वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1051–1060
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1051–1060
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वेदार्थपारिजातः १९४९ चेष्टन्ते स्मेति, तदपि यत्किञ्चित् पाश्चात्त्यानुयायिना भवद्विधानामद्यापि वेदार्धभागस्य ब्राह्मणभागस्य तादृशव्यक्ति- - —' ' (, विशेष निर्मितत्वसाधनप्रवर्त्तमानत्वात् । यत्तु ऋषेर्दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्याख्यानसयुक्ता निरुक्त १०।१०।४६ निरु० १०।२६ ) ' तत्रेतिहासमाचक्षते ' इत्यस्य व्याख्यायाम्, एतस्मिन्नर्थे इतिहासमाचक्षते आत्मविदः इतिवृत्तं परकृत्यर्थंवादरूपेण । यः कश्चिदाध्यात्मिक-आधिदैविक-आधिभौतिकोवार्थं आख्यायते दिष्ट्युदितार्थावभासनार्थं स इतिहास इत्युच्यते । स पुन- रयमितिहासः सर्वप्रकारो नित्यमविवक्षितस्वार्थस्तदर्थप्रतिपतॄणामुपदेशपरत्वात् ( दुर्गाचार्यटीका ) औपचारिकोऽयं मन्त्रे- ब्वाख्यानसमयः, नित्यत्वविरोधात् परमार्थत्वेन नित्यपक्ष एवेति नैरुक्ताना सिद्धान्तः । ( वररुचिकृतनिरुक्तसमुच्चये पृष्ठे ८६ सस्क० २ स्कन्द निरुक्तटीका ) इति तदपि सर्वशाखासु समान एव, निरुक्तकारेण ब्राह्मणाना शाखान्तराणां च निगमपदेन व्यपदिष्टत्वात् तदिहैवान्यत्रोक्तम् । तदेवच शबरस्वामी -'बवरः प्रावाहणिरकामयत' इत्यादि ब्राह्मणसम्बन्धेष्वपि वक्ति । श्रीशंकराचार्यस्तु केनोपनिषद्भाष्येऽन्यत्र च सुखावबोधार्था - ख्यायिकेति वक्ति । तस्मादाहुन वतदस्ति यद् देवासुर यदिदमन्वाख्यायते त्वदुद्यते इतिहासेत्वतः ( शतपथे ११।१।६।९, निरुक्ते २( १६ ), अपरश्च ज्योतिषश्च मिश्रीभावकर्मणो वर्णकर्म जायते, तत्र उपमार्थेन युद्धवर्णनानि भवन्ति इत्यस्यापि तथैव मन्त्राणां ब्राह्मणाना चेतिहासवर्णनेन प्राप्तस्य सादित्वस्य निराकरणे समानएवोपयोगः । देवताधिकरणे -'तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात्' ( ब्रह्मसूत्र १।३।२६ ) इत्यत्र मनुष्यादुपरि ये देवादयस्तानप्यधिकरोति शास्त्रमिति सिद्धान्त उक्तः, तेषामप्यर्थित्वात्, समर्थत्वाच्च । मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यस्तेषा विग्रहवत्वमप्रतिहतज्ञानत्वं च प्रतिपादितम् । तत्र विग्रहवत्त्वेन देवादीना विद्यास्वधिकाराऽभ्युपगमेऽपि स्वरूपसन्निधानेन इन्द्रादीना कर्माङ्गभावविरोधमाशङ्कयानेकप्रति- पत्तेर्दर्शनाद् विरोधः परिहृतः । विरोध कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्' ( ब्रह्मसूत्रे १।३।२७ ) विग्रहवत्त्वे देवादीनामभ्यु-पगम्यमाने कर्मणि कश्चिद्विरोधो मा भूत् शब्दे तु विरोधः स्यादेव । शब्दार्थसम्बन्धानामौत्पत्तिकत्वाभ्युपगमात् । वेद, कुछ ही समय पूर्व के व्यक्ति विशेष ने रचे है । किन्तु यह कहना भी निःसार है । क्योकि पाश्चात्यो का अनुकरण करने वाले आप जैसे लोग आज भी वेद के अर्धभाग रूप ब्राह्मण भाग को किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा रचित सिद्ध करने में प्रयत्नशील है । 'ऋषेर्दृष्टा- र्थस्य प्रीतिर्भवत्याख्यानसयुक्ता' ( निरु० १०।१०।४६, निरु० १० २६ ) ' तत्रेतिहासमाचक्षते ' की व्याख्या में आत्मविद् लोग इस अर्थ में इतिहास बताते हैं '। वह इतिहास ( इतिवृत्त ) परकृतिरूप अर्थवाद के रूप में है दिष्टयुदित अर्थ के अवभासनार्थ जो कोई आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक अर्थ बताया जाता है, उसे इतिहास कहते है । वह इतिहास हमेशा अविवक्षितस्वार्थवाला होता है । उसके अर्थ को जाननेवालो को वह उपदेशपरक होता है ( दुर्गाचार्यटीका ) । नित्युत्व के साथ विरोध के कारण मन्त्रों में इस आख्यानसमय को औपचारिक माना जाता है । वस्तुतः नित्यपक्ष ही नैरुक्तो का सिद्धान्त है । 1 ( वररुचिकृत निरुक्त समुच्चय पू० ८६, सस्क० २ स्कन्दनिरुक्तटीका ) भी समस्त शाखाओ के लिये तुल्य ही है । निरुक्त-कार ने ब्राह्मणों और अन्य शाखाओ को निगम पद से कहा है । उसी को शबरस्वामी ने "बवरः प्रावाहणिरकामयत" इत्यादि ब्राह्मण सम्बन्ध में भी कहा है । शंकराचार्य ने भी केनोपनिषद् भाष्य में तथा अन्यत्र भी 'आख्यायिका' को सुखावबोधार्थं कहा है । उसी तरह युद्धवर्णन उपमा के लिये होते हैं । एवंच मन्त्र और ब्राह्मणो के इतिहास वर्णन से प्राप्त हुए सादित्व के निराकरण करने में सबका उपयोग समान रूप से है ॥ देवताधिकरण में " तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात्” -( ब्र० सू० १।३।२६ ) सूत्र से बताया गया है कि मनुष्य से ऊपर देव आदि हैं, उनके लिये भी यह शास्त्र है, यह बादरायण का सिद्धान्त है । क्योकि वे भी अर्थी है और समर्थ भी है । मन्त्र-अर्थ-वाद -इतिहास-पुराण और लोक व्यवहार के द्वारा देवताओ का विग्रहवान् ( शरीरी ) होना एवं अप्रतिहतज्ञानसम्पन्न रहना बताया गया है । देवताओं के विग्रहसम्पन्न होने से विद्याओं में उनका अधिकार यद्यपि माना गया है, तथापि इन्द्रादि देवताओं का यज्ञादि कर्मों में युगपत् स्वरूपतः सन्निधान न हो सकने से उन कर्मों में उनका अङ्गभाग नही हो सकेगा, ऐसी आशंका करके कहा है 'अनेक प्रतिपत्ते-दर्शनात्'- एकही समय में एकही देवता अनेक स्वरूप धारण कर सकती है, इस प्रकार विरोध का परिहार किया है । "विरोध: कर्मणी तिचेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्" -( ब्र ० सू० ११३।२७ ) देवता आदि को विग्रहवान् ( शरीरी ) मानकर कर्म में यद्यपि विरोध नही होगा, तथापि शब्द में तो विरोध होगा ही । क्योंकि अर्थ के साथ शब्द का नित्यसम्बन्ध माना है ।
