वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1361–1370
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1361–1370
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वेदार्थपारिजातः २२५ ९ ब्रा० उ० ११४ ) इत्यादिश्रुतिषु । यथा सीताराधारुक्मिण्यादीना पर्यवमान ऐक्यमेव, तथैव त्रिपुरेश्वर्या अपि तदैक्यमेव । ,यथा श्रीरामकृष्णविष्ण्वादिरूपभेदेऽपि तत्त्वमेकमेव तथैव शिवविष्ण्वादीनामपि रूपभेदेऽपि तत्त्वैक्यमेवावगन्तव्यम् । ' श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यो, ' 'श्रिय लोके देवजुष्टामुदाराम्' इत्यादिवचनानि तु विष्णो परत्वबोधकत्वेऽपि न तदभिन्नस्य शिवस्य परत्वे बाधकानि । श्रीभगवत. प्राणेश्वरीत्वेन श्रियो महामहिमश्रवणेन भगवान् प्रसीदतितमाम् । इद च महानुभावैर्गुणरत्नकोशकारै- रुक्तमेव — ‘ श्रिय' श्री. श्रीरङ्गेशय तव च हृद्या भगवती श्रिय त्वत्तोऽप्युच्चैर्वयमिव फणाम. शृणुतराम् । दृशौ ते भूयास्वां सुखतरलतारे श्रवणतः पुनर्हर्षोत्कर्षात् स्फुटतु भुजयो कञ्चुकशतम् ||' ( गुणरत्नकोश ९) हे श्रिय सर्वाश्रयणीयाया अपि श्रीः समाश्रयणीय श्रीभगवन् रङ्गेशय श्रीरङ्गनगरे श्रीरङ्गविमाने शयनशील सौलभ्यसीमाभूमे सर्वेषा शिष्टजनाना हृद्यत्वात्परम-प्रेमास्पदत्वात् सर्वोत्तमत्वेन भवान् स्तूयते, तदा भवतोऽपि हृद्यत्वेन परमप्रेमास्पदभूताया नित्यमेव वक्ष स्थलनिवासिन्याः षाड्गुण्यपरिपूर्णायाः पुरुषकारत्वेन सर्वाश्रयणीयाया अनन्तब्रह्माण्डसौन्दर्यमाधुर्येश्वर्याद्यधिष्ठात्र्यास्त्वत्प्राणप्रियतमायास्त्व-तोऽप्यत्यधिकमुच्चैर्महामहिमैश्वर्य वर्णयामः । तदपि न परोक्ष किन्तु त्वत्समक्षमेव फणाम । अत्र स्तुतिर्नाम नाविद्यमान-गुणारोप, किन्तु विद्यमानयावद्यथावज्ज्ञातगुणवर्णन क्रियते तच्छृणुतराम् । तस्य वर्णनस्य त्वमेव साक्षी भव । न केवल श्रीस्तुतिश्रवणेन तव कोपाभाव:, प्रत्युत श्रवणसुखेन चक्षुषोर्वेवश्य सन्तोषातिशयेनापरिमितहर्षोद्रेकाद् अपरिमितकञ्चक-स्फुटनहेतुगात्रपरिपोषश्च स्यात् । स्तुतिश्रवणात् ते दृशौ सुखतरलतारे सुखेन तरले तारे कनीनिके ययोस्ते तथाभूते भूया-स्ताम् । तथैव हर्षोत्कर्षाद् भुजयो कञ्चुकशत स्फुटतु । प्रथममेककञ्चकस्फोटे ततोऽपि पृथुत्वेनापरकञ्चुकधारणे गात्रजृम्भणेन तस्यापि स्फुटने ततोऽपि विपुलकञ्चकघृतो विग्रहविवृद्धया अपरिमितकञ्चकस्फोटो भवतु । सूक्त मे नारायण को लक्ष्मीपति बनाया है, उसी तरह से श्वेताश्वतरश्रुति मे रुद्र को उमापति कहा है, किन्तु जैसे सीता, राधा, रक्मिणी को अन्तत लक्ष्मी का ही अवतार माना जाता है, उसी तरह से त्रिपुरेश्वरी भगवती पार्वती और लक्ष्मी का भी अभेद ही माना जाता है । जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीविष्णु का स्वरूप भेद होते हुए भी इनमे ऐक्य माना जाता है, उसी तरह से शिव, विष्णु आदि के स्वरूप भेद के रहते हुए भी इनमे एकता ही माननी चाहिये । विष्णु की परता को बतानेवाले वचन उससे अभिन्न रूप से अवस्थित शिव की भी परता के बोधन में बाधक नही बन सकते । लक्ष्मी भगवान् की प्राणेश्वरी हे, इनकी महिमा सुनकर भगवान् परम प्रसन्न होते है । इस स्थिति का वर्णन महानुभाव गुणरत्नकोशकारने 'श्रिय श्री ' प्रभृति श्लोक में किया है । इसका यह अभिप्राय है -भगवान् विष्णु सबके द्वारा आश्रयणीय लक्ष्मी के भी आश्रय है । हे भगवन्, आप श्रीरङ्ग नगर मे श्रीरंग विमान मे शयन करने वाले है । इस तरह से सबके लिये मदा सुलभ है । समस्त शिष्ट जनो के आप परम प्रेम के आस्पद है । अत सर्वोत्तम देव के रूप में आपकी स्तुति की जाती है । भगवती लक्ष्मी तो आप ,,, जैसे सर्वोत्तम देव के परम प्रेम की भी आस्पद है सदा आपके वक्षस्थल पर निवास करती हैं षाड्गुण्य से परिपूर्ण है पुरषकार के रूप मे सबको आश्रयणीय है, अनन्त ब्रह्माण्ड के सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री है और आपको प्राणो से भी अधिक प्रिय है । अत हमारे जैसे आप के भक्त आपसे भी अधिक महिमायुक्त लक्ष्मी ही है, ऐसा वर्णन करने का साहस करते है । यह कार्य हम परोक्ष मे न कर आपके समक्ष ही करते है । इस स्तुति में अविद्यमान गुण का आरोप न होकर समस्त विद्यमान ज्ञात गुणो का यथावत् वर्णन किया गया है । इसको आप सुनिये । इस वर्णन के साक्षी आप ही बनिये । इस श्रुति के श्रवण से केवल आपका कोप ही दूर नही होगा, किन्तु इस स्तुति के श्रवण से आपको अत्यन्त सन्तोष भी मिलेगा और अतिशय सन्तोष के कारण अपरिमित हर्ष का उद्रेक होने से आपकी आंखो से हर्षाश्रु बहने लगेगे, किसी वस्तु को देखने मे विवश हो जायगे । हर्ष के अतिरिक्त से आपको रोमाच हो से आपके नेत्र की कनीनिका सुख केजायगा और अपरिमित कंचुक के स्फोटन मे समर्थ गात्रपरिपोष हो जायगा । स्तुति के श्रवण कारण तरल ( गीली ) हो जायगी और इसी तरह से हर्ष के उत्कर्ष से आपके कचुक फट जाय । हर्षातिरेक से गात्र के पुष्ट ( मोटा) होने पर एक कंचुक फटेगा, तब दूसरा बडा कंचुक बनेगा । गात्र के परिपोष से उसके भी फट जाने पर फिर नया बडा कंचुक बनेगा । इस तरह से लक्ष्मी के गुणगण के श्रवण से आपका गात्र अपरिमित कचुक के स्फोटन में समर्थ होने तक बढ़ती रहे ।
