वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 11–20
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 11–20
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वेदार्थपारिजातः ६११ तिरिन्दिरे राजनि । यदुरिति मनुष्यनाम । यदव एव याद्वास्तेषां मध्ये अह शत शतसख्याकानि सहस्र सहस्रसंख्याकानि राधाति धनानि आददे । यद्वा यदुकुलजानामन्येषां राजा स्वभूतानि धनानि बलादपहृतानि तिरिन्दिरे वर्तमानानि अह प्राप्नोमि । 'उदानट् ककुदो दिवमुष्ट्राश्चतुर्युजो ददत् । श्रवसा याद्व जनम् ॥' (ऋ० स० ८ | ६| ४८) अय राजा ककुद उच्छ्रितः सन् श्रवसा कीर्त्या दिव स्वर्गम् उदानद् उत्कृष्टतरं व्याप्नोत् । किं कुर्वन्? चतुर्युज' चतुर्भिः स्वर्णभारे- र्युक्तानुष्ट्रान् ददत् प्रयच्छन् तथा याद्व जन च दासत्वेन प्रयच्छन् । नात्र तिरिशब्दबलेन देशान्तरीयजना ग्रहीतु शक्यन्ते । नहि शब्दसाम्येन प्रमाणमन्तरा वेदार्थोऽवधारयितु शक्यः । तथा सति सकृत् शकृत्, सकलः शकलः, स्वजनः श्वजन इत्यादिषु शब्दसाम्येनानर्थोद्भवात् । गिर्जागृहमपि गिरिजागृहं स्यात् । तदेवमुक्तम्-' यद्यपि बहु नाघीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् । स्वजनः श्वजनो मा भूत् सकल. शकलः सकृत् शकृत् ॥ ' यदपि -' मेगस्थनीजो माडि-आण्डि-नोईनाम्ना जनानामुल्लेख करोति, तन्नाम माध्यन्दिने लभ्यते, या च शुक्लयजुर्वेदिना प्रमुखशाखास्ति' इति, तदपि विसङ्गतम्, माध्यन्दिने तन्नामानुल्लेखात् । 'सिकन्दर: सिन्धुनदीतटे यज्जातीयान् जनान् दृष्टवान् ते नितान्तवैदिक्यामवस्थायामासत् । ब्राह्मण- संस्कृतेर्धरातले नासन् । सत्यमिदमेव, परन्तु भारतस्य सम्बन्धे एतेन कश्चिनिष्कर्षस्तर्कसङ्गतो न भविष्यति, यतः पञ्चनदीयाः कदाचिदपि ब्राह्मणोयव्यवस्थायाः प्रभावक्षेत्रे नागताः, ता जातयोर्वेदिकजीवनदृष्टी स्थिरा आसन् । पुरोहितानां वर्णव्यवस्थायाः प्रभावात् सदैव बहिर्भूता आसन् । तत एव तज्जातीयास्तेषां स्वबान्धवानां घृणापात्रता- मुपगता, ये प्रभूतपुरः प्रसृताः, अर्थाद् दूरदेश याता । अत एव तेषु बौद्धधर्मस्य सारल्येन प्रवेशः सञ्जातः । ' यदु यहाँ मनुष्य को कहा गया है । याद्व शब्द का प्रयोग भी इसी अर्थ मे हुआ है । राजा तिरिंदर के लिये मै मनुष्यों से सैकडो और हजारो रुपये जुटा देता हूँ । अथवा यदुकुल में उत्पन्न हुए तथा अन्य राजाओ से उनका घन जबरदस्ती छोन कर मै तिरिदिर को दे देता हूँ' । ' उदानट्' इत्यादि द्वितीय मन्त्र का सायण ने यह अर्थ किया है -' यह राजा तिरिंदिर धन से संपन्न होकर अपनी कीर्ति से भी उत्कृष्ट स्वर्गलोक को व्याप्त कर लेता है, जब कि यह चार स्वर्णभार से युक्त ऊँटो का और दासजनो का दान करता है' । यहाँ तिरि शब्द के आने से देशान्तर मे विद्यमान मनुष्यो का उससे बोध होता हो, ऐसी बात नहीं है । शब्द की समानता को देखकर बिना प्रमाण के वेद का अर्थ नही निश्चित किया जा सकता । ऐसा मानने पर शब्द की समानता को देखकर यदि अर्थ का निश्चय किया जायगा तो सकृत् और शकृत् आदि शब्दो का एक ही अर्थ करने पर महान् अनर्थ हो जायगा । सकृत् शब्द का अर्थ एक बार और शकृत् शब्द का अर्थ विष्ठा होता है । इसी तरह से सकल का अर्थ संपूर्ण और शकल का अर्थ टुकडा तथा स्वजन का अर्थ अपने संबन्धी और वजन का अर्थ कुत्ता होता है । ऐसा मानने पर तो गिर्जाघर को गिरिजा (दुर्गा देवी ) का मन्दिर भी कह सकेंगे । इसी लिये एक सुभाषित में कहा गया है-' हे पुत्र, यदि तुमको ज्यादा नही पढना है, तो भी थोड़ी- बहुत व्याकरण तो अवश्य पढ लो, जिससे तुम स्वजन और श्वजन, सकल और शकल, सकृत् और शकृत् इस तरह के शब्दो के अर्थ को ठीक से समझ सको ' । बेवर ने कहा है कि ' मेगस्थनीज 'माडि आण्डि नोई' नाम के लोगो का उल्लेख करता है और यह नाम ' माध्यन्दिन ' में मिलता है जो कि शुक्ल यजुर्वेद की प्रमुख शाखा है' ( पृ० ५ ) यह कथन भी असंगत है, क्योकि माध्यन्दिन संहिता में यह शब्द नही मिलता । 'सिकन्दर ने सिन्ध नदी के तट पर जिन जातियो और जनो को पाया, वे नितान्त वैदिक अवस्था में है, ब्राह्मण संस्कृति के धरातल पर नही । वस्तुतः यह सत्य भी है, किन्तु स्वयं भारत के संबन्ध में इससे कुछ भी निष्कर्ष निकालना तर्कसंगत न होगा । कारण, पंजाब की ये जातियाँ कभी भी ब्राह्मणीय व्यवस्था के प्रभाव में न आ सकी । ये जातियाँ अपनी वैदिक जीवनदृष्टि पर स्थिर एवं पुरोहितो की वर्णव्यवस्था के प्रभाव से मुक्त बनी रही । इसी कारण से ये अपने उन बन्धुओं की घृणा का पात्र बन गई, जो आगे फैल चुके थे और इसी कारण उनमे बौद्ध धर्म को भी सहज ही प्रवेश मिल गया' ( पृ ० २२ भू० ) । यह कथन भी कुछ सिद्ध नही
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१२ वेदार्थपारिजातः इत्यादि च यत्किञ्चित्, वर्णाश्रमधर्मस्य वैदिकधर्मानतिरिक्तत्वात् । ऋग्वेदादिषु - 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्' ( ऋ ० सं ० १०।१०।१२ ) इत्यादिभिर्वर्णभेदस्य प्रतिपादितत्वात् । यथा परवर्तिकाले विपरीतप्रचारबाहुल्येन वर्णाश्रमनिष्ठाशे थिल्ये सति बौद्धादिधर्मप्रवेशस्तथैव तत्रापि सम्भवात् । यदपि च- 'भारतीयसाहित्यस्योदृङ्कितै विवरणः स कालः सम्भाव्यते, यदा इण्डो- आर्यन ( भारतीया आर्या: ) पर्सियन्- आर्यन ( पारसदेशीया आर्या. ) च सहैव निवसन्ति स्म । तस्य साहित्यस्य प्राचीनत्वपुष्टि भौगोलिकैः प्रमाणैरपि भवति, तथापि तत्रत्यवण्यं विषयेषु तद्विषये आन्तराण्यपि प्रमाणानि नाल्पीयासि' इति, तदपि निर्मूलम्, तादृशप्रमाणानामनुपस्थापितत्वात् । यदपि च-' ऋक्सूक्तेषु जनताया अप्रतिहता शक्तिः प्रकृत्या सह सम्बन्धभावनां सहजनवीनतया सरलतया चाभिव्यनक्ति, प्रकृतिशक्तीनां पूजा श्रेष्ठप्राणिना रूपेण भवति, विभिन्नक्षेत्रेषु ताभ्यो दयापूर्णसाहाय्य याच्यते । सा च प्रकृतिपूजा सर्वत्रैव प्रकृतेव्यंक्तिगतेषु दृग्विषयेष्वेव, तत्राप्यतिमानवीयेष्वस्तित्वेषु सीमिता । तत आरम्य भारतीय-साहित्येषु हिन्दुजनतायाः प्रगति धार्मिकविकासस्य च तासु