वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10
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Barcode: 1990010086096 Title - vedartha parijatah part - 2 Author - Anantasri Karapatra svami Language - multilingual Pages - 1376 Publication Year - 1980 Barcode EAN.UCC - 13 1 990010 086096 "
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11 &ft: 11 वेदशास्त्रानुसन्धानग्रन्थमालायाः प्रथम स्पुष्पम् वेदार्थपारिजातः खण्ड २ LIBRARY IY EP 1982 प्रणेतारः अनन्तश्रीस्वामिकरपात्रमहाराजाUNIVE: 24 भाषानुवादकौ ALLAHABAD पं० व्रजवल्लभद्विवेदो दर्शनाचार्यः तथा डॉ० पं० गजाननशास्त्रिमुसलगांवकरः मीमासा-वेदान्त -साहित्याचार्य एम० ए०, पीएच० डी० काशीहिन्दूविश्वविद्यालये मीमासा- धर्मशास्त्र विभागस्य भू० पू० अध्यक्षः प्रकाशक श्रीराधाकृष्णधानुकाप्रकाशनसंस्थानम्, कलकत्ता सञ्चालकः वेदशास्त्रानुसन्धानकेन्द्रम्, केदारघाट, वाराणसी प्रथम संस्करणम् २१०० प्रतय गंगादशहरा, २०३७ वि०
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प्रकाशक श्री राधाकृष्णधानुका प्रकाशनसंस्थान १४ नेताजी सुभाष रोड, कलकत्ता मूल्य ( दोनों भाग ) सामान्य संस्करण १८०.०० विशिष्ट संस्करण ३००.०० पुनर्मुद्रण का अधिकार वेदशास्त्रानुसन्धान केन्द्र, केदारघाट, वाराणसी के अधीन है । पुस्तक-प्राप्तिस्थान: १. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशनसंस्थान, वृन्दावनविहारी भवन, मिश्रपोखरा, वाराणसी । २ श्री स्वामी सदानन्द सरस्वती ( वेदान्ती जी ), धर्मसंघ शिक्षामंडल, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी । मुद्रक वारा प्रिंटिंग वर्क्स वाराणसी
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VEDASASTRA RESEARCH CENTRE SERIES No 1 VEDIRTHA - PIRIJITA and Bullura Presented by the Ministry of ErusationINDIA. Vol. 2 GOVERNMENT ur By ANANTASRI KARAPITRA SVIMI Hindi Translation by Pt. VRAJ VALLABH DWIVEDI DarsanIcIrya Dr. Pt. GAJANANA SHASTRI MUSALGAONKAR Mimansa -VedInta - SahityIcIrya, M. A., Ph. D. Ex- Head, Department of MimInsI - Dharmasastra. Banaras Hindu University, VaranasI Publishers SRI RADHA KRISHNA DHANUKA PRAKASHAN SANSTHAN, CALCUTTA Sañcalaka VEDASASTRA RESEARCH CENTRE, KEDARGHAT, VARANASI # FIRST EDITION 2100 Copies VARANASI 1980
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विषय -सूची पाश्चात्त्यमतखण्डनम् बेवरविचारसमीक्षा जयन्तभट्टानुसारमथर्ववेदस्य प्रामाण्यम् ब्राह्मणग्रन्थविषयक बेवरमतम् मैकडानलविचारसमीक्षा पाश्चात्त्यमतसमीक्षणम् ब्राह्मणानामपि वेदत्वम् दयानन्दमतखण्डनम अथ ब्रह्मविद्याविषय अथ वेदोक्तधर्मविषय. सृष्टिविद्याविषय पृथिव्यादिलोकभ्रमणविषयः आकर्षणानुकर्षणविषयः प्रकाश्यप्रकाशकविषय गणितविद्याविषयः ईश्वरस्तुतिप्रार्थना अथोपासनाविषयको विचार: मुक्तिविचार. नौविद्याविमानादिविद्याविषयो विचार' तारविद्यामूलविचारः वैद्यकमूलविचार: पुनर्जन्मविषयो विचार: विवाहविषयो विचारः नियोग विचार राजप्रजाधर्मविचार वर्णाश्रमधर्मविचारः पञ्चमहायज्ञविचार. श्राद्धविचारः स्वर्गो मनुष्यलोकाद्भिन्नः बलि-वैश्वदेवादिविवेचनम् ग्रन्थप्रामाण्यविचारः मूर्तिपूजासमर्थनम् अधिकारानधिकारविषयः पठनपाठनविषयः भाष्यकरणशङ्कासमाधानम्