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वेदार्थपारिजातः२२६० वशिष्ठवाल्मीकिपराशरव्यासादयो मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्यापीरुषेयत्वेनापास्तसमस्तपुदोषशङ्काकलङ्कपङ्कत्वेन परमं प्रामाण्यमाहु । वेदस्य परम तात्पर्य यस्मिन् ब्रह्मण्येव पर्यवस्यति परब्रह्मरूपेण तच्छक्तिरूपेण प्रकृतिमायादिरूपेण | ' ' ( ), ' 'भगवत्या एव वर्णन कुर्वन्ति वेदा श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ वा० स० ३१।२२ हिरण्यवर्णा हरिणीम् ' सुमज्जानये विष्णवे' ( तै० ब्रा० २| ४ | ३ | ९ ), 'श्रद्धया देवो देवत्वमश्नुते ' (तै ० ब्रा ० ३ | १२| ३| १ ) इत्यादिषु मन्त्रेषु ब्राह्मणेषू-पनिषत्सु च विविधरूपेण तस्या एव गुणगणार्णवो वर्णितो लभ्यते । रामायणमहाभारतादय इतिहासा, अष्टादशपुराणानि, उपपुराणानि, तन्त्राणि, आगमाः, दर्शनानि, धर्मशास्त्राणि च त्वय्येव पर्यवस्यन्ति । इतिहासपुराणादीना वेदोपबृहकत्वमुक्तम् । ' वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभु ' (श्री ० वा० रा ० १।४।६ ), 'काव्य रामायण कृत्स्न सीतायाश्चरित महत्' (वा० रा० १।४।७) इति रामायणवचनात् । महाभारतादेरपि भगवन्माहात्म्यपर्यवसायित्वम्, 'मुनिविवक्षुभंगवद्गुणाना सखापि ते भारतमाह कृष्णः । यस्मिन्नृणा ग्राम्यसुखानुवादैर्मतिर्गृहीता नु हरे. कथायाम्' ( श्री० भा० म० पु ० ३।५।१२ ) इति श्रीमद्भा-गवतवचनात् । भगवतश्च तदभिन्नत्वात् सर्वेषा प्रमाणाना तस्यामेव पर्यवसानम् । तदप्युक्त महानुभावैः -' उद्वाहुस्त्वामुप-निषदसावाह नैका नियन्त्री श्रीमद्रामायणमपि पर प्राणिति त्वच्चरित्रे । स्मर्तारोऽस्मज्जननि यनमे सेतिहासैः पुराणैर्निन्युर्वे-दानपि च ततमे त्वन्महिम्नि प्रमाणम् ॥ ' ( गुणरत्नकोश १४) हे अस्मज्जननि, असौ उपनिषत् श्रीसूक्तादिरूपा एकैव वैतालिक इव उद्वाहुः उत् ऊर्ध्व बाहू यस्याः सा उद्वाहुः उद्यतबाहुः सती त्वमेव जगत्स्वामिनीति शपथ कुर्वाणेव त्वा नियन्त्री जगत्स्वामिनी नाह, किन्तु श्रीमद्रामायणमपि त्वच्चरित्रे तव चरित्रे सत्येव पर प्राणिति जीवति । त्वच्चरित्रप्रतिपादनरूप प्राणधारणेनैव जीवति । यद्वा परमिति क्रियाविशेषणम् । सोत्कर्ष जीवतीत्यर्थ. । रामादिचरित्रे Iतु प्राणिति जीवनमात्र धत्ते त्वच्चरित्रे तु पर प्राणिति सोत्कर्ष जीवति । अतिशयितजीवनस्यैव फलत्वात् । तत्र - ' 'टीकाकाराः श्रीवात्स्यवीरराघवाचार्याः त्वच्चरित्रे रामायण पर प्राणितीत्यनेन काव्य रामायणं कृत्स्न सीताया-श्चरित महत्' ( श्री ० वा० रा० १२४/७) इति वाल्मीकिवचन स्मारितम् । सीतायाश्चरितमहत्त्व तु त्वत्पुरुषकारोपयुक्तकृपा- पारतन्त्र्यानन्यार्हत्वप्रतिपादनेन कृपाप्रकाशनं रावणापहारकृते भगवत्याः सीतायाः प्रथमवियोगे स्पष्टम् । तथाहि रावण- वसिष्ठ, वाल्मीकि, पराशर, व्यास प्रभृति मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद को उसकी अपौरुषेयता के कारण समस्त पुरुषगत दोषो की शका के कलकरूपी पक से रहित होने से परम प्रमाण मानते है । वेद का परम तात्पर्य ब्रह्म मे ही माना जाता है । परब्रह्म के रूप मे, उसकी शक्ति, प्रकृति अथवा माया के रूप मे ये सब वेद भगवती लक्ष्मी का ही वर्णन करते है । 'श्रीश्च०' प्रभृति मन्त्र, ब्राह्मण ,,,और उपनिषद् के वाक्यों में विविध रूप में उसी का गुणगान वर्णित है । रामायण महाभारत प्रभृति इतिहास अष्टादश पुराण उपपुराण, तन्त्र आगम, दर्शन, धर्मशास्त्र प्रभृति समस्त शास्त्रो का पर्यवसान लक्ष्मी की स्तुति में ही होता है । इतिहास, पुराण प्रभृति वेदार्थ के उपबृहक माने जाते है । समस्त रामायण सीता का महान् चरित्र माना जाता है । श्रीमद्भागवत के अनुसार समस्त महाभारत मे भगवान् के माहात्म्य का ही वर्णन है । भगवान् लक्ष्मी से अभिन्न है, अतः समस्त प्रमाणो का पर्यवसान लक्ष्मी में ही होता है । गुणरत्नकोशकार ने 'उद्वाहुस्त्वा० ' प्रभृति श्लोक में इसी विषय का वर्णन किया है । इस श्लोक का अभिप्राय इस प्रकार है-- हे जननि, श्रीसूक्त प्रभृति के रूप मे विद्यमान अकेली उपनिषद् ही वैतालिक (चारण ) के समान हाथ उठाकर केवल लक्ष्मी ही इस सारे जगत् की स्वामिनी हे, ऐसा शपथपूर्वक नही कहती, किन्तु रामायण भी आपका चरित्र प्रतिपादित करने के कारण ही जीवित है, आपके चरित्र का प्रतिपादन करना ही, उसके जीवित रहने का मुख्य कारण है । अथवा ' पर' पद को क्रियाविशेषण माना जायगा । तब उसका अर्थ होगा कि यह उत्कृष्टग्रन्थ के रूप में मान्य है । राम प्रभृति का चरित्र वर्णन कर यह जीवित है, किन्तु आपके चरित्र का वर्णन करने से तो यह एक उत्कृष्टतम ग्रन्थ होगया है । यहाँ टीकाकार वात्स्यवोरराघवाचार्य का कहना है कि ' समस्त रामायण काव्य में सीता के ही महान् चरित्र का वर्णन है' इस बाल्मीकि की उक्ति का स्मरण कराया जाता है, सीता के चरित्र की महान् महत्ता उनके प्रथम वियोग काल में तब स्पष्ट होती है, जबकि भगवान् राम के पुरुषार्थं को किसी को कृपा की आवश्यकता नही है, - इस बात को प्रसिद्ध करने के लिये भगवती सीता ने रावण द्वारा अपना अपहरण होने दिया और ऐसी अवस्था मे अपनी कृपा दृष्टि का
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वेदार्थ पारिजातः २२६१ वधानन्तर रामविजयप्रियाख्यापकतया सन्निहितान्महोपकारात् स्वस्यामार्द्रापराधात् चित्रवधार्हा राक्षसीर्दृष्ट्वा तदाराधानुगुण- चित्रवधं कर्तुमुद्यताद् मारुते: 'पापाना वा शुभाना वा वधार्हाणा प्लवङ्गम । कार्य कारुण्यमार्येण न कश्चिन्नापराध्यति ॥ ' ( श्री ० वा० रा ० युद्धका ० ११३।४३) इत्याद्युपदेशेन तासा सरक्षणाद् महती कृपा प्रकाशिता । स्वय रावणगृहे वन्दीभूय वन्दीकृतसुरसुन्दरीविमोचनाद्वा भवती कृपा प्रकाशिता । द्वितीयविश्लेषे भर्तृनियमानतिक्रमेण वाल्मीक्याश्रमे तस्या निवासात् पारतन्त्र्यं प्रकाशितम् । तृतीयविश्लेषे पतिपरित्यक्तायास्तस्या पृथगाश्रयान|लम्बनेन भूमौ प्रवेशादनन्यादृशत्व प्रकाशित- मिति कृत्स्नस्य श्रीरामायणस्य सीताचरितत्व स्पष्टम्' इति । यतमे ये स्मर्तार स्मृतिरूपेण वेदार्थस्मर्तार पराशरादय, ततमे तेऽपि वेदान् तत्स्वहित-पुरुषार्थवेदकतया वेदशब्दवाच्यान् आम्नायान् सेतिहास, इतिहास. सह वर्तमानानि सेतिहासानि, तैरितिहासशब्दवाच्यैर्भारतादिभि., पुराणे विष्णुपुराणादिभि, सह त्वन्महिम्नि प्रमाणं भावप्रधाननिर्देशात् प्रमाणतां निन्युर्नयन्ति । नियोगाद्विकमत्वात् कर्मद्वयम् । तेन सर्वे वेदा अपि त्वय्येव पर्यवस्यन्ति, 'वेदवेद्ये परे पुसि जाते दशरथात्मजे । वेद. प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ॥ ' इति रीत्या वेदानामेव रामायणात्मनावतीर्णत्वात् । भगवत्याः श्रिया ह्यपेक्षणेन दौर्गत्यतारतम्य तत्कृपाकटाक्षेण चैश्वर्यतारतम्य दृश्यते । 'स श्लाघ्यः स गुणी धन्य I स कुलीन' स बुद्धिमान् । स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षित. । सद्यो वैगुण्यमायान्ति शीलाद्या सकला गुणा' । पराङ्मुखी जगद्धात्री यस्य त्व विष्णुवल्लभे ॥ ' ( विष्णुपुराण ११ ९/ १२ ९- १३० ) इति विष्णुपुराणवचनानि च तत्र प्रमाण- भूतानि । 'आकुग्रामनियामकादपि विभोरासर्वनिर्वाहकादैश्वर्य यदिहोत्तरोत्तरगुण श्रीरङ्गभर्तुः प्रिये । तुङ्ग मङ्गलमुज्ज्वलं गरिमवत् पुण्य पुनः पावन धन्य यत्तददश्च वीक्षणभुवस्ते पञ्चषा विप्रुष ॥ ' ( गुणरत्नकोश १५ ) हे श्रीरङ्गराजवल्लभे, श्री. ग्रामवाटिकामारभ्य सर्वलोकशासितुविभोर्ब्रह्मपर्यन्त यद् उत्तरोत्तरगुणमुत्तरोत्तरातिशयितं यदैश्वर्यं तुङ्गमुन्नत मेर्वादि सवरण नही किया । रावण का वध हो जाने के बाद रामविजय के प्रिय सवाद को सुनाने वाले हनुमान् के महान् उपकार को स्मरण करते हुए भी सीता ने अपने साथ दुर्व्यवहार करने वाली राक्षसियो को बडी दुर्गति के साथ मारने को उद्यत हनुमान को देखकर रोक दिया और उनको समझाया कि 'हे प्लवगम, ये पापिनी राक्षसिया मार डालने योग्य है, किन्तु आप जैसे सज्जन को यह कार्य नही करना चाहिये । जगत् में ऐसा कोई व्यक्ति नही है, जिससे कि अपराध न होता हो । इस तरह से हनुमान् के कोप से इन राक्षसियो को बचाकर भगवती सीता ने उन पर महती कृपा की । अथवा भगवती सीता ने रावण के गृह में बन्दी बन कर पहले से बन्दी बनाई गई सुरागनाओ को बन्धन से मुक्त कराकर उन पर महती कृपा की । द्वितीय वियोगकाल मे पति के द्वारा परित्यक्त होने पर भी पति के द्वारा निर्दिष्ट नियमो का बिना परित्याग किये बाल्मीकि आश्रम मे रहकर अपना पारतन्त्र्य प्रकाशित किया और तृतीय वियोग काल में पति के द्वारा परित्यक्त स्त्री का दूसरा कोई सहारा नही हो सकता, यह दिखाने के लिये भूमि में प्रवेश कर अपनी उत्कृष्टता है प्रख्यापित की । इस तरह से समस्त रामायण में सीता का चरित्र ही उत्कृष्टतम रूप से प्रतिपादित है, यह स्पष्ट हो जाता है । वेदार्थ को अपनी स्मृति मे रखकर स्मृतिग्रन्थो की रचना करने वाले पराशर प्रभृति मुनि गण भी वेदो के ही समान वेद से निसृत तत्व, हित और पुरुषार्थ के आवेदक अन्य आम्नायो को, इतिहास के साथ वर्तमान महाभारत प्रभृति को तथा पुराण साहित्य को भी आपकी I 1 महिमा के वर्णन में निरत प्रमाणभूत ग्रन्थ मानते है । इस तरह से सभी वेद और उससे नि सृत स्मृत्यादि समस्तवाड्मय आपकी महिमा के वर्णन में ही पर्यवसित है । ' वेदवेद्य परम पुरुष पुरुषोत्तम राम जब दशरथ के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए, जो वेद शास्त्र भी महर्षि बाल्मीकि के मुख से रामायण के रूप में अवतीर्ण हुए, इस वचन के अनुसार वेद ही रामायण बन गये थे । ' भगवती लक्ष्मी की उपेक्षा के कारण दुर्गति का तारतम्य और उनकी कृपा होने पर ऐश्वर्य का तारतम्य बनता है । विष्णुपुराण में वर्णित है कि वही पुरुष श्लाध्य, सुखी, धन्य, कुलीन, बुद्धिमान्, बलवान् और पराक्रमी बनता है, जिसको कि हे देवि, आप कृपा दृष्टि से देखती है । यदि जगद्धात्री, विष्णुवल्लभा लक्ष्मी किसी से विमुख हो जाती है, तो उसके शील प्रभृति सभी श्लाघ्य गुण PM दोष मे बदल जाते है । ये वचन भी उक्त कथन का ही समर्थन करते है । ' आकुग्राम० ' प्रभृति श्लोक में भी गुणरत्नकोशकार ने इसी ' विषय का वर्णन किया गया है । वे कहते है कि हे रगराजवल्लभे लक्ष्मी, गाव की बगीची से लेकर समस्त लोक का शासन करने वाले ब्रह्मा तक जो उत्तरोत्तर ऐश्वर्य की उन्नति देखी जाती है, मेरु प्रभृति में ऊँचाई देखी जाती है, चन्दन कुसुमादि मे जो मागल्य
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२२६२ वेदार्थपारिजातः मङ्गल चन्दनकुसुमादि पुण्यमामुष्मिकाभ्युदयहेतुभूतं यज्ञादि पुनर्भूय पावन पवित्रीकुर्वत् कावेरीप्रभृतितीर्थं धन्यभाग्यफलभूतं नवनिधिरूप च यदेश्वर्यं कुग्रामाधिपत्यप्रभृति सर्वं प्रभुपर्यन्तमैश्वर्यम्, अदश्चेद तुङ्गाद्यैश्वर्यादि तत्सर्वं तव वीक्षणभुवः कटाक्षकन्दलिता. पञ्चषा पञ्च वा षड् वा मान येषां ते विप्रुषो बिन्दव लेशा एव । लोके समीचीनं सर्वं वस्तु त्वत्कृपाकटा- क्षलेशायत्तमित्यर्थं । सुधासोदर्याः श्रियो भ्रूलता यदभिमुखी चलितुमिच्छेत् तदभिमुख्य एव रति प्रीति -मति- सरस्वती-धृति- समृद्धि-सिद्धयोऽहमहमिकया उद्वेलाः प्रवर्तन्ते, पुत्रपौत्रादिपर्यन्तं वशवदास्तिष्ठन्ति । तदप्युक्तम्— 'रतिर्मतिसरस्वतोधृति- समृद्धिसिद्धिश्रियः सुधासखि यतोमुखी चिचलिषेत्तव भ्रूलता । ततोमुखमथेन्दिरे बहुमुखीमहपूर्विका विगाह्य च वशवदाः परिवहन्ति कूलङ्कषा || ' लोके यावदुच्चावच स्थावरजङ्गमात्मकं जगद् दृश्यते तत्सर्वमपि त्वदीयकटाक्षसङ्कोचविकासफलमेव ॥ कटाक्षविकासतारतम्यादैश्वर्यतारतम्य तत्सङ्कोचतारतम्यादनैश्वर्यतारतम्यम् । केचित्तु परमेश्वरस्य अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकस्य सृष्टिस्थितिलयादिलीला अपि श्रियो विहारायैव सम्पद्यन्ते । पुराणपुरुषः शब्दादिविषयान् प्रदर्श्य गुणमय्या वैष्णव्या मायया जीवान् दास्यरूपं परमैश्वर्य विस्मार्य पण्यवधूविडम्बिवपुषा वेश्यानुकारिशरीरवेषेण पुसा धूर्तानिव विवशान् कुर्वन् तव नवरसमयाय परिहासाय केलये कल्पते । 