वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1371–1377

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1371–1377

पृष्ठ 1371

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वेदार्थपारिजातः २२६ ९ श्रियः कटाक्षवैलक्षण्य श्रीगुणकोशरत्नकारा एवमाहु -'त्वत्स्वीकारकलावलेपकलुपा राज्ञा दृगो दुर्दचा नित्य त्वन्मधुपानमत्तमधुपश्रीनिर्भराभ्या पतिम् । दृग्भ्यामेव हि पुण्डरीकनयन वेदो विदामास मे साक्षालक्ष्मि तवावलोकविभव काक्वा कया वर्ण्यते ॥ ' लोकपालप्रभृत्याधुनिकपर्यन्ताना प्रभूणा त्वत्कटाक्षलेशप्रमरणगर्वेण शोभाविशेपजुष्टा कविवागगोचरा भवन्तीति किमुत लोकपालाना पत्युस्तव पुण्डरीकनयनत्व त्वद्विग्रहानुभवममयसक्तविग्रहरक्तिमायत्त मति नित्य सर्वकाल त्वन्मधुपानमत्तमधुपयो श्रिया सम्पदा निर्भराभ्या पूर्णाभ्या दृग्भ्या तव पति वेद पुण्डरीकनयन पुष्कराक्ष विदामास विज्ञानवान् खलु । यथा मत्तमधुपो नैश्चल्य रक्तता चानुभवति तथा मधुरूपत्वदनुभवे मधुपतुल्यनैश्चल्यरागसम्पूर्णाभ्या लोचनाभ्यामेव हेतुभूताभ्या तव पत्यु पुष्कराक्षत्वम् । सकललोचनातिशयस्य त्वदवलोकनाधीनत्वेन त्वदवलोकसौन्दर्य वर्णनातीतमेव । हे लक्ष्मि, तवावलोकविभव कया काक्वा त्वदीयकटाक्षसौन्दर्य वर्ण्यते? ' विद् ज्ञाने' इत्यस्माद् धातो. ( | | ) ' ' ( | | )उषविद पा० सू० ३ १ ३८ इत्यादिना आम्प्रत्यये कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि पा० सू० ३ १ ४० इत्यस्तेरनुप्रयोगे विदामास इति रूपम् । पुनर्लक्ष्मीकटाक्षमेव वर्णयन् स्वरक्षण प्रार्थयते - ' आनन्दात्मभिरीश मज्जनमदक्षीबालसैरागलप्रेमाद्रैरपि कूलमुद्वह- कृपासम्प्लावितास्मादृशै.। पद्मे ते प्रतिबिन्दुबद्धकलिकब्रह्मादिविष्कम्भकैरैश्वर्योद्गमगद्गदेरगरण मा पालयालोकितै ॥ ' (गु ० २० को० ४१ ) । हे पद्मे तव आनन्दात्मभिरानन्दरूपैरीशस्य हरेर्मज्जनेन तेष्ववगाहनेन यो मदस्तेन क्षीर्बभत्ते. अलसे मन्दरै' आगलमाकण्ठ प्रेमात्रै शिशिरै कूलमुद्वहया तीररोधिन्या उद्वेलया कृपया सम्प्लाविता अस्मादृशा अकिञ्चना येस्तैः | । प्रतिबिन्दु प्रतिकटाक्षलेश बद्धकलिका ममायं कटाक्षलेशोऽस्तु ममायमिति बद्धकलहा ब्रह्मादय एव विष्कम्भा निर्वाहका , ' ' ( ) येषा तैः । विष्कम्भशब्दो नगररक्षार्थमगंलादण्डवाची तद्विष्कम्भोजल न ना अमरको० २१२/१७ इति कोषात् । ऐश्वर्यस्य सम्पद उद्गमेन उत्पादनेन गद्गदैविलासातिशयेन स्खलितगतिभिस्तादृशैरवलोकितैः कटाक्षैः अशरण मा पालय । लक्ष्मी के कटाक्ष की विलक्षणता का वर्णन गुणरत्नकोशकार ने 'त्वत्स्वीकार० ' प्रभृति श्लोक मे किया है । लोकपालो से लेकर आधुनिक प्रभुओ तक समस्त विशिष्ट जनो का मुख आप के कृपा कटाक्ष के लवलेश के स्फुरणमात्र से गर्वोन्नत विशिष्ट शोभा म सम्पन्न हो जाता है कि उनका वर्णन करने मे कविगण असमर्थ हो जाते है । इतना ही नही, लोकपालो के भी पति भगवान् नारायण के नयन जो कमल के समान माने जाते हैं, उनको जो पुण्डरीकाक्ष कहते है, वह भी आप के शरीर को एक टक देखते रहने के कारण ही उनको प्राप्त हुए है । सदा आपके वदन कमल के मधु