वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1261–1270

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1261–1270

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वेदार्थपारिजातः २१५ ९ प्रयुङ्क्त च ससृष्टार्थविवक्षया । तथैव बुद्धयते श्रोता तथैव च तटस्थित || ' ( न्या० म०, पृ० ३६६ ) । सेयमेव वाक्यस्य | वाक्यार्थे व्युत्पत्ति सत्यार्थमभिदधति पदानि वाक्यम् । एकार्थपदममहो वा वाक्यमिति । एव हि न सहत्यार्थ- मभिदध्यु पदानि, यद्येकस्यैव पदस्य व्यापारः,1 यथा बाह्य नि करणानि काष्ठादीनि पाके व्याप्रियन्ते, यथाशिविकाया उद्यन्तारः सर्वे शिविकामुद्यच्छन्ति यथा त्रयोऽपि ग्रावाण उखा बिभ्रति तथा सर्वाण्येव पदानि वाक्यार्थमवबोधयन्ति । तदिदमन्विता- भिधानमन्यानन्वितनिष्कृष्टस्वार्थपर्यवसायित्वे हि सति न सर्वेषा वाक्यार्थव्यापार स्यात् । नन्ववमेकैकस्य कृत्स्नकारित्वे सत्येकस्मादेव कृत्स्नसिद्धौ पदान्तरोच्चारणं व्यर्थं स्यादिति तन्न, पदान्तर विनैवैकस्मात् कृत्स्नकारित्वसम्पत्त्यभावात् । न च तर्ह्येक कृत्स्नकारीति चेन्मैवम् एकैकस्य फलपर्यन्तव्यापारपतितत्वात् । एकैकस्मिन् सति फलपर्यन्तो व्यापारो निर्वर्तते, एकैकेन विना न निर्वर्तत इत्येवमेकैक कृत्स्नकारि भवति । तत्राभिहितान्वयवादे वर्णाना पदार्थप्रतिपत्तौ चरितार्थत्वान्न वाक्यार्थप्रतिपत्तिहेतुत्वम् । पदार्थास्त्वपरिम्लान- सामर्थ्या वाक्यार्थबुद्धिविधातारः । वर्णानामर्थापत्या कार्येषु शक्तयः कल्प्यन्ते । पदार्थ बुद्धेरन्यथाऽनुपपन्नत्वाद् वर्णाना तत्प्रतिपादने शक्तिरवगम्यते । वाक्यार्थप्रतीतेरन्यथाऽनुपन्नत्वान्न तत्र तेषा शक्तिरभ्युपगन्तव्या । वर्णाना वाक्यार्थप्रतिपत्तिजनकत्वेऽय विकल्प स्फुरति किमेकमेव सस्कारमादधाना वर्णा पदार्थच वाक्यार्थं च ?,, बोधयन्ति भिन्न वा नाद्य पक्षः एकया सस्कृत्या कार्यद्वयानुपपत्तेः । नान्त्यः पूर्वसस्कारादन्यस्य,सस्कारस्या- नुपलम्भात् । वाक्यार्थप्रतीतेरन्यथापि सम्भवान्न नानासस्कारकल्पनाबीजमुपलभ्यते । किञ्च पदेषु पूर्ववर्णेषु नातिदूरमतिक्रान्तेषु बुद्धयोपसहर्तुं शक्येषु घटमानमन्त्यवर्णवेलायामनुसन्धानं सभवति, वाक्येषु तु पुनरतिचिरतर- अर्थावबोधन मे जो पद प्रयुक्त होते है वे वाक्य सदृशही होते है । वक्ता सबद्ध अर्थ की विवक्षा से वाक्य का प्रयोग करता है और श्रोता या तटस्थ वैसा ही अर्थ समझते है | ( पृ० ३६६ ) यही वाक्य का वाक्यार्थबोध मे नियामिका व्युत्पत्ति है । सम्मिलित होकर अर्थवाची पद ही वाक्य है । अथवा एकार्थकपद समूह ही वाक्य है । यदि एक पद का व्यापार ही माना जाता तो मिलकर अर्थावबोधक पद कैसे होत? जैमे बाहरी साधन काष्ठ भोजन पकाने के काम आते हैं, जैसे पालकी उठाने वाले सयुक्त रूप से मिलकर पालकी उठाते ढोते है, जैसे तीन-चार पत्थर मिलकर बटलोई धारण करते है, वैसे ही सभी पद मिलकर अर्थज्ञान कराते है । तो यदि अन्विताभिधानवाद के आधार पर दूसरे पदो से अन्वय रहित शुद्धस्वार्थवाची होते तो सबको वाक्यार्थबोध नही हो सकता । फिर आशङ्का करते है कि यदि प्रत्येक पद सम्पूर्ण कार्य को करने लगे तो एक से हो पूर्ण अर्थ उक्त हो जायगा दूसरे पदो का उच्चारण व्यर्थ हो जायगा, ऐसी बात ठीक नही है क्योकि दूसरे पदो के बिना एक पद ही सम्पूर्ण अर्थ को कहे ऐसा व्यवहार नही है । एक पद सम्पूर्ण अर्थ का बोधक नही हो सकता । यदि एक पूरा कार्यकारी नही है तो फिर वह व्यर्थ है ऐसा भी नही कह सकते । क्योकि जब तक कार्य का फल नही प्राप्त हो जाता तब तक एक-एक पद का महत्व है ही । प्रत्येक के रहने से ही फल पर्यन्त कार्य व्यापार निष्पन्न होता है, एक-एक करके यदि वं उपस्थित न रहे तो कार्य नही हो पाता अत एक को कृत्स्नकार्यकारित्व मान्य ही है । हा, अभिहितान्वयवाद मे वर्णो को पदार्थ बोधन मे चरितार्थता हो जाने के कारण वाक्यार्थज्ञान जनकता नही मानी जा सकती । पदार्थों की शक्ति कभी क्षोण या म्लान नही होती और वे हो वाक्यार्थज्ञानजनक है । अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा वर्णों की कार्यो मे शक्ति कल्पित की गयी है । दूसरे किसी उपाय से पदार्थज्ञान उपपन्न नही होने से वर्णों का ही पदार्थावबोध में शक्ति ज्ञान होती है । वाक्यार्थज्ञान दूसरे किसी उपाय से युक्तिसंगत नही होता अत वर्णो को छोडकर वाक्यों में कोई शक्ति नही मानी जा सकती । वर्ण हो वाक्यार्थबोधजनक है ऐसा मानने पर एक विकल्प उठ खडा होता है कि क्या एक ही सस्कार रखकर वर्ण पदार्थ और वाक्यार्थ दोनो का बोध कराते है या भिन्न-भिन्न सरकार रखते है? पहला पक्ष सगत नही, क्योकि एक सस्कार से दो कार्य नही हो सकते । दूसरा भी उचित नही, पूर्व संस्कार के अतिरिक्त दूसरा प्राप्त नही है । वाक्यार्थज्ञान दूसरे उपायो से भी हो सकता है अत अनेक सस्कार का कोई कारण नही । और भी पद या वर्ण जो बहुत पहले के कहे गये हो और बुद्धि द्वारा जिनका बोध शक्य हो उनका अन्तिमवर्णोच्चारण के समय होने वाला ऐक्य ज्ञानमभव नही है, वाक्य जो बहुत पहले के उक्त या उच्चरित है उनका भी ऐक्यज्ञान अत्यन्त क्लिष्ट तथा

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२१६० वेदार्थपारिजातः तिरोहिताक्षरपरम्परानुसन्धानमतिक्लिष्टमदृष्टपूर्व मिति दुर्घटमेव । व्यवहितपदोच्चारणे तु दृश्यते वाक्यार्थप्रतीतिर्यत्र पूर्ववर्णानु- सन्धानगन्धोऽपि न भवति । तस्मान्न वर्णाना वाक्यबुद्धिहेतुत्वमिति । किञ्च, पदार्थ वाक्यार्थ च प्रतिपादयन्तो वर्णा युगपत्प्रतिपादयेयुः क्रमेण वा? नाद्य पक्ष, क्षोदक्षम, सकृदुच्चरिताना वर्णाना युगपदुभयकारणत्वानुपपत्ते, अशक्यत्वात् । नान्त्य, विकल्पानुपपत्ते । पूर्व वाक्यार्थप्रतिपादन पदार्थप्रतिपादन वा? नाद्यः, अनवगतपदार्थस्य वाक्यार्थप्रत्ययादर्शनात् । नान्त्य, तथात्वे पदार्थप्रत्ययादेव वाक्यार्थबुद्धे. सिद्धत्वात् ॥ पुनर्व्यापारान्तरे श्रमवैयर्थ्यात् 1। तस्माद् पढार्थप्रतिपादनपर्यवसितसामर्थ्यानि पदानि पदार्थेभ्यस्तु वाक्यार्थप्रत्ययः । किञ्चान्वयव्यतिरेकाभ्या- मेव स्पष्ट पदार्थपूर्वको वाक्यार्थप्रत्ययो ज्ञायते । यो हि प्रमादाच्छ्रतेष्वपि पदेषु पदार्थान्नागवच्छति स नावगच्छत्येव वाक्यार्थम् । यस्तु अश्रुतेष्वपि पदेषु प्रमाणान्तरत पदार्थान् जानीयात् स वाक्यार्थमपि जानत्येव । यथोक्तम्--' पश्यतः श्वेतिमारूप द्वेषा-. ( ) - शब्द च शृण्वतः । खुरविक्षेपशब्द च श्वेतोऽश्वो धावतीति धी ॥ श्लो० वा० पृ० ६६७ । तदेषा वाक्यार्थबुद्धि पदार्थ प्रतीति न व्यभिचरति, व्यभिचरति तु पदप्रतीतिमिति न पदप्रतीतिकार्या वाक्यार्थबुद्धि । यदुक्तम्-- प्रत्येक व्यभिचारात्समुदि- तानामसाधारण्यान्न पदार्थाना वाक्यार्थावगतिहेतुत्वम्' इति तदप्ययुक्तम्, प्रत्येक गमकत्वाभावे समुदितानामसाधारण्येऽपि वाक्यार्थावगतिहेतुत्वे बाधाभावात् । न च पदार्था लिङ्गवत्सम्बन्धग्रहणमपेक्षमाणा अवबोधकाः, येनासाधारण्यान्नावकल्पेत, किन्त्वगृहीतसम्बन्धाप्य ( काङ्क्षासन्निधियोग्यतापर्यालोचनया परस्पर ससृज्यन्ते । स एव वाक्यार्थः ससृष्टः पदार्थसमुदायः समुदायविशिष्टो वा ससर्गो वाक्यार्थ । न चैव वाक्यार्थप्रतीतेरशाब्दत्वापत्तिरिति वाच्यम्, शब्दावगतिमूलत्वेन तस्याः शाब्दत्वानपायात् । अदृष्टपूर्व ही है अत वह दुर्घट ही है । जहाँ पूर्व वर्ण की एक्ता का लेशमात्र भी भान नही ऐसे व्यवधान से कहे गये पदो के द्वारा भी वाक्यार्थज्ञान हो जाता है ऐसी बात पहले भी कही जा चुकी है । अत प्रतिफलित है कि वर्णवाक्यार्थबोध के जनक नही है । और भी सुनिए, पदार्थ या वाक्यार्थ को कहने वाले वर्ण एक काल मे कहते है या क्रम से? पहला पक्ष विचारसगत नही, क्योकि एक बार उच्चरित वर्णों को एक ही समय में दोनो की कारणता नही हो सकती क्यो कि उनका सामर्थ्य नही है । दूसरा भी संगत नही, क्योकि उनमे विकल्प की सभावना ही नही है । पहले वाक्यार्थ कहा जाता है या पदार्थ? पहला कल्प संभव नही, जिस वाक्य के पदो का ही ज्ञान न हो उसका अर्थज्ञान देखा नही जाता । दूसरा कल्प भी मान्य नही, ऐसा मानने पर पदार्थज्ञान से ही वाक्यार्थज्ञान सिद्ध हो जायगा फिर अन्य व्यापार मानने मे केवल व्यर्थश्रम ही हाथ लगेगा । अत पदार्थ प्रतिपादन में समाप्त शक्तिवाले पद और पदों के अर्थ से वाक्यार्थज्ञान होता है । और अन्वय व्यतिरेक से यह बात साफ हैं कि पदार्थज्ञान पूर्वक वाक्यार्थज्ञान सम्पन्न होता है । जो व्यक्ति प्रमादवश सुने गये या जाने गये पदो के अर्थ नही समझता वह वाक्य का अर्थ भी नही जानता । जो न सुने गये पदों के भी दूसरे प्रमाणों से पदार्थ जान सकेगा वह वाक्यार्थ भो जानेगा ही । जैसा श्लोक वार्तिककार ने कहा है- सफेद रूप देखने से और हिनहिनाहट के शब्द सुनने से तथा खुरो के फेकने के शब्द भी सुनने से सफेद घोडा दौडता है यह ज्ञान होता है । ( १० ६६७ ) । तो इस प्रकार वाक्यार्थज्ञान पदार्थज्ञान को नही लाघ सकता । हाँ पदज्ञान को उपेक्षित करता है । अत. पदज्ञानजन्य वाक्यार्थज्ञान नही हैं । जो कोई कहते हैं कि- "प्रत्येक की उपेक्षा से उत्पन्न असाधारण पदार्थो से वाक्यार्थज्ञान नहीं होता" यह कथन युक्तिसंगत नही है, प्रत्येक मे प्रामाण्य न होने पर भी समुत्पन्न पदार्थ यद्यपि असाधारणता रखते है तौ भी उनके वाक्यार्थज्ञानजनकता से कोई बाधा नही है । पदार्थ लिङ्गज्ञान की तरह सम्बन्धज्ञान की अपेक्षा रखते हुए बोधक होते है ऐसी बात नही, असाधारणता के कारण उनकी कल्पना न की जाय यह उचित नहीं है । अपितु सम्बन्धज्ञान न होने पर भी आकाक्षा सन्निधि योग्यता आदि के ज्ञान से सम्बद्ध पदार्थ समूह या समूहयुक्त सम्बन्ध वाक्यार्थ होता है । यदि कहे कि इस प्रकार वाक्यार्थज्ञान वाक्यार्थज्ञान ही नही कहलायेगा, उत्तर है कि चूंकि वह शब्द ज्ञानमूलक है अतः उसे पृथक मानना संभव नहीं है ।

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वेदार्थपारिजातः २१६१ अथाभिहितान्वयवादप्रकार -पदानि स्व स्वमर्थमभिधाय निवृत्तिव्यापाराणि अथेदानीमवगता पदार्था एव वाक्यार्थ- मवगमयन्ति । अन्ये तु वाक्यादेव पदार्थावगतिर्न पदार्थेभ्य । अत एव वाक्यार्थप्रसिद्धिर्न पदार्थार्थम् । यथा काल्पनिकं वर्णसमू- हात्मकं पदं पदार्थप्रतिपत्तिं जनयति तथैव काल्पनिकपदममूहात्मक वाक्य वाक्यार्थप्रतिपत्तिमादधात्येव । ननु पदसमूहात्मक वाक्यं नास्त्येव, पदान्येव तु वाक्यम्, पदाना च स्वार्थे चरितार्थत्वान्न वाक्यार्थे सामर्थ्यमिति चेन्न, पदार्थानामपि स्वप्रतिपत्ती चरितार्थत्वाविशेषात् । ननु पदानि स्वप्रतिपत्तौ चरितार्थान्यपि पदार्थप्रतिपत्तिमादधति, तान्येव क्थं वाक्यार्थमाधास्यन्ति? पदार्थास्तु स्वावगतेरूर्ध्व न क्वचित्परत्र चरितार्था इति वाक्यार्थबुद्धिमाधास्यन्तीति चेदत्रोच्यते, अन्त्यपदस्यान्यत्र चरितार्थ- त्वाभावात् । अन्त्यपदमेव पूर्वपदार्थस्मरणोपकृत वाक्यमुच्यते । तदर्थश्च पूर्वपदार्थविशिष्टो वाक्यार्थ । तस्माद् वाक्यादेव वाक्यार्थप्रत्यय. । कार्यभेदात्कारणभेदानुमानेन एकोऽप्यतीन्द्रियः सस्कार कार्यात् कल्प्यते, यथा तथैव कार्यानैक्यादनेके सस्काराः कल्पयितु शक्यन्त एव । यदुक्तम्- चिरतिरोहितवर्णप्रबन्धानुसन्धान दुर्घटम्' इति, तदपि न किञ्चित् कयाचित्कल्पनया पदबुद्धौ वर्णानामिव वाक्यबुद्धौ पदानामप्युपा रोहसम्भवात् । अन्विताभिधानवादिमते---व्यवहित निरवयवो वाक्यवाक्यार्थी इति, तदपि न, सघातकार्यवत् स्वकार्यस्यपि दर्शनात् । अथ कि सघातकार्य किञ्च स्वकार्यमिति चेच्छृणु, वाक्यार्थप्रतिपत्तिः सङ्घातकार्यं स्व कार्य तु पदार्थप्रतिपत्ति । यथा पाकः सङ्घातकार्यम्, स्वकार्य च ज्वलनभरणादि काष्ठस्थाल्यादीनाम् । ननु यदि पदाना पदार्थप्रतिपादन स्वकार्यं शुद्धस्तर्हि पदस्यार्थः । न शुद्धः पदार्थः संघातकार्य एव प्रयोगात् । तत्र प्रयुक्तानामप्येषा स्वकार्य न नावगम्यते । अत एव न निरवयव अब अभिहितान्वयवाद का विचार प्रारम्भ है- पद अपना अपना अर्थ कहकर विरत हो जाते है और तदनन्तर ज्ञात पदार्थ ही वाक्यार्थ का ज्ञान कराते हैं । दूसरे विचारक वावयज्ञान से पदार्थज्ञान मानते है, अत एव वाक्यार्थज्ञान पदार्थ ज्ञान के लिए नही मानते । जैसे काल्पनिक वर्णसमूहात्मक पद पदार्थ ज्ञान करा देता