'शब्दादीन् विषयान् प्रदर्श्य विभवं विस्मार्य दास्यात्मक वैष्णव्या गुणमाययात्मनिवहान् विप्लाव्य पूर्व पुमान् । पुसा पण्यवधूविडम्बिवपुषा धूर्तानिवायासयन् श्रीरङ्गेश्वरि कल्पते तव परीहासात्मने केलये ||' ( गुणरत्नकोश २० ) यत्स्थान ब्रह्मादिवाङ्मनसागोचर यच्च तमसः प्रकृतितत्कार्यात्मकात् परस्तात् यच्चाकालकाल्य यद्गच्छतः पुरुषस्य ब्रह्मादीना पुरी वैराजामरावत्यादिरूपा निरयायिता 'एते वै निरयास्तात स्थानस्य परमात्मनः' । यच्चात्यद्भुतमत्याश्चर्यावहम्, यच्च परमपुरुषसाम्यापत्तिलक्षणस्य सायुज्यस्य यदेव सुतिः, यच्च सूरिगिरामप्यगोचर परवासुदेवस्य तत्परम पद त्वन्निवासार्थ वेदाः समाम्नासिषु । 'तद्विष्णोः परमं पदम्' ( ऋ ० स० १।२२।२० ) इति श्रुते । ' यद्दूरे मनसो यदेव तमसः पारे यदत्यद्भुतं यत्कालादपचेलिम सुरपुरी यद्गच्छतो दुर्गति । सायुज्यस्य यदेव सूतिरथवा यदुर्ग्रह मद्गिरा तद्विष्णो परमं पद तव कृते मातः समाम्नासिषु ॥ ' ( गुरणत्नकोश २१ ) | भाव देखा जाता है, यज्ञ प्रभृति मे जो पुण्य और परलोक की उन्नति का तारतम्य देखा जाता है, कावेरी प्रभृति तीर्थो में जो पावनता का तारतम्य देखा जाता है, धन्य कर देने वाला भाग्यशाली को प्राप्त होने वाला जो नवनिधि पर्यन्त ऐश्वर्य का तारतम्य देखा जाता है, यह सारा ऐश्वर्यं आपके कृपाकटाक्ष की पाच-सात बूदो के समान है । वस्तुत. लोक में समस्त समीचीन वस्तु आपकी कृपा के लवलेश केही अधीन है । सुधा की सगी बहिन लक्ष्मी भ्रूलता जिसकी तरफ घूम जाती है, उसी ओर रति, प्रीति, मति, सरस्वती, धृति, समृद्धि और सिद्धि भी होड़ लगाकर दौड पडती है, पुत्र, पौत्र प्रभृति सभी उसके कहने मे रहते है । इसी विषय को ' रतिर्मति' प्रभृति श्लोक मे भी बताया गया है । लोक मे यावत् उच्चावच स्थावरजगमात्मक जगत् दिखाई पडता है, वह सब भी आपके कृपा कटाक्ष के सकोव और विकास का ही प्रतिफल हैं । कृपा कटाक्ष के विकास से ऐश्वर्य का तारतम्य और सकोच से अनैश्वर्य का तारतम्य होता है । कुछ लोगो के मतानुसार अनन्तकोटि ब्राह्माण्ड के नायक परमेश्वर की सृष्टि, स्थिति, प्रलय आदि लीलाए भी भगवती लक्ष्मी के मन बहलाव के लिये है । पुराणपुरुष शब्द आदि विषयों का प्रदर्शन कर गुणमयी वैष्णवी माया के द्वारा जीवो के दास्य रूप में विद्यमान परम ऐश्वर्य को भुलवा देता है । जैसे कि वेश्या अपने हाव-भाव से पुरुषो को अपने वश में कर लेती है । भगवान् की यह लीला भी भगवती के परिहास के निमित्त ही है । 'शब्दादीन्' प्रभृति श्लोक में गुणरत्नकोशकार ने इसी स्थिति का वर्णन किया है । जो स्थान ब्रह्मा प्रभृति देवो के भी वाणी और मन के अगोचर है । जो प्रकृति और उसके कार्यरूपीतम से बहुत दूर है । जिसको काल खा नही सकता, जहाँ पर जाने वाले प्राणी के मार्ग में वैराज, अमरावती प्रभृति पुरियाँ प्रलोभन के रूप में बनाई गई है, जैसा कि कहा गया है ।" हे तात । परमात्मा के स्थान पर पहुँचने के लिये ये सब लोक निरय ( नरक ) के समान अथवा अन्तराय भूत है ॥ जो अत्यन्त आश्चर्य पैदा करने वाली है । परम पुरुष के साथ साम्य दिलाने वाले सायुज्य की जिससे प्राप्ति होती हैं । भक्त-गणों की वाणी भी जहाँ नही पहुँच सकती, उस परम पुरुष वासुदेव के परम पद को श्रुतिया आपका निवास स्थान बताती है 1। द्विष्णी परमं पदम्! इस श्रुति मे उसी परम पवित्र धाम का वर्णन है । 'यद्वरे मनस ' प्रमृति श्लोक मे गुणरत्नकोशकार न इसी परम पेद को वर्णन किया है ।
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वेदार्थपारिजातः २२६३ हे श्रीरङ्गेश्वरि निखिल चराचर परिदृश्यमान जगत् क्रीडाया विनियुक्तम् । हरे विहरनि क्रीडाकन्दुकैरिव जन्तुभिः ।' परमा महती विभूतिस्त्रिपाद्रूपा, 'त्रिपादस्यामृत दिवि' (ऋ० म० १०/ ९०३) इति श्रुते । तव भोगे भोगोपकरण- भोगस्थानत्वेन विनियुक्ता त्वा त्वत्प्रिय च ये सदा पश्यन्ति ते युष्मत्सदानुभवहेतुसुकृनगीला पुण्या सूरयस्तव परिचार- कर्मणि नियुक्ता वय भोगमोक्षादिपरायणा तव केवलकृपानिर्वाह्यवर्गे विनियुक्ता । परमः पुमान् त्वत्प्रिय. तव शेषित्वे विनियुक्तः । ते पूर्वोक्ता सर्वेऽपि तव स्फारणे त्वद्विभवे उपकरणभूता एवेत्याह गुणरत्नकोशकार -–'हेलायामखिल चराचर- मिद भोगे विभूति परा पुण्यास्ते परिचारकर्मणि सदा पश्यन्ति ये सूरय । श्रीरङ्गेश्वरदेवि केवलकृपानिर्वाहवर्गे वय शेषित्वे 1- परमः पुमान् परिकरा ह्येते तव स्फारणे ॥ ' ( गुणरत्नकोश २२) । हे श्रीरङ्गविमानालङ्कारभूते श्रीरङ्गेश्वरराजगेहलक्ष्मि, या अयोध्या कैश्चिदपि योद्धुमशक्या अपराजितेति प्रख्याता या निग्रहानुग्रहघोराघोरपुरीपालैः पालिता या च भजता प्रपन्नाना स्वत परमपुरुषार्थरूपा या च नाक परेण परमाकाशस्योपरिष्टात् परमे व्योम्नि स्थिता या चामृतस्राविभिरद्भुतदिव्यभोगैः परिपूर्णा सा अपराजिताद्यनेकनामभि प्रख्याता अयोध्या युवयो राजधानीति वेदा वदन्ति ॥ 'देवाना पूरयोध्या विशाला अपराजिता' इति श्रुते', ' परेण नाक निहित गुहायाम्' इति श्रुतेश्च । 'आज्ञानुग्रहभीमकोमलपुरीपाला फलं भेजुषा यायोध्येत्यपराजितेति विदिता नाक परेण स्थिता । भावैरद्भूतभोगभूमगहनै सान्द्रा सुधास्यन्दिभि' श्रीरङ्गेश्वरगेहलक्ष्मियुवयोस्ता राजधानी विदु ॥ ' (गुणरत्नकोश २३ ) । I तस्मिन्नेव मण्डपे शेषतल्पे विश्वरक्षादीक्षितेन स्वामिना सह श्रिय सर्वानन्द| वहत्वमुक्तं तत्रैव —–' तत्र स्रक्- स्पर्शगन्ध स्फुरदुपरिफणारत्नरोचिवितानं विस्तीर्यानन्दभोग तदुपरि नयता विश्वमेकाधिपत्यम् । तैस्तै कान्तेन शान्तोदित- गुणविभवैरर्हता त्वामसंख्यैरन्योन्याद्वैतनिष्ठा घनरसगहनान् देवि बध्नासि भोगान् ||' ( गुणरत्नकोश २५ ) । हे देवि, तत्र महा- हे रगेश्वरि, यह समस्त चराचर परिदृश्यमान जगत् आपको क्रीडा के लिये है । भगवान् खेलने की गेंद के समान प्राणियों से खेलते हैं । स्वर्गलोक में विद्यमान भगवान् की त्रिपाद्विभूति सर्वोत्कृष्ट मानी जाती है । हे भगवति, आपके भोग, भोगोपकरण और भोगस्थान के लिये विनियुक्त जो जीव आपको और आपके प्रिय भगवान् रगेश्वर को सदा देखते हैं, वे आपके इस सानिध्य के कारण परम पुण्य के भागी होते हैं और अपने इसी पुण्य के कारण वे सूरी गण आपकी सवा के लिये परिचारक के रूप में नियुक्त किये जाते है । हमारे जैसे भोग और मोक्ष की इच्छा वाले तो केवल आपकी कृपा पर जीवित रहते है । आपके प्रियतम परम पुरुष भगवान् नारायण आपके शेषी है और ये सब पूर्वोक सूरीगण आपके ऐश्वर्य को बढाने वाले उपकरण है, अर्थात् इन सबके साथ आप अपने प्रियतम की सेवा में सदा मनोयोग पूर्वक निरत रहती है " हेलायामखिल० " प्रभृति श्लोक मे गुणरत्नकोशकार ने इसी स्थिति का वर्णन किया है । हे श्रीरगराज के विमान की शोभा बढाने वाली, श्रीरगेश्वर के राजगृह की राजलक्ष्मी, अयोध्या आप लोगो की राजधानी है । इसका नाम अयोध्या इसलिये है कि इसके विरुद्ध युद्ध करने की किसी में शक्ति नही है । इसको कोई जीत नही सकता, इसीलिये इसको अपराजिता पुरी कहते है । निग्रह और अनुग्रह में समर्थ घोर और अघोर ( शान्त ) स्वभाव वाले द्वारपाल इसकी रक्षा करते है । शरणागत जीवो को यह स्वत परम पुरुषार्थ को देने वाली है । स्वर्गलोक, परम आकाश के भी ऊपर परम व्योम मे यह स्थित है । अमृत की वर्षा करने वाले अशुद्ध दिव्य भोगो से यह परिपूर्ण है । वह अपराजिता प्रभृति अनेक नामो से प्रसिद्ध अयोध्या पुरी आप लोगों की राजधानी है, इसका प्रतिपादन वेदो मे भी मिलता है । 'आज्ञानुग्रह० ' प्रभृति श्लोक मे गुणरत्नकोशकार ने इस पुरी का उपर्युक्त वर्णन जिया है । उसी अयोध्यापुरी मे प्रासादमण्डप में शेषनाग के पर्यंक पर विश्व रक्षा के लिये सदा तत्पर अपने स्वामी के साथ वर्तमान लक्ष्मी सभी प्रकार के आनन्द ऐश्वर्य को प्रदान करती रहती है । 'तत्र स्रक्० ' प्रभृति श्लोक में गुणरत्नकोशकार ने इसी स्थिति का वर्णन किया है । इसका यह अभिप्राय है है देवि, उस महामणि मण्डप में पुष्पमाला के समान स्पर्श और गन्ध से युक्त अनन्त भोग
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२२६४ वेदार्थपारिजातः मणिमण्डपे पुष्पमालिकाया इव स्पर्शगन्धयुक्त स्फुरतामुपरिफणारत्नाना रोचिभिर्वितानवन्तमिवानन्तभोगकाम विस्तीर्य तदुपरि निवेश्य विश्व पादविभूतित्रिपाद्विभूतिद्वय सापत्त्यरहित मैकाधिपत्यमेकच्छत्राधिपत्य नयता गमयता असख्यै सख्याती- तैरवाडुमनसगोचरैः शान्तोदितगुणविभवैर्भगवच्छान्तोदितदशाया स्ववैश्वरूप्यानुभवरूपाया गुणविभवै गुणातिशयैस्त्वा- मेवार्हता त्वदनुरूपेण कान्तेन प्रियेण हरिणा सह अन्योन्याद्वैतनिष्ठारसगहनान् अद्वैतनिष्ठया एकीभावेन परस्परगाढानुरागेण घनेन निबिडेन रसेनानन्देन गहनान् निर्भरान् भोगाननुभवान् बध्नासि धारयसि युवयोः सेवकाना सूरिपर्षदा च न केवलं पत्युस्त्वमेवानन्दवहा, किन्तु त्वमिव त्वत्पतेस्तव च भोग्यभूताः परःसहस्रं सपत्न्योऽप्यानन्दवहाः सन्तीति । 'भोग्या वामपि नान्तरीयकतया पुष्पाङ्गरागैः सम निर्वृत्तप्रणयातिवाहनविधौ नीता परीवाहताम् । देवि त्वामनु- लीलया सह महीदेव्यः सहस्र तथा याभिस्त्व स्तनबाहुदृष्टिभिरिव स्वाभि. प्रियं श्लाघसे ॥ ' ( गुणरत्नकोष २६) । हे देवि, भोग्यभूतयोर्युवयोरपि पुष्पाङ्गरागैः समं पुष्पस्रक्चन्दनाङ्गरागादिघनसारकुङ्कुम कस्तूर्यादितुल्य नान्तरीयकतया स्व भोग्य- तोपयोगेन भोग्या निर्वृत्तप्रणयातिवाहनविधौ परिवाहतां त्राप्ता भूनीले इव त्वामनुसृत्य सहस्रमनन्तसंख्याका सपत्नीरूपा देव्यः $ सन्ति । याभिः स्वाभिः स्तनबाहुदृष्टिभिरिव प्रिय श्लाघसे सन्तोषयसि । यथा पुष्पाङ्गरागादीना प्रधानभूतस्वभोग्यतोपयोगेन भोग्यत्वम्, तथैव तासामपि भोग्यत्वम् । प्रणयस्य प्रेमरसस्य अतिवाहनविधी अतिप्रवाहणे ता अपि निर्गमप्रवाहता नीताः । यथा तडागः परिपूर्णः सन् निर्गमप्रवाहं विना न निर्वहति, तथा श्री श्रीशयोरत्युत्कटप्रेमरसो भूनीलादिसपत्नीमुखेन प्रवहणं विना न प्रवहतीति हृदयमिति तट्टीकाकृत् । एतेन न केवलं लक्ष्म्याः स्वाभि समं सापत्न्यकलहाभावः, किन्तु भगवता सह ताभिः संश्लेषे स्वावयवसश्लेष इव तस्या महती प्रीतिर्वर्धत इति भावः । यथा पुष्पाङ्गरागादय. स्वभोग्योपयोगिनोऽपि प्रिय- भोग्या भवन्ति, तथैव श्रियः सपत्न्योऽपि तद्भोग्योपयोगिन्योऽपि प्रियभोग्या भवन्ति । यथा स्वकाभि स्तनबाहुदृष्टिभिरिव जाल शेष पर्यंक पर फैलाकर जिस पर कि शेषनाग ने अपनी सहस्र फणाओ से छाया कर रखी है और उन फणाओ की कान्ति का ही वितान तान रखा है, आप सारे विश्व की पादविभूति और त्रिपादविभूति का किसी सपत्नी के न रहने से एक छत्र उपभोग करती है । वाणी और मन के अगोचर, सख्यातीत भगवान् को शान्तोदित दशा, अपने विश्वरूप का अनुभव कराने वाली दशा के अनुरूप अनन्त गुणों के कारण केवल आपको ही चाहने वाले सर्वथा आपके अनुगुण प्रियतम हरि के साथ अद्वैत निष्ठा, एकीभाव और परस्पर गाढ अनुराग के कारण घने आनन्द रस मे परिपूर्ण भोगो का आप उपभोग करती है । इस अद्वयावस्था मे भी आप अकेली ही उनको आनन्द देने वाली नही है, किन्तु आप दोनो की सेवक-सेविकाए, पार्षद सूरीगण भी आपके ही समान आपके पति के भोग्यभूत है । इस प्रकार इस अद्वयावस्था मे भी आप अन्य किसी के न रहते हुए भी हजारो सपत्नियो से घिरी हुई है और उन सबके साथ निश्छल आनन्द का उपभोग करती रहती है, भगवान् को आनन्दित करती रहती है । 