का पान करके मतवाले बने उनके लोचनो को भी आपकी कृपा दृष्टि के कारण ही यह महत्ता मिली है । जैसे मतवाला मधुप ( भौरा) राग के कारण निश्चल होकर कमल के मकरन्द का पान करता है, उसी तरह से भगवान् भी लक्ष्मी के मुख कमल के सौन्दर्य को एकटक निहारते रहते है और उसी रूप में परिणत हो जाते है । लक्ष्मी मुख कमल की इस सारूप्यता के कारण ही उनको पुण्डरीकाक्ष के रूप में जाना जाता है । इससे यह सिद्ध है कि भगवान् विष्णु के नयनो के सकललोचनो से श्रेष्ठता लक्ष्मी के अवलोकन के अधीन है । इस स्थिति में आपके अवलोकन का सौन्दर्य वर्णनातीत है । है लक्ष्मी आपके अवलोकन का वैभव किस काकु के द्वारा व्यक्त हो सकता है, अर्थात् आपके कटाक्ष के सौन्दर्य का वर्णन कर पाना सम्भव नही है । 'आनन्दात्मभि' प्रभृति श्लोक से भी लक्ष्मी के कटाक्ष का वर्णन करते हुए गुणरत्नकोशकार उससे अपनी रक्षा की प्रार्थना करते है कि हे पद्मे, आनन्द की वर्षा करने वाले आपके नयनो में भगवान् नारायण स्नान करते रहते है, उनमें डूबते उतराते रहते है । इससे वे नेत्र और भी मतवाले हो जाते है और प्रेम से लबालब भर जाते है । इससे उनमें अत्यन्त शीतलता आ जाती है । आपकी इस किनारा छोडकर बहनेवाली कृपादृष्टि से सप्लावित हमारे जैसे अकिंचन जनो की रक्षा ब्रह्मा प्रभृति देवताओ के परस्पर कलह के कारण ही हो पाती है । क्योकि जब आप की करुणा का प्रवाह जब हम लोगों की तरफ आता है तो उसकी एक एक बूद को समेट लेने के लिये ब्रह्मा प्रभृति देवताओं में होड लग जाती है कि यह मुझे मिले, यह मुझे मिले । इस तरह से इस तीव्र प्रवाह को रोकने में ब्रह्मा प्रभृति की भूमिका नगर की रक्षा के लिये लगाये गये अर्गलादण्ड के समान है । हे भगवति, सकलविध ऐश्वर्य की उत्पत्ति मे समर्थ, हाव- भाव के उत्कर्ष के कारण स्खलित गति उन कृपा कटाक्षो से मेरे जैसे असहाय व्यक्ति की आप रक्षा करे ।

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२२७० वेदार्थपारिजातः हे माता, त्वदीय स्वरूप परमाद्भुतसौगन्ध्येन व्याप्तम्, यौवनविकाशेनाम्लानम्, सौन्दर्यामृतसेकशीतलसौन्दर्यपूर्णम्, शिशिरलावण्यसूत्रकोमलाङ्गसुमनःसन्दर्भण श्रीहरेर्वझोलङ्करण भवतीति कथनमपि न शोभते । निरतिशयसौगन्ध्यसौकु- मार्यलावण्ययुक्तश्रीवपुष क्षयातिशययुक्तपुष्पदामत्व निरूपण दनुजवृषविषाणोल्लिखितकठिनहरिवक्ष परिष्करणकल्पन चायुक्तमिति त्वयि श्रीगुणरत्नकोशकाराणा लोकोत्तरप्रतिभावैलक्षण्यम् । हे देवि, कान्तोपभोगललितैर्लुलिताङ्गयष्टि रसास्वादनचतुरचञ्चरीकेणोपभुक्ता समास्वादितरसा पुष्पावलीव त्व प्रेयासं मुकुन्दमभिनन्दयसे । ' मर्मस्पृशो रसशिराव्यतिविद्धय वृत्तैः कान्तोप भोगललितैर्लुलिताङ्गयष्टि । पुष्पावलीव रसिक- भ्रमरोपभुक्ता व देवि नित्यमभिनन्दयसे मुकुन्दम् ॥ ' हे श्रीरङ्गराजजीवनौषधि, स्वर्णमेखलामौक्तिककर्णपत्रैर्मुक्ताहारः कनकमय माणिक्यमय वा तिलक ललन्तीव मणिमालिका मणिमञ्जीरम् एतदादिप्रधानैः सुन्दराभरणै. प्रकृतिमधुर ते गात्र शर्कराभिर्दुग्धमिव पुष्पैः कल्पवल्लीव विशेषेण राजते । श्रीरूपाकारविभूतिमिश्रां हरेः सदृशीमित्युक्तरीत्या भगवत परमतुल्याया कौस्तुभवैजयन्तीशङ्खचक्रगदानन्दकादि- रमणः स्वयमेव त्वद्भारखेदमिव परिहर्तुकामस्त्वा सश्लिष्यतीत्याह -'सामान्ययोग्यमपि कौस्तुभवैजयन्तीपञ्चायुधादिरमणः स्वयमेव बिभ्रत् । त्वद्भारखेदमिव ते परिहर्तुकाम श्रीरङ्गधाममणिमञ्जरि गाहते त्वाम् || ' (गुणरत्नकोश ४७) इति । तत्तदवतारानुरूप यदि त्व नावतरिष्यस्तदा त्वन्नाथस्य तत्तदवतारानुरूपं नर्म असरसमेवाभविष्यत् । 'यदि मनुजतिरश्चा लीलया तुल्यवृत्तीरनुजनुरनुरूपा देवि नावातरिष्य । असरसमभविष्यन्नमं नाथस्य मातर्दरदलदरविन्दोदन्तकान्तायताक्षि ||' ( गु ० र० को ० ४९ ) सश्रितार्थं समुद्रमथनायासं भजतो भगवतः श्रमापनयनाय क्षीरसिन्धोः समुद्भूतासि । 'स्खलितकटकमाल्यै- दर्भिरब्धि मुरारेर्भगवति दधिमार्थं मन्यत श्रान्तिशान्त्यै । भ्रमदमृततरङ्गावर्ततः प्रादुरासीः स्मितनयनसुधाभिः सिञ्चती चन्द्रिकेव ॥ ' हे भगवति, प्रतिहतकटकमाल्यैर्बाहुभिरब्धि दधिमाथ मथतो मुरारेः श्रान्तिशान्त्ये स्मितनयनसुधाभिः सिञ्चती चन्द्रिकेव भ्रमदमृततरङ्गावर्ततः त्व प्रादुरासीः । हे मात, आपका स्वरूप अद्भुत सुगन्ध से व्याप्त है । यवन विकास के कारण तरोताजा, सौन्दर्यामृत से सीचने से शीतल सुहावने सौन्दर्य से भरा है । ( शिशिर शीतल ) लावण्य के सूत्र से पिरोया गया कोमल अगरूपी पुष्पो का अलकार श्रीहरि के वक्षस्थल की शोभा बढाता है यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योकि निरतिशय सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य, लावण्ययुक्त लक्ष्मी के विग्रह का क्षय और अतिशय से युक्त पुष्पमाला के रूप मे वर्णन करना और राक्षसरूपी वृषभो के विषाणो ( सीग) को चोट से आहत भगवान् विष्णु के कठोर वक्षस्थल के अलकार के रूप में चित्रित करना सर्वथा अनुचित है । इस तरह से श्री विग्रह का अलौकिक वैभव वर्णन करने वाले गुणरत्नकोशकार की लोकोत्तर प्रतिभा का हमे यहाँ दर्शन मिलता है । हे देवि, आपकी अगयष्टि कान्त के द्वारा उपयुक्त होने से अत्यन्त ललित हो उठी है । रसास्वादन मे चतुर मधुकर द्वारा समास्वादित पुष्पावली के समान आप अपने प्रियतम नारायण को आनन्द विभोर कर देती है । हे रगराज को जिलाने वाली सजीवनी औषधि, स्वर्णमेखला, मुक्तामणि, कर्णपत्र, मुक्ताहार, कनकमय किंवा माणिक्यमय तिलक, मणिमाला, मणिमजरी प्रभृति सुन्दर आभूषणो से अलकृंत स्वभावत मधुर आपका गात्र ( शरीर ) शर्करा से दूध के समान किंवा पुष्पो से कल्पवल्ली के समान विशेष शोभा से परिपूर्ण हो जाता है । पहले बताया गया है कि श्रीहरि का स्वरूप लक्ष्मी की विभूति से सक्रान्त है और लक्ष्मी का स्वरूप श्रीहरि के सदृश है । ऐसी स्थिति मे भगवान् से परम अभिन्न भगवती लक्ष्मी को समान स्थिति होते हुए भी कौस्तुभ वैजयन्ती, शख, चक्र, गदा, नन्दक प्रभृति आयुधो को केवल भगवान् ने ही इसलिये धारण कर रखा है कि इनके वहन करने के भार के खेद से भगवती लक्ष्मी को मुक्त ,,,रखना चाहते है । गुणरत्नकोशकार आगे वर्णन करते है कि मनुष्य पशु पक्षा जिस किसी योनि मे भगवान् अवतीर्ण उसी योनि मे यदि भगवती भी उनके साथ अवतीर्ण न हुई होती तो भगवान् की यह लोला असरस ही रह जाती । वे पुनःहुएकहते है कि है भगवति, समुद्र के मन्थन के लिये कठिन परिश्रम करनेवाले भगवान् के श्रम ( थकावट ) को दूर करने के लिये आप चांदनी के समान अपनी मन्द मुसकान से सबको आह्लादित करती हुई क्षीर सागर से उत्पन्न हुई हैं ।