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वेदार्थपारिजातः १ ९ ५० यद्यप्यैश्वर्यंयोगाद्विग्रहवती देवता युगपदनेक कर्मसम्बन्धीनि हवीषि भुञ्जीत, तथापि विग्रहयोगादस्मदादिवज्जन- नमरणवती सेति नित्यस्य शब्दस्य नित्येनार्थेन नित्ये सम्बन्धे प्रतीयमाने शब्दे यत्प्रामाण्यं स्थितं तस्य विरोधो भविष्यत्ये- वेत्याशङ्कय समाधानं कृतम् -"शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् " || ( ब्र० सू० १ ३ २८ ) नायमस्ति विरोधः; कस्मात्, अतः प्रभवात्, अतएव वैदिकाच्छब्दादेव देवादेर्जगतः प्रभवात् । ननु 'जन्माद्यस्य यतः', ( ब्रह्मसू ०१।१।२ ) ब्रह्मप्रभवत्त्वं जगतोऽवधारितम्, तथा चोत्पत्तिमतामनित्यत्वेन तद्वाचिनां वैदिकानां शब्दानामनित्यत्वं केन वार्यते । प्रसिद्धं हि लोके देवदत्तस्य पुत्र उत्पन्ने यज्ञदत्त इति नाम क्रियते, तस्माद्विरोधोऽस्त्येव शब्दे, इति चेन्न, गवादिव्यक्तीना मुत्पत्तिमत्त्वेऽपि गवादिजातीनामनित्यत्वाभावात् । द्रव्यगुणकर्मणां व्यक्तय एवोत्पद्यन्ते नाकृतयः ( जातय. ), आकृतिभिश्च शब्दानां सम्बन्धो न व्यक्तिभिः, व्यक्तीनामानन्त्यात् सम्बन्धग्रहणानुपपत्तेः । तथा च देवादिव्यक्तिप्रभवाऽभ्युपगमेऽपि आकृतिनित्यत्वान्नेन्द्रव- स्वादिशब्देषु विरोधः । आकृतिविशेषस्तु मन्त्रार्थवादादिभ्यो विग्रहवत्त्वावगमादवगन्तव्यः । स्थानविशेषसम्बन्धनिमित्ता- श्चेन्द्रादिशब्दाः सेनापत्यादिशब्दवत् । अतश्च यो यस्तत्स्थानमधिरोहति स स इन्द्रादिशब्देरभिधीयते । इन्द्रादीनां शब्द- प्रभवत्वं ब्रह्मप्रभवत्त्ववन्नोपादानकारणाभिप्रायेणोक्तम्, किन्तु स्थिते वाचकात्मना नित्ये शब्दे नित्यार्थसम्बन्धिनि शब्द- व्यवहारयोग्यार्थ व्यक्तिनिष्पत्ति:, अतः प्रभव इत्युच्यते । ननु कथं शब्दात्प्रभवति जगदिति प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्, प्रत्यक्षं श्रुतिः, प्रामाण्यं प्रत्यनपेक्षितत्वात्, अनुमानं स्मृतिः, प्रामाण्यं प्रति सापेक्षत्वात् । ते हि शब्दपूर्वा सृष्टि दर्शयतः । 'एत इति वैप्रजापतिर्देवानसृजता सृग्रमिति मनुष्यानिन्दव इति पितृस्तिरः पवित्रमिति ग्रहानाशव इतिस्तोत्रं विश्वानीतिशस्त्रमभिसौभगेत्यन्याः प्रजाः' इति श्रुतिरुद्धृता श्रीशङ्करा- देवताओ को शरीरी स्वीकार करने से यद्यपि वे एक ही समय में अनेक कर्मों के साथ सम्बन्ध रखते हुए अनेक हवियों का ग्रहण कर सकते हैं, तथापि शरीर के साथ सम्बन्ध होने से हम लोगो के समान वे भी जन्म-मरण शील हो जायेंगे । इसलिये नित्य शब्द का नित्य अर्थ के साथ नित्य सम्बन्ध प्रतीयमान वैदिक शब्दों में जो प्रामाण्य था, उसका अब विरोध हो जायगा ऐसी आशंका कर के उसका समाधान किया कि "शब्द इतिचेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्" - ( ब्र० सू ० ११३१२८ ) वैदिक शब्द से ही देवादि जगत् उत्पन होता है । किन्तु " जन्माद्यस्य यतः" ( ब्र० सू ० १।१।२ ) सूत्र से यह निश्चय किया गया है कि ब्रह्म से जगत् उत्पन्न होता है । जब कि उत्पत्तिमान् पदार्थ अनित्य होते है, तब उनके वाचक वैदिक शब्दों का अनित्यत्व कौन रोक सकता है? लोकव्यवहार में प्रसिद्ध ही है कि देवदत्त के पुत्र उत्पन्न होने पर ही उसका नाम यज्ञदत्त रक्खा जाता है, इसलिये शब्द में विरोध है ही । किन्तु यह कथन उचित नही है । क्योकि गो आदि शब्दों और अर्थों का सम्बन्ध नित्य दिखाई देता है । गो आदि व्यक्तियो की उत्पत्ति होनेपर उनमें रहनेवाली जातियों की भी उत्पत्ति हो यह नियम नही है । द्रव्य, गुण, और व्यक्तियाँ ही उत्पन्न होती है, द्रव्यत्व आदि जातियाँ उत्पन्न नहीं होती । शब्दो का सम्बन्ध जातियो के साथ है, व्यक्तियो के साथ नही है । क्योंकि व्यक्तियां अनन्त हैं । अतः उनके साथ शब्दो का सम्बन्ध ग्रहण नही हो सकता । देवादि व्यक्तियो के उत्पन्न होनेपर भी जातियों के नित्य होने से इन्द्र, वसु आदि शब्दों में कोई विरोध नही है । मन्त्र, अर्थवाद आदि से देवताओ के शरीर आदि की प्रतीति होने से उनकी जाति का भी स्वीकार करना चाहिये | अथवा सेनापति आदि शब्दो के समान इन्द्र आदि शब्द, विशिष्ट स्थान के सम्बन्ध में प्रवृत्त होते हैं । इसलिये जो कोई उस स्थानपर आरूढ होता है, उसे इन्द्र आदि शब्द से कहा जाता है । अतः कोई दोष नही है । शब्द से जगत् उत्पन्न होता है, यह कथन ब्रह्म से उत्पन्न होने के समान उपादान कारण के अभिप्राय से नहीं है । शब्द से जगत् की उत्पत्ति बताने का अभिप्राय यह है कि नित्य अर्थ के साथ सम्बन्ध रखनेवाला नित्य शब्द जब वाचकस्वरूप से स्थित रहता है, तभी उससे शब्दव्यवहारयोग्य अर्थ की निष्पत्ति होती. है । इस आशय से जगत् को शब्दप्रभव कहा गया है । परन्तु शब्द से जगत् उत्पन्न होता है, यह कैसे माना जाय? तो उत्तर दिया कि प्रत्यक्ष और अनुमान से | प्रत्यक्ष अर्थात् श्रुति, क्योंकि उसके प्रामाण्य के लिये अन्य किसी की अपेक्षा नहीं होती । अनुमान अर्थात् स्मृति, क्योंकि उसके प्रामाण्य के लिये श्रुति की अपेक्षा होती है । ये दोनों प्रमाण यह दिखलाते हैं कि सृष्टि शब्द पूर्वक है । इसी अभिप्राय के समर्थन में "एत इति प्रजापतिः " ---
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वेदार्थपारिजातः १ ९५१ चार्येण, तथान्यत्रापि ' समनसा वाच मिथुनं समभवत्' ( बृ० ११२४ ) इत्यादिना तत्र तत्र श्राव्यने । स्मृतिरपि — ' अनादि-निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा आदो वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ।' उत्सर्गश्चायं वाचः सम्प्रदायप्रवर्तनात्मकः । 'नामरूपं च भूतानां कर्मणा च प्रवर्तनम् । वेदशब्देभ्य एवादी निर्ममे स महेश्वरः ॥ ' ( मनु ० ११२१ ) ' सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादी पृथक् सस्थाश्च निर्ममे' इति च । अपि च चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठन् वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात्तमर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषा नः प्रत्यक्षमेव । तथा प्रजापतेरपि स्रष्टुः सृष्टेः पूर्वं वैदिकाः शब्दा मनसि प्रादुर्वभूवुः, पश्चात्तदनुगतानर्थान् ससर्जेति गम्यते । स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत् ' ( तै ० ब्रा० ३।२।४।२ ) इत्येवमादिका श्रुतिर्भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान् सृष्टान् दर्शयति । अत्र प्रत्यक्षशब्देन मन्त्रब्राह्मण- रूपा श्रुतिर्गृहीता । 1 'अत एव च नित्यत्वम्' ( ब्र० सू० १ ३ २९ ) स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिभिः स्थित एव वेदस्य नित्यत्वे देवादि-व्यक्तिप्रभवाऽभ्युपगमेन तस्य विरोधमाशड्क्य, ' अतः प्रभवात्' इति परिहृत्येदानी तदेव वेदनित्यत्वं स्थितं द्रढयति । अतएव च नित्यत्वम्—' यज्ञेन वाचः पदवीयमायन् तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्' (ऋ० १०।७१।३ ) इति मन्त्रः स्थितामेववाचमनुविन्ना दर्शयति । 'युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान्महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवा ॥ ' इति पुराणमिति देवता-धिकरणे शङ्कराचार्याः । 