वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1281–1290
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1281–1290
पृष्ठ 1281
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बेरार्थ पारिजातः २१७९ hप्रवीणाः शास्त्रपूर्वके प्रयोगेऽभ्युदयः 'तत्तुल्यं वेदशब्देन' ( वार्तिकम् ) 'शास्त्रपूर्वकम्' ( वार्तिकम् ) शास्त्रपूर्वक यः शब्दान् प्रयुक्ते सोऽभ्युदयेन युज्यते । तत्तुल्य वेदशब्देन' वेदशब्दा अप्येव वदन्ति योऽग्निष्टोमेन यजते य उ चैनमेवं वेद, योऽग्नि नाचिकेत चिनुते य उ चैनमेवं वेद' अपर आह-( वा ० तत्तल्य वेद शब्देन' इति। यथा वेदशब्दा नियमपूर्वमधीताः फलवन्तो' भवन्ति । एव यः शास्त्रपूर्वक शब्दान् प्रयुङ्क्ते सोऽभ्युदयेन युज्यत इति । तत्तुल्यमिति वेदः शब्दो यस्यार्थस्य स वेदशब्दः, तस्य यथा ज्ञात्वानुष्ठानम्, तथा शब्दानामपि प्रकृत्यादिविभागज्ञानपूर्वक प्रयोग इत्यर्थ ' ( इति प्रदीप.) । ' अपर आह-तत्तुल्यं वेदशब्देन वेदशब्दा यथा नियमपूर्वकमधीता फलवन्तो भवन्ति, एवं यः शास्त्रपूर्वक शब्दान् प्रयुङ्क्ते सोऽभ्युदयेन युज्यते । ननु चोक्तं ज्ञान एव धर्मं इति चेत्, तथाऽधर्म इति नैष दोष । शब्दप्रमाणका वय यच्छन्द आह तदस्माक प्रमाणम् । शब्दश्च धर्मज्ञाने धर्ममाह नापशब्दज्ञानेऽधर्मम् । यच्च पुनरशिष्टाप्रतिषिद्धम्' ( वार्तिकम् ) नैव तद्दोषाय भवति नाभ्युदयाय । तद्यथा हिक्कितहसितकण्डूयितानि नैव दोषाय भवन्ति नाभ्युदयाय । अथवा ज्ञाने धर्म इति ब्रुवतोऽर्थादापन्न भवति ' ( ) | अपशब्दज्ञानपूर्वके शब्दज्ञाने धर्म महाभाष्यम् अपशब्दज्ञाननान्तरीयकत्वाद् शब्दज्ञानस्य पृथक्फलमपशब्दज्ञाने नास्तीत्यर्थः । अथवा कूपखानकवदेतद्भविष्यति । तद्यथा कूपखानक कूप खनन् यद्यपि मृदा पासुभिश्चावकीर्णो भवति सोऽप्सु सञ्जातासु तत एव तं गुणमासादयति येन स च दोषो निर्हन्यते भूयसाभ्युदयेन च योगो भवति एवमिहापि । यद्यप्यपशब्दज्ञानेऽधर्म', तथापि यस्त्वसौ शब्दज्ञाने धर्म स च दोषो निधानिष्यते, भूयसा चाभ्यु दयेन योगो भविष्यति । रूढिशब्दप्रकारास्ताच्छीलिकाः । न च रूढिशब्दा गतिभिविशेष्यन्ते । नहि भवति देवदत्त प्रदेवदत्त इति' ( महाभाष्यम् ३।२।५५ ) यथा रूढिशब्देषु क्रिया केवल व्युत्पत्यर्थमाश्रीयते गच्छतीति गौरिति, तेन गमनक्रियारहितोऽपि गौर्भवति । गोपिण्डाच्चान्योऽर्थो गमनविशिष्टोऽपि गौर्न भवति । 'उणादयो बहुलम्' ( पा०सू० २।३।१ ) इति । सूत्रेणोणादि- है कि प्रयत्न कर अध्ययन करने वाले और बिना अध्ययन किये व्यक्ति भी समान रूप से शब्दो के प्रयोग मे कुशल होते हैं । अतः मानना पडता है कि शास्त्र के अध्ययन पूर्वक शब्दों का प्रयोग करने पर ही अभ्युदय प्राप्त होता है । यहा पर वेद के समान हो न्याय की प्रवृत्ति होती है । वेद शब्द कहते है कि जो अग्निष्टोम यज्ञ करता है और जो इस नाचिकेत अग्नि का चयन करता है, उनका समान फल है । जैसे वैदिक अनुष्ठान उसके पूरे विधि-विधान को जानने के बाद ही किया जाता है, उसी तरह से शब्दो का प्रयोग भी प्रकृति, प्रत्यय आदि के विभाग को जानने के बाद ही करना चाहिये । 'तत्तुल्य वेदशब्देन' का एक दूसरा अर्थ भी है कि बेदशास्त्र का नियमपूर्वक अध्ययन करने से जैसे उसका शुभफल मिलता है, इसीतरह से शास्त्र का अध्ययन करके जो साधु शब्दो का प्रयोग करता है वह भी अभ्युदय से सयुक्त होता है । तब इसका क्या उत्तर है कि यदि साधु शब्द के दान से धर्म होता है, तो अपशब्दो के ज्ञान से अधर्म भी होगा? उत्तर है कि ऐसी बात नही है । हम लोग शब्द को प्रमाण मानते है । यह शब्द साधु शब्द के ज्ञान से धर्म होता है, इतनी ही बात कहता है । अपशब्द के ज्ञान से अधर्म होता है, ऐसा कही नही कहा गया है ( अपशब्द के ज्ञान से न तो धर्म होता है और न अधर्म ही । जैसे हिचकी लेना, हसना, खुजलाना न तो दोष के लिये होता है और न अभ्युदय के लिपे हो । अथवा 'ज्ञाने धर्म ' इसका अर्थ यह कर लिया जायगा कि अपशब्द के साथ शब्द का भी ज्ञान होने से धर्म होता है । ज्ञान का ज्ञान अपशब्द के साथ जुड़ा हुआ है, अत अपशब्द के ज्ञान का अलग से कोई फल नही विहित है । अथवा कूप खननेवाले का दृष्टान्त यहा लागू होगा । जैसे कूप को खोदने वाला पहले मिट्टी और धूल से भर जाता है, किन्तु पानी निकल आने के बाद उसी से नहाकर वह स्वच्छ हो जाता है । इसोप्रकार यहा भी होगा कि यद्यपि अपशब्द के ज्ञान से अधर्म होगा, किन्तु जैसे 1-जैसे उसके साधु शब्दों का ज्ञान बढता जायगा, वैसे -वैसे अपशब्दजनित दोष निवृत्त होते रहेंगे और वह महान् कल्याण से संयुक्त हो जायगा । 1 रूढि शब्दों का अपना विशिष्ट स्वभाव होता है । गति प्रभृति से इनमें विशेषता का आधान नही किया जा सकता । देवदत्त को कोई प्रदेवदत्त नही कहता । ऐसे रूढि शब्दो मे क्रिया केवल व्युत्पत्ति के निमित्त निर्दिष्ट की जाती है । 'गच्छतीति गो." यह केवल व्युत्पत्तिप्रदर्शन मात्र है । गमन क्रिया के अभाव में भी वह 'गौ' कही जाती है और गोपिण्ड से भिन्न पिण्ड के चलने पर
पृष्ठ 1282