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वेदार्थपारिजात. २२७१ भगवतः क्षमाया अपि श्रिय क्षमामतिशयितामुदाहृत्य कविस्तादृग्या क्षमायाः सुखयित्रीत्वमाशास्ते —' मातर्म- थिलि राक्षसीस्त्वयि तदैवार्द्रापराधास्त्वया रक्षन्त्या पवनात्मजाल्लघुतरा रामस्य गोष्ठीकृता । काक तं च विभीषणं शरण- मित्युक्तिक्षमौ रक्षन सा नः सान्द्रमहागस सुखयतु क्षान्तिस्तवाकस्मिकी ॥ ' ( गु० र०को० ५० ) । हे मातर्मैथिलि जनक- नन्दिनि, कृपैक मूर्तितया सोतावतारं कुर्वाणाया त्वयि त्वद्विषये तदेव हनुमदागमनाव्यवहितपूर्वसमय एव रावणस्य तदानी- मेवाज्ञातो रावणनाशापरिज्ञानाद् हनूमदागमनपर्यन्तमतिशयापराधा राक्षसीः पवनात्मजात् तिर्यगुद्भूतात् स्वतो मर्कटाद् रक्षन्त्या पालयन्त्या काकं जयन्त न प्रसिद्ध विभीषण च 'विभीषणस्तु धर्मात्मा न तु राक्षसचेष्टित ।' ( श्री ० वा० रा० ३।१७।२२) शरणमित्युक्तिक्षमी 'त्रील्लोकान् सम्परिक्रम्य तमेव शरण गतः ।' ( श्री० वा० रा ० ५ ३८/३२), 'त्यक्त्वा पुत्राश्च दाराश्च राघवं शरण गत । (श्री० वा० रा ० यु ० का ० १७/१६), रक्षत पालयत । उभयो शरणवरणं च रक्षणनिमित्तम् 'वध्यं ब्रह्मप्रपन्न क्षत्रं न परिजिनाति' ( ऐ ० ब्रा० ७ २२ ) इति श्रुतेः । एव श्रीरामस्य त्वत्प्रियस्य गोष्ठीपरिषद् लघुतरा लघीयसी कृता । रामो लघूकृत इति वक्तव्ये गोष्ठ्या तदुक्तिरपचारभिया ॥ रामस्य गोष्ठी गुणपरिषद्वा ॥ मन्दबुद्धे- दुःसाध्यान्निनिमित्तमार्द्रापराधान् क्षमाशीलया त्वया निमित्तमपेक्ष्य रक्षतो रामस्य गुणगोष्ठीलघूकरण युक्तमेव । सा आर्द्रापराधमहत्त्वरूपेण प्रसिद्धा आकस्मिकी निर्हेतुस्तव क्षान्ति सान्द्रमहागसोऽस्मान् सुखयतु । 'प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा । अलमेषा परित्रातु राक्षस्यो महतो भयात् ॥ ' ( श्री० वा० रा० सुन्दरकाण्ड २७१३९) इति त्रिजटावचन तु स्वबुद्धयैव, न तेन प्राणिपातप्रसन्नता मैथिलीधर्म । हे भगवति, यावत्कालमविच्छिन्नमहापराधानस्मानवलोक्य मनानिग्रहा- भिमुख मन कुर्वति सति तदनुचितमिति त तत. कर्मणो निवर्त्य वात्सल्यातिशयात्त्वमस्मान् स्वजनयसि । 'पितेव त्वत्प्रेयान् जननि परिपूर्णागसि जने हितस्रोतोवृत्या भवति च कदाचित् कलुषधीः । किमेतन्निर्दोषः क इह जगतीति त्वमुचितैरुपायैर्विस्मार्य स्वजनयसि माता तदसि न ॥ ' (गु० र० को ० ५२) । हे जननि त्वत्प्रेयान् परिपूर्णागसि भगवान् की क्षमा से लक्ष्मी की क्षमा अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि की है, इस बात को उदाहरण से समझाकर कवि गुणरत्न- कोशकार ने ' मानमैथिलि' प्रभृति श्लोक मे लक्ष्मी की यह क्षमा सबके लिये मुखदायक हो, ऐसी आशका व्यक्त करते है । हे मात मैथिलि जनकनन्दिनि, आप कृपा की प्रधान मूर्ति होने के कारण ही सीना अवतार के अवसर पर जब आप रावण की लंका मे निवास कर रही थी, उस समय हनुमान् के आगमन से पहले राक्षसियो को यह भान नही था कि अब रावण का वध सनिकट है । अपने इसी अज्ञान के कारण वे आपके साथ बडा दुर्व्यवहार करती थी । इस स्थिति मे भी आपने पवनात्मज हनूमान् के कोप से इन राक्षसियो की रक्षा की । इसी तरह से अपराधी जयन्त नामक काक की और धर्मात्मा विभीषण की भी आपने रक्षा की । क्योकि विभीषण राक्षस प्रकृति का नही था, वह भगवान् राम की शरण में आगया था । इसी तरह से जयन्त काक भी तीनो लोको मे कही शरण न पाकर अन्त मे श्रीराम और जानकी जी की ही शरण में आ गया था । जयन्त को श्रीराम के कोप से भगवती सीता ने ही बचाया था । इन दोनों के शरण में आने पर आपने इनकी रक्षा की थी । इस प्रकार मे आपने राम की गुणगोष्ठी को हलका कर दिया । राक्षसियो और जयन्त काक ने आपके साथ प्रत्यक्ष अपराध किया था और वह अभी ताजा हो था, तो भी आपने इनको क्षमा कर दिया, हनुमान् और श्रीराम के कोप से इनकी रक्षा की, इससे बढकर क्षमा का उदाहरण दूसरा कहाँ मिल सकता है । आपकी यह उत्कृष्ट क्षमा हमारे जैसे अपराधियो को भी सदा सुख पहुँचानी रहे । त्रिजटा राक्षसी ने अन्य राक्षसियो से कहा था कि जनकात्मजा प्रणिपात मात्र से प्रसन्न हो जाती है । राक्षसियो, आगे आने वाले महान् भय से यही हमारी रक्षा करेगी । त्रिजटा के मुख से यह वाक्य स्वाभाविक रूप से निकल गया था । कवि प्रार्थना करता है कि हमारे जैसे निरन्तर अपराधशील व्यक्तियों को देखकर पहले आपकी इच्छा होती है कि इनको कुछ दण्ड दिया जाय, किन्तु तत्काल ही आप इस भाव को अनुचित मान कर ऐसा नही करती और वात्सल्यरस से अभिभूत होकर आप अपने निश्छल स्नेह से हमको अपना लेती है । कवि आगे कहते है कि हे जननि, आपके प्रियतम अधिक अपराध करने वाले व्यक्ति पर उसकी हितदृष्टि से उसी प्रकार कुपित हो जाते हैं, जैसे कि पिता पुत्र पर कुपित होता है । यह उनका आगन्तुक धर्म है, स्वाभाविक नही । इतना होने पर भी आप

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२२७२ वैदार्थ पारिजातः जने पितेव हितस्रोतोवृत्त्या तत्कालाप्रियपथ्यपर्यवसायि च हित तदेव स्रोतः प्रवाहस्तत्र वृत्त्या वर्तनेन हितैकपरत्वेन कदाचित् कुपितमना भवति, न तु कुपितमनस्त्व तस्य नैजम् । तदानी तद्दृष्ट्वा एतत्कुपितमनस्त्वं कि निबन्धनम्? अनुचितमिति कुत इति चेत्, इह दोषाश्रये जगति लीलाविभूतौ को निर्दोष., न कोऽपीत्यर्थ । अतो दोषदर्शने मन कालुष्य न युक्तमित्येव प्रकारेण उचितैः अपराधक्षमापनयोग्यैरुपायैः हावभावकटाक्षादिभिस्तद्विस्मार्यं स्वजनयसि स्वत्वाभिमानगोचरान् करोषि पितुर्हितपरत्व मातुश्च वात्सल्यपूर्ण हितपरत्व सुप्रसिद्ध युवयोर्दृष्टमिति । 'परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||' ( भ० गी० ४१८), ' अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ।' ( वि० पु० १२ ९| १४२) इत्यादिप्रमाणैः सश्रितरक्षणाय श्रीश्रीशी कृपास्वातन्त्र्याभ्यां हेतुभ्यां लीलाविभूताववतीर्य विरहक्लेशादिकमनुभूतवन्तौ इति कृपास्वातन्त्र्ये धिगिति तद्विग्रहप्रेमपारवश्यादित्याह – ' नेतु- नित्यसहायिनी जननि नस्त्रातु त्वमत्रागता लोके त्वन्महिमावबोधबधिरे प्राप्ता विमर्दं बहु । क्लिष्ट ग्रावसु मालतीमृदुपद विश्लिष्य वासो वने जातो धिक्करुणां धिगस्तु युवयो' स्वातन्त्र्यमत्यङ्कुशम् ॥ ' (गु ० २० को ० ५३ ) हे जननि, नेतुः सर्वजगन्नियन्तुः पर- मेश्वरस्य नित्यसहायिनी नोऽस्मान् अशरणान् त्रातु त्वन्महिमावबोधबधिरे त्वदीयवैभवज्ञानशून्येऽत्र लोके त्वमागता सम- वतीर्णा सती बहुविमर्दं सङ्घर्षमायासमिति यावत् प्राप्ता । तदेवोपपादयति —मालतीमृदुपदमिति । मालतीमृदुपद जातिकुसुम- सुकुमारपदद्वयं ग्रावसु पाषाणेषु क्लिष्ट क्लेशं प्राप्तवत् वने विश्लिष्य विरह प्राप्य वासो वर्तनम्, नित्यानपायिनोर्युवयो- पृथग्वर्तनम् अत्यङ्कुशम् अमर्याद विग्रहसौकुमार्यविरोधिनी करुणा प्रति तथाभूतमेव स्वातन्त्र्यं च प्रति धिगस्तु । तदुभयप्रयुक्तत्वात् युवयोस्तादृशस्य क्लेशस्येत्यर्थः । - सचितरक्षणोपयुक्त श्रियः स्वाधीनपतिकात्वमुच्यते — 'अधिशयितवानब्धि नाथो ममन्थ बबन्ध तं हरधनुरसौ वल्लीभञ्ज बभञ्च च मैथिलि । अपि दशमुखी लूत्वा रक्षः कबन्धमनर्तयत् किमिव न पतिः कर्ता त्वच्चाटुमनोरथः|| ' (गु० २० को० ५४ ) हे मैथिलि, असौ नाथः, त्वच्चाटुचुचुमनोरथः त्वच्चाटुना त्वत्प्रियाचरणेन वित्त सम्पन्नः त्वच्चाटुचुञ्चस्तादृशो मनोरथो यस्य सः । तेन वित्तश्चुचुपचणपौ' (पा० सू० ५/२/२६ ) इति चप्प्रत्ययः । त्वल्लाभाय अब्धिमधि अब्धौ शयित- उस पर विचार करती है कि प्रियतम ने ऐसा क्यों किया? आप इसको उचित नही मानती । यह सारा जगत् दोषो से भरा है, इसमे निरपराध व्यक्ति मिलना कठिन है । अत किसी का दोष देखकर उस पर कुपित होना अनुचित है । ऐसा मान कर आप उचित हाव- भाव, कटाक्ष आदि से अपने प्रियतम को प्रसन्न कर लेती है और उस अपराधी व्यक्ति के अपराधो को भुलाकर उसको अपना लेती | पिता अपनी सन्तति का हित चाहता है और माता उस पर अपना वात्सल्य लुटाती रहती है । यही स्थिति आप दोनो की भी है । 'परित्राणाय ', ' अन्येषु ' इत्यादि प्रमाणो के आधार पर शरणागत की रक्षा के लिये श्री और श्रीश दोनो अवतार लेते है, किन्तु उनको बहुत ही कष्ट उठाना पडता है । इस सम्बन्ध मे कवि का कहना है कि हे जननि, सारे जगत् के नियन्ता परमेश्वर की आप सदा सहायता करती रहती है । हमारे जैसे असहाय व्यक्तियो की रक्षा के लिये आप इस लोक में अवतीर्ण होती है, किन्तु आपकी महिमा को ये समझ नही पाते । इसके लिये आपको बहुत कष्ट भी उठाना पडता है । आपके मालती पुष्प के समान सुकुमारचरण पत्थरो पर चलने के कारण छिल जाते है, वन मे आपका भगवान् से वियोग हो जाता है, जब कि लक्ष्मी और लक्ष्मीपति का कभी वियोग नही होगा | अपनी करुणावृत्ति और स्वातन्त्र्य शक्ति के कारण ही आप यह सब सहन करती है, किन्तु यह सब आपके शरीर की सुकुमारता को देखते हुए अनुचित है । हम ऐसी अमर्याद करुणा और स्वातन्त्र्य को अच्छा नही मानते, क्योकि इन्ही के कारण आप लोगो को अनेक प्रकार के कष्ट उठाने पडते है । लक्ष्मी स्वाधीनपतिका नायिका है, इसीलिये वह अपनी शरण मे आये प्राणियो की रक्षा करने में समर्थ है । कवि कहता है कि हे मैथिलि, वह आपके प्रियतम, आपकी चाटुकारिता करके अपने मनोरथ को सिद्ध करते रहते है । आपको पाने के लिये ये समुद्र में सोते रहते हैं, क्योकि आपको प्रसन्न रखने के लिये ही उन्हें आपके पिता का घर अच्छा लगता है । आपके लाभ के लिये उन्होने समुद्र

