वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 131–140
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 131–140
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देवार्थपारिजातः १०३१ कस्मिन् संवत्सरे कस्मिन् मासे कस्मिन् पक्षे कस्या तिथौ केषां समक्ष किनानवेयैः किगोत्रेः कथ रचितानीति प्रमाणस्य वक्तुमशक्यत्वात् । ऋषीणा नूत्नत्वप्रस्नत्वादिक स्वध्येत्रपेक्षया न मन्त्रनिर्माणापेक्षा, निर्माणासिद्धेः । यदुक्तम्—' दशममण्डले स्वराणां लोपा अधिकाधिका दृश्यन्ते, अवग्रहा अपि लौकिकसस्कृतस्येव । रेफस्थाने लकारप्रयोगास्तदानी प्राचलत् । प्रत्ययेषु प्रथमाबहुवचनस्य आसस्प्रयोगा न्यूनतामुपगताः । अनेकपुरातनशब्दा लुप्ता जाताः । तेषां स्थानेऽन्ये शब्दा आयाता । यथा सिमशब्दों दशमातिरिक्ते मण्डले ऋग्वेदे पञ्चाशद्वार प्रयुक्तः । दशममण्डले त्वेकवारमेव । लम्-काल-लक्ष्मी-एवमित्यादिलौकिकसाहित्यिक सम्बन्धित शब्दा दशममण्डले बाहुल्ये -नोपलभ्यन्ते । बुद्धिपूर्वकमार्ष प्रयोगचेष्टा अपि तत्र स्पष्ट व्यज्यते' ( पृ० ३७ ) इति, तदपि कुशकाशाबलम्बनमेव, नित्यत्वान्निर्माणासम्भवात् । अपौरुषेयत्वाद्वेदेषु विशिष्टशब्दप्रत्ययादिप्रयोगा अपर्यनुयोज्या एव । केवलमुपक्रमादिभि रभिप्रायमेवैषामवगन्तु प्रभवामो न पर्यनुयोक्तुं शक्ष्याम । अत एव पाणिनिरपि छन्दसि दृष्टानुविधानमनुशास्ति । .,कात्यायनपतञ्जली अपि तत्समर्थयेते । नहि लौकिकेभ्य शब्देभ्योऽत्यन्तविलक्षणा वेदशब्दा तथात्वे शक्तिग्रहा-, सम्भवादप्रामाण्यं स्यात् । देशकालपरिस्थितिपरवशाः पुरुषास्तत्तद्देशकालगतान् शब्दान् प्रयुञ्जते । किञ्च वैयाकरणानां मीमांसकानां च दृष्ट्या लौकिका वैदिकाश्च सर्वेऽपि शब्दा नित्या एव । यदपि — 'इतरवेदाना समीक्षयापि कालविशेषनिर्धारण शक्यम्' इति, तदप्यसङ्गतम्, इतरवेदानामपि नित्यत्वाविशेषात् । यदपि- 'वैदिकपरम्परासारभाग ऋग्वेद उपलभ्यते स निश्चप्रचं मौलिकपाठरूपेण ई० पू० १००० वर्षेभ्यो याथातथ्येन लभ्यते' ( पृ ० ३ ९ ) इति, तदप्यशुद्धम्, नित्यानामनादीना वेदाना कतिचित्सवत्सरका लिकत्व- कल्पनस्यायुक्तत्वात् । अत एवेतरवेदापेक्षया ऋग्वेदस्य प्रामाण्याधिक्यमपि निर्मूलमेव$ समेषामेव वेदानामपौरुषेयत्वा- यह कथन भी संभावनामात्र है, क्योकि किन सूक्तो को कब किस युग में किस वर्ष, मास, पक्ष और तिथि में किसके सामने किस नाम के किस गोत्र के ऋषियों ने बनाया, इस बात को सिद्ध करने के लिये कोई प्रमाण नही दिया जा सकता । ऋषियों की नूतनता और प्राचीनता तो अध्येता के क्रम के आधार पर सिद्ध हो सकती है, इससे यह नही सिद्ध किया जा सकता कि उन उन प्राचीन और नवीन ऋषियो ने नूतन मन्त्रों की रचना की है । 'दशम मण्डल में स्वरो का लोप अधिकाधिक होने लगा और अवग्रह कम होने लगे । लौकिक संस्कृत की तरह रेफ के स्थान मे लकार का प्रयोग होने लगा । प्रत्यया में प्रथमा बहुवचन का वैदिक प्रत्यय ' आसस' धीरे धीरे कम हो चला । कई पुरातन शब्दो का प्रयोग समाप्त हो गया और उनके स्थान पर दूसरे शब्द साधारण से बन गये । जैसे 'सिम' जो शेष ऋग्वेद में पचास बार आया है, दशम मण्डल में केवल एक ही स्थान पर दीख पडता है । इसके अतिरिक्त लभ्, काल, लक्ष्मी और एवम् जैसे लौकिक साहित्य के शब्द दशम मंडल में बहुधा मिलते है । जान बूझकर प्रयोगो को आर्ष रूप देने की चेष्टा भी दशम मंडल मे स्पष्ट झलकती हैं' (पृ० ३७ ) | यह कथन भी कुश-काश का सहारा लेने सरीखा है, क्योकि वेद तो नित्य है, उनका निर्माण नही होता । वेद अपौरुषेय हैं, अत: उनमें कुछ विशिष्ट शब्दो का प्रयोग हुआ न हुआ, इस तरह की बातें विचारार्ह नही हो सकती, केवल उपक्रम प्रभृति प्रमाणो के आधार पर उनके अभिप्राय को हम समझ भर सकते है । इसी लिये पाणिनि ने भी छन्द में जैसा देखा गया है, तदनुरूप ही प्रकृति-प्रत्ययादि के विधान को स्वीकृति दे दी है । कात्यायन और पतजलि भी इसी बात का समर्थन करते है । लौकिक शब्दो से वैदिक शब्द अत्यन्त विलक्षण नही है, यदि ऐसा हो तो उनसे शक्तिग्रह के अभाव में अर्थ का बोध न होने से उनका अप्रामाण्य होने लगेगा | देश, काल और परिस्थिति के परवश पुरुष उस देश और काल में प्रचलित शब्दो का ही प्रयोग करते हैं । तो भी वैयाकरण और मीमांसकों के मत के अनुसार लौकिक एवं वैदिक सभी शब्द नित्य है । 'इतर वेदों की समीक्षा से भी हम ऋग्वेद के काल का निर्धारण कर सकते हैं, यह कथन भी असंगत है, क्योंकि इतर वेद भी ऋग्वेद की ही तरह समान रूप से नित्य है । 'वैदिक परम्परा का सारभाग जो हमें ऋग्वेद में मिलता है, बहुत सीमा तक निश्चित एवं मौलिक पाठ के रूप में ईसा पूर्व १००० वर्ष से ज्यो का त्यों मिला है' ( पृ० ३ ९ ) यह भी गलत है, क्योकि नित्य, अनादि
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वेदार्थपारिजातः १०३२ सौकर्यपूर्तये येषा रचना विशेषात् । यदुक्तम्-' उत्तरकाले ऋग्वेदस्याशान् गृहीत्वा नवोन्मेषितपौरोहित्यपद्धत्यपेक्षित। यदप्युक्तम्— 'ऋग्वेदीयमन्त्रा-, ' ( ),, जाता तदपेक्षया प्रामाण्याधिक्यमिति पृ ० ३ ९ तदपि यत्किञ्चित्नावश्यकमासीद्यथातदसिद्धेः मौखिकपरिपाट्या ऋक्- ' नुद्धृत्य स्वरचनासु निवेशयितॄणामृषीणा कृते प्राचीनपाठरक्षण स्वभावतोऽन्यपरम्परायातथा नियन्त्रणे शैथिल्यं भवतीति संहितायाः स्वरूपरक्षणचेष्टावताम् । नूत्नपरम्परायाः प्रादुर्भावें प्रवृत्तिसिद्धेश्च । स्वर- ( पृ० ३ ९ ), तदपि यत्किञ्चित् वदमन्त्राणां तदसिद्धे, वैदिकानां स्वस्वपरम्परारक्षणे धर्मतः वर्णव्यत्यासे वाग्वज्रत्वभियापि तद्रक्षणप्रवृत्तिदा सिद्धे । यथाद्यत्वे' यदपि - ' कतिपयान् अपवादानपहाय सामवेदयजुर्वेदसंहितो. सङ्कलनकाले ऋग्वेदस्तथैवासीद्ऋग्वेदार्थ सहस्र- ( पृ० ३ ९ ), यदपि 'प्रारम्भिक युगकालनिर्णये यद्यपि हस्तलिखितग्रन्थाना साहाय्य नोपयोगिसविधे, तथापिया चेतरवेदेषूपलभ्यते, द्वयवर्षादपि पूर्वकालात् प्रचलितविभिन्नपाठान्तराणां प्रभूता