वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 121–130

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 121–130

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वेदार्थ पारिजातः १०२१ प्राचीनताया अपौरुषेयत्वसनातनत्वास्यामसमन्वयात् । अपौषेयता सनातनता चानादित्वप्रयोजिका, अनादित्वरचित- स्वयोश्च विरोध एवास्ते । यद्यप्यनुपूर्व्या निर्माण स्वातन्त्र्याभावेन गुरुमुखोच्चारणानूच्चारणकत्वेनाप्य पौरुषेयता सिद्धयति, अत एव पूर्वकल्पीयानुपूर्वी सव्यपेक्षतया कल्पादी परमेश्वरोपदिष्टत्वेनाप्यपरुषेयता सिद्ध्यति, तथापि पाश्चात्त्यैस्तन्नानुमन्यते । पुरोहितास्तात्पर्यं सूक्तानां विस्मृतवन्त इत्यत्र हेतुर्नोक्तः । नहि प्रतिज्ञामात्रेणाभीष्टसिद्धिः सम्भवति । वैदिकाना दृष्ट्या तु गद्यपद्यात्मका मन्त्रा ब्राह्मणानि वाsपौरुषेयाण्येव, अनुस्तेषां कालनिर्धारणमशक्यमेव । यदपि च-' मन्त्रग्रामाणा विनियोगे परस्पर सम्बन्धस्थापनमेव बाह्मण नामुद्देश्यम्' ( पृ० २७ ) इति, तदपि न, ब्राह्मणानामेव प्राधान्येन विनियोगवर्णनात् । यद्यपि लिङ्गादिभिरपि विनियोग कल्प्यते, तथापि 'श्रुतिलिङ्ग- ' ( ) वाक्यप्रकरणस्थानसमाख्याता सम्बाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात् मी० सू० इति सूत्ररीत्या श्रुतेरेव प्राबल्यनिर्णयात् । 'ब्राह्मण मन्त्राणां विधिविधानानि साङ्केतिकरहस्यानि च प्रकाशयति, तदर्थमाख्यानानि कथानकानि च तत्समर्थनायाद्रियन्ते । क्वचित् क्वचिद् गम्भीरविपयानपहाय तत्र साहित्यिकदृष्ट्या काचिद्रोचकता नोपलभ्यते । • पज्ञियविषयावगमाय क्वचिच्छन्दार्थभाषाशब्दव्युत्पत्त्यादिसम्बन्धि ऊहापोहादिकं करोति । क्वचिदीश्वरवादादि सिद्धान्तान् स्थापयितुं चेष्टते । वस्तुतोनिःसाराः पाण्डित्माडम्बरपूर्णाः पुरोहितानः धामिकधारणानां प्रतिबिम्वरूपा ब्राह्मणगता विचारा. अधिकांशतया कल्पितास्तर्कशुन्या सन्ति । क्वचित्तु रूपकमय्यो बुद्धिशुन्या असङ्गता. संसारे क्वचिदप्यदृष्टचराः विद्यन्ते, तथापि विश्वधर्मेतिहामाध्येतृभिरत्यन्तमुपादेया: ' ( २७ पृ० ) इति, तदप्यज्ञानविजृम्भितम्, ' अशक्तास्तत्पद गन्तु ततो निन्दां प्रकुर्बते इति त्या ब्राह्मणानां महती भूतस्य परमेश्वरस्य निःश्वसितानां प्राचीनतम गद्य-लेख के प्रतीक हैं । इन ग्रन्थो की शैली अवश्य नीरस, खेदकर, विकीर्ण एवं असंघटित है' (पृ० २६-२७ ) । यह कथन औ निःसार है । अतिप्राचीनता का अपौरुषेयता और सनातनता से समन्वय नही बन सकता । अपौरुषेयता और सनातनता अनादिता के आधार पर ही सिद्ध की जा सकती है । अनादिता और कर्तृता परस्पर विरोधी है । यद्यपि आनुपूर्वी के निर्माण में स्वतन्त्रता न होने से और गुरुमुख से उच्चरित बात को ही पुनरुच्चरित करने से भी अपौरुषेयता सिद्ध होती है, इसी तरह से पूर्वकल्पीय आनुपूर्वी की अपेक्षा इस कल्प में भी रहने से परमेश्वर कल्प के आदि मे तदनुसार ही वेद का उपदेश करता है, अतः इस तरह से भी वेद की अपौरुषेयता सिद्ध होती है, तथापि पाश्चात्य विद्वान् इसको स्वीकार नही करते । पुरोहित सूक्तो के तात्पर्य को भूल गये, ऐसा कहते समय मैकडानल ने इसका कारण नही बताया । केवल प्रतिज्ञा कर लेने से वस्तु की सिद्धि नही हो जाती । वैदिको की दृष्टि से तो गद्यपद्यात्मक मन्त्र और ब्राह्मण सभी अपौरुषेय है अतः इनका काल निर्धारित कर पाना अशक्य है । 'ब्राह्मण- ग्रन्थो का मुख्य ध्येय मन्त्रग्राम और विनियोग के बीच परस्पर संबन्ध को प्रकट करने का है' ( पृ० २७) । यह भी गलत है, क्योकि प्रधानतः ब्राह्मण ही विनियोग को बताते है । यद्यपि लिंग प्रभृति से भी विनियोग की कल्पना की जाती है, किन्तु 'श्रुतिलिङ्ग०' प्रभृति मीमासा सूत्र के आधार पर विनियोग के निर्णय में श्रुति का ही प्रामाण्य सर्वोपरि माना जाता है । 'साथ ही साथ वे ( ब्राह्मण ग्रन्थ) मन्त्रो का और विधि- विधान का साकेतिक रहस्य भी उद्घाटित करते हैं । इस प्रकार के विवरण के समर्थन में दिये हुए कुछ कथानक या उपाख्यानों को तथा कही कही गंभीर विचारो को छोड, ये ग्रन्थ सामान्यतः साहित्यिक दृष्टि से किसी तरह भी रोचक नही हैं । यज्ञीय विधि को समझाने के लिये ये बीच- बीच मे शब्दार्थ- संबन्धी, भाषा- संबन्धी अथवा शब्द व्युत्पत्ति संबन्धी अनेक ऊहापोह करते रहते हैं । विचार- विमर्श द्वारा ये जगत् सृष्टि तथा ईश्वरवाद के अपने सिद्धान्तो को स्थापित करने की चेष्टा भी करते हैं । जो भी हो, वस्तुतः ये निःसार एवं पण्डिताऊ विवेचनमात्र हैं । इनमें पुरोहित वर्ग की जो धार्मिक धारणाएँ प्रतिबिम्बित हैं, वे अधिकांश कल्पित तथा तर्कहीन प्रतीत होती है । कहीं कही तो इनकी रूपकमयी कल्पनाएँ ऐसी बुद्धिशून्य और असंगत सी लगती है, जैसी संसार में और कहीं ढूढने पर मिल नही सकतीं । तथापि विश्व के किसी भी साहित्य में उपलब्ध धार्मिक विधियो पर रचित ग्रन्थो में से सर्वप्राचीन होने के नाते ये ग्रन्थ विश्व - धर्म के इतिहास के अध्येता के लिये अत्यन्त

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१०२२ वेवार्थपारिजातः तात्पर्यमुत्तानाथं वाज्ञात्वैब तथा जल्पनात् । जेमिति व्यास -उपवर्ष - शबरस्वामि-भट्टपाद - शङ्कराचार्यादिभिर्ब्राह्मणानाम- पौरुषेयत्वस्य वेदत्वस्य चाभ्युपगमाच्च । अपि च, सर्वेऽपि वैदिका महर्षयो विद्वास एव, ब्राह्मणाना विधिप्रधानानामेव प्राधान्यम्, तत्रैव चोपनिषदामपि सन्निवेश मन्वते, यासा लोकोत्तर विचारगाम्भीर्य विश्वविश्रुतम् । एतादृशाना ब्राह्मणग्ग्रन्थाना सम्बन्धे तादृश. प्रलापः प्रमाद एव । 'नह्येष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति' इति न्यायमनुसरति मेकडानलमहाशयः । 