वामन पुराण — पृष्ठ 61–70

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

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अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन ५१

अन्धकस्य रथो दिव्यो युक्तः परमवाजिभिः ।

कृष्णवर्णैः सहस्रारस्त्रिनल्वपरिमाणवान् ॥

प्रह्लादस्य रथो दिव्यश्चन्द्रवर्णैर्हयोत्तमैः ।

उह्यमानस्तथाऽष्टाभिः श्वेतरुक्ममयः शुभः ॥

विरोचनस्य च गजः कुजम्भस्य तुरंगमः ।

जम्भस्य तु रथो दिव्यो हयैः काञ्चनसन्निभैः ॥

शङ्कुकर्णस्य तुरगो हयग्रीवस्य कुञ्जरः ।

रथो मयस्य विख्यातो दुन्दुभेश्च महोरगः ।

शम्बरस्य विमानोऽभूदयः शङ्कोर्मृगाधिपः ॥

बलवृत्रौ च बलिनौ गदामुसलधारिणौ ।

पद्भ्यां दैवतसैन्यानि अभिद्रवितुमुद्यतौ ॥

ततो रणोऽभूत् तुमुलः संकुलोऽतिभयंकरः ।

रजसा संवृतो लोको पिङ्गवर्णेन नारद ॥

नाज्ञासीच्च पिता पुत्रं न पुत्रः पितरं तथा ।

स्वानेवान्ये निजघ्नुर्वै परानन्ये च सुव्रत ॥

अभिद्रुतो महावेगो रथोपरि रथस्तदा ।

गजो मत्तगजेन्द्रं च सादी सादिनमभ्यगात् ॥

पदातिरपि संक्रुद्धः पदातिनमथोल्बणम् ।

परस्परं तु प्रत्यघ्नन्नन्योन्यजयकाङ्क्षिणः ॥

ततस्तु संकुले तस्मिन् युद्धे दैवासुरे मुने ।

प्रावर्तत नदी घोरा शमयन्ती रणाद्रजः ॥

शोणितोदा रथावत्ता योधसंघट्टवाहिनी ।

गजकुम्भमहाकूर्मा शरमीना दुरत्यया ॥

तीक्ष्णाग्रप्रासमकरा महासिग्राहवाहिनी ।

अन्त्रशैवालसंकीर्णा पताकाफेनमालिनी ॥

गृध्रकङ्कमहाहंसा श्येनचक्राह्वमण्डिता ।

वनवायसकादम्बा गोमायुश्वापदाकुला ॥

पिशाचमुनिसंकीर्णा दुस्तरा प्राकृतैर्जनैः ।

रथप्लवैः संतरन्तः शूरास्तां प्रजगाहिरे ॥

आगुल्फादवमज्जन्तः सूदयन्तः परस्परम् ।

समुत्तरन्तो वेगेन योधा जयधनेप्सवः ॥

अश्वोंसे परिचालित होता था । वह हजार अरों-२६ | पहियेकी नाभि और नेमिके बीचकी लकड़ियोंसे युक्त बारह सौ हाथोंका परिमाणवाला था । प्रह्लादका दिव्य रथ सुन्दर एवं सुवर्ण रजत- मण्डित था । उसमें चन्द्रवर्णवाले २७ आठ उत्तम घोड़े जुते हुए थे । विरोचनका वाहन हाथी था एवं कुजम्भ घोड़ेपर सवार था । जम्भका दिव्य रथ २८ स्वर्णवर्णके घोड़ोंसे युक्त था ॥ २५–२८ ॥ इसी प्रकार शंकुकर्णका वाहन घोड़ा, हयग्रीवका हाथी और मय दानवका वाहन दिव्य रथ था । दुन्दुभिका २ ९ वाहन विशाल नाग था । शम्बर विमानपर चढ़ा हुआ था तथा अय: शंकु सिंहपर सवार था । गदा और मुसलधारी बलवान् बल और वृत्र पैदल थे; पर देवताओंकी सेनापर ३० चढ़ाई करनेके लिये उद्यत थे । फिर अति भयङ्कर घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया । नारदजी! समस्त लोक ३१ पीली धूलसे ढक गया, जिससे पिता पुत्रको और पुत्र पिताको भी परस्पर एक - दूसरेको पहचान नहीं पाते थे । सुव्रत! कुछ लोग अपने ही पक्षके लोगोंको तथा कुछ ३२ लोग विरोधी पक्षके लोगोंको मारने लगे ॥२ ९ –३२ ॥ उस युद्धमें रथके ऊपर रथ और हाथीके ऊपर ३३ हाथी टूट पड़े तथा घुड़सवार घुड़सवारोंकी ओर वेगसे आक्रमण करने लगे । इसी प्रकार पादचारी ( पैदल ) सैनिक क्रुद्ध होकर अन्य बलशाली पैदलोंपर चढ़ बैठे । ३४ | इस प्रकार एक- दूसरेको जीतनेकी इच्छासे सभी परस्पर प्रहार करने लगे । मुने! उसके बाद देवताओं और असुरोंके उस घोर संग्राममें युद्धसे उत्पन्न धूलिको ३५ शान्त करती हुई रक्तरूपी जलधारावाली एवं रथरूपी भँवरवाली और योद्धाओंके समूहको बहा ले जानेवाली एवं गजकुम्भरूपी महान् कूर्म तथा शररूपी मीनसे युक्त ३६ बड़ी भारी नदी बह चली ॥ ३३-३६ ॥ उस नदीमें तेज धारवाले प्रास ( एक प्रकारका ३७ अस्त्र ) ही मकर थे, बड़ी - बड़ी तलवारें ही ग्राह थीं, उसमें आँतें ही शैवाल, पताका ही फेन, गृध्र एवं कङ्क पक्षी महाशंख, बाज ही चक्रवाक और जंगली कौवे ही ३८ मानो कलहंस थे । वह नदी भृगालरूपी हिंस्र एवं पिशाचरूपी मुनियोंसे संकीर्ण थी और साधारण मनुष्योंसे दुस्तर थी । ३ ९ जयरूप धनकी इच्छावाले शूर योद्धा लोग घुटनोंतक डूबते और एक - दूसरेको मारते हुए रथरूपी नौकाओंद्वारा ४० उस नदीको वेगसे पार कर रहे थे ॥ ३७–४० ॥