सामग्री बिद्यत एवास्माकंवेदास्तथैव कार्यकरा यथा साहित्यिक- विषयेषु हस्तलिखितग्रन्याः । ते च पाठभेदा यास्कप्रातिशाख्योल्लिखित पाठेभ्योऽपि सत्य निनिता इत्यस्यार्थस्य' ( साधने) येषा रचना ऋग्वेदीयसूतमन्त्राणा पङक्तिभिः सम्पन्ना । ऋग्वेदसमोक्षाचामितरे पुरातनाः पृ० ३८०३ ९ इति, तदपि न किञ्चित् निर्मूलत्वान् । केश्चिग्वेदीयसूतमन्त्राणा साहाय्येनेतरवेदा। यदपि -'मौखिकपारम्पर्येण यस्यार्थ-, मानाभावात् । सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वेन तेपानप्यनादित्वात् तस्य प्रामाणिकतोत्तरग्रन्थाद् ग्रन्थस्य स्वरूपं सुरक्षितमितरवेदाना रचनातः प्रयोगविधिनिर्धारणाच्च पूर्वमेवासीत् विशिष्टैवेति' ( पृ० ३ ९ ), तदपि निरस्तम्, निर्माणासिद्धयोक्तोत्तरत्वात् अपेक्षा ऋग्वेद को अधिक प्रामाणिक मानना वेदो को कुछ वर्षों पहले की रचना मामलामा असंगत है । इसी लिये अन्य वेदो की ऋग्वेद की प्रामाणिकता शेष उन ग्रन्थो की भी निराधार है, क्योकि सभी वेद समान रूप ने अपौरुषेय है । 'यह स्वाभाविक है कि कर केवल नवोन्मेषित पौरोहित्य पद्धति की , ( ) ' अपेक्षा कही अधिक रहे जिनकी रचना उत्तर काल में उमो ऋग्वेद के अंशो को ग्रहण यह बात सिद्ध नही हो पाती । ऋग्वेद ' ( ), अपेक्षाओं को सौकर्य से पूर्त करने के लिये हुई हो पृ० ३ ९ यह कथन भो गलत है क्योकि था कि वे प्राचीन पाठ को यथावत्,, से मन्त्रों को उद्धृत कर अपनी रचनाओं में निवेश करने वाले ऋषियों के लिये यह कोई आवश्यक न था जितना उन विद्वानो का सुरक्षित रखने के लिये सतर्क रहें । कारण, उनका उत्तरदायित्व पाठ की सुरक्षा के लिये इतना अधिकपरम्परान का नियन्त्रण उस स्थान पर जो संहिता को मौखिक परिपाटी से जीवित रखने के लिये सचेष्ट थे । सामान्य नियम है कि , क्योंकि वेद-मन्त्रों के संबन्ध मे यह बात, ' ( ) शिथिल हो जाता है नहीं नई परम्परा का प्रादुर्भाव होता है पृ० ३ ९ यह कथन भी गलत है हो जाने पर उच्चारण लागू नही हो सकती । वैदिक अपनी अपनी परम्परा की रक्षा में धर्मतः प्रवृत्त रहते है । स्वरउनकीऔररक्षावर्णमें कादृढताविपर्ययसे प्रवृत्त रहते है । कर्ता के ऊपर वाणी रूपी वस्त्र का प्रहार होता है, इस डर से भी वैदिक विद्वान् सदा 'कतिपय अपवादों को छोड़ वर्तमान ऋग्वेद संहिता ठीक ऐसी ही उस समय भी थी, जब सामवेद तथाअनुपयोगीयजुर्वेद हैसंहिताओ, तथापि का संकलन हुआ' ( पृ० ३ ९ ), 'यद्यपि हस्तलिखित ग्रन्थो की सहायता प्रारम्भिक युग के काल निर्णयकीमें प्रभूतबिलकुलसामग्री है । यह सामग्री यह सुख की बात है कि ऋग्वेद के लिये हमारे पास दो हजार वर्ष से पूर्व प्रचलित विभिन्न पाठान्तरो लिये वास्तव में इतर वेद हर वेदो मे हैं, जिनकी रचना ऋग्वेद के अनेक सूक्त, मन्त्र एवं पंक्तियों से निर्मित है । ऋग्वेद की समीक्षापाठभेदके यास्क एवं प्रातिशाख्यो मे ठीक वही काम करते है, जो अन्य साहित्यिक विषयो' ( के लिये हस्तलिखित) ग्रन्थ कर सकते है । ये लोगों ने ॠग्वेदीय सूक्त एवं मन्त्रो उल्लिखित विभिन्न पाठो से भी सचमुच पुरातन है १० ३८-३९ यह कथन भी निराधार है । कुछ नही है । सम्प्रदाय के विच्छिन्न, की सहायता से अन्य वेदों का निर्माण किया इस बात को सिद्ध करने के लिये आपके पास कोई प्रमाण आर्ष ग्रन्थ जिसका न होने पर उसके कर्ता की स्मृति के अभाव मे उनकी भी अनादिता ही माननी पड़ेगी । 'यह स्वाभाविक है कि वहसे सुरक्षित रहा हो, मूल ऐतिहासिक होकर इतर वेदों की रचना तथा प्रयोग विधि के निर्धारण से भी पूर्व इस प्रकार मौखिक परम्परा कि इन वेदों - उसकी प्रामाणिकता शेष उन ग्रन्थो की अपेक्षा कहीं अधिक रहे ' ( पृ० ३ ९ ) यह कथन भी इस तरह से निरस्त हो जाता है की भी रचना की बात किसी तरह से सिद्ध नही हो पाती । }
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बदायपारिजात' १०३३ यदपि - 'सहिताया. पाठसमीक्षात ऋग्वेदस्य युगद्वय प्रतोयते --प्रथमं तु यदेनरवेदानामस्तित्वमेव नामीत्, द्वितीय यत्र स्वरानुसारेण वैयाकरणन परिश्रमात् सहितापाठा निर्धारित ' इति, तदपि तुच्छम् त्वदुक्तोभय- पक्षस्याप्यप्रामाणिकत्वात् । समेपा वेदानामनादित्वात् । वैयाकरणैश्छन्दसि दृष्टविधानाङ्गीकारेण स्वरपाठादिपरि- - वर्तनानङ्गीकारात् । मौखिक रपटा युगयुगान्तराद्वेदप्राप्त्यङ्गीकारेणापि परिवर्तनासम्भवाच्च । यत्त्वितरग्रन्थे , ( ),, वेदानामपि समानयोगक्षेमत्वमिति पृ० ३ ९ तदपि न परम्पर्याविच्छेदस्यान्यत्रामत्त्वात विकासक्रमेणान्यत्र परिवर्तनाङ्गीकारेऽपि वेदे तदनङ्गीकारात् नियतानुपूर्वीकत्व विशिष्टवाक्यसमूहस्यैव वेदस्वरूपत्वाभ्युपगमात् । यदपि - 'ऋग्वेदे नैकविधास्त्रुटय समालत् परस्त्वन्ते सहितासङ्कलनसमये मौलिकताया उच्चस्तरेण निर्वाह, सूक्तनिमातॄणा मूलपाठेषु सहितापाठात् शतशो भेदा उपलभ्यन्ते । शब्दा प्रायेण त एव विद्यन्ते । उदा- हरणार्थ सुम्न वा द्युम्न वा पाठेऽनिश्चितता न प्रतीयते । अय भेदस्तु लोकिकभाषासु सन्धिनियमाद्धेतोर्ध्वन्यात्मक- परिवर्तनफलम् । यत्प्रथम 'तु अम् हि अग्ने' इति पठन्ति स्म, तदिदानी ' त्वं ह्यग्ने' इति कथयन्ति । एतद्रूपेणापि पाठस्याधुनिकरूपदानाय प्रयत्नः पाक्षिक एव क्वाचित्क एव आसीत् । एवं सन्धिनियमे सहितापाठेऽनेकेषु छन्दस्स्व- स्तव्यस्तता जाता । छन्दोऽनुसारं पाठन प्राचीनपाठाना सहजतया ज्ञान जायते । संहितापाठे स्वररूपादिषु सूक्ष्माति- सूक्ष्मविषयेषु ध्यान दीयते स्म' यदन्यत्र सरलतया त्यक्तु शक्यमासीत् । वेदपाठस्य शाब्दिकमौलिकता रक्षणाय साव- धानतोपयुज्यते स्म । प्रथमयुगे पारम्यर्यवशात् काश्चित् श्रुटयो जाताः । द्वितीययुगे व्याकरणनियमवशात् काश्चित् त्रुटयो जाता । ता अपहाय ॠग्वेदस्य प्राचीनतम ग्रन्थ एतावतो दीर्घात् कालाद् याथातथ्येन सुरक्षित आसीदित्या- ' संहिता के पाठ की समीक्षा से भी ऋग्वेद की रचना के दो युग स्पष्ट होते है । पहला तो वह, जिसमे इतर वेद का अस्तित्व न था, दूसरा वह, जिसमे