सर्वास्ववस्थासु वयं पश्यामः, याभ्यो मानवमस्तिष्क प्रगतिमुपगतम्, ते वैयक्तिका दृग्विषयाः प्रथमतोऽतिमानवीयत्वाम्मस्तिष्क प्रभावयन्ति । शनैः शनैविभिन्न क्षेत्रीयैर्वर्गे-विभक्ताः, अनया रीत्या अनेका देवीः सत्ताः समुपगच्छामः, यासु प्रातिस्विक्यः स्वीयेषु विशिष्टक्षेत्रेषु सर्वोच्चशक्ति- सम्पन्ना भवन्ति । यासा प्रभावाः कालक्रमेण मानवजीवनस्य समरूपाः सर्वा घटना: प्रभावयन्ति । एता देव्यः सत्तामानवीयगुणैरवयवैश्च युक्ता भवन्ति । एतासां प्राकृतिकदेवतानां प्रकृतिशक्तीनामधिष्ठातॄणां संख्याः प्रथमत एव पर्याप्ता आसन् । पुनश्च नैतिक सम्बन्धैरुद्भूतभावात्मकसत्ताभिः संयोजनेनेय संख्या ततोऽपि वर्धते । एतास्तथाग्या : -अपि देवता देवीभि शक्तिभिर्वेयक्तिकैर्जीवनैश्च विशिष्टकार्येश्च युज्यन्ते । देव्याः सत्तायाः सन्दर्भे जिज्ञासा कर पाता, क्योंकि वर्णाश्रम धर्म वैदिक धर्म से अतिरिक्त नहीं है । ॠग्वेद आदि में ' ब्राह्मण इस पुरुष का मुह था' इत्यादि मन्त्रो से वर्णभेद का प्रतिपादन हुआ है । जैसे परवर्ती काल में वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध जोरो का प्रचार होने से वर्णाश्रम धर्म में श्रद्धा कम हो जाने पर बौद्ध आदि धर्मों को जनता स्वीकार करती रही है, वही स्थिति उपर्युक्त काल में भी हो सकती है । 'भारतीय साहित्य के लिखित विवरणो का समय संभवतः वह समय हो सकता है, जब इण्डो -आर्यन ( भारतीय आर्य) पेर्सा आर्यन (फारस के आर्य) के साथ निवास करते थे । इस साहित्य के नितान्त प्राचीनता के दावे की पुष्टि बाह्य भौगोलिक प्रमाणों से होती है, फिर भी इस दिशा में उनके वर्ण्य विषयो में ही पाये जाने वाले आन्तरिक प्रमाण भी कम निर्णायक नही है' (१० २२-२३ भू० ) । यह कथन भी निर्मूल है, क्योंकि इस तरह के कोई प्रमाण यहीं नहीं दिये गये है । 'ऋक्- सूक्तों में जनता की अप्रतिहत शक्ति प्रकृति के साथ संबन्ध की भावना को सहज नवीनता और सरलता के साथ अभिव्यक्त करती है । प्रकृति की शक्तियों की पूजा श्रेष्ठ प्राणियो के रूप में होती है और विभिन्न क्षेत्रों में उनकी दयापूर्ण सहायता की याचना की जाती है । प्रकृति की यह पूजा सर्वत्र केवल प्रकृति के व्यक्तिगत दृग्विषयों और वह भी उनके अतिमानवीय अस्तित्वों तक ही सीमित है । इनसे प्रारम्भ कर हम भारतीय साहित्य में हिन्दू जनता की प्रगति धार्मिक विकास की उन सभी अवस्थाओं में देखते हैं, जिनसे होकर सामान्य मानव मस्तिष्क गुजरा है । प्रकृति के व्यक्तिगत दृग्विषय, जो प्रथमतः अतिमानवीय होने से मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं, शनैः शनैः विभिन्न क्षेत्रीय वर्गों में विभक्त कर दिए जाते हैं । इस प्रकार हम अनेक देवी सत्ताओं पर आ पहुँचते है, जिनमें से प्रत्येक अपने विशिष्ट क्षेत्र मे सर्वोच्च शक्तिमान् है, जिसका प्रभाव समय के साथ-साथ मानव-जीवन की समरूप घटनाओं तक आ जाता है । ये देवी सत्तायें भी मानवीय गुणों एवं अवयवों से युक्त हो जाती है । इन प्राकृतिक देवताओं या प्रकृति की शक्तियो के अष्ठाताओं की संख्या पहले ही काफी थी । पुनः नैतिक संबन्धो से उद्भूत भावात्मक सत्ताओ को जोड़ देने से यह संख्या और भी बड़ी हो जाती है । इन्हें अन्य देवताओं को दैवी शक्ति, व्यक्तिगत जीवन और विशिष्ट कार्य से युक्त कर दिया जाता है । इन देवी
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वेदार्थपारिजातः ६१३ प्रबृत्तिर्मव्याया व्यवस्थायाः समानयनाय प्रयतते । तासां प्रमुखप्रभावानुसारेण वर्गीकरणं भवति । आकाशान्तरिक्ष पृथिवी- सम्बधिन्यो देवता उपलभ्यन्ते, तासु सूर्य- वायु- वह्नयस्तत्स्वामित्वेन मन्यन्ते । एतास्तिस्रो देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यः प्रधाना गण्यन्ते । अन्यास्तदनुयायिन्यो गण्यन्ते । एभिर्वर्गीकरणः परिपोषमुपगम्य कल्पना पुरःसरति । एतासां स्थाननिर्धारणाय परमात्मनैक्यमुपगन्तु च प्रयत्यते । ब्रह्मरूपनितान्तस्वतन्त्रसत्ताकल्पनया तत्सम्पद्यते । सूर्यादयश्च नदधीमस्थदेवता भवन्ति । एतासां मध्ये चैका सर्वोच्चदेवतारूपेण पूज्यते । सर्वप्रथममिद संमान सूर्याय प्रत्तम् । पारसीका आर्या इमं दृष्टिकोणमभिरक्ष्यैव विस्तारं कृतवन्तः । ब्राह्मणेष्वपि तत्र तत्र सूर्यदेवताया अन्यदेवताभ्य उत्कर्ष उपलभ्यते— ' सविता देवानाम्' पूजाविधानेष्वेतत्सम्बन्धीनि चिह्नान्युपलभ्यन्ते 1। ब्रह्मणः पुल्लिङ्गरूपमप्यनेन सूर्येण पर- वर्तिकाले धारितम् । यद्यपि तस्य गौरवं पर्याप्तं क्षीणतामुपगतम् । इन्द्रियगोचरत्वादधिक प्रत्यक्ष प्रभावत्वाद् वायुनाग्निना च शनैः शनैः पूर्णरूपेण सर्वोच्चसत्ताऽधिगता । यद्यपि तौ निरन्तरसङ्घर्षरता वेवास्ताम् । इय पूजा विभिन्नास्ववस्थासु प्रलम्बमानया शृङ्खलया समुपगता, संवावस्था मेगस्थनीजेन भारते दृष्टा । पेरिप्लसस्य समये सुदूरदक्षिण यावत् प्रसृता । यद्यपि तस्याः स्वरूप पर्याप्तमुपभ्रष्ट स्यात् । एवं भारतीयसाहित्यस्य प्राचीनत्वं तु सिद्धयति, तथापि निश्चितकालक्रमानुसारिणीना तिथीनां सम्बन्धेऽसन्तो-षावहैव परिस्थितिरुपलभ्यते । स्ट्रवो ( पृ ० ११७ ) रीत्या डिओनुसस ( रुद्रसोमशिवानां ) पूजा पर्वतीयप्रदेशे प्रचलति स्म, ( )हाक्लीज इन्द्रविष्णु पूजा च समतलप्रदेशे । वैदिकसूक्ताना भाषाया जनभाषापर्यंन्तमागमनायानेकाः शताब्द्यो व्यतीताः । एतावता प्राचीनतैव सिद्धयति' इत्यादिकं सर्वमपि कल्पनाप्रसूतमेव, वैदिकशब्देरेव वेदानामनादित्वस्य सत्ताओं के सन्दर्भ में आगे चलकर जिज्ञासा की प्रवृत्ति एक नई व्यवस्था लाने का प्रयत्न करती है और उनके प्रमुख प्रभाव के अनुसार उनका वर्गीकरण करती है । हम ऐसे देवताओ को पाते है, जो आकाश में, अन्तरिक्ष मे और पृथ्वी पर अपने कार्य मे लगे हैं और इनमे सूर्य, वायु तथा अग्नि को क्रमशः प्रतिनिधि और स्वामी माना गया है । ये तीनो देवता शनैः शनैः अन्य देवताओ के ऊपर प्राधान्य प्राप्त कर लेते है, जिन्हे उनका अनुयायी या सेवक मान लिया गया है । इन वर्गीकरणो से पुष्ट होकर