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५२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९ ततस्तु रौद्रे सुरदैत्यसादने महाहवे भीरुभयंकरेऽथ । रक्षांसि यक्षाश्च सुसंप्रहृष्टाः पिशाचयूथास्त्वभिरेमिरे च ॥ पिबन्त्यसृग्गाढतरं भटाना-मालिङ्गय मांसानि च भक्षयन्ति । वसां विलुम्पन्ति च विस्फुरन्ति गर्जन्त्यथान्योन्यमथो वयांसि ॥ मुञ्चन्ति फेत्काररवाञ्शिवाश्च क्रन्दन्ति योधा भुवि वेदनार्त्ताः । शस्त्रप्रतप्ता निपतन्ति चान्ये युद्धं श्मशानप्रतिमं बभूव ॥ तस्मिशिवाघोररवे प्रवृत्ते सुरासुराणां भयंक ह । युद्धं बभौ प्राणपणोपविद्धं द्वन्द्वेऽतिशस्त्राक्षगतो दुरोदरः ॥ हिरण्यचक्षुस्तनयो रणेऽन्धको रथे स्थितो वाजिसहस्त्रयोजिते । मत्तेभपृष्ठस्थितमुग्रतेजसं समेयिवान् देवपतिं शतक्रतुम् ॥ समापतन्तं महिषाधिरूढं यमं प्रतीच्छद् बलवान् दितीशः । प्रह्लादनामा तुरगाष्टयुक्तं रथं समास्थाय समुद्यतास्त्रः ॥ विरोचनश्चापि जलेश्वरं त्वगा-वायुं अन्ये सुरान् ज्जम्भस्त्वथागाद् धनदं बलाढ्यम् । समभ्येत्य च शम्बरोऽथ मयो हुताशं युयुधे मुनीन्द्र ॥ महाबला दनुपुङ्गवाश्च । हुताशार्कवसूरगेश्वरान् द्वन्द्वं समासाद्य महाबलान्विताः ॥ गर्जन्त्यथान्योन्यमुपेत्य युद्धे चापानि कर्षन्त्यतिवेगिताश्च । मुञ्चन्ति नाराचगणान् सहस्रश आगच्छ हे तिष्ठसि किं ब्रुवन्तः ॥ शरैस्तु तीक्ष्णैरतितापयन्तः शस्त्रैरमोघैरभिताडयन्तः वह युद्ध डरपोकोंके लिये भयावना, देवों एवं दैत्योंका संहार करनेवाला तथा वस्तुतः अत्यन्त भयंकर था । उसमें यक्ष और राक्षस लोग अत्यन्त आनन्दित ४१ हो रहे थे । पिशाचोंका समूह भी प्रसन्न था । वे वीरोंके गाढ़े रुधिरका पान करते थे तथा ( उनके शवोंका ) आलिंगन कर मांसका भक्षण करते थे । पक्षी चर्बीको नोचते और उछलते थे एवं एक-४२ दूसरेके प्रति गर्जन करते थे । सियारिनें ' फेत्कार ' शब्द कर रही थीं, भूमिपर पड़े हुए वेदनासे दुःखी योद्धा कराह रहे थे । कुछ लोग शस्त्रसे आहत ४३ होकर गिर रहे थे । युद्धभूमि मरघटके समान हो गयी थी । सियारिनोंके भयंकर शब्दसे युक्त देवासुर-संग्राम ऐसा लगता था, मानो युद्धमें निपुण योद्धा लोग शस्त्ररूपी पाशा लेकर अपने प्राणोंकी बाजी ४४ । लगाते हुए जुआ खेल रहे हैं॥४१–४४ ॥ हिरण्याक्षका पुत्र अन्धक हजारों घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ होकर मतवाले हाथीकी पीठपर स्थित महातेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ जा भिड़ा । ४५ इधर आठ घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ अस्त्र उठाये बलवान् दैत्यराज प्रह्लादने महिषपर सवार यमराजका सामना किया । नारदजी! उधर विरोचन ४६ वरुणदेवसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा तथा जम्भ बलशाली कुबेरकी ओर चला । शम्बर वायुदेवताके सामने जा खड़ा हुआ एवं मय अग्नि ४७ साथ युद्ध करने लगा । हयग्रीव आदि अन्यान्य महाबलवान् दैत्य तथा दानव अग्नि, सूर्य, अष्ट वसुओं तथा शेषनाग आदि देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध ४८ करने लगे ॥ ४५ -४८ ॥ वे एक - दूसरेके साथ युद्ध करते हुए भीषण गर्जन कर रहे थे । वे वेगपूर्वक धनुष चढ़ा करके हजारों बाणोंकी झड़ी लगाकर कहने लगे - अरे! ४ ९ आओ, आओ, रुक क्यों गये । तेज बाणोंकी वर्षा करते हुए तथा अमोघ शस्त्रोंसे प्रहार करते हुए

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अध्याय १० ] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५३ मन्दाकिनीवेगनिभां वहन्तीं प्रवर्तयन्तो भयदां नदीं च ॥५० त्रैलोक्यमाकांक्षिभिरुग्रवेगैः

सुरासुरैर्नारद संप्रयुद्धे ।

पिशाचरक्षोगणपुष्टिवर्धनी-मुत्तर्तुमिच्छद्भिरसृग्नदी भौ ॥ ५१

वाद्यन्ति तूर्याणि सुरासुराणां पश्यन्ति खस्था मुनिसिद्धसंघाः । नयन्ति तानप्सरसां गणाग्र्या हता रणे येऽभिमुखास्तु शूराः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन लोगोंने गङ्गाके समान तीव्र वेगसे प्रवाहित होनेवाली, ( किंतु ) भयंकर नदीको प्रवर्तित कर दिया । नारदजी! उस युद्धमें तीनों लोकोंको चाहनेवाले उग्रवेगशाली देवता एवं असुरगण पिशाचों एवं राक्षसोंकी पुष्टि बढ़ानेवाली शोणित- सरिताको पार करनेकी इच्छा कर रहे थे । उस समय देवता और दानवोंके बाजे बज रहे थे । आकाशमें स्थित मुनियों और सिद्धोंके समूह उस युद्धको देख रहे थे । जो वीर उस युद्धमें सम्मुख मारे गये थे, उन्हें अप्सराएँ सीधे स्वर्गमें लिये चली जा रही