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( ८ ) दयानन्दीयभाष्यप्रतिज्ञाविषयपर्यालोचनम् प्रश्नोत्तरविषयकविचार. वैदिकप्रयोगविषयविचारः स्वरव्यवस्थाविषयो विचारः व्याकरणनियमविषयो विचार अलङ्कारविषयो विचार. परिशिष्टानि १ विधवाविवाहनियोगमीमासा २ युधिष्ठिरमीमासकमतखण्डनम् श्रुतिसज्ञाविचारप्रत्याख्यानम् आम्नायसज्ञाविचारनिरास: मन्त्रविनियोगविमर्श. देवयोनि गोमेध. श्रौतयज्ञमीमासा ३ शास्त्रसमत. शाब्दबोधप्रकार. ४. श्रीसूक्तभाष्यम्
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बेवरविचारसमीक्षा ( वेदान मपौरुषेयत्वानादित्व सम्बन्धिनस्तर्काननवबुद्ध्यासमाधायैव च वेबरादिभिः पाश्चात्यैर्वेदाना सम्बन्धेऽनेके तर्काभासा उपस्थापिता । तद्रीत्या 'ऋग्वेदसहिताया अधिकप्राचीनेष्वशेषु विज्ञायते चेद यद् भारतीया भारतस्योत्तरपश्चिमसीमसु पञ्चनदप्रदेशेषु बहिश्च कुभा-काबुल-आदिप्रदेशेषु निवसन्ति स्म ॥ सरस्वतीमुत्तीर्य गङ्गा यावदस्या जाते ऋमिको विस्तारो दृश्यते । वैदिकोषु परवर्तिनीष्वपि रचनासु चैतद् द्रष्टुं शक्यते' ( भारतीयसाहित्य- भूमिकाया २१ पृष्ठे ), तत्तु न किञ्चित् वैदिकशब्दाना नित्यत्वेन घटनापूर्वं कोल्लेखासम्भवात् । समेषा कार्याणा जानातीच्छत्यथ करोतीति रीत्या ज्ञानेच्छापूर्वकत्वावश्यंभावित्वेन ज्ञानस्य च 'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानु- गमादृते ' ( वा ० प ० १।११५) इति रीत्या शब्दपूर्वकत्वावश्यम्भावित्वेन जगन्निर्माणस्यापि वैदिकशब्दपूर्वकत्वमेवेति मन्तव्यम् । तस्माद् वेदेषु कुत्रचित् कुभा-सिन्धु- इरावतोत्यादिशब्दश्रवणमात्रेण न कश्चिदितिहासोऽवधारयितु शक्यः । ऋग्वेदसहिताया कश्चित् प्राचीनो भाग. कश्चिदर्वाचीन इति कल्पनापि निर्मूलैव । ' यथा महाकाव्यकाले भारतीयविजेतॄणामान्तरिक सङ्घर्षेषु यद्वर्ण्यते यथा महाभारते, अथवा ब्राह्मणधर्मस्य सुदूरदक्षिणे विस्तारो वर्ण्यते यथा रामायणे, एतत्सम्बन्धे ग्रीकस्रोतसा मेगस्थनीजस्य रीत्या यः सिल्यूकसस्य राज + दूतरूपेण चन्द्रगुप्तसभाया किश्वित्कालमुवास, यस्य लेख एरियनकाले उपलभ्यते स्म एरियनकालश्च ईसाद्वितीय-शताब्दी विज्ञायते, हिन्दुस्थाने ब्राह्मणसस्कृतिविकासः पूर्तिमगात् । पेरिप्लससमये ( लास्सेन इण्ड० अल्ट० २.१५० बेवर विचार समीक्षा वेदों की अपौरुषेयता और अनादिता को सिद्ध करने वाले तर्कों को बिना समझे और उनका समाधान किये बिना ही बेवर प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् वेदो के सम्बन्ध में अनेक कुतर्क उपस्थित करते हैं । बेवर के मत से-'ऋग्वेद संहिता के अधिक प्राचीन अंशो मे इस भारतीय जातियों को भारत के उत्तर- पश्चिमी सीमाओ पर पंजाब मे और पंजाब के बाहर काबुल मे कुभा ' कोफीन' ( श्री० ) पर