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वेदार्थपारिजातः २२७३ वान् 1। त्वज्जननभवनप्रीत्येति भावः । त्वल्लाभाय तं ममन्थ मथितवान् | त्वल्लाभाय बबन्ध च सेतुना बद्धवांश्च । त्वल्लाभायैव हरधनु: वल्लीभञ्ज वल्लीमिव उपमार्थे णमुल् बभञ्ज च भङ्ग कृतवान् । त्वल्लाभायैव दशमुखी दशानां मुखाना समाहार दशापि मुखानि लूत्वा छित्वा रक्ष.कवन्ध रावणशरीरमनर्तयत् नर्तितवाश्च रणरङ्ग इति शेष । 'अत्यन्तभक्तियुक्ताना नैव शास्त्र न च क्रमः । ' इति रीत्या क्रमातिक्रमणम् । नैतावदेव किन्त्वशक्यमपि कुर्यात् । त्वत्प्रियत्वल्लाभाय किमिव न कर्ता किं वा न कुर्यात् । इवशब्दो बार्थ. । अघटितमपि सर्व कुर्यादित्यर्थ । 'यदि राम. समुद्रान्ता मेदिनी परिवर्तयेत् । अस्याः कृते जगञ्चापि युक्तमित्येव मे मति ॥ ' (वा० रा ० सुन्दरकाण्ड १६। १३ ) इति हनुमदुक्ते । . ' भगवत सर्वप्रकारविभवोऽपि श्रीविलासलवानुभवेन पर्याप्त इत्याह-- दशशतपाणिपादवदनाक्षिमुखै राविलैरपि निजवैश्वरूप्यविभवैरनुरूपगुणै । अवतरणे रतैश्च रसयन् कमिता कमले क्वचन हि विभ्रमभ्रमिमुखे विनिमज्जति ते ॥' (गु ० २० को० ५६) हे कमले, ते तव कमिता नायको हरि सहस्रशीर्षा पुरुषः 'अनन्तबाहूदरवक्त्रनेत्रम्' इत्यादिरीत्याऽपरि- मितपाणिपादवदनाक्षिमुखै. अनुरूपगुणै त्वद्गुणानुरूप अखिले अन्यूनैः निजवैश्वरूप्यविभवैः निज स्वकीय नित्य वा विश्वरूपमेव वैश्वरूप्य विश्वरूपसम्बन्धि वा तस्य विभवैरतिशयैरपि, अतस्तद्भिते. वैश्वरूप्यविभवभिन्नैरवतरणैर्वासुदेवादि- चतुव्यूँहैर्विरिञ्चिगिरीशमध्यवर्तिविष्णूपेन्द्रमत्स्यकूर्मादिरूपैश्च रसयन् त्वद्विभ्रम क्वचन क्वापि समुद्रे तुषारवदेकदेश एव विभ्रमभ्रमिमुखे विलासावर्तगह्वरे विनिमज्जति निमग्नो भवति, न त्वदेकदेशमपि प्रयाति । भक्ताना रक्षणाय क्षीरार्णवपरम- पदे अपि विस्मृत्य श्रीरङ्गधाम्नि वससीत्याह -'जननभवनप्रीत्या दुग्धार्णव बहु मन्यसे जननि दयितप्रेम्णा पुष्णासि तत्परमं पदम् । उदधिपरमव्योम्नोविस्मृत्य मादृशरक्षणक्षममिति धिया भूयः श्रीरङ्गधामनि मोदसे ||' ( गु० २० को ० ५६ ) इत्येवं श्रीगुणरत्नकारैस्तट्टीकाकृद्भिश्च श्रियो लोकोत्तरमाहात्म्यवर्णनेन श्रीसूक्तमेव निगदव्याख्यातं मन्तव्यम् । प्रमाणपथातीतवैभवाया मङ्गलाना मङ्गलरूपाया अगरणशरणभूताया. श्रियः श्रीसूक्तेन लोकोत्तरं माहात्म्य- मावेद्यते । क्षीरजलधावध्वरे यस्या. प्रादुर्भावः अरविन्दवन विष्णुवक्ष स्थल वा, श्रीहरे परमव्योमात्मकं दिव्यं पदं वा का मन्थन और सेतु द्वारा उसका बन्धन भी किया । आपको पाने के लिये ही उन्होने शिव के धनुष को लता-पत्र के समान तोड डाला और इसीके लिये युद्धस्थल मे रावण के दसो मुखो को काट कर कबन्ध का