थीं ॥। ४ ९ –५२ ॥

नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥

दसवाँ अध्याय अन्धकके साथ देवताओंका पुलस्त्य उवाच

ततः प्रवृत्ते संग्रामे भीरूणां भयवर्धने ।

सहस्राक्षो महाचापमादाय व्यसृजच्छरान् ॥ १

अन्धकोऽपि महावेगं धनुराकृष्य भास्वरम् ।

पुरंदराय चिक्षेप शरान् बर्हिणवाससः ॥ २

तावन्योन्यं सुतीक्ष्णाग्रैः शरैः संनतपर्वभिः ।

रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराजघ्नतुरुभावपि ॥ ३

ततः क्रुद्धः शतमखः कुलिशं भ्राम्य पाणिना ।

चिक्षेप दैत्यराजाय तं ददर्श तथान्धकः ॥ ४

आजघान च बाणौघैरस्त्रैः शस्त्रैः स नारद ।

तान् भस्मसात्तदा चक्रे नगानिव हुताशनः ॥ ५

ततोऽतिवेगिनं वज्रं दृष्ट्वा बलवतां वरः ।

समाप्लुत्य रथात्तस्थौ भुवि बाहुसहायवान् ॥ ६

रथं सारथिना सार्धं साश्वध्वजसकूबरम् ।

भस्म कृत्वाथ कुलिशमन्धकं समुपाययौ ॥ ७

तमापतन्तं वेगेन मुष्टिनाहत्य भूतले ।

पातयामास बलवाञ्जगर्ज च तदाऽन्धकः ॥ ८ ।

युद्ध और अन्धककी विजय पुलस्त्यजी बोले- तत्पश्चात् भीरुओंके लिये भय बढ़ानेवाला समर आरम्भ हो गया । हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अपने विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे । अन्धक भी अपने दीप्तिमान् धनुषको लेकर बड़े वेगसे मयूरपंख लगे बाणोंको इन्द्रपर छोड़ने लगा । वे दोनों एक - दूसरेको झुके हुए पर्वोंवाले स्वर्णपंखयुक्त तथा महावेगवान् तीक्ष्ण बाणोंसे आहत कर दिये । फिर इन्द्रने क्रुद्ध होकर वज्रको अपने हाथसे घुमाकर उसे अन्धकके ऊपर फेंका । नारदजी! अंधकने उसे आते देखा । उसने बाणों, अस्त्रों और शस्त्रोंसे उसपर प्रहार किया; पर अग्नि जिस प्रकार वनों, पर्वतों ( या वृक्षों ) - को भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस वज्रने उन सभी अस्त्रोंको भस्म कर डाला ॥ १-५ ॥ तब बलवानोंमें श्रेष्ठ अन्धक अति वेगवान् वज्रको आते देखकर रथसे कूदकर बाहुबलका आश्रय लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया । वह वज्र, सारथि, अश्व, ध्वजा एवं कूबरके साथ रथको भस्मकर इन्द्रके पास पहुँच गया । उस ( वज्र ) -को वेगपूर्वक आते देख बलवान् अन्धकने मुष्टिसे मारकर उसे भूमिपर गिरा दिया और गर्जन करने लगा ॥ ६-८ ॥

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५४

तं गर्जमानं वीक्ष्याथ वासवः सायकैर्दृढम् ।

ववर्ष तान् वारयन् स समभ्यायाच्छतक्रतुम् ॥

आजघान तलेनेभं कुम्भमध्ये पदा करे ।

जानुना च समाहत्य विषाणं प्रबभञ्ज च ॥

वाममुष्ट्या तथा पार्श्वं समाहत्यान्धकस्त्वरन् ।

गजेन्द्रं पातयामास प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ॥

गजेन्द्रात् पतमानाच्च अवप्लुत्य शतक्रतुः ।

पाणिना वज्रमादाय प्रविवेशामरावतीम् ॥

पराङ्मुखे सहस्त्राक्षे तद् दैवतबलं महत् ।

पातयामास दैत्येन्द्रः पादमुष्टितलादिभिः ॥

ततो वैवस्वतो दण्डं परिभ्राम्य द्विजोत्तम ।

समभ्यधावत् प्रह्लादं हन्तुकामः सुरोत्तमः ॥

तमापतन्तं बाणौघैर्ववर्ष रविनन्दनम् ।

हिरण्यकशिपोः पुत्रश्चापमानम्य वेगवान् ॥

तां बाणवृष्टिमतुलां दण्डेनाहत्य भास्करिः ।

शातयित्वा प्रचिक्षेप दण्डं लोकभयंकरम् ॥

स वायुपथमास्थाय धर्मराजकरे स्थितः ।

जज्वाल कालाग्निनिभो यद्वद् दग्धुं जगत्त्रयम् ॥

जाज्वल्यमानमायान्तं दण्डं दृष्ट्वा दितेः सुताः प्राक्रोशन्ति हतः कष्टं प्रह्लादोऽयं यमेन हि तमाक्रन्दितमाकर्ण्य हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः प्रोवाच मा भैष्ट मयि स्थिते कोऽयं सुराधमः इत्येवमुक्त्वा वचनं वेगेनाभिससार च । जग्राह पाणिना दण्डं हसन् सव्येन नारद तमादाय ततो वेगाद् भ्रामयामास चान्धकः जगर्ज च महानादं यथा प्रावृषि तोयदः प्रह्लादं रक्षितं दृष्ट्वा दण्डाद् दैत्येश्वरेण हि । साधुवादं ददुर्हष्टा दैत्यदानवयूथपाः भ्रामयन्तं महादण्डं दृष्ट्वा भानुसुतो मुने दुःसहं दुर्धरं मत्वा अन्तर्धानमगाद् यमः अन्तर्हिते धर्मराजे प्रह्लादोऽपि महामुने दारयामास बलवान् देवसैन्यं समन्ततः वरुणः शिशुमारस्थो बद्ध्वा पाशैर्महासुरान् गदया दारयामास तमभ्यगाद् विरोचनः श्रीवामनपुराण [ अध्याय १० उसे इस प्रकार गरजते देखकर इन्द्रने उसके ऊपर ९ जोरोंसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी । अन्धक भी उनको निवारित करते हुए इन्द्रके पास पहुँच गया । उसने अपने १० हाथसे ऐरावत हाथीके सिरपर एवं अपने पैरसे सूँड़पर प्रहार कर और घुटनोंसे दाँतोंपर प्रहार कर उन्हें तोड़ डाला । फिर अन्धकने बायीं मुट्ठीसे ऐरावतकी कमरपर ११ शीघ्रतापूर्वक चोट मारकर उसे जर्जर कर गिरा दिया । इन्द्र भी हाथीसे नीचे गिरे जा रहे थे । वे झटसे कूदकर एवं १२ हाथमें वज्र लेकर अमरावतीमें प्रविष्ट हो गये ॥ ९ –१२ ॥ इन्द्रके रणसे विमुख हो जानेपर अन्धकने उस विशाल १३ देव - सेनाको पैर, मुट्ठी एवं थप्पड़ों आदिसे मारकर गिरा दिया । नारदजी! इसके बाद देवश्रेष्ठ यमराज अपना दण्ड १४ घुमाते हुए प्रह्लादको मारनेकी इच्छासे दौड़ पड़े । यमराजको अपनी ओर आते देख प्रह्लादने भी अपने धनुषको चढ़ाकर १५ फुर्तीसे बाण - समूहों की झड़ी लगा दी । यमराजने अपने दण्डके प्रहारसे उस अतुलनीय बाण - वृष्टिको व्यर्थ कर १६ लोकभयकारी दण्ड चला दिया ॥ १३–१६ ॥ धर्मराजके हाथमें स्थित वह दण्ड हवामें ऊपर १७ घूम रहा था । वह ऐसा लगता था मानो तीनों लोकोंको जलानेके लिये कालाग्नि प्रज्वलित हो रही हो । उस । प्रज्वलित दण्डको अपनी ओर आते देखकर दैत्यलोग ॥ १८ चिल्लाने लगे - हाय! हाय! यमराजने प्रह्लादको मार । दिया । उस आक्रन्दनको सुनकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकने कहा- डरो मत । मेरे रहते ये यमराज क्या ॥ १ ९ वस्तु हैं? नारदजी! ऐसा कहकर वह वेगसे दौड़ पड़ा और हँसते हुए उस दण्डको बायें हाथसे पकड़ ॥ २० लिया ॥ १७ – २० ॥ । फिर अन्धक उसे लेकर घुमाने लगा और साथ ॥ २१ ही वर्षाकालिक मेघके तुल्य वह महानाद करते हुए गर्जन करने लगा । अन्धकके द्वारा यम- दण्डसे प्रह्लादको ॥ २२ सुरक्षित देखकर दैत्यों एवं दानवोंके सेनानायक प्रसन्न होकर उसे धन्यवाद देने लगे । मुने! अपने महादण्डको । अन्धकद्वारा घुमाते देख सूर्यतनय यम दैत्यको दुःसह ॥ २३ और दुर्धर समझकर अन्तर्धान हो गये । महामुने! । धर्मराजके अन्तर्हित होनेपर अब बली प्रह्लाद भी सभी ॥ २४ ओरसे देवसेनाको नष्ट करने लगे ॥ २१–२४ ॥ वरुणदेव सूँसपर स्थित थे । वे प्रबल असुरोंको । | अपने पाशोंसे बाँधकर गदाद्वारा विदीर्ण करने ॥ २५ । लगे । इसपर विरोचनने उनका सामना किया ।

