वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1251–1260
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1251–1260
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वेदार्थपारिजात २१४ ९ पेक्षिताङ्गाङ्गिबोधकवाक्यतयैकवाक्यता । 'स्वार्थबोधे समानानामङ्गाङ्गित्वाद्यपेक्षया । वाक्यानामेकवाक्यत्व पुन सहत्य जायते ॥ ' ( त० वा० पृ० ३६६ ) इति भट्टपादोक्ते । सर्वमेतद्वेदान्तपरिभाषाया स्पष्टम् । आसत्ति -योग्य ताऽऽकाङ्क्षातात्पर्यज्ञानाना च वाक्यार्थबोवहेतुत्वमुक्तम् । तत्रान्वयप्रतियोग्यनुयोगिपदयोरव्यव- धानमासत्ति क्वचिद् व्यवहितेऽप्यव्यवधानभ्रमात् शाब्दबोधात् । दयानन्दस्तु सर्वत्र सम्भवत्यवधानेऽपि व्यवहितै पदैरेव सम्बन्ध योजयति । यत्पदार्थेनान्वयोऽपेक्षितस्तयोख्यवधानेनोपस्थिति शाब्दबोधे कारणम् । तेन 'गिरिर्भुक्तमग्निमान् देवदत्तेन' इत्यादी न शाब्दबोध । तात्पर्यगर्भा चासत्ति | 'नीलो घटो द्रव्य पट ' इत्यादावासत्तिभ्रमाच्छाब्दबोध । आसत्तिभ्रमाभावेऽपि न क्षतिः । ननु यत्र 'छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्त ' इत्युक्तम्, तत्रोत्तरपदस्मरणेन पूर्वपदस्मरणस्य नागादव्यवधानेन तत्तत्पदस्मरणासम्भव इति,, ', चेन्नचेन्न प्रत्येकपदानुभवजन्यसंस्कारैश्चरमस्य तावत्पद विषयकस्मरणस्याव्यवधानेनोत्पत्ते नानामन्निकर्षैरेकप्रत्यक्षस्येव नानासंस्कारैरेकस्मरणोत्पत्तेरपि सम्भवात् तावत्पदमस्कारसहितचरमवर्णज्ञानस्योद्बोधकत्वात् । कथमन्यथा नानावर्णैरप्येकपदस्मरण' स्यात्? तावत्पदार्थाना स्मरणादेकदैव खलेकपोतन्यायात् तावत्पदार्थाना क्रियाकर्म- ----- भावेनान्वयबोधरूप शाब्दबोधो भवतीति केचित् । अपरे तु —' यद्यदाकाङ्क्षित योग्य सन्निधान प्रपद्यते ॥ तेन तेनान्वितः स्वार्थ' पदैरेवावगम्यते ॥ ' तथा च खण्डवाक्यार्थबोधानन्तर तथैव पदार्थस्मृत्या महावाक्यार्थबोध इत्याहु. । यत्र द्वारमित्युक्त तत्र पिधेहीति पदस्य ज्ञानादेव बोध, न तु पिधानादिरूपार्थज्ञानात्, पदजन्यपदार्थोप स्थितेस्तच्छाब्दबोधे हेतुत्वात्, क्रियाकर्म- अपेक्षा के होने पर दूसरे से मिलकर एकवाक्यता हो जाती है । ( पृ० ३३६ ) | यह सभी बाते वेदान्तपरिभाषा मे विशेषरूप से विचारित हुई है । आसत्ति- योग्यता-आकाङ्क्षा-तात्पर्यज्ञान, ये चारो वाक्यार्थबोधके कारण माने गये है । इनको परिभाषा पृथक्- पृथक् रूप से दी जाती है । वाक्य में प्रयुक्त प्रतियोगि- अनुयोगीरूप से अर्थात् विशेषणविशेष्यभाव से स्थित पदो के बीच में व्यवधान अर्थात् प्रतिबन्धक न होना आसत्ति कहलाता है । कही व्यवधान रहने पर भी न रहने के भ्रम से वाक्यार्थ ज्ञात हो जाता है । दयानन्दने तो सर्वत्र व्यवधान न रहने पर भी व्यवहित पदो से ही सम्बन्ध जोड लेने का ढंग अपना लिया है । जिन पदो का सम्बन्ध अभीष्ट है उनके बीच व्यवधान न पडना ही वाक्यार्थज्ञान का हेतु होता है । अत एव "गिरिर्भुक्तमग्निमान् देवदत्तेन" इस व्यवह्नित वाक्य का अर्थबोध नही होता । आसत्ति के भीतर तात्पर्यज्ञान निविष्ट रहता है । "नीलो घटो द्रव्य पट." आदि वाक्यो मे आसत्ति के भ्रम से अर्थज्ञान हो जाता है । आसत्ति के भ्रम से यदि वाक्यार्थज्ञान में भ्रम न हो तो भी कोई आपत्ति नही है । यदि "छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्त. " ऐसा कहा गया है, तो उत्तरपद के स्मरण से पूर्वपद का ज्ञान नष्ट हो जाने से व्यवधान रहित उन उन पदो का स्मरण संभव नही होगा फिर वाक्यार्थज्ञान भी कैसे होगा? उत्तर है कि प्रत्येक पदजन्य जो अनुभव उससे होनेवाले सस्कार से अन्तिमपद तक के उन सभी पदो का अर्थज्ञान अव्यवहित रूप से हो जाता है । जैसे कई सनिकर्षो की सहायता से एक वस्तुविषयकप्रत्यक्ष हो जाता है उसी तरह नाना सस्कारो से एक विषयक अर्थज्ञान हो जाना सभव ही है । उतने पदो के सस्कारसहित अन्तिमवर्ण के ज्ञान को सबका उद्बोधक मान लिया जाता है । यदि ऐसा न माने तो अनेक वर्णोवाले पद में स्मरण क्योकर होगा? अथवा अनेक पदो का स्मरण एक बार हो खले कपोतन्याय से मानकर सर्व का अर्थज्ञान हो जाता है ऐसा कुछ लोग मानते हैं । दूसरो का कहना है कि जो-जो पद योग्य होने के कारण आकाक्षित होगे उन-उनसे योग प्राप्त कर पदों से ही ' अर्थज्ञान हो जाता है एसी स्थिति मे खण्ड वाक्य का अर्थज्ञान हो जाने के बाद उसी क्रम से पदो के अर्थ स्मरण पथ मे आते जायेंगे और वाक्य महावाक्य सबका अर्थज्ञान अञ्जसा होता जायगा । जहाँ द्वार कहा जाय वहाँ 'बन्द करो' का अध्याहार करके वाक्यार्थबोधसुसम्पन्न हो जायगा । न कि बन्द करना इस पद का वहाँ रहना जरूरी है । जिस वाक्य का अर्थज्ञान आवश्यक है उस वाक्यघटक पदो के अर्थ- ज्ञान का रहना होना वाक्यार्थज्ञान मे अपेक्षित है । क्योकि क्रिया, कर्म, कर्त्ता आदि पद जैसे -जैसे अपेक्षित होगे वैसे उपस्थित होने
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२१५० वेदार्थपारिजात पदाना तेन तेनैव रूपेणाकाङ्क्षितत्वात् पुण्येभ्य इत्यादीना स्पृहयतीत्यादिपदाध्याहारं विना चतुर्थ्यनुपपत्ते पदाध्याहा- रस्यावश्यकत्वात् । एतच्च मुक्तावल्या स्पष्टमेव । ( ' ' ) वेदान्तिनोऽप्यव्यवधानेन पदजन्यपदार्थोपस्थितिमेवासति मन्यन्ते तत एव इषे त्वा वा० स० १ १ इत्यादिमन्त्रे छिनद्मीति पदाध्याहार । विकृतिषु च ' सूर्याय जुष्टं निर्वपामि' इति पदप्रयोग. । ' एकपदार्थेऽपरपदार्थसम्बन्धो ' ' योग्यता इति मुक्तावली । तात्पर्यविषयीभूतससर्गाबाधो योग्यता इति वेदान्तिनः । वह्निना सिञ्चतीत्यादौ तादृशज्ञाना- भावात् संसर्गबाधाद्वा न शाब्दबोध । नन्वेवं योग्यताज्ञान शाब्दबोधात् प्राक् सर्वत्र न भवति, वाक्यार्थस्यापूर्वत्वादिति चेन्न, तत्तत्पदार्थस्मरणे सति कचित्संशयरूपस्य कचित्रिश्चयरूपस्य योग्यताज्ञानस्य सम्भवात् । 