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१८० वेदार्थपारिजातः सिद्धा अपि शब्दा सङ्ग हीता भवन्ति, विशेषतो नैगमाना रूढाना शब्दाना साधुत्व तेन सिद्ध्यति । अपशब्देभ्यो भिन्न- त्वात्तेषामपि साधुशब्दत्वमेव, वैदिकत्वात् शिष्टप्रयुक्तत्वाच्च । साधुत्वाच्च तत्प्रयोगेण पुण्यनिष्पत्तिः । 'एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः सुष्ठु प्रयुक्तः शास्त्रान्वित स्वर्गेलोके च कामधुग्भवति' इति शास्त्रपूर्वक प्रयोगेण विशेषतः पुण्यजनकत्वमुक्तम् 1। ओणादिका शब्दा अव्युत्पन्नप्रातिपदिकत्वाद् रूढा एव । 'उणादयो बहुलम्' ( पा० सू० ३।३।१ ) इत्यत्र 'पुव' सज्ञायाम्' ( पा० सू० ) इत्यत संज्ञाग्रहणमनुवर्त्य उणादिप्रत्ययान्ताः सर्वे संज्ञाशब्दा इति दयानन्दातिरिक्तै सर्वैरपि वृत्तिकारैर्व्यवस्थापनात् । यत्तु-'उणादिशास्त्र एव सप्तकृत्व सज्ञापदनिर्देशात् तदयुक्तमिति', तन्न, अवान्तरसज्ञाबोधने तत्तात्पर्यावसानात् । यथा देवसज्ञान्तर्गता अपि रुद्रादित्यवस्वादिसंज्ञा सन्ति, प्रातिपदिकसज्ञान्तर्गता अपि अवान्तरा अनेकाः सज्ञा सन्ति, तथैव प्रकृतेऽपि बोद्धव्यत्वात् । 'नैगमरूढिभव हि सुसाधु' इति महाभाष्येण नैगमरूढशब्दसाधुत्वार्थ- मेवोणादिकमिति कण्ठत एवोक्तत्वात् । यथा निरुक्तोक्तनिर्वचनेनापि प्रसिद्ध एवार्थो व्युत्पाद्यते, तथैवोणादिविधानैरपि प्रसिद्धार्थस्यैव व्युत्पादनात् । अत एव पायुशब्देनोणादिव्युत्पत्यापि गुदेन्द्रियमेवावबोधनीयम् न रक्षकत्वेन परमेश्वर इति । तत्तदुपाधिविशिष्ट परमात्मैव सर्वशब्दाभिधेय इति त्वन्यदेतत् । यत्तु—'संज्ञाग्रहणेनोणादय. सामान्यार्थे यौगिका भवन्ति, सज्ञायास्तस्मिन्नर्थे रूढत्वात् । यदि च प्रकृति- प्रत्ययविभागेन औणादिकेभ्यो यौगिकार्थो न निःसरेत्, तर्हि सर्व उणादिस्थाः शब्दाः संज्ञावाचकाः स्युः, पुनः संज्ञाग्रहणम- नर्थकं स्यात् ।' इति, तदपि तुच्छम् अवान्तरसज्ञाबोधनार्थ सज्ञाग्र हणसार्थकत्वोपपत्ते । प्रकृतिप्रत्ययविभागेन साधुत्व- प्रदर्शनं तु शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थमेव ॥ भी उसको गौ नही कहा जाता । 'उणादयो बहुलम्' सूत्र से उणादि से सिद्ध शब्दो का संग्रह किया नया है । विशेषतः नैगम और रूढ शब्दो की सिद्धि उनसे होती है । अपशब्दो से भिन्न होने से ये भी साधु शब्द ही है । साधु शब्द होने से इनके प्रयोग से भी पुण्य की प्राप्ति होगी । 'एक शब्द:' श्रुति मे शास्त्र से परिज्ञात शब्दो के प्रयोग मे विशेष रूप से पुण्यजनकता बताई गई है । औणादिक शब्द अव्युत्पन्न प्रातिपदिक होने से रूढ माने जाते है । 'उणादयो बहुलम्' इस सूत्र मे 'पुवः सज्ञायाम्' इस सूत्र से संज्ञा पद की अनुवृत्ति मानकर उणादि प्रत्ययान्त सभी संज्ञा शब्द है, इस बात को दयानन्द को छोड़ बाकी सभी वृत्तिकारों ने माना है । उणादि शास्त्र में ही सात वार सज्ञा पद का निर्देश होने से इन वृत्तिकारो का उक्त अनुवृत्ति सही नही है, यह कथन स्वयं अपने मे सदोष है । उनको अवान्तर संज्ञाओ के बताने में उनका तात्पर्य माना जाता है । जैसे देवसज्ञा के अन्तर्गत रुद्र, आदित्य आदि संज्ञाए होती है, अथवा जैसे प्रातिपदिक सज्ञा के अन्तर्गत भी अन्य अनेक सज्ञाए होती है, उसी तरह से यहा समझना चाहिये । महाभाष्य में स्पष्ट ही कहा गया है कि नैगम और रूढ शब्दो की साधुता के प्रदर्शन के लिये ही उणादि प्रत्ययो का विधान है । निरुक्त के निर्वचन की तरह ही उणादि का विधान भी प्रसिद्ध अर्थ को बताने के लिये ही हैं । 1 यह कहा जाता है कि संज्ञा पद के ग्रहण से ऐसा प्रतीत होता है कि उणादि प्रत्यय सामान्य अर्थ मे यौगिक होते है । यदि प्रकृति और प्रत्यय के विभाग से औणादिक शब्दो से यौगिक अर्थ न निकले । तो फिर सभी उणादि प्रकरण सिद्ध शब्द संज्ञावाचक ही होंगे, तब पुनः संज्ञा पद का ग्रहण व्यर्थ होगा । किन्तु आर्यसमाजियों का यह दृष्टिकोण सही नहीं है, क्योकि अवान्तर संज्ञा का बोध -कराने के लिये पद ग्रहण की सार्थकता है । प्रकृति प्रत्यय के विभाग से शब्द की साधुता का प्रदर्शन तो केवल शिष्य की बुद्धि का विकास करने के लिये है ।
पृष्ठ 1283
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २१८१ यत्तु — 'उज्ज्वलदत्त सज्ञाधिकारे पुनः सज्ञाग्रहण प्रायेणौणादिकाना यौगिकत्वसिद्धत्रर्थम्' इति तदपि न -, ' ' मनोज्ञम् उज्ज्वलदत्तोक्ते रुणादिव्युत्पत्तिसार्थकत्वोपपादनपरत्वात् । उणादयोऽव्युत्पन्नानि प्रातिपदिकानि इति महाभाष्येण तद्यौगिकप्रतिक्षेपात् । न च तद्भाष्यं पक्षान्तरमूलकमिति वाच्यम्, असकृत्तादृशवचनानुपपत्तेः । न च तर्ह्यग्रह- गानि प्रातिपदिकानि, एतेषामपि स्वरूपवर्णानुपूर्वीज्ञानार्थमुपदेशः कर्त्तव्यः' इति भाष्य तु तेषामव्युत्पन्नप्रातिपदिकत्वे किमर्थं प्रकृतिप्रत्ययाद्युपदेश इत्याक्षेप निराकरणार्थमेव । स्फोटवादिवैयाकरणाना रीत्या प्रकृतिप्रत्ययाद्यशा असन्त एवार्थप्रतिपत्तिहेतुत्वादुपेयन्ते, तेषा स्वरूपेणेयत्ता- नुपपत्तेः । भवतीत्यत्र भूशब्दः प्रकृति क्वचिदन्वाख्यायते क्वचिद् भवगब्द ॥ प्रत्ययादेगागमगुणवृद्धिवर्णलोपाद्यन्वाख्यान- विसवादम् क पारमार्थिक प्रकृतिप्रत्ययविभाग | कल्पनामात्र त्वेतत् - इय प्रकृतिरेष प्रत्यय इति । शब्दनित्यत्ववादिभिरपि प्रकृतिविकार भावः शिष्यबुद्धिवैशद्याय शास्त्रपूर्वकप्रयोगेण पुण्यविशेपोत्पादनायैवाभ्युपेयते । 'मधु -अरि ' इत्युच्चारयितव्ये मध्वरिरित्युच्चारयितव्यम् इत्येष नियम, लोपागमादेशादिविकारोपदेशस्तु बुद्धिवैशद्यायैव । दध्यत्र मध्वत्रेत्यत्र दधिमधुपदयो- रिकारोकारयोग्दर्शनेऽपि तदर्थसम्प्रत्ययो दृश्यते । तस्मादपि न पारमार्थिकः पदवर्णविभाग । निरस्तावयव वाक्य तथा- विधस्यैवार्थस्य वाचकम् । यथा पदेषु वर्णा न सन्ति वाक्येषु पदानि न सन्ति तथा महावाक्येष्ववान्तरवाक्यान्यपि न स्यु' । महावाक्यान्यपि प्रकरणापेक्षया न तात्त्विकानि सन्ति । प्रकरणान्यपि शास्त्रापेक्षया न स्युः । ततोऽपि किम् एकमेवेदं शास्त्रतत्त्वमविभागमद्वयमापतति । 'वाग्रूपता चेदुत्क्रामेदववोधस्य शाश्वती । न प्रकाश प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शनी ॥ ' ( वा० प० ) | सर्वस्य ज्ञानस्य शब्दानुविद्धत्वाद् वाग्रूपताया अभावे प्रकाशो न प्रकाशेत, यत सा वाग्रूपता प्रत्यवमशिनी सविकल्परूपा । स्थान-करण प्रयत्न क्रमव्यज्यमानगकारा दिवर्णसमुदायात्मिका या वाक् सा वैखरी । विखरे देहादिसङ्घाते भवा वैखरी ॥ 'स्थानेषु विबुने वायो कृतवर्णपरिग्रहा । वैखरी वाक् प्रयोक्तृणां प्राणवृत्तिनिबन्धना' ( वा० प० ) । अन्त' संकल्प्यमानक्रमवती श्रोत्रग्राह्यवर्णरूपा अभिव्यक्तिरहिता वा मध्यमा । 'केवल वृद्धयुपादाना क्रमरूपानुपातिनी । प्राणवृत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्तते ॥ ' ( वा० प ० ) । ग्राह्यभेदक्रमादिरहिता स्वप्रकाशसविद्रूपा वाक् पश्यन्ती । ' अविभागात्तु पश्यन्ती सर्वत सहृतक्रमा | स्वरूपज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा वागनपायिनी ॥ ' ( वा० प ० ) इति । पुन कहा जाता है कि उज्ज्वलदत्त ने सज्ञा के अधिकार मे पुन सज्ञा शब्द के मध्य का प्रयोजन यह बताया है कि इससे औणादिक शब्दों की यौगिकता सिद्ध होती है । किन्तु यह कथन भी ठीक नही है, क्योकि उज्ज्वलदत्त की उक्ति का तात्पर्य मात्र इतना है कि उणादि प्रकरण की व्युत्पत्ति की सार्थकता का प्रतिपादन किया जाय । महाभास्य मे स्पष्ट उक्ति है कि उणादि प्रकरण सिंह शब्द अव्युत्पन्न प्रातिपदिक माने जाते है । 'तर्ह्यग्रहणानि प्रभृति भाष्यवाक्य मे इस संज्ञा का समाधान किया गया है कि इनके अव्युत्पन्न प्रातिपदिक मान लिये जाने के बाद भी यहा पर प्रकृति- प्रत्यय का उपदेश क्यो किया गया है । महाभाष्यकार का कहना है कि इनके स्वरूप और वर्णानुपूर्वी का ज्ञान कराने के लिये ऐसा किया गया है । स्फोटवादी वैयाकरणों के मत से प्रकृति, प्रत्यय आदि की वास्तविक स्थिति नही है, तो भी उनसे अर्थ प्रतीति होती है, अत उनकी सत्ता मानी जाती है । 'भवति' पद मे कोई भू को प्रकृति मानता है, कोई भव को प्रत्यय, आदेश, आगम, गुण, वृद्धि, वर्णलोप के उपदेश में भी वैयाकरणों में मतभेद है । अतः वास्तविक प्रकृति-प्रत्यय विभाग बड़ा है, इसका समाधान कर पाना कठिन है । अत इतना अंश प्रकृति है और इतना अश प्रत्यय यह सब बैयाकरणो की कल्पना मात्र है | शब्दनित्यतावादी भी प्रकृति विकृति मात्र को शिष्य की बुद्धि के विस्तार के लिये और शास्त्रपूर्वक प्रयोग से पुण्य विशेष के उत्पादन के लिये मानते हैं ।
पृष्ठ 1284
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१८२ वेदार्थपारिजातः यत्तु कश्चित् 'पुराकाले यदा संस्कृतभाषायां समग्रा नाम (जाति द्रव्य, गुण- शब्द ) -अव्यय (स्वरादि-निपात ) - शब्दा एकस्वरेण यौगिक एवाभिमता आसन्, तदानीमुणादिसूत्राणि शब्दानुशासनस्य कृदन्तप्रकरणान्तर्गतान्यासन् । परमुत्त- रकाले धारणामेधादिशक्तिह्रासाद यौगिकशब्दानां धातुप्रत्ययसम्बद्धयौगिकार्थाप्रतीत्या स्वरवर्णानुपूर्वीविशिष्टसमुदायादर्थ- विशेषप्रतीतौ च वैयाकरणाः संस्कृतभाषायां सहस्रशः शब्दान् रूढान् मन्यन्ते स्म तथापि वैयाकरणेष्वपि शाकटायनः, नैरुक्तेषु गार्ग्यभिन्ना' सर्वे नैरुक्ता आचार्या रूढानपि शब्दान् यौगिकानेव मन्यते स्म । रूढवादिनोऽपि तेषा यौगिकत्वस्य प्राचीनपक्षस्य रक्षार्थं रूढशब्दानामपि धातुप्रत्ययनिदर्शनार्थमुणादिसूत्रात्मक कृदन्तभाग शब्दानुशासनाद्वहि खिलरूपेण परिशिष्टरूपेण योजितवन्त इति, तत्तु निर्मूलमेव, महाभाष्यादिविरुद्धत्वात् । व्याकरणशास्त्रेषु पाणिनीयमेव व्याकरण- मूर्धन्यम् । तत्र च यथोत्तर मुनीना प्रामाण्यम्' इति रीत्या पतञ्जलेरनुपमं माहात्म्य प्रसिद्धमेव । स चाव्युत्पन्नप्रातिपदिका- न्युणादीनीत्याह । निरुक्ते यास्काचार्यस्तट्टीकाया दुर्गाचार्यश्च नाम्नां यौगिकत्वायोगिकत्वसम्बन्धे चैवमाहतु –'इतीमानि चत्वारि पदजातान्यनुक्रान्तानि नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च । तत्र नामान्याख्यातजानीति शाकटायनो नैरुक्तसमयश्च । न सर्वाणीति गार्यो वैयाकरणाना चैके' (नि० १।१२-१३-१४) । पदचतुष्टये यानि नामानि तानि सर्वाण्यविशेषेणाख्यातजानीति शाकटायनो मधु अरि के स्थान पर मध्वरि ऐसा उच्चारण करना चाहिये, यह नियम है, इसके अतिरिक्त लोप, आगम, आदेश आदि विचारो का उपदेश बुद्धि के विस्तार के लिये है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि पद, वर्ण का विभाग पारमार्थिक नही है । जैसे पदों में वर्ण नही हैं, वाक्य मे पद नही है, उसी तरह से महावाक्यो मे भी अवान्तर वाक्य नही माने जायगे । महावाक्य भी प्रकरण की अपेक्षा अवास्तविक ही रहेगे । प्रकरण भी शास्त्र की अपेक्षा पारमार्थिक नही माने जायगे । इस तरह से अन्तत एक शास्त्र ही अविभागात्मक अद्वय तत्व माना जायगा । वाक्यपदीपकार ने ठीक ही कहा है कि सभी ज्ञान शब्द से अनुविद्ध है, अनुस्यूत है, अत वाणी के बिना प्रकाश भी प्रकाशित नही होगा, क्योकि वाणी ही सभी सविकल्पक पदार्थों का ज्ञान कराती है । स्थान, करण, प्रयत्न आदि से अभिव्यक्त होने वाली गकारादि वर्ण समुदायात्मक वाणी वैखरी कही जाती है, क्योकि यह विखर अर्थात् देहादिसघात में पैदा होती है । वाक्यपदीय मे यही अर्थ किया गया है । मानसिक सकल्प मे जिसका क्रम विद्यमान है, योगीजन जिसका अन्तरिन्द्रिय से प्रत्यक्ष करते है, किन्तु साधारणजन के लिये जो अनभिव्यक्त है, वह मध्यमा वाणी है । इसका भी लक्षण वाक्यपदीय मे बताया गया है । ग्राह्य भेद, क्रम आदि से रहित स्वप्रकाश सविद्रूपा वाणी पश्यन्ती कही गई है । इसका भी लक्षण वाक्यपदीयकार ने किया है । आर्यसमाजियो का कहना है कि प्राचीन समय मे संस्कृत भाषा में जब समग्र नाम (जाति, द्रव्य और गुणशब्द), अव्यय (स्वरादि निपात ) समान रूप से यौगिक ही थे, उस समय उणादि सूत्र व्याकरण शास्त्र के कृदन्त प्रकरण के अन्तर्गत विद्यमान थे । वाद में धारणा और मेधाशक्ति के ह्रास से यौगिक शब्दो के धातु और प्रत्यय के विभागपूर्वक ज्ञान होनेवाले यौगिक अर्थ को लोग भूल गये और स्वर तथा वर्णानुपूर्वी विशिष्ट शब्द समुदाय से ही अर्थ की प्रतीति हो जाने के कारण वैयाकरणो ने भी संस्कृतभाषा में हजारो शब्दो को रूढ मान लिया । तथापि वैयाकरण शाकटायन और नैरुक्तो मे भी गार्ग्यभिन्न सभी नैरुक्तो ने रूढ शब्दो को भी यौगिक माना है । रूढ शब्द वादी वैयाकरणो ने भी यौगिकता वादी प्राचीन पक्ष की रक्षा के लिये रूढ शब्दों के भी धातु, प्रत्यय आदि को बनाने के लिये उणादि सूत्रात्मक कृदन्त भाग को शब्दानुशासन के बाहर खिल भाग के रूप मे अथवा परिशिष्ट के रूप मे जोड दिया गया है । किन्तु उनका यह कथन निर्मूल है, क्योकि महाभाष्य प्रभृति से इसका स्पष्ट विरोध है । व्याकरण शास्त्र में पाणिनीय व्याकरण प्रमुख है । इसमें यथोत्तर मुनियो का प्रामाण्य माना गया है, अत पतंजलि का ही अनुपम सर्वोत्कृष्ट माहात्म्य है । उन्होंने स्पष्ट ही उणादिप्रकरण सिद्ध शब्दो को अव्युत्पन्न प्रातिपदिक माना है । निरुक्तकार यास्काचार्य और निरुक्तं के टीकाकार दुर्गाचार्य शब्दों के यौगिकत्व और अयोगिकत्व में संबन्ध में कहते हैं कि नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात ये चार प्रकार के पद हैं । इनमें से सभी नाम आख्यात से बनते है, ऐसा शाकटायन आचार्य का कथन है और नैरुक्तों को भी यही प्रसिद्धि है । सभी नाम आख्यातज नही है, ऐसा गार्ग्याचार्य का कथन है, और वैयाकरणों में से भी पाणिनि