4 'समाननामरूपत्वादावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च' ( ब्र० सू० १1३1३० ) ननु यदि पश्वादिव्यक्तिवद्देवादि- 1 व्यक्तयोऽपि संतत्यैवोत्पद्येरन् निरुध्येरंश्च ततोऽभिधानाभिधेयाभिधातृव्यवहाराविच्छेदात् संबन्धविरोधेन शब्देऽनित्यत्व-परिहारेऽपि प्रलये तन्नोपपद्यते । तदा तु सकलं त्रैलोक्य परित्यक्तनामरूपं निर्लेप प्रलीयते, प्रभवति चाभिनवमिति तदा 1 कथमविरोध इति चेन्न, समाननामरूपत्वादिति । अनादी संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः प्रलयप्रभवश्रवणेऽपि पूर्वप्रबोधवदुत्तर- 5 ( ऋ० सं० ९१६२११, साम-छन्दोग ब्रा० ८३० ) तथा 'स मनसा वाचम्' -( वृ ० उ० १ २ ४ ) श्रुति को भी श्रीशंकराचार्य ने उद्धृत किया है । तथा अन्यत्र स्मृति भी 'अनादि निधना नित्या' -( म० भा० शा ० २३३ । २४ ) यही बता रही है । वाणी का यह उत्सर्ग भी सम्प्रदायप्रवर्तन स्वरूप ही है, क्योकि अनादि और अनन्त वाणी का अन्य किसी प्रकार से उत्सर्ग नही हो सकता । उसी प्रकार मनु ने भी वेद शब्द से ही सृष्टि का होना बताया है । और यह सभी का प्रत्यक्ष अनुभव भी है कि जब कोई पुरुष किसी वस्नु को बनाना चाहता है तब वह पहले उसके वाचक शब्द का स्मरण करता है, पश्चात्उस वस्तु को बनाता है ॥ उसी प्रकार सृष्टि करनेवाले प्रजापति के मन में सृष्टि से पहले वैदिक शब्द प्रादुर्भूत हुए, उसके पश्चात् शब्द के अनुगत अर्थों ( वस्तुओं ) की उसने रचना की । तै० ब्रा० ( ३।२/४/ २ ) की श्रुति भी इसी अभिप्राय को स्पष्ट बता रही है । "अत एव च नित्यत्वम्" ( ब्र० सू० १।३।२ ९ ) इस सूत्र पर श्रीशंकराचार्य कहते हैं कि स्वतन्त्र कर्ता का स्मरण न होने से वेद की नित्यता सिद्ध होने पर देवता आदि व्यक्तियों की उत्पत्ति मानने से वेद की नित्यता नही बन सकेगी इस आशका का -- "अतः प्रभवात्" से परिहार करके अब पूर्वसिद्ध उसी वेदनित्यता को दृढ करते है । उसी प्रकार " यज्ञेन वाच." -( ऋ० स ० १०।७१।३ ) यह मन्त्र भी पूर्वसिद्ध वेदरूप वाणी की प्राप्ति दिखा रहा है । उसी तरह वेदव्यास भी कहते हैं -- "युगान्तेऽन्सहितान्" -प्राचीन काल में महर्षियों ने ब्रह्मा की अनुज्ञा पाकर युग के अन्त में गुप्त हुए इतिहाससहित वेदों को तप से प्राप्त किया । यह सब श्रीशंकराचार्य ने देवताधिकरण में बताया है । "समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविशेषो दर्शनात् स्मृतेश्च" -( ब्र० सू० १।३।३० ) यदि पशु आदि व्यक्तियों के समान देवता आदि व्यक्तियो के भी उद्भव और लय अविच्छिन्न होते तो नाम, विषय और वक्ता के व्यवहार का विच्छेद न होने के कारण सम्बन्ध नित्य रहने से शब्द में विरोध का ( शब्दाऽनित्यत्वका ) परिहार हो जाता, परन्तु जब श्रुतियों और स्मृतियाँ कहती हैं कि सम्पूर्ण i त्रैलोक्य नाम और रूप का परित्याग करके समूल नष्ट हो जाता है अर्थात् प्रलय हो जाता है, और पुनः नवीन उत्पन्न होता है, तब अविरोध कैसे कह सकते हैं? यह शंका मन में उठती है, किन्तु वह ठीक नही है । उसी को उपर्युक्त सूत्र का भाष्य करते हुए श्रीशंकरा- 1
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१ ९ ५२ वेदार्थ पारिजात' प्रबोधेऽपि व्यवहारान्न कश्चिद्विरोध, एवं कल्पान्तरप्रभवप्रलययोरपि द्रष्टव्यम् । ' स्वापप्रबोधयोश्च प्रलयप्रभवो श्रूयेते, यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति, तदेनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति, चक्षुः सर्वैरूपैः सहाप्येति, श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति, मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति यदा प्रतिबुध्यते, यथाग्नेर्व्वलत सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेव- मेतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते, प्राणेभ्यो देवाः, देवेभ्यो लोकाः' ( कोषो० उ० ३।३ ) इति 1। ननु स्वापे पुरुषान्तरव्यवहाराविच्छेदात् स्वय च सुप्तप्रतिबुद्धस्य पूर्वप्रबोधव्यवहारानुसन्धानसंभवादविरुद्धम्, महाप्रलये तु सर्व- व्यवहारोच्छेदाज्जन्मान्तरव्यवहारवञ्च कल्पान्तरव्यवहारस्यानुसन्धातुमशक्यत्वाद्वैषम्यमिति चेन्न, सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये सत्यपि परमेश्वरानुग्रहादीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानोपपत्तेः । प्राकृतप्राणिषु जन्मान्तरीयव्यवहारानुसन्धानाऽ भावेऽपि हिरण्यगर्भादिषु तत्सभवात् । मनुष्यादिस्तम्बपर्यन्तेषु मनुष्यादिषु हिरण्यगर्भ- पर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्यादिप्रतिबन्धाप्रतिबन्धतारतम्यसिद्धेः । ततश्चातीतकल्पानुष्ठितप्रकृष्टज्ञानकर्मणामीश्वराणा हिरण्यगर्भादीनां परमेश्वरानुगृहीतानां सुप्तप्रतिबुद्धवत् कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानमुपपद्यत एव । 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ ' ( श्वे ० ६। १८ ) इति श्रुतेः । स्मरन्ति च शौनकादयो मधुच्छन्दः प्रभृतिभिऋषिभिर्दाशतय्यो दृष्टाः । प्रतिकाण्डं चैवमेव काण्डर्थ्यादयः स्मर्यन्ते । श्रुतिरप्यृषिज्ञानपूर्वकमेव मन्त्रेणा- नष्ठानं दर्शयति- ' यो ह वा अविदितार्षेय छन्दोदैवत ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाऽध्यापयति वा स्थाणुं वच्छेति, गत्तं वा प्रतिपद्यते' इत्युपक्रम्य - 'तस्मादेतानि मन्त्रे मन्त्रे विद्यात् । ' किच, सुखप्राप्तय धर्मो विधीयते, दुःखपरिहाराय चाधर्मः प्रतिषिध्यते । दृष्टानुश्रविकविषयौ च रागद्वेषी- चार्य कहते है कि -संसार को अनादि मानने पर सुषुप्ति में प्रलय और जाग्रदवस्था में उत्पत्ति के होने पर भी जैसेपूर्व जाग्रदवस्था के समान ही उत्तरजाग्रदवस्था में व्यवहार होने में कोई विरोध नही होता है, उसी प्रकार पूर्वकल्प के लय और उत्तर कल्प के विषय मे भी समझना चाहिये । से भी वेद की नित्यता में कोई विरोध नही है । इसी तरह अन्यान्य कल्पो की उत्पत्ति और प्रलय की उत्पत्ति सुषुप्ति और जाग्रत् में ससार के प्रलय और उद्भव को श्रुति ( कौषी ० उ० ३।