बसे हुए पाते है । इस जाति का पूर्व की ओर सरस्वती को पार कर हिन्दुस्तान मे गंगा नदी तक क्रमिक विस्तार वैदिक रचनाओ के परवर्ती काल के अशो मे प्राय प्रत्येक अवस्था में देखा जा सकता है' ( भूमिका, पृ० २१ ) । इस कथन में कुछ दम नही है । वैदिक शब्द नित्य है, अतः उसमे किसी घटना का उल्लेख नही हो सकता । कोई भी व्यक्ति पहले कुछ जानता है, तब इच्छा करता है और बाद में उसकी प्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है । प्रत्येक कार्य में मनुष्य की प्रवृत्ति इसी तरह होती है । 'लोक में ऐसा कोई भी ज्ञान नही है, जो कि बिना शब्द की सहायता से हो सकता हो' इस वाक्यपदीपकार की उक्ति के अनुसार कोई भी ज्ञान बिना शब्द के नही हो सकता । अतः इस जगत् का निर्माण भी वैदिक शब्दों की सहायता से ही होता है । इसलिये वेद में कही कुभा, सिन्धु, इरावती आदि शब्दो को सुनने मात्र से किसी इतिहास की बात को नही सिद्ध किया जा सकता । ऋग्वेद संहिता का कुछ अंश प्राचीन है औरकुछ अंश अर्वाचीन, यह कल्पना ही निर्मूल है । 'महाकाव्य काल की रचनाओ में स्वयं हिन्दुस्तान के विजेताओ के आन्तरिक संघर्ष का वर्णन किया गया है, जैसे महाभारत में । अथवा ब्राह्मण धर्म के सुदूर दक्षिण की ओर विस्तार का वर्णन किया गया है, जैसे रामायण में । यदि हम इनके साथ भारत के विषय में एक ग्रीक स्रोत, अर्थात् मेगस्थनीज से प्राप्त स्पष्ट जानकारी का सम्बन्ध जोड़ें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस लेखक के समय में हिन्दुस्तान में ब्राह्मण संस्कृति के विकास का कार्य पूरा हो चुका था, जब कि पेरिप्लस के समय में दक्षिण भारत
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६१० वेदार्थपारिजातः टिप्पणी इ स्टू० १.१ ९२ ) दक्षिणसुदूरवर्ती प्रदेश: शिवपत्न्याः पूजाकेन्द्र • सवृत्तः । अत्र विस्तृतप्रदेशे जाङ्गलिका-स्तथा युद्धप्रिया जातयो निवसन्ति स्म । एतेषा ब्राह्मणधर्मप्रभावे समानयनात्पूर्वमनेकासा शताब्दीना कियत्यो महत्य: परम्परा व्यतीता भवेयुः' ( पृ० २१-२२ ) इत्यादि, पर सर्वमेतदसङ्गतमेव, ब्राह्मणधर्मस्य पाश्चात्त्यमस्तिष्कविल. सितत्वात् । यतो हि वैदिकधर्म एव ब्राह्मणधर्म', स एव वर्णाश्रमधर्मः । शिवपल्या दुर्गायाश्च पूजा वैदिकधर्मस्यै- वाङ्गभूता, रात्रिसूक्तादीनां तद्बोधकत्वात् । यत्तु टिप्पण्या गोल्डस्टूकरविचाररीत्या –' कश्चिद् वैदिक ऋषिर्यः कण्ववशीय उच्यते । ऋक्सहिता- ( ) ८।६।४६-४८ मन्त्रेष्वश्वादिपशुभिः साधं रथे नियुक्ताना चतुर्णामुष्ट्राणा प्रशसा विद्यते । राथमहाशयेन सेटपीटर्स- वर्गडिक्शनरीग्रन्थे उष्ट्रशब्दस्य महिषः कुब्जो वृषभो वार्थ उक्तः । एतेषा पशूना दान तेन तिरिन्दिरात् पर्शुना च यादवेभ्यः प्राप्तम् अत्र केवलस्य तिरिन्दिरस्यैवोल्लेखः । शाखायनश्रौतसूत्रे १६।११।