'संहिता पद्यरचिता स्तुतिपरा, ब्राह्मणग्रन्थश्च विवरणात्मको गद्यमय:' (पृ० २७ ) इत्यपि निर्मूलम्, ब्राह्मणगतविधिभागस्य संहितास्वदर्शनात् । मन्त्रसहितास्वपि यजुषां गद्यन्द्योभयात्मकत्वात् । अत एव 'स्वस्वसंहिता- विहितकर्मकाण्डानां विध्यनुसारेण ब्राह्मणाना प्रतिपाद्यविषया. पृथक्- पृथक् मन्ति' ( १० २७ ) इत्यपि ब्राह्मण सहितयो- रज्ञानमूलकमेव संहितासु कर्मविधानाभावात् । ब्राह्मणष्वेव विधिदर्शनाच्च । ऋग्वेदसम्बद्धब्राह्मणानि होतृकर्तव्यप्रतिपादन एव पर्यवम्यन्ति होता च प्रत्येककर्मापेक्षितशास्त्रमुल्लिख्य तदुपयुक्तान् मन्त्रानुद्धृत्य विनियोगात् निर्णयनि, सामब्राह्मणानि औद्गात्रप्रतिपादकानि' (पृ० २८ ) इति, तदेतत्सर्व- मज्ञजनप्रतारणमेव, ऋग्वेदीयैतरेय ब्राह्मणं शतपथादिवदेव कर्मविधानोपलम्भात् । शास्त्रोल्लेखस्तत्र नावश्य:, किन्तु मन्त्रसमूहा एवं शंसनसाधनत्वात् शस्त्रपदव्यपदेश्या भवन्ति । यस्य शस्त्रमपि शास्त्र प्रतीयते, शस्त्रपदार्थमपि यो न जानाति स ब्राह्मणग्रन्थसम्बन्धे किं ज्ञास्यतीति स्पष्टमेव । उपादेय है' ( १० २७ ) यह पूरा कथन भी बक्ता के अज्ञान को उजागर करता है । ' अंगूर खट्टे है' इस कहावत के अनुसार महान् भूत परमेश्वर के निःश्वासभूत ब्राह्मणों के तात्पर्य को और उनके उदात्त अर्थ को न समझ करके ही यह सब कहा गया है । जैमिनि, व्यास, उपवर्ष, शबरस्वामी, भट्टपाद, शंकराचार्य प्रभृति ने ब्राह्मणो की अपौरुषेयता और वेदत्व को स्वीकार किया है । दूसरी बात, सभी वैदिक महर्षिगण और विद्वान् ब्राह्मणों में वर्णित विधि- विधानों को ही प्रधानता देते है और उन्ही मे उपनिषदो का संनिवेश मानते है, जिनका कि लोकोत्तर विचारगाम्भीर्य विश्वविश्रुत है । इस तरह के ब्राह्मण ग्रन्थो के विषय मे इस तरह का प्रलाप सर्वथा प्रमाद कोटि में ही गिना जायगा । ' यह स्थाणु का अपराध नही है कि उन्को अन्धा नहीं देख पाता' इसी न्याय का अनुसरण करते से मैकडानल महाशय मालूम पड़ते है । 'सहिताएँ पद्य में रचित है और उनका अर्थ स्तुतिपरक है । ब्राह्मण ग्रन्थ विवरणात्मक है और गद्य मे रचित' ( पृ ० २७ ) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि ब्राह्मणगत विविभाग के दर्शन संहिताओ मे नही होते । मन्त्र संहिताओ मे भी अनेक यजुर्वेद संहिताएँ गद्य और पद्य उभयात्मक है । इसी लिये - ' प्रत्येक वेद के अपने अपने ब्राह्मण भिन्न है और उनका प्रतिपाद्य विषय भी अपनी अपनी संहिता में विहित कर्मकाण्ड की विभिन्न विधियो के अनुसार पृथक् पृथक्' (पृ ० २७ ) यह कथन भी ब्राह्मण और सहिताओं के स्वरूप को ठीक से न समझ पाने के कारण है । सहिताओ में कही भी कर्मकाण्ड का विधान नहीं मिलता, यह केवल ब्राह्मण ग्रन्थो में ही मिलता है । 'ऋग्वेद से संबद्ध ब्राह्मण-ग्रन्थ प्रयोगो का विवरण करते हुए प्राय: 'होता' नामक ऋत्विक के ही कर्तव्यो को बतलाने में सीमित हैं । होता वह ऋत्विक् है, जो कि प्रत्येक कर्म के लिये शास्त्र का उल्लेख कर उसमे उपयुक्त मन्त्रो को सूक्तो से उद्धृत कर विनियोग का निर्णय करता है । सामवेद के ब्राह्मण-ग्रन्थ केवल उद्गाताओं के कर्तव्यो का ही प्रतिपादन करते है ' ( पृ ० २८ ) यह सारा कथन अबोध व्यक्तियो के ठगने के लिये है । ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण में शतपथ ब्राह्मण के समान ही सारे कर्मविधान उपलब्ध होते है । इसके लिये शास्त्र का उल्लेख आवश्यक नही है, किन्तु मन्त्रसमूह को ही शंसन के साधन के रूप में 'शस्त्र' पद से अभिहित - किया जाता है । जिस व्यक्ति को शस्त्र बोर शास्त्र एक ही प्रतीत होता है, जो 'शस्त्र' पद के अर्थ को भी ठीक से नही जानता, वह ब्राह्मण -ग्रन्थो के संवन्ध में क्या जानेगा?

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वेदार्थपारिजातः १०२३ यदपि- 'ब्राह्मणयुग एव वर्णव्यवस्था निश्चितं रूपं धारितवती । यत्र जातीयताया जटिलजावं निर्मितम्, पौरोहित्यपद्धत्या यद्यपि वैदिकयुग एवं पर्याप्तं प्रतिष्ठोपलब्धा, तथापि ब्राह्मणयुगे तया सा सत्ताधिगता या अद्य यावत् स्थिरास्ते । विश्वस्मिन् कोऽपि मानवसमाजः पौरोहित्येनैवं न प्रभावितो यथा हिन्दूसमाजः । यतो हिन्दुजाती धार्मिकविद्याध्ययने वशपारम्पर्येण पुरोहितानामेवैकाधिकारः । अन्यत्र तु समाजस्योपरि योद्धृणां कुलीनवर्गस्य हस्तगता सत्ता । भारते पुरोहिताना वर्चस्वकारणमिदमासीद् यद् वैदिकयुगस्य प्रारम्भ एव दिग्विजयसम्बन्धिशौर्यमयं जीवनं समाप्तमासीत् । तत्पश्चाद् भारतस्य समरेखभूमौ विजेतॄणां जीवन शारीरकश्रमहीनत्वादकर्मण्यमिव समपद्यत । तादृशपरिवर्तितपरिस्थितो यज्ञविधिरहस्यज्ञाना शिष्टजनानां बुद्धिबलप्राधान्यस्थापनायावसरो लब्धः' ( ),, २८ पृष्ठे इति तदेतत्सर्वं पाश्चात्त्यकौटिल्यमेव निष्प्रमाणत्वात् । पौरोहित्ययुगस्याप्रामाणिकत्वात् । पौरोहित्यः सत्तापि तथाविधैव मन्त्रब्राह्मणयोरविशेषेण दिग्विजयसाहात्म्यस्य प्रख्यातत्वात् । राजसूयाश्वमेधयोर्वेदविहितकर्म- प्रमुखयोविशेषता दिग्विजयापेक्षणात् । रामायण महाभारतयोस्तत्प्रसङ्गेनानेकयुद्धवर्णनात् । मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च राजसूयाश्वमेधप्रसङ्गे विश्वजितो वर्णनाच्च । - ' ', यत्तु समयमुपलभ्य ब्राह्मणग्रन्थानामपि धार्मिकसाहित्येषु परिगणना श्रुतिसज्ञा च सञ्जाता इति तदपि तुच्छम् हेतुशून्यायाः प्रतिज्ञाया निरर्थकत्वात् 4 मन्त्रेष्वपि ब्राह्मणानां वर्णनेनानादित्वसिद्धेः । धार्मिकग्रन्थेषु ब्राह्मणानां परिगणना जातेति कथनं तु साहसमेव, धर्मस्वरूपतद्विधानादीना ब्राह्मणेष्वेव सत्त्वात् । ब्राह्मणमन्तरा तदवगमासम्भवाच्च । मन्त्राणामपि ब्राह्मणविधेयत्वावगमाच्च । यदपि च-' श्रवणसाक्षात्कारेण श्रुतित्वम्, महर्षिभिः स्वयमाविष्कृतग्रन्थ राशेरेव वा श्रुतित्वम्, ' तत्कक्षायामेव पश्चाद्भाविनिर्मितिमतां ब्राह्मणानामपि सन्निवेशः. वस्तुतस्तु ब्राह्मणग्रन्था आध्यात्मिका एव 'भारतीय समाज के इतिहास मे ब्राह्मण युग बड़े महत्व का है । इसी युग में वर्णव्यवस्था ने निश्चित रूप धारण किया, जिसके अन्तर्गत आज जातीयता का सबसे बड़ा जटिल जाल बन गया है । पौरोहित्य -पद्धति ने यद्यपि वैदिक युग में ही