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अध्याय १० ] अन्धकके साथ देवताओंका

तोमरैर्वज्रसंस्पर्शैः शक्तिभिर्मार्गणैरपि ।

जलेशं ताडयामास मुद्गरैः कणपैरपि ॥ २६

ततस्तं गदयाभ्येत्य पातयित्वा धरातले ।

अभिद्रुत्य बबन्धाथ पाशैर्मत्तगजं बली ॥ २७

तान् पाशशतधा चक्रे वेगाच्च दनुजेश्वरः ।

वरुणं च समभ्येत्य मध्ये जग्राह नारद ॥ २८

ततो दन्ती च शृङ्गाभ्यां प्रचिक्षेप तदाऽव्ययः ।

ममर्द च तथा पद्भ्यां सवाहं सलिलेश्वरम् ॥ २ ९

तं मर्द्यमानं वीक्ष्याथ शशाङ्कः शिशिरांशुमान् ।

अभ्येत्य ताडयामास मार्गणैः कायदारणैः ॥ ३०

स ताड्यमानः शिशिरांशुबाणै-रवाप पीडां परमां गजेन्द्रः । दुष्टश्च वेगात् पयसामधीशं मुहुर्मुहुः पादतलैर्ममर्द ॥ ३१ स मृद्यमानो वरुणो गजेन्द्रं पद्भ्यां सुगाढं जगृहे महर्षे । पादेषु भूमिं करयोः स्पृशंश्च मूर्द्धानमुल्लाल्य बलान्महात्मा ॥ ३२ गृह्याङ्गुलीभिश्च गजस्य पुच्छं उत्पाट्य क्षिप्तो साट्टं कृत्वेह बन्धं भुजगेश्वरेण । चिक्षेप विरोचनं हि सकुञ्जरं खे सनियन्तृवाहम् ॥ ३३ जलेशेन विरोचनस्तु सकुञ्जरो भूमितले पपात । सन्यत्रार्गलहर्म्यभूमिं पुरं सुकेशेरिव भास्करेण ॥ ३४ । जलेशः सगदः सपाशः ततः हा हा प्रह्लाद अहो पाशेन समभ्यधावद् दितिजं निहन्तुम् । समाक्रन्दमनुत्तमं हि मुक्तं तु दैत्यैर्घनरावतुल्यम् ॥ ३५ हतोऽसौ वरुणेन वीरौ विरोचनो दानवसैन्यपालः । हे जम्भकुजम्भकाद्या रक्षध्वमभ्येत्य सहान्धकेन ॥ ३६ महात्मा बलवाञ्जलेशः संचूर्णयन् दैत्यभटं सवाहम् । बद्ध्वा गदया निहन्ति यथा पशुं वाजिमखे महेन्द्रः ॥ ३७ । युद्ध और अन्धककी विजय ५५ उसने वज्रतुल्य तोमर, शक्ति, बाण, मुद्गर और कणपों * ( भल्लों ) - से वरुणदेवपर प्रहार किया । इसपर वरुणने उसके निकट जाकर गदासे मारकर उन्हें पृथ्वीपर गिरा दिया । फिर दौड़कर उन्होंने पाशोंसे उसके मतवाले हाथीको बाँध लिया । पर अन्धकने तुरन्त ही उन पाशोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये । नारदजी! इतना ही नहीं, उसने वरुणके निकट जाकर उनकी कमर भी पकड़ ली ॥ २५-२८ ॥ उस हाथीने भी अपने प्रबल दाँतोंसे वरुणको उठाकर फेंक दिया । साथ ही वह वाहनसहित वरुणको अपने पैरोंसे कुचलने लगा । यह देख शीतकिरण चन्द्रमाने हाथीके पास पहुँचकर अपने तेज नुकीले बाणोंसे उसके शरीरको विदीर्ण कर दिया । चन्द्रमाके बाणोंसे विद्ध होनेपर अन्धकके हाथीको अत्यधिक पीड़ा हुई । वह अपने पैरोंसे वरुणको तेजीसे बार - बार कुचलने लगा । नारदजी! वरुणदेवने भी हाथीके दोनों | पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया एवं अपने हाथों तथा पैरोंसे भूमिका स्पर्श करते हुए मस्तक उठाकर बलपूर्वक अङ्गुलियोंसे उस हाथीकी पूँछ पकड़ ली और सर्पराज वासुकिसे विरोचनको बाँधकर उसे हाथी और पिलवानके सहित उठाकर आकाशमें फेंक दिया ॥ २ ९ - ३३ ॥ वरुणद्वारा फेंका गया विरोचन आकाशसे हाथीसहित पृथ्वीपर इस प्रकार आ गिरा, जैसे सूर्यद्वारा पहले सुकेशी दैत्यका नगर अट्टालिकाओं, यन्त्रों, अर्गलाओं एवं महलोंके सहित पृथ्वीपर गिराया गया था । उसके बाद वरुण गदा और पाश लेकर दैत्यको मारनेके लिये दौड़े । अब दैत्यलोग मेघ गर्जन- जैसे जोर - जोर से रोने लगे-- हाय! हाय! राक्षस - सेनाके रक्षक वीर विरोचन वरुणद्वारा मारे जा रहे हैं । हे प्रह्लाद! हे जम्भ! हे कुजम्भ! तुम सभी अन्धकके साथ आकर ( उन्हें ) बचाओ । हाय! बलवान् वरुण दैत्यवीर विरोचनको वाहनसहित चूर्ण करते हुए उन्हें पाशमें बाँधकर गदासे इस प्रकार मार रहे हैं, जैसे अश्वमेध यज्ञमें इन्द्र पशुको * कणप अस्त्रका वर्णन महाभारत तथा दशकुमारचरितमें आया है ।