है, वैसे ही काल्पनिक पदसमूहात्मकवाक्य वाक्यार्थज्ञान करा देगा ही । यदि कहे कि पदसमूहात्मक वाक्य नही होता, पद ही वाक्य है, पद अपने अर्थ मे सफल है अत वाक्य के अर्थजनन मे समर्थ नही रहे, यह कथन ठीक नही, क्योकि पद भी अपने अर्थज्ञान कराने में सफल नही है । अत जिसका अर्थ स्वय अस्पष्ट है वह दूसरे का सहायक कैसे बन सकता है । यदि कहे कि पद स्वज्ञान के लिये चरितार्थ ( सफल ) होते हुए भी पदार्थज्ञान कराते है फिर वे ही कैसे वाक्यार्थज्ञान करा सकेगे? उत्तर - पदार्थ स्वीयबोध करा देने के पश्चात् फिर अन्यत्र कही चरितार्थ नही है तो वे वाक्यार्थज्ञान करायेगे ही इसपर विचार करना है - अन्त्य ( अन्तिम ) पद तो अन्यत्र कही चरितार्थ नही है | अन्त्य पद ही पूर्व पदार्थ का स्मरण कराता हुआ वाक्य कहा जाता है । अत इसका अर्थ करना होना या जानना ही पूर्व पदार्थ के साथ वाक्यार्थ कहा जायेगा । इस तरह वाक्य से हा वाक्यार्थज्ञान होता है यह अभ्युपगम स्थिर है । कार्य के भेद से कारण का भेद होता है इस अनुमान द्वारा एक भी अतीन्द्रिय सस्कार कार्य को देखकर जैसे कल्पित कर लिया जाता है वैसे ही कार्य की अनेकता से सस्कारो की अनेकता कल्पित की जा सकती है । 'जो लोग यह कहते थे कि देर के कहे गये वर्णसमूहो का स्मरण या अनुसन्धान दुर्घट है' यह कथन अनर्थक है क्योंकि जैसे पदज्ञान करने हेतु वर्णों की कल्पना की जाती है वैसे वाक्यबोध के लिये पदो की कल्पना कोई दुरारूढ नही है । अन्विताभिधानवादी के मत का निरूपण-कुछ वादी आचार्यों का मत था कि ' वाक्य और वाक्यार्थ व्यवहित और निरवयव होते है इनमे दोनो दोनो गुणधर्म से युक्त है या क्रम से उभय गुण रहते है । इनकी पृथक् मोमासा नही मिलती, यह मत भी ठीक नही । सामूहिक कार्य की तरह वैयक्तिक कार्य भी देखा जाता है । इनमे सामूहिक कार्य वाक्यार्थ ज्ञान है और पदार्थ ज्ञान व्यक्तिगत कार्य है । जैसे भोजन बनाना संघात कार्य है और लकडी जला देना बटलोई चूल्हे पर चढा देना वैयक्तिक कार्य है । अब आशंका करते है कि यदि पदो का पदार्थकथन वैयक्तिक कार्य है तो पद का अर्थ शुद्ध अर्थात् अकेला है | उत्तर दिया कि नही, संघात कार्य मे प्रयोग देखने से पद का अर्थ केवल नहीं होता | संघात कार्य मे प्रयोग के कारण पदो का वैयक्तिक कार्य नही जान पडता । अत वाक्य पदोका समूह ज्ञात होता है निरवयव नही है । व्यक्तिगत कार्य की प्रतिज्ञा रहने पर भी पद मिलकर सामूहिक काम करते दिखाई पड़ते है संघबद्ध होकर भी वे पृथक कोई कार्य करते है ऐसी प्रतीति नही है । २७१

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वेदार्थपारिजातः २१६२ वाक्यमिष्यते 1। स्वकार्यप्रतिज्ञानात् सहतास्ते सङ्घातकार्यं कुर्वन्तो दृश्यन्ते न सङ्घात एव । सहतेष्वपि कुर्वत्सु स्वकार्य पृथगुप- लभ्यते । यथा शकटाङ्गानामयमशोऽनेन कृतोऽयमनेनेति न पृथक् प्रयुज्यमानानि शकटाङ्गानि मनागपि शकटकार्य कुर्वन्ती- त्येव न केवलं पद प्रयुज्यते प्रयुक्तमपि वा न तत्कार्याङ्ग पदान्तरेण तु सहव्यापारात्तदन्वितार्थकार्येव पदमिति युक्तम् । सहत्यार्थमभिदधति पदानि वाक्यम् । एकार्थ पदसमूहो वाक्यम् ॥ तदिदमवयवकार्योपलम्भान्न वैयाकरणवन्निमित्तान्यपि निह्नमहे । कृत्स्नफलसिद्ध्यवधि व्यापारनिश्चयाच्च नान्यमोमासकवच्छुद्धपदार्थाभिधामुपगच्छामह इति । अथरन्विताभिधानपक्षे दूषणनिरासः - यदुक्तम् - 'प्रतिवाक्य व्युत्पत्ति रपेक्षणीया, अन्यथा नवकविश्लोकादर्थो न प्रतीयेत' इति तदकिञ्चित्करम् । नहीय व्युत्पत्तिः गोशब्दस्य शुक्लान्वितोऽर्थः सहि व्यभिचरति कृष्णान्वितस्यपि तदर्थस्य दर्शनात् । नापि सर्वान्वितस्तदर्थं आनन्त्येन दुरवगमत्वात् । किन्त्वाकाङ्क्षितयोग्यसन्निहितार्थानुरक्तोऽस्यार्थः । एता च व्युत्पत्ति वाक्यान्येवावापोद्वापरचनावैचित्र्यभाञ्जि सञ्जनयन्ति । पदार्थपर्यन्तापि भवन्ती व्युत्पत्तिरीदृशी दृश्यते न शुद्धपदार्थविषया, पदेन व्यवहाराभावात् । तथापि न ज्ञायते पदस्थ कियानर्थ इति शकटाङ्गवदावापोद्वापाभ्या तत्कार्यभेदस्य दर्शितत्वात् । तस्मान्न प्रतिवाक्यं व्युत्पत्तिरपेक्षिता । सन्निहितयोग्याकाङ्क्षितार्थोपरक्तस्वार्थाभिधेयत्वे नहि क्वचिद् गृहीतः सम्बन्धः सर्वत्र गृहीतो भवति । ततश्च नवकविश्लोकादप्यर्थप्रतिरत्तिरुपपत्स्यते । पदपदार्थयोस्तु न व्युत्पत्तिरूपायाभावात् । पदान्तरसन्निधाने हि सर्वाणि पदानि कृत्स्नकारीणि भवन्तीति न पदान्तरोच्चारणमप्यफलम् । कि पदान्तरो- चारणेन क्रियत इति चेत् सर्वकारकेष्वप्यस्यानुयोगस्य तुल्यत्वात् । सहृत्य तु सर्वाणि कुर्वन्ति कारकाणोत्युच्यन्ते तथा जैसे बैलगाडी के भिन्न भिन्न उपकरण इसने यह कार्य किया, इसने यह कार्य किया, ऐसा प्रयोग ( लोकव्यवहार ) होने पर भी जरा सी देर के लिये भी वे पृथक् नही होकर ही गाडी का काम कर पाते है ऐसे ही पद भी केवल न प्रयुक्त होते है यदि प्रयुक्त हो तो भी वे कुछ कर नही पाते इसलिए अन्वित होकर ही पद भी कहलाते है और मिलकर ही अपने अर्थों को कहते है वे वाक्य है । एकार्थक अर्थात् सामूहिक कार्य परक पद समूह ही वाक्य हैं । अतः अवयव कार्य के रहने के कारण वैयाकरणों की तरह हम निमित्त कारण को असत्य नही कहते है । पूराफल सिद्ध हो जाने के समय तक क्रिया का ज्ञान आवश्यक होने के कारण अन्य मीमासको की तरह शुद्ध पदार्थ कथन ही एकमात्र उचित है यह मत ही स्वीकार कर रहे है । अब अन्विताभिधानवाद के पक्ष मे आने वाले दोषो का निराकरण करते है -जो लोग यह कहते थे कि 'प्रति वाक्य मे व्युत्पत्ति आवश्यक है नही तो नये कवि के प्रणीतश्लोक का अर्थ नही ज्ञात हो सकेगा' यह कथन निरर्थक है । क्योकि गो शब्द का शुक्ल रंग से युक्त होना यह व्युत्पत्ति नही है । वह तो काली रंग की गाय के होने के कारण गो शब्द के अर्थ देखने के कारण दोषयुक्त हो जाता है । सफेद काला लाल चित्र आदि सब रंगो के साथ युक्त होना गो शब्द का अर्थ भी नही माना जा सकता क्योकि अनन्त अर्थ हो जाने के कारण ज्ञात होना दुष्कर है, हा, आकाक्षा योग्यता सन्निधान के अर्थ से उपरक्त गो शब्द का अर्थ हो सकता है, और इस व्युत्पत्ति को वाक्य ही जो आवाप उद्वाप ( आनयन + नयन ) की विचित्र रचना से संयुक्त है पैदा करते है । पदो के अर्थ करने समझने के उपयुक्त ऐसी व्युत्पत्ति पदार्थ मे भी माननी ही है; केवल पदार्थवादी के मत में यह सब कल्पना अपेक्षित नही क्योकि केवल पद से व्यवहार नही होता न चलता है । तो भी यह नही ज्ञात होता है कि पद का अर्थ कितना है क्योकि गाडी के साधनो के से तथा लोकव्यवहार मे आवाप उद्वाप आदि के द्वारा उसके दृष्टान्त कार्य का भेद दिखाया जा चुका है॥ अत प्रति वाक्य व्युत्पत्तिआवश्यक नहीं है । आकाक्षादि वाक्यार्थज्ञान के कारण पदार्थ का जो अभिव्ञ्जन होता या उसका सम्बन्ध जो सर्वत्र ज्ञात होता है उसमें भी प्रतिवाक्य पदपदार्थ मे प्रकृति प्रत्यय का अन्वेषण नही किया जाता । जब ऐसी बात मान्य कर ली जाय तो नये कवि की रचना का अर्थज्ञान भी माना ही जायेगा । दूसरो कल्पना का कोई अवकाश न होने के कारण पद पदार्थ में व्युत्पत्ति मानना अपेक्षित नही रहा । दूसरे पद के सान्निध्य में ही सभी पद सब कार्य करते हैं अतः दूसरे पद की आवश्यकता नही यह मत भी व्यर्थ है, एक पद से ही जब सब कार्य हो जाते है तो पदान्तर का उच्चारण ही क्यो? उत्तर --इस तरह तो सभी कारक के विषय में भी प्रश्न

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२१६३ वेदार्थपारिजातः पदान्यनि । अर्थाभिधानेनापि चोपकुर्वत्सु पदेषु नाभिहितान्वय, अनन्वितार्थे व्युत्पत्यभावात् । अनुपगमे? वाशब्दस्यार्थस्यदुरुपपादः पदार्थानामन्वय, उपायाभावात् । नन्वाकाङ्क्षासन्निधियोग्यत्वान्यभ्युपाय इत्युक्तमिति चेन्न, कस्येयमाकाङ्क्षा न प्रमाणम्, प्रमातुर्वेति विकल्पानुपपत्ते । न तावच्छब्दार्थयो, तयोरचेतनत्वेनाकाङ्क्षामम्भवात् । प्रमातुतत्र तत्रस्वतन्त्रस्याकाङ्क्षावाचायुक्तिस्तु फलत एव न पुरुषेच्छया वस्तुस्थिते रघटमानत्वात् । शब्द शब्दान्तरमाकाङ्क्षते, अर्थोऽर्थान्तरमिति भवत्यर्थाना संसर्गहेतुरित्येव शब्दस्यायमियानिषोरिव वस्तुतः । शब्दाख्य प्रमाण पृष्ठभावेन तु पुरुषस्य आकाङ्क्षा भवन्ती । पदाना यौगपद्येन पदार्थवाक्यार्थप्रत्यायकत्वा- दीर्घो दीर्घो व्यापारः । उपरतव्यापारे तु शब्दे पुरुषाकाङ्क्षामात्र न कारणम् वाक्यार्थम् ॥ यद्यप्येव वाक्यार्थस्य 1 भावेऽपि क्रमेण तत्सम्भवत्येव । क्रमेऽपि प्रथमं पदार्थमवगमयन्ति पश्चाद् । नच पदार्थवाक्यार्थयोरत्यन्तं प्रमेयत्वेन तथापि प्रमापकत्वासम्भवात् पदार्थपूर्वकत्वमुपपद्यते । पदार्थाना स्यात् । न स्वशरीर एव भेदो येन तयोर्धूमाग्न्योरिव सम्बन्धग्रहणसापेक्ष योस्तदनपेक्षयोर्वा रूपदीपयोरिव। प्रत्याय्यप्रत्यायकभावःननु सामान्ये पद वर्तते विशेषे वाक्यम् । गम्यगमकभावः सभवति, स्वभावात् स्वभाववादिनो बौद्धस्य गिष्यत्वापत्तेः' (श्लो० वा० पृ० ३३२) इति प्रत्याय्यप्रत्यायकयो- सामान्यविशेषभेदस्तु प्रसिद्ध एव । 'सामान्यान्यथासिद्धेविशेष गमयन्ति हि चेन्न, विरतव्यापारे चक्षुषीव शब्दे धूमादिवत् र्व्यतिरेकस्यैवोक्तत्वात् । तथा च स्यादेव पदार्थवाक्यार्थयोर्गम्यगम्यकभाव इति प्रमेयात्पदार्थादग्नेरिव वाक्यार्थस्यावगमाभावात् । पदान्येव पदार्थप्रतिपादनद्वारा वाक्यार्थ- नहि पदार्थाः प्रमेयीभूतधूमवत् पुनः प्रमाणीभवितुमर्हति किन्तु काष्ठाना पदार्थप्रतिपादनम्' ( २लो ० वा ० प्रतिपत्तौ पर्यवस्यन्तीति वाक्यार्थमितये तेषा प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् 'पाके ज्वालेव ऐसा माने तो पद के सकता । यदि सभी कारक मिलकर कार्य करते हैं सम्भव है लेकिन केवल एक कारक से व्यवहार नही चल द्वारा उपकार करने वाले पदो मे भी अभिहितान्वय नही होता, अनन्वित अर्थ विषय मे भी ऐसा ही कहा जा सकता है । अर्थाभिव्यक्ति अन्वय कहना दुष्कर है क्योकि कोई गमक या उपाय नही । यदि कहे कि मे व्युत्पत्ति नही होती । मानने पर भी पदार्थ का परस्पर नही है क्योंकि तब जिज्ञासा होगी कि यह, आकाक्षा योग्यता सन्निधान ही अभ्युपाय है यह कहा जा की इन विकल्पो की उपपत्ति नही हो पाती । यदि शब्द या अर्थ की कहे चुका है तो यह कथन भी ठीक तो? स्वतन्त्र प्रमाता की, किसकी आकाक्षा है शब्द की या अर्थ की या प्रमाता आकाक्षा हो भी तो प्रमाण नही है क्योकि पुरुष की, इनके अचेतन होने के कारण इनकी आकाक्षा सम्भव नही । दूसरे शब्द को चाहता है वैसे ही एक अर्थ अर्थान्तर को चाहता है यह इच्छा से वस्तु की स्थिति क्यो तदनुकूल हो जायेगी? परिणामएक शब्ददेखकर कहा जाता है वस्तु को देखकर नही । शब्दप्रमाण के आधार जो भिन्न भिन्न स्थलो पर कहा जाता है वह फल या तरह शब्द की ही यह क्रिया वाण की तरह अधिक गहरी अर्थात् तीखी पर पुरुष की आकाक्षा अर्थसम्बन्ध का कारण हो सकती है इसदुर्बल हो जाती है वह कारण नही बन सकती । एककाल मे पद पदार्थ क्रिया है । शब्द की इस क्रिया के पश्चात् पुरुष की आकाक्षाहै । क्रम में भी पहले पद पदार्थ के बोधक होते है बाद मे वाक्यार्थ का । यद्यपि t पदार्थ प्रमापक नही हैं । वाक्यार्थ के बोधक भले न हो क्रम से तो हा ही सकते सापेक्ष और निरपेक्ष दोनो स्थितियो मे पदार्थ प्रमेय होने के नाते पदार्थ वाक्यार्थ के सहायक है किन्तु है और रूप प्रकाश्य होता है किन्तु रूप और दीप दोनो दो पदार्थ है वाक्यार्थ में कोई बडा भेद नही है जैसे दीप रूप का प्रकाशकएक है, ऐसी स्थिति मे गम्यगमक भाव नही होता । यदि कहे कि पद , शब्द और अर्थ दोनो एक है कहने मे भिन्न है वस्तुत को बताता है अतः पदार्थ वाक्यार्थ मे गम्यगमकभाव हो सकता है उत्तर पर रूप नही दीखता जैसे सामान्य और वाक्य विशेष्य है सामान्य ही अगत्या विशेष घूम दर्शन के बिना अग्नि का पता नही लगता है कि यह कथन ठीक नही है क्योकि जैसे आँख मूंद लेने वैसे पदार्थ ज्ञान के बिना वाक्यार्थ ज्ञान नही हो सकता । में हो सकता । हाँ, पद ही पदार्थज्ञान कराता हुआ वाक्यार्थज्ञान ( ) जैसे धूम प्रमेय है वैसे ही पदार्थ प्रमेय हैं वहहै प्रमाणजैसे भोजननही पकाने में लकडी की आच ज्वाला अनिवार्य साधन है । नही रोक सकती । पद की दो शक्तिया ( ) ( ) | लीन होता है अव पद वाक्यार्थज्ञान में अनिवार्य साधन है १ अभिधात्री २ तात्पर्यशक्ति कारक की भीतरी गतिविधि उसके प्रधान कार्य को

