें नियोजित तथा भगवान् ॥ ७१ नारायणका ध्यान और स्मरण करते हुए योगके द्वारा शुद्ध शरीर होकर विराजित हुए । नारदजी! इस प्रकार पहले पुरुषोत्तम नारायणद्वारा पराजित दानवेन्द्र प्रह्लाद राज्य छोड़कर भगवान् नारायणके ध्यानमें लीन होकर ॥ ७२ । शान्त एवं सुस्थिर हुए थे ॥ ६७–७२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन ४ ९ नवाँ अध्याय अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन नारद उवाच नेत्रहीनः कथं राज्ये प्रह्लादेनान्धको मुने अभिषिक्तो जानताऽपि राजधर्मं सनातनम् पुलस्त्य उवाच लब्धचक्षुरसौ भूयो हिरण्याक्षेऽपि जीवति ततोऽभिषिक्तो दैत्येन प्रह्लादेन निजे पदे नारद उवाच राज्येऽन्धकोऽभिषिक्तस्तु किमाचरत सुव्रत देवादिभिः सह कथं समास्ते तद् वदस्व मे पुलस्त्य उवाच राज्येऽभिषिक्तो दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः तपसाराध्य देवेशं शूलपाणिं त्रिलोचनम् अजेयत्वमवध्यत्वं सुरसिद्धर्षिपन्नगैः अदाह्यत्वं हुताशेन अक्लेद्यत्वं जलेन च एवं स वरलब्धस्तु दैत्यो राज्यमपालयत् । शुक्रं पुरोहितं कृत्वा समध्यास्ते ततोऽन्धकः
ततश्चक्रे समुद्योगं देवानामन्धकोऽसुरः ।
आक्रम्य वसुधां सर्वां मनुजेन्द्रान् पराजयत् ॥
पराजित्य महीपालान् सहायार्थे नियोज्य च ।
तैः समं मेरुशिखरं जगामाद्भुतदर्शनम् ॥
शक्रोऽपि सुरसैन्यानि समुद्योज्य महागजम् । समारुह्यामरावत्यां गुप्तिं कृत्वा विनिर्ययौ शक्रस्यानु तथैवान्ये लोकपाला महौजसः आरुह्य वाहनं स्वं स्वं सायुधा निर्ययुर्बहिः ॥
देवसेनाऽपि च समं शक्रेणाद्भुतकर्मणा ।
निर्जगामातिवेगेन गजवाजिरथादिभिः ॥
नारदजीने कहा- मुने! प्रह्लादजी सनातन । राजधर्मको भलीभाँति जानते थे । ऐसी दशामें उन्होंने ॥ १ नेत्रहीन अन्धकको राजगद्दीपर कैसे बैठाया? ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी बोले – हिरण्याक्षके जीवनकालमें ही अन्धकको पुनः दृष्टि प्राप्त हो गयी थी, अतः दैत्यवर्य
।
प्रह्लादने उसे अपने पदपर अभिषिक्त किया था ॥ २ ॥
॥ २
नारदजीने पूछा – सुव्रत! मुझे यह बतलाइये कि अन्धकने राज्यपर अभिषिक्त होनेपर क्या - क्या । किया तथा वह देवताओं आदिके साथ कैसा व्यवहार ॥ ३ करता था ॥ ३ ॥
पुलस्त्यजी बोले – हिरण्याक्षके पुत्र दैत्यराज । अन्धकने राज्य प्राप्त करके तपस्याद्वारा शूलपाणि भगवान् ॥ ४ शंकरकी आराधना की और उनसे देवता, सिद्ध, ऋषि एवं नागोंद्वारा नहीं जीते जाने और नहीं मारे जानेका वर । प्राप्त कर लिया । इसी प्रकार वह अग्निके द्वारा न जलने, ॥ ५ जलसे न भीगने आदिका भी वरदान प्राप्त कर राज्यका संचालन कर रहा था । उसने शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बना लिया था । फिर अन्धकासुरने देवताओंको ॥ ६ जीतनेका उपक्रम ( आरम्भ ) किया और उन्हें जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया - सभी श्रेष्ठ ७ राजाओंको परास्त कर दिया ॥ ४–७ ॥ उसने सभी राजाओंको पराजित कर उन्हें ( सामन्त ८ बनाकर ) अपनी सहायतामें नियुक्त कर दिया । फिर उनके साथ वह सुमेरुगिरि पर्वतको देखनेके लिये उसके अद्भुत शिखरपर गया । इधर इन्द्र भी देवसेनाको ॥ ९ तैयारकर और अमरावतीमें सुरक्षाकी व्यवस्था कर अपने ऐरावत हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये बाहर निकले ॥ इसी प्रकार दूसरे तेजस्वी लोकपालगण भी अपने - अपने १० वाहनोंपर सवार होकर तथा अपने अस्त्र लेकर इन्द्रके पीछे - पीछे चल पड़े । हाथी, घोड़े, रथ आदिसे युक्त ११ देवसेना भी बड़े अद्भुत पराक्रमी इन्द्रके साथ तेजीसे
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९ अग्रतो द्वादशादित्याः पृष्ठतश्च त्रिलोचनाः ।
मध्येऽष्टौ वसवो विश्वे साध्याश्विमरुतां गणाः ।