'स आत्मनो वपामुदखिदत्' ( ते • सं० २| १ | १| ४ ) इत्यादावपि तात्पर्यविषयीभूतपशुप्राशस्त्याबाधाद् योग्यताऽस्त्येव । तत्त्वमस्यादिवाक्येषु वाचाभेदबाधेऽपि लक्ष्यस्वरूपाभेदे बाधाभावाद् योग्यताऽस्त्येव । आकाङ्क्षा येन विना यत्पदस्यान्वयाननुभावकत्व तेन पदेन सह तस्याका क्षेत्यर्थ । क्रियापदं कारकपदं विना नान्वयबोध जनयतीति तेन तस्याकाङ्क्षा । यद्वा क्रियाकारकपदाना सन्निधानमासत्त्या चरितार्थम्, परन्तु घटकर्मताबोधं प्रति घटपदोत्तरद्वितीयाकाङ्क्षाज्ञान कारणम्, तेन घट: कर्मत्वम् आनयन कृतिरित्यादौ न शाब्दबोध. । ' अयमेति पुत्रो राज्ञ. पुरुषोऽपसार्यताम्' इत्यादौ तु पुत्रेण सह राजपदस्य तात्पर्यग्रहसत्त्वात् तेनैवान्वयः । पुरुषेण तात्पर्यग्रहे तु तेन सहान्वयबोध. । वेदान्तिना रीत्या तु पदार्थाना परस्परजिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वमाकाङ्क्षां । क्रियाश्रवणे कारकस्य, कारक- श्रवणे क्रियायाः, करणश्रवणे इतिकर्त्तव्यतायाश्च जिज्ञासाविषयत्वाद् अजिज्ञासोरपि वाक्यार्थबोधाद् योग्यत्वमुपात्तम् । तदवच्छेदकं च क्रियात्वकारकत्वादिकमिति नातिव्याप्तिः । गौरश्व इत्यादी अभेदान्वये च समानविभक्तिप्रतिपाद्यत्वं तद- चाहिए । पुष्पेभ्य इसमें स्पृहयति इस पद के अध्यहार के बिना चतुर्थी विभक्ति नही आयेगी, अतः पदध्याहार हर हालत मे करना ही होगा । यह प्रसङ्ग मुक्तावली मे सुविचारित है । वेदान्ती लोग भी व्यवधानरहित पदजन्यपदार्थोपस्थिति को ही आसक्ति मानते है । इसीलिये ' इषे त्वा' (वा० स ० १1१ ) ' ' ' इस मन्त्र में छिन इस क्रिया का अध्याहार होता है । विकृतिसज्ञकयाग मे सूर्याय जुष्ट निर्वपामि इस पद का प्रयोग होता है । एक पद के अर्थ के साथ दूसरे पद के अर्थ का सम्बन्ध योग्यता है ऐसा मुक्तावली ग्रन्थ का मत है । तात्पर्य का विषय जो सम्बन्ध उसमे बाधा न पडना ही योग्यता है ऐसा वेदान्ती लोग मानते है । 'वह्निना सिञ्चति' इस वाक्य में उक्त दोनो तरह का अभिप्रेत अर्थ न होने से वाक्यार्थज्ञान नही माना जाता । यदि कहे कि वाक्यार्थज्ञान के पूर्व योग्यताज्ञान सब जगह नही होता क्योकि योग्यताज्ञान व्यवस्थापूर्वक होता है, तो उत्तर है कि उन उन पदो के अर्थों के स्मरण होने पर कही संशय कही निश्चयरूप योग्यताज्ञान रहता ही है तो व्यवस्था है ही । 'स आत्मनो वपामुदखिदत्' ( तै ० स० २।१।११४ ) इस मन्त्र मे तात्पर्यस्वरूप पशु की प्रशस्तता का बाध न होने से योग्यता है हो । 'तत्त्वमसि' इस श्रुति मे वाच्यार्थ के साथ अभेद न होने पर भी लक्ष्यार्थ के साथ तो है अत बाब का प्रश्न न होने से योग्यता है ही । ' आकाक्षा' जिस पद के बिना जिस पद का अन्वय न हो उस पद के साथ उस पद की आकाक्षा होती है । क्रियावाचीपद कारक के बिना अन्वित नही हो सकता अत क्रिया को कारक की आकाक्षा है । अथवा क्रियाकारक शब्दो का सामीप्य आसत्ति से ही चरितार्थ हो चुका है किन्तु घटमानय इस वाक्य मे घटकर्मता बोध के प्रति घटपदोत्तर द्वितीया की आकाक्षाकारण है । इसलिए घट का कर्मत्व और आनयन क्रिया इस वाक्य का अर्थज्ञान नही होता है । ऊपमेति पुत्रो राम पुरुषीऽपसार्यताम् । इस वाक्य मे पुत्र का राजपद के साथ सम्बन्ध होने के कारण उसा से अन्वय होता है पुरुष के साथ सम्बन्ध इष्ट होने पर उसके साथ अन्वय होगा | वेदान्तमतानुसार पद और उसके अर्थ की आपसी जानने की इच्छा का विषय जो पदार्थ वह नही अपितु के बाद इतिकर्तव्यता | J,योग्यता आकांक्षा है क्रिया के जानने पर कारक की तथा कारक के सुनने पर क्रिया की तथा करण के ज्ञान उसकीकी जिज्ञासा होती है, ५ कभी किसी अजिज्ञासु को भी वाक्यार्थज्ञान हो जाने से लक्षण में योग्यत्व पद का निवेश किया गयाहै । उस 90 } +
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वेवार्थपारिजातः २१५१ वच्छेदकमिति तत्त्वमस्यादिवाक्येषु नातिव्याप्तिः । तादृशाकाङ्क्षाभिप्रायेणेव बलाबलाधिकरणे 'ना वैश्वदेव्यामिक्षा वाजिभ्यो वाजिनम्' ( तै ० स० १/८/२ ) इत्यत्र वैश्वदेवयागस्यामिक्षान्वितत्वेन न वाजिनावाङ्क्षेति व्यवहार । ननु तत्र वाजिनस्य जिज्ञासाऽविषयत्वेऽपि तद्योग्यत्वमस्त्येव, प्रदेयद्रव्यत्वस्य यागनिरूपितजिज्ञासाविषयतावच्छेदकत्वादिति चेन्न, स्वममान-जातीयपदार्थान्वयबोधविरहसहकृत प्रदेयद्रव्यत्वस्यैव तदवच्छेदकत्वेन वाजिनद्रव्यस्य स्वममानजातीयमिक्षाद्रव्यान्वयबोधसह- कृतत्वेन तादृगावच्छेदकत्वाभावात् । आमिक्षाया तु नैवम्, वाजिनान्वयस्य तदाऽनुपस्थितत्वात् । उदाहरणान्नरेष्वप्याकाङ्क्षा-विरह एव दुर्बलत्वप्रयोजक इति वेदान्तपरिभाषाया स्पष्टम् । तात्पर्यं तु तत्प्रतीतीच्छ्योच्चरितत्वमिति नैयायिका । तच्च न सङ्गतम्, अर्थज्ञानशून्येन पुरुषेणोच्चारिताद्वेदादर्थ-प्रत्ययाभावप्रमङ्गात् । अयमध्यापकोऽव्युत्पन्न इति विशेषदर्शनेन तत्र तात्पर्यभ्रमस्याप्यभावात् । न च परमेश्वरीयतात्पर्य-ज्ञानात् तत्र शाब्दबोध इति वाचाम् ईश्वरानङ्गीकर्तुरपि तद्वाक्यार्थप्रतिपत्तिदर्शनात् । किन्तु तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वमेव तात्पर्यम् । गेहे घट इति वाक्य, गेहे घटमसर्गप्रतीतिजननयोग्यम्, न तु पटससर्गप्रतीनिजननयोग्यमिति तद्वाक्य घटससर्ग-परम्, न पटमसर्गपरमिति । ननु ' सैन्धवमानय ' इत्यादिवाक्य यदा लवणानयनप्रतीतीच्छ्या प्रयुक्तम्, तदाप्यश्वससर्गे प्रतीतिजनने स्वरूप-योग्यतानत्त्वाल्लवणपरत्वज्ञानदशायामप्यश्व ससर्गज्ञानापत्तिरिति चेन्न, तदितरप्रतीतीच्छयाज्नुच्चरितत्वस्यापि तत्र विवक्षित- त्वात् । तथा च तदन्यप्रतीतीच्छ्याऽनुच्चरितत्वे सति तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व तात्पर्यमिति । शुकादिवाक्येऽव्युत्पन्नोच्चरितवेद- योग्यता का अवच्छेदक ( नियन्त्रक ) क्रियात्व, कारकत्व, इतिकर्तव्यतात्व आदि ही है अत लक्षण मे अतिव्याप्ति नही आती । इसी प्रकार गौ, अश्व आदि शब्दो मे समानविभक्तिकता अभेदान्वय का कारण है और वही अवच्छेदक है अत एव 'तत्त्वमसि' आदि श्रुति-वाक्य मे अतिव्याप्ति नही होती । उसी तरह की आकाक्षा के तात्पर्य से ही बला- बलाधिकरण मे "सा वैश्वदेव्यामिक्षा वाजिभ्यो वाजिनम्' ( तै० स० ११८ २ ) इस श्रुति वाक्य में वैश्वदेवयाग का