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५६ श्रुत्वाथ शब्दं दितिजैः समीरितं जम्भप्रधाना दितिजेश्वरास्ततः । समभ्यधावंस्त्वरिता जलेश्वरं यथा पतङ्गा ज्वलितं हुताशनम् ॥ तानागतान् वै प्रसमीक्ष्य देवः प्राह्लादिमुत्सृज्य वितत्य पाशम् । गदां समुद्भ्राम्य जलेश्वरस्तु दुद्राव ताञ्जम्भमुखानरातीन् ॥ जम्भं च पाशेन तथा निहत्य तारं तलेनाशनिसंनिभेन । पादेन वृत्रं तरसा कुजम्भं निपातयामास बलं च मुष्ट्या ॥ नार्दिता देववरेण दैत्याः संप्राद्रवन् दिक्षु विमुक्तशस्त्राः । ततोऽन्धकः स त्वरितो ऽभ्युपेयाद् रणाय योद्धुं जलनायकेन तमापतन्तं गदया जघान पाशेन बद्ध्वा वरुणो सुरेशम् । तं पाशमाविध्य गदां प्रगृह्य चिक्षेप दैत्यः स जलेश्वराय ॥ तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाशं गदां च दाक्षायणिनन्दनस्तु । विवेश वेगात् पयसां निधानं ततोऽन्धको देवबलं ममर्द ॥ ततो I हुताशः सुरशत्रुसैन्यं ददाह रोषात् पवनावधूतः । तमभ्ययाद् दानवविश्वकर्मा मयो महाबाहुरुदग्रवीर्यः तमापतन्तं सह शम्बरेण समीक्ष्य वह्निः पवनेन सार्धम् । शक्त्या मयं शम्बरमेत्य कण्ठे सन्ताड्य जग्राह बलान्महर्षे शक्त्या स कायावरणे विदारिते संभिन्नदेहो न्यपतत् पृथिव्याम् । मयः प्रजज्वाल च शम्बरोऽपि कण्ठावलग्ने ज्वलने प्रदीप्ते स दह्यमानो दितिजोऽग्निनाथ सुविस्वरं घोरतरं रुराव सिंहाभिपन्नो विपिने यथैव मत्तो गजः क्रन्दति वेदनार्त्तः श्रीवामनपुराण [ अध्याय १० मारते हैं । दैत्योंके रुदनको सुनकर जम्भ आदि प्रमुख दैत्यगण वरुणकी ओर शीघ्रतासे ऐसे दौड़े जैसे पतङ्ग ३८ प्रज्वलित अग्निकी ओर दौड़ते हैं ॥ ३४-३८ ॥ उन दैत्योंको आया देख वरुण प्रह्लाद - पुत्र ( विरोचन ) को छोड़ करके पाश फैलाकर और गदा ३ ९ घुमाकर उन जम्भप्रभृति शत्रुओंकी ओर दौड़े । उन्होंने जम्भको पाशसे, तार- दैत्यको वज्र - तुल्य करतलके प्रहारसे, वृत्रासुरको पैरोंसे, कुजम्भको अपने वेगसे और बल नामक असुरको मुक्केसे मारकर गिरा ४० दिया । देवप्रवर! वरुणद्वारा मर्दित दैत्य अपने अस्त्र-शस्त्रोंको छोड़कर दसों दिशाओंमें भागने लगे । उसके बाद अन्धक वरुणदेवके साथ युद्ध करनेके लिये बड़ी ॥ ४१ । तेजीसे उनके पास पहुँचा । अपनी ओर आते देख वरुणने उस दैत्यनायक अन्धकको अपने पाशसे बाँधकर गदासे मारा, किंतु दैत्यने उस पाश और गदाको ४२ छीनकर वरुणपर ही फेंक दिया ॥ ३ ९ -४२ ॥ उस पाश और गदाको अपनी ओर आते देखकर दाक्षायणीके पुत्र वरुण शीघ्रतासे समुद्रमें पैठ ४३ गये । तब अन्धक देवसेनाका मर्दन करने लगा । | उसके बाद पवनद्वारा प्रज्वलित अग्निदेव क्रोधपूर्वक असुरोंकी सेनाको दग्ध करने लगे । तब दानवोंका ' विश्वकर्मा ' ( शिल्पिराज ) प्रचण्ड प्रतापी महाबाहु ॥ ४४ मय उनके सामने आया । नारदजी! शम्बरके साथ उसे आते देख अग्निदेवने वायुदेवताके साथ शक्तिके प्रहारसे मय और शम्बरके कण्ठमें चोट ॥ ४५ पहुँचाकर उन दोनोंको ही जोरसे पकड़ लिया । शक्तिसे कवच फट जानेपर छिन्न - भिन्न शरीरवाला मय पृथ्वीपर गिर पड़ा और शम्बरासुर

कण्ठमें प्रदीप्त अग्निके लग जानेसे दग्ध होने लगा ।

॥ ४६

अग्निद्वारा जलते दैत्यने उस समय मुक्त कण्ठसे । इस प्रकार रोदन किया, जैसे वनमें सिंहसे आक्रान्त मतवाला हाथी वेदनासे दुःखी होकर करुण ॥ ४७ | चिग्घाड़ करता है ॥ ४३–४७ ॥

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अध्याय १० ] अन्धकके साथ देवताओंका तं शब्दमाकर्ण्य च शम्बरस्य दैत्येश्वरः क्रोधविरक्तदृष्टिः । आः किं किमेतन्ननु केन युद्धे जितो मयः शम्बरदानवश्च ॥ ४८ ततोऽब्रुवन् दैत्यभ दितीशं