स्त्ररो के अनुसार वैयाकरण संपादको के परिश्रम से सहिता पाठ निर्धारित किया गया' ( पृ० ३ ९ ), यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि आपके दिखाये गये ये दोनो पक्ष अप्रामाणिक है । हमारे मत से सभी वेद मनादि है । वैयाकरण वेदो मे जो जैसा देखा गया है, उसको उसी रूप में सिद्ध करने के पक्षपाती है, अत उनके द्वारा स्वर और पाठ में परिवर्तन किया गया, इस बात को नही माना जा सकता । मौखिक परिपाटी से युग युगान्तर से वेद की परम्परा चलो आरहो है, इस बात को सभी मानते है, इस कारण से भी इनमें किसी परिवर्तन की बात नही सोची जा सकती । ' इसकी भी गति अवश्य वैसी ही हुई, जैसो और प्राचीन ग्रन्थो की होती है ' ( पृ० ३ ९ ) यह भी गलत है, क्योकि वेदों की तरह अन्य प्राचीन ग्रन्थो की अविच्छिन्न परम्परा आज उपलब्ध नही है । विकासक्रम से अन्यत्र परिवर्तन को स्वीकार किया जा सकता है, किन्तु वेद के विषय मे इसको नही माना जा सकता । वेद का स्वरूप ही नियत आनुपूर्वी से विशिष्ट वाक्यसमूहात्मक माना जाता है । 'प्राचीन युग में निश्चय ही ऋग्वेद के पाठ मे कई त्रुटियाँ हुई हों, परन्तु अन्त मे सहिता के सकलन के समय, मालूम होता है, मौलिकता का निर्वाह बडे ऊँचे स्तर से किया गया । सूक्त निर्माताओ के मूल पाठ में सैकडो जगह संहिता के पाठ से भेद पाया जाता है, परन्तु शब्द प्रायः वे ही रहे है । उदाहरणार्थ, इसमें कोई अनिश्चितता प्रतीत नही होती कि वास्तविक शब्द 'सुम्नम्' या या द्युम्नम् | यह भेद तो लौकिक भाषा में प्रचलित सन्धि-नियमो के कारण ध्वन्यात्मक परिवर्तन का फल है, जिसे पहले 'तु अम् हि अग्ने' पढते थे, उसे अब 'स्वं ह्यग्ने' कहते है । इस रूप मे भी पाठ को आधुनिक रूप देने का प्रयत्न पाक्षिक एव क्वचित् ही हो पाया है । afe नियमो को लागू कर देने मे संहिता पाठ में कई जगह छन्द अस्तव्यस्त हुए है । यदि हम छन्द के अनुसार पढ़ें तो प्राचीन पाठ का हमे पता सहज लग जाता है । साथ ही साथ संहिता पाठ में छोटी से छोटी बारीकी की ओर ध्यान 1 दिया गया है । स्वर के सम्बन्ध में तथा रूपान्तर के सम्बन्ध में भी उन सूक्ष्मताओ पर ध्यान दिया गया है, जो आसानी से छोड दी जा सकती थी 1 । ये सब बातें वेदपाठ की शाब्दिक मौलिकता को सम्हाले रखने के लिये बहुत पहले से ही बडी सावधानी से काम में लाई जाती थी । प्रथम युग में परम्परा के कारण कुछ गलतिया और द्वितीय युग में व्याकरण के नियमो के कारण त्रुटियाँ हुई है, जिन्हें छोड, ॠग्वेद का प्राचीनतम ग्रन्थ इतने लम्बे समय तक हर सूरत में ठीक ठीक सुरक्षित रखा गया - यह एक आश्चर्य की बात है' ( पृ ० ४० ) । १३०
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१०३४ पदार्थपारिजातः श्र्चर्यमेव' ( पृ ० ४० ) इति, तदेतत्सर्व पाश्चात्यानामनधिकारचेष्टाविलसितमेव " प्रमाणशून्यत्वात् । द्युम्न सुम्नस् इत्यादि पाठभेदास्तु शाखामूलका एव । तु अम् हि अग्ने त्वं ह्यग्ने इति पाठभेदस्तु विकृतिमूलकोऽभ्यामाय, व्याकर- णानि तु छन्दास्येवानुमरन्तीत्यसकृदुक्तम् । यथा लताया वक्रना न दूषण किन्तु भूषणमेव, तथैव व्याकरणसूत्रादि- विरुद्धो वैदिकः प्रयोगोऽपि न दूषणं किन्तु भूपणमेव, वैनाकरणैरपि तदभ्युपगमात् । सहितापदक्रमादिपाठा अध्यनादय एवेत्यैतरेयब्राह्मणे तदुपासनाविधानात् । यत्तु -'सहितापाठकालनिर्धारणप्रसङ्गे ब्राह्मणेषु ऋग्वेदसम्वन्धिविवेचनेन निश्चीयते यत्तदानी यजुर्वेदीय- गद्यभागापेक्षयापि ऋग्वेदपाठ: पूर्णतया स्थिरतामुपागमत् । अत एव शतपथे प्रयोगविध्यनुसारेण मन्त्रपाठपरिवर्तन- प्रस्तावप्रसङ्गे ऋग्वेदे पाठान्तरकल्पनापि न कर्तुं शक्यत इत्युक्तम् । ब्राह्मणग्रन्थेष्विदमप्युल्लिखित यदमुदतेऽमुक-, प्रयोगकल्प सम्बन्धितसूक्तेषु कियन्तो मन्त्राः सन्तीति । यत्तु क्वचित्क्वचिन्मन्त्रा पौर्वापर्येऽन्तरं दृश्यते ,, केचिन्मन्त्रा इतस्ततो दृश्यन्ते त्यक्ता तस्य कारण न पाठभेद किन्तु प्रयोगविघेरावश्यकतैव ॥ सूत्रेष्वपि यदृचा रूपान्तर दृश्यते, तदपि न पाठभेदमूलकम्, किन्तु प्रयोगविधिसामञ्जस्यायैव । सूत्रेषु काश्विदेवभूता उक्तय. सन्ति या सहिताया उपलब्धरूपाणा वास्तविकता प्रमाणयन्ति । यथा यस्य सूक्तस्य यस्य मन्त्रस्य साख्यायनसूत्रे यत्स्थान मुल्लिखितम्, तथैव ऋग्वेदसंहितायामुपलभ्यते' ( पृ० ४०-४१ ) इति, तदप्यशुद्धम, सर्वासु सहितास्वपि पाठभेदस्य तथैव नियतत्वात् ॥ ऊहानुसारेण पाठपरिवर्तन तु तत्तत्कर्मानुसारेण तात्कालिकमेव भवति । तदपि सर्वत्र समम् । सूत्रेषु ब्राह्मणेषु च क्वचिदचा रूपान्तरोपन्यासस्तु शाखाभेदेन मन्तव्यः । तच्च शाखाना वेदत्वसमर्थनप्रसङ्गे सनिदर्शनमुपन्यस्तमेव । यह सब पाश्चात्य विद्वानो की अनधिकार चेष्टा का तमाशा है । ये सारी बातें मनगढन्त है । द्युम्नम्, सुम्नम् प्रभृति पाठभेद शाखा- मूलक माने जाते है । 'तु अम् हि अग्ने ' और 'त्वं ह्यग्ने' यह पाठ विकृति पाठ के आधार पर अभ्यास के लिये किया गया है । व्याकरण ग्रन्थ छन्दो की पद्धति का हो अनुमरण करते है, यह बात अनेक स्थलो पर सप्रमाण कही जा चुकी है । जैसे लता का टेढापन दूषण न होकर उसके लिये भूषण ही माना जाता है, उसी तरह मे व्याकरण के नियमो के विरुद्ध वैदिक प्रयोग भी दूषण न होकर भूषण ही माना जाता है । वैयाकरण भी इस बात से सहमत हैं । सहिता, पद, क्रम आदि पाठ भी अनादि ही है । इसी लिये ऐतरेय ब्राह्मण मे उनकी उपासना विहित है ।