आमिक्षा से अन्वय है न कि वाजिन से ऐसा प्रयोग होता है । यदि कहे कि वाजिन जिज्ञासा का भविषय है तो भी याग के योग्य तो है ही क्योकि प्रदेय द्रव्य यागनिरूपित जिज्ञासा का नियन्त्रक हैं, इसका उत्तर है कि - स्वसमान जातीय पदार्थ के सम्बन्ध के बिना जो प्रदेयद्रव्यत्व वही अवच्छेदक ( नियन्त्रक ) होता है वाजिन तो स्वसमानजातीय आमिक्षा द्रव्य बोध के साथ ही है अत वह अवच्छेदक नही हो सकता । आमिक्षा मे ऐसी बात नही है क्योकि वाजिन का सम्बन्ध आमिक्षा के समय अनुपस्थित रहता है । दूसरे उदाहरणो मे भी आकाक्षा का अभाव ही दुर्बलता का कारण है यह सब बाते वेदान्त परिभाषा मे अधिक स्पष्टता से कही गया है । उसके बोध की इच्छा से उच्चारण करना ही तात्पर्य है, ऐसा नैयायिक लोग मानते है । किन्तु यह ठीक नही है । क्योकि अर्थज्ञानहीन पुरुष द्वारा उच्चारित वेद से अर्थज्ञान होना ही सभव नही होगा । यह अध्यापक अव्युत्पन्न ( तात्पर्यज्ञानहीन ) है, इस विशेषबोधजनक वाक्य से वहा तात्पर्य भ्रम भी नही होगा । यदि कहे कि परमेश्वर का जो तात्पर्यज्ञान वह लेकर वाक्यार्थज्ञान हो जायगा, यह नही कह सकते क्योकि ईश्वर को जो नही मानते उन्हें भी उस वाक्य से ज्ञान देखा जाता है । अतः उस बोध उत्पादन योग्यता को ही तात्पर्य कहना उचित है । घर मे घडा है यह वाक्य घर में घडे के ससर्ग के बोध के योग्य है । पट के ससर्ग बोधोत्पादन योग्य नही है अतः वह वाक्य घडे के ससर्गबोध का वाचक है पट ससर्गबोधक नही । 'सैन्धवमानय' यह वाक्य जब नमक लाने के बोध की इच्छा से प्रयोग किया गया है तब भी उसमे घोडे की ससर्ग-बोधजनकता स्वरूपयोग्यता से होने के नाते नमक लाने के तात्पर्य से प्रयुक्त दशा मे भो घोडे का ज्ञान अनिवार्यत होने लगेगा ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योकि वहा तदितरप्रतीतीच्छ्या अनुच्चरितत्व का भी निवेश है अत नमक का ही बोध होगा घोडे का नही । इस 1 तरह 'तदन्यप्रतीतीच्छ्याऽनुच्चरितत्वे सति तत्प्रतोतीच्छया प्रयुक्तत्व ( तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व ) यही तात्पर्य का लक्षण स्थिर हुआ 1। सुग्गे की बोली या असस्कृत व्यक्ति द्वारा उच्चरितवेदवाक्य आदि मे तत्प्रतीतीच्छा के न रहने के कारण अतिव्याप्तिदोष नही होता ।
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वेदार्थपारिजात, २१५२ वाक्यादौ च तत्प्रतीतीच्छाया एवाभावेन तदन्यप्रतीतीच्छ्योच्चरितत्वाभावेन तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वेन नाव्याप्ति । तादृशयोग्य- ताया अवच्छेदिका च शक्तिरेव, वेदान्तिरीत्या सर्वत्र कारणतायाः शक्तेरेवावच्छेदकत्वाभ्युपगमात् । तच्च तात्पर्य वेदे मीमासापरिशोधितन्यायात्, लोके तु प्रकरणादिनाऽवधार्यते । तत्रैवोपक्रमादीनामन्तर्भाव । ते च 'उपक्रमोपसहारावभ्यासोपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये ।' वेदान्तविचारे चैषामुपयोगः । लौकिक- वाक्याना मानान्तरावगतार्थत्वाद् अनुवादकत्वम् । वेदे तु वाक्यार्थस्यापूर्वतया नानुवादकन्वम् । दयानन्दस्तु सर्वत्र लौकिकार्थ- मेव प्रतिपादयतीति तद्रीत्यानुवादकत्वमेव वेदवाक्यानाम् । ' अर्थात् प्रकरणाल्लिङ्गादौचित्याद्देशकालतः । शब्दार्थास्तु विभिद्यन्ते न रूपादेव केवलात् ॥ इति, अन्यथैव प्रवर्तन्ते प्रत्यक्षाद्युद्भवा धिय । अर्थं पूर्णमपूर्ण वा दर्शयन्त्य. पुर. स्थितम् ॥ अन्यथैव मतिः शब्दे विषयेषु विजृम्भते । प्रतिपत्तुरनाकाङ्क्षप्रत्ययोत्पादनावधिः । अत एव पद लोके केवल न प्रयुज्यते । नहि तेन निराकाङ्क्षा श्रोतुराधीयते मति ॥' इति च । , नन्वभिधानव्यतिरिक्तः कोऽन्यः शब्दस्य कृत्स्नफलपर्यन्त प्रत्यायनात्मा व्यापार इति चेन्न सर्वैरपि ससर्गवादिभिस्तस्याप्रत्याख्येयत्वेनाङ्गीकारात् 1। ननु ससृष्टाभिधाने सत्येव ससर्ग प्रतीयते नान्यथेति चेन्न, सहत्यकारित्वादेव ससर्गावर्गातिसिद्धे ' । नहि सहत्यकरणमससृष्ट च कार्य क्वचिद् दृष्टम् 1। किञ्च J यथा प्रकृतिप्रत्ययौ परस्परापेक्षमर्थमभिदधाते न च प्रकृत्या प्रत्ययार्थोऽभिधीयते, नियोगस्य धातुवाच्यत्वापत्ते । न च प्रत्ययेन प्रकृत्यर्थोऽभिधीयते, यागादेर्डिंवाच्यत्वानुपपत्तेः । न च तौ पृथक् स्वकार्यं कुरुत । एव पदान्यपि परस्परापेक्षाणि सहृत्य कार्य करिष्यन्ति न च परस्परमर्थमभिधास्यन्ति । वाक्यान्यपि प्रकरणपतितान्येव । तदुक्तम्-'प्रकृतिप्रत्ययो यद्वदपेक्षेते परस्पम् । पद पदान्तर तद्वद्वाक्य वाक्यान्तर तथा ॥ अभिधात्री मता शक्तिः पदाना स्वार्थनिष्ठता । तेषा तात्पर्यशक्तिस्तु ससर्गावगमावधि ॥ वाक्यार्थ प्रत्यये तेषा प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् । पाके ज्वालेव काष्ठाना पदार्थप्रतिपादनम् ।' ( न्या० म० पृ० ३७२ ) । ऐसी योग्यता की नियामिका शक्ति ही है । वेदान्त शास्त्र मे निष्ठित लोगो के अनुसार कारणता की नियामिका शक्ति ही मानी गयी है इस विश्वास से | वह तात्पर्य वेद मे मीमासापरिशोधित न्याय से निर्णीत होता है और लोक मे प्रकरण, लिङ्ग आदि से अवधारित होता है । उन्ही 'अर्थ प्रकरण लिङ्ग शब्दस्यान्यस्य सन्निधि ' आदि में ही वेदान्तप्रयुक्त 'उपक्रमोपसहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । ' ' अर्थ-वादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये' । इन छह निर्णायको का अन्तर्भाव होता है । मुख्य रूप से वेदान्त मे इनका उपयोग होता है । लोकप्रसिद्ध वाक्यो का दूसरे प्रमाणो से भी अर्थावबोध होने के कारण ये वहा अनुवादक मात्र है । वेद मे वाक्यार्थ अपूर्व होते है अत-वहा अनुवादकत्व नही होता अपितु वाचकत्व या अपूर्वार्थबोधकत्व होता है । दयानन्द सर्वत्र लौकिक अर्थ ही मानते है अत-उनके मत से वेद के वाक्यों का भी अनुवादकत्व ही है । अर्थात् प्रकरण, लिङ्ग, देशकाल का औचित्य आदि से शब्द का अर्थ भिन्न-भिन्न हो जाता है केवल स्वरूप से भेद नही माना जा सकता है । "प्रत्यक्ष उपस्थित वस्तु जो चाहे पूर्ण हो या अपूर्ण उन्हे विपरीत जताती हुई प्रत्यक्ष अनुमानादि प्रमाणो से उत्पन्न की गयी बुद्धि भिन्न-भिन्न रूप से कार्यो मे प्रवृत्त होती रहती है । 