पर्याप्त प्रतिष्ठा पा ली थी, तथापि कहना होगा कि ब्राह्मण युग मे उसे वह सत्ता प्राप्त हुई, जो आज तक स्थिर है । विश्व में किसी अन्य देश का मानव समाज पौरोहित्य से इतना प्रभावित नही, जितना हिन्दुओ का है । कारण, हिन्दू जाति मे धार्मिक विद्या के अध्ययन पर वंश-परम्परा से केवल पुरोहितो का ही एकाधिकार रहा है । इसके विपरीत, अन्य देशों में प्राथमिक समाज पर सत्ता योद्धाओ तथा कुलीन वर्ग के हाथ बनी रही । भारतवर्ष में पुरोहितो के वर्चस्व का कारण यह रहा कि वैदिक युग के प्रारंभ में ही दिग्विजय का शोर्यमय जीवन समाप्त हो गया था और तत्पश्चात् भारत की समरेख भूमि पर विजेताओं का जीवन शारीरिक श्रम से हीन एवं अकर्मण्यता का बन गया था । ऐसी परिवर्तित परिस्थितियों में यज्ञ- यागादि विधियों के रहस्य को जानने वाले शिष्ट जनों को शारीरिक बल के ऊपर बुद्धि बल का प्राधान्य स्थापित करने का अवकाश प्राप्त हुआ' ( पृ० ३८) यह सारा कथन पाश्चात्यों की कुटिलता का सूचक और प्रमाण शून्य है । पौरोहित्य युग की बात सर्वथा अप्रामाणिक है । पुरोहितों की सत्ता की बात भी इसी तरह से सर्वथा कल्पित है । मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही भागो में समान रूप से दिग्विजय का माहात्म्य वर्णित है । राजसूय और अश्वमेघ ये दो मुख्य याग वेदो में प्रतिपादित है । अश्वमेध और राजसूय यज्ञ को पूरा करने के प्रसंग मे हुए अनेक युद्धों का वर्णन रामायण और महाभारत में मिलता है । मन्त्र और ब्राह्मण ग्रन्थों में राजसूय और अश्वमेध के प्रसंग में विश्वविजय की बात कही गई है । ' समय पाकर ब्राह्मण ग्रन्थ भी धार्मिक साहित्य में गिने जाने लगे और आगे चलकर इनकी गणना भी ' श्रुति' के अन्तर्गत हो गई' ( १० २८) । यह कहना भी गलत है, क्योंकि बिना कारण बताये प्रतिज्ञा मात्र कर लेने से किसी वस्तु की सिद्धि नहीं होती । मन्त्र भाग में भी ब्राह्मणों का उल्लेख मिलता है, अतः इनको अनादि ही मानना पड़ेगा । धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण ग्रन्थों की गणना होने लगी, यह कहना दुःसाहस मात्र है, क्योकि धर्म का स्वरूप और उसका विधान प्रधानतया ब्राह्मणों में ही विद्यमान है । बिना ब्राह्मण-ग्रन्थो के इनको अवगति नही हो सकती । मन्त्रों का विनियोग भी ब्राह्मण-ग्रन्थों के ही अधीन है ।

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वार्थपारिजातः १०२४ । ब्राह्मणानां ( पृ० २८-२९ ) इति, तदप्यज्ञानमूलकमेव, तेन मन्त्राणामपि कृतकत्वाभ्युपगमेनाविर्भूतत्वानभ्युपगमात्के? वस्तुतस्तु ब्राह्मणग्रन्था कृतकत्वे कथं श्रुतिप्रवेशः स्यात्? यदि ब्राह्मणग्रन्था अध्यात्मग्रन्थास्तर्हि धर्मग्रन्थाः । यथा कस्यचित कुरानवाय-,एव धर्मग्रन्थाः धर्मविधीना तत्रैव सत्त्वात् । पाश्चात्त्यास्तु सर्वथापि तदनभिज्ञा एव साहसमेव । विलाद्यनभिज्ञस्य इस्लामादिधनपदेष्टृत्वमनभिज्ञतैव, तथैव मैकडानलप्रभृतीना वैदिकधर्मोपदेष्टृत्वमपिन तु तेषामपि कृतकत्व श्रूयत एव परं न केनचित्क्रियत इति हि श्रुतिशब्दार्थः । आरण्यकान्युपनिषदश्च वाह्मणान्येव पश्चात्कृतत्वं वा । वेदान्तादिदर्शनानि तू पौरुषेयाण्येव । तेषा त्रवलत्वात् । यदपि-' श्रुतेनैरपेक्ष्येण प्रामाण्यम्, धार्मिकसामाजिक रूढिप्रतिपादक परवतिग्रन्थापेक्षया स्मारकत्वात्' (पृ० २ ९ ) इति,: परवर्तिन्यो रचना स्मृतय उच्यन्ते । या रूढयो महर्षीणा पारम्पर्येण प्राप्तास्तासा समेषामपि प्रमाणाना स्वार्था- तदपि तादृगेव, कृतकाना पौरुषेयत्वेन निरपेक्षत्वासम्भवान् । प्रामाण्यवतस्त्ववादिना। वेदने प्रामाणान्तरनंरपेक्ष्याम्युपगमात् । वेदानां त्वपौरुषेयत्वेनैव निरपेक्षत्वसम्भवान् गोपथब्रह्मणेन ब्राह्मणादीना - '.9:'... यत्तु एवमिमे सर्वे वेदातिरिक्तत्वोक्त्या ब्राह्मणानामवेद दमनुनीयते वेदा निर्मिताः' इनि,साह्मणाःम ' अस्यसोपनिषत्कामहतो भूतस्यइतिनिश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदो निःश्वसितानि' (बृ० उ० २| ४| १० ) इतिहास: पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुत्र्याख्यानानि । अस्यैवतानिएवेतिहासादिरूपेणोच्यन्ते, निःश्वसित- 1 इति श्रुत्योपनिषदादीनां वेदकुक्षिप्रविष्टत्वज्ञापनात् अत्र ऋग्वेदादिविशेषा कहे कि प्राचीन महर्षियों को स्वयं आविभूत ' ', श्रुति उसे कहते हैं जिनका श्रवण साक्षात् हुआ हो । अथवा हमका योसमावेण है, जो वस्तुतः आध्यात्मिक ग्रन्थ है ग्रन्थराशि 'श्रुति ' है । इसी कक्षा में ब्राह्मण ग्रन्थो के युग की पिछलीभी ऋषियोंकृतियोंकी कृति मानते है, ऐसी अवस्था में उनका आविर्भाव ( ),? पृ० २८-२९ यह कथन भी अज्ञानमूलक है आप तो मन्त्रो को आविर्भूत श्रुति में समावेश कैसे होगा यदि ब्राह्मण ग्रन्थ?,, ग्रन्थ हो धार्मिक ग्रन्थ माने जा सकते आप कैसे मानेंगे फिर ब्राह्मण भी किसी के द्वारा रचित है तो उनका हैं क्योकि धार्मिक,?, आध्यात्मिक ग्रन्थ हैं तो वे धर्म ग्रन्थ कैसे होगे वास्तव मे तो ब्राह्मण से सर्वथा अनभिज्ञ है । जैसे कोई कुरान बाइबिल आदि विधियों का प्रतिपादन प्रधानतः इन्ही मे किया गया है । पाश्चात्य इस विषय गलती मानी जायगी, उसी तरह से मेकडानल प्रभृति से अनभिज्ञ व्यक्ति इस्लाम, ईसाई आदि धर्मो का उपदेश करे, तो यह उसकीमें 'श्रुति' पद का अर्थ यह है कि यह केवल सुना जाता है,. का वैदिक धर्म का उपदेश देना भी केवल दु साहस ही माना जायगा । वास्तव ही अंग हैं । इनको भी हम न तो किसी की रचना ही लेकिन इसकी कोई रचना नही करता । आरण्यक और उपनिषद् ब्राह्मण भाग वेदान्तके प्रभूति दर्शनो को तो हम पौरुषेय ही मानते है । का प्रतिपादन करने वाले परवर्ती ग्रन्थो मानते हैं और न यही मानते है कि इनकी रचना परवर्ती काल मे हुई थी । की ' ' श्रुति को निरपेक्ष प्रमाण माना जाता है । धार्मिक एवं सामाजिक रूढियोंरूढ़ि का स्मरण कराती है, जो प्राचीन महर्षियो ' ',, अपेक्षा यह प्रबल प्रमाण है । परवर्ती रचनाएँ स्मृति कहलाती है । कारणको ही ये प्रदर्शितउस करता है क्योंकि पौरुषेय रचना का कभी भी की परम्परा से प्राप्त है' ( पृ० २ ९ ) यह कथन भी लेखक के अज्ञान सभी विद्वानो के मत से प्रमाण अपने अर्थ को प्रकट करने मे सदा, निरपेक्षही किसीप्रामाण्यदूसरे प्रमाणनही कीहो सकताअपेक्षा । केप्रामाण्यबिना स्वतन्त्रका स्वतस्त्वरूप सेमाननेप्रवृत्तवालेहोता है । वेद अपौरुषेय है इसलिये इनका प्रामाण्य भी प्रमाणान्तर की अपेक्षा से रहित है । ' इस गोपथ ब्राह्मण के वचन के अनुसार ' इस तरह से ब्राह्मणग्रन्थ और उपनिषदों के साथ सभी वेदों की रचना हुई नही पाये जाते थे, ऐसा अनुमान से प्रतीत होता है' यह 6440,,,, ब्राह्मण और उपनिषदों का अलग निर्देश होने से ये वेद के अन्तर्गत उस समयनिःश्वासभूत हैं इतिहास पुराण विद्या उपनिषद् कथन भी गलत है । 