३ ) ने बताया है । परन्तु सुषुति में अन्य पुरुषो का व्यवहार विच्छिन्न नही होता और स्वयं सुषुप्ति से जागने पर पूर्व की जाग्रदवस्थाओं के व्यवहारों को स्मरण करता है, इसलिये विरोध नही है । महाप्रलय में तो सब व्यवहारों का उच्छेद हो व्यवहारो के समान अन्य कल्प के व्यवहारों का स्मरण नही हो सकता । इसलिये दृष्टान्त और दान्त मे जातावैषम्यहै, इसलिये अन्यजन्म के ,ठीक नही है । जिसमें समस्त व्यवहारो का उच्छेद हो जाता है ऐसे महाप्रलय को यदि मान भी लिया है, यह उपर्युक्त शंका अनुग्रह से हिरण्यगर्भ आदि ईश्वरो को अन्य कल्प के व्यवहार का स्मरण हो सकता है । यद्यपि जाय तो भी परमेश्वर के,का स्मरण करते नही दिखाई देते तो भी ईश्वरो को भी प्राकृतो के समान ही नहीं समझना प्राकृत प्राणी अन्य जन्म के व्यवहारों भी जैसे मनुष्यादि से लेकर स्तम्बपर्यन्त प्राणियों में ज्ञान, ऐश्वर्य आदिका प्रतिबन्ध ( प्रतिरोधचाहिये । सभी में प्राणित्व समान रहनेपर वैसे ही मनुष्यादि से लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त में ज्ञान, ऐश्वर्य आदि की अभिव्यक्ति ( आविर्भाव) उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ दिखाई देता है, )मनुष्य से स्तम्ब तक और मनुष्य से हिरण्यगर्भ तक के ज्ञानादि में प्रतिबन्ध अप्रतिबन्ध का उत्तरोत्तर अधिक होती है । अतः सर्वोत्तम ज्ञान और कर्मों का अनुष्ठान किया है । और वर्तमान कल्प के आरम्भ मे जो प्रादुर्भूततारतम्य है । इसलिये विगतकल्प में जिन्होने हुए हैं, उन हिरण्यगर्भ आदि ईश्वरों को परमेश्वर के अनुग्रह से सुषुति से जागे हुए पुरुष के समान अन्य कल्प के व्यवहारों का मैं भी यही बात कही गई है । 'मधुच्छन्द आदि ऋषियो ने दस मण्डलवाले ऋग्वेद की स्मरण होना उचित है । श्वेताश्वर श्रुति ( ६/१८) , -कहते हैं । प्रत्येक वेद में भी इसी प्रकार काण्ड ऋषि आदि का स्मरण किया ऋचाएँ देखो इस प्रकार शौनक आदि भी " ” ' 'करके तस्मादेतानि कहकर श्रुति भी ऋषिज्ञान पूर्वक ही मन्त्र से अनुष्ठान दिखलातीगया हैहै ॥ यो ह वा अविदितार्षेय ऐसा उपक्रम प्राणियों को सुख की प्राप्ति हो इसलिये धर्म का विधान है और दुःख और पारलौकिक सुख-दुःख में राग एवं द्वेष हुआ करते हैं, अन्य विषय में नही । इसलियेके परिहार के लिये अधर्म का प्रतिषेध है । ऐहिक धर्म और अधर्म की फलभूत जो उत्तरोत्तर
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वेदार्थपारिजातः १ ९ ५३ भवतः, न विलक्षणविषयावित्यतो धर्मा - धर्मफलभूतोत्तरोत्तरा सृष्टिनिष्पद्यमाना पूर्वसृष्टिसदृश्येव निष्पद्यते । ' तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव ते प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥ ' इति स्मृतेश्च । प्रलीयमानमपि जगदिदं शक्त्यवशेषमेव प्रलीयते, शक्तिमूलमेव च प्रभवति, इतरथाऽऽकस्मिकत्वप्रसङ्गात् शक्तिमूलमेव च प्रभवति । यथेन्द्रियविषय- सम्बन्धादेव्र्व्यवहारस्य नियतत्वमेव न प्रतिसर्गमन्यथात्वम्, न वा षष्ठेन्द्रियविषयकल्पन शक्यमुत्प्रेक्षितुम्, तथैव सर्वकल्पानां तुल्यव्यवहारत्वात् कल्पान्तरव्यवहारक्षमत्वाच्चेश्वराणां समाननामरूपा एव प्रतिसगं विशेषा. प्रादुर्भवन्ति । समाननाम- ६ रूपत्वाच्चावृत्तावपि सर्गमहाप्रलयलक्षणायां जगत्यामभ्युपगम्यमानाया न कश्चिच्छब्दप्रामाण्यविरोध. –' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवी चान्तरिक्षमथो स्वः ॥ ' ( अ० १० १ ९०) इति श्रुतिभ्य., 'ऋषीणा नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः । शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः । यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ ' इत्यादि स्मृतिभ्यश्च । तस्मान्मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु राज्ञामृषीणां पर्वतादीनां वर्णनेऽपि न तेषा- मनित्यत्वम्, जातिरूपेण स्थानरूपत्वेन वा तेषां नित्यत्वात् । तथा च न औत्पत्तिकसूत्रविरोधो न वा तेन मन्त्रब्राह्मणादीना- f 1 मनित्यत्वम् । 'वाचा विरूपनित्यया' ( ऋ० सं ० ८२७५१६ ), 'पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचु:' ( तै० सं ० ) इति श्रुतिभ्यः 'ज्योतिषि भावाच्च' ( ब्र ० सू० १ ३३२ ) इति सूत्रेण च ' यदिद ज्योतिर्मण्डलं द्युस्थानमहोरात्राभ्यां बम्भ्रमज्जगदवभासयति तस्मिन्नेवादित्यादयो देवतावचनाः शब्दाः प्रयुज्यन्ते, लोकप्रसिद्धेर्वाक्यशेषप्रसिद्धेश्च । न च ज्योतिर्मण्डलस्य हृदयादिना, विग्रहेण चेतनतयाऽर्थित्वादिना वा योगः संभवति, मृदादिवदचेतनत्वात् ॥ एतेनैवाग्निपृथिव्यादयोऽपि व्याख्याताः । यच्च मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वमुक्तमिति, नदपि न मन्त्राणां श्रुत्यादिविनियुक्तानां प्रयोगसमवेतार्था- I सृष्टि उत्पन्न होती जाती है, वह पूर्व सृष्टि के समान ही होती है । महाभारत शान्तिपर्व ( १२१८५ और २५/७ ) मे भी (स्मृति में भी ) }इस प्रकार कहा गया है । जगत् का नाश होने पर भी उसकी शक्ति शेष रहती है, उसी शक्ति से वह पुनः उत्पन्न होता है । अन्यथा जगत् की सृष्टि निष्कारण हुई है, यह अनिष्ट प्रसंग प्राप्त होगा । शक्तियां अनेक प्रकार की है, यह कल्पना भी नही कर सकते । इस लिये पुनः पुनः उत्पन्न होनेवाले भू आदि लोक, देव, पशु और मनुष्यरूप प्राणियों का प्रवाह वर्ण, आश्रम, धर्म और फल की व्यवस्थाएं भी अनादि संसार मे इन्द्रिय और विषय के सम्बन्ध के समान नियत है, ऐसा समझना चाहिये । क्योकि छठे इन्द्रिय ( मन ) के विषय के समान प्रत्येक सृष्टि में इन्द्रिय और विषय के सम्बन्ध से होनेवाले व्यवहार के भेद की कल्पना नही की जा सकती । अतः सब कल्पो में एक सा व्यवहार होने से और हिरण्यगर्भ आदि ईश्वरों के अन्य कल्प के व्यवहार का स्मरण करने में समर्थ होने से प्रत्येक सृष्टि मे समान नाम और रूपवाली ही भिन्न-भिन्न व्यक्तियां उत्पन्न होती है । नाम और रूपों के समान होने से महासृष्टि और महाप्रलयस्वरूप जगत् की आवृत्ति स्वीकार करने में भी शब्दप्रामाण्य आदि मे कोई भी विरोध नही है । श्रुति और स्मृति भी सब कल्पो में नाम और रूप की समानता दिखलाती है । अतः मन्त्रो और ब्राह्मणों में राजाओं के, ऋषियों के, पर्वत आदि के वर्णन रहने पर भी वेदो का } अनित्यत्व उससे सिद्ध नही होता । जातिरूप से मथवा स्थानरूप से उनका नित्यत्व है ही । एवं च न तो औत्पत्तिकसूत्र से विरोध है और न मन्त्रब्राह्मण आदि का1 अनित्यत्व ही हो पाता है । 1 किञ्च, 'वाचा विरूपनित्यया' ( ऋ० सं० ८२७५/६ ) तथा पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचुः' ( तै ० सं ० ) इन श्रुतियो में मोर ' ' ( ज्योतिषि भावाच्च ब्र ० सू ० १ ३ ३२ सूत्र में भी यह बताया गया है कि द्युलोक में रहनेवाला जो यह ज्योतिर्मण्डल दिन रात पुनः पुनः भ्रमण करता हुआ जगत् को प्रकाशित करता है, उसमें आदित्य आदि देवतावाचक शब्द प्रयुक्त होते हैं, क्योंकि ऐसी लोक प्रसिद्धि है और वाक्य शेष से भो यही सिद्ध होता है । ज्योतिर्मण्डल का हृदय बादि शरीर के साथ अथवा चेतना और कामना आदि के साथ सम्बन्ध नही माना जा सकता, क्योकि मृत्तिका आदि के समान वे बचेतन हैं, ऐसा ज्ञात होता है । यही प्रकार अग्नि, पृथ्वी आदि के विषय में भी समझना चाहिये । मन्त्र, अर्थबाद, इतिहास, पुराण और लोकव्यवहार से देवताओं का निग्रहवत्त्व ( शरीरी होना ) नो प्रतीत होता है, उसमें कोई हानि नही है, क्योकि श्रुति आदि से विनियुक्त होनेवाले तथा मनुष्ठानकालीन पदार्थों को बताने २४५