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२१६४ वेदार्थपारिजातः पृ० ६६४ ) इति । नह्यवान्तरव्यापारः कारकस्य प्रधानव्यापारे कारकता व्याहन्ति । पदाना द्वयीशक्ति ( १ ) अभिधात्री शक्ति ( २ ) तात्पर्यशक्तिश्च । तत्राभिधात्री शक्ति पदाना पदार्थेषूयुज्यते, तात्पर्यशक्तिश्च वाक्यार्थे पर्यवस्यति । यद्यपि पदानि स्व स्वमर्थमभिधाय निवृत्तव्यापाराणि, तथापि यदर्थपराणि तत्रानिवृत्तव्यापाराण्येव । एव शाब्दता वाक्यार्थप्रत्ययस्य न हास्यते । सर्वात्मना तु विरतव्यापारे शब्दे साऽवश्य हीयते । शब्दावगतिमूलत्वेन शाब्दत्वे तु श्रोत्रत्वमपि स्यात्, श्रोत्र- स्यापि पारम्पर्येण मूलत्वानपायात् । शब्दे विरतव्यापारे कतमत्तत्प्रमाण यस्य वाक्यार्थप्रतीति. फलमित्यनिर्णयात् । पदार्थ- ससर्गस्वभावत्वाद्वाक्यार्थस्य पदार्थपूर्वकत्वेऽपि वाक्यार्थप्रतिपत्तेस्तु न तज्जन्यत्व शब्दव्यापारानुपरमात् । मानसे चापचारे वाक्यस्येव पदानामपि ग्रहणाभावात् । यत्तु -'पश्यत * खेतिमारूपम्' इति, तदापि न किञ्चित्, प्रत्यक्षेण शुक्लो गौरपि गच्छन् दृश्यत एव । न च म 'शुक्लो गौर्गच्छति, इति वाक्यस्यार्थ प्रत्यक्षभासात्तु प्रत्यक्षार्थः एव स मन्तव्यः । तथैव वेतोऽश्वो धावत त्यानुमानिकोऽय प्रत्यय । अभिहितान्वयवादे पदार्थप्रतिपत्तिपूर्वकत्वाद्वाक्यार्थप्रतिपत्तेरभिहिताना पदार्थानामेवान्वयः । अनवगत- पदार्थस्य वाक्यार्थप्रत्ययादर्शनात् पदार्थप्रविभागाच्चाभिहितान्वयवाद एव सिद्धयति । अस्य पदस्य जातिरर्थोऽस्य द्रव्यमस्य गुणोऽस्य क्रियेति पदार्थप्रविभागः । स च तदेवावकल्पते यदि सोऽर्थः पदैरभिधीयेत । पदान्तरार्थोपरक्ते तु तस्मिन्नभिधीयमाने तदर्थे यत्तैव नावधार्यते, कदम्बाकारार्थप्रतीते । आवापोद्वापाभ्या तु तदवधारणमिति चेन्न, आवापोद्वापपरीक्षावसरे कदम्बप्रतीत्यनपायात् । नह्येकमेव किच्चिद्वाक्यमन्विताभिधायिपदग्रथितमिति । अन्यत्र तु शुद्ध एव पदानामर्थः । पर्युदासा- दिस्तु भाव्य एव । ' अर्थनित्यः परीक्षेत' ( नि० २1१ ) इत्यस्यापि नायमर्थो यद्य एवार्थोऽभिमतो भवेत् तत्परत्वेन व्युत्पत्तिः कार्या, किन्तु प्रमाणप्रतिपन्नार्थं नित्यः परीक्षेतेत्येवार्थं । 'अन्वाख्यानानि भिद्यन्ते शब्दव्युत्पत्तिकर्मसु 1। बहूना सम्भवेऽर्थाना निमित्त किञ्चिदिष्यते || ' पहली पदपदार्थविषयिणी है और दूसरी वाक्यवाक्यार्थ मे उपयुक्त होती है । पद अपने -अपने अर्थ को कहकर विरत हो जाते है तौ भी जिस अर्थ के लिये प्रयुक्त होते है उससे निवृत्त नही होते । इस तरह वाक्यार्थज्ञान की बोधकता अक्षुण्ण है । यदि शब्द का व्यापार विरत हो जाय तो पूर्वोक्त बोधकता अवश्य ही विघ्नित होती । शब्दज्ञानमूलक बोधकता होती तो श्रोत्रता भी होती क्योकि श्रोत्र का भी परम्परया शाब्दत्व है । शब्द विरतव्यापार हो गया तो किस प्रमाण के द्वारा वाक्यार्थज्ञानरूप फल प्राप्त हुआ इसका निर्णय नही है । वाक्य का अर्थ पदार्थ पूर्वक होने पर भी उसमें पदार्थो का सम्बन्ध स्वाभाविक होने के कारण वाक्यार्थज्ञान पदार्थजन्य नही है क्योकि शब्द का व्यापार विरत नही हुआ है । मानसबोध मे तो वाक्य की तरह पद का भी ज्ञान नही है । “पश्यत. श्वेतिमारूपम् ” इस वाक्य के आधार पर कुछ लोग विप्रतिपत्ति खडी करते थे वह कोई दोष नही, क्योकि सफेद गाय या बैल जाते हुए देखा जाता ही है । "शुक्लो गौर्गच्छति" इस वाक्य का अर्थ वह नही है क्योकि जो प्रत्यक्ष दाखता है वह प्रत्यक्षार्थ है वाक्यार्थ नही । वैसे ही सफेद घोड़ा दौडा जा रहा है यह आनुमानिक बोध है । अभिहितान्वयवाद के अनुसार पदार्थज्ञानपूर्वक ही वाक्यार्थज्ञान होता है अत उक्त पदार्थो का ही आपस मे अन्वय होता है । जिस पदार्थ का ज्ञान नही होता उसका वाक्यार्थज्ञान भी नही देखा जाता । पदार्थो के प्रविभाग के कारण अभिहितान्वय ही सिद्ध होता है । इस पद का जाति अर्थ है अमुक का द्रव्य और अमुक का गुण यही पदार्थ का प्रविभाग है । वह तभी माना जाता है जब वह अर्थ दूसरी से कहा जाता है । दूसरे पद के अर्थ को छाया से उसके कहे जाने पर उस अर्थ को सीमा नहीं निश्चित की जा सकती क्योकि वहाँ सामूहिक अर्थबोध मानना पडता है । आवाप-उद्वाप से उसका निश्चय होता है यह बात नही है क्योकि ले जाने ले आने की परीक्षा के समय सामूहिक प्रतीति है ही । कोई एक वाक्य ही अन्वितवाचक पद से युक्त है ऐसा नही माना जा सकता । क्योंकि अन्यत्र तो पदो का ही अर्थ होता है । पर्युदास आदि तो भावी अर्थ है पदार्थ नही । "अर्थ नित्यः परीक्षेत" इस वचन का यह अर्थ नहीं है कि जो जो अर्थ अभिमत हो उसके अनुरूप व्युत्पत्ति की जाय अपितु प्रमाण के बल पर होनेवाला अर्थ ही स्वाभाविक अर्थ हो सकता है । कहा भी हैं कि "शब्द को व्युत्पत्ति करने में व्याख्यान भिन्न - भिन्न हो सकते है । जहाँ अनेक अर्थो की सम्भावना 1 हाँ वहाँ कोई भेदक निमित्त मान लिया जाता है । "

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वेदार्थपारिजातः २१६५ सर्वे शब्दा यौगिका इति नैरुताना केषाञ्चिद्वेयाकरणानामुक्तसु शिष्यवुद्धिवैशद्यार्थताप्रदर्शनमात्रपरम् । अत एव औणादिक। • प्रायेण यौगिका एव मुख्योऽर्थस्तदुपयोगी च विशेपार्थं इति सिद्धमित्यप्यपास्तम्, महाभाप्यविरोधादेव । 