वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 931–938
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 931–938
पृष्ठ 931
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वार्थपारिजातः ६०१ केचिन्मन्त्रा भाषिकेण स्वरेण ब्राह्मण उपदिष्टाः । मन्त्रसमाम्नाये च स्वर्येण पठिताः । यथा-- ' इमामगृभ्णत् ' stra | कः पुनर्भाषिकस्वरः? उच्यते- ' छन्दोगा बह्वचाश्चैव तथा वाजसनेयिनः । उच्चनीचस्वरं प्राहुः स वै भाषिक उच्यते ॥ ' अर्थात् छन्दोगा बह्वचा वाजसनेयिनश्च उच्चनीचस्वरमुदात्तानुदात्तस्वरं भाषिकं स्वरं प्राहुः । तथा च यथा इरापदस्योपदेशात् कर्मकाले गिरापदस्य निवृत्तिर्भवति, तथा स्वरान्तरोपदेशात् प्रावचनमन्त्रप्रवचन-ani स्वयंप्रतिषेधो ज्ञेयः । ' मन्त्रोपदेशो वा भाषिकस्य प्रायापतेर्भाषिकश्रुति: ' ( मी ० सू ० १२/३/२१ ) इदं सिद्धान्तसूत्रम् । अर्थाद् ब्राह्मणे मन्त्रस्योपदेशो न स्वरस्य ' इत्यश्वाभिधानीमादत्ते ' इत्युक्तत्वात् । ननु तर्हि कस्माद् भाषिकस्वरो दृश्यते तत्रेति चेत्तत्रोच्यते -- प्रायापत्तेर्भाषिकश्रुतिः ब्राह्मणे भाषास्वरः प्रवर्तते । तन्मध्ये यदि मन्त्राम्नायप्रवचनगत-स्वर्येण पठ्यते तदा भाषिकस्वरसन्तानो विच्छिद्येत, तस्मान्नात्र भाषिकस्वरोपदेशः । तस्माज्जपादिमन्त्रेषु मन्त्र + समानासिद्धस्वर एव प्रयोक्तव्यः । कात्यायन श्रौतसूत्रेऽपि ' मन्त्रे स्वरक्रिया यथाम्नात्तमविशेषात् ' ( १/८/१६ ), ' भाषिकस्वरो वा ' ( १८/१७ ), ' तानो वा नित्यत्वात् ' ( १ | ८ | १८ ) इति सूत्रैर्यज्ञे प्रयुक्तमन्त्रेषु मन्त्राम्नायगत स्वयं-प्रयोगो ब्राह्मणगतो भाषिकस्वरो वा प्रयोक्तव्य इति विचार्य तानस्वर उक्तः । एकश्रुतिस्तानः । उदात्तादिस्वर-सामान्याभाव एकश्रुतिः, याज्यादिप्रयोगेऽन्यासम्भवात् । कुतः? नित्यत्वात् मन्त्रस्वरूपवर्णोच्चारणादिना भूतत्वात् । ' जुष्टापिते च छन्दसि ' ( पा ० सू ० ६११ / २० ९ ), ' नित्यं मन्त्रे ' ( पा ० सू ० ६।१।२१० ) इत्यादिप्रमाणे-छन्दोवाच्ये ब्राह्मणे विकल्पेनाद्युदात्तो ' नित्यं मन्त्र ' इत्यनेन छन्दसो मन्त्रभिन्ने भागे आद्युदात्तविधानात् । मन्त्र-froad भागस्वर एव भाषिकस्वर इति वाचस्पत्यकोषः । न च सामान्यभाषायां जुष्टार्पिते व छन्दसीति स्वरः विधानं भवति, छन्दस्त्वाभावात् । स्वरो ० ' इस सूत्र में पूर्वपक्ष के रूप में यह अर्थ उपस्थापित किया गया है कि कुछ मन्त्र भाषिक स्वर के द्वारा ब्राह्मणों में उपदिष्ट हैं और मन्त्र समाम्नाय में इनका पाठ तीनों स्वरों में होता है । जैसे कि ' इमामगृभ्णन् ' इस मन्त्र का अवध में पाठ भाषिक स्वर से और मन्त्र समाम्नाय में तीनों स्वरों से होता है । प्रश्न होता है कि यह भाषिक स्वर क्या है? इसका उत्तर है- ' सामवेदी, ॠग्वेदी और वाजसनेयी शाखा के अध्येतागण उच्च - नीच स्वर को ही भाषिक स्वर के नाम से कहते हैं । उच्चनीच स्वर का तात्पर्य यहाँ पर उदात्त और अनुदात्त स्वर से है । इस प्रकार जैसे ' इरा ' पद के उपदेश से कर्म करते समय ' गिरा ' पद का उच्चारण निवृत्त हो जाता है, उसी तरह से स्वरान्तर के उपदेश से प्रवचन के समय किये गये स्वयं की निवृत्ति समझ लेनी चाहिये । ' मन्त्रोपदेशो वा ० ' यह सिद्धान्त सूत्र है । इसका अर्थ यह है कि ब्राह्मण में मन्त्र का उपदेश किया गया है, स्वर का नहीं । ' इस मन्त्र से अश्वाभिवानी का ग्रहण करते हैं ऐसा ब्राह्मण वाक्य है । प्रश्न होता है कि तब वहाँ पर भाषिक स्वर का विधान कैसे होता है? इसका उत्तर है कि ब्राह्मण में भाषा स्वर की प्रवृत्ति प्रायिक आधार पर होती है । अर्थात् ब्राह्मण का स्वर प्रायः भाषिक ही होता है । उसके बीच में यदि मन्त्रान्नाय प्रवचनगत स्वर्य का पाठ किया जाय तो भाषिक स्वरसन्तान विच्छिन्न हो जायगा । इसलिये यहाँ पर भाषिक स्वर का उपदेश नहीं किया गया है । अत: जपादि मन्त्रों में मन्त्र समाम्नाय में सिद्ध स्वर का ही प्रयोग करना चाहिये । कात्यायन श्रौतसूत्र में भी ' मन्त्रे स्वरक्रिया ० ', ' भाषिकस्वरी वा ', ' तानो वा नित्यत्वात् ' इत्यादि सूत्रों से यश में प्रयुक्त मन्त्रों के लिये मन्त्रान्नायगत वैस्वर्य का अथवा ब्राह्मणगत भाषिक स्वर का प्रयोग करना चाहिये, ऐसा विचार उपस्थापित करके अन्त तान स्वर का विधान किया गया है | एकश्रुति स्वर तान कहलाता है | एकश्रुति वहाँ होती है, जहाँ कि उदात्तावि स्वरसामान्य का अभाव होता है । याज्यादि के प्रयोग और कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि यह नित्य है, मन्त्र के स्वरूप और उच्चारण आदि का वह निश्चय हो चुका है । ' जुष्टापिते च छन्दसि ', ' नित्यं मन्त्रे ' इत्यादि पाणिनि सूत्रों के प्रमाण पर छन्दपद से कहे जाने वाले ब्राह्मण में विकल्प से आबुदात्त का और ' नित्यं मन्त्रे ' इस सूत्र से छन्द के मन्त्रभिन्न भाग में आद्युदात्त का विधान है । मन्त्र free वेदभागीय स्वर ही भाषिक स्वर कहलाता है, छन्दसि ' इस सूत्र के आधार पर स्वर का विधान नहीं हो सकता, यह वाचस्पत्य कोश का कथन है । सामान्य भाषा में जुष्टापि ' च afe as पर छन्दस्त्व का अभाव है ।