'भोग्या वामपि, प्रभृति आगे के श्लोक मे गुणरत्नकोषकार कहते है कि हे देवि, आप दोनो के भोग्यभूत मुख्यागराग के साथ, पुष्प, माला, चन्दन, अगराग, घनसार, कुंकुम, कस्तूरी आदि के साथ स्वय अपने को भोग्य रूप में समर्पित करने वाली भूभ और नीला के साथ अन्य अनन्त संख्या वाली देविया सपत्नी के रूप में प्रणय निवेदन के लिये सदा तत्पर रहती है, प्रणय के प्रवाह को सदा उद्वेलित करतो रहती है । ये देविया अपने बाहु दृष्टि आदि अगो का प्रदर्शन कर प्रभु को जो सन्तुष्ट करती हैं, वह सब आप की ही महिमा है । जैसे पुष्प, अगराग आदि की प्रधान उपयोगिता भोग्य रूप से उनके उपयोग में हैं, उसी तरह उन देवियो की भी उप- योगिता उनका कोई उपयोग करें, इसी में हैं । प्रेम रस को बहाने में इन सबकी भी उपयोगिता है । जैसे तालाब के भर जाने पर जल की निकासी के लिये मार्ग की आवश्यकता पड़ती है, नही तो पूरा तालाब ही टूट जायगा, उसी तरह से श्री और श्रीश का अत्युत्कट प्रेम रस का प्रवाह भी भू, नीला प्रभृति सपत्नियो के तरफ से गुजरे बिना नही रह सकता । उस प्रेम रस के तालाब लबालब भरे रहने के लिये यह आवश्यक है कि यह प्रेम का बाध कही टूट न जाय, उसका अतिरिक्त प्रेम रस धीरे- धीरे बहता रहे । इसके साधन के रूप में ही लक्ष्मी को भू, नीला प्रभृति सपत्नियो की सार्थकता है । इससे यह स्पष्ट होता है कि लक्ष्मी का अपनी सपत्नियो के साथ कभी कलह नहीं होता । इतना ही नहीं, भगवान् के साथ सपत्नियो का सश्लेष होने पर लक्ष्मी की प्रसन्नता ऐसी बढती है, मानो उसके अपने ही अंगों के साथ भगवान् का संश्लेष हो रहा हो । जैसे पुष्प, अंगराग आदि का उपभोग कोई नायिका करती है किन्तु इनका
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वेदार्थपारिजातः २२६५ स्वावयवैरिह प्रेयास सन्तोषयमि, हे श्री, तथैव तव पत्युर्बहवो द्योतमाना मोदमाना नित्यनिर्दोपगन्धा अपहतपाप्मत्वादिगुणै- र्ज्ञानशक्त्यादिभिर्गुणै शङ्खचक्राद्यलङ्कारैर्निरङ्कुशव्यापारैर्ज्ञानानन्दामलात्मस्वरूपे सविभूतिकभगवत्कल्याणगुणानुभवैर्भोगैश्च युवाभ्या निर्विशेषा समानवयस्का सखाय इव तव पत्युश्च श्रीपादकङ्कर्यकरणाय प्रेमविह्वलहृदया सदा सोत्कण्ठा युवा प्रतीक्षन्ते । हे चन्द्रे चन्द्रवदने आश्रितानन्दनमुखि मात, त्वदाश्लेपोत्कर्षात् त्वन्नित्ययोगातिशयादेव परमेश्वरस्य दिव्यात्म- स्वरूप निरङ्कुशस्वातन्त्र्य च तत्त्वविदो निर्णयन्ति ॥ त्वा भगवति दृष्ट्वा त्वदाश्रयमीश्वर निश्चिन्वन्ति । भगवन्रवरूपनिरूपक- कोटावन्तर्भावादेव भगवत पृथक्त्वेन श्रुतिस्त्वा नाभिधत्ते । 'स्वरूप स्वातन्त्र्य भगवत इद चन्द्रवदने त्वदाश्लेषोत्कर्षाद् भवति खलु निष्कर्षसमये । त्वमासीर्मात श्री कमितुरिदमित्थ त्वविभवस्तदन्तर्भावात्त्वा न पृथगभिधत्ते श्रुतिरपि ॥ ' (गु० २० को० २८) कमितु प्रेयस. त्वमिदमित्यत्वविभव आसी अयमीश्वर इतीदन्त्वविभव ईदृश ईश्वर इतीत्यत्वविभवः उभयमपि त्वमेवाभवः । कमले परमेश्वरस्तव स्पर्शात् त्वत्सम्बन्धाद् मङ्गलपद स्पृशति त्वयि चेद मङ्गलत्व नान्यहेतुक किन्तु स्वतः सिद्धमेव, यतो भवती श्रीरसि स्वतो मङ्गलरूपासि यथा प्रसूनमतिशयित कुर्वन्ती परिमलधि. गन्धसम्पदमेतादृशगुणयोगात् एवं स्वदते इत्थ हृद्या भवतीति न कश्चित् कवयते । पुष्पातिशयनिरूपणे परिमलापेक्षेव परिमलातिशयनिरूपणे गुणान्तरापेक्षा यथा न भवति, तथैव भगवन्मङ्गलत्वे श्रीसम्बन्धो नियामक, न तु श्रियो मङ्गलत्वे नियामकान्तरापेक्षेत्यर्थ । 'तव स्पर्शा - दीश स्पृशति कमले मङ्गलपद तवेद नोपाधेरुपनिपतित श्रीरसि यत । प्रसून पुष्यन्तीमपि परिमल जिगदिषुर्न चैव त्वां देव स्वदत इति कश्चित् कवयते ॥ ' (गु० २० को० ) । उपयोग अन्तत प्रिय के उपभोग मे होता है, उसी तरह से लक्ष्मी सपत्निया यद्यपि लक्ष्मी की ही सेवा मे लगी रहती है, तो भी अन्तत. उनका उपभोग भी लक्ष्मीपति ही करते है । जैसे लक्ष्मी अपने अगो से प्रियतम को सतोष प्रदान करती है, हे श्री, उसी तरह से अन्य भी बहुत सी तुम्हारी सपत्निया तुम्हारे ही समान प्रकाशमान, प्रसन्न वदन, समस्त दोषगन्ध से रहित अपहतपाप्मत्व प्रभृति आठ गुणो तथा ज्ञान शक्ति प्रभृति पडगुणो, शख, चक्र प्रभृति अलकारो, निरङ्कुश चेष्टाओ, ज्ञानानन्दात्मक निर्मल स्वरूपो, समस्त ऐश्वर्य के साथ समस्त कल्याण गुणगणो से और भोग से भी आप दोनो के ही सदृश समान वय वाली सखिया तुम्हारे और तुम्हारे पति के चरण कमलो की सेवा करने के लिये प्रेम विह्वल मन से सदा उत्कण्ठा के साथ आज्ञा की प्रतीक्षा करती रहती है । हे चन्द्रवदने, चन्द्रमा के समान अपने आश्रितो को आनन्द देने वाली माता, आप के साथ सदा सलिष्ट रहने के कारण ही परमेश्वर का अपना दिव्य स्वरूप और निरकुश स्वतन्त्रता विद्यमान है, ऐसा तत्ववेत्तागण निर्णय देते है । आपको देखकर ही वे आपके आश्रय भूत ईश्वर का निश्चय करते है । भगवत्स्वरूप के निरूपक के रूप मे ही आप को स्थिति होने से श्रुति भी आपका अलग से वर्णन नही करती । भगवती के इस स्वरूप का भी वर्णन गुणरत्नकोशकार ने ही 'स्वरूप स्वातन्त्र्य० प्रभृति श्लोक में किया है । आप के प्रियतम का इदम् और इत्थम् के रूप में, यह ईश्वर है और ऐसा ईश्वर है, इन उभय रूपो का निरूपण आपकी सहायता के बिना नही हो सकता । 'तव स्पर्शादीशं' प्रभृति श्लोक में वे ही कहते है कि हे कमले, परमेश्वर आपके स्पर्श के कारण हो, आपसे संश्लिष्ट होने से ही मंगलपद के आस्पद होते है । आप मे विद्यमान यह मगलपद कही अन्य से नही आया है, किन्तु आप मे यह स्वभावसिद्ध है । आप तो श्री है, स्वत मंगलस्वरूप हैं । पुष्प को शोभा को बढानेवाली सुगन्धि की गुण सम्पत्ति की अपनी प्रशंसा होती है, पुष्प के कारण उसकी प्रशंसा कोई कवि नही करता । पुष्प को अतिशयिता के निरूपण के लिये परिमल की अपेक्षा रहती है, किन्तु परिमल की अति-शयिता के निरूपण के लिये किसी दूसरे गुण की जैसे अपेक्षा नही रहती, उसी तरह से भगवान् के मगलमय होने मे तो श्री का सबन्ध नियामक माना जाता है, किन्तु श्री के मगलमय होने में किसी दूसरे नियामक की अपेक्षा नही है । २८४