'यत्र संज्ञाग्रहणमुपाधिग्रहण वा क्रियते, तत्रापि बहुलग्रहणात् यौगिकार्थमाश्रित्य यथासम्भवमन्यत्रापि वृत्तिर्द्रष्टव्या । अत एव पक्षिण्यन्वाख्यात पतङ्ग शब्दोऽश्वे सूर्ये च दृश्यते । अन्नोदकयोर्व्युत्पादित पाथः शब्दोऽन्तरिक्षेऽपि प्रयुज्यते । कर्माख्याया निरुक्तोऽग्निशब्दो निघण्टावपत्यनामसु पठ्यते' इति, तदपि कुशकागावलम्बनम्, बहुलसज्ञावाचकत्वस्यापि बाहुल्यादेव सिद्धेः । निघण्टवादिप्रमाणेन यत्रेकशब्दस्यानेकत्रवृत्तिरिष्यते, तत्र तु तत्प्रमाणबलादेव । न च तावना त्वपाप्यश्वशब्दस्य गवादी गोशब्दस्य वाऽश्वादौ वृत्तिर्बोधयितुमिष्टा । तत्रापि गौरवादेकत्रेव मुख्या वृत्तिरन्यत्र तु लक्षणैव । यथा प्रतिषेधो नञः स्वाभाविकोऽर्थः । ‘ स्याद्वाचको लाक्षणिक शब्दोऽत्र व्यञ्जकस्त्रिधा । वाच्यादयस्तदर्थाः स्युस्तात्पर्यार्थोऽपि केषुचित् ।” इत्युक्तेः । ( काव्यप्रकाशे ) । आकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिवशात् पदार्थाना समन्वये तात्पर्यार्थो विशेषag. । वाच्याद्यर्थविलक्षण समर्गतारूप वपुः शरीर यस्य स. । यद्वा विशिष्य पूर्वाननुभूत वपु. स्वरूप यस्य स इत्यपदार्थोऽपि वाक्यार्थः । न च तात्पर्यरूपा वृत्तिः पदानामिव स्मारिका, किन्तु अनुभाविकैव । न च समुल्लसत्यभिहितान्वयवादिना भट्टमीमासकाना लाघवात् पदाना पदार्थमात्र शक्तिर्न त्वन्वयाशेऽपि, गौरवादन्यलभ्यत्वाञ्च । तदशा हि तात्पर्याय वाच्याद्यर्थविलक्षणशरीर आकाङ्क्षा-दिवशादपदार्थोऽपि प्रतीयते । एतेषा रीत्या घट करोतीत्यत्र घटवृत्तिकर्मत्वानुकूला कृतिरित्यर्थो बोध्यते । तत्र घटशब्दस्य घटोऽर्थः, अम्प्रत्ययस्य कर्मतार्थ, वृत्तिता तु न कस्याप्यर्थः, किन्तु सा तात्पर्यवशादनयोः ससर्गविधया भासते । वाच्य एव वाक्यार्थ इत्यन्विताभिधानवादिना मतम् । तद्रीत्या पदान्यन्वितानि भूत्वा पश्चाद्विशिष्टमर्थं " सभी शब्द यौगिक है यह निरुक्त तथा व्याकरणशास्त्र वेत्ताओ का कथन शिष्यो की बुद्धि विस्तृत करने के तात्पर्य से माना जाता है । इसीलिये औणादिक शब्द प्राय यौगिक है अर्थ ही मुख्य है । विशेष अर्थ मुख्य अर्थ का उपयोगी या सहायक है यह मत निरस्त हो गया । क्योकि ऐसा मानने मे महाभाष्य का विरोध है । जहाँ सज्ञा या उपाधि ज्ञान किया जाता है वहाँ पर भी बहुलग्रहण के बल से यौगिक अर्थ लेकर यथा स्थिति शक्तिज्ञान जानना चाहिए । इसीलिए पक्षी के लिये व्याख्यात पतङ्ग शब्द घोडे और सूर्य मे प्रयुक्त ( ) अर्थ में भी प्रयुक्त होता है । अत्र जल मे रूढ पाथ शब्द अन्तरिक्ष अर्थ मे भी प्रयुक्त होता है । कर्म क्रिया अर्थ मेके वाचकवेद शब्दो "", अग्निशब्द निघण्टु मे अपत्य अर्थ मे पढा गया है यह सब कथन भी दुर्बल ही प्रतीत होता है क्योंकि कई सज्ञाओ है वहाँ को बहुल ग्रहण के बल से ही मान लिया जाता है । निघण्टु आदि के प्रमाण द्वारा जहाँ एक शब्द का अनेक अर्थ माना जाता। वहाँ भी प्रमाणो के बल से ही ऐसा होता है । इस दृष्टान्त से अश्व का अर्थ गौ और जो शब्द का अर्थ अश्व नही किया जा अन्यार्थसकता लाक्षणिक एक अर्थ मे मुख्य शक्ति और अन्य अर्थों में लक्षणा आदि मनना उचित है । जैसे निषेध नव् का स्वाभाविक अर्थ शब्दों है । क्योकि शब्द की तीन शक्तियाँ अभिधा लक्षणा व्यञ्जना जैसे मान्य है वैसे हो वाच्य लक्ष्य व्यङ्ग्ग्य ये तीन अर्थ भी, कही किन्ही में तात्पर्यार्थ भी माना जाता है । आकाक्षा योग्यता सन्निधि के आधार पर पदार्थों की व्यवस्था हो जाने पर कही कही तात्पर्यार्थ यह विशेष अर्थ मान लिया गया है । वह प्रसिद्ध तान अर्थो से भिन्न है । वह ससर्गतारूप शब्द शक्ति के आधार पर कल्पित है इस तरह वाक्यार्थ कही कही पदार्थगम्य ही नही तद्भिन्न भी माना गया है । तात्पर्याख्या शक्ति पदो की तरह अर्थ स्मरणमात्र ही नही कराती है अपितु वह अनुभव करा देती है । भाट्टमीमासक पदो मे पदार्थवाचकताशक्ति मानते है अन्वय या सम्बन्ध नही, क्योकि ऐसा मानने पर गौरव होना सम्बन्ध अन्यलभ्य हो जाता है उसे अर्थ मानना ठीक नही । तात्पर्य के बल से अपदार्थ भी भासित हो जाता है । उनके अनुसार घट करोति का घटनिष्टकर्मत्वजनिक क्रिया अर्थ है । घट शब्द का अर्थ घट व्यक्ति और अम् का कर्मत्व अर्थ है किन्तु घटवृत्ति कर्मत्व यह तात्पर्य के बल पर ससर्गमर्यादा से भासित हो जाता है । अन्विताभिधानवादी के अनुसार वाच्य अर्थ ही वाक्य का अर्थ है । उनके मत मे पद पहले अर्थ से अन्वित होकर बाद में

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२१६६ वेदार्थपारिजातः कथयन्तीति । देवदत्त गामानयेत्युत्तमवृद्धप्रयोगात् सास्नादिमती व्यक्ति मध्यमवृद्धे सञ्चारयति तच्चेष्टया तस्य वाक्यस्य तदर्थबोधकतामनुमायानन्तरं गा नयाश्वमानयेति प्रयोगे गवापसारणमश्वाहरणं दृष्ट्वाऽन्वयव्यतिरेकाभ्या क्रियापदार्थान्विते कारके कारकपदस्य कारकपदार्थान्विताया क्रियाया क्रियापदस्य शक्ति बालोऽवधारयति । न च गौरवेणान्वयाशपरिहार, प्रथमगृहीतान्वयशक्ते रुपजीव्यत्वेन तदपरित्यागात् । तेनाभिधयैवान्वयबोधोपपत्तौ कि तात्पर्यरूपवृत्त्यन्तरेणेत्यन्वितमेवाभिधत्ते । तद्रीत्यान्वितघटादावव घटादिपदाना शक्तिः । शाब्दबोधे त्वाकाङ्क्षादिवशात् वृत्तितादिविशेषरूपमेव भासत इति नापदार्थो वाक्यार्थः । ,, न च शक्ति बिना वाक्यात् ससर्गधीर्युक्ता लक्षणादिस्तत्पूर्वकत्वात् । न च संसर्गमर्यादया तद्धीः तस्याः शब्दवृत्तित्वाभावात्, शक्तिलक्षणयोरेव तत्वात् । न शब्दतात्पर्यगोचरत्व शाब्दत्वम्, तदभावै शुक्रबालाद्युदीरिते वाक्ये - ऽबोधकत्वापत्तेः । न च गा नयाश्वमानयेति व्यभिचारात् ससर्गे न शक्तिरिति वाच्यम्, वाक्यस्यैव प्रयोगार्हत्वेन पूर्वगृहीत- संसर्गशक्त्यवबाधेन तदन्वितस्वार्थे पदानां शक्तिग्रहादन्वितस्य ससर्गविशिष्टस्याभिधानमिति । अन्ये तु न ससर्गविशेषेषु शक्तिः, गा नय, गा बधानेत्यादौ तेषामानन्त्येन गोपदस्य नानार्थत्वापत्तेः । न च संसर्गसामान्ये शक्तिः, विशेषस्यासङ्केतविषयत्वेऽशाब्दत्वापत्तेः । इतरान्वितयोद्वित्वेन गामानयेत्यत्र वाक्यार्थद्वयबुद्धयापत्तेः । संसर्गसामान्ये शक्ती च सर्ववाक्याना पर्यायत्वापत्तेः । विशेषस्य सम्बन्धिविशेषादेव सिद्धेर्न वाच्यत्वम्, तत्त्वे उक्तदोषादिति । आद्यसङ्केतग्रहस्य व्यवहारमात्राधीनतया प्रवृत्तिनिवृत्तियोग्याया व्यक्तावेव तद्युक्तमिति । यद्यप्यर्थक्रियाकारितया प्रवृत्तियोग्या व्यक्तिरेव, तथाप्यानन्त्याद् व्यभिचाराच्च तत्र संकेतो न कर्त्तुं शक्यत इति गौ: शुक्लर चलो डित्थ इत्यादीता विषयविभागो न प्राप्नोति तदुपाधावेव सङ्केतः । विशिष्ट अर्थ कहते है । 