पृष्ठ 1285
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदाथपारिजातः २१८३ वैयाकरणेषु सर्वे गार्ग्यभिन्ना नैराश्च वदन्ति । पाणिन्यादयो वैयाकरणा नैरुक्तेषु गार्ग्योऽन्ये च नैयायिका मीमासका वेदान्तिनश्च बहूनि नामान्यव्युत्पन्नप्रातिपदिकान्यङ्गीकुर्वन्ति । व्युत्पन्नान्यपि यानि समुदायशक्त्या बोधकत्वेन रूढान्येवेति । ----- तेषा रीत्या नाम्ना त्रिविधाव्यवस्था — प्रत्यक्षक्रियाणि, प्रकल्प्यक्रियाणि, अविद्यमानक्रियाणि च । कारको हारक इत्यादीनि नामानि प्रत्यक्षक्रियाणि । गौरव इत्यादीनि प्रकल्प्यक्रियाणि । डित्थ, डवित्थ, अरविन्दः, वाविड. (चाविड ) इत्यादीन्यविद्य- मानक्रियाणि । तत्र येषु नामसु स्वरसस्कारी (स्वर उदात्तादि, संस्कार प्रकृतिप्रत्ययादिश्च) समर्थों ( सङ्गतार्थौ) लक्षण- शास्त्रविहितप्रक्रियया युक्तौ प्रादेशिकेन गुणेनान्वितौ स्याताम् तेष्वाख्यातजत्वमविप्रतिपन्नमेव । अत्र प्रदिश्यतेऽनयेति प्रदेशः क्रिया या तस्मिन् द्रव्ये व्यवस्थिता यद्धेतुकस्तस्य नामधेयप्रतिलम्भोऽभिप्रेतः, तस्या प्रदेशाख्याया. क्रियाया अभिधायको धातुः स गुण इत्युच्यते । अन्यत्र हि गुणशब्दोऽप्रधाने शेषेऽङ्गे वा प्रयुज्यते, प्रधान तु तत्र क्रिया प्रदेशाख्या तदभिधायको धातुरत्र गुण । स प्रदेशवाचकत्वात् प्रादेशिको गुण उच्यते । तेन धातुरूपेणान्वितौ स्वरसस्कारौ स्याता येषा नाम्ना तानि सविदितानि ऐकमत्येन विज्ञातानीत्यर्थ । यथा कर्ता, कारक, पक्का, पाचक इत्यादयः । गौरश्वः पुरुषो हस्तीत्यादिषु क्रियाः प्रकल्प्यन्ते न स'क्षादुपलभ्यन्ते । कल्पयितुमपि शक्यन्ते । डित्थडवित्थादिषु पुनः कल्पयितुमपि न शक्यते, तस्मान्न सर्वाणि नामान्याख्यातजानि वक्तु शक्यन्ते । अथ चेत् सर्वाण्याख्यातजानि नामानि स्युस्तत्रमे दोषाः स्यु, यः कश्चित् तत्कर्म कुर्यात् सर्वं तत्सत्त्व तथा चक्षीरन्, य कश्चनाप्यध्वानमश्नुवीताश्वः स वचनीय स्यात्, यत्किञ्चित्तृन्द्यात् तण तदिति, कस्माद्वाश्वोऽश्नुवन्नश्व इत्युच्य- तेऽन्योऽनुवन्नपि नोच्यते, विशेषहेतुस्तु नास्ति । अश्वोऽपि नैवाशनक्रियायोगाभिप्रायेणाश्व उच्यते, कि तर्हि शब्दव्यवहार एवायमर्थप्रत्यायनार्थं ईदृशक्रियानिरपेक्ष एव । यत्किञ्चित्तृन्द्यात्तदविशेषेण तत्सर्वतर्दनक्रियायोगात्तृणमित्येवोच्येत । अथ भिन्नक्रियायोगादेकमेव द्रव्यं भिन्ननामभिरभिधीयेत, एवमनेकानि सत्त्वान्येकक्रियायोगादनेकनामानि स्युरेकं वानेकक्रिया- योगादनेकनाम स्यात् । तस्मान्न सर्वाण्याख्यातजानि नामानि । अथापि य एपा न्यायवान् कार्मनामिक. सस्कारो यथा चापि प्रतीतार्थानि स्युस्तथैतान्याचक्षीरन् पुरुष पुरिशयमित्याचक्षीरनष्टेत्यश्व तर्दनमितितृणम् । न चैवमाचक्षते । न चासति कारणे विद्यमाना क्रिया परोक्षीकर्तु न्याय्या । तस्मान्न सर्वाण्याख्यावजानि नामानि । किञ्च ते शाकटायनादयोः निष्पत्त्रेऽभिव्याहारे विचारयन्ति प्रथनात्पृथिवोमाहु, तत्रेदमाशङ्क्यते यदीयं स्वभावत एव पृथिवी नाभविष्यत्ततः क प्रभृति इसी पक्ष को मानते है । नैयायिक, मीमासक और वेदान्ती भी बहुत से नामो को अव्युत्पन्न प्रातिपदिक ही मानते है । अव्युत्पन्न प्रातिपादिक समुदाय शक्ति से अर्थ के बोधक होने से रूढ माने जाते है । उनके मत से नाम की व्यवस्था तीन प्रकार से होती हैं— प्रत्यक्ष क्रिया वाले, कल्पित क्रिया वाले और अविद्यमान क्रिया वाले । कारक, हारक प्रभृति नाम प्रत्यक्ष क्रिया वाले, गौ, अश्व प्रभृति नाम कल्पित क्रिया वाले, डित्थ, डवित्थ, अरविन्द, वाविड (चार्विड) इत्यादि अविद्यमान क्रिया वाले नाम है । इनमे से जिन नामों में उदात्तादि स्वर ओर प्रकृति-प्रत्ययादि सस्कार लक्षण शास्त्र विहित प्रक्रिया से युक्त हैं, उनके आख्यान से उत्पन्न होने में कोई सन्देह नही है । जैसे कि कर्ता, कारक, पक्ता, पाचक आदि । गौ, अश्व, पुरुष, हस्ती प्रभृति मे क्रिया की कल्पना की जाती है, इनमे साक्षात् क्रिया उपलब्ध नही होती । यहा क्रिया की कल्पना की जा सकती हैं, किन्तु डित्थ, डवित्थ प्रभृति मे तो इनकी कल्पना भी नही हो सकती । अत सभी नाम आख्यात से उत्पन्न होते है, यह कथन कथमपि संगत नही हो सकता । यदि सभी नामो को आख्यातज माना जाय तो ये दोष उपस्थित होगे । जो कोई भी उस क्रिया को करेगा, वे सभी उसी नाम से जाने जायेगे । जो कोई भी खाने वाला हो, सभी अश्व कहे जायगे । खाने वाला कोई अश्व कहलावे और कोई नही, इसमे क्या विशेष कारण है? अश्व पद का प्रयोग भी खा रहे अश्व के लिये ही नही होता, किन्तु जब वह खाता नही रहता, तब भी केवल उसी के लिये इस शब्द का प्रयोग होता है । यही स्थिति तृण-शब्द की भी है । भिन्न भिन्न क्रियाओ के योग से एक ही द्रव्य अनेक नामो 'से कहा जाय, तो अनेक प्राणी एक क्रिया के योग से अनेक नाम वाले हो जायगे अथवा एक ही प्राणी अनेक क्रिया के योग से अनेक 1नाम वाला हो जायगा । अत मानना पड़ेगा कि सभी नाम आख्यातज नही हो सकते । शाकटायन प्रभृति आचार्यगण पद की निष्पत्ति
पृष्ठ 1286