कल्पना आगे बढती है और इन तीन देवताओ का आपेक्षिक स्थान निर्धारित करने एवं परमात्मा के ऐक्य पर पहुँचने का प्रयत्न करती है । यह कार्य या तो चिन्तन से वस्तुतः एक संप्रभु और नितान्त स्वतन्त्र सत्ता, अर्थात् ब्रह्मन् की कल्पना द्वारा सिद्ध होती है, जिससे आगे ये तीनो देवता अधीनस्थ देवो या सेवकों के रूप में आते है, अथवा इनमें से एक या दूसरे देवता की पूजा सर्वोच्च देवता के रूप में होने लगती है । सर्व प्रथम यह संमान सूर्य देवता को दिया गया है, फारस के आर्यों ने इस दृष्टिकोण को बनाये रखा और निःसन्देह उन्होने इसका और आगे विस्तार किया । ब्राह्मण ग्रन्थों के अधिक प्राचीन अंशो मे भी - जिनसे काल और वर्ण्य विषय की दृष्टि से अवेस्ता संहिता की - अपेक्षा अधिक संबन्ध रखता है – हम स्थान-स्थान पर सूर्य देवता को अन्य देवताओ से बहुत ऊपर उठा हुआ पाते हैं ( सविता देवानाम् ) । हम इसके पर्याप्त चिह्न पूजा की विधाओं में भी पाते है, जिनमें प्राय: अतीत के अवशेष सुरक्षित है । यही नहीं, ब्रह्मन् ( पुल्लिंग ) के रूप में उसने सिद्धान्ततः इस पद को बहुत बाद के समय तक धारण किया है, यद्यपि उसका गौरव बहुत कुछ समाप्त हो चुका है । अधिक प्रत्यक्ष एवं इन्द्रिय-गोचर प्रभाव के कारण उसके सहयोगियो, वायु और अग्नि ने शनैः शनैः सर्वोच्च सत्ता का पद पूर्ण रूप से प्राप्त कर दिया, यद्यपि वे परस्पर निरन्तर संघर्षरत बने रहे । यह पूजा विभिन्न अवस्थाओं की लम्बी शृंखला से होकर गुजरती है और स्पष्टतः यह वही अवस्था है, जिसे मेगस्थनीज वे भारत में पाया है और जो पेरिप्लस के समय में सुदूर दक्षिण तक फैल चुकी थी, भले ही इसका स्वरूप पर्याप्त भ्रष्ट हो चुका था । इस प्रकार भारतीय साहित्य का समय अत्यन्त प्राचीन मानना संगत तो है, किन्तु हिन्दू धर्म के इतिहास के साथ संबद्ध बाह्य भौगोलिक आधारों तथा आन्तरिक प्रमाणों की दृष्टि से जब हम निश्चित कालक्रमानुसारी तिथियो का अन्वेषण करते हैं, तो स्थिति पर्याप्त असन्तोषजनक सिद्ध होती है । 'स्ट्रावो ( पृ० ११७ ) के अनुसार 'डिमोनुसस' ( रुद्र, सोम, शिव ) की पूजा पर्वतीय क्षेत्रों में होती थी और 'हाक्लीज ' ( इन्द्र, विष्णु ) की पूजा मैदानों में होती थी' । 'वैदिक सूक्तों की भाषा के इस भाषा तक पहुँचने ११५
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II वेदार्थपारिजाल साधितत्वात् । न च विकासक्रमेण सूर्यवाय्वग्न्यादिषु देवतात्व कल्पितम्, किन्तु नित्यसिद्धवैदिकैः शब्देरेव सूर्यादीना स्थूलसूक्ष्मरूपेण स्पष्टमुपदर्णनात् । सूर्यादीना तत्प्रकृतीना चोत्पत्तयोऽपि वेदे वर्णिताः । ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्प-यत्' ( ऋ ० सं ० १०।१०1३ ) । तत्तदन्तर्यामिरूपस्य ब्रह्मणस्तत्तदधिष्ठातृदेवाना च देवताधिकरणादी स्पष्टमुपवर्ण-नात् । वेबरप्रभृतयः पाश्चात्त्यास्तु भारतीयसाहित्यविवेचन प्रणालीपरिचयाभावादेव भ्राम्यन्ति, यत्किञ्चिच्च प्रजल्पन्ति । ब्रह्मात्मतत्त्वमपि न कल्पनाप्रसूतम्, किन्तु प्रत्यक्षावगत विवेकविधूततमस्कानाम् । यदुक्तम्- 'वेदाश्चत्वारः । तत्र ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेदा द्वाभ्यां पाठाभ्या विभक्ता, अथर्ववेदश्च त्रिधा विभक्तः । तेषु प्रत्येक सहिता ब्राह्मण सूत्ररूपेण विभक्त:' इति, तदपि न युक्तम्, महाभाष्यादिरीत्या वेदचतुष्टयस्यै-कत्रिंशदुत्तरंकादशशतशाखारूपेण विभक्तत्वात् । तत्रैकविंशतिवा बाह्यच्यम्, सहस्रवर्त्मा सामवेद, एकशतमध्वर्यु- ', ':' ( )शाखा नवधाथर्वाणः । एता मानवबुद्धिग्राह्याः । स्वभावतस्तु अनन्ता वै वेदा तै ० ब्रा० । साम्प्रत लोके लुप्ता अपि ताः सूर्यलोके विद्यन्त इति वायुपुराणादिभिरवगम्यते । सूत्रग्रन्थास्तु न वैदिको भागस्तेषामपौरुषेयत्वा- भावात् । यदुक्तम्— 'ऋग्वेदसंहिता गीतसंग्रहात्मिका । तेषा गीतभाण्डागारस्थानीया सा । यान् स्वनिवासस्थानात् सिन्धुतटादार्या आनीतवन्तः । यत्र स्वपशूनां समृद्धये उषसो विद्युद्धारिण्या देवतयाऽन्धकारेण च सङ्घर्षस्य प्रशस्तयः, युद्धप्रसङ्गे रक्षित्रीणां देवतानां धन्यवादप्रकाशनानि च सन्ति । कविकुलानुसारेण तेषां गीतानां वर्गीकरणानि । वर्गीकरणसिद्धान्तस्तु वैज्ञानिक इति वक्तुं शक्यते । येनेदं विज्ञायते यद्विवेचयिष्यमाणयोः सहितयोः परवर्तिकाले में अवश्य हो अनेक शताब्दियां बीत चुकी होगी । इससे इस भाषा की प्राचीनता ही सिद्ध होती है' ( पृ० २३-२४ मूल व टिप्पणी) । यह सारा कथन की कल्पना का विलास मात्र है, क्योकि हम भी वैदिक वाक्यों से ही वेद की अनादिता को सिद्ध कर चुके है । विकास- वाद के क्रम से सूर्य, वायु, अग्नि आदि में देवता स्वरूप की कल्पना नही की गई है, किन्तु नित्य सिद्ध वैदिक शब्दो से ही इनका स्थूल और सूक्ष्म रूप में स्पष्ट वर्णन किया गया है । सूर्य प्रभृति की और इनकी प्रकृतियो की उत्पत्ति भी वेद में वर्णित है । ऋग्वेद में बताया गया है कि 'ब्रह्मा ने पूर्व कल्प के समान इस कल्प में भी सूर्य और चन्द्रमा की रचना की । उस उस पदार्थ के अन्तर्यायी रूप ब्रह्मा की ओर उन उन पदार्थों के अधिष्ठाता देवताओं की चर्चा देवताधिकरण में की गई है । बेवर प्रभूति पाश्चात्य विद्वान् भारतीय साहित्य की विवेचना पद्धति का ज्ञान न होने से भ्रम में पड जाते हैं और मनमानी बातें गढने लग जाते है । ब्रह्मात्मतत्व भी कल्पना की उपज नही है, किन्तु विवेक के द्वारा अपने अज्ञान को दूर कर लेने वाले साधकों को उसका प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त हो सकता है । 