'प्रतिपत्ता या बोद्धा को जबतक निराकाक्ष बोध उत्पन्न न हो जाय तबतक बुद्धि शब्दादि विषयो मे भिन्न भिन्न रूप से प्रवृत्ति -निवृत्ति की अनि-श्चितता मे पडी रहती है ।' यही कारण है कि लोक मे केवल पद प्रयोग नही किया जाता क्योकि केवल उससे श्रोता की बुद्धि निराकांक्ष नही हो पाती ।' ( न्या० म० पृ० ३७१ ) । यदि यह कहे कि शब्द का प्रयोजन अभिधान या कथन ही तो है प्रत्यायन ज्ञापन या प्रबोधन नही, यह कथन ठीक नही है क्योकि सभी ससर्गवा दियोने प्रत्यायन पर्यन्त शब्द-व्यापार माना है । यदि यह कहे कि ससर्गयुक्त अभिवान होने पर संसर्ग प्रतीत होता है अन्यथा नही यह भी ठीक नही क्योंकि सम्मिलित प्रयत्न से ही ससर्ग ज्ञान होता है । सम्मिलित प्रयत्न बिना संसर्ग का कहीं नहीं देखा जाता । अथ च, जैसे प्रकृति प्रत्यय अन्योन्य की अपेक्षा से अर्थ को कहते है, न कि केवल प्रकृति से प्रत्यय का अर्थ कहा जाता है, ऐसा मानने पर नियोग भी धात्वर्थ माना जाने लगेगा । उसी तरह प्रत्यय से प्रकृति का अर्थ भी नहीं कहा जाता, नही तो यागादि लिङ्वाच्य नही माना जायगा । प्रकृति और प्रत्यय पृथक -पृथक् अपना कार्य नही करते ।
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वेदार्थपारिजात २१५३ अन्ये तु 'यद्यपि वृद्धव्यवहारादेव व्युत्पत्ति, वाक्येनेव तु व्यवहार, शिविकोद्वहनवत् सर्वाणि पदानि सहत्य व्याप्रियन्ते ' इत्यादिक सत्यमेव, तथापि व्युत्पत्तेरेकघनाकारमघातनिष्ठत्वे प्रतिवाक्य व्युत्पत्तिरपरिहरणीयैव स्यात्, पदार्थ-पर्यन्ताया तु व्युत्पत्तौ इयानस्य पदस्यार्थ इति निर्धारणीयम् । यथा श + टावयवव्यापारनिर्धारणमेव पदव्यापार निर्धारण-मप्यङ्गीकार्यमेव । इतरथा पदार्थनियमानवेक्षणे गामानयेति विवक्षावान् अश्वपदमपि निमित्तयोपाददीत । नहि मीमामकाना वैयाकरणानामिवानपेक्षितपदार्थ एव वाक्यार्थप्रत्यय । तस्माद् यावान् आवापोद्वापपर्यालोचनया गोपदस्यार्थो निर्धार्यते तावानेव सङ्घातकार्येऽपि व्याप्रियमाणस्य तस्यार्थ । - - नन्वाकाङ्क्षित योग्य सन्निहितार्थोपरक्तोऽस्यार्थ इत्युक्तमिति चेन्न सर्वदा संहतव्याप्रियमाणमेतत्पदमिति-,प्रतीतेर्भ्रान्तिरूपत्वात् । अस्य तावानेवार्थो यावत्यभिधात्री शक्ति नाभिधात्रीशक्तिरन्वितविषया किन्त्वन्वयव्यतिरेकावगत- निष्कृष्टस्वार्थविषयैव । तात्पर्यशक्तिस्तु तेषामन्वितावगमपर्यन्ता सह व्यापारात्, व्यापारस्य च तदीयस्य निराकाङ्क्षप्रत्ययो- - ' त्पादनपर्यन्तत्वात् । तदुक्त न्यायमञ्जरीकृतौ अशाब्दत्व च वाक्यार्थप्रतीतेरित्थमापतेत् । व्यवधानमयुक्त च साक्षाच्छाब्दत्वसम्भवे । ' ( न्या० म०, पृ० ३६७ ) । अङ्गुल्यग्रादिवाक्येषु योग्यताभावादससर्ग, ससर्गस्य आकाङ्क्षादित्रय- सापेक्षत्वात् । इसी तरह पद भी अन्योन्याश्रित होने से मिलकर ही कार्य करेगे । स्वतन्त्र रूप से एक दूसरे का अर्थ नही कह सकेगे । वाक्य भी प्रकरण आदि के अधीन ही रहेगे । कहा भा है - प्रकृति और प्रत्यय जैसे एक दूसरे की अपेक्षा करते है वैसे ही पद दूसरे पदो की और वाक्य दूसरे वाक्यों की अपेक्षा करते है । पदो की स्वार्थनिष्ठ शक्ति ही अर्थाभिधात्री है । उनको तात्पर्यशक्ति उनके पारस्परिक संसर्गज्ञान पर्यन्त रहती है । वाक्यार्थज्ञान मे पदो की प्रबृत्ति अनिवार्य हे पदार्थ ज्ञानपूर्वक ही पद प्रवृत्ति वाक्ययोजना में अपेक्षित है जैसे भोजन पकाने मे काष्ठ की ज्वाला अनिवार्य है । ( न्या० म ० पृ० ३७३ ) दूसरे विद्वानो का अभिमत निम्नाति है-- ' यद्यपि बडे बूढो का व्यवहार देखने से ही व्युत्पत्ति होती है और लोक मे वाक्यों का हो प्रयोग व्यवहारार्थ होता है । शिविका से ले जाये जाने की तरह सभी वाक्यघटक पद मिलकर व्यापार करते है । शिबिका की बनावट तथा चार कहारो द्वारा उसका कधे पर ढोना उसके बासो का उसके अगो मे सयोजन आदि सहत्यक्रियाकारित्व का सयुक्तिक श्रेष्ठ उदाहरण है और यह सब सत्य है, तथापि व्युत्पत्ति एक घनीभूत सघातनिष्ठ है वैसे ही प्रत्येक वाक्य मे व्युत्पत्ति का होना रहना अपरिहार्यं ही है और उचित है । किं बहुना, वाक्यार्थ ज्ञान करने हेतु पदो का अर्थज्ञान नितान्त अपेक्षित है । इस पद का अमुक अर्थ है ऐसा स्पष्ट ज्ञान अनिवार्य है । जैसे शकट के प्रत्येक अवयव की क्रिया जरूरी है वैसे ही वाक्यावयव प्रत्येक पद का अर्थ जानना स्वीकरणीय है । नही तो पदो के अर्थज्ञानवाले नियम की उपेक्षा करने वाला 'गाय लाओ' इस वाक्य को कहने की इच्छा वाला घोडे को भी कारणतया सन्निविष्ट समझने लगेगा । मीमासको का वाक्यार्थज्ञान वैयाकरणो की तरह पद पदार्थ ज्ञान निरपेक्ष नही अपितु तदपेक्ष माना गया है । अत जितना ले आने ले जाने के अर्थज्ञान मे गोपद का अर्थ जरूरी है उतना ही सघाताय ( अर्थात् बड़े वाक्य मे प्रयुक्त गो शब्द का अर्थ ) ज्ञान में भी जरूरी हैं । यदि यह कहे कि सर्वदा आकाक्षित योग्य पद के सामीप्य मे हो गो पद का अर्थ कहा गया है, यह ठीक नही है, क्योकि सदा सघातान्वित होकर ही प्रयुक्त होने वाले गो आदि पद को वादिगण भ्रान्तरूप प्रयोग की सज्ञा देते है । गोपद का वही स्वाभाविक शाश्वत अर्थ है जितना अभिधाशक्ति प्रतिपाद्य है । अभिधा अन्वित पदविषया नही अपितु अन्वयव्यतिरेकद्वारा निर्णीत केवल स्वार्थविषयिका ही है । तात्पर्यशक्तिपदान्वित अर्थज्ञानसापेक्षा अवश्य होती क्योंकि उसका व्यापार सहयोग सापेक्ष । उसका व्यापार भी निराकाक्ष बोध उत्पन्न करने तक समर्थ है । न्यायमञ्जरीकार जयन्तभट्ट ने कहा है-निराकाक्षबोधोत्पादन में असमर्थ सिद्ध हो जाने पर तात्पर्य शक्ति को अशाब्दत्व दोष का पात्र बनना पडेगा अर्थात् उसको शब्दशक्तिता ही व्याक्षिप्त हो जायगी । जब सीधे शाब्दत्व अर्थात् वाक्यार्थबोधजनकत्व उसका सभव है तो उसमे किसी तरह का व्यवधान होना, डालना, समझना अयुक्त अनुचित है । ( न्याय० म० पृ० ३६७ | | अङ्गल्यग्रादि वाक्य में योग्यता के न रहने के कारण ससर्ग ( सम्बन्ध ) भी नही माना जाता क्योकि ससर्ग आकाक्षा योग्यता सन्निधान इन तीनो की अपेक्षा है । २७० '