पृष्ठ 932
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६०२ शुक्लयजुः प्रातिशाख्ये प्रतिज्ञासूत्र परिशिष्टे ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इत्युक्तम् । तत्राद्यो भागः कर्माङ्गभूतद्रव्यदेवतास्मारकः, मन्त्रेण स्मृतं कर्म कर्तव्यमिति नियमार्थवचनम् । ' मन्त्रान्तः कर्मादिः सान्निपात्योऽभि-घानात् ' इति कल्पदुक्तेो । मन्त्रभागः संहितारूपः । तत्रापि ' वसन्ताय कपिञ्जलानालभते ' ( वा ० सं ० ३४।२० ) इत्यादिषु न मन्त्रत्वम् | ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम् ' ( वा ० सं ० ३०१५ ) इत्यादिब्राह्मणाध्यायद्वयस्य ब्राह्मणत्वमेवेत्याचार्यैरुक्त-त्वात् । तथापि मन्त्रान्तर्गतत्वान्मन्त्रधर्मा एव सर्वे भवन्ति । तथैव ब्राह्मणान्तर्गत मन्त्रभागानामपि ब्राह्मणधर्मा एव भवन्ति । ब्राह्मणभागो विधिनिषेधार्थवादनामधेयरूपो भवति । शुक्लयजुः प्रातिशाख्येऽष्टमेऽध्याये ' शुचिना ' ( १७ ), ' शुचौ देशे ' ( १८ ) इति सूत्राभ्यां शुचिता त्रैर्वाणकेन यथावदुपनीतेन स्मार्तशीचाचारवता ' शूद्रपतितयोरसंश्रावं स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' ( १ ९ ) चतुर्थपतितयोर्यथा संश्रवं न स्यात्तथा स्वाध्यायो s ध्येतव्य इत्युक्तम्, स्वाध्याये मन्त्रब्राह्मणसमुदायरूपे स्वरप्रक्रिया चोक्ता । ' तस्मिन् शुक्ले याजुषाम्नाये माध्यन्दिनीयके मन्त्रे स्वरप्रक्रिया ' ( ३ ) ( प्रतिज्ञापरिशिष्टे ) इत्यादिभिः पूर्व मन्त्रे सोता | ' स्वर -संस्कारयोश्छन्दसि नियम: ' इति प्रातिशाख्यसूत्रेण छन्दसि स्वरसंस्कारयोनियमः । स्वरा उदात्तादयः, संस्कारा वर्णागमा-देशलोपविकारप्रकृतिभावप्रभृतयः । अत एव न मन्त्रब्राह्मणाभ्यां वेदभागाभ्यामन्यत्र स्वरप्रक्रिया दृश्यते । अस्मिन् ग्रन्थे कात्यायनेन महर्षिणा विशेषेण माध्यन्दिनीयशाखायाः स्वराः प्रोक्ताः । मध्यन्दिनसंज्ञेन लब्धो याज्ञवल्क्याच्छाखा-विशेषो माध्यन्दिनीयः । तमधीयते विदन्ति वा ते माध्यन्दिनीया उच्यन्ते । ' उच्चैरुदात्तः ' ( पा ० सू ० १ / २ / २ ९ ), ' नीचैरनुदात्त: ' ( पा ० सू ० १/२/३० ) इत्यादिभिरुदात्तादिलक्षणान्युक्तानि । ' हृद्यनुदात्त: ' ( ४ ), मृयुदात्त: ' ( ५ ), ' श्रुतिमूले स्वरितः ' ( ६ ) इत्यादिभिर्हस्तस्वरा निर्दिष्टाः । तत्रैव एवं जात्यादयोऽभिहिताः ' ( ७ ) ' जात्यः क्षेत्रोऽभि-निहितस्तै व्यञ्जन एव च । तैरोविरामः प्रश्लिष्टः पादवृत्तश्च सप्तमः || ' इत्यादिनारदोक्ताः । तत्रैव - ' ब्राह्मणे शुक्ल यजुर्वेद के प्रातिशाख्य के प्रतिज्ञासूत्र नामक परिशिष्ट में ' मन्त्र और ब्राह्मण का नाम वेद हैं ' ऐसा कहा गया है । इनमें पहला मन्त्रभागकर्म के अंगभूत द्रव्य और देवता का स्मारक है । यह वचन इसलिये है कि मन्त्र के द्वारा स्मरण करके ही किसी कर्म at fare किया जाय । किसी कल्पकार ने कहा भी है कि मन्त्रभाग से कर्म के अंगभूत सन्निपत्योपकारक द्रव्य - देवतादि का स्मरण किया जाता है । मन्त्रभाग संहिता के रूप में उपलब्ध है । इनमें भी ' वसन्ताय ० ' इस तरह के वाक्य मन्त्र नहीं कहलाते, क्योंकि आचार्यों ने बताया है कि ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम् ' इत्यादि दो अध्याय ब्राह्मणभाग के अन्तर्गत आते हैं । तो भी इनका पाठ मन्त्रभाग के बीच में किया गया है, अतः सभी ant का विधान इनके लिये भी होता है । इसी तरह से ब्राह्मणभाग के अन्तर्गत आने वाले मन्त्रभागों में भी ब्राह्मणभाग गत धर्मों का ही विधान होगा । यह तो स्पष्ट ही हैं कि ब्राह्मणभाग विधि, निषेध, अर्थवाद, नामधेय आदि विभागों में बंटा हुआ है । शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य के आठवें अध्याय में ' शुचिना ', ' शुचौ देशे ' इन दो सूत्रों में बताया गया है कि पवित्र त्रैवर्णिक को, जिसका for faarat उपनयन संस्कार हो गया है, स्मार्त शौच और आचार का पालन करते हुए चतुर्थ वर्ण शूद्र और पति को जो न सुनाई पड़े, इस तरह से स्वाध्याय अर्थात् अपनी शाखा का अध्ययन करना चाहिये । स्वाध्याय मन्त्र और ब्राह्मणभाग को मिला कर पूरा होता है । इसमें स्वर प्रक्रिया भी संनिविष्ट है । प्रतिज्ञा परिशिष्ट में पहले मन्त्रभाग के लिये शुक्ल यजुर्वेद के आम्नाय में माध्यन्दिनीय शाखा के मन्त्रों की स्वर प्रक्रिया बताई गई है । ' स्वरमंस्कारयोनियम: ' इस प्रातिशाख्य सूत्र के अनुसार छन्द में हो स्वर और संस्कार का नियम माना गया है । उदात्तादि स्वर और वर्णों के आगम, आदेश, लोप, विकार, प्रकृतिभाव प्रभृति संस्कार कहे जाते हैं । इसीलिये वेद के भाग मन्त्र और ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं स्वरप्रक्रिया के दर्शन नहीं होते । इस ग्रन्थ में महर्षि कात्यायन ने विशेष रूप से माध्यन्दिनीय शाखा के स्वरों का वर्णन किया है । मध्यन्दिन नाम के शिष्य ने याज्ञवल्क्य से जिस शाखा विशेष को प्राप्त किया, वह माध्यन्दिनीय कहलाती है । इसका अध्ययन करने वाले और इसको समझने वाले भी माध्यन्दिनीय कहलाते हैं । ' उच्चैरुदात्तः ' इत्यादि से उदात्तादि स्वरों के लक्षण बताये गये हैं । ' हृद्यनुदात्तः ' इत्यादि सूत्रों से उच्चारण के साथ हाथ के संकेतों से उदात्तादि स्वरों का निर्देश किया गया है । वहीं पर ' एवं जात्यादयोऽभिहिता: ' इस सूत्र के द्वारा नारद के द्वारा उपदिष्ट: जात्य, क्षेत्र, अभिनिहित, तैरोव्यंजन, तैरोविराम, प्रश्लिष्ट और पादवृत्त इन सात स्वरों का भी वर्णन किया गया है । वहीं पर ब्रह्म