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वेदार्थपारिजातः १ ९५४ भिधायिना विधिनैकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थानामर्थवादानां च न पार्थगर्थ्येन देवादीनां विग्रहादिसद्भावे प्रामाण्यम्, इतिहास- पुराणस्य पौरुषेयत्वात् प्रमाणान्तरसापेक्षित्वेन लोकस्य च प्रत्यक्षादिव्यतिरिक्त प्रमाणत्वम्' इति मीमांसकाः । 'भावं तु बादरायणोऽस्ति हि' ( ब्र ० सू० १1३1३३ ) इति सूत्रेण देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामधिकारस्य भाव उक्त ' । मध्वादिविद्यामु देवतादिव्यामिश्रास्वधिकाराभावेऽपि शुद्धायां विद्यायामस्त्येवाधिकारः । 'तद्यो यो देवानां प्रत्य- बुद्धयत स एव तदभवत्तथर्षीणा तथा मनुष्याणाम्' ( बृ० उ० १।४।१० ), 'इन्द्रो वे देवानामभिवव्राज, विरोचनोऽसुराणाम्' (छा० ८७१२ ), 'ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विष्यामो यमन्विष्य सर्वाश्च लोकानाप्नोति सर्वाश्च कामान्' ( छा० ८| ७| २ ) । , ' आदित्यशब्दोऽपि चेतनावन्तमैश्वर्याद्युपेतं तं तं देवतात्मानं समर्पयति मन्त्रार्थवादेषु तथा व्यवहारात् । अस्ति श्वयं- योगाद्देवतानां ज्योतिराद्यात्मभिश्वावस्थातुं यथेष्ट च तं तं विग्रहं ग्रहीतुं सामर्थ्यम्, श्रूयते हि सुब्रह्मण्यार्थवादे मेधातिथि ह काण्वायनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार' ( षड्विंशब्राह्मणे, १1१ ), स्मर्यते च आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम । मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते । ' मृदब्रवीत्, आपो अब्रुवन्' इत्यादिदर्शनात् । यदुक्तमर्थवादादयोऽन्यार्थत्वान्न देवताविग्रहादिप्रकाशनसमर्था इति, तत्राप्युच्यते, प्रत्ययाप्रत्ययो हि सद्भावा- सद्भावयोः कारणम्, नान्यार्थत्वमनन्यार्थत्वं वा, नान्यार्थं प्रस्थितः पथि पतित तृणपर्णादि न प्रतिपद्यते । ननु तृणपर्णादि- विषयं प्रत्यक्षं प्रवृत्तमिति तदस्तित्वं सिद्धयति न पुनर्विभ्युद्देश्यैकवाक्यभावेन स्तुत्यर्थेऽथंवादे पार्थंगर्थ्येन वृत्तान्तविषया प्रवृत्तिः शक्याऽध्यवसातुम् । नहि महावाक्येऽर्थप्रत्यायकेऽवान्तरवाक्यस्य पृथक् प्रत्यायकत्वमस्ति । ' न सुरां पिबेत्' इति नश्र्वति वाक्ये पदत्रयसम्बन्धात् सुरापानप्रतिषेध एक एवार्थोऽवगम्येत, न पुनः सुरा पिबेदिति पदद्वयसम्बन्धात् सुरापान- वाले मन्त्रों की विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता रहती है, अर्थवाद भी विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता के कारण स्तुत्यर्थक ही है । अतः वे भी स्वतन्त्रता से देवता आदि के शरीर का प्रतिपादन करने में समर्थ नही हो सकते । इतिहास, पुराण भी पुरुष प्रणीत होने से मूल- भूत अन्य प्रमाण की अपेक्षा रखते है । लोक कोई स्वतन्त्र प्रमाण नही है । यथार्थत पदार्थ का ज्ञान कराने वाले प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से प्रसिद्ध हुआ अर्थ ही लोक-प्रसिद्धि कहा जाता है । वह कोई प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के अतिरिक्त स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है । अतः विद्या में देवता आदि का अधिकार नही है, ऐसा मीमासक कहते हैं । इसका उत्तर बादरायण व्यास ' भावं तु बादरायणोऽस्ति हि' (ब्र० सू० १।३।३३ ) सूत्र से देते है । बादरायण कहते है कि देवता आदि का भी विद्या मे अधिकार है । यद्यपि देवता आदि से सम्बन्ध रखनेवाली मधुविद्या आदि में देवता आदि का अधिकार असम्भव है, तथापि शुद्ध ब्रह्मविद्या में उनका अधिकार हो सकता है । ब्रह्मविद्या के प्रकरण में देवता आदि का अधिकार सूचित करने वाली श्रुतियाँ ( बृ० उ० ११४| १०, छॉ० उ० ८ ७१२ ) हैं | ज्योतिर्मंण्डल आदि में प्रयुक्त होने पर भी देवतावाचक मादित्य आदि शब्द चेतना वाले ऐश्वर्यशाली उन उन देवताओ का बोध कराते हैं, क्योंकि मन्त्र, अर्थवाद आदि में ऐसा व्यवहार है । ऐश्वर्य के योग से देवता ज्योतिमंण्डल बन सकते हैं और अपनी इच्छानुसार अनेक शरीर भी धारण कर सकते हैं, क्योंकि षड्विंश ब्राह्मण ( १1१ ) के अनुसार सुब्रह्मण्यार्थवाद में इन्द्र के प्रति मेधातिथि का ' मेष' ऐसा सम्बोधन है । इस प्रकार की श्रुति तथा स्मृति भी है । उसी प्रकार मृत्तिका का आदि में भी चेतन अधिष्ठाता माने जाते हैं, क्योंकि 'मृदब्रवीदापोऽब्रुवन्' ( श० ग्रा० ६।१।३।२२४ ) आदि श्रुतियाँ देखी जाती है । आदित्य आदि में भी ज्योतिमंण्डलरूप भूतांश अचेतन माना जाता है; किन्तु मन्त्र, अर्थवाद आदि के व्यवहार से देवतात्मा वषिष्ठाता चेतन ही है । मन्त्र और अर्थवाद अन्यार्थक है, अतः उनमें देवता के विग्रह आदि पर प्रकाश डालने की सामर्थ्य नही हैं, ऐसा जो कहा है, उस पर कहते हैं कि वस्तु के सद्भाव और असद्भाव के प्रति उसकी प्रतीति और अप्रतीति कारण है । उसके वाचक पद का अन्यार्थ- कत्व या अनत्यार्थकत्व कारण नहीं है । जैसे किसी प्रयोजन के लिये निकले हुए पुरुष को मार्ग में पड़े हुए घास-पत्तों वादि की प्रतोति भी होती है । इस पर कहते हैं कि जो दृष्टान्त दिया गया है, वह विषम है । वहाँ तो घास-पत्ते आदि का प्रत्यक्ष होता है, उससे ‡ उसके अस्तित्व की प्रतीति होती है, परन्तु यहाँ तो विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता प्राप्त करने से अर्थवाद स्तुत्यर्थक है । अतः