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २१८४ एनामपृथिवी सतीम प्रथयिष्यत्? यदि कश्चित् पृथिव्याः प्रथनकर्ताऽभ्युपगम्येत ततोऽपि किमाधारः स स्यादिति प्रश्नः स्यात् । पृथिवी सर्वस्य प्राणिजातस्याधारः प्रतिष्ठा । नह्यनाधारेणाप्रतिष्ठितेन शक्येय प्रथयितुम् । न चाधारः सम्भवति, तस्मादाख्यातजान्येव नामानीत्ययुक्तमेव । शाकटायनो नैरुक्ताश्च गार्ग्यवजं कानिचिदभिधानान्यनेकैर्धातुभिरनुविदधाति कानिचिदेकेनैव । प्रतिनियतो हि स्वेषु स्वेषु व्याकरणेषु शब्दानुविधानस्य समयः । तद्यथा पाणिनिर्भूरिति प्रकृतिमुपादाय ततो लडिति प्रत्ययमुपादत्ते । ततः कृतानुबन्धलोपस्यानच्कस्य लस्य स्थाने तिबादीनादिशति । पाणिनिपरिक्लृप्ता सैषा शब्दानुविधानतन्त्रशैलीत्येतदेकमेव प्रयोजनमुक्त्वा नान्यत्प्रयोजनमस्ति लडादी-नामनुबन्धाध्ययने लोपे च । अपरे वैयाकरणा लटमकृत्वा तिबादीनेवोपाददते । तेषामपि शब्दानुविधाने ' सा तन्त्रशैली । एवं प्रतिनियतया स्वया शैल्या समानमेव शब्दरूपं साधयन्ति । शाकटायनस्त्वनेकैश्च धातुभिरेकमभिधानमनविहितवानेकेन चैकमेव । तत्र यदनेकैरनुविहितवान् तदितरैर्गार्ग्यपाणिन्यादिभिर्न मृश्यते । अप्रसिद्धो हि स तेषां शब्दानुविधानमार्ग. 1। धातु-समुदायमात्रमेव नामेति । अथानन्वितेऽर्थेऽप्रादेशिके विकारे पदेभ्यः पदेतरार्धान् सञ्चस्कार शाकटायन । अनन्विते शब्देनानु- गतेऽर्थे यत्र प्रतार्यमाणोऽपि शब्दोऽर्थमनुगन्तुं न शक्नोत्येव सचस्कार । यया हि क्रियया तद् द्रव्यं प्रदिश्यते तदभिधायको यो धातु स तदभिधान विगृह्यमाण विकर्तुं न शक्नोति । तत्र तत्र हीयमानप्रतिज्ञः शाकटायन सर्वाण्याख्यातजानि नामान्युप-पादयिष्यन्नसम्भवे स कुशकाशावलम्बनमिव कुर्वन् पदेभ्यः पदेतरार्धान् सचस्कार, आख्यातपदेभ्यः समस्तेभ्योऽवयवानुपादाय पदेतरार्धानन्याश्चेतरेतराख्यातपदावयवैरन्यैश्चान्यैश्चान्यमर्धनाम्नः संस्कृतवान् । तद्यथा - सत्यमित्येतदभिधान संस्कार । एतेः कारित च यकारादि चान्तकरणमस्ते शुद्ध च सकारादि च । एतेः ( इण् गतौ ) इत्यस्य कारितान्त ( ण्यन्तं रूप कृत्वा) ततो यकारमन्तमादाय मकारान्तं च कृत्वा सत्यशब्दस्य अन्त्यमर्ध सचस्कार । ततो यमिति भवति । अस्तेः शुद्धं च शुद्धमेव रूप कृत्वा न कारितान्तं ततः सकारादिशब्दरूपं गृहीत्वा सदित्येतत् सत्यमित्येतस्य शब्दस्यादिमकरोत् । आद्यमर्धं सञ्चस्कार | तत्सदिति भवति । अत्र योऽमस्तेस्तकारः स यकारमधिरोहति । एवमेतदेकमभिधान द्वयोर्धात्वोः सत्यमिति संचस्कार । अथ कोऽर्थः? सन्तमर्थमाययति प्रत्याययति गमयतीति सत्यं तदेतदन्यायमकरोत् । तदेतद्कृतपूर्वमन्यैर्विद्वद्भिः शाकटायनोऽतिपाण्डित्याभिमानात् पदान्यभिनत् । तत्र शङ्का भवति । अवश्यमसौ वर्णानपि भेत्स्यति, अनेकार्थाश्च करिष्य- हो जाने के बाद उसकी व्युत्पत्ति पर विचार करते है कि प्रथन होने से पृथिवी कही जाती है । इस पर शका यह उठती है कि यदि स्वभाव से ही पृथिवी ऐसी न होती तो इसका प्रयन (विस्तार) किसने किया होता? यदि कोई पृथिवी का प्रथनकर्ता माना जाता है, तो उसने कहाँ खडे होकर इसका विस्तार किया । पृथिवी सारे प्राणिवर्ग की प्रतिष्ठा भूमि है । बिना आधार के इसका कोई प्रथन नही कर सकता । इसके सिवाय दुसरा कोई आधार नही है । अत नाम आख्यातज ही है, ऐसा मानना सही नही है । शाकटायन और गार्ग्य से भिन्न सभी नैरुक्त कुछ नामो की निष्पत्ति अनेक धातुओं से करते हैं और कुछ की एक ही धातु से । व्याकरण शास्त्र में भी शब्द की निष्पत्ति का अपना अपना प्रकार है । जैसे कि पाणिनि भू धातु से लट् प्रत्यय का विधान कर उसके स्थान पर तिप् प्रत्यय का विधान करते है । अन्य वैयाकरण लट् का विधान न कर सीधे तिप् प्रत्यय का ही विधान करते हैं । यहाँ पर अपनी अपनी शैली से ' भवति' प्रभूति पदो की निष्पत्ति की जाती है, इसके सिवाय हमारे पास इसका कोई उत्तर नहीं है कि यह अलग-अलग पद्धति क्यों स्वीकार की जाती है शाकटायन अनेक धातुओ से एक नाम की और एक धातु से अनेक नामो की निष्पत्ति बताते है । अनेक धातुओ से एक नाम की निष्पत्ति को गार्ग्य, पाणिनि प्रभृति आचार्य नही स्वीकार करते । धातुसमुदाय मात्र ही नाम है, इस पक्ष को वे सही पद्धति नही मानते । शाकटायन जब देखते है कि अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वे एक आख्यान से तदनुरूप अर्थ वाक्य शब्द नही बन रहा है, तो उस स्थिति में अनेक आख्यानों के एक एक अवयव को लेकर एक शब्द की सिद्धि करते है । जैसे इण् धातु के ण्यन्त रूप और अस् धातु के शुद्ध रूप को लेकर उन्होंने सत्य शब्द बनाया हैं । इस तरह से सत्य शब्द की निष्पत्ति दो धातुओं से उन्होंने बताई है । फिर इस शब्द का उन्होने अर्थ भी अनोखी पद्धति से किया है ऐसा पहले किसी विद्वान् वैयाकरण ने नहीं किया । शाकटायन ने अपने पाण्डित्य के अभिमान में आकर पदों को ही
पृष्ठ 1287
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २१८५. तीति । यो हि पदान्यभिनत् तस्य वर्णाभेदे विशेषहेतु को भविष्यति? तस्मादतिप्रसङ्गान्न सर्वाणि नामान्याख्यातजानि । स्वेनाभिधानेन क्रियानिरपेक्षेणाभिसम्बद्धमेव द्रव्यमुत्पद्यते । नित्यसम्बद्धो हि शब्दार्थौ । 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्या- र्थेन सम्बन्ध ' ( जै० सू० ११ ११४) इति । तस्मान्नापरकालेन भावेन ( क्रियया ) पूर्वोत्पन्नसत्त्वस्य प्रदेशन संज्ञाप्रतिलम्भः सम्भवतीति गार्ग्यादिपक्ष । तदय पक्ष: 'यथो हि नुवा, (नि० १ १४ ) इत्यादिना खण्डेन यास्केन समालोचितः । येनैव प्रकारेणाख्यातजत्वं प्रतिषिद्ध नाम्नस्तत्प्रत्यनुभाव्य समीकरिष्यामीति । सर्व प्रादेशिकमित्येव सत्यनुपालम्भ एव भवति । अर्थात् प्रदेशवाचिनो धातृनुत्प्रेक्ष्य तदाश्रयौ स्वरसंस्कारौ यावद्गम्यमनुविधेयौ । विभ्वी हि लक्षणगति । नैष शब्दापराधो नाप्यस्माकम् । भवत एवापराधो मन्दशिक्षितत्वात्, येन स्वरसस्कारौ विद्यमानावपि नानुविधातु शक्नोषि । व्याकरणेऽप्यष्ट- धाभेदभिन्ने लक्षणैकदेशो विक्षिप्तः । कश्चित् सौत्रो विधि, कश्चित्तु शब्दगम्य, चशब्दवाशब्दातिरिक्ताभिव्याहारयोग- विभागादिगम्य । तद्यथा मतान्तरेष्वप्यभिन्नेषु कश्चित् क्वचिद्विधिरुच्यते । ते च सर्वप्रयोगमिच्छता प्रयोगकाले उपसंहर्त्तव्याः, एवमिहापि सर्वाणि लक्षणशास्त्राण्यपेक्ष्याणि स्वरसस्कारमिद्धये । स त्वं यावदाविलशब्दाना स्वरसस्कारावनुविधातुं सामर्थ्य- लाभायानिर्विण्णस्तावच्छिक्षस्व । यदुक्तम्—'य' कश्चन तत्कर्म कुर्यात् सर्वं तत्सत्त्व तथा चक्षीरन् अनेकेषामेकक्रियायोगादनेकनामता प्रसज्येत 'इति, तत्रोच्यते -तुल्यकर्मणामपि सता कर्मकृतं नामप्रतिलम्भः केषाञ्चिद्भवति केषाञ्चिन्न भवतीति लोकप्रसिद्ध एव । तक्षन् कश्चित्त- क्षेत्युच्यते, अन्यस्तक्षन्नपि न तक्षेत्युच्यते ॥ कोऽत्र हेतुरिति पर्यनुयोगे लोकमेव पृच्छ, तमेवोपालभस्व, न मयैष नियम. कृत इत्येवोत्तरम् । अपि च, तद्यथा समानमीहमानाना कश्चिदेवार्थेन सयुज्यते कश्चिन्न । न चेदानीमेकोऽर्थेन संयुज्यत इत्यन्यैरपि सयोक्तव्यम्. एकेन वा लब्धमित्यन्यैरपि' लब्धव्यमिति । स्वभावतो हि शब्दाना क्रियाजत्वेऽपि सति काञ्चिदेव क्रियाभङ्गी- कृत्यावस्थितिर्भवतीति । अथवा क्रियातिशयकृतो नियमः स्यात् । यो हि यदतिशयेन करोति तस्यानेकक्रियावत्त्वेऽपि सति तोडमरोड दिया है । इस पर यह शका उठना स्वाभाविक है कि वर्णों को भी तोड़-मरोड देगे और उनके आधार पर पदो के अनेक अर्थ करेगे । जिसने पदो के साथ छेड-छाड की वह वर्णों को क्यो कर छोड़ देगा । इन सब कारणो से मानना ही पडेगा कि सभी नाम आख्यातज नही है, अर्थात् सभी शब्द यौगिक नही है । मोमासा सूत्र के अनुसार नाम ( शब्द ) का वस्तु (द्रव्य = अर्थ) के साथ स्वाभाविक शब्द माना जाता है, इसकी किसी क्रिया से उत्पति नही होती । अतः बाद में होने वाली क्रिया से पूर्वोत्पन्न भाव का नामकरण कथमपि मान्य नही हो सकता, यही गार्ग्य प्रभृति का पक्ष है । यास्क ने इस मत की समालोचना की है । उनका कथन है कि प्रदेशवाची धातुओ की उत्प्रेक्षा करके तदाश्रित स्वर और संस्कार जहा तक बन सके, किये जाने चाहिये । लक्षणशास्त्र का क्षेत्र व्यापक है । यह न तो शब्द का अपराध है और न हमारा । कम शिक्षित व्यक्ति का ही यह अपराध है कि वह विद्यमान स्वर और सस्कार को भी जान नही पाता । व्याकरण के आठ भेद है ।" उनमें भी अनेक विधिया प्रयोग में लाई जाती है | कही सोत्रविधि और कही च शब्द, वाशब्द, योगविभाग आदि से विधि की प्रतीति होती है । मतान्तर हो या न हो सब जगह सभी विधिया स्वीकार नही की जाती । सभी शब्दो की साधुता के नलिये इनका यथायोग्य प्रामाण्य स्वीकार किया जाता है । उसी तरह से स्वर और सस्कार को सिद्धि के लिये भी सभी लक्षण शास्त्रो की यथायोग्य सहायता ली जानी चाहिये । अत सभी को समस्त शास्त्रों के स्वर और सस्कार के विधान की सामर्थ्य को प्राप्त कर लेने के लिये प्रसन्न मन से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये । जो कोई भी उस क्रिया को करेगा, उन सबका उसी नाम से बोध होने लगेगा | अनेक व्यक्तियो का उस क्रिया से सम्बन्ध 'होने से एक ही नाम से अनेक व्यक्तियो का बोध होने लगेगा । इस शका का समाधान यह है कि तुल्यक्रिया के रहते हुए भी किसी का उससे बोध होता है और किसी का नहीं होता, यह बात लोक से प्रसिद्ध है । तक्षण करने वाला कोई तक्षा कहा जाता है और दूसरा व्यक्ति इस कार्य को करता हुआ भी तक्षा नही कहाता । इसमे क्या कारण है? इसका उत्तर लोक से ही पूछा जा सकता है । उसी को उपालम्भ भी दिया जा सकता है । किसी एक व्यक्ति ने यह नियम नहीं बनाया है । सामान्यत देखा जाता है कि समान रूप से इच्छा रहने पर भी किसी को कोई वस्तु मिलती है, दूसरों को नही मिलती ऐसा कोई नही कह सकता कि एक व्यक्ति को कोई वस्तु मिली है, २७४
पृष्ठ 1288
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१८६ वेदार्थपारिजातः तद्धेतुक एव नामप्रतिलम्भः । अथवा न ब्रूमो यो यत्र यदा च तक्षति स एव तक्षेति, किं तर्हि यो यदा यत्र तक्षा भवति स एव तक्षति । तदेतल्लक्षणमनियतं काममन्येष्वप्यस्तु । कदाचित् क्वचित्तेषामप्यन्याः क्रिया नियततराः सन्ति यद्वैतुको नामधेय- प्रतिलम्भ इति । तेषा तु तक्षा नियमतस्तक्षतीति विशेषः । जीवन इक्षुरसः शाकजातिर्वा, भूमिजोऽङ्गारको वृक्षो वा ॥ एतेनैवोत्तरः प्रत्युक्तः । यदुक्तम्— 'यावद्भिर्भावैः सम्प्रयुज्यते तावद्भ्यो नामधेयप्रतिलम्भः स्यात्' (नि० ११२), तत्राप्येतदेवोत्तरम्, लोके- ऽनेकक्रियायुक्तांनामप्येकक्रियाकारिनामधेयप्रतिलम्भदर्शनात् । यथा परिव्राजक इत्येतान्येवोदाहरणानि । तक्षा ह्यन्यान्यपि कर्माणि करोति न पुनस्तस्य तत्कृतो नामधेयप्रतिलम्भ । तावताप्येकस्यानेकनामताऽनेकेषा चैकनामताप्रसक्तिर्व्यवहारा- सिद्धिश्चेति वाच्यम्, अनेकेषामेकक्रियायोगेऽप्येकस्यानेकक्रियायोगेऽपि सति शब्दनियमस्य स्वभावत एव लोके व्यवस्थित- त्वात् । तस्मान्न व्यवहाराप्रसिद्धिरपि । यदुक्तम्—— यथा चापि प्रतीतार्थानि स्युस्तथैनान्याचक्षीरन्' इति, तत्राप्युच्यते - शास्त्रेण यथावस्थिताना शब्दाना- मन्वाख्यानमात्रमेव क्रियते । नाह शब्दानां कर्ता य एषां प्रयोक्तारस्तानुपालभस्व, निराकुरु वा यदि शक्नोषि । अभिधान- स्वाभाव्यमेव कानिचित् प्रतीतार्थानि कानिचिदप्रतीतार्थानि । तान्यपि शास्त्रेण प्रतीतार्थान्येव कर्तव्यानि । एतदेव शास्त्रस्य शास्त्रार्थत्वं यदप्रतीतार्थान्यपि प्रकृत्यादिना प्रतीतार्थानि स्युस्तथैनान्याचक्षीरन् । आख्यायन्त एव कानिचिच्छास्त्रेण प्रती- तानि क्रियन्ते, रूढ्यनुविधायित्वाल्लक्षणशास्त्रस्य । गुणतस्तेषु लक्षणम् । सन्ति चाल्पप्रयोगाः प्रतीतार्थक्रियाः । तेषामिमान्यु-दाहरणानि व्रततिः, दमूना, जाट्यः, अटणार, जागरूकः, दर्वीहोमीति । व्रततिव्रणातेः, वल्ली, दमूना दमनमना वा अग्नि- रतिथिर्वा, जाट्यः जटावान्, अटणार अटनशील, जागरूक जागरणशील, दर्वीहोमो दर्व्या जुहोतीति । तो दूसरे को भी अवश्य मिल जानी चाहिये । स्वभावत शब्द क्रिया से बनते है, किन्तु किसी विशेषक्रिया से ही उसकी निष्पत्ति होती है । अथवा जिस व्यक्ति की जिस क्रिया के साथ अधिक सम्बन्ध रहता है, अनेक क्रियाओ के रहते भी उस विशेषक्रिया से सबद्ध ही उसका नाम रक्खा जाता है । अथवा इसको अधिक स्पष्टता से इस रूप में कहा जा सकता है कि तक्षण क्रिया से सबद्ध व्यक्ति तक्षा नही होता, किन्तु तक्षानाम वाला व्यक्ति ही तक्षण क्रिया करता है । इस लक्षण की व्याप्ति भले ही आज हमे उपलब्ध न हो, किन्तु अनुमान द्वारा यह मान लिया जायगा कि किसी न किसी इसी तरह के आधार पर उन उन नामो की सृष्टि हुई है । विशेषता इतनी ही होगी कि नियमत: तक्षण करने वाला तक्षा कहा जायगा । जितने भावों से सबद्ध होगा, उन सब के आधार पर नाम रखा जायगा, इस शंका का समाधान यह है कि लोक में अनेक क्रियाओ से सबद्ध रखने पर भी व्यक्ति का किसी एक विशेष क्रिया के आधार पर ही नाम रखा जाता है । तक्षा परिव्राजक आदि शब्द उसके उदाहरण के रूप मे उपस्थित किये जा सकते है । तथा अन्य भी दूसरे बहुत से कार्य करता हैं, किन्तु उसके आधार पर उसका अन्य कोई दूसरा नाम नही रखा जाता । अनेक व्यक्ति एक क्रिया से और एक व्यक्ति अनेक क्रियाओ से युक्त रहते है, किन्तु लोक में शब्द का नियम स्वभावत. व्यवस्थित है, अत व्यवहार की अप्रसिद्धि का प्रश्न ऐसे प्रश्नो में नही उठता । अर्थ की प्रतीति के अनुसार ही उनका अन्वाख्यान होना चाहिये, इसका भी उत्तर यह है कि शास्त्र यथावस्थित शब्दों का अन्वाख्यान मात्र करता है । शास्त्रकार शब्दों को नही बनाते । इसके लिये तो उपालम्भ उनके प्रयोक्ताओं का दिया जाना चाहिये | सामर्थ्य हो तो ऐसा करने से उनको रोकना चाहिये । यह नांम का स्वभाव है कि उनमे से कुछ का अर्थ स्पष्ट है और कुछ का नही है । शास्त्र का प्रयोजन यही है कि जिसका अर्थ स्पष्ट नही है, उनकी प्रकृति आदि का विश्लेषण कर अर्थ को स्पष्ट कर दिया जाय । लक्षण शास्त्र रूढि का अनुसरण करते हैं, अत तदनुसार हो शास्त्रो में उनको अर्थप्रतीति भी कराई जाती है । जैसा कि व्रतति प्रभृति शब्दों का अर्थ निरुक्त में किया गया है । NI
पृष्ठ 1289
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २१८७ — ' ', - यदुक्तम् निष्पन्नेऽभिव्याहारेऽभिविचारयन्ति इति तत्राप्युच्यते युक्त कुर्वन्ति योगस्य परीक्षणात् । कथं चानुत्पन्नाभिधानयोगः परीक्ष्येत? यदुक्तम्- ' प्रथनात् पृथिवीत्याहुः क एनामप्रथयत् किमाधारश्चेति?' तत्रापि न वयमेव ब्रूमः प्रथितेय केनचिदतः पृथिवीति । ननु कथमप्रथिता सती पृथिवीत्वमापेति चेन्न, दृश्यमाना हीय पृथिवी । तस्माद्यप्यप्रथिता कैश्चिदन्यैस्तथापीय पृथुदर्शनक्रियायोगात् पृथिव्यैव । अन्यथापि धात्वर्थ उपपद्यते । यथा न विरुद्धयेत तथा निर्वक्ष्यामः । यदि दृष्टेऽपि तस्या. पृथुत्वे वयमुपलभ्यामहे तर्हि सर्व एव दृष्टप्रवादा उपालभ्येरन् । यो य दृष्ट्वा ब्रवीति स तत्र दोष एव स्यात्, तथा सति दृष्टहान प्रसज्येत तस्मात् पृथुदर्शनात् पृथिवीत्युपपद्यते ॥ यदपि च ' पदेतरार्धान् सचस्कार' इति, तत्रोच्यते- अनेकैर्धातुभिर्नाम्नो व्युत्पत्तौ न कोऽपि दोष । असमञ्जसेन असम्बद्धेन सस्कारेण गर्छ । योऽनुगमय्य धातुभिरनेकैरेकाभिधान- गतानर्थास्ततः सञ्चस्कार न तु मोढ्येन । कश्चिदशिक्षितत्वादेकधातुजमपि न जानाति, किमुत बहुधानुजम् । हारककारकादीनि प्रकटक्रियाण्यपि कतमेभ्यो धातुभ्य एतान्यभिनिष्पद्यन्त इति न जानन्ति पुरुषदोष एव न शास्त्रदोष । अनुगत एवार्थे
सचस्कार शाकटायन । सन्तमेवार्थं गमयतीति सत्यम् ॥
किञ्च, रूढशब्दव्युत्पत्तिर्मन्त्रेष्वपि दृश्यते । यथा च लक्ष्य तथा च लक्षण भवितुमर्हति इतरथा हि कस्य लक्षण स्यात्? 'यदसर्पत्तसर्पिः' ( तै० सं० २३| १० ), ' यन्नवमैत् तन्नवनीतमभवत्' (तै ० स० २।३२| ३|| १०१०|| )) ब्राह्मणेनाप्यनेकधातुजान्येव कृत्वा निरुच्यन्ते 'तदेतत् त्र्यक्षर हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरम् । अभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एव वेद', 'द इत्येकमक्षरम्, ददन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एव वेद', ' यमित्येकाक्षरमेति स्वर्गलोक य एव वेद' ( श० ९१ ४| ८| ४| १ ), ( बृ० उ० ३| ५ | ३| १ ) एव हरतेर्ददातेरेतेर्हृदयशब्दः । तदर्थफलोपप्रदर्शनार्थ ब्राह्मणे चैव निरुक्तम् । तस्मात्तदपि न विरुद्धम् । - यदुक्तम् —'अपरस्माद् भावात् पूर्वस्य प्रदेशो नोपपद्यते इति तत्र ब्रूमः – केषाञ्चिच्च पूर्वोत्पन्नाना सत्त्वानामपि पश्चात्कालीनेन भावेन नामप्रतिलम्भेऽपि न दोषः, यथा विल्वादो लम्बचूडक इति पश्चात्कालीनया चूड़ालम्बनक्रियया नाम के निष्पन्न होने के बाद उसकी व्युत्पत्ति की जाती है, इसका समाधान निरुक्तकार यास्क ने दिया है कि यह ठीक ही कि योग की परीक्षा की जाय । अनुत्पन्न नाम के योग की परीक्षा कैसे की जा सकती है । प्रथन के कारण पृथिवी नाम पड़ा तो किसने इसका प्रथन किया और प्रथन करते समय वह किस आधार पर खडा था? इसका उत्तर यह है कि हमारा यह कहना नही है कि किसी ने इसका प्रथन किया, किन्तु यह बहुत विस्तृत दिखाई पडती है, अत प्रथन क्रिया के योग से यह पृथिवी कहलाती है । इसके विस्तार को देखकर भी यदि नकार दिया जाय, तब तो सभी दृष्टप्रवादो की कोई स्थिति नही रह जायगी । इस तरह से दृष्ट हानि दोष उपस्थित होता । अत पृथु दर्शन के आधार पर पृथिवी शब्द का निर्वचन उचित ही है । अनेक धातुओ से आधे आधे पदो की सिद्धि कर शब्द बनाये गये है । इसका भी समाधान यह है कि अनेक धातुओ से एक नाम की व्युत्पत्ति में कोई दोष नही है । असमञ्जस अथवा असबद्ध व्युत्पत्ति हो निन्द्य हो सकती है । जब अनेक धातुओं के अर्थों का अनुगमन कर और किसी अभिधान के अर्थ का * विश्लेषण कर शब्द का सस्कार किया जाता है, यह उचित ही है । कोई अशिक्षित व्यक्ति एक धातु से निष्पन्न नाम की भी व्युत्पत्ति नही