प्रदह्यते ह्येष हुताशनेन ।

रक्षस्व चाभ्येत्य न शक्यतेऽन्यै-हुताशनो रणाग्रे ॥ ४ ९ ।

इत्थं स दैत्यैरभिनोदितस्तु हिरण्यचक्षुस्तनयो महर्षे । उद्यम्य वेगात् परिघं समाद्रवत् तिष्ठ तिष्ठ ब्रुवन् हि ॥ ५० श्रुत्वाऽन्धकस्यापि वचो व्ययात्मा संक्रुद्धचित्तस्त्वरितो हि दैत्यम् । उत्पाद्य भूम्यां च विनिष्पिपेष ततोऽन्धकः पावकमाससाद ॥ ५१ समाजघानाथ हुताशनं हि वरायुधेनाथ वराङ्गमध्ये । समाहतोऽग्निः परिमुच्य शम्बरं तथाऽन्धकं स त्वरितोऽभ्यधावत् ॥ ५२ तमापतन्तं परिघेण भूयः समानमूर्ध्नि तदान्धकोऽपि । स ताडितोऽग्निर्दितिजेश्वरेण भयात् प्रदुद्राव रणाजिराद्धि ॥ ५३ ततोऽन्धको मारुतचन्द्रभास्करान् साध्यान् सरुद्राश्विवसून् महोरगान् । यान् या शरेण स्पृशते पराक्रमी पराङ्मुखांस्तान् कृतवान् रणाजिरात् ॥ ५४ विजित्यामरसैन्यमुग्रं सैन्द्रं सरुद्रं सयमं ससोमम् । संपूज्यमान दनुपुंगवैस्तु आसाद्य जगत्समग्रं तत्र तदाऽन्धको भूमिमुपाजगाम ॥ ५५ भूमिं करदान् नरेन्द्रान् कृत्वा वशे स्थाप्य चराचरं च । प्रविवेश धीमान् पातालमग्र्यं पुरमश्मकाम् ॥ ५६ स्थितस्यापि महासुरस्य गन्धर्वविद्याधरसिद्धसंघाः I सहाप्सरोभिः परिचारणाय पातालमभ्येत्य समावसन्त ॥ ५७ युद्ध और अन्धककी विजय ५७ शम्बरके उस शब्दको सुनकर क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले दैत्येश्वरने कहा - अरे! यह क्या है? युद्धमें मय और शम्बरको किसने जीता है? इसपर दैत्ययोद्धाओंने अन्धकसे कहा – अग्निदेव इनको जला रहे हैं । आप जाकर उनकी रक्षा करें । आपके अतिरिक्त दूसरा कोई भी अग्निको नहीं रोक सकता । नारदजी! दैत्योंके ऐसा कहनेपर हिरण्याक्षपुत्र शीघ्रता से परिघ उठाकर ' ठहरो - ठहरो ' – कहता हुआ अग्निकी ओर दौड़ पड़ा । अन्धकके वचनको सुनकर अव्ययात्मा अग्निदेवने अत्यन्त क्रोधसे उस दैत्यको शीघ्र ही उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया । उसके बाद अन्धक अग्निके पास पहुँचा ॥ ४८ – ५१ ॥ उसने श्रेष्ठ अस्त्रके द्वारा अग्निके सिरपर प्रहार किया । इस प्रकार आहत अग्निदेव शम्बरको छोड़कर तत्काल अन्धककी ओर दौड़े । अन्धकने आते हुए अग्निदेवके सिरपर पुनः परिघसे प्रहार किया । अन्धकद्वारा ताडित अग्निदेव भयभीत हो रणक्षेत्रसे भाग गये । उसके बाद पराक्रमी अन्धक वायु, चन्द्र, सूर्य, साध्य, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसु और महानागोंमें जिन - जिनको बाणसे स्पर्श करता था, वे सभी युद्धभूमिसे पराङ्मुख हो जाते थे । इस प्रकार इन्द्र, रुद्र, यम, सोमसहित देवताओंकी उग्र सेनाको जीतकर अन्धक श्रेष्ठ दानवोंके द्वारा पूजित होकर पृथ्वीपर आ गया । वहाँ वह बुद्धिमान् दैत्य सभी राजाओंको अपना करद ( सामन्त ) बना करके तथा समस्त चराचर जगत्‌को वशमें कर पातालमें स्थित अपने अश्मक नामक उत्तम नगरमें चला गया । वहाँ उस महासुर अन्धककी सेवा करनेके लिये अप्सराओंके साथ सभी प्रमुख गन्धर्व, विद्याधर एवं सिद्धोंके समूह पातालमें आकर निवास करने लगे ॥ ५२-५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १० ॥

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५८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११ ग्यारहवाँ अध्याय सुकेशिकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन नारद उवाच

यदेतद् भवता प्रोक्तं सुकेशिनगरोऽम्बरात् ।

पातितो भुवि सूर्येण तत्कदा कुत्र कुत्र च ॥

सुकेशीति च कश्चासौ केन दत्तः पुरोऽस्य च ।

किमर्थं पातितो भूम्यामाकाशाद् भास्करेण हि ॥

पुलस्त्य उवाच

शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् ।

यथोक्तवान् स्वयम्भूर्मां कथ्यमानां मयाऽनघ ॥

आसीन्निशाचरपतिर्विद्युत्केशीति विश्रुतः ।

तस्य पुत्रो गुणज्येष्ठः सुकेशिरभवत्ततः ॥

तस्य तुष्टस्तथेशानः पुरमाकाशचारिणम् ।

प्रादादजेयत्वमपि शत्रुभिश्चाप्यवध्यताम् ॥

स चापि शंकरात् प्राप्य वरं गगनगं पुरम् ।

रेमे निशाचरैः सार्द्धं सदा धर्मपथि स्थितः ॥

स कदाचिद् गतोऽरण्यं मागधं राक्षसेश्वरः ।

तत्राश्रमांस्तु ददृशे ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥

महर्षीन् स तदा दृष्ट्वा प्रणिपत्याभिवाद्य च ।

प्रत्युवाच ऋषीन् सर्वान् कृतासनपरिग्रहः ॥

सुकेशिरुवाच

प्रष्टुमिच्छामि भवतः संशयोऽयं हृदि स्थितः ।

कथयन्तु भवन्तो मे न चैवाज्ञापयाम्यहम् ॥

किंस्विच्छ्रेयः परे लोके किमु चेह द्विजोत्तमाः ।

केन पूज्यस्तथा सत्सु केनासौ सुखमेधते ॥

पुलस्त्य उवाच

इत्थं सुकेशिवचनं निशम्य परमर्षयः ।

प्रोचुर्विमृश्य श्रेयोऽर्थमिह लोके परत्र च ॥

ऋषय ऊचुः

श्रूयतां कथयिष्यामस्तव राक्षसपुंगव ।

यद्धि श्रेयो भवेद् वीर इह चामुत्र चाव्ययम् ॥

नारदजीने ( पुलस्त्यजीसे ) पूछा- आपने जो यह कहा है कि सूर्यने सुकेशीके नगरको आकाशसे १ पृथ्वीपर गिरा दिया था तो यह घटना कब और कहाँ हुई थी? सुकेशी नामका वह कौन व्यक्ति था? उसे वह नगर किसने दिया था और भगवान् सूर्यने उसे २ आकाशसे पृथ्वीपर क्यों गिरा दिया? ॥ १-२ ॥ पुलस्त्यजी बोले- निष्पाप नारदजी! यह कथा बहुत पुरानी है; आप इसे सावधानीसे सुनिये । ब्रह्माजीने ३ जैसे यह कथा मुझे सुनायी थी, वैसे ही इसे मैं आपको सुना रहा हूँ । पहले विद्युत्केशी नामसे प्रसिद्ध राक्षसोंका ४ एक राजा था । उसका पुत्र सुकेशी गुणोंमें उससे भी बढ़कर था । उसपर प्रसन्न होकर शिवजीने उसे एक आकाशचारी नगर और शत्रुओंसे अजेय एवं अवध्य ५ होनेका वर भी दिया । वह शंकरसे आकाशचारी श्रेष्ठ नगर पाकर राक्षसोंके साथ सदा धर्मपथपर रहते हुए ६ विचरने लगा । एक समय मगधारण्यमें जाकर उस राक्षसराजने वहाँ ध्यान - परायण ऋषियोंके आश्रमोंको ७ देखा । उस समय महर्षियोंको देखकर अभिवादन और प्रणाम किया । फिर एक जगह बैठकर उसने समस्त ८ ऋषियोंसे कहा -॥३–८ ॥ सुकेशि बोला- मैं आपलोगोंको आदेश नहीं दे रहा हूँ; बल्कि मेरे हृदयमें एक संदेह है, उसे मैं ९ आपसे पूछना चाहता हूँ । आप मुझको उसे बतलाइये । द्विजोत्तमो! इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी क्या है? मनुष्य सज्जनोंमें कैसे पूज्य होता है और उसे १० सुखकी प्राप्ति कैसे होती है? ॥९ -१० ॥ पुलस्त्यजी बोले- सुकेशीके इस प्रकारके वचनको सुनकर श्रेष्ठ ऋषियोंने विचारकर उससे इस ११ लोक और परलोकमें कल्याणकारी बातें कहीं ॥११ ॥