'देवदत्त गाय लाओ' ऐसा बड़े बूढे के कहने पर गाय को देखकर और बूढे के करचरणादि चेष्टाओ को देखकर उस वाक्य का अर्थ जानकर फिर गाय ले जाओ घोडे को बाँध दो आदि प्रयोगो मे गाय का हटाना घोडे का लाना आदि देखकर अन्वय व्यतिरेक द्वारा क्रियान्वित कारक में कारक पद की तथा कारकान्वित क्रिया में क्रियापद की शक्ति का बालक को ज्ञान हो जाता है । गौरव के डर से अन्वय का परिहार नही किया जा सकता क्योकि पहले पहल ज्ञात जो अन्वयशक्ति वह उपजीव्य अर्थात् मूल कारणरूप है उसे छोडना संभव नही है । इस तरह अभिधा से हो अन्वयज्ञान उपपन्न हो जाता है फिर तात्पर्यरूप शक्तयतन्र की कल्पना नही करनी पडती है और अन्वितार्थ को ही पद कहता है । आकाक्षा आदि के बल से सम्बद्ध अर्थ ही भासता है वाक्यार्थ पदार्थ रहित नही होता । वाक्य से शक्ति के बिना ससर्गबोध होता नही, अत लक्षणाआदि शक्तियाँ सदा सहायतार्थ उद्यत है । ससर्गज्ञान के बल पर वाक्यार्थज्ञान होना नही माना जा सकता क्योंकि ससर्ग शब्दशक्ति नही है । शक्ति और लक्षणा ही शक्तिया है । शब्द के तात्पर्य की बोधिका ही शक्ति है यह भी कहना सगत नही क्योकि शब्दशक्ति के न मानने पर सुग्गे या शिशु बालक के शब्द से बोध नही होगा । वाक्य से ही बोध देखने के कारण ससर्गविशिष्ट अर्थका वाचक पद होता है अत ससर्ग भी शक्तिभास्य माना जाता है । दूसरे लोग - गाय लाओ, गाय बाधो, आदि वाक्यों में अनन्त सर्ग मानने के कारण गोपद का अनेक अर्थ होने लगेंगे अत. संसर्ग विशेष मे शक्ति नही मानते है । ससर्गता भी शक्ति नही हो सकती क्योकि यदि विशिष्ट अर्थ शक्तिवाच्य नही है तो वह मान्य कैसे है? अन्यान्य मे अन्वित पद + अर्थ दो चीजे है अतः गाय लाओ इसमे पद + अर्थ दोनो के तात्पर्य से दो वाक्यार्थ होने लगेगे । वाक्यों में ससर्गता या शक्ति पर्याय है । दो सम्बन्धियो के कारण विशेष अर्थात् सिद्ध हो जाता है वह वाच्य नही हो सकता यह कहना ठीक नही क्योकि ऐसा मानने पर वह अर्थ ही कैसे आ गया? व्यवहार ही एक मात्र आद्यसङ्केतज्ञान का कारण है अतः प्रवृत्ति या निवृत्ति व्यक्ति से ही सम्बद्ध मानी गयी है । यद्यपि प्रयोजन व्यक्ति का है तो प्रवृत्ति या निवृत्ति व्यक्ति के होगे तो भी व्यक्ति अवस्य हैं और कहीं विपरीत भी सम्भव हो जाने से व्यक्ति मे शक्ति नही जाति में ही मानना अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है ।

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वेदार्थपारिजात २१६७ अयमभिप्राय – गौ शुक्लश्चलो डित्थ ' इति महाभाप्यप्रयोगे गवादिभिश्चतुर्भिरपि शब्देरेका सैव व्यक्ति-रभिधीयते । तत्र व्यक्तिवादिमते व्यक्तेरेव प्रवृत्तिनिमित्तत्वात् तस्याश्च प्रकृत एकत्वात् सैव गोत्वरूपजातिमत्वेन गो, शुक्लत्वरूपगुणवत्वेन शुक्ल, चलनरूपक्रियावत्वेन चल, डित्यतामायमिति तालर्येण डित्यो भवति । विषयविभागाभावे गवादिशब्दाना घटः कलश इत्यादीनामिवैकार्थवाचकत्वेन पर्यायतया सहप्रयोगो न स्यात् । उपाधिवादिसते तु जातिगुण-यदृच्छाशब्दाना प्रवृत्तिनिमित्ताना भेदेन गवादिशब्दाना पर्यायत्वाभावाद् भवत्येव सह प्रयोग | उपाधिश्च द्विविध – वस्तुधर्मो वक्तृयदृच्छासन्निवेशितश्च । वस्तुनि व्यक्ती समवेतो धर्मो जातिगुणक्रियारूपा , - - - -वक्ता स्वेच्छया सन्निवेशितः सकेतसम्बन्धेन तद्धर्मिणि सस्थापितः डित्थडवित्थचैत्र मैत्र-देवदत्त यज्ञदत्त विष्णुमित्रा ---दिनामरूप इति यावत् । संज्ञाशब्दादेव सज्ञाविशिष्टधर्मिरूप । वस्तुधर्मोऽपि द्विविध -सिद्ध:, साध्यश्च । साध्यस्तावत् साध्यत्वेन विवक्षित कृदाख्यातप्रकृत्यर्थः I। सिद्धोऽपि द्विविधः-पदार्थस्य प्राणप्रदो विशेषाधानहेतुश्च । पदार्थस्य पदोद्देश्यस्य प्राणनं प्राणो व्यवहारयोग्यता तत्प्रद, सर्वगोव्यक्तिवृत्तिजातिरित्यर्थ । प्राण व्यवहारयोग्यता प्रददाति सम्पादयतीति व्युत्पत्ते, यावद्वस्तुस्थितिसम्बन्धित्वमित्यर्थ । आद्यो जाति यावद्गोव्यवहार तत्र पिण्डे गोत्वस्य सत्वात् प्राणप्रदत्वम् । नहि गौः स्वरूपेण गौ, नाप्यगौः, गोत्वाभिसम्बन्धात्तु गौरिति वाक्यपदीयकारः । द्वितीयो गुणो लब्धसत्ताकं जात्या प्राप्तव्यवहार-योग्यताक वस्तु ( व्यक्ति: ) शुक्लादिना विशिष्यते सजातीयेभ्यो व्यावर्त्यते, अत एवोत्पन्नस्य द्रव्यस्य पश्चाद्गुणेन योगः । तेनैव क्षणमेकं निर्गुणत्वं द्रव्यस्य । जातिस्तु जन्मना जायते । महाभाष्यरीत्या –'सत्वे निविशतेऽपैति पृथग्जातिषु दृश्यते । आधेयश्च क्रियाजश्च सोऽसत्वप्रकृतिर्गुणः ॥ ' इति । चतुष्टयी शब्दाना प्रवृत्तिरिति भाष्यरीत्या जाति-क्रिया द्रव्यातिरिक्त "गौ: शुक्लश्चलो डित्थ " इस महाभाष्यकार के शब्द से जातिगुण क्रिया यदृच्छा वाचक चार प्रकार के शब्दो की सत्ता के साथ-साथ इन चार शब्दो से एक ही व्यक्ति का बोध होता है । जातिपुरस्कारेण गोत्वयुक्त गो, शुक्लगुण से शुक्ल, चलन क्रिया से चल इसका नाम डित्थ है इस भाव से डित्थ प्रयुक्त हुआ है । विषयों का विभाग न किया जाय तो गो आदि शब्दो की घट कलश की तरह पर्यायता पूर्वक सह प्रयोग नही होगा । उपाधिवादी मत मे जाति गुण क्रिया यदृच्छा शब्दो का प्रवृत्ति निमित्तो के भेद से गो आदि शब्दो की पर्यायता न होने के कारण सह प्रयोग होता ही है । वस्तुधर्म और वक्ता की इच्छा सन्निवेश भेद से उपाधि दो प्रकार का होता है । पहले शब्द मे सप्तमी तत्पुरुष समास के द्वारा व्यक्ति मे समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला धर्म गोत्व, ब्राह्मणत्व आदि । दूसरे भेद मे वक्ता की अपनी इच्छा से जातिगुण क्रिया इन तीन भेदो द्वारा सकेत सम्बन्ध से धर्मी मे सस्थापित अर्थात् निहित जो तत्तद् जाति गुण धर्म आदि जहा जैसी स्थिति हो जैसे डित्थ sवित्थ चैत्र मैत्र देवदत्त आदि नामो मे जो जो धर्म सम्भव हो वह । जैसे सज्ञा वाचक शब्द मे सज्ञाविशिष्ट जो सज्ञी अर्थात् धर्मी वह समझा जाता है । सिद्ध और साध्य भेद से वस्तु धर्म भी दो प्रकार का होता है । साध्य का अर्थ है जो साध्य के रूप मे वक्ता की इच्छा द्वारा कहा जाय जैसे कृदन्त ओर तिङन्त के प्रकृति का अर्थ । | सिद्ध भी द्विविध है ( १ ) पदार्थ को प्राणवान् बतानेवाला या बनानेवाला, ( २ ) विशेष गुणो को आधान कराने का कारण भूत । पद से बोधनीयव्यवहार योग्यता ही प्राणप्रद नामक भेद है जो जाति रूप पडता है जैसे निखिलगोव्यक्ति मे रहनेवाली गोत्व