पृष्ठ 933
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
anurates ६०३ तदात्तानुदात्ती भाषिकस्वरी ' ( ८ ) इति सूत्रेण ब्राह्मणभागे उदात्तानुदात्तौ भाषिकस्वरायुक्तो । प्रत्यासत्या शतपथे स्वराती, चरकाणां तु ब्राह्मणे, मन्त्रवत्स्वर्यमिति खाण्डकीयोखीयानाम्, चातुः स्वर्यमपि क्वचित् । बाष्कलादि -ब्राह्मणानां तानरूपैकस्वर्यमिति । साम्नां मन्त्रेऽपि सप्तस्वयं प्रातिशाख्येऽभिहितम् । यदुक्तम्- ' ब्राह्मणे भाषिकस्वरविधानाद् ब्राह्मणानां भाषात्वेनावेदत्वम् ' इति, तद्बालभाषितम्, ' स्वर-विशेषस्य भाषिक संज्ञाविधानविरोधात् भाषायां स्वरनियमाभावाच्च । छन्दस्येव तन्नियमस्योक्तत्वात् । सूत्रादिषु तानस्वरो विहितः । उदात्तादिस्वरसामान्याभावस्तानः । एकश्रुतिरित्यर्थः । यदुक्तम्- ' ब्राह्मणानां छन्दोभिस्तुल्यत्वात् तत्र स्वरप्रक्रिया न वेदत्वात् ' इति, तत्तुच्छम् ' तानस्वराणि छन्दोवत्सूत्राणि ( ९ ) इति कात्यायनपरिशिष्टविरोधात् । अत्र छन्दोवत् सूत्राणि भवन्तीति कृत्वा तत्र तानस्वरो विहितो न भाषिकस्वरः । ' तान एवाङ्गोपाङ्गानाम्, तान एवाङ्गोपाङ्गानाम् ' ( का ० प ० ३१२८ भाषिकपरिशिष्टे ) इति शिक्षा - कल्प - व्याकरण निरुक्त छन्दो - ज्योतिषादीनां तान उदात्तादिस्वररहित एकश्रुतिस्वरः । ra ya erfor परिशिष्टसूत्रे -- ' अथ ब्राह्मणस्वरसंस्कारनियम: ' ( १ ) इत्यस्य भाष्य उक्तम्- ' तथाहि वक्ष्यति --जात्याभिनिहित क्षैप्रप्रश्लिष्टाच्चेति सूत्रेण पूर्वसिद्धं जात्यादिकमनूद्य भाषिकसंज्ञाम्, तथा स्वरितानुदात्तौ चेति सूत्रेण पूर्वसिद्धस्वरितानुदात्तावनूद्य ब्राह्मण उदात्त विधास्यति । ' उक्तो मन्त्रस्वर: ' ( २ ), ' तेनात्र सिद्धम् ' ( ३ ) | मन्त्रस्वरलक्षणेन सिद्धं स्वरमनूद्य ब्राह्मणे स्वरलक्षणं विधीयत इति तत्रैवानानन्तदेवयाज्ञिकाचार्य: । ' उदात्तानुदात्ती भाषिकस्तत्सन्धि: ( ४ ) शुक्लयजुः प्रातिशाख्ये भाषिकपरिशिष्टसूत्रे उदात्तानुदात्तयोः सन्धिरेकवर्णरूपः, स भाषिकसंज्ञो भवति । यथा - अर्थमा आयुः भानौ मित्रो रुमायुः । ' अनुदात्तावन्तरेणोदात्तः ' areergarat भाषिकस्वरों ' इस सूत्र के द्वारा ब्राह्मण भाग के लिये उदात्त और अनुदात्त भाषिक स्वर का विधान है । प्रत्यासत्ति-न्याय से शतपथब्राह्मण में भी ये ही दोनों भाषिक स्वर है । चरकाचार्थो के ब्राह्मणों में तो मन्त्र भाग की तरह तीनों स्वरों का विधान है । खाण्डकीय और औखीय शाखाओं में ही यही नियम है । कहीं - कहीं चार स्वर भी विहित हैं । बाष्कलादि ब्राह्मणों में तान नाम का एक ही स्वर विहित है । प्रातिशाख्य में सामवेद के मन्त्रों के सात स्वरों का भी विवरण मिलता है । ' ब्राह्मण ग्रन्थों में वही स्वर प्रवृत्त हुआ है, जो साधारण भाषा में है, क्योंकि इसमें स्वरविशेष की भाषिक संज्ञा के अतः इनको वेद नहीं माना जा सक ar ' विधान का विरोध होगा । दूसरे भाषा में ( पृ ० १२८ ) | यह भी बच्चों की सी बात है, स्वर का नियम भी नहीं है । यह कहा जा चुका है कि वेद में ही स्वरों का नियम है । सूत्र प्रभृति के लिये ' तान ' स्वर का विधान है । उदात्त प्रभृति स्वरसामान्य का जहाँ अभाव रहता है, वहाँ तान स्वर माना जाता है । इसी का दूसरा नाम एकश्रुति स्वर है । ' ब्राह्मणभाग की दो भाग से समानता के आधार पर वहाँ स्वर प्रक्रिया का विधान है, इसका मतलब यह नहीं है ज्ञान स्वर वाले होते हैं ' समान सूत्र भी तान स्वर का विधान है, भाषिक स्वर कि इनको वेद मान लिया जाय ' यह कथन भी गलत है, क्योंकि ऐसा मानने पर ' छन्द के इस कात्यायन परिशिष्ट से विरोध होगा । यहाँ पर छन्द की समानता के आधार पर सूत्रों में का नहीं । भाषिक परिशिष्ट में बताया गया है कि वेदांग और उपांगों का निरुक, छन्द और ज्योतिष प्रभृति का उदात्तादि स्वर से भिन्न ' तान ' नाम का एकश्रुति स्वर होता है । ' तान ' स्वर होता है । इस प्रकार शिक्षा, कल्प, व्याकरण, इसीलिये भाषिक परिशिष्ट सूत्र के ' अथ ब्राह्मणस्वर ० ' इत्यादि सूत्र के भाष्य में कहा गया है ' जैसे कि ' जात्याभिनिहित ' इत्यादि सूत्र से पूर्वसिद्ध जात्यादि का अनुवाद कर भाषिक संज्ञा की तथा ' स्वरितानुदात्तों ' इत्यादि सूत्र से पूर्वसिद्ध स्वरित और अनुदात्त का अनुवाद कर ब्राह्मणों में उदात्त का विधान करेंगे । इसके बाद ' उक्तो मन्त्रस्वर: ', ' तेनात्र सिद्धम् ' इन सूत्रों के द्वारा मन्त्रों में स्वरलक्षण से सिद्ध स्वर का अनुवाद करके ब्राह्मणों में स्वर के लक्षण का विधान किया जाता है । इस भाष्य के कर्ता अनन्तदेव याज्ञिकाचार्य हैं । शुक्ल यजुः प्रातिशाख्य के भाषिक परिशिष्ट सूत्र में उदात्त और अनुदात्त के एक वर्ण रूप सन्धि स्वर को भाषिक स्वर कहा गया है । जैसे कि ' अर्थमा ' प्रभृति उदाहरणों में देखा जाता है । ' अनुदात्तावन्तरेणोदात्तः ', ' अनुदात्तोदात्तयोः पूर्वमेकदेश: ' इन