ऋषिगण बोले- वीर राक्षस श्रेष्ठ! इस लोक १२ | और परलोकमें जो अक्षय श्रेयस्कर वस्तु है, उसे हम तुमसे

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अध्याय ११ ] सुकेशिकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश,

श्रेयो धर्मः परे लोके इह च क्षणदाचर ।

तस्मिन् समाश्रितः सत्सु पूज्यस्तेन सुखी भवेत् ॥ १३

सुकेशिरुवाच

किं लक्षणो भवेद् धर्मः किमाचरणसत्क्रियः ।

यमाश्रित्य न सीदन्ति देवाद्यास्तु तदुच्यताम् ॥ १४ ।

ऋषय ऊचुः

देवानां परमो धर्मः सदा यज्ञादिकाः क्रियाः ।

स्वाध्यायवेदवेतृत्वं विष्णुपूजारतिः स्मृता ॥ १५

दैत्यानां बाहुशालित्वं मात्सर्यं युद्धसत्क्रिया ।

वेदनं नीतिशास्त्राणां हरभक्तिरुदाहृता ॥ १६

सिद्धानामुदितो धर्मो योगयुक्तिरनुत्तमा ।

स्वाध्यायं ब्रह्मविज्ञानं भक्तिर्द्वाभ्यामपि स्थिरा ॥ १७ ।

उत्कृष्टोपासनं ज्ञेयं नृत्यवाद्येषु वेदिता ।

सरस्वत्यां स्थिरा भक्तिर्गान्धर्वो धर्म उच्यते ॥ १८ ।

विद्याधरत्वमतुलं विज्ञानं पौरुषे मतिः ।

विद्याधराणां धर्मोऽयं भवान्यां भक्तिरेव च ॥ १ ९

गन्धर्वविद्यावेदित्वं भक्तिर्भानौ तथा स्थिरा ।

कौशल्यं सर्वशिल्पानां धर्मः किम्पुरुषः स्मृतः ॥ २०

ब्रह्मचर्यममानित्वं योगाभ्यासरतिर्दृढा ।

सर्वत्र कामचारित्वं धर्मोऽयं पैतृकः स्मृतः ॥ २१ ।

ब्रह्मचर्यं यताशित्वं जप्यं ज्ञानं च राक्षस ।

नियमाद्धर्मवेदित्वमार्षो धर्मः प्रचक्ष्यते ॥ २२

स्वाध्यायं ब्रह्मचर्यं च दानं यजनमेव च ।

अकार्पण्यमनायासं दया हिंसा क्षमा दमः ॥ २३

जितेन्द्रियत्वं शौचं च माङ्गल्यं भक्तिरच्युते ।

शंकरे भास्करे देव्यां धर्मोऽयं मानवः स्मृतः ॥ २४

धनाधिपत्यं भोगानि स्वाध्यायं शंकरार्चनम् ।

अहंकारमशौण्डीयं धर्मोऽयं गुह्यकेष्विति ॥ २५

परदारावमर्शित्वं पारक्येऽर्थे च लोलता ।

स्वाध्यायं त्र्यम्बके भक्तिर्धर्मोऽयं राक्षसः स्मृतः ॥ २६

अविवेकमथाज्ञानं शौचहानिरसत्यता ।

पिशाचानामयं धर्मः सदा चामिषगृध्नुता ॥ २७

योनयो द्वादशैवैतास्तासु धर्माश्च राक्षस ।

ब्रह्मणा कथिताः पुण्या द्वादशैव गतिप्रदाः ॥ २८ ।

देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन ५ ९ कहते हैं, उसे सुनो । निशाचर! इस लोक और परलोकमें धर्म ही कल्याणकारी है । उसमें स्थित रहकर व्यक्ति सज्जनोंमें आदरणीय एवं सुखी होता है ॥ १२-१३ ॥ सुकेशि बोला - धर्मका लक्षण ( परिचय ) क्या है? उसमें कौन - से आचरण एवं सत्कर्म होते हैं,

जिनका आश्रय लेकर देवादि कभी दुःखी नहीं होते ।

आप उसका वर्णन करें ॥१४ ॥

ऋषियोंने कहा— सदा यज्ञादि कार्य, स्वाध्याय, वेदज्ञान और विष्णुपूजामें रति – ये देवताओंके शाश्वत परम धर्म हैं । बाहुबल, ईर्ष्याभाव, युद्धकार्य, नीतिशास्त्रका ज्ञान और हर - भक्ति - ये दैत्योंके धर्म कहे गये हैं । श्रेष्ठ योगसाधन, वेदाध्ययन, ब्रह्मविज्ञान तथा विष्णु और शिव - इन दोनोंमें अचल भक्ति - ये सब सिद्धोंके धर्म कहे गये हैं । ऊँची उपासना, नृत्य और वाद्यका ज्ञान तथा सरस्वतीके प्रति निश्चल भक्ति – ये गन्धर्वोके धर्म कहे जाते हैं ॥ १५–१८ ॥ अद्भुत विद्याका धारण करना, विज्ञान, पुरुषार्थकी बुद्धि और भवानीके प्रति भक्ति - ये विद्याधरोंके धर्म हैं । गन्धर्वविद्याका ज्ञान, सूर्यके प्रति अटल भक्ति और सभी शिल्प - कलाओंमें कुशलता - ये किम्पुरुषोंके धर्म माने जाते हैं । ब्रह्मचर्य, अमानित्व ( अभिमानसे बचना ) योगाभ्यासमें दृढ़ प्रीति एवं सर्वत्र इच्छानुसार भ्रमण-ये पितरोंके धर्म कहलाते हैं । राक्षस! ब्रह्मचर्य, नियताहार, जप, आत्मज्ञान और नियमानुसार धर्मज्ञान – ये ऋषियोंके धर्म कहे जाते हैं । स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, उदारता, विश्रान्ति, दया, अहिंसा, क्षमा, दम, जितेन्द्रियता, शौच, माङ्गल्य तथा विष्णु, शिव, सूर्य और दुर्गादेवीमें भक्ति - ये मानवोंके ( सामान्य ) धर्म हैं ॥ १ ९ –२४ ॥ धनका स्वामित्व, भोग, स्वाध्याय, शिवजीकी पूजा, अहंकार और सौम्यता – ये गुह्योंके धर्म हैं । परस्त्रीगमन, दूसरेके धनमें लोलुपता, वेदाध्ययन और शिवभक्ति - ये राक्षसोंके धर्म कहे गये हैं । अविवेक, अज्ञान, अपवित्रता, असत्यता एवं सदा मांस भक्षणकी प्रवृत्ति – ये पिशाचोंके धर्म हैं । राक्षस! ये ही बारह योनियाँ हैं । पितामह ब्रह्माने उनके ये बारह गति देनेवाले धर्म कहे हैं ॥ २५—२८ ॥