1 ' ब्राह्मणो मे ऋग्वेद संबन्धी विवेचन से यह निश्चित होता है कि उस समय ऋग्वेद का पाठ पूर्णतः स्थिर हो गया था और वह भी उस विशेष रूप में, जैसा यजुर्वेद के गद्यभाग मे भी नही पाया जाता । शतपथ ब्राह्मण में प्रयोग विधि के अनुसार मन्त्र- पाठ मे कही कही परिवर्तन करने के प्रस्ताव पर यह कहाँ गया है— ऋग्वेद के पाठ में अन्तर करने की कल्पना भी नही की जा सकती । ब्राह्मण ग्रन्थों में यह भी लिखा है --अमुक सूक्त में अथवा अमुक प्रयोग कल्प से संबन्धित सूक्तो मे कितने मन्त्र है । इस प्रकार के संख्या सबन्धी उल्लेख वर्तमान ॠग्वेद के मंहिता पाठ से शब्दशः मिलते है, परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थो मे कही कही ऋग्वेद के मन्त्री के पौर्वापर्य में अन्तर है, अथवा कुछ मन्त्र इधर उधर छूट गये हैं, जिसका कारण पाठभेद नही, परन्तु प्रयोगविधि की आवश्य- कताएँ है । सूत्रों में ऋग्वेद की ऋचाओ के रूपान्तर भी दिये गये है, परन्तु उसका कारण भी कोई प्राचीन पाठभेद नही, परन्तु वही प्रयोग विधि के साथ सामंजस्य है । सूत्रो में कई उक्तियाँ ऐसी है, जो संहिता के उपलब्ध रूप की वास्तविकता को प्रमाणित करती है । उदाहरणार्थ- जिस सूक्त के जिस मन्त्र का जा स्थान साख्यायन सूत्र में उल्लिखित है, अथवा जिस सूक्त में जितनी मन्त्र संख्या बताई गई है, वह ऋग्वेद संहिता में ठीक ठीक वैसी ही मिलती है' ( पृ० ४०-४९ ) । यह कथन भी अशुद्ध है, क्योकि सभी सहिताओ का अपना अपना पाठभेद नियत हैं । ऊह के अनुसार किया गया पाठ परिवर्तन केवल उस उस कर्म के संपादन तक तात्कालिक रूप से रहता है । वह भी सर्वत्र समान है । सूत्र अथवा ब्राह्मण ग्रन्थो में कही कही देखा गया मन्त्र के पाठ का परिवर्तन शाखा भेद के अनुसार मानना चाहिये । इस बात को हम शाखाओं को वेद मिद्ध करने के प्रसंग मे उदाहरण पूर्वक समझा चुके है ।
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वेदार्थपारिजात १०३५ यदप्युक्तम — 'ब्राह्मणभागेष्वेवविधा साक्षादुक्तय सन्ति या एकस्मिन् पदसमुहे कियन्तो वर्णा मन्तीति निर्धारयन्ति, पर सहितापाठे तथा नोपलभ्यते, सन्धिनियमानुसारेणाक्षरन्यूनत्वोपगमात् । तेन ब्राह्मणसाहित्यस्य प्राचीनभागे वैदिकग्रन्थसम्बद्बध्वन्यात्मकप्रश्नसम्वन्धिविचारो न प्रतीयते । अतो ब्राह्मणग्रन्थरचना सहितापाठपूर्णता- निर्धारण यावन्नासीत्' ( पृ० ४१ ) इत्ययमंशोऽशुद्ध सहितापाठपूर्णतानिर्धारणात् पूर्वमेव जात. । 'ब्राह्मणग्रन्थपूरकेष्वा रण्यकोपनिषद्ग्रन्थेषु केषाञ्चिद्वर्णनमुना कृने न केवल पारिभापिकाः शब्दा लभ्यन्ते, अपि तु वैदिकपाठसम्बद्धध्वनिनियमानामनि विस्तृत वर्णनमुपलभ्यते । एतेषु ग्रन्थेषु कतिपयेषा भाषा- शास्त्रिणामपि प्रथमोल्लेखो दृश्यते, यथा शाकल्यमाण्डूकेयादीनाम् ये प्रातिशाख्येषु प्रमाणभूता अवगम्यन्ते । अत इद मन्तव्य यद् व्याकरणसम्वन्धिप्रश्न विचारका आरण्यकोपनिषदादिपन्था ब्राह्मणग्रन्ययुगस्थ यास्कप्रातिशाख्य- युगस्य चान्तरालवतन. । तेन सहितापाठोऽवश्यमेतन्मध्यसन्धिकाले ई० पू० ५००,६०० वर्षेभ्य. प्राडूनिर्मित स्यात्' ( ),, पृ० ४१ इति तदपि निर्मूलमेव वैदिकसिद्धान्ते मन्त्रब्राह्मणारण्यकोपनिषदामपौरुषेयत्वेनानादित्वोपगमेन , कालभेदकल्पनाया निर्मूलत्वात् ॥ शाकल्यमाण्डुकेयादीनामुल्लेखेनापि न कालनिर्धारण सम्मवि उर्वशीपुरूरव- सादिसहितास्थनामोल्लेखात्तस्यापि स्थानजात्यादिवाचकत्वेन व्यक्तिविशेषाबोधकत्वात् । अक्षरसंख्यापूर्तिस्तु सन्ध्यभावमादायैव कर्तव्या । यथा सावित्र्या प्रथमपादस्याष्टाक्षरत्वपूर्तिर्णकारमिकारान्त मत्वा क्रियते । यदपि - 'पदपाठनिर्माणानन्तरमृषिभिः सहितापाठरक्षणायासाधारण प्रयत्नः कृतः । तत्परिणाम एष यद् विश्वमाहित्येतिहासेषु कस्यचिदपि प्राचीनग्रन्थस्य शुद्धः पाठोऽनेकाः शतीर्यावद् नैवमुपलभ्यते, यथा ऋग्वेद- सहितायाः । पदपाठपद्धत्या तत्प्रयासोपक्रमः । पदपाठात्सहिताया प्राचीन रूपमप्यवगम्यते । सहितापाठेन सार्धमेव हम देख चुके है कि ब्राह्मणो में कई साक्षात् उक्तियाँ ऐसी है, जो एक पदसमूह मे जितने वर्ण है, उनका भी उल्लेख करती है, परन्तु आज के संहिता पाठ में वैसा नही मिलता, क्योकि सन्धि-नियमो के कारण कई वर्ण कम हो गये है । ब्राह्मण साहित्य का प्राचीन भाग वैदिक ग्रन्थो से सबद्ध ध्वन्यात्मक प्रश्नो का किसी प्रकार विचार करते प्रतीत नही होता । इससे यह निर्णय किया जा सकता है कि ब्राह्मण ग्रन्थो को रचना संहिता पाठ के पूर्णत निर्धारित होने तक नही हुई थी' ( पृ ० ४१ ) यह कथन भी गलत है, क्योकि सहिता पाठ की पूर्णता के निर्धारण के पहिले ही नित्यता के आधार पर उनकी स्थिति सुव्यवस्थित रूप से मानी जाती है । 'ब्राह्मण साहित्य के पूरक ग्रन्थ आरण्यक और उपनिषदों की बात कुछ भिन्न है । इन ग्रन्थो मे कुछ वर्णों के समुदाय के लिये न केवल पारिभाषिक शब्दो का उल्लेख ही मिलता है, अपितु वैदिक पाठ संबन्धी ध्वनि नियमो का भी विस्तृत विवरण है । इन्ही ग्रन्थो मे कतिपय वैदिक भाषाशास्त्रियों का भी पहली बार नाम निर्देश है, जैसे शाकल्य और माण्डूकेय, जो प्रातिशाख्यो में भी प्रमाण समझे जाते हैं । अतः यह कहना होगा कि व्याकरण-सबन्धी प्रश्नो पर आरण्यक और उपनिषद् ऐसे ग्रन्थ है, जो ब्राह्मण ग्रन्थो के युग एव यास्क और प्रातिशाख्य के युग के मध्यवर्ती है । अत एव सहिता-पाठ निश्चय ही इस मध्य सन्धिकाल मे, ईसा पूर्व ६०० वर्ष के लगभग निर्मित हुआ होगा' ( पृ ० ४१ ) यह कथन भी निराधार है, क्योकि वैदिक सिद्धान्त मे मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदात्मक सारा साहित्य अपौरुषेय और अनादि माना जाता है, अतः इसमे कालभेद की कल्पना सर्वथा प्रमाणहीन है । शाकल्य, माण्डुकेय आदि का उल्लेख होने से भी काल का निर्धारण नही हो सकता, उर्वशी, पुरूरवा आदि का नाम ऋक् सहिता में उल्लिखित है, किन्तु यहाँ पर भी ये नाम स्थान, जाति के ही वाचक माने जाते है, अतः ये व्यक्तिविशेष के बोधक नही माने जाते, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । अक्षर संख्या की पूर्ति सन्धि न करके की जा सकती है । जैसे गायत्री मन्त्र के प्रथम पाद के आठ अक्षरो की पूर्ति णकार को इकारान्त मानकर की जाती है । 'पद-पाठ बना चुकने पर ऋषियों ने संहिता-पाठ को सुरक्षित रखने के लिये असाधारण प्रयत्न किया । प्रयत्न का फल यह हुआ कि विश्व साहित्य के इतिहास में कोई भी प्राचीन ग्रन्थ इतना पाठ-शुद्ध सदियों तक सुरक्षित न रहा, जैसा वैदिक संहिता का पाठ है । इस दिशा की ओर पहला उपक्रम यह था कि ऋषियों ने पद पाठ की पद्धति प्रस्तुत की । इसके अनुमार संहिता का प्रत्येक पद