'वेद चार है: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद - जो दो पाठों में हैं, तथा अथर्ववेद । इनमें से प्रत्येक अलग अलग तीन भागों में विभक्त है- संहिता, ब्राह्मण और सूत्र' (पृ० ३ ) यह कथन भी ठीक नही है । महाभाष्य के अनुसार चारों वेद ११३१ शाखाओं में विभक्त हैं । इनमें से ऋग्वेद की २१, सामवेद की एक सहस्र ( १००० ), यजुर्वेद की एक सौ एक ( १०१ ) और अथर्ववेद की ९ शाखाएँ है । ये शाखाएँ मनुष्यों की बुद्धि में आने वाली हैं । वास्तव में तो वेद अनन्त है । ये सब शाखाएँ यद्यपि अब लोक में लुप्त हो गई है, किन्तु वायुपुराण आदि से ज्ञात होता है कि सूर्यलोक में वे सब शाखाएँ अब भी सुरक्षित हैं । सूत्र ग्रन्थों को वेद का भाग नहीं माना जाता, क्योंकि वे अपौरुषेय नही है । ऋग्वेदसंहिता पूर्ण रूप से एक गीतात्मक संग्रह है और इसके अन्तर्गत गीतों का वह भाण्डार है, जिसे हिन्दू सिन्धु नदी के तट पर स्थित अपनी प्राचीन निवास भूमि से अपने साथ ले आये थे और जिसका प्रयोग वे वहाँ पर अपनी तथा अपने पशुओं की समृद्धि के लिये, उषा की बन्दना, विद्युत् धारण करने वाले देवता और अन्धकार के बीच संघर्ष के प्रशस्तिगान और युद्ध में रक्षा करने वाले देवताओं के प्रति धन्यवाद प्रकाशन के लिये करते थे । इनमें गीतो का वर्गीकरण उन कवियों के कुलो के आधार पर किया गया है, जिनकी ये रचना बताये जाते हैं । इस वर्गीकरण के सिद्धान्त को नितान्त वैज्ञानिक कहा जा सकता है । इस कारण यद्यपि अधिक तो नहीं कहा जा सकता, फिर भी यह संभव है कि इस संहिता का संकलन आगे विवेचित की जाने वाली उन दो संहिताओं
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वेदार्थपारिजातः ६१५ संहितेयं सगृहीता । निश्चितविधानेन देवपूजनसंस्थाया अस्तित्वोद्गमकाले यस्यापेक्षासोत् तस्य पूर्तिर्जातेति तत्सर्वमपि निर्मूलमेव, व्याप्तिग्रहाभावेन तादृशानुमानासम्भवात्, कल्पनामात्रस्याप्रामाणिकत्वात् । यदुक्तम् -'सामवेदयजुर्वेदसहितयोस्तादृशा एव ऋङ्मन्त्राः समायान्ति येषा पाठाः सोमादियज्ञादिपु भवन्ति । येन क्रमेण यज्ञेषु मन्त्राणामुपयोगो भवति तेनैव क्रमेण तत्र पाठोऽपि भवति' इति, तदपि यत्किञ्चित्, तावता संहितासङ्कलनस्य परवर्तित्वासम्भवात् । विकासक्रमाङ्गीकार एवैतत्सम्भवति । पूर्वमीमालकाना दृष्ट्या वेदा अनादयोऽ पौरुषेयाश्च । उत्तरमीमासकाना दृष्ट्यापि सर्वज्ञात् परमेश्वरानि श्वासन्यायेन वेदाः प्रादुर्भवन्ति । निःश्वासस्य निद्राकालेऽपि सत्त्वाद् विशिष्टबुद्धिप्रयत्ननिरपेक्षत्ववद् वेदानामपि बुद्धिप्रयत्न निरपेक्षतया पुरुषस्वातन्त्र्याभावेना- पौरुषेयत्वोपगमात् । तेन वेदा. पशुपालकानामार्याणा कविनिर्मितगीतरूपास्तेषु कश्चिद् भागः प्राचीनः कश्चिदर्वाचीन इत्यादिकल्पनाः सारशून्या एव । एतेन 'सामसहितासु ऋक्संहिताया ऋचामेवोद्धरणम्, न तदतिरिक्तमन्यत्' इत्यपास्तम्, गोतिब्बेव . सामशब्दप्रयोगात् । ऋचश्च यथा सामसु विद्यन्ते तथैव यजु सहितास्वथर्वसंहितासु च विद्यन्ते । अत एव ऋक् संहिताया एव ऋचः सर्ववेदेषूद्धियन्त इत्यपि निर्मूलम्, यजु. संहितादिषूपलभ्यमानानां बह्वीनामृचामृक्सहित स्वनुप लम्भात् । अत एव यदुक्तम् 'सामसहितायां यजुःसहिताया चोपलभ्यमानानामृचा परिवर्तितरूपेणोपलम्भन भवति' इति, तदपि न युक्तम्, वेदानुपूर्वीणामेकरूपेण तत्र परिवर्तनासम्भवात् । किन्तु तत्रत्या ऋचस्तथाविधा एव नित्या. । पाठरक्षणाय पद क्रम जटा- मालादयो विकृतयोर्वेदिकेषु प्रचलिताः सन्ति । अत एव वेदेषु मात्रास्वरादिपरिवर्तनस्य के समय से परवर्ती काल का है, जो एक व्यावहारिक अभाव की पूर्ति करने के कारण निश्चित विधि से युक्त देवपूजन संस्था के अस्तित्व में आते ही आवश्यक हो गई थी' ( पृ० ३) । यह सारा कथन भी निर्मूल है, क्योकि जहां पर व्याप्ति का ज्ञान नही हो पाता, वहाँ अनुमान प्रमाण की प्रवृत्ति नही हो सकती । कोरी कल्पना प्रामाणिक नही मानी जा सकती । 'सामवेद संहिता और यजुर्वेद को दोनो सहिताओ में केवल ऐसी ही ऋचाएँ ( मन्त्र ) और याशिक ( यजुस्) मन्त्र है, जिनका पाठ सोमयज्ञ और अन्य यज्ञो मे किया जाता था और वे है भी उसी क्रम मे, जिस क्रम में उनका व्यवहारतः उपयोग होता था' ( पृ० ३ ) इस कथन में भी कुछ दम नही है । इतना मान लेने पर भो यह सिद्ध नही हो पाता कि संहिता का संकलन बाद में हुआ था । विकास का क्रम मानने पर ही वह संभव हो सकता है । यहाँ पर तो पूर्व मीमासको की दृष्टि से बेद अनादि और अपौरुषेय है और उत्तर मीमासको के मत से भी सर्वज्ञ परमेश्वर से वेदो का प्रादुर्भाव उसी तरह स्वाभाविक रूप से होता है, जैसा कि श्वास- प्रश्वास की स्वाभाविक गति होती है । श्वास-प्रश्वास की गति निद्रा की दशा में भी स्वाभाविक रूप से चलती रहती है । इसके लिये विशेष प्रयत्न की अथवा बुद्धि के विशेष व्यापार की आवश्यकता नही रहती, इसी तरह से वेदो के प्रादुर्भाव में परमेश्वर के प्रयत्न अथवा बुद्धि व्यापार की अपेक्षा न रहने से, अर्थात् इस वेद के प्रादुर्भाव के लिये परमेश्वर रूप परम पुरुष की भी स्वतन्त्रता न रहने से अपौरुषेयता मानी जाती है । इस तरह से वेदो के मन्त्र पशुओ को चराने वाले आर्यों के गीत मात्र है । इनमे से कुछ मन्त्र प्राचीन और कुछ नवीन है, इस तरह की सारी बातें सारहीन कपोल कल्पनाएँ है । उक्त प्रतिपादन से इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि 'सामवेद की संहिताओ में ऋक्संहिता की ऋचाओ के उद्धरण के सिवाय और कुछ नहीं है' ( पृ० ३ ), क्योंकि साम शब्द का प्रयोग केवल गीतो में ही होता है । ऋचाएँ जैसे सामवेद में मिलती हैं, उसी तरह से यजुः संहिता और अथर्वसंहिता में भी मिलती है । इसी लिये ऋग्वेद की ऋचाएं ही सर्वत्र उद्धृत है, यह कथन सर्वथा निराधार है, क्योकि यजुःसंहिता आदि में उपलब्ध होने वाली अनेक ऋचाएँ ऋक्संहिता में नही मिलती । इसी लिये यह कथन भी ठीक नही है कि -'सामसंहिता और यजुःसंहिता में पायी जाने वाली ऋचाएँ अशतः बहुत बदले हुए रूप में मिलती हैं' (पृ० ४), कमोकि वेद की आनुपूर्वी का एक ही रूप रहता है, उसमे किसी तरह का परिवर्तन नही हो सकता । जो ऋचा जहाँ जिस रूप में है, वहीं वह उसी रूप में नित्य मानी जाती है । प्रत्येक संहिता के अपने पाठ को रक्षा के लिये पद, क्रम, जटा, माला