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२१५४ वेदार्थपारिजात - ' अन्विताभिधानवादिमतेऽपि पदाना योग्यतासन्नादिससृष्टार्थवाचित्वमिष्यते । यत्तु अन्विताभिधान-वादिनोऽन्वयासम्भवादनभिधान स्यात् । अभिहितान्वयवादिमते त्वनन्वयेऽप्यभिधान न विरुद्धयत इति चेन्न, शब्दाना प्रकाशकत्वस्य नैसर्गिकत्वेऽपि पुसा गुणदोषाभ्यामेव तत्र सदसदर्थत्वोपपत्ते । क्रियाकारकससर्गबुद्धिर्यद्यप्यन्यैव भवति, तथापि नग्बुद्धिप्रमादतस्तादृश्येवान्यापि बुद्धिर्भवति । शब्दे स्वन प्रमाणत्व तत्रापि भवत्येव, बाधकापसर्पणात् । अङ्गुल्यादिवाक्येऽपि शाब्द समन्वयोऽस्त्येव । अन्यथा अकचटतादिवद् दशदाडिमानि, षडपूपा इत्यादिवदबोधक त्वमेव स्यात् । अतोऽन्विताभिधान न विरुद्धयते । बाधकस्त्वन्यविषय एव । प्रथमं वर्णज्ञान तत ' संस्कार, ततो द्वितीयवर्णज्ञान तेन प्रथमवर्णज्ञानजनितेन च सस्कारेण पटुतरस्सस्कार, ततस्तृतीयवर्णज्ञान तेन प्राक्तनेन सस्कारेण पटुतर संस्कारः । एव यावदन्त्यवर्णज्ञानानन्तर तु तत संस्कारात् सकल- पूर्ववर्णविषयमेकस्मरणम् । तेनान्त्यवर्णज्ञानस्य विनश्यत्ता विनश्यदवस्थग्रहणस्मरणविषयीकृतो वर्णसमूह पदमिति ज्ञायते । तत पदज्ञानात् संस्कारः, ततस्तथैव वर्णक्रमेण द्वितीयपदज्ञानम्, तेन प्रथमपदज्ञानजन्मना च सस्कारेण पटुतर सस्कारो जन्यते । पुनस्तेनैव क्रमेण तृतीयपदज्ञान तेन प्राक्तनेन च सस्कारेण पीवरतर. संस्कारः । एव यावदन्त्यपदज्ञान- मन्तरेण स्थवीयसा सस्कारेण सर्वविषयमेकस्मरणमुपजन्यते, सस्कारस्यैवैकत्वात् । सोऽय स्मरणानुभवविषयीकृतवर्णसमूहो , वाक्यमित्युच्यते । ततो वाक्यार्थप्रतिपत्तिः । सस्कारस्य सस्कारान्तरकरणकोशलमवश्यमोषितव्यम् अन्यथा सर्वत्र क्रियाभ्यासोऽनर्थकः स्यात् । केचित्तन्न रोचयन्ते । अन्त्यपदार्थप्रतीतिसमये तदवच्छेदकतया प्रतिभासमानं पदं तावत् कारणमित्यत्र न अन्विताभिधानवादी के मतानुसार भी पदो मे योग्यतादि सामग्री समवधान मे ही वाचकता मानी गयी है । जो कोई ऐसा मानते है कि ' अन्विताभिधानवादी के मत मे अन्वय असभव होने से अभिधान नही होगा । अभिहितान्वयवादी के मत मे अन्वय न होने पर भी अभिधान विरुद्ध नही पडता, यह ठीक नही है, क्योकि शब्दो मे प्रकाशकता नैसर्गिक रहते हुए भी पुरुषनिष्ठ, गुणदोष से ही शब्दो के सदर्थ असदर्श की स्थिति बन जाती है । क्रियाकारकससर्गज्ञान ( सम्बन्ध बोध ) यद्यपि भिन्न भिन्न होती है तो भी पुरुष बुद्धि के प्रमाद आलस्य आदि के कारण वैसी ही अन्य बुद्धि भी हो जाती है । ऐसी स्थिति मे भी शब्द स्वतःप्रामाण्य रहता ही है, क्योकि बाधक हट जाने से उसमे कोई रुकावट नही । अङ्गल्यादि वाक्य मे भी शब्द सम्बन्धी समन्वय ( सम्बन्ध ) रहता ही है । नही तो अकचटत आदि की तरह दश दाडिम ( अनार ) षट् अपूप ( छह पूए ) इत्यादि शब्द कदम्ब की तरह अबोधकता ही रहेगी । अत अन्विताभिधान दोषावह नही है, बाधक यदि है या होगा तो वह भिन्न विषयक है उक्त बिषयक नही । पहले वर्णज्ञान होता है अनन्तर तद्विषयक सस्कार अनन्तर द्वितीय वर्ण का ज्ञान उससे अर्थात् प्रथमवर्णज्ञानोत्पन्न संस्कार से अपेक्षाकृत तीव्रतर सस्कार होता है अनन्तर तीसरे वर्ण का ज्ञान और उस प्राक्तन संस्कार से भी तीव्रतर सस्कार होता है । इस तरह अन्तिम वर्णज्ञान के पश्चात् जो सस्कार होता है उससे पूरे वर्णों का एक पिण्डीभूत स्मरण बनता है । इस प्रक्रिया से अन्तिम वर्ण के ज्ञान का विनाश और विनाशकालिक ज्ञान को स्मरण का विषय बनाता हुआ वर्णों का समूह पद कहलाता है । फिर पद के ज्ञान से सस्कार और फिर उसी वर्णक्रम से दूसरे पद का ज्ञान और वह प्रथमपदज्ञानोत्पन्न सस्कार पूर्वापेक्षया पटुतर संस्कार उत्पन्न होता है । पुन उसी क्रम से तृतोयपद ज्ञान और पुन. पूर्वापेक्षया गाढतर संस्कार होता चलता है इस क्रम से अन्तिम पद ज्ञान के माध्यम से गाढतर संस्कार से सर्वपदविषयक एक दृढ स्मरण उत्पन्न हो जाता है । वह सस्कार एक होता है । वह यह स्मरणानुभवविषयक पद समूह वाक्य कहलाता है | चूँकि वर्णसमूह ही पद है अत. पूर्वोक्तस्मरणानुभवविषयक वर्णसमूह भी वाक्य कहा जाता है । वाक्य प्रयोग के अनन्तर बाक्यार्थज्ञान होता है । संस्कार से सस्कारान्तर लाभ का कौशल अवश्य प्राप्त करना चाहिए, नही तो सर्वत्र क्रिया का अभ्यास अन क हो जायगा । कुछ लोग उक्त मत नहीं मानते । अन्तिमपदार्थबोध के समय उसके सहयोगी के रूप मे भासमान पद कारण है इस तथ्य को मानने से कोई मतभेद नही । स्वयं प्रतिभासित होता हुआ कर्म भी तो रहता है वह यदि उस समय कर्म के रूप में उपस्थित YS
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वेदार्थपारिजात २१५५ विभति । स्वय च प्रतिभासमानत्वात् कर्मापि भवत्येव । तस्य तदानी कर्मत्वे कारण चिन्त्यम् । तत्र न तावत् श्रोत्र कारणम्, अन्त्यपदप्रतीत्यनन्तरमेतद्व्यापारस्य विरतत्वात् विरम्य पुनर्व्याप्रियमाणत्वानुपपत्ते । मनस्तु बाह्ये विषये स्वातन्त्र्येण प्रवर्तितुमसमर्थमेव । तत्प्रवृत्तौ सर्वाण्येव प्रथमपदात् प्रभृति पदानि मानसव्यवसायगोचरचारीणि भवन्तु, कि स्मर्यमाणत्व- मन्येषामुच्यते । अथ तदन्त्यपदमर्थे इवात्मन्यपि तदवच्छेदकत्वप्रतिपत्ते कारणत्व प्रतिवत्स्यत इति मन्यसे चेत्? तदयुक्तमेव, स्वप्रतीतौ तस्य कर्मत्वात् । न चैकस्यामेव क्रियाया तदेव कर्म करण च भवितुमर्हति । अन्ये तु प्रथम पदज्ञान ततः सकेतस्मरण तत पदार्थज्ञान पदार्थज्ञानात् पदज्ञानस्य विनश्यत्ता विनश्यदवस्थ- पदज्ञानमपेक्षमाण श्रोत्र प्रथमपदावच्छेदेन द्वितीयपदे ज्ञानमादधाति । द्वितीयपदज्ञानानन्तर पुन सम्बन्धस्मरण तत. पदार्थ- ज्ञान तेन द्वितीयपदज्ञानस्य विनश्यत्ता विनश्यदवस्थपदज्ञानमहायाच्छोत्रात् तथैव तदवच्छेदेनोत्तरोत्तरपदज्ञान तावद्या- वदन्त्यपदज्ञानमिति । तज्ज्ञानानन्तर च प्राक्तनप्रक्रियावन्नात्र