'इस महान् भूत परमात्मा के ऋग्वेद, यजुर्वेद प्रभृति है' इस बृहदारण्यक श्रुति के अनुसार उपनिषद् भी वेद के ,,, श्लोक सूत्र अनुव्याख्यान ये सब भी उसी परमात्मा के निःश्वास से प्रादुर्भूत आगे इतिहास आदि के विशेष नाम से कहा गया है पेटे में ही समाविष्ट है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है । यहाँ पर ऋग्वेद आदि को ही

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वेदार्थपारिजात १०२५ त्वेनाकृत्रिमत्वेनापौरुपेयत्वाविशेषात् । तथाहि--इतिहान इत्युर्वशीपुरूरवसोः संवादरूपः, 'उर्वशी हाप्सरा' इत्यादि ब्राह्मणमेवेत्यादिना सन्दर्भेण शङ्कराचार्यैस्तथैव व्याख्यातत्वात् । यथा विद्यमानस्यैव निःश्वासस्याभिव्यक्तिर्भवति, तथैव नियतरचनावतो विद्यमानम्यैव वेदस्याभिव्यक्तिर्भवति, निश्वासस्येव पुरुषबुद्धिप्रयत्नानपेक्षत्वात् । शब्दोपात्तानु- मितयोरर्थयो' शब्दोपात्तोऽय ज्यादानिति न्यायेन गोपथश्रुत्यनुनितोऽर्थः प्रत्यक्षया बृहदारण्यकश्रुत्या तत्समानार्थकया गोपथश्रुत्या च बाध्यते । यदपि - 'सूत्राणां भाषा परुपाsपरिमार्जिता च, प्रतिपादनशैली दुरूहा नीरसा च' ( पृ ० ३१ ) इति, तदपि यत्किञ्चित् सूत्राणामर्थाज्ञानमूलकत्वात् ॥ सूत्राप्याश्रित्यैव व्यासभाष्य- वात्स्यायनभाष्य-पातञ्जलभाष्य- शाबरभाष्य- शाङ्करभाष्यादिप्रवृत्तेः । यत्तु - ईसातः पूर्वमण्डपणत्या अर्वाक्तनकालिकानि सूत्राणि' ( पृ० ३० ) इति, , -'तदपि यत्किञ्चिन् बादरायणसूत्राणां पञ्चमहस्रवपदपि प्राचीनत्वात् । यदपि विश्वस्मिन् जगत्यन्यमानव- जात्यपेक्षया हिन्दुना जीवन वैदिकयुगेऽपि विभित्रधार्मिकविधि नहाजालैरावृतम्, तेषा दैनिकी चर्या, गृह्यविधिव्यवहार- सम्बन्धीनि सूत्राणि प्राचीनभारतीयसामाजिक स्थित्यध्ययनेषु महत्त्वपूर्णानि तदीयरूढिपरम्परागताना सर्वविषयाणां G सुसंगृहीतकोषस्थानीय सूत्रसाहित्यम्' इत्यादिकम्, तदपि सूत्राभिप्रायाज्ञानविजृम्भितमेव, श्रीत-गृह्य धर्मादिसूत्राणा- मनादिवैदिक विधिमूलकत्वेनापास्तसमस्त पुंदोषशङ्कापङ्कतयाऽनाशङ्कनीयत्वात् । सूत्राणामध्ययनेन हिन्दूनां सामाजिक- स्थितिरपि तज्जानामेव नम्भवति । बाह्यानां तु तदर्थज्ञान दुरूहमेव । तृतीयाध्याये ऋग्वेदसम्बन्धे यदुक्तं तदप्यनधिकार- चेष्टाविलसितमेव । क्योकि निःश्वास के समान ये भी अकृत्रिम अत एव अपौरुषेय है । जैसे कि 'उर्वशी अप्सरा थी' इस तरह का, उर्वशी और पुरूरवा के संवाद के रूप में वर्णित इतिहास ब्राह्मण ही है, इस तरह का सन्दर्भ देते हुए शंकराचार्य ने उसकी इसी तरह की व्याख्या की है । जैसे पहले से विद्यमान निःश्वास की अभिव्यक्ति होती है, उसी तरह से नियत रचना वाले पहले से विद्यमान वेद की ही अभिव्यक्ति होती है । जैसे श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया प्राणियों में स्वाभाविक रूप से चलती रहती है, उसी तरह से वेद की अभिव्यक्ति भी पुरुष के बुद्धि, प्रयत्न आदि की अपेक्षा के बिना हो स्वाभाविक रूप से कल्पादि में होती है । साक्षात् शब्द से उपात्त और अनुमान के द्वारा उपात्त अर्थों का जहा परस्पर विरोध उपस्थित होता है, वहीं पर शब्दोपात्त अर्थ प्रबल होता है, इस न्याय के अनुसार गोपथ श्रुति के द्वारा अनुमित अर्थ प्रत्यक्ष बृहदारण्यक श्रुति और उसके समान अर्थ वाली अन्य गोपथश्रुति से बाधित हो जायगा । 'सूत्रो की भाषा अत्यन्त परुष एवं अपरिमार्जित है, उनकी प्रतिपादन शैली दुरूह एव नीरस है' ( पृ० ३१ ) यह कथन भी कुछ दमवाला नही है, क्योकि इन लोगो के पल्ले सूत्रों का अर्थ किसी भी तरह से नही पड़ता । व्यासभाष्य, वात्स्यायनभाष्य, पातंजलभाष्य, शाबरभाष्य, शाकरभाष्य प्रभूति सभी भाष्य ग्रन्थो की रचना सूत्रों पर ही हुई है । यह कहना कि - 'सूत्र साहित्य के विकास का काल ईसा पूर्व ८०० से लगाकर २०० तक रहा हो' ( पृ० ३० ) इस लिये गलत है कि बादरायण के वेदान्तसूत्र आज से पाँच हजार वर्ष पहले निर्मित हो चुके थे । यह भी कहा गया है कि - 'विश्व की किसी भी अन्य मानव जाति की अपेक्षा हिन्दु का जीवन वैदिक युग मे भी विभिन्न धार्मिक विधियो के महाजाल से कही अधिक घिरा हुआ था । अतः उनकी दैनिक चर्या, उनकी गृह्यविधि और व्यवहार से सम्बन्ध रखने वाले सूत्र ही प्राचीन भारत की सामाजिक स्थिति के अध्ययन में सब से अधिक महत्त्वपूर्ण आधार कहे जा सकते हैं । रूढि अथवा परम्परा के अन्तर्गत आने वाले समस्त विपय का सुसंगृहीत कोष यदि कही है, तो वह यही सूत्र साहित्य है' (पृ० ३२ ) । इससे भी यही प्रतीत होता है कि वक्ता को सूत्रो का अभिप्राय ठीक से समझ में नही आया है, क्योकि श्रोत, गृह्य और धर्मसूत्र अनादि वैदिक विधि के प्रतिपादक है, अतः इनमें पुरुष कृत दोष की शंका की आशंका किसी प्रकार से भी नही उठाई जा सकती । सूत्रों के अध्ययन से हिन्दुओं की सामाजिक स्थिति का परिज्ञान भी तज्ज्ञ लोगों को ही हो सकता है । बाहरी लोगो के लिये इसको समझ पाना बडा कठिन है । मैकडानल ने अपने ग्रन्थ के तीसरे अध्याय में जो कुछ कहा है, वह भी उसकी इस अनधिकार चेष्टा का ही प्रमाण है । १२९