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१०३६ वेदार्थपारिजातः पदपाठरचना जातेति वक्तुं न शक्यते, यतो हि तत्र निश्चितभ्रान्तोना मिथ्याग्रहाणां च निदर्शनानि लभ्यन्ते । तथापि सहितापाठरचनात. किश्चित्कालानन्तरमेव पदपाठरचना जाता स्यात् । ऐतरेयारण्यकरचयित्रा पदपाठस्योल्लेखात् स्थाने स्थाने शाकल्य मुल्लिखतो यास्कात् सवथापि पदपाठमुपजीव्य निर्मितस्य प्रातिशाख्यस्य निर्मातुः शौनकाच्च :' ( ),पदपाठरचयिता शाकल्योऽधि प्राचीन पृ० ४१-४२ इति तदप्यकिश्वित्करम् सहिता पदपाठ क्रमादीनामपि नित्यत्वाभ्युपगमेन त्वत्कल्पनाया निर्मूलत्वात् । पदपाठे भ्रान्तिमिथ्याग्रहकल्पनैव भ्रान्तिमूलिका । पदपाठादिकर्तृत्व तु मन्त्राणामिव तत्सम्प्रदायप्रवर्तकत्वमेव । क्वदिसन्धि पचिल्लौकिकव्याकरणविपरीतसन्धिप्रत्ययादिक तु सहजत्वाल्लतावत्रतादिवद् भूषणयेव । man -' (, यदुक्तम ऋग्वेदमन्त्रणा प्रामाणिकतायाः पदपाठ एव मानदण्डः । येषां मन्त्राणा ६।५ ९ ।१२ १०।१ ९ ०।१०३) पदपाठो नोपलभ्यते, मन्त्राश्च सहितायामुपलभ्यन्ते, ते मन्त्रा न ऋग्वेदीया.' ( पृ० ४२ ) इति, तदपि तुच्छम् अङ्गानामङ्ग नियामकत्वायोगात् । तेषः परिशिष्टत्वेन पदपाठेऽनिवेशात् । येऽन्यशाखीया मन्त्रास्ते परिशिष्टखिलादिशब्देन व्यपदिश्यन्ते । यथा वालखिल्यनामका एकादशमन्त्रा आश्वलायनाना मौलिका इति मैकडानलोऽप्यङ्गीकरोति । पदक्रमपाठी पुरातनौ ऐतरेयारण्यकपरिचितावित्यप्य सावभ्यु गच्छत्येव । यदपि - ( ४२ पृष्ठे ) 'क्रमपाठे प्रत्येक पदस्य द्विरुच्चारणेन पूर्ववतपरवर्तिनो • शृङ्खला सम्पद्यते । जटा- पाठे प्रत्येक पद त्रिरावर्त्यते । मध्यमावृत्तिकाले पदसमूहो व्युत्क्रमेण पठ्यते । घनपाठे च पदाना चतुर्धा वर्तन भवति । एव प्रातिशाख्यस्यापि निर्माण वेदसुरक्षाथमेव जातम् । तत्र पदपाठस्य सहितापाठात्मना विपरिणामेऽपेक्षितपरि सन्धि विश्लेषण कर पृथक् पृथक् रखा गया । पद-पाठ से संहिता के प्राचीन रूप का भी पता चल जाता है । संहिता पाठ के साथ ही साथ पद-पाठ की रचना भी हुई हो, यह नहीं कहा जा सकता; कारण, उसमे कुछ निश्चित भ्रान्तियाँ एवं मिथ्याग्रह के निदर्शन मिलते हैं । तथापि इसमें सन्देह नहीं कि पद-पाठ की रचना संहिता के पाठ से कुछ ही बाद हुई होगी; कारण ऐतरेय आरण्यक का रचयिता पद-पाठ से भलीभाँति परिचित प्रतीत होता है, साथ ही साथ यह भी ध्यान देने योग्य है कि स्थान स्थान पर शाकल्य का उल्लेख करने वाले यास्क से तथा पद-पाठ पर सर्वदा आधारित ऋऋक् प्रातिशाख्य के निर्माता शौनक से, पद-पाठ का रचयिता शाकल्य कही अधिक प्राचीन है ' ( पृ० ४१-४२) यह कथन भी अकिंचित्कर है । संहिता, पद- पाठ, क्रम पाठ प्रभृति भी हमारे मत से नित्य है । अत. इस सम्बन्ध की आपकी सारी कल्पनाएँ निराधार है । पद पाठ मे भ्रान्ति एव मिथ्याग्रह की कल्पना भ्रान्तिपूर्वक ही मानी जायगी । पद- पाठ का कर्तृत्व भी मन्त्रो के समान उस सम्प्रदाय के प्रवर्तक के रूप मे ही माना जा सकता है । कही पर सन्धि न होना और कही पर लौकिक व्याकरण के नियम के विपरीत सन्धि का होना वेद में साम्प्रदायिकता के आधार पर लता की वक्रता के समान भूषण हो माना जायगा । 'निम्नलिखित कारणो से यह लक्षित होता है कि ऋग्वेद के मन्त्रो की प्रामाणिकता के लिये पद-पाठ सही मापदण्ड है । ऋग्वेद मे कुछ मन्त्र ऐसे है ( ६/ ५ ९/ १२, १० १ ९ ० १०३) जिनका पद-पाठ बनाया नही गया, परन्तु वे वे बल संहिता के रूप में हो मिलते है । इससे पता चलता है कि शाकल्य ने उन्हें सचमुच ऋग्वेद के मन्त्र नही माने ' ( पृ० ४२ ) । यह कथन भी सारहीन है, क्योकि अङ्ग अङ्गो का नियामक नही माना जा सकता । ये मन्त्र परिशिष्ट है, अत. इनका पदपाठ मे समावेश नही किया गया । अन्य शाखाओ के मन्त्र परिशिष्ट अथवा खिल नाम से कहे जाते है । जैसे वालखिल्य नामक ग्यारह मन्त्र आश्वलायन शाखा के मौलिक मन्त्र है, इस बात को मैकडानल भी स्वीकार करते है । इस बात को भी वे मानते है कि 'पद और क्रम पाठ पुरातन है और ऐतरेय आरण्यक को इनका ज्ञान था (पृ० ४२) । 'क्रम पाठ में प्रत्येक पद को दुहराते है, जिससे वह पूर्ववर्ती और परवर्ती पदो मे श्रृंखलित हो जाता है!....... जटा- पाठ में प्रत्येक पद की तीन बार आवृत्ति होती है । मध्यम आवृत्ति के समय पद- समूह को व्युत्क्रम से पढ़ा जाता है । घनपाठ में पदो - - की चार बार आवृत्ति होती है । प्रातिशाख्य भी वेद पाठ को सुरक्षित रखने के लिये रचे गये हैं । उनका लक्ष्य प्रधानतः पद पाठ को
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वेवार्थपारिजातः १०३७ ' वर्तननिदश । एवमेवानुक्रमणीपदव्यपदेश्या अनेके परिशिष्टग्रन्थाः प्रतिपाद्यविषयाणा विशिष्टदृष्टिकोण वर्गीकरणे पर्यवस्यन्ति । सहिताया कियन्ति मुक्तानि कियन्तो 1 न्त्रा वर्णाश्च कियन्त इति परिगणयति' ( पृ० ४२-४३ ) इत्यादि, तत्तु वेदस्वरूपग्क्षणोपयोग्येव । अत एव वेदेपु मात्र स्वरादिव्यत्यासेनापि दात्रादि रुक्ता । नस्मान्न केवन्द्र दृष्टार्था वेढा, किन्त्वदृष्टार्था एव, प्राधान्येन स्वर्णग्निहोत्रहो |यो कार्यकारणभावस्य वेदेकसमधिगम्यत्वात् । तत एव दाना मनुष्यबुद्धिपूर्वकत्वमपास्यत, प्रत्यक्षानुमानाविषये ननुष्यबुद्धयनङ्कन्ते• । यदपि ‘शाकलवाष्कलाश्वनायनशाङ्खायन माण्डूकेयादिनाम्नामुल्लेखवरणव्यूहग्रन्थे दृश्यते ॥ तेषा शाकल-. —पाठादय भेद ये वालखिल्यमन्त्रा ११ सख्याका शाकलपाठे खिला उपेयन्ते त आश्वलायनपाठेषु मौलिका उपेयन्ते । शाङ्खायनपाठेऽपि कतिचिन्मन्त्रानपहाय वालखिल्या मन्त्रा मौलिका उपेयन्ते । अत एक पुराणषु तदनन्तरी-यास्वाख्यायिकासु ऋग्वेदस्य तिस्रः शाख ।