पूर्वपदस्मरणमुपयुज्यते । तत्फलस्य च विनाशदशापतितपद- ज्ञानकृतावच्छेदमहिम्नैव सिद्धत्वात् तस्य हि फलमन्त्यपदावगमसमये सकल वपदोपस्थानम् । तच्च विनश्यदवस्थपूर्वपूर्वपद- ज्ञानकृतोत्तरोत्तरपदानुरागबलादेव लब्धमिति किं तत्तत्स्मरणेन? तदभावाच्च नात्र यौगपद्यादिचोद्यावसरः । एव वाक्यादेव वाक्यार्थप्रत्यय सेत्स्यति ( न्या० म० पृ० ३६१-३६२) । - अपरे तु इयमपि कल्पना नानवद्येति । यतो हि पूर्वपदोपरागपूर्वकद्वितीयपदज्ञानोपजननानुपपत्ते प्रथमपद- ज्ञानानन्तरं सम्बन्धस्मरण तेनैव तस्य विनश्यत्ता । पदार्थप्रत्तिपत्तिकाले च परज्ञान विनष्टमेव । विनश्यदवस्था च बुद्धयन्तर- विरोधिनीति सामान्येन श्रवणात् । कार्यभूतया बुद्धया कारणभूता बुद्धिविरुद्धयेत न बुद्धिमात्रेण बुद्धिमात्रमिति तदयुक्तम्, विशेषे प्रमाणाभावात् । तथाभ्युपगमेऽपि पदज्ञान सस्कार इव समयस्मृते. कारणमेव, सस्कारेणेव तेनापि विना तदनुत्पादात् । है तो वह कारण भी रहे यह सभव नही । वहाँ श्रोत्र कारण नही हो सकता क्योकि अन्तिम पद के बोध के बाद उसकी क्रिया समाप्त हो जाती है, एक बार विरत हो जाने के बाद पुन उसकी क्रिया नही होती । मन तो बाहरी विषय मे स्वत स्वतन्त्रतापूर्वक प्रवृत्त होने मे असमर्थ है । यदि उसकी प्रवृत्ति मानेगे तो प्रथमपद से लेकर सभी पद मानस व्यापार के विषय हो, तब कुछ स्मर्यमाण और कुछ मनसा उपस्थित यह द्वैविध्य नही होगा । यदि अन्तिम पद जैसे अर्थबोध में सहायक है आत्मा मे भी सहायक बोध का कारण मानोगे तो यह अनुचित है, आत्मबोध मे वह कर्म ही रहेगा । एक ही क्रिया मे वही कर्म और करण नही हो सकते । दूसरे लोग तो ऊपर की बात को दूसरे ही तरह मानते है - पहले पद का ज्ञान होता है उसके बाद सक्तस्मरण तत पदार्थ का ज्ञान और उससे पद ज्ञान की निवृत्ति, निवर्तमान पदज्ञान को रखनेवाला श्रोत्र प्रथम पद के साथ दूसरे पद मे ज्ञान उत्पन्न करता है । द्वितीय पद के ज्ञान के बाद फिर सम्बन्ध का स्मरण होता है उसके बाद पदार्थ का ज्ञान उससे द्वितीय पद ज्ञान की निवृत्ति निवर्तमान पद ज्ञान के सहायक श्रोत्र से वैसे ही उसकी सहायता से उत्तरोत्तर पदो का ज्ञान चलेगा, जब तक अन्तिम पद का ज्ञान हो जाय । उस अन्त्यपद के ज्ञान के बाद पहली प्रक्रिया की तरह यहाँ पूर्वपद का स्मरण जरूरी नही होता । ऐसे ज्ञान के फल का विनाश पडे पदज्ञान की सहायता से ही सिद्धि हो जाती है । उसका फल अन्तिमपद ज्ञान के समय सभी पूर्वपदो का उपस्थित कराना वह भी निवर्तमानपूर्व पूर्वपद ज्ञान से उत्तरोत्तर पदानुरागबल से ही प्राप्त हो जाता है अतः उन उन प्राक्तन पदो के स्मरण की क्या जरूरत है । स्मरणाभाव में यहाँ एक काल मे उपस्थित होने का प्रश्न ही नही उठता । इस तरह वाक्य से ही वाक्यार्थ प्रत्यय सिद्ध हो जाता है | ( न्या ० म० पृ० ३६१ - ३६२ ) । 1 दूसरे लोग इस कल्पना को भी निर्दोष नही मानते है । क्योकि पूर्वपद के छायापूर्वक दूसरे पद की ज्ञानोत्पत्ति सभव न होने से प्रथम पद के ज्ञान के बाद सम्बन्ध का स्मरण होगा और उसी से उसकी निवृत्ति हो जायगी । पदार्थज्ञान के समय मे पदज्ञान-निवृत्त ही रहेगा । विनष्ट होती हुई अवस्था दूसरो बुद्धि की विरोधिनी होती है ऐसा सुना जाता है । कार्यरूपाबुद्धि से कारणरूप बुद्धि विरुद्ध होगी अत बुद्धि होनेमात्र से अर्थात् तद्विषयकबुद्धि मात्र से बुद्धि का होना ऐसा मानना यह उचित नहीं है क्योकि विशेष है या F
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वेदार्थपारिजात२१५६ सस्कारप्रबोधस्तद्व्यापार इति चेन्न, तेनापि द्वारेण यत्कारण तत्कारणमेव । तदिह पदज्ञान समयस्मरण पदार्थज्ञानमिति त्रीणि ज्ञानानि युगपदवतिष्ठन्ते इति पर प्रमाद । अपि च, पदज्ञानमुपजायमान वर्णक्रमेण जायते न सहसैव, निरशपदवादस्य निरस्तत्वात् । द्वित्राणि त्रिचतुराणि पञ्चषाणि वाक्षराणि क्रमेणैकस्मिन् पदे ग्रहीष्यन्ते । तद्विषयाश्च क्रमभाविन्य, उपजनना-पायधर्मिण्यो बुद्धय । अत्रान्तरे विनश्यदवस्थ मन्त्यपदज्ञानमासिष्यते तदुपरागेण द्वितीयपदज्ञानमुत्पत्स्यत इति दुराशैव । अपि च, व्यवहितोच्चरितेभ्योऽपि पदेभ्यो वाक्यार्थप्रत्यया दृश्यते । यत्रानेककार्यालोचनव्यग्रहृदय स्वामी रे कन्दलक कल्पितपर्याणमश्वमानयेति वाक्यस्य प्रतिपद मध्ये मध्ये व्यवहारान्तर कुर्वन् वक्ति, तत्रापि वाक्यार्थावगमो भवति । न च भवन्मते तदुपपद्यते । पदानुरागस्य तत्रासम्भवात्, सर्वपदानुस्मरणस्य चानभ्युपगमात् । यदुक्त चिर तिरो हतवर्णप्रबन्धानुसन्धान दुर्घटमिति तत्र केचिदेव निवेदयन्ति-चिरातिक्रान्तत्वमचिराति-क्रान्तत्व वा न स्मृतिकारणम् । सस्कारकारणक हि स्मरणम् । तच्च सद्य प्रलीने चिरप्रलीने वा न विशिष्यत इति पूर्वेषा पदाना चिरतिरोहितानामपि व्यवहितोच्चरितानामपि सस्कारात्स्मरण भवत्येव । अन्त्यपदस्यानुभूयमानत्वोपगमे ज्ञानयौगपद्यादिप्रमादप्रसङ्ग इति वरमन्त्यपदमपिवरमन्त्यपदमपि स्मर्यमाणमस्तु । स्मृत्यारूढान्येव सर्वपदानि वाक्यार्थ-मवगमयिष्यन्ति । तत्र वर्णक्रमेण तावत्प्रथम पदज्ञान तत. सकेतस्मरण सस्कारश्च युगपद् भवतः । ज्ञानयोहि यौगपद्य' शास्त्र प्रतिषिद्ध न सस्कारज्ञानयोः । तत पदार्थज्ञान तेनापि सस्कार पुनर्वर्णक्रमेण द्वितीयपदज्ञान तत. संकेतस्मरणम् । . पूर्वसंस्कारसहितेन तेन पटुतर सस्कार पुन पूर्ववर्णक्रमेण तृतीयपदज्ञान सकेतस्मरण पूर्वसस्कारापेक्ष पटुतर संस्कारः होता है इसमे कोई प्रमाण नही है । ऐसा मान लेने पर भी पदज्ञान सस्कार की तरह सम्बन्धज्ञान का कारण ही है सस्कार की तरह उसके बिना भी उसकी उत्पत्ति नही होगा । सस्कार का ज्ञान ही उसकी क्रिया है ऐसा कहना भी ठीक नही, क्योकि संस्कार द्वारा भी जो कारण है वह कारण तो है ही । तो इस क्रम मे पदो का ज्ञान, सम्बन्ध का स्मरण और पदार्थ का ज्ञान ये तीन ज्ञान एक साथ रहते है यह मानना भयङ्कर भूल हैं । और भी विचार कीजिए, पद का ज्ञान उत्पन्न होता हुआ वर्ण के द्वारा ही होग अकारण नही, पद निरंश होता है यह मत तो सर्वसम्मत्या अस्वीकार्य