जाति । प्राण अर्थात् व्यवहार पात्रता को सम्पन्न करनेवाला ही प्राण- प्रद कहलाता है । इस तरह जाति ही प्राणप्रद बस्तु है क्योकि स्वरूप से गाय न गाय है न तद्भिन्न है अपितु गोत्व के अभिसम्बन्ध के कारण ही वह गाय है ऐसा वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का मत है । जाति के बाद दूसरा पदार्थ गुण है जो गुण के कारण व्यक्ति को विशेषित करता है । सजातीयों से पृथक् करता है यही गुण की विशिष्टता है । यही कारण है कि द्रव्य के उत्पन्न होने के अनन्तर उसका गुण से योग ( सम्बन्ध ) होता है । अतएव द्रव्य उत्पत्ति क्षण में निर्गुण होता है । जाति तो सहज वस्तु है । महाभाष्यकार पतञ्जलिने कहा है कि द्रव्य मे गुण सनिबिष्ट होता है और दूर भी हो जाता है किन्तु जाति नित्य उपस्थित वस्तु है । गुण आधेय तथा क्रिया से उत्पन्न होता हे अत एव गुण द्रव्यस्वभाव से भिन्न माना गया है । शब्द की चार विधाए है ' इस भाष्यवचन के अनुसार जाति, क्रिया, द्रव्य, इन तीनो से भिन्न गुण माना गया जो धर्ममात्र रूप है यही निर्णीत होता है । यही कारण है कि अभाव भी गुण है

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 1270 का मूल पृष्ठ
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२१६८ वेदार्थपारिजातः धर्ममात्र गुण इति पर्यवस्यति । तेनाभावादेरपि गुणत्व १६७ सूत्र काव्यप्रकाश उक्तम् । साध्य साध्यत्वेन प्रतीयमानत्वं क्रियात्वम्, साध्यत्व चोत्पद्यमानत्वम् । तथा च पूर्वापरीभूतावयव क्रियारूपो बौद्धोऽधिश्रयणाद्यवतारणान्तव्यापारसमूहो हि पाकक्रिया, विक्लित्यनुकूलत्वे तेषामनुगमात् । डित्थादिशब्दाः सज्ञारूपा । मीमासकमते जातावेव शक्तिः । व्यक्तयविनाभावित्वात्तु जात्या व्यक्तिराक्षिप्यते । अन्ये त्वाक्षेपाद् व्यक्ति- प्रतीतौ व्यक्त्यनुपस्थितत्वेन शाब्दबोधविषयत्वानुपपत्तिः तस्माज्जातिविशिष्ट एव शक्तिः । मुख्यार्थबाध, मुख्यार्थयोग, रूढिप्रयोजनान्यतरच्चेति त्रयं लक्षणाया हेतु ' । रूढिलक्षणाप्रयोजनसूत्र लक्षणा चेति विभागद्वयम् । 'विशेष्य नाभिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिविशेषणे' । विशेषणे जातिरूपे उपाधौ, क्षीणशक्तिविगतव्यापारेति यावत् । नागृहीतविशेषणाबुद्धिविशेष्य उपजायत इति न्यायेन विशेषण प्रत्याय्योपरमात् । अनन्यलभ्यः शब्दार्थ इति जातिरेव शब्दार्थ', व्यक्तेराक्षेपलभ्यत्वादिति भावः । कर्मणि कुशल इत्यादौ कुशशब्देन दर्भग्रहणायोगात्, गङ्गाया घोष इत्यादी गङ्गादीना घोषाधारत्वाद्यसम्भवाद् मुख्यार्थबाधे लक्षणा । कुशलपद दक्षे रूढमेव । योगो हि शब्दस्य न प्रवृत्तिनिमित्तम् । तदाहु -'पङ्कजादिष्वतिव्याप्तेर्मण्डपादिष्वसम्भवात् । तैलादिषु तथाऽव्याप्तेर्न च योगः प्रवर्तकः ॥ ' इति । व्याकरणव्युत्पत्तिस्तु साधुत्व मात्र प्रतिपादयति न शक्तिम् । अन्यथा ' गमेर्डो' इत्यादिना साधितो गोशब्दो गमनकर्तारम्, मण्डपकुशलादिशब्दो मण्डपायिकुशग्राहकादीन् बोधयेत् । कलिङ्गशब्दस्य तद्वासिनि पुरुषे, इन्द्रियवाचिनश्चक्षुः शब्दस्य तदधिष्ठाने गोलके शक्त्य- भावेऽपि कलिङ्ग साहसिकः, कौवलय चक्षुः -इत्यादिकं निरूढलक्षणायामुदाहरणम् । ऐसा काव्यप्रकाशकार का मत है । साध्य अपने धर्म साध्यत्व से युक्त होकर ही क्रिया कहलाता है । उत्पन्न होना ही साध्य का स्वरूप है । इसीलिए उसे क्रिया भी कहते है । जिसमे पूर्व और पर अवयव हो । जो क्रियारूप और बुद्धि का अर्थात् मन का धर्म हो वही क्रिया है, जैसे बटलोई के चढाने से लेकर उतारने के बीच जितनी क्रियाये है वे क्रियायें ही पाकक्रिया कही जाती है । चावल और दाल मे जो विक्लित्ति अर्थात् उसका कोमल या शिथिल हो जाना ही पाक होना है । काठ के हाथो को डित्य कहते है यह डित्थ शब्द संज्ञा के अन्दर आता है । मीमासक के मत मे जाति मे ही शक्ति है और व्यक्ति के बिना वह रह नही सकती अत जाति से व्यक्ति का आक्षेप हो जाता है । दूसरे लोग कहते है कि आक्षेप से आयी व्यक्ति अनुपस्थित होने के कारण वाक्यार्थबोध का विषय ही नही होगा यह दोष पडेगा । अत. जातिविशिष्ट व्यक्ति मे ही शक्ति मानना ठीक है । लक्षणाशक्ति के तीन कारण है ( १ ) मुख्यार्थ का बाध, ( २ ) मुख्यार्थ का योग ( सम्बन्ध ) ( ३ ) रूढिया प्रयोजन मे से किसी एक का अवश्य रहना । रूढि लक्षणा और प्रयोजन लक्षणा यह लक्षणा के दो भेद है । विशेषण के ज्ञापन मे क्षीणशक्ति अभिधा विशेष्य का बोध नही करा सकती । विशेषण अर्थात् जातिरूप उपाधि में शक्ति के नष्ट हो जाने से । जो बुद्धि विशेषण का ज्ञान नही रखती उसमे विशेष्य का ज्ञान होना संभव नही, इस नियम के अनुसार विशेषण का ज्ञान कराकर बुद्धि निष्क्रिय हो जाती है । किसी शब्द का अर्थ दूसरे की सहायता से नही माना जाता, इस अनुगम के कारण जाति ही शब्द का अर्थ है, व्यक्ति तो आक्षेप से आ जाती है । ' कर्मणि कुशल ' काम में निपुण है, इस वाक्य मे कुश शब्द का अर्थ दर्भ नही हो सकता, 'गङ्गाया घोष. ' इस वाक्य मे गङ्गा का घोष का आधार बन पाना संभव नही है, अतः उक्त स्थलो मे मुख्य अर्थ का बाधित होना ही लक्षणा का कारण है । कुशल पद दक्ष अर्थ मे रूढ है । योग किसी शब्द का प्रवृत्तिनिमित्ति नही हो सकता क्योकि कहा है कि पङ्कज मे अतिव्याप्त होने के कारण मण्डप में असभव होने के कारण और तैल मे अव्याप्त होने के कारण योग को प्रवर्तक अर्थात् प्रवृत्तिनिमित्त नही माना जाता । व्याकरण शास्त्र से प्रकृति- प्रत्यय के सहयोग से शब्द की सिद्धिमात्र हो पाती है उससे वाचकता या बोधकतारूप शक्ति का ज्ञान नही किया किया जा सकता । नही तो ' गमेड.' इस उणादि सूत्र से निष्पन्न गो शब्द जानेवाला का बोधक होने लगेगा, उसी तरह मण्ड पिबति, कुशात् लाति, विग्रह से निष्पन्न मण्डप कुशल शब्द क्रमश: मण्ड पीनेवाला, कुश लानेवाला, ऐसे अर्थो के बोधक होने लगेगे । कलिङ्ग शब्द का अर्थ उड़ीसा का निवासी पुरुष, इन्द्रियवाचक चक्षु शब्द का अर्थ आँख का आधार जो गोलाई, इन अर्थो मे शक्ति न होने पर भी 'कलिङ्ग साहसी है, आँख कमल की तरह लम्बी-चौडी है, यह निरूढ लक्षणा के उदाहरण दिये गये है ।