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२२६६ वेदार्थपारिजातः किबहुना, सर्वेश्वरस्य लोकपालाना च लक्ष्मीकटाक्षादेव लब्धविभवत्वम् । हे सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये यदुपरि तव भूयासो बहुसंख्याका कटाक्षा. प्रसरन्ति तद्वस्तु परब्रह्मभूत तव भूय. कटाक्षविषयीभूत वस्तु परब्रह्मत्वमगमत् । यत्र वस्तुन्यमी कटाक्षा द्वित्रा निपतन्ति तत् परब्रह्मणोऽर्वाचीनं शतमखादिकमभूत् । तेनाम्नायस्तदुभयमुशन् त्वामेवोच्च प्रणिजगौ । यथा पुर्या राजधान्या कोशस्य धनसञ्चयादेश्व या प्रशस्तिः सा राज्ञ एव प्रशस्ति, तथैव वेदकृता परब्रह्मादिप्रशस्तिरपि तव श्रिय एव प्रशस्तिर्मन्तव्या । 'अपाङ्गा भूयासो यदुपरि परंब्रह्म तदभूदमी यत्र द्वित्राः स च शतमखादिस्तदधरात् । अत. श्रीराम्ना- यस्तदुभयमुशस्त्वा प्रणिजगौ प्रशस्तिः सा राज्ञो यदपि च पुरीकोशकथनम् ||' ( गुणरत्नकोश ३० ) । हे श्री, त्व विष्णो स्वतः स्वभावान्निरुपाधिकात्मस्वरूपात् स्वमसि शेषभूतासि । त्वयि भगवतः स्वत्व भगवति च त्वयि स्वामित्वं स्वाभाविकमित्यर्थः । 'स्वत्वमात्मनि संजातं स्वामित्व ब्रह्मणि स्थितम् । आत्मदास्यं हरेः स्वाम्य स्वभावं च सदा स्मर || ' इत्याद्यनेकप्रमाणसिद्धमेतत् । तत एव एष भगवान् त्वदायत्तद्धित्वेऽप्यपराधीनविभवोऽभवत् । यथा माणिक्यं स्वया दीप्त्या महार्घं निरवधिकमूल्यं भवदपि विगुण प्रतिहतस्वोत्कर्षं च न भवति, अन्याहितगुणं पराधीनातिशय चन तद्वत् त्वत्प्रियतमोऽपि त्वदधीनसम्पत्तिमत्त्वेऽपि न विगुणो नाप्यन्याहितातिशय. । यथाहुः -'स्वत श्रीस्त्वं विष्णोः स्वमसि तत एवैष भगवान् त्वदायत्तद्धित्वेऽप्यभवदपराधीनविभव । स्वया दीप्त्या रत्न भवदपि महार्थ न विगुणं न कुण्ठस्वातन्त्र्य भवति च न चान्याहितगुणम् ॥ ' हे इन्दिरे परमैश्वर्यप्रदे, प्रशकन प्रकृष्टा शक्तिर्बलं सर्वजगद्भरणसामर्थ्य ज्योतिरनुपम तेजः सर्ववस्तुसाक्षात्कार- लक्षण ज्ञान परमेश्वरत्वविजयप्रथाजयशीलत्वप्रशस्तिः प्रणतवरणमाश्रितविषया प्रीतिः आश्रितेष्टप्रापकत्वलक्षणं क्षेमकरत्वं तदनिष्टनिवर्तकत्व चेत्यादयो दिव्यात्मगुणा परिमलः सौगन्ध्यं कान्तिः सौन्दर्यम् अवयवशोभा लावण्यं सर्वावयवशोभा अर्चि: इतना ही नही, सर्वेश्वर भगवान् विष्णु और लोकपालो का वैभव लक्ष्मी के कृपा कटाक्ष से ही प्राप्त होता है । हे सर्वमंगल- मागल्ये, जिस पर आपकी कृपादृष्टि बहुलता से पडती है, वह तो परब्रह्म हो जाता है । जिस पर आपके दो तीन कृपा कटाक्ष पडते है, ( ) वह परब्रह्म से कम शतमुख इन्द्र इत्यादि पद को प्राप्त करता है । इसीलिये शास्त्र परब्रह्म पदवी और इन्द्र पदवी को छोडकर उन पदवियो को देनेवाली के रूप मे आपकी ही स्तुति करते है, आपको ही इन दोनो मे से भी बडी मानते है । जैसे राजधानी और उसके ,,, वैभव सम्पत्ति आद की स्तुति अन्त राजा की ही स्तुति में परिणत हो जाती है उसी तरह वेद आदि में की गई परब्रह्म इन्द्र आदि की प्रशस्ति भी अन्तत लक्ष्मी को ही प्रशस्ति में बदल जाती है । गुणरत्नकोशकार ने इस स्थिति का वर्णन ' अपाङ्गा भूयासो' प्रभृति श्लोक में किया है । हे लक्ष्मी, आप भगवान् विष्णु के निरुपाधिक स्वरूप से स्वभावत अभिन्न है, उनकी शेषभूत है, पूरक है । आप मे भगवान् का स्वत्व है, भगवान् आपके स्वामी है । यह स्थिति अत्यन्त स्वाभाविकरूप से विद्यमान है । किसी प्रामाणिक वचन में बताया गया है कि प्राणीमात्र को स्वय अपने मे स्वत्व की और परमात्मा मे स्वामित्व की भावना करनी चाहिये कि आत्मा दास है और भगवान् स्वामी है । इसीलिये भगवान् का वैभव अपराधीन इसलिये माना जाता है कि वह आपके हो अधीन है और आप में तो उसका स्वाभाविक स्वत्व है ही । जैसे कोई मणि अपनी ही कान्ति से बहुमूल्य बनती है, उस मणि की इस विशेषता को कोई नष्ट नहीं कर सकता और न यह विशेषता उसकी किसी दूसरी वस्तु से प्राप्त होने के कारण पराधीन ही है, उसी तरह से आपके प्रियतम की सारी सम्पत्ति आपके ही अधीन है, तो भी उसमे विगुणता अथवा पारतन्त्र्य नही आने पाता, क्योकि आप मे तो स्वयं उन्ही का स्वत्व है, 'स्वत. श्रीस्त्वं' इत्यादि श्लोक मे गुणरत्नकोशकार ने इसी स्थिति का वर्णन किया है । है परमऐश्वर्य को देने वाली इन्दिरे, प्रशकन अर्थात् प्रकृष्टशक्ति, बल अर्थात् सारे जगत् को पालन करने की सामर्थ्य, ज्योति अर्थात् अनुपम तेज, समस्त वस्तुओं के साक्षात्कार में समर्थ ज्ञान, परम ऐश्वर्य के विजय की प्रथा, अर्थात् विजयशील स्वभाव की प्रशंसा, प्रणत व्यक्ति को स्वीकार करना, अर्थात् अपने आश्रय में आये व्यक्ति से स्नेह करना और उसको अभीष्ट वस्तु प्रदान करना -साथ ही उस पर आने वाले अनिष्ट की निवृत्ति करना, ये सब आपके अपने दिव्य गुण है । परिमल ( अतिमधुर सुगन्ध ), सौन्दर्य,