माना गया है । दो तीन या तीन चार या पाँच छ, अक्षरक्रम से एक पद मे गृहीत होते है । तद्विषयिणी क्रमिक उत्पादविनाशशालिनी बुद्धियाँ होती है । इसी बीच मे नष्ट होता हुआ अन्तिम पद का ज्ञान होगा उसकी छाया लिए दूसरे पद का ज्ञान उत्पन्न होगा यह दुराशामात्र है । व्यवधान से भी उच्चरित पद वाक्यज्ञान करा देते है । जहा कोई घोडे का स्वामी अनेक कामो में लगा होता है तो भी 41 ऐ कन्दलक जीन कसकर तैयार घोडे को लाओ" ऐसा वाक्य बार-बार बीच-बीच मे कार्य करता हुआ भी कहता रहता है ऐसी स्थिति में भी वाक्यार्थज्ञान होता है । और यह व्यवस्था पूर्वोक्तमत के चलते न हो पायेगी । पद की छाया वहाँ सम्भव नही और सभी पदो का स्मरण माना नही जाता । जो लोग यह कहते थे कि " देर से कहे गये वर्णक्रम का अनुमन्धान दुर्घट है " इस विषय में कुछ लोग निम्नलिखित समाधान प्रस्तुत करते हैं -"बहुत समय पहले का कहा गया या तत्काल का कहा गया पद या वाक्य स्मृति का हेतु नही होता क्योकि स्मरणात्मकज्ञान तो सस्कारमात्र जन्य होता है, वह सस्कार तत्काल उच्चरित या बहुत पहले के उच्चरित पद या वाक्य में कोई महत्व कही रखता, बहुत पहले का उच्चरित हो या बीच में रुक-रुक करके कहा गया हो संस्कार के बल से उनका स्मरण होता ही है । अन्तिम पद का अनुभव हो रहा है ऐसा मानने पर ज्ञान के एक काल के होने का जो असावधानी का प्रसंग आने की बात आती है अत. उत्तम है कि अन्तिम पद का अनुभव न मानकर उसका भी स्मरण ही माना जाय, स्मरण मे आये सभी पद वाक्यार्थबोध मे कारण होगे । वर्णक्रम से पहले पदज्ञान होगा तत सङ्केत का स्मरण, और सस्कार साथ-साथ होगे । ज्ञान का एककालिकत्व शास्त्र मे निषिद्ध है न कि ज्ञान और सस्कार का एककालिकत्व | पदज्ञान के बाद पदार्थज्ञान हों तो उससे भी सस्कार होगा और पुनः वर्णक्रम से दूसरे पद का ज्ञान होगा, उससे सङ्केत का स्मरण होगा । पूर्व संस्कार के साथ होने के कारण उससे पटुतर सस्कार होगा इसी क्रम से पूर्ववर्ण के ज्ञान के बाद तीसरे पद का ज्ञान सङ्केत स्मरण आदि होगें और पूर्व सरकार को अपेक्षा अधिक पटुतर संस्कार इस क्रम से पदज्ञान से उत्पन्न '
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वेदार्थपारिजात २१५७ इत्येव पदज्ञानजनितपीवरे सस्कारे पदार्थज्ञानजनिते च तादृशे मस्कारे स्थितेऽन्त्यपदार्थज्ञानानन्तर पदसस्कारात् सर्वपद- विषया स्मृति पदार्थसस्काराच्च पदार्थविषया स्मृतिरिति सस्कारक्रमेण द्वे स्मृती भवत । तत्रैकस्या स्मृतावुपारूढ पद- समूहो वाक्यमितरस्यामुपारूढ पदार्थममूहो वाक्यार्थ । ननु स्मृतेरप्रमाणत्वादप्रमाण वाक्यार्थबोध इति चेन्मैवम्, तथा सम्बन्धग्रहणात् । यत्र ह्यन्यथासम्बन्धग्रहण- मन्यथा प्रतिपत्तिस्तत्राय दोष । यथा धूमे गृहीतसम्बन्धे नीहाराद्दहनानुमितौ । इह तु क्रमवर्तिना वर्णानामन्यथाप्रत्यया- सम्भवाद् यथैव व्युत्पत्तिस्तथैव प्रतीनिरिति न किञ्चिदवद्यम् । अचिरनिर्वृत्तानुभवसमनन्तरभाविनी च स्मृतिरनुभवायते । अथवा कृत स्मरणकल्पनया । अन्त्यपदार्थज्ञानान्तर सकलपदार्थविषयो मानसोऽनुव्यवसाय गतादिप्रत्ययस्थानीयो भविष्यसि । तदुपारूढपदानि वाक्यम् 1। तदुपारूढरच पदार्थो वाक्यार्थः । तथाविधश्व मानसोऽनुव्यवसाय सकललोकसाक्षित्वादप्रत्याख्येयः । एकाकारो हि वाक्यार्थप्रत्यय प्रत्यात्मवेदनोयो न शक्योऽपह्नोतुम् । न चामौ स्मर्यमाणादनुव्यवमायाद्वा विना सम्पद्यते इत्यस्ति तदुपयोगः । इत्थ स्मर्यमाणारूढमङ्कलनाज्ञानविपयाभूत वेद पदनिकुरम्ब वाक्य तथावि वश्चेष वाक्यार्थः । किन्तु सर्वत्र कदम्बकरूपादुपायात् कदम्वकरूपमुपेय प्रतीयत इति दुरवगम पदार्थविभागः । ततश्च पदार्था- नामनपेक्षणे गामानयेति वाक्यादश्वबन्धननियोग. प्रतीयेत । अपेक्ष्यते तु पदानामर्थः । सोऽपेक्ष्यमाण इयानिति नियतोऽव- धारयितव्य । तदवधारण तु शुद्धाभिधायिषु पदेष्ववकल्पते । तस्मात् पदपदार्थोत्पत्तिक सम्बन्ध इष्यते । वृद्धव्यवहारेषु दृढ संस्कार मे तथा पदार्थज्ञानजनित दृढ सस्कार के रहते अन्तिम पदार्थ ज्ञान के बाद पद सस्कार से सभी पदो की स्मृति और पदार्थ सस्कार से पदार्थविषयक स्मृति होगी । इस संस्कार के क्रम से दो स्मृतियाँ होगी । उनमे पहली स्मृति में उपारूढ पदो का समूह वाक्य और दूसरी मे उपारूढ पदार्थसमूह वाक्य का अर्थ होगा । यदि कहे कि स्मृति के अप्रामाण्य के कारण प्रमाण ही वाक्यार्थज्ञान कहलायेगा तो यह ठीक नही, क्योकि स्मृति के अनुसार ही सकेतज्ञान माना जाता है । जहाँ दूसरे प्रकार का सम्बन्ध ज्ञान और दूसरे प्रकार का बोध होता है वहाँ के लिये उक्त दोष होता है । जैसे धुँआ मे सम्बन्ध ( सकेत ) ज्ञान होने पर नीहार से जलने की अनुमिति होने लगे ऐसे स्थल मे दोष होगा । यहाँ तो क्रम से उपस्थित वर्णो का भिन्न बोध होना संभव न होने से जैसी व्युत्पत्ति होगी वैसा ज्ञान होगा इसलिये कोई दोष नही है । ताजे अनुभव के तत्काल बाद होनेवाली स्मृति एक प्रकार का अनुभव ही है । अथवा स्मरण के विषय का विचार सर्वथा व्यर्थ है । अन्तिम पदार्थ के ज्ञान के बाद सभी पदार्थविषयक मानसज्ञान होगा जो सैकडो हजारो बोधो के समान होगा । मानसबोध के आश्रित जो पद- समूह है वे वाक्य कहलात है । वैसे ही मानसबोध के आश्रित जो पदार्थ है वे वाक्यार्थ कहलाते है । वैसे मानस बोध के साक्षी सर्वजन है अतः उसका खण्डन नही हो सकता । वाक्यार्थज्ञान एक प्रकार का होता है जिसे प्रत्येक व्यक्ति जानते मानते है उसे झूठा नही कहा जा सकता । ऐसा ज्ञान स्मरण या ज्ञान चाहे वह अनुभवात्मक या मानस हो उनके बिना हो नही सकता अतः ऐसे ज्ञान का बहुत उपयोग है । इस तरह स्मृत्याश्रित ज्ञान का विषय पद समूह वाक्य है और उसी प्रकार का वाक्यार्थ है । किन्तु सर्वत्र सामूहिक उपाय से सामूहिक उपेय प्रतीत हो रहा है अत पदार्थ का विभाग दुर्ज्ञेय है । दुर्बोधता के कारण पदो मे अर्थ न मानने पर गाय लाओ इसका अर्थ घोडे को बाँधो ऐसा होने लगेगा | अतः प्रत्येक पद का अर्थ आवश्यक है । और वह 'इतना