जान जाता तो वह अनेक धातुओ से व्युत्पन्न नाम को क्या जानेगा? हारक, कारक प्रभृति प्रगट क्रिया वाले शब्द किन धातुओं से निष्पन्न होते हैं, कुछ लोग यह भी नही जानते । इसमे शास्त्र का क्या दोष है? यह तो पुरुष का ही दोष माना जायगा । शाकटायन ने अर्थका अनुगमन करके ही सत्य आदि पदो की व्युत्पत्ति बताई है, यह उचित ही है । रूढ शब्दों की व्युत्पत्ति मन्त्रो मे भी बताई गई है । लक्ष्य के अनुसार ही लक्षण होगा, अन्यथा वह लक्षण किसका होगा? तैत्तिरीय सहिता में सर्पि और नवनीत की व्युत्पत्ति प्रदर्शित है । ब्राह्मणग्रन्थो मे भी अनेक धातुओ से एक पद की निरुक्ति कही गई है । जैसे कि बृहदारण्यक उपनिषद् मे तीन धातुओ से हृदय शब्द की निष्पत्ति को गई हैं । इस व्युत्पत्ति के ज्ञान का फल भी वहाँ वर्णित है । आगे आने वाली स्थिति के आधार पर अभी नाम नही रखा जा सकता, इसका उत्तर देते हुए कहा गया है कि कुछ पूर्वोत्पन्न सत्त्वो के लिये ऐसा किया जाय तो उसमें कोई दोष नहीं है 'जैसे कि किसी का नाम लम्बचूडक रख दिया गया । अभी उसकी चोटी
पृष्ठ 1290
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१८८ वेदार्थपारिजातः भविष्यता योगेन पूर्वोत्पन्नस्य सत्त्वस्य नामधेयप्रतिलम्भ उपपद्यमानो दृष्ट एव । विल्व भरणाद्वा भेदनाद्वा भृतं हि तद्भवति वीजानाम्, बिर्भात वा दुर्भिक्षादौ भक्ष्यमाण जनम्, भिद्यते तदवश्यं भक्षणायेति वा । नाम्नामाख्यातजत्वमधिकृत्य शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थमेतदुक्तम् । कथं नाम व्युत्पन्नबुद्धिः शिष्योऽप्रतिबुद्धयमान सर्वतो- मुखानेव लौकिकवैदिकान् शब्दान् निर्ब्रूयादिति । सर्वाण्येव हि व्याकरणानि निरुक्तानि च वेदाङ्गत्वाविशेषात् प्रमाणानि । तेषामिदं फल्विदं साध्विति एतदशक्य वक्तुम् । यद्यपि शाकटायनस्य गार्ग्यभिन्ननैरुक्ताना च दृष्ट्या रूढा अपि शब्दा यौगिका एवेति स्पष्टम्, तथापि योगरूढत्वं तैरप्यभ्युपगम्यत एव शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थम् सर्वेषामपि नाम्ना धातुजत्वमङ्गीकृत्य निर्वच- नेऽपि न स्वेच्छया यत्र क्वापि व्युत्पत्तिबलात् तक्षपरिव्राजकादिशब्दाना प्रयोग क्रियते, लोकस्य नियामकत्वाभ्युपगमात् । -स्पष्टमेव निरुक्तकारो वक्ति -'समानकर्मणा नामधेयप्रतिलम्भमेकेषा नैकेषा यथा तक्षा परिव्राजको जीवनो भूमिजः' (नि० १।१२ ) इति ॥ कि मूलक वैषम्यमिदमित्यस्येदमेवोत्तर लोकमेव पृच्छ लोक एव नियामक इत्यर्थ । यथा लोकव्यव- -हारादेव शब्दार्थसम्बन्धग्रह, तथैव लोकव्यवहारेणैव तक्षन् कश्चित्तक्षोच्यते, अन्यस्तक्षन्नपि न तक्षोच्यते । कश्चिद् गच्छन् गौर्भवति, अपरो गच्छन्नपि गौर्नोच्यते । परिव्रजन् सन्यासी परिव्राजको भवति नान्यः परिव्रजन्नपि परिव्राजकः । सरः पङ्कजनिकर्तृत्वेऽपि कुमुदस्य न सरसिजत्व न वा पङ्कजत्वम्, तेनैव पद्मस्य सरसिजत्व पङ्कजत्वं च भवत्येव । तत्रैवोपपत्तिः- समानमीहमानाना कश्चिदर्थेन युज्यते कश्चिन्नेति । न चेदानीमेकोऽर्थे न संयुज्यत इत्यन्यैरपि संयोक्तव्यम्, एकेन लब्धमित्य- न्यैरपि लब्धव्यम् । 1 रूढशब्दव्युत्पत्तिमन्त्रेष्वपि दृश्यत इति ब्रुवताऽपि रूढशब्दावेदेषु सन्त्येवेत्यङ्गीकृतम् । दयानन्दस्तु स्वातन्त्र्येण व्युपत्तिबलात् प्रसिद्धिविरुद्धेऽप्यर्थे शब्दान् योजयति । यथा शतक्रतुशब्दस्य शूरवीरे सूर्यलोके वा प्रयोगः (ऋ० स० ११२१८), यथा सोमशब्दस्य सूयन्त उत्पद्यन्ते ये ते पदार्था । (ऋ० स० १ २ १ ) क्रियातिशयकृतो वा नियमः । यो हि यदतिशयेन लम्बी नही है, किन्तु बाद में हो सकती है । इसी आधार पर नाम रख दिया जाता है विल्व नाम इसलिए रख दिया जाता है कि वह दुर्भिक्ष काल मे खाने वाले की रक्षा करता है, अथवा खाते समय उसको अवश्य तोडा जाता है । नाम आख्यातज है, इस बात को यहाँ विस्तार से इसलिये समझाया गया है कि शिष्य की बुद्धि का विस्तार हो, वह व्युत्पन्न होकर अपरिचित लौकिक और वैदिक शब्दो की भी व्युत्पत्ति कर सके । सभी व्याकरण और निरुक्तग्रन्थ वेदाग होने से प्रमाण है । उनमें एक सही है और दुसरा गलत है, यह कहना कठिन है । यद्यपि शाकटायन और गार्ग्यभिन्न नैरुक्तो के अनुसार रूढ शब्द भी यौगिक है, यह स्पष्ट है, किन्तु उन्होने योगरूढ शब्द माने ही है । इसका प्रयोजन वे शिष्य की बुद्धि की विशदता बताते है ( सभी नाम आख्यात हैं, ऐसा मानकर निर्वाचन किया जाता है, तब भी मनमानी पद्धति से व्युत्पत्ति के आधार पर तक्षा, परिव्राजक प्रभृति शब्दों की प्रवृत्ति मनमाने अर्थो मे नही की जाती, जैसा कि आर्यसमाजी कहते है । सभी शास्त्रकारो ने अर्थ की प्रवृत्ति मे लोक को नियामक माना है । निरुक्त मे इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है । जैसे लोक व्यवहार से ही शब्द और अर्थ का सम्बन्ध ज्ञात होता है, उसी तरह से 'लोक व्यवहार से ही तक्षा, गौ, परिब्राजक प्रभृति शब्दों की प्रवृत्ति निश्चित व्यक्तियो के लिये ही होती है, उस क्रिया के निष्पादक सभी व्यक्तियो के लिये नही (तालाब के पक मे पैदा होने पर भी कुमुद पंकज नही कहलाता, किन्तु कमल के लिये ही उसका प्रयोग होता है । निरुक्तकार ने इसी विषय को स्पष्ट किया है कि समान क्रिया से सम्बन्ध रहने पर भी एक व्यक्ति का उस अर्थ के साथ सम्बन्ध रहता है और दूसरे का नही रहता । यह आवश्यक नही है कि एक का अर्थ के साथ सम्बन्ध हो तो दूसरे का सम्बन्ध उससे अवश्य हो, एकको कुछ प्राप्त हो तो दूसरे को भी वह अवश्य मिले । रूढ शब्दों की व्युत्पत्ति मन्त्रों में भी मिलती है, इस नैरुक्तकथन से भी ' वेदों में रूढ शब्दों की स्थिति सिद्ध होती है । | स्वामी दयानन्द स्वतन्त्र रूप से व्युत्पत्ति के आधार पर प्रसिद्धि से विपरीत अर्थ में भी शब्दों की योजना करते जैसे कि वक्रतु शब्द का वे शूरवीर या सूर्यलोक अर्थ करते हैं । सोम शब्द का अर्थ उत्पन्न होने वाले पदार्थ करते है । शब्द की प्रवृत्ति में क्रिया