यक्षविद्याधराद्याश्च स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥
नारद उवाच
रुद्रादीनां वदस्वेह वाहनानि च सर्वशः ।
एकैकस्यापि धर्मज्ञ परं कौतूहलं मम ॥
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्व कथयिष्यामि सर्वेषामपि नारद ।
वाहनानि समासेन एकैकस्यानुपूर्वशः ॥
रुद्रहस्ततलोत्पन्नो महावीर्यो महाजवः ।
श्वेतवर्णो गजपतिर्देवराजस्य वाहनम् ॥
रुद्रोरुसंभवो भीमः कृष्णवर्णो मनोजवः ।
पौण्ड्रको नाम महिषो धर्मराजस्य नारद ॥
रुद्रकर्णमलोद्भूतः श्यामो जलधिसंज्ञकः ।
शिशुमारो दिव्यगतिः वाहनं वरुणस्य च ॥
रौद्रः शकटचक्राक्षः शैलाकारो नरोत्तमः ।
अम्बिकापादसंभूतो वाहनं धनदस्य तु ॥
एकादशानां रुद्राणां वाहनानि महामुने ।
गन्धर्वाश्च महावीर्या भुजगेन्द्राश्च दारुणाः ।
श्वेतानि सौरभेयाणि वृषाण्युग्रजवानि च ॥
रथं चन्द्रमसश्चार्द्धसहस्त्रं हंसवाहनम् ।
हरयो रथवाहाश्च आदित्या मुनिसत्तम ॥
कुञ्जरस्थाश्च वसवो यक्षाश्च नरवाहनाः ।
किन्नरा भुजगारूढा हयारूढौ तथाश्विनौ ॥
सारङ्गाधिष्ठिता ब्रह्मन् मरुतो घोरदर्शनाः ।
शुकारूढाश्च कवयो गन्धर्वाश्च पदातिनः ॥
आरुह्य वाहनान्येवं स्वानि स्वान्यमरोत्तमाः ।
संनह्य निर्ययुर्हृष्टा युद्धाय सुमहौजसः ॥
नारद उवाच
गदितानि सुरादीनां वाहनानि त्वया मुने ।
दैत्यानां वाहनान्येवं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्व दानवादीनां वाहनानि द्विजोत्तम ।
कथयिष्यामि तत्त्वेन यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥
निकल पड़ी । सेनाके आगे - आगे बारहों आदित्य और उनके पृष्ठभागमें ग्यारह रुद्रगण थे । उसके मध्यमें आठों वसु, तेरहों विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, यक्ष, विद्याधर आदि अपने - अपने वाहनपर १२ सवार होकर चल रहे थे ॥ ८- १२ ॥ नारदजीने पूछा- धर्मज्ञ! रुद्र आदिके वाहनोंका एक - एक कर पूरी तरह वर्णन कीजिये । इस विषयमें १३ मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही है ॥१३ ॥
पुलस्त्यजी बोले- नारदजी! सुनिये; मैं एक-एक करके क्रमशः सभी देवताओंके वाहनोंका संक्षेपमें १४ वर्णन करता हूँ । रुद्रके करतलसे उत्पन्न अति पराक्रमवाला, अति तीव्रगतिवाला, श्वेतवर्णका ऐरावत हाथी देवराज १५ । ( इन्द्र ) का वाहन है । हे नारद! रुद्रके ऊरुसे उत्पन्न भयंकर कृष्णवर्णवाला एवं मनके सदृश गतिमान् १६ पौण्ड्रक नामक महिष धर्मराजका वाहन है । रुद्रके कर्ण - मलसे उत्पन्न श्यामवर्णवाला दिव्यगतिशील जलधि १७ नामक शिशुमार ( सूँस ) वरुणका वाहन है । अम्बिका चरणोंसे उत्पन्न गाड़ीके चक्केके समान भयंकर आँखवाला, १८ पर्वताकार नरोत्तम कुबेरका वाहन है ॥ १४–१८ ॥ हे महामुने! एकादश रुद्रोंके वाहन महापराक्रमशाली गन्धर्वगण, भयंकर सर्पराजगण तथा सुरभिके अंशसे १ ९ उत्पन्न तीव्रगतिवाले सफेद बैल हैं । मुनिश्रेष्ठ! चन्द्रमाके रथको खींचनेवाले आधे हजार ( पाँच सौ ) हंस हैं । २० आदित्योंके रथके वाहन घोड़े हैं । वसुओंके वाहन हाथी, यक्षोंके वाहन नर, किन्नरोंके वाहन सर्प एवं २१ अश्विनीकुमारोंके वाहन घोड़े हैं । ब्रह्मन्! भयंकर दीखनेवाले मरुद्गणोंके वाहन हरिण हैं, भृगुओंके वाहन शुक २२ और गन्धर्वलोग पैदल ही चलते हैं ॥ १ ९ –२२ ॥ इस प्रकार बड़े तेजस्वी श्रेष्ठ देवगण अपने - अपने वाहनोंपर आरूढ़ एवं सन्नद्ध ( तैयार ) होकर प्रसन्नतापूर्वक २३ युद्धके लिये निकल पड़े ॥२३ ॥
नारदने कहा – मुने! आपने देवादिकोंके वाहनोंका वर्णन किया; इसी प्रकार अब असुरोंके वाहनोंका भी २४ यथावत् वर्णन करें ॥ २४ ॥
पुलस्त्यजी बोले- द्विजोत्तम! ( अब ) दानवोंके वाहनको सुनो । मैं तत्त्वतः उनका ठीक - ठीक वर्णन २५ । करता हूँ । अन्धकका अलौकिक रथ कृष्णवर्णके श्रेष्ठ