पृष्ठ 934
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
*** ( ६ ), ' अनुदात्तोदात्तयोः पूर्वमेकदेशः । तस्मिन् सत्युदात्तवानुदात्तः । एवं सुत्रकृदेकादेश सन्धिर्भाषिक संज्ञो भवती-त्युक्तवान् । क्वचिदपवादोऽपि भवतीत्यप्याह -- आप्रपूर्व आख्यातपरो न ' ( ७ ) आप्रपूर्व आख्यातपरश्रोदात्तानुदात्त-सन्धिर्भाषिकसंज्ञो न भवतीति । यथा ' आ ' अ प्रा: ', ' अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ', ' समासश्वानाख्यातपरो न आप्रपूर्वः । ' समासश्च अनाख्यातपरोऽपि न भाषिकसंज्ञो भवति । आ इष्ट एष्टा रायः । ' अपूर्व समासो नैव ' ( ९ ) अ इति ह्रस्वाकारपूर्वः समाससन्धिरपि भाषिकसंज्ञो न भवति । ' स तौ विश्वायुः | ' जात्याभिनिहित क्षेत्र प्रश्लिष्टाश्च ' ( १० ) जात्यादयश्चत्वारः स्वरिता भाषिकसंज्ञा भवन्ति । ' एकपदे नीचपूर्वसवो जात्यः ', ' एदोम्यामकारो लुगभिनिहितः । युवण यवो क्षेत्रः । इवर्ण उभयतो ह्रस्वः प्रश्लिष्टः । तत्र जात्यो यथा -- ' धान्यमसि ', ' भूर्भुवः स्वः सुप्रजा ' । अहिनिहितो यथा - ' प्रसवेऽश्वितो: ', ' पुष्णेऽग्नये ', ' वेदोऽसि । क्षेत्रो यथा -- ' व्यम्बकं यजामहे ', ' द्रवन्तः ', ' सर्पिरासुति: ' । प्रश्लिष्टो यथा- ' अभीन्धता मुखे ', ' दिवीद चक्षुः ' | अत्राप्यपवादाः सन्ति | ' उतो यो मोनो सोच ' ( ११ ) एतेषां पञ्चानामोकारो भाषिकसंज्ञो भवति । ' ओकेषाम् ' ( १२ ) एकेषामाचार्याणां मतेन ओकारश्च केवलो भाषिकसंज्ञो भवति --- इत्यादिना महता प्रपञ्चेन भाषिकस्वरविचारों दृश्यते भाषिकपरिशिष्टसूत्रे । तस्माद् भाषिकस्वरो भाषास्वरो भवतीति कथनं वक्तुरनभिज्ञतां द्योतयति । भाषिकस्वरो मन्त्रेऽपि भवति पूर्वोक्तस्थलेषु । तदेते श्लोका भवन्ति - ' उदात्तः स्वयंते नीचो नोच उच्च-स्वरो भवेत् । ब्राह्मणस्य स्वरो ह्येष ज्ञायते वेदपारगैः ॥ ' इति । यदुक्तम्- ' ब्राह्मणग्रन्थेषु मन्त्राणां प्रतीकोद्धरणेन न केवलं मन्त्राणां व्याख्यानं कृतमपि तु ऋषिदेवता-दयो s प्युक्ताः ' ( पृ ० १२८ ) इति, तदपि तुच्छम् तावता ब्राह्मणानामाधुनिकत्वे इतिहास - पुराण -गाथा- नाराशंस्यादी-सूत्रों के आधार पर पहले अनुदात्त और उदात्त का एक देश हो जाता है । ऐसा होने पर उदात्तवान् उदात्त हो जाता है । इस तरह से सूत्रकार कहते हैं कि आदेश सन्धि ही भाषिक संज्ञक स्वर कहलाता है । कहीं पर अपवाद भी होता है, इस बात को भी सूत्रकार ' पूर्व ' इत्यादि सूत्र से कहते हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि आ और प्र जिसके पूर्व में है और आख्यात बाद में है, वहाँ पर उदात्तादात्त सन्धिस्वरूप भाषिक स्वर नहीं होता । जैसे कि ' आ अ प्रा: ' इस उदाहरण में देखा जाता है । ' समासश्वा ० ' इस सूत्र के द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि आख्यात से भिन्न पद के आगे रहने पर भी समास में भाषिक स्वर नहीं होता । जैसे कि ' आ इष्ट एटा ' इत्यादि स्थलों में । वहीं पर ' अपूर्वच समासो नैव ' इस सूत्र में बताया गया है कि ह्रस्व अकार जिसके पूर्व में है, वहाँ समास सन्धि रहने पर भी भाषिक संज्ञक स्वर नहीं होता, जैसे कि स नो विश्वायुः । ' जात्याभिनिहित ० ' इत्यादि सूत्र से बताया गया है कि जात्य प्रभूति चार स्वरित भाषिक संज्ञक होते हैं | इसके बाद यहाँ पर ' एकपदे ' इत्यादि चार सूत्रों से जात्य, अभिनिहित, क्षेत्र और प्रश्लिष्ट स्वरों का लक्षण बताकर उनके उदाहरण दिये गये हैं । इसके भी अपवाद मिलते हैं । जैसे कि उतो यो मो मो और सो इनमें वर्तमान ओकार भाषिक स्वर वाला होता है और अन्य माचायों के मत से केवल ओकार भी भाषिक स्वर का होता है । इस तरह से यहाँ पर भाषिक परिशिष्ट सूत्र में बड़े विस्तार से भाषिक स्वर का विचार किया गया है । इन सब पर विचार करते हुए यह कहना कि भाषिक स्वर लौकिक भाषा में प्रयुक्त होने वाला स्वर है, केवल वक्ता को इस विषय की अनभिज्ञता को ही उजागर करता है, क्योंकि यहाँ हमने विस्तार से बताया है कि पूर्वोक्त उदाहरणों में मन्त्रों में भी भाषिक स्वर प्रयुक्त हुआ है । इस विषय का एक श्लोक यहाँ याद कर लेने लायक है जहाँ पर उदात्त स्त्रर अनुदात्त और अनुदात्त स्वर उदात्त हो जाता है, वेद के पारद्रष्टा विज्ञ जन इसी को ब्राह्मण का स्वर जानते हैं ' । ' ब्राह्मणादि ग्रन्थों में मन्त्रों के प्रतीकें देकर ' इति ' कहकर न केवल मन्त्रों का व्याख्यान ही किया है, प्रत्युत उनके ऋषि, देवता आदि भी दिये हैं ' ( पृ ० १२८ ) यह कथन भी तुच्छ है । में इतिहास, पुराण, गाथा, नाराशंसी प्रभूति अंशों की उपलब्धि होने से यदि इतने से ही ब्राह्मणों को आधुनिक माना जाय तो अथर्ववेद उसकी भी आधुनिकता माननी पड़ जायगी । दूसरे शब्दों में
पृष्ठ 935