: शाकल वाष्कल- माण्डूकेना अभ्युपेयन्ते । यदि माण्डूकेपशाखाया. स्वतन्त्र . --रूप स्यात्तथापि तल्लुप्तम् । वाष्कल शाकलपाठयोस्त्वियानेव भेद बाष्कलशाखायामष्टी मुक्तान्यधिनि प्रथम- मण्डले च सूक्तेषु स्थानभेदो दृश्यते । तस्मात् शाकलपाठ एव वास्तविक. पाठ ' ( पृ० ४३-४८ ) इति, तदपि न युक्तम्, 'एकविशतिधा बाह्यच्यम्' इति महाभाष्यवचनात् पुराणादिवचनेभ्य ऋग्वेदीयमन्त्राणा ब्राह्मणाना च भेदस्य प्रामाणिकत्वात्।'. क्वचित् सुक्ताना मन्त्राणा च स्वरूपभेदा क्वचिदाशिकपाठभेदा आमन्निति यास्कमहाभाष्या- द्युद्धरणेन विज्ञायते । क्वचिद् ब्रह्मलोपः क्वचित्संहितालोपः दवचित्तदुपनिषदतिरिक्तमन्त्रसंहिता ब्राह्मणाना च लोपो जातः । वायुपुराणरीत्या लुप्तांशानामपि सूर्यलोकेऽवस्थानमस्ति । तत एव याज्ञवल्क्येन शुक्लयजुर्वेदीयाः संहिता-पाठ में परिणत करने के लिये अपेक्षित परिवर्तनों का निर्देशन है । अन्त मे कतिपय परिशिष्ट ग्रन्थ हैं, जिन्हे अनुक्रमणी कहते हैं । इनका लक्ष्य भी ऋग्वेद मे प्रतिपादित विषयो का विभिन्न दृष्टिकोणो से वर्गीकरण करना है । इसके अतिरिक्त, सहिता में किसने सूक्त, किनने मन्त्र, कितने पद और यहाँ तक कि कितने वर्ण है, इसकी परिगणना भी अनुक्रमणिका में की गई है' (पृ ० ४२-४३) यह सब वेदो के स्वरूप की रक्षा के लिये अत्यन्त उपयोगी है । इसी लिये वेदो में माना और स्वर का व्यत्यास हो जाने पर भी दोष बताया गया है । इसी लिये वेद केवल दृष्ट प्रयोजन के निये हा न होकर अदृष्टार्थक भी है । स्वर्ग और अग्निहोत्र होम का कार्यकारणभाव प्रधानत. क्योकि,केवल वेद से ही जाना जा सकता है । इसीलिये वेदो को मनुष्य की बुद्धि से उत्पन्न रचना नही नाना जाता प्रत्यक्ष औरअनुमान का जो विषय नही है, वहाँ पर मनुष्य को बुद्धि नही पहुँचती । 'चरणव्यूह नामक संग्रह-ग्रन्थ में ऋग्वेद की पाँच शाखाओ का उल्लेख है—शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, पाख्यायन और माण्डूकेय । उनमें और शाकलो मे एकमात्र अन्तर यह है कि आश्वलायनो ने बालखिल्य नामक ११ प्रक्षिप्त मन्त्रो को भी मौलिक माना है । इसी तरह साख्यायनो ने भी कुछ मन्त्रो को छोड बालखिल्यो को मौलिक स्वीकृत किया है । यही कारण है कि पुराणो मे और उनके बाद की आख्यायिकाओ मे ऋग्वेद को तीन ही शाखाएँ मानी गई है । ये हैं --- शाकल, वाष्कल और माण्डूकेय । मान भी लिया जाय कि माण्डुकेय शाखा का कही स्वतन्त्र पाठ हो भी, तो वह प्राचीन भारत के आदि युग में ही सम्भवतः लुप्त जान पडता है 1। वाष्कल और शाकलो की शाखा में इतना ही अन्तर था कि वास्कल शाखा मे आठ सूक्त अधिक है और प्रथम मण्डल के सूतो में स्थान भेद है । अत एव यह सिद्ध है कि शाकलो की सहिता ऋग्वेद का सर्वोत्तम परम्परा पाप्त पाठ ही नहीं, अपितु हमारे मत मे तो बहो एक वास्तविक पाठ कहा जा सकता है ' ( पृ० ४३-४४ ) यह कथन ठीक नही है, 'ऋग्वेद की २१ शाखाए है' इस महाभाष्य के वचन से और अन्य पुराणो के वचन से ऋग्वेदीय शाखाओ और ब्राह्मणो का भेद प्रामाणिक रूप से माना जाता है । यास्क के निरुक्त और पतंजलि के महाभाष्य के प्रमाण पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है कि कही कही सूक्तों और मन्त्रो के स्वरूप में परिवर्तन हो गया है, अथवा आणिक रूप से पाठ भिन्न हो गया है । किमी शाखा का ब्राह्मण भाग लुप्त हो गया है, तो कहीं मन्त्रभाग का लोप हो गया है और कही कही उपनिषद् को छोडकर मन्त्र और ब्राह्मण भाग दोनो लुप्त हो गये हैं । यह
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१०३८ वेदार्थपारिजातः पञ्चदश शाखा उपलब्धा • । यदपि मन्त्रब्राह्मणाना स्वरसम्बन्धे ग्रीकभाषास्वरेण तुलना कृता, तदपि यत्किञ्चित्, वैदिकानामिव तेपामविच्छिन्नपारम्पर्येण हस्तादिस्वरानुपलम्भात् । एवमेव वैदिकछन्दसा ग्रीकलैटिनछन्दसा साम्यवैषम्यविचारोऽपि निरर्थक एव, साधर्म्यवैधर्म्ययोरंशत. सर्वत्र सम्भवात् । अत एव ' ऐतिहासिकदृष्ट्या परवर्ति-साहित्यप्रयुक्त छन्दोविधानानामाधारभूतानि वैदिकानि छन्दासि हिन्द- इरानीयुगस्य लौकिकसंस्कृतयुगस्य लौकिक सस्कृत-प्रचलितछन्द पद्धतेश्च मध्यवर्तीनि' इति, तदपि निर्मूलम्, 'वाचा विरूपनित्यय ' (ऋ० स० ८० ७५१६ ), 'अत एव च नित्यत्वम्' ( ब्रब्र ०० सूसू०० १।३।२१ / ३/ २ ९९ )) इत्यादिप्रमाणैर्वेदिकइत्यादिप्रमाणे वैदिक मन्त्राणामन्त्राणा नित्यत्वावगमाच्छन्दसामपि सुतरा नित्यत्वेन हिन्द-इरानी युगादिकालिकत्वे मानाभावात् । यदपि - ' अवेस्ता ग्रन्थेऽष्टाक्षरैरेकादशाक्षरैर्वा पादा भवन्ति । मात्राणां महत्त्व तत्र नास्ति । ऋग्वेदस्येव अवेस्ताग्रम्थेऽपि चरणैरेव वृत्तानि सम्पद्यन्ते । एतावतेदमायात यद् भारतीया. पारसीकाश्च यदेकत्रः सन् तदान। वृत्त- निर्माणपद्धतिर्वर्णसख्यासिद्धान्ताश्रितासीदिति । लौकिक संस्कृतयुगे तु प्रत्येक पक्ते प्रत्येकमक्षरस्य मात्रानुसारेण छन्दःसु गणना भवति स्म । प्राचीनेतिहासेषु प्रयुक्तश्लोकनामधेयेषु पद्येष्वस्यापवादो दृश्यते । वस्तुतस्त्विद स्वच्छन्द- मेव छन्दः । एव चरणानामाद्योपान्त मात्राबद्धता नियमा. परवर्तिषु छन्द मु सर्वत्र दृश्यन्ते । वैदिकचरणस्यान्ते नियमितस्वरप्रयोगो वृत्तमुच्यते । वृत्तशब्दस्य शाब्दिकोऽर्थः परिवर्त उच्यते । वृत्तशब्दो लॅटिन् ' ह्वरसस्' इत्यनेन समानान्तर.' इति, तदपि यत्किश्चित् वेदतच्छन्दसामनादित्वेन कालविशेषेण सम्बन्धायोगात् । कथञ्चित्साम्य तु सर्वत्र सङ्गच्छत एव । . S --' मैकडानलमहाशय प्रथम सायणभाष्य प्रशशस । यथा सायणभाव्य स्थाने स्थाने प्राचीनविदुषा प्रमाणान्युल्लिखति । अत एव पुरातनकालात् प्रचलितपरम्परानुसारेण ऋग्वेदस्य तात्त्विकोऽर्थो ज्ञातु शक्यते । ठीक है, किन्तु इतना हमें स्मरण रखना चाहिये कि वायुपुराण प्रभृति मे प्रतिपादित पद्धति के अनुसार ये लुप्त अंश भो सूर्यलोक मे अवस्थित रहते है । वही से याज्ञवल्क्य ने शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाओं को प्राप्त किया था । मैकडोनल ने मन्त्र और ब्राह्मणो भारतीय वैदिक विद्वानो