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वेदार्थपारिजातः १९ ५५ विधिरपीति चेन्न, उपन्यासवैषम्यात् । युक्तं यत्सुरापानप्रतिषेधे पदान्वयस्यैकत्वादवान्तरवाक्यार्थस्याग्रहणम्, विध्युद्देशार्थ-बादयोः स्तुत्यर्थवादस्थानि पदानि पृथगन्वयं वृत्तान्तविषय प्रतिपद्यानन्तरं कैमर्थ्यवशात् कामं विधेः स्तावकत्वं प्रतिपद्यन्ते । यथा हि- 'वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः' इत्यत्र विध्युद्देशवर्तिना वायव्यादिपदानां विधिना सम्बन्धः, नैवं ' वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता, वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति ' इत्येषामर्थवादगतपदानाम् ॥ नहि भवति ' वायुर्वा आलभेत' इति । वायुस्वभावसंकीर्तनेन त्ववान्तरमन्वयं प्रतिपद्येव विशिष्टदैवत्यमिदं कर्मेति विधि स्तुवन्ति । तद्यत्र सोऽवान्तरवाक्यार्थः प्रमाणान्तरगोचरो भवति, तत्र तदनुवादे नार्थवादः प्रवर्तते । यत्र प्रमाणान्तरविरुद्धस्तत्र गुणवादेन, यत्र तु तदुभय नास्ति तत्र किं प्रमाणान्तराभावाद् गुणवाद आहोस्वित् प्रमाणान्तराविरोधाद् विद्यमानवाद इति प्रतीति-बलाद् विद्यमानवाद आश्रयणीयो न गुणवादः । एतेन मन्त्रो व्याख्यातः । अथ विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीना स्वरूपम्, नहि स्वरूपरहिता इन्द्रादय-श्वेतस्यारोपयितुं शक्यन्ते । नहि चेतस्यनारूढाये तस्ये तस्यै देवतायै हविः प्रदातुं शक्यते । श्रावयति च -' यस्यै देवतायं हविर्गृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट्करिष्यन्' ( ऐ ० ब्रा० ३।८।१ ) इति । न च शब्दमात्रमर्थस्वरूपं भवति, शब्दार्थयोर्भेदात् । तत्र यादृशं मन्त्रार्थवादयोरिन्द्रादीनां स्वरूपमवगतं न तत्तादृश शब्दप्रमाणकेन प्रत्याख्यातुं युक्तम् 1। इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण सभवन्मन्त्रार्थमूलत्वात् प्रभवत्येव देवतादिविग्रहं साधयितुम् । प्रत्यक्षादिमूलमपि संभवति । भवति ह्यस्माकमप्रत्यक्षमपि चिरन्तनानां प्रत्यक्षम् । तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति स्मर्यते । 'स्वाध्यायादिष्ट- स्वतन्त्रतया वह भूतार्थ का प्रतिपादक है, ऐसा निश्चय नही हो सकता । अर्थ की प्रतीति कराने वाले महावाक्य मे अवान्तरवाक्य भिन्न प्रतीति नही करा सकता । जैसे 'न सुरा पिवेत्' - सुरा न पीए - इस 'न'कार वाले वाक्य मे तीन पदो के सम्बन्ध से सुरापान का प्रति-षेधरूप एक ही अर्थ प्रतीत होता है, 'सुरा पिबेत्' इन दो पदो के सम्बन्ध से सुरापान की विधि की प्रतीति नही होती । इस पर कहते हैं कि दृष्टान्त विषम है । सुरापान के प्रतिषेष में पदान्वय एक होने के कारण अवान्तर वाक्यार्थ का ग्रहण न होना उचित है, परन्तु विधिवाक्य और अर्थवाद में से तो अर्थवाद में रहने वाले पद भूत ( सिद्ध ) अर्थ मे पृथक् अन्वित होकर पश्चात् कैमथ्यं से विधिवाक्य के स्तावक होते है । जैसे- ' ऐश्वर्य चाहने वाला पुरुष वायुदेवता के लिये श्वेत पशु का आलम्भन करे' इसमें विधिवाक्यगत वायव्य आदि पदो का विधि के साथ सम्बन्ध है, उस प्रकार 'वायु सब की अपेक्षा अतिशय शीघ्र गतिशील देवता है, यजमान अपने वायु के भाग से वायु का ध्यान करता है, वही इसको ऐश्वर्यशाली बनाता है' इन अर्थवादस्थ पदो का विधि के साथ सम्बन्ध नही है । 'बायुरालभेत ' या 'क्षेपिष्ठा देवता आलभेत ' ऐसा अन्वय नही होता । अर्थवाद के वायु पद का अथवा 'क्षेपिष्ठा देवता' इन पदों का 'आलभेत ' विधि के साथ संबन्ध नही होता, किन्तु वायु का उसके स्वभाव कथन द्वारा अवान्तर अन्वय प्राप्त करके ही इस प्रकार विशिष्ट देवता वाला यह कर्म है, इस प्रकार विधि की स्तुति करते हैं । जहाँ वह अवान्तर वाक्यार्थ अन्य प्रमाण का विषय होता है, वहीं उसके अनुवाद से afare प्रवृत्त होता है और जहाँ प्रमाण से विरोध है, वहाँ गुणवाद से । जहाँ वे दोनो नही होते, वहाँ अन्य प्रमाण के अभावकासे आश्रयणगुणवाद हो अथवा अन्य प्रमाण के अविरोध से विद्यमानवाद हो, ऐसा सन्देह उपस्थित होने पर विचारशीलों को विद्यमानवाद करना चाहिये, गुणवाद का नही । इसी प्रकार मन्त्र में समझना चाहिये । इन्द्र आदि देवताओं को हवि देने की प्रेरणा करनेवाली विधियों ही इन्द्र आदि के स्वरूप की अपेक्षा रखती हैं । यदि इन्द्र आदि देवता वस्तुत ' स्वरूपरहित हों, तो उनका ध्यान नही किया जा सकता और व्यान न होने से उन्हें हवि भी नही दिया जा सकता । ऐतरेय ब्राह्मण श्रुति ( ३।८।१ ) कहती है कि 'जिस देवता के लिये हवि का ग्रहण किया हो, उसका वषट्कार करने से पहले ध्यान करना चाहिये ' । केवल शब्द, अर्थ का स्वरूप नही हो सकता, क्योकि शब्द और अर्थ का भेद है । मन्त्र और अर्थवाद में इन्द्र उचित नहीं हूँ ।आदि का जैसा स्वरूप बताया गया है, वह वैसा ही है । उसका प्रतिषेध करना शब्दप्रमाण मानने वालों के लिये आदि सिद्ध करने इतिहास और पुराण भी मन्त्रमूलक और अर्थवादमूलक होने के कारण प्रमाण होने से उपर्युक्त रीति से देवता के विग्रह हो में समर्थ होते हैं । देवता आदि के शरीर होने में प्रत्यक्षादि भी मूल है । जो हमको अप्रत्यक्ष हैं, वे भी प्राचीनो को प्रत्यक्ष सकते हैं, जैसे कि ग्यास आदि देवतानों के साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते हैं, ऐसी स्मृति है । आज के लोगों के समान प्राचीन लोग भी
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वेदार्थपारिजातः १ ९५६ देवतासंप्रयोगः' ( यो० सू० २।२४ ) इति वचनाच्च । योगो ह्यणिमाद्यैश्वर्यफलः स्मर्यमाणो न शक्यते साहसमात्रेण प्रत्या- ख्यातुम् । तथैवाख्यायिकानां सुखार्थावबोधार्थत्वेऽपि प्रमाणान्तराविरुद्धोऽसिद्धश्च प्रमाणान्तरेण भूतार्थं एवेति मन्तव्यः । यद्यपि वैदिकाः शब्दा न घटनापूर्वकास्तथापि वैदिकशब्दपूर्विका घटनास्तु न निवारयितु शक्यन्ते, सृष्टेर्वेदिकशब्दपूर्वत्वा- भ्युपगमात् । तस्मादैतिहासिक पक्षोऽपि निरुक्तेष्वाध्यात्मिक पक्षवदभ्युपेयत एव । अयमभिप्रायः - लोके विशिष्टार्थबोधनाय प्रयुक्तानि पदानि न स्वार्थमात्रस्मारणे पर्यवस्यन्ति । न चैतान्य- स्मिन् स्वार्थानि साक्षाद्वाक्यार्थं बोधयितु समर्थानि तेन स्वार्थस्मारणं वाक्यार्थ बोधेऽवान्तरव्यापारः । न च नञ्वति वाक्ये विधानपर्यवसानम्, तथा सति नञ्पदानर्थक्यापातात् । तदुक्तम्- 'साक्षाद्यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् । शब्दास्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥ वाक्यार्थमितये तेषा प्रवृत्तो नान्तरीयकम् । पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ ' सेयमेकस्मिन् वाक्ये गतिः । यत्र तु वाक्यस्यैकस्य वाक्यान्तरेण सम्बन्धस्तत्र लोकानुसारतो भूतार्थव्युत्पत्ती सिद्धायामेकैकस्य वाक्यस्य तद्विशिष्टार्थप्रत्यायनेन पर्यवसितवृत्तिना पश्चात्कुतश्चिद् हेतोः प्रयोजनान्तरापेक्षायामन्वयः कल्प्यते । यथा -'वायु-वेति', 'वायव्यं श्वेतमालभेत' इति । इह हि यदि न स्वाध्यायाध्ययनविधिः स्वाध्यायशब्दवाच्यवेदराशि पुरुषार्थतामनेष्यत्, ततो भूतार्थमात्रपर्यवसिता नार्थवादा विध्युद्देश्यवाक्येनैकवाक्यमगमिष्यन् । तस्मात् स्वाध्यायविधिवशात् कैमर्थ्याकाङ्क्षायां वृत्तान्तादिगोचराः सन्तस्तत्प्रत्यायनद्वारेण विधेयप्राशस्त्यं लक्षयन्ति, न पुनरविवक्षितस्वार्था एव तल्लक्षणे प्रभवन्ति । देवताओ के साथ व्यवहार करने में समर्थ न थे, ऐसा जो कहेगा, वह जगत् की विचित्रता का अपलाप करेगा और आजकल के समान अन्य समय में भी सार्वभौम क्षत्रियो की सत्ता का निषेध करेगा, तब राजसूय आदि विधि में भी वर्णाश्रमधर्म अव्यवस्थित ही था, ऐसी प्रतिज्ञा करनी होगी, तब व्यवस्थापक शाखा हो व्यर्थ हो जायेगी । इससे स्पष्ट हुआ कि धर्म के उत्कर्ष के कारण प्राचीन लोग देवताओं के साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे । 'स्वाध्याय से इष्ट देवता के साथ सम्प्रयोग और संभाषण आदि सम्बन्ध होता है' इत्यादि स्मृति भी है । अणिमा आदि ऐश्वर्य के साधन स्मृतिसिद्ध योग का भी सहसा निषेध नही किया जा सकता । उसी तरह अनायास अर्थज्ञानार्थ आख्यायिकाओं के होने पर भी यदि वे प्रामाणान्तर के बिरुद्ध न हों तथा प्रमाणान्तर से सिद्ध हों तो उन्हे भूतार्थ ( सत्यार्थ ) हो समझना चाहिये । यद्यपि वैदिक शब्द घटना पूर्वक नही हैं, तथापि घटना तो वैदिक शब्दपूर्वक माननी होगी, इसे तो मना नही कर सकते, क्योंकि सृष्टि को वैदिक शब्दपूर्वक कहा गया है । तस्मात् ऐतिहासिक पक्ष को भी आध्यात्मिक पक्ष के समान निरुक्त मे मानना ही पड़ता है । अभिप्राय यह है— लोकव्यवहार में विशिष्ट अर्थ के बोधनार्थ प्रयुक्त पद केवल अपने अर्थ के स्मरण कराने में ही पर्य-वसित नहीं समझे जाते और न ही ये पद साक्षात् वाक्यार्थ का बोधन करने में समर्थ हैं । अतः वाक्यार्थ मे स्वार्थस्मरण को अवान्तर व्यापार माना जाता है । 'न' का नन्घटित वाक्य के विधान में पर्यवसान नही होता, विधान में यदि उसका पर्यवसान माना जाय तो नञ्पद ही व्यर्थ हो जायगा । इसी बात को श्लोकवात्तिक के सातवें वाक्याधिकरण में श्लोक ३४२-३४३ के द्वारा कुमारिल भट्ट ने बताया है । यहाँ एक वाक्य का उपाय बताया गया है, किन्तु जहाँ वाक्य का अन्य वाक्य के साथ सम्बन्ध रहे, वहाँ लोकव्यवहारा-नुसार भूतार्थ में व्युत्पत्ति सिद्ध रहने पर एक एक वाक्य के द्वारा उसके अपने एक विशिष्ट अर्थ का बोध न कराने के कारण उसका व्यापार विश्रान्त होने से पश्चात् किसी कारण अन्य प्रयोजन की अपेक्षा होते पर उसके अन्वय की कल्पना की जाती है । जैसे- ' वायुर्वा ' इति, ' वायव्यं श्वेतमालभेत इति । यहाँ पर यदि स्वाध्यायाध्ययन विधि स्वाध्यायशब्दवाच्य वेदराशि को पुरुषार्थता न कहे तो भूतार्थमात्र में पर्यवसित होने वाले अर्थवाद विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता को नही प्राप्त करते । तस्मात् स्वाध्यायविधि के कारण भावना, कैमर्थ्याकांक्षा के होने पर वे अर्थवादवाक्य अपने प्रतिपाद्य अर्थ को बोधन कराते हुए विधेय के प्राशस्त्य को लक्षणा के द्वारा बताते हैं । अपने अभिधेय अर्थ को बिना बताये वे विधेय के प्राशस्त्य को लक्षित नही कर सकते । अपने अर्थ की विवक्षा न करने पर तो लक्षणा ही नहीं हो सकेगी, क्योकि लक्षणा करने में बीज ( कारण ) अभिधेयाविनाभाव है । उक्त कारण के होने पर ही लक्षणा होती है, अन्यथा नही । अत एव 'गङ्गाया घोषः" यहाँ पर गङ्गा शब्द अपने स्वार्थ से सम्बद्ध गङ्गातीर को ही लक्षित करता है ।
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वेदार्थपारिजातः १ ९ ५७ तथा सति लक्षणैव न भवेत्, अभिधेयाविनाभावस्य तद्बीजस्याभावात् ॥ अत एव गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गाशब्दः , न तु समुद्रतीरम्, स्वार्थप्रत्यासत्त्यभावात् । न चैतत्सवं स्वार्थाविवक्षायां कल्पते ।1 स्वार्थसम्बद्धमेव गङ्गातीरं लक्षयति अत एव यत्र प्रामाणान्तरविरुद्धार्था अर्थवादा दृश्यन्ते 'आदित्यो यूपः', 'यजमानः प्रस्तर:' इत्येवमादयः, तत्र यथा प्रमाणान्तराविरोधः, यथा च स्तुत्यर्थता, तदुभयसिद्धयर्थं - ' गुणवादस्तु' इति ' तत्सिद्धि:' इति चासूत्रय-: । ' यथा प्रमाणान्तराविरोधः तथाऽसूत्रयज्जैमिनिः' (जै ० १ २ १० ) । यथा च स्तुत्यर्थता, येन गुणेन स्तुत्यर्थता तथाT ज्जैमिनि सूत्रयत् ' तत्सिद्धि: ' ( जे० ११४/२२ ) इति । 'यजमान. प्रस्तरः' इति किं गुणविधिरुतार्थवाद इति संशये विधिरपूर्वार्थ- लाभादिति प्राप्ते, सिद्धान्त -यदि प्रस्तरकार्ये यजमानो विधीयेत तदा प्रस्तरं प्रहरतीति शास्त्राद्यजमानोऽग्नी हूयेत । ततः प्रयोगो न समाप्येत । अथ यजमानकार्ये प्रस्तरो विधीयेत तदानीमशक्यविधिः । नहि प्रथमलूनदर्भमुष्टिः प्रस्तरः शक्नोति चेतनयजमानकार्यं कर्तुम्, तस्मात् प्रस्तर बर्हिषा उत्तरं सादयतीत्यस्य विधेरर्थवादः । द्वितीयादिमुष्टिर्वीहिः, कथं वह 'यजमानः प्रस्तर:' इति सामानाधिकरण्यम्, तत्राह 'गुणवादस्तु' । को गुण इत्यपेक्षाया च तत्सिद्धिरिति सूत्रम् । तस्य यजमानस्य कार्यं क्रतुनिर्वृत्तिः । तत्प्रस्तरादपि सिद्धयति । स हि जुह्वाधारतया ऋतु निर्वर्तयति । 'आदित्यो यूपः ' इत्यत्र तेजस्वित्वं गुणः । तेजसा गुणेन घृताक्तत्वाद्यूपस्य । तस्माद्यत्र सोऽर्थोऽर्थवादाना प्रमाणान्तरविरुद्धस्तत्र गुणवादेन प्राशस्त्य- लक्षणेति लक्षितलक्षणा । यत्र तु प्रामाणान्तरसंवादस्तत्र प्रामाणान्तरादिवार्थवादादपि सोऽर्थः प्रसिद्धयति, द्वयोः परस्परा- नपेक्षयोः प्रत्यक्षानुमानयोरिवैकार्थे प्रवृत्तेः प्रमानपेक्षयाऽनुवादकत्वम् । प्रमाता ह्यव्युत्पन्नः प्रथम यथा प्रत्यक्षादिभ्योऽर्थमव- गच्छति, न तथाऽम्नायतः, तत्र व्युत्पत्या अपेक्षितत्वात् । न तु प्रमाणापेक्षया, द्वयोः स्वार्थेऽनपेक्षणात् । ननु मानान्तरविरोधेऽपि कुतो गुणवादः स्यात्, मानान्तरमेव कुतो न शब्दविरोधाद् बाध्येत, वेदान्तैरिवा- द्वेतविषयेः प्रत्यक्षादयः प्रपञ्चगोचराः, वेदान्ता वा अर्थवादवत्कुतो न गुणवादेन नीयन्त इति चेत्, तत्रोच्यते -द्विविधो हि समुद्रतीर को नही, क्योकि उसकी स्वार्थ से प्रत्यासत्ति ( सम्बन्ध ) नही है | स्वार्थ को अविवक्षित रखनेपर यह सब संगत नही हो पाता । अत एव जहाँ प्रमाणान्तर विरुद्धार्थवाले अर्थवाद दिखाई देते हैं, जैसे 'आदित्यो यूप:, 'यजमानः प्रस्तर: ' आदि स्थलों में जिस प्रकार प्रमाणान्तर से विरोध न हो सके और जिस तरह विधेय की स्तुत्यर्थता इनमे आ सके, इन दोनो कार्यों के सिद्धघ 4 जैमिनि मुनि ने 'गुणवादस्तु', 'तत्सिद्धि ' ये दो सूत्र रचे और 'यजमान प्रस्तर ' इस वैदिक वाक्य को लेकर विचार किया कि यहाँ गुण विधि है या अर्थवाद? यह सन्देह होने पर पूर्वपक्षी ने कहा कि गुण विधि है, क्योंकि विधि मानने से अपूर्व अर्थ का लाभ होगा । तब सिद्धान्ती ने कहा कि यदि पूर्वपक्षी के कथनानुसार विधि मानेंगे तो प्रस्तर के उचित कार्य मे यजमान रूप गुण का विधान होगा 1 तब 'प्रस्तरं प्रहरति' इस शास्त्र वचन के अनुसार अग्नि में