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६० सुकेशिरुवाच

भवद्भिरुक्ता ये धर्माः शाश्वता द्वादशाव्ययाः ।

तत्र ये मानवा धर्मास्तान् भूयो वक्तुमर्हथ ॥

ऋषय ऊचुः

शृणुष्व मनुजादीनां धर्मोऽस्तु क्षणदाचर ।

ये वसन्ति महीपृष्ठे नरा द्वीपेषु सप्तसु ॥

योजनानां प्रमाणेन पञ्चाशत्कोटिरायता ।

जलोपरि महीयं हि नौरिवास्ते सरिज्जले ॥

तस्योपरि च देवेशो ब्रह्मा शैलेन्द्रमुत्तमम् ।

कर्णिकाकारमत्युच्चं स्थापयामास सत्तम ॥

तस्येमां निर्ममे पुण्यां प्रजां देवश्चतुर्दिशम् । स्थानानि द्वीपसंज्ञानि कृतवांश्च प्रजापतिः

तत्र मध्ये च कृतवाञ्जम्बूद्वीपमिति श्रुतम् ।

तल्लक्षं योजनानां च प्रमाणेन निगद्यते ॥

ततो जलनिधी रौदो बाह्यतो द्विगुणः स्थितः । तस्यापि द्विगुणः प्लक्षो बाह्यतः संप्रतिष्ठितः ततस्त्विक्षुरसोदश्च बाह्यतो बलयाकृतिः । द्विगुणः शाल्मलिद्वीपो द्विगुणोऽस्य महोदधेः सुरोदो द्विगुणस्तस्य तस्माच्च द्विगुणः कुशः । घृतोदो द्विगुणश्चैव कुशद्वीपात् प्रकीर्तितः घृतोदाद् द्विगुणः प्रोक्तः क्रौञ्चद्वीपो निशाचर । ततोऽपि द्विगुणः प्रोक्तः समुद्रो दधिसंज्ञितः समुद्राद् द्विगुणः शाकः शाकाद् दुग्धाब्धिरुत्तमः । द्विगुणः संस्थितो यत्र शेषपर्यङ्कगो हरिः । एते च द्विगुणाः सर्वे परस्परमपि स्थिताः चत्वारिंशदिमाः कोट्यो लक्षाश्च नवतिः स्मृताः योजनानां राक्षसेन्द्र पञ्च चातिसुविस्तृताः जम्बूद्वीपात् समारभ्य यावत्क्षीराब्धिरन्ततः

तस्माच्च पुष्करद्वीपः स्वादूदस्तदनन्तरम् ।

कोट्यश्चतस्त्रो लक्षाणां द्विपञ्चाशच्च राक्षस ॥

पुष्करद्वीपमानोऽयं तावदेव तथोदधिः । लक्षमण्डकटाहेन समन्तादभिपूरितम्

एवं द्विपास्त्विमे सप्त पृथग्धर्माः पृथक्क्रियाः ।

गदिष्यामस्तव वयं शृणुष्व त्वं निशाचर ॥

प्लक्षादिषु नरा वीर ये वसन्ति सनातनाः शाकान्तेषु न तेष्वस्ति युगावस्था कथंचन श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११ सुकेशिने कहा- आपलोगोंने जो शाश्वत एवं अव्यय बारह धर्म बताये हैं, उनमें मनुष्योंके धर्मोको २ ९ एक बार पुनः कहनेकी कृपा करें ॥ २ ९ ॥ ऋषियोंने कहा – निशाचर! पृथ्वीके सात द्वीपोंमें निवास करनेवाले मनुष्य आदिके धर्मोंको सुनो । यह ३० पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली है और यह ३१ नदीमें नावके समान जलपर स्थित है । सज्जन श्रेष्ठ! उसके ऊपर देवेश ब्रह्माने कर्णिकाके आकारवाले अत्यन्त ३२ ऊँचे सुमेरुगिरिको स्थापित किया है । फिर उसपर ब्रह्माने चारों दिशाओंमें पवित्र प्रजाका निर्माण किया और द्वीप-|| ३३ नामवाले अनेक स्थानोंकी भी रचना की है ॥ ३०–३३ ॥ उनके मध्यमें उन्होंने जम्बूद्वीपकी रचना की । ३४ इसका प्रमाण एक लक्ष योजनका कहा जाता है । उसके बाहर दुगुना परिमाणमें लवण - समुद्र है तथा उसके बाद ॥ ३५ । उसका दुगुना प्लक्षद्वीप है । उसके बाहर दुगुने प्रमाणवाला बलयाकार इक्षुरस - सागर है । इस महोदधिका दुगुना ॥ ३६ शाल्मलिद्वीप है । उसके बाहर उससे दुगुना सुरासागर है तथा उससे दुगुना कुशद्वीप है । कुशद्वीपसे दुगुना ॥ ३७ घृतसागर है ॥ ३४–३७ ॥ निशाचर! घृतसागरसे दुगुना क्रौंचद्वीप कहा गया ॥ ३८ है तथा उससे दुगुना दधिसमुद्र है । दधिसागरसे दुगुना शाकद्वीप है और शाकद्वीपसे द्विगुण उत्तम क्षीरसागर है जिसमें शेषशय्यापर सोये श्रीहरि स्थित हैं । ये सभी ॥ ३ ९ । परस्पर एक - दूसरेसे द्विगुण प्रमाणमें स्थित हैं । राक्षसेन्द्र! । जम्बूद्वीपसे लेकर क्षीरसागरके अन्ततकका विस्तार ॥ ४० चालीस करोड़ नब्बे लाख पाँच योजन है ॥ ३८–४० ॥ राक्षस! उसके बाद पुष्करद्वीप एवं तदनन्तर ४१ स्वादु जलका समुद्र है । पुष्करद्वीपका परिमाण चार करोड़ बावन लाख योजन है । उसके चारों ओर उतने ॥ ४२ ही परिमाणका समुद्र है । उसके चारों ओर लाख । योजनका अण्डकटाह है । इस प्रकार वे सातों द्वीप भिन्न धर्मों और क्रियावाले हैं । निशाचर! हम उनका ४३ ॥ वर्णन करते हैं । तुम उसे सुनो । वीर! प्लक्षसे शाकतकके । द्वीपोंमें जो सनातन ( नित्य ) पुरुष निवास करते हैं, ॥ ४४ । उनमें किसी प्रकारकी युग - व्यवस्था नहीं है ।