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६१६ वेदार्थ पारिजातः दोषत्वमङ्गीकृतम् । ' मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्जो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्र- शत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ ' ( पा० शि ० ५१ ) इत्यभ्युपगमः । यदुक्तम्- 'पाठपरिवर्तनं त्रिधा व्याख्यातुं शक्यते - इमे सामादिसहितापाठा ऋग्वेदपाठापेक्षया अत्यन्त- प्राचीना मौलिकाश्च । याज्ञिकप्रयोगवशादेव ते परिवर्तनात् सुरक्षिताः । अन्या ऋचो यज्ञक्रियाभिः प्रत्यक्षसम्बन्धा -: भावात् तादृशावधानराहित्ये परिवर्तनमुपगता । यद्वा यज्ञप्रयोगानुसारेणार्थसाङ्गत्याय सामादिगताः पाठा एव पश्चात् सम्पन्नाः । अथवा ऋग्वेदपाठः समाना एव संहितान्तरपाठा अपि प्रदेशानां कुलानां च वैविध्यात् तत्रासङ्गतय उत्पन्नाः । यत्रैतेषां मन्त्राणा प्रयोगाः प्रचलन्ति स्म, तत्र प्रदेशेषु कुलेषु चैतेषामेव सर्वाधिक प्रामाणिकत्वमासीत् । यत्र प्रदेशेषु कुलेषु वा पश्चात्तेषां प्रचारः सञ्जातस्तत्र तेषा तादृशं प्रामाणिकत्व नासीत्' इति, तदपि यत्किञ्चित्, शाखाभेदेनंव मन्त्राणां भेदस्य वैदिकैरभ्युपगतत्वात् । यथा पुरुषसूक्तस्य शाखाभेदेन सर्वेषां पाठाना सर्वत्र समानरूपेण प्रामाणिकत्वम्, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञातव्यम् । यच्च 'सामसहितान्तर्गताना मन्त्राणामतिप्राचीनव्याकरणनिष्पन्नरूपत्वे- नाधिकप्राचीनत्वं मौलिकत्व च, यजुर्वेदादिसंहितासु तद्वैपरीत्येन परिवर्तितत्वमवगम्यते' इति, तदपि न सङ्गतम्, यजुःसामसंहितयोरपि प्राचीनव्याकरण निष्पन्नरूपस्य बाहुल्येनोपलम्भात् ॥ वस्तुतस्तु छन्दसि दृष्टानुविधित्वेन व्याकरणान्येव मन्त्राननुसरन्ति न मन्त्रा अनुव्याकरणानि, नित्यत्वश्रुतिविरोधात् । बेवस्महाशयेन यदुक्तम्-'मौखिक सक्रमणद्वारा जनसाधारणभाषासु सूक्तेषु गीतेषु च यत्परिवर्तनं तदधिक महत्त्वपूर्ण मित्यत्र नाधिक बलमुपस्थापयितुं शक्यम् । यतो लेखनद्वारा चैतेषां स्वरूपं सुरक्षितमासीदिति कल्प प्रभृति विकृतियाँ वैदिक परम्परा में प्रचलित है । इसी लिये वेद मे एक मात्रा या स्वर का परिवर्तन कर देने पर भी उसको दोष माना गया है । पाणिनि शिक्षा मे यह स्वीकार किया गया है कि-'मन्त्र यदि एक मात्रा और स्वर से भी च्युत हो जाता है तो इस गलत प्रयोग के कारण वह अपने वास्तविक अभिप्राय को नही सिद्ध कर पाता । इस तरह का गलत प्रयोग एक प्रकार से वाणी रूपी वज्र का स्वरूप धारण कर यजमान को ही नष्ट कर देता है, जैसा कि ' इन्द्रशत्रु ' इस समस्त पद में स्वर के उच्चारण में गलती होने से इन्द्र ने ही वृत्र का वध कर दिया । ' 'इन पाठ परिवर्तनों की व्याख्या तीन प्रकार से संभव हो सकती है । पहले, ये पाठ ऋग्वेद के पाठो की अपेक्षा अधिक प्राचीन और मौलिक होगे और उनके याज्ञिक प्रयोग ने इन्हें परिवर्तन से सुरक्षित रखा, जब कि सीधे-सादे गीत का यज्ञ-क्रिया से प्रत्यक्ष संबन्ध न होने से उसकी सुरक्षा उतनी सावधानी से न हो सकी । या दूसरे, वे ऋग्वेद के पाठो के बाद के पाठ होगे और मन्त्र की याज्ञिक प्रयोगानुसारी अर्थ से संगति बैठाने के लिए उत्पन्न हुए होंगे । अथवा अन्ततः वे ऋग्वेद के पाठों के समान ही प्रामाणिक होगे और वे असंगतियाँ उन प्रदेशों और कुलो की विविधता के कारण उत्पन्न हुई होंगी, जिनमें इन मन्त्रों का प्रयोग होता था । वह पाठ का उस प्रदेश या कुल में सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता था, जिसमे उसका उद्भव होता था और उनमें कम प्रामाणिक होता था, जिनमें उसका प्रचार बाद में होता था' (पृ० ४ ) यह कथन भी निराधार है, क्योंकि वैदिक परम्परा में शाखा के भेद के अनुसार मन्त्रों में भी भिन्नता मानी जाती है । जैसे शाखा के भेद से विद्यमान पुरुष सूक्त के सभी पाठो को सर्वत्र समान रूप से प्रामाणिक माना जाता है, उसी तरह से इन पाठभेदो के विषय में भी मानना चाहिये । 'सामसंहिता में आने वाली ऋचाएं अधिक पुरावे व्याकरण रूपों के कारण सामान्यतः अधिक प्राचीनता और मौलिकता की छाप लिये हुए है, किन्तु इसके विपरीत, यजुर्वेद की दोनों संहिताएं कालान्तर में परिवर्तित होने का भान कराती है ( ०४ ) यह कथन भी सही नही है, यजुःसंहिता और सामसंहिता में भी प्राचीन व्याकरण से निष्पन्न रूपो की बहुलता देखने को मिलती है । वास्तव में व्याकरण का यह सामान्य नियम है कि वेद मे जैसा देखा जाता है, उसी रूप को व्याकरण की भी मान्यता मिल जाती है । इस तरह से व्याकरण ही मन्त्रों का अनुसरण करते है, मन्त्र व्याकरण का अनुसरण नहीं करते । यदि मन्त्रों को व्याकरण के नियमों का अनुसरण करने वाले मान लिया जाय तो उनकी नित्यता को बनाने वाली श्रुतियाँ बाधित हो जायेंगी ।
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दार्थ पारिजातः ६१७ यितुमपि न शक्यम्, ब्राह्मणानामपि कालसम्बन्धे नैतद्वक्तु शक्यते, अन्यथैतत्सम्बद्धासु रचनास्वपि ये भेदा विभिन्न शाखासु बृहतीभिः संख्याभिरुपलभ्यन्ते तेषां कारणनिर्देशो विषम एव स्यात्' इति, तदपि यत्किञ्चित्, विद्यमानाना- मेव विभिन्न ( शाखीय ) मन्त्राणामेव व्यासादिभि: शाखाभेदेन विभागकरणात् । यदुक्तम्- 'यद्यपि ऋग्वेदीयगीतानी' रचना सिन्धुनद्यास्तटे खञ्जाता, तथापि तेषामन्तिमरूपेण सङ्कलनं भारत एव सम्पन्नम्' इति, तदपि निर्मूलम्, निष्प्रमाण त्वात्, 'वाचा विरूपनित्यया' ( ० सं ८२७५/६), (पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतद्वचुः', 'अत एव च नित्यत्वम्' ( ब्र० सू० १ | ३।२ ९ ) इति विरोधात् । एतेन कस्मिन् काले तत्सङ्कलनं जातमिति निर्धारणं कठिनमेव । केचिदशास्तु वर्णव्यवस्थायाः स्थापनादप्यर्वाचीना एवेत्यपि कल्पनामात्रम्, वर्णव्यवस्थाया अपि वेदसिद्धत्वेन वेदवदेवानादित्वात् । - ' - - यदपि शाकल्य पञ्चाल बाभ्रव्यादि ऋग्वेदीयपरम्परया महत्त्वपूर्ण भागस्य विदेहानां पञ्चालाना च समृद्धियुगसूचकत्वात् तात्कालिकत्वम्' इति, तदपि न समीचीनम्, तेषां नाम्नामाख्यायिकारूपेण सुखावबोधार्थत्वेन तैः कालविशेषसबद्धानां जातीनां व्यक्तीनां च बोधासम्भवात्, 'शब्द इति चेन्नातः प्रभवात्प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्' ( ब्र ० सू० १।