२ इति स्थले स तिरिन्दिरः पारशव्य उक्तः । एतैनामभि. तिरिडेटीजस्य पसियनस्य च सङ्केतो लभ्यते, परन्तु साइरसाना पश्चात् पर्सियनाना सत्त्वं नाभ्युपेतव्यम्, एतेनात्यन्तपाश्चात्त्ये काले गता भविष्यामः । साइरससमयात्पूर्वमपि पारसीका जनाः पर्सियन्- शब्देनाख्यायन्ते स्म तेषा स्वीयो राजापि भवति स्म । अथवा यथा ओलशा-उजेनमहाशयेन वेलींनेन मोनाटस वेरिष्ट १८७४ पृ० ७०८ सूचितः । पर्सियनशब्दैः पार्थवाः पार्थिअना वा ग्राह्याः येषां सम्बन्धे एचेमिनिडिसमये पार्शाजनैः सहोल्लेखो लभ्यते । तिरिडेटेसआदिषु तिरिशब्दस्य या व्युत्पत्ति • प्रचलिता सा पहलवीभाषास्थतीर जेव्ड- तिस्त्र्यशब्देन व्युत्पाद्यत इति नोचितम् । व्युत्पत्तिरियं एम० ब्रीअलमहोदयेन डेपेशिसिम नोमिनिवस १८६३ पृ० ९, १० इत्यत्र निगदिता' (पृ ० २१-२२ टि० ) इति सर्वमेतत् कल्पनामात्रं निर्मूलत्वात् । मन्त्रस्तु - शतमह तिरिन्दिरे सहस्र पर्शावाददे ॥ राधांसि याद्वानाम्' ( ऋ ० स ० ८| ६ | ४६ ) इति । सायणरीत्याऽत्र तिरिन्दिरस्य राज्ञो दान स्तूयते का सुदूरवर्ती क्षेत्र शिव की पत्नी की पूजा का केन्द्र बन चुका था । इस विस्तृत देश को, जिसमे जङ्गली तथा लड़ाकू जातियाँ निवास किया करती थी, ब्राह्मण धर्म के प्रभाव मे ले आने के पहले वर्षों और शताब्दियों की कितनी बडी परम्परा बीत चुकी होगी ।" (पृ० २१-२२ भू० ) । किन्तु यह सारा कथन असंगत है, क्योकि ब्राह्मण धर्म की कल्पना पाश्चात्य विद्वानों के दिमाग की उपज है । वास्तव में वैदिक धर्म ही ब्राह्मण धर्म है और इसी को वर्णाश्रम धर्म भी कहते है । शिवपत्नी दुर्गा की पूजा भी वैदिक धर्म का ही अंग है, क्योकि रात्रिसूक्त आदि में उसका विधान है । यहाँ पू० २१ की २ संख्या की टिप्पणी में बताया गया है -'एक वैदिक ऋषि, जिन्हे कण्व वंश का वत्स बताया गया है, ऋ० ८।६।४६-४८ में घोड़ो, पशुओं और एक साथ चार-चार जोते गये ऊँटो के दान की प्रशंसा करते है ( राय ने सेंट पीटर्सवर्ग डिक्शनरी मे उष्ट्र का अर्थ भैंस या कूबड़ा बैल बताया है, सामान्यतः इसका अर्थ ऊँट है) --इन पशुओ का दान उन्होने तिरिंदिर और और पर्शु ने, यादवों से प्राप्त किया था या यहाँ केवल एक व्यक्ति विरिंदिर पशु का ही उल्लेख है? शाखायन श्रौतसूत्र १६।११।२७ में उन्हें तिरिंदिर पारशव्य कहा गया है । इन नामों से तिरिडेटीज और परियन्स् का संकेत मिलता है; निःसन्देह हमें साइरस के बाद पर्सियन लोगो को नही मानना चाहिये, इससे हम बहुत बाद के समय में चले जायेंगे, किन्तु साइरस के समय के पूर्व भी फारसी लोग इसी नाम से पुकारे जाते थे और उनके अपने राजा भी होते थे । अथवा जैसा ओल्शाउजेन ने वेलींनेर मोनाटस वेरिष्ट १८७४, पृ० ७०८ में सुझाया है, हमे पार्थवो या पार्थियन लोगों से अर्थ लेना चाहिये, जिनके एचेमीनिडी के समय में होने का उल्लेख पार्शाओं के साथ किया गया है? तिरिडेटेस आदि में 'तिरि' शब्द की जो व्युत्पत्ति प्रचलित है, उसे पहलवी तीर- जेन्ड-तिस्त्र्य से बताना उचित नही ( यह व्युत्पत्ति एम० ब्रीअल ने डे पेशिसिस् नोमिनिबस १८६३, पृ० ९ -१० में दी है) ' ( भूमिका, पृ ० २१-२२ टि० ) | यह सारा कथन भी निर्मूल कल्पना मात्र है । इस मन्त्र का सायण ने यह अर्थ किया है-'यहाँ राजा तिरिन्दिर के दान की स्तुति की गई है ।
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