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजाता नामप्यथर्ववेदे वर्णनात् तस्याधुनिकत्वापत्तेः शब्दान्तरेण तदर्थकथनरूपस्य व्याख्यानस्य पुरुषसूक्तादिमन्त्रेषु दर्शनात् तेषामप्याधुनिकत्वापत्तेश्च । यदुक्तं ब्राह्मणप्रमाणैर्मन्त्राणां सृष्ट्यादिनिर्मितत्वं साधितमिति ( पृ ० १२८ ), तदपि तुच्छम् तवास्थया ब्राह्मणानामाधुनिकत्वेन तेषां त्वया प्रामाण्यानभ्युपगमेन तत्सिद्ध्यसम्भवात् । प्रामाण्ये वा तैरेव ब्राह्मणैर्मन्त्राणा-मिव ब्राह्मणानामपि परमेशनिःश्वसितत्वोक्त्या सृष्ट्यादी सिद्धत्वाविशेषात् । सामाजिका एव सृष्ट्यादौ वेदनिमार्ण वदन्ति । सिद्धान्ते तु वेदानां नित्यत्वेन निर्माणस्यैवासम्भवात् । यदुक्तम्- ' मन्त्रार्थद्रष्टार ऋषयस्तु सृष्टेः पश्चादेवोत्पन्नाः । ब्राह्मणादिग्रन्थास्तु नवीना नवीनषिप्रोक्ता एव । यथोक्तम् — ' महित्रीणामवो s स्तु ' ( का ० सं ० ७/२ ), ' इत्येष प्राजापत्यस्तृचः ' ( ७ ९ ), ' स वामदेव उख्यमग्रिम -वियस्तमवैक्षत स एतत्सूक्तमपश्यत् कृणुष्व पाजः प्रसिति न पृथिवीम् ' ( का ० सं ० १०१५ ) ( पृ ० १२८ ) इति, तदप्यः सङ्गतम् ' अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनेरुल ' ( ऋ ० सं ० १ १/२ ), ' रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावतीरुप मुहूर्तमेवैः । प्र सिन्धुमच्छा बृहती मनीषा वस्युर कुशिकस्य सूनुः || ' ( ऋ ० सं ० ३।३३।५ ) इति मन्त्रे कुशिकपुत्रवर्णनाच्च त्वदभिमतवेदानामाधुनिकत्वसिद्धयापत्तेः । ' अकारि त इन्द्र गोतमेभिः ब्रह्माण्योक्ता नमसा हरिभ्याम् ' ( ऋ ० १।६३ ९ ), ' कारुरहं ततो भिषगुपलक्षिणी ' ( ऋ ० ९ / ११२ / ३ ), ' सोधन्वनासः ' ( ऋ ० १ ११०१२ ), ' ऋभवो हि सुधन्वन आङ्गि रसस्य पुत्रा बभूवुः ' ( नि ० ११।१६ ) इत्यादीनां मन्त्राणामर्थान्तरपरत्वव्याख्यानमाख्यायिकानां सुखावबोधार्थत्वेन व्यक्तिविशेषोल्लेखे तात्पर्याभावादिवर्णनं तु ब्राह्मणेष्वपि न तद्दण्डवारितम् । सिद्धान्ते तु मन्त्रब्राह्मणसमुदायस्य नित्यत्वाद भूत - भव्य- भविष्यार्थबोधकत्वाच्चातीतानागतयस्तुवर्णनं भूषणमेव न दूषणम्, वेदस्य नित्यत्वेन सृष्टिपूर्वकत्वासिद्धया सुश्च शब्दमूलकत्वसिद्धया प्राचीनार्वाचीनव्यक्तिघटनादिवर्णनेऽपि न पौरुषेयत्वशङ्का कलङ्क पङ्कस्पर्शः । अर्थ को स्पष्ट करना ही व्याख्यान कहलाता है । इस तरह का व्याख्यान पुरुषसूक्त प्रभृति के मन्त्रों का देखने को मिलता है, अतः उनको भी नवीन मानना पड़ेगा । यह कहना भी गलत है कि ' ब्राह्मणों के प्राणों से हम वेदों का आदि सृष्टि में होना कह चुके हैं ( पु ० १२८ ), क्योंकि आपकी आस्था के अनुसार ब्राह्मण ग्रन्थ तो बाधुनिक हैं, उनको आप प्रमाण नहीं मानते, तब उनसे आपकी बात कैसे सिद्ध हो सकती है | यदि ब्राह्मण ग्रन्थों को आप प्रमाण मानते हैं, तो उन्हीं से मन्त्रों की तरह ब्राह्मण भाग भी परमेश्वर के निःश्वास से निकलते हैं, अतः उनकी स्थिति भी सृष्टि के आदि में सिद्ध हो जाने से उन पर नवीनता की आपत्ति नहीं उठाई जा सकती । आर्यसमाजी ही सृष्टि के प्रारम्भ में वेदों के निर्माण की बात कहते हैं । हमारे मत में तो वेद नित्य है, अतः उनके निर्माण का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है । ' मन्त्रद्रष्टा ऋषि उससे बहुत पीछे हुए हैं । उनका उल्लेख करने वाले ग्रंथ उससे पीछे के होंगे । इन मन्त्राद्रष्टा ऋषियों नाम का सामान्यार्थ हो ही नहीं सकता । अतः ब्राह्मणादि ग्रंथ बहुत नये और ऋषि - प्रोत ही हैं । इसके उदाहरण काण्व संहिता में देखो - ' महित्रीणामवोऽस्तु ' ' इत्येष प्राजापत्यस्तच ः ', ' स वामदेव ' इत्यादि ' ( पृ ० १२८ ) । यह कथन भी असंगत है, क्योंकि ' अग्निः पूर्वेभऋषिभि: ' इस ऋग्वेद के मन्त्र में पूर्व ऋषियों का तथा ' रमयं वचसे " ' कुशिकस्य सूनुः ' यहाँ पर कुशिक के पुत्र का वर्णन होने से आपके अभिमत वेदों की भी आधुनिकता की आपत्ति आपकी ही पद्धति से उठ खड़ी होगी । इसी तरह से ' कार तन्द्र गोतमेभिः ', ' कारुरहं ततो भिषक ', ' सोधन्वनासः ', ' वो हि सुधन्वन प्राङ्गिरसस्य पुत्रा बभूवुः इन सब मन्त्रों में आये हुए पदों का र्थान्तर करना और आख्यायिकाओं का उपयोग केवल विषय को सरलता से समझने के लिये मानना, उनका व्यक्तिविशेष में तात्पर्य न मानना, ये सब बातें ब्राह्मणों के पक्ष में भी मान लेने को कोई रोकने वाला नहीं है । हमारे मत से तो मन्त्र ब्राह्मण समुदाय पूरा नित्य है, यह भूत, भविष्यत् और वर्तमान सभी त्रिकाल की वस्तुओं का बोधक है, अतः यहाँ पर अतीत और अनागत घटनाओं का वर्णन इसकी महत्ता को बढ़ाने वाला है, इसके लिये शोभा की बात है, दूषण नहीं । वेद नित्य है, अतः इसकी रचना सृष्टि के आरंभ में हुई, इस बात को हम लोग नहीं मानते । इसके विपरीत हमारे यहाँ सृष्टि ही शब्दपूर्वक मानी जाती है, अर्थात् वैदिक शब्दों के आधार पर ही परमात्मा इस जगत् के सभी पदार्थों की सृष्टि करता है । इस तरह से प्राचीन और अर्वाचीन ११४
पृष्ठ 936