३।२८ ) इति ब्रह्मसूत्रादिसिद्धान्तानभिज्ञानमूलत्वाच्च । अत एव सामसंहितायाः पूर्णतया ऋग्वेदादुद्धृतत्वात् तस्या उद्भवकालसम्बन्धे नान्यत् किञ्चित् सूत्रं शिष्यते' इति, तदपि न, पूर्वमेव खण्डितत्वात् । यदपि च— ऋग्वेदस्य परबलिकालसम्बद्धानामृचामनुद्धरणादिदमेव विज्ञातु शक्यते यदेतेषामंशानां तदानीं रचनैव नासीदिति, तदपि तुच्छम्, पूर्वोत्तरविरोधात् । पूर्वं तु ऋग्वेदसंहिता अभ्याभ्यः पूर्वत एव सिद्धेत्युक्तम्, इदानी तद्विपरीतं तस्या अंशान्तराणामर्वा- चीनत्वकथन कल्पनाया निरङ्कुशत्वमेवावेदयति । नह्यन्यग्रन्थेष्वनुद्धरणादेव कस्यचित्प्राचीनग्रन्थस्य शाखान्तराणाम- बेवर महाशय ने कहा है—' मौखिक संक्रमण द्वारा जन साधारण की बोली में इन गीतों और सूक्तो में जो परिवर्तन हुए, उन्हें किसी स्थिति में अधिक महत्त्वपूर्ण समझना चाहिये, क्योंकि इस युग में लेखन द्वारा इनका रूप सुरक्षित रहा हो, ऐसी कल्पना भी नही की जा सकती । वस्तुतः हम ब्राह्मणो के काल के लिये भी ऐसी बात नही मान सकते, अन्यथा इन रचनाओ से संबद्ध विभिन्न रचनाओ के भेदों का तथा सामान्यतः विभिन्न शाखाओं की बड़ी संख्या का कारण बताना कठिन हो जायगा' ( पृ० ४), किन्तु यह कथन भी सही नहीं है, क्योकि पहले से विद्यमान मन्त्रो को ही व्यास प्रभृति ऋषियों ने अलग-अलग शाखाओं में बांट दिया था । इसी तरह से बेवर का यह कथन भी निराधार है कि-' यद्यपि ऋग्वेद के गीतों की या उनमें से अधिकांश की रचना सिन्धु नदी के तटों पर हुई थी, तथापि उनका अन्तिम रूप मे संकलन एवं विन्यास भारत में ही संभव हो सका' ( पृ ० ४ ), क्योंकि उन्होंने इसमें कोई प्रमाण नही दिया है । फिर उनका यह कथन 'वाचा विरूपनित्यया' इत्यादि श्रुति और सूत्रों मे प्रतिपादित वेद की नित्यता के सिद्धान्त के विपरीत भी पड़ता है । इसी तरह किस काल मे इन मन्त्रों का संकलन किया गया, इसको निश्चित कर पाना कठिन है । 'ऋग्वेद संहिता के कुछ अंश वर्णव्यवस्था की स्थापना के बाद के हैं" ( पु ० ४ ) यह कथन भी कल्पना मात्र है, क्योकि वर्णव्यवस्था भी वेद से सिद्ध है, अतः वह भी वेद की तरह ही अनादि है । 'स्वयं परम्परा भी शाकल्य तथा पंचाल बाभ्रव्य को ऋक्संहिता के विन्यास में महत्त्वपूर्ण भाग लेने का श्रेय देकर विदेहों और पंचालों की समृद्धि के युग को इंगित करती है' ( पृ० ४) यह कथन भी ठीक नही है, क्योंकि वहीं उन नामो का उल्लेख कहानी के पात्रों की तरह किसी विषय को सरलता से समझाने के लिये कल्पित है, उनसे कालविशेष से संबद्ध जातियों अथवा व्यक्तियों का बोध नहीं होता । पाश्चात्य विद्वान् 'शब्द इति० ' इत्यादि ब्रह्मसूत्र में प्रतिपादित इस सिद्धान्त को नही समझ पाते कि सारे जगत् की उत्पत्ति वैदिक शब्दो से ही हुई है, वेद में शाकल्य, बाभ्रव्य आदि नाम देखकर लोक में भी ये नाम प्रचलित हो गये हैं । इसी लिये 'सामवेदसंहिता पूर्णतः ऋग्वेद से उद्धृत होने के कारण अपने उद्भव काल के विषय में कोई सूत्र नहीं छोड़ती' ( पृ० ४-५ ) यह कथन "भी गलत है, इसका हम पहले ही खण्डन कर चुके हैं । 'इसमें ऋग्वेद के परवर्ती काल के अंशो से कोई उद्धरण नहीं है, हमें संभवत: यह संकेत मिलता है कि इस समय तक ऋग्वेद के इन अंशों की रचना नहीं हुई थी ' यह कथन भी तुच्छ एवं परस्पर विरोधी है । "पहले कहा गया है कि ऋग्वेदसंहिता अन्य सब संहिताओं से प्राचीन है, अब उसके विपरीत कहा जाता है कि उसके कुछ अंश नवीन हैं । इस तरह की बातें कल्पना को बेलगाम छोड़ देने से ही कही जा सकती हैं । किसी अन्य ग्रन्थ में उद्धृत न होने मात्र से किसी
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६१८ वेदार्थपारिजात: पेक्षयाऽर्वाचीनत्वं सिद्धयति, तथात्वे वायबलादिप्रन्थस्य ग्रन्थान्तरेष्वनुद्धृतानामंशानामर्वाचीनत्वापत्तेः । गीताभागवता- दावनुद्धवानां महाभारतांशानामर्वाचीनत्वापत्तेश्च । यदप्युक्तम्- 'यजुर्वेदीयसहितयोर्गद्याशाना निर्माणं हिन्दुस्थानस्य पूर्वीय कुरुपञ्चालादिदेशेषु जातम्, इमे तस्मिन् युगे विरचिते यत्र ब्राह्मणीयतत्त्वः प्राधान्य प्राप्तमासीत् । यद्यपि तदानीमप्येतैविषमाः सङ्घर्षाः कर्तव्यतयाऽवशिष्टा आसन्, ब्राह्मणाना पौरोहित्याधिपत्य वर्णव्यवस्था च कस्याचिद्दशाया पूर्णतः संस्थापिता आसीत्, नेतावदेव, किन्तु शुक्लयजुर्वेदसंहिताया वर्तमानरूपेण संग्रहकालस्तु ईसवापूर्व तृतीय शताब्दीमारम्य प्रवर्तत इत्यत्र बाह्यप्रमाणमुप-लभ्यते 1। यतो मेगस्थनीजो माडि-आण्डिनोईनामकानां जनानामुल्लेख करोति । इद च नाम माध्यग्दिनसहितायामुप-लभ्यते ' इति, तदप्यसङ्गतम्, तादृशाना जनाना माध्यन्दिनसंहिताया कुत्राप्यनुपलब्धेः । यदपि -'ब्राह्मणधर्मप्राधान्यप्राप्त्यनन्तरमथर्व संहिताया उद्भवः । अन्यदृष्टिकोणेनेयं सहिता ऋग्वेद-सहितया तुलनामर्हति । ब्राह्मणयुगीयगीतानां भाण्डागाररूपेय सहिता । एतेषु गीतेषु सूक्तेषु चानेके ऋक्संहितायाः सर्वतोऽप्यर्वाचीनांशा दशसे मण्डल उपलभ्यन्ते । ऋग्वेदे चेमानि सूक्तानि तत्सङ्कलनानन्तरं योजितानि । तथापि ऋग्वेदे सजीवा प्राकृतिकभावना तथा प्रकृति प्रति प्रोद्दामप्रेमा दृश्यते । अथर्ववेदे तु तद्वैपरीत्येन आभिचारिक- शक्तीनां चिन्ताकुलित आतङ्को दृश्यते । ऋग्वेदे जनता स्वच्छन्दा क्रियायां स्वतन्त्राऽवस्थायामुपलभ्यते । अथर्ववेदे ,जनता पौरोहित्य प्रभुतायामन्घ विश्वासैर्निगडिता दृश्यते । अथर्वसंहितायामतिप्राचीनकालिका अप्यंशाः सन्ति येषां सम्बन्धः सामान्यजनैः समाजस्य निम्नवर्गैश्चासीत् । ऋग्वेदस्य सूक्तानि तच्चवर्गीयपरिवाराणां विशिष्टसम्पत्तयः प्रतीयन्ते' ( पृ० ५ ) इति, तदेतत्सर्व दुरभिसन्धिमूल ककल्पनामात्रम्, सम्पूर्णस्यैव वेदस्य नित्यत्वेन कैश्चिद् व्यक्ति- प्राचीन ग्रन्थ के अंशों को उसकी अन्य शाखाओ की अपेक्षा अर्वाचीन मान लेना सही नही हो सकता । ऐसा मान लेने पर बाइबिल के अंश अन्य ग्रन्थो में उद्धृत नही है, उनको नवीन मान लेना पड़ेगा । भगवद्गीता, भागवत