को अविच्छिन के स्वर के संबन्ध में ग्रीक भाषा के स्वरो से तुलना की है ( पृ० ४४ ), यह भी गलत है, क्योकि- से के द्वारा अभिव्यक्त किये जाने वाले स्वरो की तरह पाश्र्चात्यो को यह स्वर परम्परा प्राप्त नही हुई है । बसी तरह से वैदिक छन्दो का ग्रीक और लेटिन छन्दों मे साम्य और वैषम्य का विचार करना ( पृ० ४५-०८ ) भी निरर्थक है, क्योकि किसी न किसी रूप में इस तरह का साधर्म्य और वैधर्म्य सर्वत्र मिल सकता है । इसी लिये 'ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर परवर्ती साहित्य में प्रयुक्त छन्दोविधि के आधारभूत ये वैदिक छन्द ही माने जायेंगे, जो कि हिन्द-ईरानी युग और लौकिक संस्कृत में प्रचलित छन्दःपद्धति के मध्यवर्ती है' (पृ० ४६ ) यह कथन भी निर्मूल है, 'वाचा विरूपनित्यया', ' अतएव च नित्यत्वम्' इत्यादि प्रमाणो से वैदिक मन्त्रो की नित्यता की अवगति होती है, तो इनके छन्द भी सुतरां नित्य ही माने जायेंगे, अतः इनको हिन्द-ईरानी युग के आदि काल का मानने में कोई तुक नही है । ' अवेस्ता ग्रन्थ में भी ८ अथवा ११ अक्षरो के पाद मिलते है, जिनमें मात्राओ का कोई महत्व नही होता । अवेस्ता मे भी ॠग्वेद की भाति चरणो से ही वृत्त बनते है । इससे यह विदित होता है कि जब पारसी और भारतीय एक ही राष्ट्र के निवासी थे, उस समय वृत्त निर्माण की पद्धति वर्ण- संख्या के सिद्धान्त पर आधारित थी । लौकिक संस्कृत युग में हर पक्ति का हर अक्षर मात्रा के अनुसार हर छन्द में गिना जाता है । इसका एक मात्र अपवाद पुराने इतिहास में प्रयुक्त 'श्लोक' नामक पद्य में पाया जाता है । वास्तव में यह एक स्वच्छन्द छन्द है । चरण के इस प्रकार आद्योपान्त मात्राबद्ध होने का नियम आगे चलकर सर्वत्र लागू हो गया । वैदिक चरण के अन्त में नियमित स्वर का प्रयोग ' वृत्त' कहलाता है । वृत्त शब्द का शाब्दिक अर्थ ' मोड' है । वृत्त शब्द लैटिन 'ह्वरसस ' के समानान्तर है' ( पृ ० ४६ ) यह सारा कथन भी गलत है, क्योकि वैदिक छन्द तो अनादि हैं, उनका किसी कालविशेष से सम्बन्ध नहीं जोडा जा सकता । कुछ न कुछ समानताएँ तो सर्वत्र मिल ही सकती है ।
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वेदार्थारिजात १०३६ एतदधिकमामन्त्रघन्वेषण मृग्वेदार्थज्ञानाय नापेक्षितमासीत् । अक्सफोर्डविश्वविद्यालयीयसत्य प्रथमाचार्येण हेनरी-बिलननेन १८५० ईसवीयवर्षे ऋग्वेदानुवादारम्भ पूर्वोक्तविचारो व्यञ्जित । तदनगर दिविज्ञान-. - सत्थापकेन स्वर्गीयाचार्य राथ महाभयेन तद्भिन एवं विचार प्रकटिन । तद्रीत्या तिहित्य पूवतम्य सायणस्य यास्कस्य बानुसारेण ज्ञातु न योग्य । चतं पिभिन्थिनिभिसन्धाय तुलाति रचितानि तज्ज्ञानमेवास्माक लक्ष्य युक्तम्, भाग्यकारप इत्यनुसरणेन न तत्पम्भवि । भाष्यकारा यद्यपि वेदोत्तरकालियाज्ञिक- दार्शनिकविषय विशेषज्ञास्तात्कालिकप्रचलितविचाराणा कर्मकाण्डस्य चाभिजत्वाद् वैदिकसाहित्यस्यार्थज्ञाने सहायकास्तथापि तेषा भाग्य सूक्तनिर्मातॄण समयात् प्रसुतपारम्पर्यणाविच्छिन्नवाराया निर्वाह न करोति, यतस्तेयां भाष्योपक्रमस्तदानी जातो या सूक्तानामर्थज्ञान पूर्णतयाऽसम्भव जातम । वस्तुतस्तदानी काचित्परम्परंव नासीत् । .तदैव भाष्योपक्रमप्रमङ्गः सञ्जातो यदा सूक्ताना यथावदर्थो दुर्योध सवृत्तः । तदैवोपस्थितकाठिन्य समाध नार्थ भाष्यकारैः प्रयतितम् । तैर्वेदिकभाषा प्राचीनसमयात् प्रचलितधार्मिकविश्वोत्पत्त्यादिसम्बन्धि विचाराश्च स्वसमय- प्रचलित विचारानुसारेणावगन्तु चेष्टा कृता, वैदिकमाहित्यस्य यथार्थमर्थ त्रोटयित्वा मोटयित्वा च भाष्य कृतम् । यास्केन सप्तदशाचार्याणा विदुषा नामानि निरुक्ने प्रोक्तानि येषा वेदार्थसम्बन्धे गम्भीरमनभेदा आसन् । उदाहरणार्थ केनचिदाचार्येण नासत्याविति पदस्य सत्यं मिथ्या नेत्यर्थः कृतः । अन्येन सत्यनेतेत्यर्थ. कृतः । यास्करीत्या नासिकासमुद्भूत इत्यर्थं । तस्माद् मन्त्ररचयितॄणा भाष्यकाराणा च मध्ये महानपूरणीयः खातो विद्यते । यास्क-पूर्ववर्तिना कौत्सेन तु निरुक्तविज्ञान व्यर्थमेव यतो वैदिकसूक्तानि निरुक्तोक्तप्रयोगाश्च दुर्बोधा निरर्थकाः परस्पर- मैकडानल महाशय पहले सायण के भाष्य की प्रशंसा करते है । जैसे कि–' उनके भाष्य में स्थान स्थान पर प्राचीन विद्वानो के प्रमाणो का उल्लेख मिलता है । अत एव यह माना गया कि पुरातन काल से प्रचलित परम्परा के अनुसार ऋग्वेद का सही अर्थ उक्त भाष्य के द्वारा जाना जा सकता है । इससे अधिक सामग्री को देखना मूल ग्रन्थ को समझने के लिये आवश्यक प्रतीत न हुआ । आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रथम आचार्य हेनरी विल्सन ने सन् १८५० ई० मे ऋग्वेद का अनुवाद प्रारम्भ किया, जिसमे उन्होने पूर्वोक्त मत प्रकट किया है । इसके बाद वैदिक भाषा-विज्ञान के संस्थापक स्वर्गीय आचार्य रॉय इस अभिप्राय से सहमत न थे और उन्होने अपने विचार भिन्न रूप से प्रकट किये है । उनका अभिप्राय है कि वैदिक साहित्य का अर्थ आज से लगभग १२ शताब्दी पूर्व के सायण एवं यास्क के अनुसार समझना उचित न होगा, परन्तु प्राचीन ऋषियो ने जिस अर्थ को लेकर सूक्तो की रचना की है, उसी को समझना हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिये । इस लक्ष्य की सिद्धि केवल भाष्यकारो की पद्धति के अनुसरण करने से सभव नहीं । कारण, ये भाष्यकार वेदोत्तर काल के याज्ञिक एवं दार्शनिक विषयो के विशेषज्ञ और तत्कालीन प्रचलित विचार एवं कर्मकाण्ड के अभिज्ञ होने से वैदिक साहित्य के अर्थबोध करने में विशेष सहायक यद्यपि हो सकते है, तथापि उनका भाष्य सूक्तो के निर्माताओ के समय से प्रसूत परम्परा की अविच्छिन्न धारा का निर्वाह नही करता, क्योकि उनके भाष्य का उपक्रम उस समय हुआ, जब सूक्तो का अर्थ पूर्णत समझना असभव हो चुका था । सच पूछा जाय तो उस समय कोई परम्परा हो न थी, भाष्य करने का प्रसंग तब ही आया, जब सूक्तों का यथार्थ अर्थ दुर्बोध हो गया था । अत एव