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पारिजाता ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' ( ३४ ) इत्यापस्तम्बसूत्रव्याख्याने ' कैश्चित्तु मन्त्राणामेव वेदत्वमाश्रितम् ' इति धूर्तस्वामिना उक्तम् । अत्र ' कैश्चिन्मन्त्राणामेव वेदत्वमाख्यातम् ' इत्यनेन ज्ञायते यदापस्तम्बात्पूर्वमाचार्या मन्त्राणामेव वेदत्वं मन्यन्ते स्म ' ( पृ ० १२ ९ ) इति तत्तु कुशकाशावलम्बनम्, पूर्वोत्तरमीमांसादिषु सर्वत्रैव सिद्धान्तनिर्धारणाय पूर्वपक्षवर्णनं दृश्यते, न तावता पूर्वपक्षस्य शिष्टजनपरिगृहीतत्वं भवति । तथाहि - ' वेदांश्चैके सन्निकर्षं पुरुषाख्या: ' ( मी ० सू ० १११/२७ ) इति सूत्रे पूर्वपक्षे वेदानां पौरुषेयत्वमेवोक्तम्, न तावता तस्य ग्राह्यत्वं वक्तुं शक्यते । कथं पुनः कृतका वेदा इति केचिन्मन्यन्ते यतः पुरुषाख्याः पुरुषेण समाख्यायन्ते वेदाः काठकं कालापकं पैप्पलादकमिति शावरभाष्यम् । यदुक्तम्- ' आपस्तम्बसूत्रमिदं पश्चात् प्रक्षिप्तम् ' ( पृ ० १२ ९ ) इति, तत्तु सामाजिक दुःस्वभावमूलकमेव । तदभिमते वेदेऽपि पाश्चात्त्यैः प्रक्षिप्तत्वमुच्यत एव नास्तिकतुण्डस्य निरङ्कुशत्वात् । यदुक्तम्- ' महाभारतकालानन्तरं याज्ञिककाल आगतः । तत्र यज्ञेषु ब्राह्मणानामत्युपयोगाद् औपचारिकं वेदत्वं तत्र स्वीकृतम् । न केवलं ब्राह्मणे धर्मशास्त्रेष्वप्याम्नायपदप्रयोगः प्रवृत्तः । ' यत्र वाम्नायो विदध्यात् ' ( १।५१ ) इति गौतमधर्मसूत्रे मस्करिणोच्यते-- ' अथवास्नायशब्देन मनुरुच्यते इति, तथैव ब्राह्मणेष्वपि मन्तव्यम्, स्मृतिग्रन्थेऽप्या-स्नायशब्दप्रयोगात् । स्मार्तधर्माधिकारे हि शङ्खलिखिताभ्यामुक्तम्- ' आम्नायः स्मृतिधारकः ' इति । ग्रन्थाकारगतायाः स्मृतेस्तत्कृतग्रन्यास्नायः स्मृतिग्रन्थाध्यायिनां स्मृतिधारणार्थत्वेनोक्त इति । अर्थात् स्मृतिग्रन्थेष्वप्याम्नायशब्द-प्रयोगात् शङ्खलिखिताभ्यां च तथैवोक्त: स्मृतिग्रन्थाध्यायिनः स्वमूलमाम्नायं गदितं शक्नुवन्ति ' ( पृ ० १२ ९ -१३० ) व्यक्तियों का, घटनाओं का वर्णन यहाँ पर मिलने पर भी उसके आधार पर मन्त्रब्राह्मण समुदायात्मक वेद में किसी भी तरह से पौरुषेय होने की शङ्का के कलंक रूपी पंक से तनिक भी स्पर्श नहीं होता । ' इस सारे लेख से यह ज्ञात हो चुका है कि मन्त्र - संहिताएं ही वेद हैं । वही अपौरुषेय हैं । अत्यन्त प्राचीन आचार्य ऐसा ही मानते थे । आपस्तम्ब परिभाषासूत्र - ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' की व्याख्या में धूर्तस्वामी लिखता है - ' कैश्चिन्मन्त्राणामेव वेदत्वमाख्यातम् ' । अर्थात् कई एक आचार्य मन्त्रों को ही वेद मानते हैं । इस लेख से प्रकट है कि धूर्तस्वामी की दृष्टि में आपस्तम्ब के काल से पहले के कई आचार्य मन्त्र भाग को ही वेद मानते थे ' ( पृ ० १२ ९ ) | यह भी नदी की बाढ़ में बहते हुए आदमी के कुश-काशका, तिनके का सहारा लेने के समान है । पूर्व और उत्तर मीमांसा में सभी जगह सिद्धान्त पक्ष को स्थिर करने के लिये पूर्वपक्ष का वर्णन भी मिलता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि यह पूर्वपक्ष भी शिष्टजनों के द्वारा स्वीकृत हो । जैसे कि ' वेदांचे सन्निकर्ष पुरुषाख्या ' इस मीमांसा सूत्र में पूर्वपक्ष के रूप में वेदों को पौरुषेय सिद्ध किया गया है, इसका मतलब यह नहीं हुआ कि यही पक्ष ब्राह्म है । शावर भाष्य ' इसकी व्याख्या इस तरह से की गई है— ' कुछ लोग वेदों को कुलक कैसे मानते हैं? इसलिये कि यहाँ पर कुछ शाखाएं पुरुषों के नाम से प्रसिद्ध हैं, जैसे कि काठक, कालापक, पैप्पलादक | ये संहिताएं व्यक्तियों के नामों के साथ जुड़ी हुई है । यह कहना कि हमारा ' विचार है कि यह मूल सूत्र चाहे औपचारिक भाव से ही लिखा गया हो, पर आपस्तम्ब के काल से बहुत अर्वाचीन है । इसलिये संभवतः आपस्तम्ब आदि भो मन्त्रमात्र को ही वेद मानते थे । जब आपस्तम्ब आदि के ग्रन्थों में इस सूत्र का प्रक्षेप किया गया, तब उससे उत्तर काल में लोगों ने ब्राह्मणों को भी वेद मानना आरम्भ कर दिया ' ( पृ ० १२ ९ ) | यह कथन आर्यसमाजियों की आदत के अनुसार ही है । आर्यसमाजी जिनको वेद मानते हैं, उनमें भी पाश्चात्य विद्वान् प्रक्षेप की बात करते हैं । ara यह है कि नास्तिकों की खोपड़ी निरंकुश हुआ करती है । ' महाभारतकाल के कुछ पश्चात् एक याज्ञिक काल आया । उसमें ब्राह्मणों का अत्यन्त उपयोग होने का अतिमान होने से ब्रह्म को औपचारिक दृष्टि से वेद कहा गया । ब्राह्मणों को ही क्या, धर्मशास्त्रों को भी कभी - कभी औपचारिक दृष्टि से आम्नाय कहा गया है । देखो गौतमधर्मसूत्र का टीकाकार मस्करी ' यत्र चाम्नायो विदध्यात् ' इस सूत्र पर टीका करते हुए कहता है- ' अथवा आम्नायशब्देन मतुरुच्यते । अर्थात् -- आम्नाय शब्द से मनुस्मृति का भी ग्रहण हो सकता है । जब आम्नाय शब्द किसी धर्मशास्त्री की दृष्टि में अपने मूल मनुस्मृति के लिये उपचार से प्रयुक्त हो सकता है, तो याज्ञिकों की दृष्टि में यज्ञक्रिया - प्रधान ग्रन्थों के लिये उपचार से वेद शब्द प्रयुक्त हो गया, इसमें अणुमात्र भी आश्चर्य नहीं । और भी देखो, तन्त्रवात्तिक में भट्ट कुमारिल लिखता है -' स्मृतिग्रन्थेऽप्याम्नायशब्दप्रयोगात् ' इत्यादि । अर्थात् स्मृति ग्रन्थों के लिये भी आम्नाय शब्द का प्रयोग हुआ है । शङ्ख - लिखित भी ऐसा