नृत्य कराया । इतना ही नही, आपकी प्रसन्नता के लिये आपके प्रियतम क्या नही कर सकते? अर्थात् अशक्य को भी शक्य बनाने मे वे सदा तत्पर रहते है । बाल्मीकि रामायण मे हनुमान् की उक्ति है कि भगवान् राम भगवती सीता को पाने के लिये समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को भी यदि उलट दे, तो मै इस कार्य को उचित ही मानूगा! भगवान् का सारा वैभव लक्ष्मी के विलास के कण की भी बराबरी नही कर सकता । कवि कहता है कि हे कमले, आपके कान्त भगवान् नारायण श्रुति और स्मृति ( गीता ) के वर्णन के अनुसार अपरिमित पाणि, पाद, वदन, नेत्र, मुख वाले है और आपके गुणो के अनुरूप समस्त विश्व के वैभव से सम्पन्न है । इन्ही की सहायता से वे वासुदेव, सकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के रूप मे प्रसिद्ध चतुर्व्यूहावतार के रूप में अथवा ब्रह्मा और शिव के मध्यवर्ती विष्णु के उपेन्द्र, मत्स्य, कूर्म, प्रभृति अवतारो के रूप मे अवतरण कर विविध रसों की सृष्टि करते रहते है । किन्तु उनका यह सारा खिलवाड समुद्र के सामने तुषार कण के समान आपके लीलाविलास के सामने नगण्य हैं । उसके एक कण की भी वह बराबरी नही कर सकता । भक्तों की रक्षा के लिये आप क्षीरसमुद्र को छोड कर श्रीरगधाम में निवास करती है । इस स्थिति का वर्णन 'जननभवन ० ' प्रभृति श्लोक मे किया गया है । इस प्रकार गुणरत्नकोशकार और उसके टीकाकारों ने लक्ष्मी के लोकोत्तर माहात्म्य का वर्णन कर एक प्रकार से श्रीसूक्त की ही स्पष्ट और विशद व्याख्या की है । भगवती लक्ष्मी का वैभव किसी भी प्रमाण से पूरी तरह से नही जाना जा सकता । ये मंगलों का भी मंगल और अशरण को शरण देने वाली है ॥ ऐसे लक्ष्मी के लोकोत्तर माहात्म्य का वर्णन श्रीसूक्त मे किया गया है, क्षीरसागर के मन्थन के अवसर पर

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२२७४ वेदार्थपारिजातः यस्याः स्थानम्, तस्या महामहिमवैभव को वा वर्णयितु शक्नोति । यस्याश्च स्तवैर्जनः स्तोतव्यतामुपयाति, यत्सङ्कल्पा-ज्जङ्गमाजङ्गमाना सृष्टिस्थितिप्रलया भवन्ति, तत्पूर्णं तेजो योगिना समाधौ त्वत्पादलाक्षारसाङ्कमवभातीति वर्णयन्ति || २६|| लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ । कमल का वन, विष्णु का वक्षस्थल अथवा श्रीहरि का परम व्योमात्मक दिव्यपद इनका निवासस्थान है । उस लक्ष्मी के महान् वैभव का वर्णन कौन कर सकता है । जिसकी स्तुति में लगा हुआ व्यक्ति स्वय स्तोतव्य हो जाता है, उसकी भी लोग स्तुति करने लगते है । जिसके सकल्प से स्थावर और जगम जगत् की सृष्टि, स्थिति और प्रलय लीला होती है, वह परिपूर्ण ब्रह्म-तेज भी योगियों की समाधि में, आपके (लक्ष्मी के ) पैर की लाक्षा के राग से अकित ही प्रतीत होता है, ऐसा वर्णन शास्त्रो मे मिलता है || २६|| मुनिलोकनभःपक्षसमासु विगतासु च ॥ विक्रमार्कात् श्रीमुखेऽर्के देवत्ये परिवत्सरे ॥ ज्येष्ठेऽधिके सिते पक्षे गङ्गादशहरातिथौ । वेदार्थपारिजातस्य भूमिका पूर्णतामियात् ॥

पृष्ठ 1377

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