भाष्यकारो ने उपस्थित कठिनाइयो के समाधान के लिये यत्न किया और उन्होने वैदिक भाषा को तथा प्राचीन समय मे प्रचलित धार्मिक एवं विश्व की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रकट किये हुए विचारो को अपने अपने समय में प्रचलित विचारों के अनुसार समझने की चेष्टा कर वैदिक साहित्य के यथार्थ अर्थ को तोड मोड कर रख दिया । यास्क ने लगभग १७ ऐसे प्राचीन विद्वानो के नाम दिये हैं, जिनका वेदार्थ के संबन्ध में गंभीर मतभेद है । उदाहरणार्थ एक आचार्य 'नासत्यौ' इस पद का अर्थ 'सत्य, मिथ्या नहीं, और दूसरा आचार्य ' सत्य के नेता' - ऐसा करते है, परन्तु स्वयं यास्क का मत है कि उक्त पद का अर्थ है -' नासिका से उद्भूत । मन्त्रो के रचयिता और उनके प्रारंभिक भाष्यकारो मे इतनी बड़ी खाई है कि यास्क के पूर्ववर्ती कौत्स ने तो इतना तक कह डाला कि वैदिक निरुक्त एक व्यर्थ का विज्ञान है, क्योकि वैदिक सूक्त और उनमें
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ववार्थपारिजातः १०४० विरुद्धाश्चेति कथितम् । यास्कस्तदुत्तरणे नैष स्थाणोरपरावो यदेनमन्धो न पश्यति इत्येव वक्ति । यास्केन कति-चित्सूक्तानामेव निर्ववन कृतम्, तदपि शाब्दिकव्युत्पत्त्यबीनमेव । क्वचित्वेकस्यैव शब्दस्य वैकल्पिका अनेकेऽर्था प्रदर्शिताः । एतेन तत्पथप्रदर्शनाय प्रारम्भिक आधारो नोपलब्ध:, तेन निजकल्पनयैवार्था. सामञ्जस्य नीताः । सूक्तनिर्मातॄणा मन स्वेकस्मादधिका अर्थ आसन्निति न कोऽपि मस्यते' ( पृ० ४६-५१ ) इति, तदपि वेदिकसस्कार- वैधुर्यमूलकमेव, असमन्वयात् । वैदिकास्तु ग्रन्थाना तात्पर्य समन्वयेनावधारयन्ति । पाश्चात्त्यास्त्वेकस्मिन्नपि ग्रन्थे वैलक्षण्यं वैषम्य चावलोक्य कर्तृभेदमनुमिन्वन्ति । व्यासनिर्मित भारताभति तद्वचनसिद्धमपि प्रत्यक्षं वाधित्वाऽ- नुमानात्तत्र वैशम्पायनसूतादिकर्तृकत्व कल्पयन्ति । वाल्मीकिनिमितमपि वाल्मीकीय रामायण रामायणसिद्धमप्य पलप्य तत्र रामायणमादिरामायणं च कल्पयन्ति । पारम्पर्यप्राप्तमपि शतपथ सकर्तृकमनेककर्तृक च कल्पयन्ति । तथैवाना दिपारम्पर्याविच्छेदेन प्राप्तामपि ऋग्वेदसहिता विभिन्नकालिकसूक्तमण्डलादिसमवेतामूरीकुर्वन्ति । साम्प्रतिकन्यायवादिनोऽपि समन्वयेनंव सविधानानां तदनुगुणसाम्प्रतिकनियमाना च तात्पर्यमध्यवस्यन्ति । वैदिकास्तु प्रत्यक्ष विरुद्धमनुमानमेवासमानयोगक्षेम निगदन्ति । मन्त्रा ब्राह्मणानि च तद्दृष्ट्या वेदा एव । व्याकरण- निरुक्तकल्पादीनि वेदाङ्गानि तानि च प्रतिकल्प तत्तन्महर्षिभिः प्रादुर्भावितान्यप्यनादीन्येव । मन्त्रब्राह्मणानाम- नादित्व नित्यत्वं तु मन्त्रब्राह्मणव्यासजैमिनिकणादगोतमपतञ्जलिवात्स्यायनशवरशङ्करादिवचनसिद्धम् । तस्मात् सूक्तमन्त्राणामर्थज्ञानपारम्पर्यं लुप्तमासीदिति कथन सूर्खजनप्रतारणमेव । मन्त्राणामनेकत्र ब्राह्मणानि क्वचित्तात्पर्यशः क्वचिच्छन्दशोऽर्थं वर्णयन्ति । कल्पसूत्राणि च ब्राह्मणानुसारेणैव विनियोजयन्ति । तत्र जैमिनिः पूर्वकाण्डस्य समस्तमन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्य मीमासा विदधाति, वादरायणश्चोत्तर- काण्डस्य मन्त्रब्राह्मणात्मकरयैव वेदस्य । यास्कस्तु मन्त्राणा विषमस्थलानि पारा पर्येणैव व्याख्याति । मीमासा- बताये गये प्रयोग दुर्बोध, निरर्थक एवं परस्पर विरोधी है । इस आलोचना के उत्तर मे यास्क तो इतना ही कहते है कि लकडी का क्या दोष, यदि उसे अभ्धा न देख सके । यास्क ने ऋग्वेद के कुछ हो सूक्तो का निर्वचन किया है, मगर जितना भी कुछ किया है, वहाँ अर्थ-ग्रहण के लिये शाब्दिक व्युत्पत्ति पर ही वह अधिकाश निर्भर रहे है । कई स्थान पर तो एक ही शब्द के उन्होने दो-चार वैकल्पिक अर्थ भी बताये है । इससे यह प्रमाणित होता है कि उन्हें पथप्रदर्शन मे कोई प्रारंभिक आधार न मिला और उन्होंने निज की कल्पना से ही अर्थ बैठाया है । कारण, यह कोई भी न मानेगा कि सूक्तकारो के मन मे कही एक से अधिक अर्थ रहा हो ( पू० ४ ९-५१ ) । यह सारा कथन वैदिक संस्कारो के न होने के कारण है, क्योकि इनमें परस्पर समन्वय का अभाव है । वैदिक विद्वान् ग्रन्थो का तात्पर्य समन्वय के आधार पर निर्धारित करते है । इसके विपरीत पाश्चात्य विद्वान् एक ग्रन्थ मे भी विलक्षणता और वैषम्य के मिलने पर उन उन अंशों के कर्ताओं का भेद मानने लगते है । महाभारत व्यास को कृति है, उस ग्रन्थ में इसका प्रत्यक्ष उल्लेख मिलने पर भी उसको न मान कर अनुमान के आधार पर वैशम्पायन, सूत प्रभृति को उसके कर्ता के रूप मे कल्पित करते हैं । वाल्मीकि की रचना वाल्मीकि रामायण को रामायण से सिद्ध होने पर भी उसका अपलाप कर उसमें रामायण, आदिरामायण आदि की कल्पना करते है । परम्परा से प्राप्त शतस्थ ब्राह्मण को किसी एक ही रचना नही, अनेक व्यक्तियों की रचना मानते है । इसी तरह से अविच्छिन्न अनादि परम्परा से प्राप्त ॠग्वेद संहिता को विभिन्न कालो के रचित सूक्त, मण्डलो का समुदाय मात्र मानते है । आज कल के विधिवेत्तागण समन्वय के आधार पर हो सविधान की और तदनुवर्ती नवीन नियमो की व्याख्या करते है । वैदिक विद्वान् प्रत्यक्ष विरुद्ध अनुमान को कभी प्रमाण नही मानते । उनकी दृष्टि में मन्त्र और ब्राह्मण दोनो वेद ही है । व्याकरण, निरुक्त, कल्प प्रभृति वेदाग कहे जाते हैं । प्रत्येक कल्प में उन उन महर्षियो के द्वारा प्रादुर्भूत होने से ये भी अनादि है । मन्त्र और ब्राह्मण भाग की अनादिता और नित्यता मन्त्र, ब्राह्मण, व्यास, जैमिनि, कणाद, गोतम, पतंजलि, वात्स्यायन, शबर, शकर प्रभूति के प्रमाण से सिद्ध है । अतः ऋग्वेदादि के सूक्तों और मन्त्रो के अर्थज्ञान की परम्परा लुप्त हो गई थी, यह कथन सर्वथा भोले आदमियों को ठगने वाला है । अनेक स्थलो में ब्राह्मण ग्रन्थ मन्त्रों के अर्थ को उनका तात्पर्य समझाते हुए अथवा शब्दशः उनका अर्थ करके समझाते हैं और कल्पसूत्र ब्राह्मणों की इसी व्याख्या के अनुसार मन्त्रों का विनियोग बताते है ।