पृष्ठ 937
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २०७ इति, तदपि तुच्छम्, तथात्वे ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य मतदर्थानाम् ' ( मी ० सू ० १ २ १ ) इत्यादिरीत्या विधि-भागस्यैव विधायकत्वेन शासकस्थानीयत्वाद् मन्त्राणां च विधेयत्वेन भृत्यस्थानीयत्वाद् औपचारिकमेव वेदत्वम् | इष्टप्राप्यनिष्टपरिहारोपायशासनाच्च शास्त्रत्वमपि विधायकानां ब्राह्मणानामेव स्यात् । मन्त्राणां त्वौपचारिकमेव शास्त्रत्वमपीति विपरीतस्यैव सुवचत्वात् । धर्मशास्त्रे त्वौपचारिकमाम्नायत्वमिष्यत एव । भट्टपादीयवचनमपि न त्वदीयाभिप्रायसाधकम् । तदनन्तरमेव ततश्च मन्वादिवाक्य प्रतिषिद्धाचाराणां प्रामाण्यमाशङ्कय तत्समाहितम् । पूर्व-मयुक्तम् -'यदि वेदविरोधः स्यादिष्येतैवाप्रमाणता । स्मृतिराम्नायशब्देन न तु वेदवदुच्यते ॥ ' आम्नायशब्देन यद्यपि स्मृतय उच्यन्ते, तथापि प्रत्यक्षवेदतदनुप्राणितमम्वादिविरोधे तासामप्रामाण्यस्य व्यवस्थापनात् । अत एव आपस्तम्बवचन तु बौधायनेन स्मृतिविरुद्धदुष्टाचारोदाहरणान्येव प्रयच्छता निराकृत्तम् । स्पष्टकामादिहेत्वन्तरदर्शनान्न विरुद्धाचाराणा-मापस्तम्बवचनस्य वा श्रुतिमूलकत्वोपपत्तिरिति तत्रत्यकौमारिलवचनाच्च । ' मनोऋ चः सामघेभ्यो भवन्ति ' इत्यस्य विधेर्वाक्यशेषे श्रूयते - ' मनुर्वे यत्किञ्चिदवदत् तद् भेषजं भेषजताये ' इत्यत्र ब्राह्मणस्य मनुव्यक्तिप्रतिपादकत्वेन पौरुषेयत्वे सादित्वे च प्राप्ते तत्परिहारमाहुः कुमारिलभट्टपादा: - न तच्छूतिसामान्यमात्रम्, नित्येऽपि सम्भवात् । ' यज्ञेऽध्वर्युरिव ह्यस्ति मनुर्मम्यन्तरे सदा । प्रतिमन्वन्तरं चैषा श्रुतिरन्या विधीयते ॥ स्थिताश्च मनवो नित्यं कल्पे कल्पे चतुर्दश । तेन तद्वाक्यघटितानां सर्वदेवास्ति सम्भवः । तदुक्तिज्ञापनाद्वेदो ही कहते है | अतः स्मृतिग्रंथों के पढ़ने वाले अपने मूल को आम्नाय कह सकते हैं ' ( १० १२ ९ -१३० ) | यह कथन भी तुच्छ हैं, क्योंकि ऐसा मानने पर ' वास्तायस्य क्रिया ० ' इस मीमांसा सूत्र के प्रमाण पर विधिभाग के ही विधायक शास्त्र होने से वही शासक-स्थानीय माना जायगा और मन्त्रों की विधेयता के आधार पर भृस्यस्थानीयता होगी । इस प्रकार से औपचारिक वेद शब्द का प्रयोग मन्त्र भाग के लिये होने लगेगा, ब्राह्मण भाग के लिये नहीं । इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के उपाय को बताने वाला शासन ही शास्त्र होता है । यह लक्षण भी ब्राह्मण भाग पर ही लागू होगा, मन्त्र भाग पर नहीं । इस तरह से मुख्य वेद और शास्त्र ब्राह्मण-भाग ही माना जायगा, मन्त्रों में यह औपचारिक मानना पड़ जायगा, इस तरह से यह बात आपके सिद्धान्त से एकदम विपरीत पड़ेगी । धर्मशास्त्रों में तो औपचारिक आम्नाय पद का प्रयोग माना ही जाता है । भट्ट कुमारिल का वचन भी आपकी बात को नहीं सिद्ध कर पाता, क्योंकि इसके बाद ही मन्वादि स्मृति वाक्यों के द्वारा प्रतिषिद्ध आचारों की प्रामाणिकता की आशङ्का उठाकर उनका समाधान वहाँ किया गया है | इसके पहले भी वहाँ कहा गया है कि ---- ' यदि स्मृति शास्त्र का वेद वचनों से विरोध पड़ता है, तो इस दशा में निश्चित रूप से स्मृति शास्त्र को ही अप्रमाण माना जायगा । स्मृति को आम्नाय कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि उसका प्रामाण्य वेद के समान मान लिया जाय ' । आम्नाय शब्द से यद्यपि स्मृतियों का भी बोध होता है, तो भी प्रत्यक्ष वेद और वेदानुवर्तनी मन्वादि स्मृतियों में किसी बात पर प्रत्यक्ष विरोध उपस्थित होने पर स्मृतियों का ही अप्रामाण्य व्यवस्थापित किया गया है । इसीलिये आपस्तम्ब के वचन को बौधायन ने स्मृतिविरुद्ध दुष्ट आचरणों की प्रतिपादकता के आधार पर उदाहरण देते हुए निराकृत किया है । भट्ट कुमारिल ने भी यहाँ अपनी स्पष्ट टिप्पणी दी है कि आपस्तम्ब ने अपने ग्रन्थ में fur fava आचारों का समर्थन किया है, ये श्रुति इसलिये नहीं माने जा सकते कि उनमें क्षुद्र कामना प्रभूति की प्रवृत्ति कारणता सिद्ध हो जाती है । ' मनो: ' इस विधि वाक्य के अंश के रूप में यह वाक्य सुना जाता है कि जो कुछ मनु ने कह दिया है, उसी का सर्वोपरि प्रामाण्य मानना चाहिये । यहाँ पर ब्राह्मण वाक्य में मनु नाम के ' व्यक्ति का वर्णन होने से वह पौरुषेय और आधुनिक माना जायगा, इस आपत्ति का परिहार भट्ट कुमारिल ने इस तरह से किया है - ' व्यक्ति के नाम के आधार पर ब्राह्मण वाक्यों में पौरुषेयता की आपत्ति नहीं उठाई जा सकती, क्योंकि सामान्य रूप से व्यक्ति का नाम नित्य वेदों में भी आ सकता है । जैसे प्रत्येक यज्ञ में resear विद्यमान रहता है, उसी तरह से प्रत्येक मन्वन्तर में सामान्य रूप से मनु भी विद्यमान रहता है । यह श्रुति भी प्रत्येक मन्वन्तर में free free स्वरूपों में आविर्भूत होती है । प्रत्येक कल्प में सदा ही चोदह मनुओं की स्थिति मानी गई है । इस लिये ब्राह्मण aran मनुओं की स्थिति सदा मानी जा सकती हैं । इन नित्य वर्तमान मनुओं का निर्देश होने से वेद को अनित्य नहीं माना जा सकता ।
पृष्ठ 938