आवश्यक' है ऐसी कोई नियत सीमा निर्धारित होनी चाहिए । और वह अवधारण शुद्ध अभिधाशक्ति द्वारा वाचक पदो मे हो सकता है । अत पद और पदार्थ में एक औत्पत्तिक ( जन्मजात ) सम्बन्ध अपेक्षित हैं । वृद्धो के व्यवहार में वाक्य होनेवाला बोध पदो मे भी माना गया है, नही तो प्रतिवाक्य मे बोध मानना पडेगा । और ऐसा बोध अनन्त होने के कारण उसका उपपादन अशक्य होगा -इस तरह वाक्यार्थज्ञान द्वारा चला आता व्यवहार उच्छिन्न हो जायगा । पदपदार्थ ज्ञाता लोगो को नवीन कविरचितश्लोक से भी बोध होता देखा जाता है । वह बोध पदपदार्थ के प्रत्येक के ज्ञान के आधार पर ही होता माना जाता है । वाक्य और वाक्यार्थ में प्रत्येक से बोध अपेक्षित होने पर बोध ही नही होगा । इसलिए अन्विताभिधानवाद समर्थनीय नही है । और उसके न मानने पर दूसरे पद का उच्चारण व्यर्थ ही है क्योकि एक ही पद से पदान्तर का अर्थज्ञान हो जायगा । बिना परस्परान्वय के तो कोई पद होगा नही इस तरह
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२१५८ वेदार्थपारिजात वाक्यादपि भवन्ती व्युत्पत्ति. पदपर्यन्ता भवति, इतरथा हि प्रतिवाक्य व्युत्पत्तिरपेक्ष्येत । सा चानन्त्याद् दुरुपपादेति शाब्द- व्यवहारोच्छेदप्रसङ्ग · । दृश्यते च पदार्थविदामभिनवकविनिर्मितश्लोकादपि वाक्यार्थप्रतिपत्तिः । सा पदतदर्थव्युत्पत्त्यैवा- वकल्पते । वाक्यवाक्यार्थयोस्तु व्युत्पत्तावपेक्षमाणाया सा न स्यादेव । तस्मान्नान्विताभिधानम् । अतश्चैवं पदान्तरोच्चारणवैफल्प यप्रसङ्गादेव स्मादेवपदात् । तदुपरञ्चकद्वितीयपदार्थावगति' सिद्धैव । तदपि पदमन्यानुरक्तस्वार्थवाचीत्यनेनैव न्यायेनैकमेव पदमखिलपदाभिधेयार्थवाचि सम्पन्नमिति तेनैव व्यवहारोऽस्तु । न चासौ सम्पद्यते । गौरित्युक्ते सर्वगुणक्रियावगमान्न ज्ञायते किमुपादीयतामिति । सर्वावगमो ह्यनवगमनिर्विशेष एव व्यवहारानुप- पत्तेः । नहि रसविदा पूर्णोऽब्धिर्मरोरतिरिच्यते, सलिलकार्यानिष्पत्ते । नियतगुणक्रियानुरक्तस्वार्थप्रतिपादने तु गोगब्दस्य हेतु नोत्पश्याम । पदान्तरसन्निधान नियमहेतुरिति चेत्, किं स्वरूपमात्रेणार्थप्रतिपादनेन वा? यदि स्वरूपमात्रेण तर्हि जप- मन्त्रपदानामिव सन्निधान भवदप्यसन्निधानान्न विशिष्यते, अगृहीतसम्बन्धस्य तत्कृतोपकारादर्शनात् । अर्थप्रतिपादनेन पदान्तरस्य नियमहेतुत्वे त्वभिहितानामर्थानामेवान्वय उक्तो भवति । तस्मात् पदेभ्य. प्रतिपन्नास्तावदर्था आकाङ्क्षासन्निधि- योग्यतावशेन परस्परमभिसम्बध्यन्ते । यो येनाकाङ्क्षितो यश्च सन्निहितो यश्च सम्बन्धुं योग्य स तेन सम्बध्यते नातोऽपरः । अत एव ' अङ्गुल्यग्रे करिणा शतमास्ते' इति वाक्ये नास्ति सम्बन्ध', योग्यत्वाभावात् । अन्विताभिधानवादिना तु अन्वितस्या- भिधानात्तत्रान्वयः प्राप्नोत्येव । स च नास्ति । तस्मादभिहितानामेव पदार्थानामन्वयः । तदेवोक्तम्, 'पदानि हि स्व स्वमर्थ- मभिधाय निवृत्त व्यापाराणि भवन्ति अथार्था अवगता वाक्यार्थं सम्पादयन्ति' ( न्या० म० पृ० ३६५) इति । अपरे तु न "त्पत्तिनिरपेक्षो दीप इव शब्दोऽर्थमवगमयत व्युत्पत्तिश्च वृद्धव्यवहारात् । वृद्धाना च व्यवहारो वाक्यात् न पदात्, केवलस्य पदस्याप्रयोगात् । 'अर्थप्रकरणप्राप्तपदार्थान्तरवेदने । पद प्रयुज्यते यत्तद्वाक्यमेवोदित भवेत् ॥ वक्ता वाक्यं एक पद दूसरे के अर्थ से उपरक्त होकर ही होगा । और वह दूसरा पद भी सभिन्न पद के अर्थ से अनुरक्त होता हुआ ही स्वार्थवाचक रहेगा इस प्रक्रिया से एक पद ही सभी पदो के अर्थ को कह सकेगा अत एक पद से ही व्यवहार चले, क्या हर्ज है? इस पक्ष को न मानकर अब खण्डन करते है ---कि उक्त कथनानुसार व्यवहार सम्पन्न नही होगा । गौ शब्द कहने से ही सभी गुण और क्रिया का ज्ञान हो जाने से अब यह समझना दुष्कर होगा कि अब आगे क्या करना होगा? क्योकि सबकुछ जानना कुछ न जानने के समान ही है, व्यवहार तरतम भाव से चलता है सर्वज्ञ और अनभिज्ञ से नही । जो षड्विध रस का ज्ञान रखता है उसके लिये भरापूरा समुद्र मरुप्रदेश से कुछ भी भिन्न नही क्योकि समुद्र का खारा जल न पोने योग्य है न सिंचाई के योग्य है । नियतगुण क्रिया से उपरक्त या अनुरक्त गो 15 आदि शब्द स्वार्थवाचक बने रहे इसका कोई विनिगमक कारण नही समझ मे आता? दूसरे पद का सामीप्य गमक माने तो प्रश्न होगा कि वह पदसामीप्य स्वरूपमात्र से नियामक होगा या अर्थ प्रतिपादक रूप से? पहला पक्ष सदोष है क्योकि जपे जाने वाले मन्त्र के पद सन्निहित रहने पर भी दूर की तरह ही है क्योकि जिन मन्त्रघटक पदो का अर्थ ज्ञात नही है वे परस्पर कैसे एक दूसरे के उपकारक }, होगे? नही होते न होगे । दूसरा पक्ष भी उचित नही प्रतीत होता क्योकि अर्थ प्रतिपादन द्वारा यदि दूसरे पद का सन्निधान नियमन का 1 कारण होगा तब तो उक्त अर्थो का हो अन्वय होता है यह बात आ गयी । अत पद से ज्ञात होने वाले अर्थ आकाक्षा योग्यता सन्निधि [ के द्वारा ही आपस मे सम्बद्ध होते है । जो जिसका आकाक्षी है, जिसके पास है जिससे सम्बद्ध होना चाहता है वही उससे सम्बद्ध होता है उससे भिन्न नही । इसीलिए "अङ्गुलि के अग्रभाग में हाथियो का झुण्ड है अर्थात् सैकडो हाथो है इस वाक्य मे कोई आपसी सम्बन्ध नही होता क्योकि योग्यता नही है । अन्विताभिधानवादियो के मत मे तो अन्वित पद का दूसरे से सम्पर्क होता हे तो उनके मत मे अन्वय प्राप्त होगा ही । लेकिन होता नही, अतः अभिहित पदार्थो का ही अन्वय मान्य है । इसीलिए न्यायमञ्जरीकार ने कहा है कि "पद अपने-अपने अर्थ को कहकर विरत हो जाते हैं और उसके बाद अवगतार्थक होकर ही वाक्यार्थबोध कराते है " । दूसरे आचार्यो का मत है कि-जैसे दीपक अन्यवस्तुनिरपेक्ष होकर स्वयं वस्तु प्रकाशक है वैसे शब्द प्रकृति प्रत्यय निरपेक्ष होकर अर्थज्ञापक नही होते । बोधापरपर्यायव्युत्पत्ति वृद्धो के व्यवहार से होती है । और वृद्ध व्यवहार वाक्य द्वारा ही होता है पद से नही क्योकि केवल पद का प्रयोग नही होता । न्यायमञ्जरीकार ने लिखा है कि-अर्थ,प्रकरण लिङ्ग आदि द्वारा दूसरे पद के