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वेदार्थपारिजात. १०२६ समागताः । तत एव मार्गादागामि- यदुक्तम्- ' पश्चिमोत्तरप्रदेशात् केचिद्वीरा आर्या हिन्दुस्थानविजेतारः स्वभाषासंस्कृतिभिः समस्तदेशस्योपरि कालेऽप्यनेकेप्रभुत्व स्थापितम्आक्रामका। तदिदभारतभूमिमाक्रान्तवन्तःतद्युगं यदा सिन्धुनद्या। उभयपार्श्वेष्वार्यजात्याएतेषा प्राचीनतमरचनाभिःस्वाधिकाराःसंग्रहस्य कारणसस्थापितान सामवेदयजुर्वेदयोरिवआसन् । आर्याणांताः प्राचीनारचना ऋग्वेदाख्यसूक्तसञ्चयरूपेण पारम्पर्यात् प्राप्ताः । सूक्ताना युगे परिवर्तनाद्विनाशाच्च रक्षण- व्यावहारिकम्, किन्तु वैज्ञानिक मैतिहासिकं च । पुरात्नस्यास्य साहित्यस्यास्मिन्सूक्तानि सन्ति । वालखिल्याख्यानामेकादश-, मभिलक्ष्यैव तत्सङ्कलनम् । अद्य शाकली संहितोपलभ्यते यत्र १०१७ सङ्कलनम् । गणनायाम् ऋग्वेदीयसूक्तानां सूक्तानामपि संयोजने १०२८ सूक्तसख्या सम्पद्यते । दशभिर्मण्डलेस्तेषा तावानेवाकारो यावान् महाकविहोमरस्य कवितानामुपलब्धाणानामाकारः । विरचितानि । मण्डलानां रूपाणि समानि न सन्ति. ( २- ७ ) सर्वप्रथम तु विभिन्नैर्ऋषिभिस्तद्गोत्रजैर्वाप्राप्तानि । तत्कुलेष्वेव तानि तदिदमन्तःसाक्ष्येन प्रमीयते । निःसंशयं दीर्घकालात् पृथक् पृथग् ऋषिकुलेभ्यस्तानिभिन्नैव । प्रथममष्टम दशम च मण्डल- रचितानिमेकेनैवार्षिकुलेनतत्तत्कुलग्रन्थग्रथितसूक्तानारचितानि प्रतीयन्ते । अत्रापिरचना एकरूपामिश्रणानिइतरग्रन्थरचनाभ्योसन्ति । तेषा वर्गीकरण रचयितृनाधृत्यैव जातम् । नवम- सम्बद्धा । एकदेवतासम्बद्धत्वात् तेषामेकत्र मण्डलसूक्तानां रचना न निर्मातृभिः सम्बद्धा, किन्तु सोमदेवतया वर्गाः सन्ति, परन्तु सोमदेवतां सम्बोध्य सङ्कलनम् । छन्दःसाम्यानुरोधेनाप्यस्य वर्गीकरणम् । कुलवर्गेष्वप्यनेकेमूलाधारविचारे विज्ञायते । द्वितीयमण्डलमारभ्या प्रवृत्तत्वेनैकत्र सकलनं जातम् । ऋग्वेदीयमण्डलानां परस्परसम्बन्धे सार्धं सूक्तसख्यानां क्रमेण विवर्ध- सप्तमं सूक्तसख्योत्तरोत्तर वर्धमानोपलभ्यते । एतेषां मण्डलानामाभ्यन्तररचनया के विजेता है । ये भी पश्चिमोत्तर घाटियो से - ' आक्रमण होते रहे । इस विजेता जाति वहीं पर कहा गया है कि ये आदिवीर पश्चिम से आये हुए हिन्दुस्तान की प्राचीनतम ही देश में घुसे हैं । यह वही मार्ग था, जिसके द्वारा आगामी युगो मे सतत कर लिया । यह उस युग की बात है, जब कि सिन्ध नदी प्रदेश पर 1 आर्य जाति ने अपना अधिकार रचनाओं ने अपनी भाषा और संस्कृति के साथ समस्त देश पर प्रभुत्व स्थापित जमा रखा था । " के उभय तट की सीमाओं पर पूर्वी काबुल और पंजाब के नाम से प्रसिद्ध हुई । ये सब सूक्त एक ग्रन्थ में संकलित क्यों कर आर्यों की यह प्राचीन रचना हमें ऋग्वेद नामक सूक्त - संचय के रूप मे परम्परा से प्राप्त एवं ऐतिहासिक है । वह कारण है, इस प्राचीन हुए, इसका कारण सामवेद और यजुर्वेद की भाँति व्यावहारिक नहीं, परन्तु वैज्ञानिकपरिवर्तन एवं विनाश से बचा रहे । आज के युग साहित्य के संपादकों का निस्सन्देह लक्ष्य रहा कि अपना साहित्य इस पुरातन युग में । यदि इस संख्या में बालखिल्य नामक ग्यारह, मे ऋग्वेद की केवल शाकल शाखा की संहिता ही उपलब्ध है जिसमे १०१७ सूक्त है १०२८ होती है । इन सूक्तों का संकलन परिशिष्ट सूक्त, जो अष्टम मंडल के मध्य प्रसिद्ध है, जोड दिये जाय तो ऋग्वेद की सूक्त संख्या ही है, जितना कि महाकवि होमर की दस मण्डलों में किया गया है । यह गिना गया है कि ऋग्वेद के सूक्तों का आकार ठीक उतना कविताओं के उपलब्ध अंश का है ॥ सर्वप्रथम तो ये विभिन्न दसों मण्डलों का स्वरूप एक सा नही, उनमे से ६ मंडल, संख्या २ से ७ विविध रूप वाले है ये दीर्घकाल से पृथक् पृथक् ऋषियों के द्वारा या उनके गोत्रजो द्वारा रचित हैं । यह बात अन्तःसाक्ष्य से प्रमाणित है । निःसन्देह सूक्तों की रचना एकरूप है ऋषिकुलो को प्राप्त हुए और उन्ही कुलो मे इनकी रचना भी ग्रथित हुई । इन कुल-ग्रन्थोंऋषिकुलमें प्रथितके द्वारा रचित प्रतीत नही होते । और वह इतर ग्रन्थों की रचना से भिन्न है । पहिला, आठवीं ओर दसवां मण्डल एक ही सूक्तो की रचना किसी भी तरह अपने निर्माताओं इनमें कही कही मिश्रण है । इनका वर्गीकरण रचयिता के आधार है । नवम मंडल के ही सोम देवता को संबोधित हैं । इस मंडल से संबन्ध नहीं रखती । उनका संकलन एक जगह इस कारण से हुआ कि ये सभी सूक्क एक एक ही देवता को संबोधित सूक्तों को -, का वर्गीकरण छन्दःसाम्य पर आधारित है । कुल ग्रन्थों में भी अनेक वर्ग हैं परन्तु यह वर्गीकरण के मूलाधार पर विचार एकत्र संकलन करने के अभिप्राय से किया गया है । ॠग्वेद के समस्त मंडलो की रचना में परस्परसंख्यासबन्धउत्तरोत्तर वर्धमान पाई जाती करने से यह विदित होता है कि २ से ७ वें मंडल तक संकलन का क्रम एक जैसा है, जिसमें सूक्त

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संदार्थपारिजात १०२७ मानताया विचाराद् ऋग्वेदीय मौलिक रूप षण्मण्डलात्मकमेवासीदिति सम्भाव्यते । पश्चाद्यथासमयमवशिष्ट- मण्डलानि योजितानि । एतदपि सम्भाव्यते यत्प्रथममण्डलस्य द्वितीयभागान्तर्गता अल्पाल्पा नव सग्रहा एकेनंव निर्मितत्वात् पश्चात् सम्पूर्णग्रन्थस्य पूर्वत्र योजिताः । अष्टममण्डलस्य सूक्तेषु सामान्यतया पारस्परिकमैक्य न तथा स्पष्ट यथा सम्पूणग्रन्थस्योपलभ्यते, शब्दानामुक्तीना च पुनरावृत्तिदर्शनात् । अन एव तदीया रचना न सम्पूर्णग्रन्था रूपा । एकेनैव कविकुलेन कृता रचना- त्राधिक्येनोपलभ्यते । तस्य शैली स्वीयैव । सप्तममण्डलापेअना सूक्तान्यल्पान्येव । तेनाष्टम मण्डल कुल प्रणीत- मण्डलाना वर्गे न विद्यते । प्रथममण्डलम्य प्रथमभागे १००५० सूक्तेऽप्टमण्डलेन साम्यमुपलभ्यते । तत्रार्धाधिकानि सूक्तानि कण्व- कुलेन रचितानि कथ्यन्ते । तत्र तेषा प्रिय त्रिष्टुप् छन्दो लभ्यते यदप्टममण्डले दृश्यते । नवमसूक्तसम्वन्धे निश्चप्रच वक्तु शक्यते यदप्टभमण्डलाना सुसंघटनानन्तरमेव तन्निर्माण जातम । अष्टमण्डलानां सङ्कलनस्य तत्साक्षात् फलमेव, नोमपवमानरचयिता तस्यैव कुलस्य ऋषि, यत्रत्यैः २-६ मण्डलानि रचितानि । नवममण्डलस्य मुक्तेषु तानि ध्रुवपदान्युपलभ्यन्ते यत्समस्तमण्डलाना वैशेष्यम् । पवमानसूक्तेषु प्रथमाष्टम- मण्डलाभ्यामपि साम्य दृश्यते । विभिन्नषिकुलप्रणीताना सङ्कलनसमये समस्तपवमानसूक्तानि संगृहोतानि । सोम- सूक्तानामवेस्तासूक्तैरनेकाशेषु तौत्यमेव । तत्र कश्चन तादृशो विधिरस्ति यस्माद्गमो हिन्द - ईरानीययुगे संवृत्तः । तदेव च वैदिकपाठकानामारम्भकालादद्य यावदागच्छति । नवममण्डलसूक्ताना कालसम्वन्धिभेदो लुप्न इवास्ते ॥ अधुनातनेना- म्वेषणेनाद्यावध्यम्य संग्रहस्य निर्णये साफल्यं नाधिगतम् |' ( पृ ० ३४-३६ ) इति, तदपि प्रमाणशून्यसम्भावनामात्रम्, है । इन मंडलो की एकरूपता एवं आभ्यन्तर रचना के साथ यदि सूक्त संख्या की क्रमश. वर्धमानता पर विचार करें, तो यह संभावित है कि ऋग्वेद का मौलिक रूप इन छ. मण्डलो का ही रहा हो, जिसमे समय समय पर शेष मंडल जोड दिये गये है । यह भी संभव प्रतीत होता है कि प्रथम मंडल के द्विताय भाग के अन्तर्गत नो छोटे-छोटे संग्रह एक ही रचयिता के द्वारा निर्मित होने के कारण बाद में कुल-ग्रन्थो में पूर्वत्र जोड दिये गये हों । अष्टम मण्डल के सूक्तो मे सामान्यतः पारस्परिक एकता उतनी स्पष्ट नही है, जितनी कुल-ग्रन्थो मे मिलती है । कारण, इनमे कई शब्दों और उक्तियों को कई जगह दुहराया गया है । अत एव अष्टम मडल की रचना कुल-ग्रन्थो के सुसदृश नही कही जा सकती । इस मण्डल में एक ही कवि कुल के द्वारा अधिकाश रचनाएं की गई है, यद्यपि इसकी एक अपनी ही शैली है । साथ ही साथ अष्टम मंडल मे सातवें मण्डल की अपेक्षा सूक्त बहुत कम है । इससे यह स्पष्ट है कि आठवाँ मंडल कुलप्रणीत मण्डलो के वर्ग में नही है । प्रथम मण्डल के प्रथम भाग ( सूक्त १०५० ) में अष्टम मण्डल के साथ बहुत कुछ साम्य दीखता है । आधे से अधिक सूक्त कण्व-कुल के द्वारा रचित बताये गये है और कण्व-कुल द्वारा प्रोक्त सूक्तो मे वही उनका प्रिय त्रिष्टुप् छन्द मिलता है, जो अष्टम मंडल का है । नवम सूक्त के संबन्ध मे तनिक भी सन्देह नही है कि वह आठो मडल सुघटित हो जाने के पश्चात् ही रचा हुआ है । वास्तव में आठ मंडलों के संकलन का ही यह साक्षात् फल है । सोम पवमान के रचयिता उसी कुल के ऋषि है, जिन्होने २-६ मंडलो की रचना की है । इतर साम्य के अतिरिक्त यही पर्याप्त प्रमाण है कि नवम मंडल के सूक्तो में उन ध्रुवपदो को हम पाते है जो कुन- मंडलो की विशेषता है । पवमान सूक्तो में प्रथम एवं अष्टम मडल के साथ साम्य भी मिलता है । विभिन्न ऋषि-कुलो द्वारा प्रणीत सूक्तों के संकलन के समय समस्त पवमान सूक्त एकत्र कर संगृहीत किये गये थे । यह मान लेना उपयुक्त है कि सोम- सूक्तो की रचना की अवेस्ता के साथ अनेक अंशों में समानता है । उनमें एक ऐसी विधि है, जिसका उद्गम हिन्द- ईरानी युग में हुआ और वह वैदिक पाठकों के प्रारंभिक समय तक चली आ रही थी । नवम मडल के सूक्तो मे कालसंबन्धी भेद लुप्त सा है । जो भी हो, आधुनिक अन्वेषण को अद्यावधि इस संग्रह के पौर्वापर्य को निश्चित करने में किसी तरह सफलता प्राप्त नही हुई हैं' ( पृ० ३४-३६) । ऊपर का

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वेदार्थपारिजातः १०२८ आधुनिककर्तृकासु कृतिष्वपि वैलक्षण्यदर्शनेन भाषावैषम्येण कर्तृभेदकल्पनस्य निर्मूलत्वात् । वेदस्य वाक्यसमूहत्वेऽपि सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वेन पौरुषेयत्वाभ्युपगमेन कर्त्रसिद्धया कर्तृवैलक्षण्यकल्पनस्य दूरतो निरस्तत्वात् । अन्यत् सर्व कल्पनामात्रम्, प्रमाणानुपलम्भात् । वाल्मीकीय रामायणस्यैककर्तृकत्वेऽपि सुन्दरकाण्डे तदितरकाण्डापेक्षया वैलक्षण्यदर्शनात् ॥ साधर्म्यवैधर्म्य प्रयोजकानि तु नानाविधानि भवन्ति । ऋषयो मन्त्रद्रष्टारो भवन्ति न तु कर्तार इत्यसकृदुक्तत्वात् । यथा द्रष्ट्रैक्य साधर्म्यं तथैव प्रतिपाद्यदेवतेवयमपि सावम्यं सम्भवत्येव । ताभ्या वर्गीकरणे बाधा- भावात् । वर्धमानसंख्यायाः साधर्म्यहेतुत्वेऽपि न कर्तृसिद्धिः, तस्यास्तदप्रयोजकत्वात्। शब्दानामुक्तीना पुनरावृत्तिरपि न कर्तृसिद्धिप्रयोजिका, न वाधुनिकत्वप्रयोजिका । अत एव षण्णा मण्डलानामेव मौलिकत्वोक्तिरप्यपार्येव । अविच्छिन्ना- नादिपारम्पर्येण दशमण्डलात्मकस्य सर्वस्यैव ऋग्वेदस्य मौलिकत्वावगमात् । न च तावतः पारम्पर्यविच्छेदः कल्पयित् शक्यते, प्रमाणाभावात् । न च वाक्यत्वेन सकर्तृकत्वानुमानम्, स्मर्यमाणकर्तृकत्वेन सोपाधित्वात् । अत एव शैली भेदोऽप्यकिञ्चित्करः । सूक्ताना केषाञ्चित् काण्वस्नार्षत्वेऽपि न तेन काण्वकर्तृकत्व सिद्ध्यति । पवमानसूक्तानामपि न कर्तारः, केचिद् ऋषयस्तु द्रष्टार एव । यत्तु- 'दशममण्डलप्रणेतारो नव मण्डलानि परिचिन्वन्ति स्म । यथास्थान तथाभासात. २०-२६ सूक्तेषु 'अग्निमीळे' ' इत्यस्य प्रयोगदर्शनात् । तेन प्रकीर्णसुक्ताना समुदाय एवं दशममण्डलम् । स्फुटानि कानिचित्सूक्तानि ॥ रचनारूपात् प्रतिपाद्यविशेषाच्च दशममण्डलस्येतरमण्डलापेक्षया बहुकालपश्चाद्भावित्वम् । ऋषीणामुपरि देवतानां प्रभावो न्यूनतामुपगतः । उषस्देवतायाः प्रभावस्तु सवथा तदानी लुप्त आसीत । इन्द्राग्न्योस्तु प्रभावोऽक्षुण्ण आसीत् । यह सारा प्रतिपादन कल्पना की उडान मात्र है और प्रमाण से सवया शून्य है । आजकल भी एक ही कर्ता की रचनाओ में विलक्षणता देखने को मिलती है, अत भाषा की विलक्षणता के आधार पर कर्ता के भेद की कल्पना सर्वथा निराधार है । वेद यद्यपि वाक्य- समूहात्मक ही है, तो भी इसमे बिना संप्रदाय का विच्छेद हुए कर्ता की कोई स्मृति विद्यमान नही है, अतः इसको अपौरुषेय ही माना जाता है । जब इसका कोई कर्ता नही सिद्ध हो पाता, तो उस अवस्था मे अनेक विलक्षण कर्ताओ की कल्पना तो बहुत दूर की बात है । ये सारी बातें कल्पना की उड़ान मात्र है 1, क्योकि उसके लिये कोई प्रमाण नही दिये गये है । वाल्मीकि रामायण एक ही व्यक्ति की कृति है, किन्तु उसमें भी अन्य काण्डों की अपेक्षा सुन्दर काण्ड का अपना वैशिष्टय है । साधर्म्य और वैधर्म्य के बोधक अनेक होते है । ऋषिगण मन्त्रों के द्रष्टा मात्र है, कर्ता नही, यह बात अनेक स्थलो पर कही जा चुकी है । जैसे द्रष्टा की एकता के आधार पर ऋचाओं में साधर्म्य माना जाता है, उसी तरह से प्रतिपाद्य देवता के साम्य से भी इनमे साधर्म्य रह सकता है । इन दोनो आधारो पर वर्गीकरण करने में कोई बाधा नहीं हो सकती । बढती हुई संख्या को साधर्म्य का कारण मानने पर भी उसके आधार पर मण्डलो की कर्तृकता नहीं सिद्ध हो सकती, क्योकि सख्यावृद्धि कर्तृत्व की प्रयोजक नही है । शब्दो की और उक्तियो की आवृत्ति से भी कर्ता की सिद्धि नही हो सकती और न उससे उनकी आधुनिकता ही सिद्ध की जा सकती है । इस तरह से छ: मण्डल ही मौलिक प्राचीन ऋग्वेद है, इस तरह का कथन सर्वथा निराधार है । अविच्छिन्न अनादि परम्परा से दस मण्डलों से युक्त पूरा ऋग्वेद मौलिक माना जाता है । बिना प्रमाण के परम्परा का विच्छेद नही माना जा सकता । वाक्यत्व हेतु से वेदो की सकर्तृकता का अनुमान भी नही किया जा सकता, क्योकि इस हेतु में स्मर्यमाणकर्तृकता उपाधि है । यदि यह सकर्तृक होता तो उसके कर्ता की स्मृति अवशिष्ट रहती । सूक्तों की शैली , के भेद से भी आप अपने मन की बात नही सिद्ध कर सकते कुछ सूक्तो के ऋषि कण्व है इसका अभिप्राय यह नहीं है कि कण्व इन सूक्तों के रचयिता हैं । पवमान सूक्तो के भी कर्ता कोई ऋषि नही है । वे मात्र उनके द्रष्टा है । 'दशम मण्डल के प्रणेताओं को इसके पूर्व के नौ मण्डलो के साथ भली-भांति परिचय था, जिसका आभास हमें दशम मण्डल में स्थान स्थान पर मिलता है । दशम मण्डल का रचयिता २० से २६ सूक्तो के प्रारम्भ में ' अग्निमीळे ' का प्रयोग करता है, जो * ॠग्वेद का प्रथम मन्त्र है । इससे यह मालूम पडता है कि दशम मण्डल प्रकीर्ण सूक्तो का समुदाय है । इस मण्डल में कई तो नये स्फुट सूत है । दशम मण्डल की रचना काफी बाद की है । इसके लिये रचना का रूप और प्रतिपाद्य दोनो ही प्रमाण है । जहाँ तक देवता }f का सम्बन्ध है, हमें पता चलता है दशम मण्डल के ऋषियों पर पूर्ववत् वैदिक देवताओ का प्रभाव बहुत कुछ कम हो गया था । उषस् है

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वेदार्थपारिजातः १०२६ श्वेदेवानां वर्गस्त्वधिक महत्त्वमुपगत आसीत् । रोषश्रद्धादिभावात्मकदेवतानां नव्यानामपि तदानीमाविर्भावो जातः । त्र मण्डले विविधनूत्नविषयाणां येषां पूर्वमण्डलेषु चर्चाऽपि नागता, तादृशजगदुत्पत्यादिविषयाणामप्यत्र चर्चा दृश्यते । न्त्येष्टिविवाहादिसम्बन्धीभ्यप्यनेकानि सूक्तानि दृश्यन्ते' ( पृ० ३६-३७ ) इति, तत्सर्वमपि निरर्थकमेव, तादृशरचनारूप- तिपाद्यभेदानामा घुनिकत्वाप्रयोजकत्वात् । नित्येऽपि तद्वर्णने बाघाभावात् । आत्मादिविषया विचारा आधुनिका न चीना इति कुतो विज्ञायते? देहातिरिक्तात्मास्तित्वेऽविज्ञाते परलोकमात्रैकफलेषु यज्ञादिषु प्रवृत्त्यसम्भवात् । अपि च, रमेश्वरादृष्टादिसत्त्वानभ्युपगमे कथ यज्ञादिफलं सेत्स्यति? सर्वोऽपि चेतनः किञ्चित्प्रयोजनमुद्दिश्यैव प्रवर्तते । प्रयोजन- पि प्रयोज्यप्रयोजकभावावगमपूर्वकमेवेष्यते । यज्ञयागादी प्रवृत्ति कार्यकारणभावमूलिकंब मन्तव्या । सा च तादृशकार्य- रणभावे प्रत्यक्षानुमानाप्रसरात् तन्मूलकपौरुषेयवचनाप्रसराच्च स्वतन्त्रापौरुषेयवेदवाक्यमूलिकैव सम्भवति । वेद- क्यस्य च नैयायिकादिरीत्या सर्वज्ञेश्वरहेतुकत्वेन पूर्वोत्तरमीमामकरीत्या सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वेना-[रुषेयत्वेन पुरुषास्वातन्त्र्येणानादित्वेन च प्रमाणमनतिशङ्कनीयम् । वैदिका बालसुलभमोग्ध्येनैव कार्यकारणभाव- र्णयमन्तरा तेषु तेषु कर्मकलापेषु प्रवृत्ता इति कल्पनं नु मुग्धानां दुराशयानां घूर्ताना वा शोभते नान्येषाम् । तथा च ष्टिप्रलयतत्कारणादिविचारो नाधुनिको येन दशममण्डले तद्दर्शनेन तस्याधुनिकत्वं सिद्धयेत्, मन्त्रब्राह्मणात्मकेऽनादौ दे भूतभवद्भविष्यद्वस्तूनामपि प्रतिपादनात् । सर्वज्ञदृष्टी सर्वभासनाच्च न दशममण्डलस्यानादित्वभङ्गः । तथैव न प्रथमाष्टमनवमानामपि कालभेदकल्पनं युज्यते । सोमसूक्तानामवेस्ताग्रन्थस्यानेकांशैस्तुल्यत्वं विस्ताग्रन्थकर्तृकर्क सूक्तानुकरणादपि सम्भवत्येव । न चावेस्ताग्रभ्यस्यैव तत्सूक्तापेक्षया प्राचीनत्वं समकालिकत्व वा ताओ का तो बिलकुल लोप हो गया था । इन्द्र और अग्नि जैसे लब्वप्र तिष्ठ देवता ही अपना स्थान बनाये रहे । विश्वेदेवो का वर्ग अधिक महत्त्व पा गया है । कुछ नये भावात्मक देवताओ का प्रादुर्भाव भी हुआ, जैसे रोष और श्रद्धा का देवरूप में प्रथमावतार राम मण्डल में ही पाया जाता है । इतना ही नही, परन्तु इस मंडल मे विविध नवीन विषयो पर अनेक सूक्त है, जिनकी चर्चा पहले भी न हुई | उदाहरणार्थ, जगत् की उत्पत्ति के सम्बन्ध में, विवाह और अन्त्येष्टि के सम्बन्ध में आदि आदि (पृ० ३६-३७ ) | यह सारा न भी निरर्थक है, इस तरह से रचनाभेद और प्रतिपाद्य का भेद ऋग्वेद के इस मंडल की नवीनता को नही सिद्ध कर सकते । पूरे ग्वेद को नित्य मानने पर भी इन सबकी संगति बैठ सकती है । आत्मादि विषयक विचार आधुनिक है, प्राचीन नही, यह कैसे आप नते है? देह से अतिरिक्त आत्मा का जब तक परिज्ञान नही होगा तब तक परलोक को अवगति मात्र ही जिसका फल है, ऐसे यज्ञ दि कर्मों में मनुष्य की प्रवृत्ति कैसे होगी? अपि च, परमेश्वर, अदृष्ट आदि की सत्ता को माने बिना यज्ञादि के फल की सिद्धि कैसे होगी प्राणी किसी न किसी प्रयोजन का सामने रखकर ही किसी कार्य में प्रवृत्त होते हैं । प्रयोज्यप्रयोजक भाव के आधार पर ही प्रयोजन निर्धारण होता है । इस तरह के कार्यकारणभाव मे प्रत्यक्ष और अनुमान की प्रवृत्ति नही होती और एतन्मूलक पौरुषेय वाक्यो की प्रवृत्ति