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
T नानित्योऽतो भविष्यति । प्रतियज्ञं भवन्त्यन्ये सर्वदा पोडशत्विजः || आदिमत्त्वं च वेदस्य न तच्चरितबन्धनात् । ' ( मो ० सू ० १/३/७ ) इत्येवं त्वदुक्तकुचोद्यस्य भट्टपादैः समूलोन्मूलनात् । स्मृतिप्रामाण्यसम्बन्धेऽपि भट्टपादैर्बहूक्तम्- ' विरोधे त्वनपेक्षं स्यात् प्रामाण्यं स्मृतिबन्धनम् | अविरोधे हि वेदेन तन्मूलनुमीयते || याच वेदविरुद्धेह स्मृतिः काचन दृश्यते । सा तु स्याद् भ्रान्तिमूलेव न स्पष्टश्रुति-मूलिका || स्वातन्त्र्येण प्रमाणत्वं स्मृतेस्तावन्न सम्मतम् । वेदमूलानुमानं तु प्रत्यक्षेण विरुद्धयते || प्रत्यक्षे श्रूयमाणे वन वितानुमानिकम् । ' ( मी ० सू ० १ ३1३ ) इत्यत्र तन्त्रवातिके । यदुक्तम्- ' मन्त्रमात्रेण विधिना कार्य चाल्यते स्म कैश्चिन्मीमांसकै: ' ( पृ ० १३० ) इति तत्तु निर्मूलम्, प्रत्यक्ष मोमांसाशास्त्रविरोधात् । ' ऐन्द्रचा गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' ( ० सं ० ३१२१४ ) इति विधिवाक्यैर्मन्त्राणां विधेयत्वावगमविरोधाच्च । ' मत्रेषु सर्वे विधयः सन्ति ' ( पृ ० १३० ) इति कथनं तु स्पष्टं धूलिप्रक्षेप एव । नहि मीमांसागत पूर्वपक्षीयवचनेन किञ्चिन्मतं मीमांसकमतं भवति । दयानन्दस्य मन्त्राणामेव वेदत्वसंज्ञा न ब्राह्मणग्रस्यानामिति ( पृ ० १३१ ) कथनं तु धाष्टर्यमेव तदुक्तप्रमाणाभासानां समूल-मुन्मूलितत्वात् । मन्त्र ब्राह्मण - मनु वशिष्ठ गोतम कणाद वात्स्यायन व्यास - जैमिनि पाणिनि- कात्यायन- पतञ्जलि-शवरस्वामि - शङ्कर - रामानुज- निम्बार्क- मध्वाद्याचार्य- वल्लभाचार्य- भट्टपाद वाचस्पति श्रीहर्ष- मण्डनोदयनोवट सायण-महीधराचार्यादिविरुद्धवदने धाष्टर्थमेव हेतु:, न पाण्डित्यम् । तेषां युक्तिखण्डने तु न वराकाणां सामाजिकानां जन्मान्तरेष्वपि सामर्थ्य मायास्यति । सनातनधर्मोद्धारादिग्रन्थानामपि खण्डने नवी सामर्थ्यम् । यथास्माभिस्तदुक्तीनां खण्डनमक्षरशोऽनूच क्रियते, तथैकस्यापि ग्रन्थस्य तैः खण्डयितुमशक्यत्वात् । प्रत्येक यज्ञ में षोडश ऋत्विजों का विधान है । ये ऋत्विक् नये नये होते हैं, किन्तु उनके आधार पर वेद की सादिता नहीं सिद्ध की जा सकती ' । इस तरह से आपके द्वारा उठाये गये कुबोध को भट्ट कुमारिल ने जड़ - मूल से उखाड़ फेंका है । स्मृतियों के प्रामाण्य के सम्बन्ध में भी भट्ट कुमारिल ने बहुत कुछ कहा है- ' श्रुति और स्मृति का विरोध रहने पर स्मृति का अनपेक्ष अर्थात् स्वतन्त्र प्रामाण्य नहीं स्वीकार किया जा सकता, क्योंकि इनमें परस्पर अविरोध रहने पर ही स्मृतिमूलक aftaar का अनुमान किया जा सकता है । जो कोई स्मृ uae after के विरुद्ध दिखाई पड़ता है, उस स्मृति को भ्रान्त ही माना जायगा । उसके मूल में प्रत्यक्ष श्रुतिविरुद्ध अनुश्रुति को कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि स्मृति का स्वतन्त्र रूप से प्रामाण्य नहीं माना जा सकता और प्रत्यक्ष श्रुति के विरोध में अनुमान के द्वारा स्मृति समर्थक श्रुति की कल्पना नहीं की जा सकती । जब प्रत्यक्ष श्रुति सुनाई पड़ रही हो तो उसके विरुद्ध श्रुति का अनुमान कैसे संभव हो सकता है । ' यह सारा प्रतिपादन तन्त्रवालिक में मिलता है । यह कथन भी सर्वधा निर्मूल है कि ' अनेक ऐसे म tates हो चुके हैं, जो ब्राह्मण का परम आदर करते हुए भी मन्त्र मात्र से ही सारे ' विधिवाद ' का काम चलाते रहे हैं ' ( पृ ० १३० ) । किन्तु यह बात मीमांसा शास्त्र के सर्वथा विपरीत है । ऐन्द्रा गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' इस तरह के विधि वाक्यों से ही मन्त्रों की विधेयता की, विनियोग की अवगति होती हैं । ' मन्त्रों में किसी न किसी प्रकार से सारी ' विधि ' कही गई है ' ( पृ ० १३० ) यह कथन ऑंखों में धूल झोंकने के समान है, क्योंकि मीमांसा शास्त्र में पूर्वपक्ष के रूप में उपस्थापित मत को सिद्धान्त नहीं माना जा सकता | दयानन्द मन्त्रों को ही वेद मानते हैं, ब्राह्मणों को नहीं ( पृ ० १२१ ), यह कथन भी सरासर धृष्टता है । आपके द्वारा उद्धृत अनेक प्रमाणों का हम खण्डन कर चुके हैं । मन्त्र, ब्राह्मण, मनु, वसिष्ठ, गोतम, कणाद, वात्स्यायन, व्यास, जैमिनि, पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि, शवरस्वामी, शंकर रामानुज, निम्बार्क, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, भट्ट कुमारिल, वाचस्पति, श्रीहर्ष, मण्डन, उदयन, उवट, सायण, महीधर प्रभृति आचार्यो के द्वारा ' सर्वमान्य रूप से प्रतिपादित मत के fava कहने में धृष्टता हो कारण हो सकती है, विद्वत्ता नहीं । इन आचार्यों के द्वारा दी गई युक्तियों के खण्डन की सामर्थ्य तो इन बेचारे आर्यसमाजियों में जन्म - जन्मान्तर में भी आने से रहो । इनकी सामर्थ्य तो ' सनातन धर्मोद्धार ' जैसे आधुनिक ग्रंथों के खण्डन में भी नहीं है । जैसे हम यहाँ पर उनकी प्रत्येक पंक्ति को उद्धृत कर उसका अक्षरशः अनुवाद कर खण्डन करते हैं, उस तरह का खण्डन वे हमारे किसी एक ग्रंथ का भी कर सकने में सर्वथा असमर्थ हैं ।