आदि में अनुद्धृत महाभारत के अंश नवीन मानने पडेंगे । ' यजुर्वेद को दो संहिताओं के गद्याशो का निर्माण हिन्दुस्तान के पूर्वीय भागों में कुरुपंचालो के देश में हुआ और वे उस , जब ब्राह्मणीय तत्त्व प्राधान्य प्राप्त कर चुका था, यद्यपि इसे अनेक कठिन संघर्ष अभी करने थे और जब ब्राह्मणोंयुगकी रचनाएँ है का पौरोहित्य पद पर आधिपत्य तथा वर्णव्यवस्था किसी भी दशा में पूर्णतः स्थापित हो चुकी थी । यही नहीं, हमें इस बात को मानने का भी बाह्य प्रमाण मिलता है कि शुक्लयजुर्वेद संहिता के विद्यमान संग्रह का काल तीसरी शताब्दी ई० पू० से आरंभ होता है । कारण मेगस्थनीज ' माडिमण्डिनोई' नाम के लोगों का उल्लेख करता है और यह नाम ' माध्यन्दिन' में मिलता है, जो शुक्ल यजुस् की प्रमुख शाखा है' ( पृ० ५ ) यह कथन भी सर्वथा असंगत है । ' अथर्वसंहिता का उद्भव उसी समय से प्रारंभ होता है, जब ब्राह्मण धर्म प्रधानता प्राप्त कर चुका था । अन्य दृष्टिकोणों से यह ऋक्संहिता से बिलकुल मिलती - जुलती है और ब्राह्मणीय युग के गीतो का भाण्डार है । इन गीतो या सूक्तों में से अनेक ऋक्संहिता के सबसे अर्वाचीन अंश अर्थात् दशम मंडल में उपलब्ध होते है । ऋग्वेद में ये सूक्त उसके संकलन के समय सबसे बाद में जोड़े गये थे, अथर्ववेद में ये सूक्त स्वाभाविक रूप में तत्कालीन रचना है । निःसन्देह, दोनों संकलनों का मूल तत्त्व परस्पर नितान्त भिन्न है । ऋग्वेद में एक सजीव प्राकृतिक भावना है, प्रकृति के प्रति उत्कट प्रेम है; जब कि अथर्ववेद में इसके विपरीत उसके भयंकर रूपों और आभिचारिक शक्तियों का चिन्ताकुल आतंक फैला है । ऋग्वेद में हम जनता को स्वच्छन्द क्रिया और स्वतन्त्रता की अवस्था में पाते हैं, अथर्ववेद में हम उसे पौरोहित्य प्रभुता और अन्धविश्वासों की बेड़ियो में जकडी हुई देखते हैं । किन्तु अथर्वसंहिता में भी बहुत प्राचीन काल के भी अंश है, जिनका संबन्ध सामान्य जनता से या समाज के निम्न वर्ग से रहा होगा, जब कि ऋग्वेद के सूक्त सच्च वर्ग के परिवारों की विशिष्ट संपत्ति प्रतीत होते हैं' (पृ० ५ ) । यह सारा कथन पाश्चात्यो की भारतीयों के प्रति योजनाबद्ध दुरभि-
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वेदार्थपारिजातः ete - जाति पर्वतारण्य नदी समुद्रप्रान्तादिनामभिस्तेषामर्वाचीनत्वस्य साधयितुमशक्यत्वात् । ऋग्वेदीयदशममण्डलक स्यार्वाचीनत्वकथनं प्रतिज्ञामात्रमकिञ्चित्करं च प्रमाणानुपन्यासात् । विषयभेदाच्च वर्णनभेदो नार्वाचीनत्वं प्राचीनत्वं , - वा साधयितुमलम् संसारे सर्वदेव सात्त्विक राजस- ताममप्राणिनामाविर्भावो भवति । तेषां तेषां प्राणिनां हिताय वेदेषूपदेशभेदाः स्वाभाविका एव । अथर्ववेदोक्त शान्तिक-पौष्टिक-आभिचारिकविधानानां प्रत्यक्षफलदत्वेनान्ध- विश्वासमूलकत्वकथनमपि निर्मूलमेव । ', यत्तु दीर्घकालीनसंघर्षानन्तरमेवाथर्वसूक्ताना चतुर्थवेदत्वपदप्राप्तिः ऋग्वेदादिसम्बन्धिब्रह्मण ग्रन्थे- ध्वथर्व॑सूक्तानामनुल्लेखात् । परवर्तिनामथर्वसुकाना ब्राह्मणैः सार्धमेवोत्पन्नत्वात्' इति, तदपि निर्मूलम्, वैदिकेषु यज्ञेष्वनादिकालादेवाथर्वणिकस्य ब्रह्माख्यस्यत्विजः प्रसिद्धत्वात् । ऋग्वेद एव-'ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः ॥ ' (ऋ०सं० १० / ७१।११ ) अत्र मन्त्रे एको होतृनामक ऋत्विग् यज्ञकाले स्वकीयवेदगतानामृचां पुष्टि कुर्वन्नास्ते । उद्गातृनामक एक ऋत्विग् गायत्रशब्दाभिधेयं स्तोत्रं शक्वरीशब्दाभिधेयासु ऋक्षु गायति । ब्रह्मनामक एक ऋत्विग जाते जाते तदा तदोत्पन्ने यज्ञे प्रस्तुते प्रणयनादिकर्मणि विद्यामनुज्ञा वदति । ब्रह्मन्नपः प्रणेष्यामीति संबोधितः सन् ओम् प्रणय इत्यनुज्ञां ददाति । अध्वर्युनामक एक ऋत्विग् यज्ञम्य मात्रा स्वरूपं विमिमीते । जयन्तभट्टानुसारमथर्ववेदस्य प्रामाण्यम् केचित् त्रय्याम्नातधर्मोपयोगानुपलब्धे स्त्रयी बाह्यत्वेनाथर्ववेदस्य न तत्समानयोगक्षेमत्वम् । लोके चतस्र इमा विद्या: प्राणिनामनुग्रहाय प्रवृत्ताः । आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चेति प्रसिद्धिः । श्रुतिस्मृती अपि तथैव दश्येते । सम्धि का अंग है, क्योंकि सभी वेद नित्य है, कुछ व्यक्ति, जाति, पर्वत, वन, नदी, समुद्र, प्रान्त आदि के नामो को देखकर उनकी अर्वाचीनता नही सिद्ध की जा सकती । ॠग्वेद के दशम मंडल को अर्वाचीन बताना केवल प्रतिज्ञा मात्र है, इससे वह नवीन सिद्ध नही हो सकता, जब तक कि उसके लिये कोई प्रमाण उपस्थित न किया जाय । विषय के भेद से वर्णन में भी भेद हो ही जाता है । इससे नवीनता और प्राचीनता का कोई संबन्ध नही है । संसार में सदा से सात्विक, राजस और तामस प्रकृति के जीवों की उत्पत्ति होती रही है । उन उन प्राणियों के हित के लिये वेदो में सभी तरह के उपदेश विद्यमान हों, यह स्वाभाविक बात है । अथर्ववेद में प्रतिपादित शान्तिक, पौष्टिक और आभिचारिक प्रयोगों का फल प्रत्यक्ष मिलता है, अतः इनको अन्धविश्वास मानना सर्वथा असंगत है | 'अथर्ववेद के सूक्तों को दीर्घकालीन संघर्ष के बाद ही चोथे वेद के रूप में स्थान मिल सका । ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के ब्राह्मणों के अधिक प्राचीन अंशों में अथर्ववेद के सूक्तो का कोई उल्लेख नही है । वस्तुतः उम सूक्तों की उत्पत्ति इन ब्राह्मणों के साथ-साथ ही हुई' ( पृ० ५-६ ) । यह कथन भी निर्मूल है, क्योंकि वैदिक यज्ञों में अनादि काल से अथर्ववेद के जानकार ब्रह्मा नाम के ऋत्विग् की अनिवार्य उपस्थिति मानी गई है । ऋग्वेद में ही 'ऋचा त्वः' इत्यादि मन्त्र में बताया गया है कि एक होता नामका ऋत्विक (ऋग्वेद ) यज्ञ के समय अपने वेद की ऋचाओं की पुष्टि करता है । उद्गाता नाम का ऋत्विक ( सामवेदी ) गायत्र अभिहित होने वाले स्तोत्र का शक्वरी नाम की ऋचाओं में गान करता है । ब्रह्मा नाम का ऋत्विक् ( अथर्ववेदी ) यज्ञ कीशब्दविधिसे प्रारंभ होने पर प्रणयन आदि प्रत्येक कर्म के संपादन की अनुमति देता है, 'हे ब्रह्मन्, अब मैं जल का प्रणयन करूँगा' इस तरह पर 'हाँ' प्रणयन करो' इस तरह से अनुमति देता है । अध्वर्यु नाम का ऋत्विक् ( यजुर्वेदी ) यज्ञ के स्वरूप का निर्धारण करता है । पूछने जयन्तभट्ट के अनुसार अथर्ववेद का प्रामाण्य कुछ लोगों का कहना है कि 'वेदत्रयी में प्रतिपादित धर्मों का उपयोग अथर्ववेद में नही मिलता है, अतः वेदत्रयी (ऋक्, यजुः, साम ) से बाहर होने से अथर्ववेद को, वेदत्रयी के समान प्रमाण नही माना जा सकता । लोक में आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता
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वेदार्थपारिजातः६२० 'ऋग्भिः प्रातदिवि देव ईयते यजुर्वेदेन तिष्ठति मध्येऽह्नः । सामवेदेनास्तमये महीयते वेदरशून्यस्त्रिभिरेति सूर्यः ॥।' ' प्रजापतिकामयत । स तपोऽतप्यत । तपस्तप्त्वेमस्त्रील्लोकानसृजत, पृथिवीमन्तरिक्षं दिवमिति । तल्लिोकानभ्यत्तपत् । तेभ्यस्त्रीणि ज्योतींष्यजायन्त । अग्निरेव पृथिव्या वायुरन्तरिक्षाद् दिव आदित्यः । तानि ज्योतींष्यभ्यतपत् । तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त । अग्नेर्ऋग्वेदः, वायोर्यजुर्वेदः, आदित्यात् सामवेद इति । सँवा विद्यात्रयी तपति' इति । मानवी स्मृतिरपि -- प्रतिवेद द्वादशवार्षिकं ब्रह्मचर्योपदेशिनो दृश्यते -' षटुत्रिशद्वार्षिकं ब्रह्मचर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् ।' ( २।१४५ ), श्राद्धप्रकरणे ' यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वचं वेदपारगम् । शाखान्तगमथाध्वयुं छन्दोग वा समाप्तिगम् ॥' इति त्रिवेदवाद- गाने श्राद्धभुजो ब्राह्मणान् दर्शयति नाथर्वणिकमिति । , ' ' ( ) तदेतदप्यसङ्गतमेव जैमिनिरीत्या तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् मी ० सू० इति वेद- प्रामाण्याभ्युपगमहेतोस्तत्रापि तुल्यत्वात् । तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यमिति मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमिति च गोतमकणादाभ्यामात्मप्रामाण्यहेतोरपि चतुर्षु वेदेषु समानत्वात् । पूर्वमीमांसारीत्या तथा त्रय्यनादिमती तथैवाथर्वणश्रुतिरपि कर्तृस्मरणाभावात् । गोतमकणादमतेऽपि चतुर्णामप्याप्तप्रणीतत्वाविशेषात् चतुर्णामपि समानमेव प्रामाण्यम् । अत एव चतुभिर्वेदैश्चतुर्णां वर्णाश्रमाणा चतसृषु दिक्षु चतुरब्धिमेखलायामवनो वैदिको व्यवहारः प्रचलति । श्रुतिस्मृतिमूलश्चायं भारतीयाना व्यवहारः । श्रुतिस्मृती चतुरो वेदान् समकक्षानेवाभिवदतः । तद्यथा शतपथे तृतीयेऽहनीत्युपक्रमस्याश्वमेघे पारिप्लवाख्याने सोऽयमाथर्वणो वेदः श्रूयते । छान्दोग्योपनिषदि ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इति । और दण्डनीति ये चार विद्याएं ही प्राणियों के कल्याण के लिये प्रवृत्त मानी गई है । श्रुति और स्मृति से भी यही बात सिद्ध होती है । जैसे कि -'सूर्य देवता प्रातःकाल आकाश मे ऋग्वेद के साथ चलता है, मध्याह्न मे यजुर्वेद के साथ रहता है और अस्ताचल को जाते समय सामवेद के साथ शोभा पाता है । इस तरह यह सूर्य भगवान् सदा किसी न किसी वेद के साथ ही रहते हैं ', 'प्रजापति ने कामना की । उस कामना की पूर्ति के लिये उसने तप किया । तप करके उसने पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्गलोक इन तीन लोकों की सृष्टि की । बाद में प्रजापति वे इन तीनो लोको को तपाया । तपाने से तीन ज्योतियाँ उत्पन्न हुईं । पृथिवी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु और स्वर्ग को भी तपाया, तब उनसे तीन वेद निकले । अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद से आदित्य । प्रजापति ने बाद में इन तीनो ज्योतियों बारह- और आदित्य से सामवेद । इस तरह से यह त्रयी विद्या सर्वत्र प्रकाशित होती है । मनुस्मृति में प्रत्येक वेद के अध्ययन के लियेका पालन ' बारह वर्ष के ब्रह्मचर्य का विधान बताया गया है- तीनों वेदो के अध्ययन के लिये गुरु के समीप ३६ वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत को करना चाहिये ' । श्राद्ध के प्रकरण में -' श्राद्ध में ऋग्वेद के पारंगत को अथवा अपनी शाखा का ठीक से अध्ययन किये हुए अध्वर्युको ही अथवा सम्पूर्ण सामवेद का अध्ययन किये हुए सामवेदी को प्रयत्न पूर्वक भोजन करावे' इस तरह से तीन वेदों के विद्वान् ब्राह्मणोंश्रुति और aa में भोजन कराने का विधान है । यहाँ अथर्ववेदी ब्राह्मण का उल्लेख नही मिलता और यही स्थिति ऊपर उद्धृत स्मृति के वचनों में भी मिलती है' । किन्तु यह पूरा प्रतिपादन असङ्गत हैं, क्योकि आचार्य जैमिनि के मत से वेदो के प्रामाण्य के लिये निर्धारित ' निरपेक्षत्व' हेतु वेदत्रयी के समान अथर्ववेद में भी विद्यमान है, अर्थात् अथर्ववेद को भी अपने प्रामाण्य के लिये किसी दूसरे प्रमाणहै' कीइन अपेक्षागोतम नहीं है । 'ईश्वर का वचन होवे से सब वेद प्रमाण है', ' मन्त्र और आयुर्वेद शास्त्र के समान वेदशास्त्र भी प्रामाणिक और कणाद के वचनों के अनुसार भी चारों वेदो की स्वयंप्रमाणता सिद्ध होती है । पूर्वमीमासा की दृष्टि से जैसे वेदत्रयी मनादिचारोंहै, उसी तरह से अथर्ववेद भी अनादि है, क्योकि इन सभी के कर्ता की स्मृति किसी को नही है । गोतम और कणाद के मत से भी वेद आप्त- प्रणीत है, अतः इन सबका समान रूप से प्रामाण्य माना जाता है । इसी तरह से यह व्यवहार भी सर्वत्र प्रचलित है कि चार वेदों से चार वर्णों, आश्रमों का विधान चारों दिशाओ में चारों समुद्रों की सीमा पर्यन्त विस्तृत पृथ्वी पर फैला हुआ है । भारतीयो का यह व्यवहार श्रुति और स्मृति के प्रमाण पर आधारित है । श्रुति वीर स्मृति में चारों वेदों का एक सा प्रामाण्य प्रतिपादित है । जैसे कि शतपथ ब्राह्मण में अश्वमेध यज्ञ के प्रसङ्ग में तीसरे दिन के पारिप्लव आख्यान के प्रसङ्ग में अथर्ववेद का स्मरण किया गया है । छान्दोग्य उपनिषद् में ॠग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के साथ चतुर्थ अथर्ववेद का भी उल्लेख है ।