यजमान की आहुति देनी होगी । तब तो अनुष्ठान की समाप्ति ही न हो सकेगी । यदि यजमान के उचित कार्य में प्रस्तर का विधान करें, तो वैसा करना ही संभव ही नही होगा, क्योकि प्रथम छिन्न दर्भमुष्टि- रूप प्रस्तर तो जड़ पदार्थ है, उससे चेतन यजमान के द्वारा करने योग्य कार्य का सम्पादन कैसे होगा । तस्मात् 'प्रस्तरं बहिषा उत्तरं सादयति' इस विधि का उसे अर्थबाद ही मानना उचित होगा, यह सिद्धान्त किया गया । उसी तरह 'आदित्यो यूपः' यहाँ पर घृताक्त यूपमें तेजोगुण के कारण तेजस्वित्व उपलब्ध है । इस गुण के कारण प्राशस्त्य में लक्षणा करके लक्षित-लक्षणा मानी जाती है । जहाँ प्रमाणान्तर के साथ संवाद रहता है, वहाँ प्रमाणान्तर के समान अर्थवाद से भी उस अर्थ को अवगति होती है, क्योकि परस्परानपेक्ष 1 दोनों की प्रत्यक्ष और अनुमान की तरह एक ही अर्थ मे प्रवृत्ति रहती है । प्रमाता की दृष्टि से दोनों में अनुवादकता रहती है, क्योंकि प्रमाता तो अव्युत्पन्न रहता है । प्रथमतः जैसे वह प्रत्यक्षादि से अर्थ को जानता है, वैसे आम्नाय से नही जानता, क्योंकि वहाँ व्युत्पत्ति की अपेक्षा होती है । प्रमाण की अपेक्षा नहीं, क्योंकि दोनों अपने स्वार्थ बोधन में निरपेक्ष हैं । यदि यह कहे कि प्रमाणान्तर का विरोध रहने पर भी गुणवाद क्यों माना जाय? शब्द का विरोध रहने से मानान्तर (प्रमाणान्तर ) को ही बाधित क्यों न माना जाय? अद्वैतविषयक वेदान्त वाक्यों की तरह प्रपश्यविषयक प्रत्यक्ष आदि को अथवा अर्थ- 1
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१ ९५८ वेदार्थपारिजातः विषयः शब्दानाम्-द्वारतः, तात्पर्यतश्च ॥ यथैकस्मिन् वाक्ये पदानां पदार्थो द्वारतः, वाक्यार्थश्च तात्पर्यंतो विषयः, एव वाक्यद्वयेनैकवाक्यतायामपि । यथेयं देवदत्तीया गौः क्रेतव्येत्येकं वाक्यम्, एषा बहुक्षीरेत्यपर वाक्यम् । तदस्य बहुक्षीरत्व- प्रतिपादनं द्वारम्, तात्पर्यं तु क्रेतव्येति वाक्यार्थे । तत्र यद् द्वारतस्तत्प्रमाणान्तरविरोधेऽन्यथा नीयते । यथा ' विष भुङ्क्ष्व ' इति वाक्यम् ' माऽस्य गृहे भुङ्क्ष्व ' इति वाक्यान्तरार्थपरम् । यत्र तु तात्पर्यं तत्र मानान्तरविरोधे पौरुषेयमप्रमाणमेव भवति, वेदान्तास्तु पौर्वापर्यपर्यालोचनया निरस्तसमस्तभेदप्रपञ्चब्रह्मप्रतिपादनपरा अपौरुषेयतया स्वतः सिद्धतात्त्विकप्रमाणभावाः सन्तस्तात्त्विक प्रमाणभावात् प्रत्यक्षादीनि प्रच्याव्य व्यावहारिके तस्मिन् व्यवस्थापयन्ति । न चादित्यो यूप इति वाक्यमादित्यस्य यूपत्वप्रतिपादनपरम् अपि तु यूपस्तुतिपरम् । तस्मात् प्रमाणान्तर- विरोधे द्वारभूतो विषयो गुणवादेन नीयते । यत्र तु प्रमाणान्तर विरोधकं नास्ति, यथा देवताविग्रहादी, तत्र द्वारतोऽपि विषयः प्रतीयमानो न शक्यः परित्यक्तम्, न वा गुणवादेन नेतुम् । को हि मुख्ये संभवति गुणवादमाश्रयेत, अतिप्रसङ्गात् । ननु तथा सत्यनधिगतं विग्रहमपि प्रतिपादयद् वाक्यं भिद्येतेति चेत्, सत्यम्, वाक्यस्य भिन्नत्वादेव । ननु तथा सति तात्पर्य- भेदोऽपि स्यादिति चेन्न, द्वारतोऽपि तदवगतौ तात्पर्यान्तरकल्पनायोगात् । न च यत्र न तात्पर्यं तत्राप्रामाण्यम्, तथा सति विशिष्टपरं वाक्यं विशेषणेष्वप्रमाणमिति विशिष्टपरमपि न स्यात्, विशेषणविषयत्वात् । विशिष्टविषयत्वेन तु तदाक्षेपे परस्पराश्रयत्वम् । आक्षेपाद्विशेषणप्रतिपत्ती सत्यां विशिष्टविषयता, विशिष्टविषयत्वाच्च तदाक्षेपः । तस्माद्विशिष्टप्रत्यय- परेभ्योऽपि विशेषणानि प्रतीयमानानि तस्यैव वाक्यस्य विषयत्वमनिच्छताप्यभ्युपगन्तव्यानि यथा, तथाऽन्यपरेभ्योऽप्यर्थवाद- वाक्येभ्यो देवताविग्रहादयः प्रतीयमाना असति प्रमाणान्तरविरोधेन युक्तास्त्यक्तुम् । नहि मुख्यार्थसंभवे गुणवादो युक्तः, न च भूतार्थमप्यपौरुषेयं मानान्तरापेक्षकं स्वार्थे, येन प्रमाणान्तरासंभवे भवेदप्रामाण्यम् ॥ नन्वेवं तात्पर्येक्येऽपि यदि वाक्य- भेदः कथं तर्ह्यर्थैकत्वादेकवाक्यमिति चेन्न, वाक्यैकवाक्ये सत्यपि प्रयाजादिवाक्यानामिव अर्थवादानामवान्तरभेदे बाधा- भावात् । स्तुति लक्षयितुं त्वयापि तत्रत्यपदार्थविशिष्टस्तुतेरभ्युपेयत्वात्, अन्यथाऽभिधेयाविनाभावाभावात् स तु पदार्थान्तर-विशिष्टः पदार्थ एकः कचिद् द्वारभूतः कचिद् द्वारीत्येतावान् विशेषः । स्तुतिप्रतिपत्तिद्वारं विग्रहादिप्रयाजादिवाक्य तु नान्यप्रतीतो द्वारम्, किन्तु तद् द्वारि स्वयं तात्पर्यविषयः । नन्वेवमोदनं भुक्त्वा ग्रामं गच्छतीत्यत्रापि वाक्यभेदप्रसङ्गः, अन्यो हि संसर्गः, ओदनं भुक्त्वेति, अन्यस्तु ग्रामं गच्छतीति चेन्न, एकत्र प्रतीतेरपर्यवसानात् । भुक्त्वेति हि समानकर्तृता भूतकालता च प्रतीयते, न चेयं प्रतीतिरपरकालक्रियान्तरप्रत्ययमन्तरेण पर्यवस्यति । तस्माद्यावति समहे पदाहिताः वाद की तरह वेदान्तवाक्यों को ही गुणवाद क्यो नही कहते? इन प्रश्नों के उत्तर में यह कहा जा रहा है कि शब्दो का विषय द्विविध होता है, एक द्वारत: ( किसी माध्यम से ) और दूसरा तात्पर्यतः । जैसे किसी एक वाक्य में पदों का विषय जो पदार्थ होता है, वह द्वारत: होता है और वाक्यार्थ जो विषय होता है, वह तात्पर्यतः होता है । उसी प्रकार वाक्यद्वय के साथ एकवाक्यता में भी समझना चाहिये ॥ जैसे यह देवदत्त की गौ क्रयण करने योग्य है, यह एक वाक्य है और वह बहुक्षीरा है, यह दूसरा वाक्य है । यहाँ पर बहुक्षीरत्व प्रतिपादन तो द्वार है, तात्पर्य क्रेतव्या इस वाक्यार्थ में है । द्वारतः जो विषय है, उसका प्रमाणान्तर के विरोध में अन्यथानयन होता है । जैसे 'विषं भुङ्क्ष्व' यह वाक्य 'माऽस्य गृहे भुङ्क्ष्व' इस वाक्यान्तरार्थपरक होता है । जहाँ तात्पर्य होता है, वहीं प्रमाणान्तर विरोध रहने पर पौरुषेय को अप्रमाण ही माना जाता है । वेदान्त वाक्य पौर्वापर्य की दृष्टि से समस्त भेद प्रपञ्च का निरसन कर ब्रह्मप्रतिपादनपरक होते है, वे अपौरुषेय होने से उनका वास्तविक प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है । अपने क्षेत्र से लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाणों को हटाकर उन्हें व्यावहारिक क्षेत्र में व्यवस्थापित करते हैं । 'आदित्यो यूपः' यह आदित्य में यूपत्व का प्रतिपादन नही कर रहा है, अपि तु ग्रूप की स्तुति में उसका तात्पर्य है । तस्मात् प्रमाणान्तर का विरोध रहने पर सारभूत विषय गुणवाद के द्वारा बताया जाता है । किन्तु जहाँ विरोधक प्रमाणान्तर न हो, जैसे देवता विग्रह आदि में, वहाँ पर द्वारतः प्रतीयमान होनेवाले विषय को भी त्यागा नहीं जा सकता और न गुणवाद के द्वारा उसका