नही होती । फलतः स्वतन्त्र, अपौरुषेय वाक्य से ही यह जाना जा सकता है । इस वेद वाक्य में नैयायिक प्रभृति के मत से सर्वज्ञ वर प्रणोत होने से और मोमासा एवं वेदान्त की दृष्टि से सम्प्रदाय की अविच्छिन्न परम्परा के रहते हुए भी कर्ता का स्मरण न होते अपौरुषेयता के आधार पर इसके उच्चारण में पुरुष का स्वातन्त्र्य न होने से और अनादिता के आधार पर भी अप्रामाण्य की किसी र की शंका नही उठाई जा सकती । वैदिक ऋषिगण बालसुलभ मूढता के कारण कार्यकारणभाव का विचार किये बिना ही उन उन -याग आदि कर्मों में प्रवृत्त होते थे, इस तरह की कल्पना हतबुद्धि, दुराशय व्यक्तियों अथवा धूर्तों के लिये ही शोभा की बात हो सकती इस तरह से सृष्टि, प्रलय और इनके कारण आदि का विचार नवीन नही कहा जा सकता, जिसके आधार पर कि दशम मंडल की निता सिद्ध की जा सके | मन्त्र-ब्राह्मणात्मक अनादि वेद में भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल को सभी वस्तुओं का प्रतिपादन मिलता पौर सर्वज्ञ की दृष्टि में सब कुछ भासित होता रहता है, इस तरह से दशम मंडल की अनादिता को भी नष्ट नही किया जा सकता । प्रथम, अष्टम और नवम मंडलो की अलग अलग कालों की रचना हुई, यह कल्पना भी उचित नही मानी जा सकती । सूक्तो की अनेक अंशों में अवेस्ता ग्रन्थ से तुलना अवेस्ता ग्रन्थ के रचयिता के द्वारा ऋग्वेद के सूतो का अनुसरण करने

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजात १०३० । जेन्दावेस्ता-,:सिद्ध्यति अवेस्ताग्रन्थस्य सम्प्रदायविच्छेदाभ्युपगमात् अवेस्तासङ्कलनकर्तृभि तल्लोपाङ्गीकारात्प्रचारितम् । मगा मीडिया- ग्रम्यसम्बन्धे कथेयं प्रसिद्धा यद् मज्दधर्मस्य संस्कृतं शुद्धरूपम् ईरानप्रदेशे मगनामकर्जनं आप्रवना ( आथर्वणिका. ) प्रदेशे निवसन्ति स्म । मीडिया ईरानस्योत्तरपश्चिमप्रदेश आसीत् । त एत्रोपासनाकालेदग्धा जाताः । सम्भाव्यन्ते । अवेस्त पुस्तकप्रतय इस्कन्दरूमी ( सिकन्दरस्य ) इत्यस्याक्रमणकाले पश्चाद् येषां सङ्कलनं जातम् । यावन्तोंऽशाः कण्ठस्था आसन् ये बांशा इतस्ततः प्राप्ताः, तेषामुल्लेखा जाता । ततस्तत्तदशाना विगलिता एवेति ( आर्यो का आदिदेश एतद्वृत्तान्तेन स्पष्टं विज्ञायते यत् प्राचीनस्य अवेस्ताग्रन्थस्य बहवोशा पुस्तके ७८ पृष्ठे ) । पौर्वापर्यावधारणे साफल्य नाधि- अत एव मेकडनलमहाशयोऽगच्या वदति मन्वषणेनाप्यस्य संग्रहस्य नित्यसिद्धे वाऽज्ञातांथ- गतम् ( पृष्ठे ३६ ) । इदमेव सत्य यद्विधिना मुखादपि बल [ नि सरनि । सर्वज्ञेश्वरनिर्मितवेदे। न तावता तस्याधुनिकत्व कल्पनापि नोपपद्यते । तस्मादपि दशममण्डले ननमण्डलीगवर्णनामोल्लेखो नासम्भवी पौर्वापर्यमन्तरा वर्णेषु सिद्धयति । यथा कथञ्चित् पौर्वापर्य तु मण्डलेषु सूक्तेषु मन्त्रेषु वाक्येषु चाभ्युपगम्यत एव पदवाक्यत्वाद्यसम्भवात् । :' इति, तदप्यशुद्धम्, ' यदुक्तम्- म्यूनान्न्यूनं त्रीणि पञ्च वा निर्माणयुगानि कल्पयितु शक्यन्ते ऋक्सहिताया शैली विकासोऽपि एकस्यापि युगस्यासिद्धे, सम्भावनामात्रस्याप्रमाणत्वात् । यदपि - 'परिवर्तनयुगे प्राचीनानेकसूक्तानांतथैव सूकानि कथयन्ति स्म । 4 सम्भाव्यते यत ऋग्वेदनिर्मातुभिः मेागामिनामुपीणा वर्णन त्रियते । तेऽपिकानि सूक्तानि कदा कस्मिन् युगे सुकाना प्राचीनपरम्परासु रक्षणमात्सुका कासन इनि वपि सम्भावनामात्रम् अथवा समकालिकता किसी भी तरह से नही को अवेस्ता का सकलन करने वाले ही के आधार पर भी सभव हो सकती है । इसमें अवेस्ता ग्रन्थ की उन सूक्तो से प्राचीनता स्वीकार करते, सिद्ध की जा सकती । अवेस्ता ग्रन्थ का सप्रदाय विच्छिन्न हो गया है इस बात रूप ईरान प्रदेश मे ' मग' नाम से प्रसिद्ध जनो | जेन्दावेस्ता ग्रन्थ के संबन्ध में यह कथा प्रसिद्ध है कि ' मज्द' धर्म का शुद्ध संस्कृतउत्तर-पश्चिम दिशा मे वर्तमान एक प्रदेश है । कल्पना ' ' ' ' ने प्रचारित किया । ये मग मीडिया प्रदेश में रहते थे । मीडिया ईरान का के समय जला दी गई । बाद मे जिसको की जाती है कि ये आथर्वणिक उपासक थे । अवेस्ता ग्रन्थ की प्रतियाँ सिकन्दर के कियाआक्रमणगया और उसी के आधार पर इस ग्रन्थ का J, -, जितना अंश याद था अथवा जो अंग इधर उधर से प्राप्त हो सका उसको इकट्ठा ग्रन्थ के अनेक अंश नष्ट हो गये ( द्रष्टव्य आय का पुन संकलन किया गया । इस वृत्तान्त से स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्राचीन अवेस्ता आदि देश, पृ० ७८) | अन्वेषण को अद्यावधि इस संग्रह अन्तत: इसीलिये मैकडानल महाशय को भी अगत्या कहना पडता है कि ' आधुनिक , वास्तविकता इसी को कहते हैं कि के पौर्वापर्य को निश्चित करने में किसी तरह सफलता प्राप्त नहीं हुई है' ( पृ ० ३६ ) । सचाई वेद में अज्ञात अंश की कल्पना कभी विरोधियो के मुँह से भी वह निकल ही पडती है । सर्वज्ञ ईश्वर के द्वारा प्रणीत अथवामें वर्णितनित्यसिद्धअंशों का उल्लेख असंभव नही माना जा,, संभव ही नही हो सकती । इस तरह से भी दशम मण्डल में पहले नो मंडलो तरह का पौर्वापर्य तो मंडल सूक्त मन्त्र और सकता । इतने मात्र से उस अंश को आधुनिक नही सिद्ध किया जा सकता । जिस किसी भी नही बन सकती । वाक्यों में मानना ही पड़ेगा । इस पौर्वापर्य के बिना वर्णों में पद, वाक्य प्रभृति व्यवहार की उपपत्ति युगों का पृथक्करण 'इस दिशा में इतनी प्रगति हो गई है कि हम ऋग्वेद संहिता के कम से कम तीन या पांच निर्माण नही किया जा सकता । संभावना को कोई कर सकते हैं ' ( पू० ३८) । यह कथन भी गलत है, क्योंकि इस तरह का एक भी युग सिद्ध, जो नष्ट हो गये हैं और उनमें उपलब्ध ' प्रमाण नही मानता । इस परिवर्तन युग में कई और प्राचीन सूक्तों की निर्मिति हुई होगी स्वयं ही अपने अग्रगामी ऋषियों प्राचीनतम सूक्तों की शैली का विकास भी अवश्य हुआ होगा । ऋग्वेद के प्राचीनतम अंश के निर्माता रखने को उत्सुक थे' (पृ० ३८ ) । का वर्णन करते है । वे भी उसी तरह से सूक्त कहते थे और सूक्तों की प्राचीन परम्परा को जीवित