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वेदार्थपारिजातः २२६७ प्रकाशकत्वम् इत्येते द्विविधा अपि स्वरूपविग्रहाविनगुणराशयस्तव भगवतच समाना एव । भगवतोऽपि विजयप्रथा यथा रामायणे ' शत्रोः प्रख्यातवीर्यस्य रञ्जनीयस्य विक्रमै । ' (वा० रा० ६ १०४ ६ ) इति रावणवचनाद् व्यक्ता | सीतायास्तु वाशिष्ठरामायणे शतकन्धरमहारे विजयप्रथा सुव्यक्ता । तदुक्तम्-'प्रशकनबलज्योतिर्ज्ञानेश्वरीविजयप्रथा प्रणतवरणप्रेय- क्षेमङ्करत्वपुर. सरा । अपि परिमल: कान्तिर्लावण्यमचिरितीन्दिरे नव भगवतश्चैते साधारणा गुणराशयः ॥ ' ( अन्ये च यौवनमौकुमार्यादयो भगवतस्तव च समाना । तव गुणास्तस्मिन् तस्य च गुणास्त्वयि दर्पण इवाभिव्याप्य परस्परेण प्रकाम स्वदन्ते । भगवान् लक्ष्म्या प्रकाशनबलादीनवलोक्य स्वकीया एवैते गुणा इत्यानन्दमनुभवति । तथैव श्रीरपि तान् भगवत्युपलभ्य स्वकीया एवैते इति मोदते । एव युवत्वादी युवयोस्तुल्येऽपि पुस्त्वसुलभान् अपरवशता शत्रुशमन स्थिर- त्वादीन् कृत्वा भेदकान् गुणान् भगवति स्त्रीत्वैकान्तान् म्रदिमपतिपारार्थ्यकरुणाक्षमादीन् कृत्वा भेदकान् गुणान् त्वयि चातु- सन्धाय ताननुभवितु भोक्तुं च भिदा भवतीति प्राहु | स्वातन्त्र्यं शत्रुशयनसामर्थ्यमप्रकम्प्यत्व भगवत्यसाधारण्येनानुभूयते । भगवत्या दिव्याङ्गमार्दव मृदुहृदयत्वं भर्तृपारतन्त्र्य परदु.खासहिष्णुत्वरूपा करुणा अपराधसहनरूपा क्षमा इति स्त्रीत्वेकान्ता गुणा असाधारण्येन लक्ष्यन्ते । तस्माद्युवयोभिदाप्यनुभूयते । तथा चोक्तम्—' युवत्वादी तुल्येऽप्यपरवशता शत्रुशमनस्थिर- त्वादीन् कृत्वा भगवति गुणान् पुस्त्वसुलभान् । त्वयि स्त्रीत्वैकान्तान् प्रदिमपतिपारार्थ्यकरुणाक्षमादीन् वा भोक्तु भवति ' ( ) युवयोरात्मनि भिदा । गुणरत्नकोश ३४ । नीलसरोरुहनीलमणिनीलनीरधराद्युपमिते भगवति विद्युत्काञ्चनचम्पका- द्युपमिताया त्वयि यौवनतारुण्यानुरूपभूषण वसनाङ्गरागालङ्कृतयोर्युवयोर्विभाजकगुणानुसन्धानेनैव युवयोरेव भेदग्रहो भवति । अन्यथा भेदग्रहो न भवत्येव । अनन्तब्रह्माण्डजनन्याः श्रीविष्णुप्राणेश्वर्या मङ्गलमय वपुर्मृदुशीतमुग्धमधुरोदारैर्गुणैरलङ्कृत वीक्ष्य कवीन्द्राः अगो का लावण्य और सबके प्रकाशन की सामर्थ्य, यह सब आपके स्वरूप और विग्रह के आश्रित द्विविधगुणराशि आप में और श्रीपति भगवान् मे समान रूप से विद्यमान है । भगवान् की भी विजयप्रथा ' प्रसिद्ध पराक्रमी शत्रु को पराक्रम से ही प्रमन्न किया जाता है' इस रावण की उक्ति से स्पष्ट है । वासिष्ठ रामायण मे शतकन्धर की सहारकथा मे भगवती सीता को विजयप्रथा वर्णित है । उक्त आशय का वर्णन गुणरत्नकोश के 'प्रशकन० ' प्रभृति श्लोक में किया गया है । यौवन, सौकुमार्य प्रभृति गुण भी भगवती और भगवान् मे समान रूप से विद्यमान है । आपके गुण भगवान् मे और भगवान् के गुण आप में दर्पण मे प्रतिबिम्ब की तरह सक्रान्त होकर भक्तजनो को अत्यन्त आनन्दित करते है । भगवान् लक्ष्मी के प्रकाशन, बल प्रभूति गुणो को देखकर आनन्दित होते है कि ये मेरे ही गुण है । इसी तरह से लक्ष्मी भी उन्ही गुणो को भगवान् में देखकर प्रसन्न होती है कि ये तो मेरे ही गुण है । इसी तरह से यौवन, सौन्दर्य प्रभृति गुणो की समानता के रहते हुए भी पुस्त्व सुलभ अपरवशता, शत्रुशमन प्रभृति और स्त्रीत्व सुलभ कोमलता, पतिपरायणता, करुणा, क्षमा प्रभृति भेदक गुणो के कारण इनका अनुसन्धान और अनुभव करने के लिये, इनका उपयोग करने के लिये इन दोनो मे भेद की स्थिति का भी कुछ लोग वर्णन करते है । स्वातन्त्र्य, शत्रु के शमन की सामर्थ्य, निश्चय से अडिग रहना, ये गुण भगवान् मे और भगवती में उनके दिव्य अग की मृदुता, हृदय की मृदुता, पतिपरायणता, दूसरे के दुख को न सह पाना (करुणा) और अपराध को सहन करने की सामर्थ्य ( क्षमा) ये सब एकान्त रूप में स्त्रियो मे पाये जाने वाले गुण अनुभूत होते है । अत आप लोगो में भेदक और अभेदक दोनो प्रकार के गुणो की स्थिति के कारण अद्वय और द्वय दोनो प्रकार की स्थिति उपलब्ध होती है । ' युवत्वादी० ' प्रभृति गुणरत्नकोश के श्लोक ,, ( ) ( )में इसी द्वयाद्वयात्मक स्थिति का वर्णन है । अभिप्राय यह है कि नीलकमल नीलमणि नीलनीर जल और धरा पृथिवी के समान स्वरूप वाले भगवान् नारायण और विद्युत्, काचन तथा चम्पक के समान स्वरूप वाली भगवती मे यौवन ( तारुण्य) के अनुरूप भूषण, वदन, अंगराग से अलंकृत हो जाने पर और उनके परस्पर सक्रान्त हो जाने पर उक्त विभाजक गुणो का अनुसन्धान होने पर हो इनमें भेद का अनुभव हो सकता है, अन्यथा इन दोनो में भेद कर पाना कठिन है । अनन्त ब्रह्माण्डो की जननी, भगवान् विष्णु की प्राणेश्वरी लक्ष्मी के मगलमय शरीर को मृदुल, शीतल मुग्धकारी, मधुर, उदार
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वेदार्थपारिजातः२२६८ क्षीराब्धिसारत्वमुत्प्रेक्षन्ते । चन्द्र- कल्पलता-सुधाप्रभृतीन् तदसारत्वेन कल्पयन्ति । तथात्वेऽप्यकृत्रिमस्य श्रीविग्रहस्य कृत्रिम- वस्तुसारत्वोत्प्रेक्षणं न युक्तमिति न तुष्यन्ति । हे श्रीः, त्वत्सदयकटाक्षलेशप्रसरणवशात् शोभाविशेषजुष्टा लोकपालप्रभृत्या- धुनिक पर्यन्ताना प्रभूणा दृष्टयोऽनिर्वचनीया भवन्ति । सर्वदा त्वदीयसौन्दर्यमकरन्दपानवशात् तव पतिं भगवन्त पुष्कराक्ष-मिति वर्णयन्ति । एव सकललोचनातिशयस्य त्वदवलोकनाधीनत्वेन त्वदीयकटाक्षसौन्दर्य कथ वर्ण्यत । हे पद्म, यस्य कटाक्ष-लेशस्य ममाय ममायमिति प्रतिबिन्दु बद्धकलहा ब्रह्मादयो भवन्ति, तैः परमानन्दमयै प्रियतमावगाहनमदालसै प्रेमाद्रे. उद्वेलया कृपया सम्प्लावितास्मादृशैरशरण मा पालय । श्रीलक्ष्म्या. सौकुमार्यातिशयमाचार्यवर्या वर्णयन्ति श्रीगुणरत्नकोशे - 'पादारुन्तुदमेव पङ्कजरजश्चेटी भृशालोकि-तैरङ्गम्लानिरथाम्बसाहसविधौ लीलारविन्दग्रह. । दोला ते वनमालया हरिभुजे हा कष्टशब्दास्पदं केन श्रीरतिकोमला तनुरिय वाचां विमर्दक्षमा || ' ( ४२ ) हे अम्ब, पङ्कजरजोऽपि तव पादयोररुन्तुदमेव कण्टक इव मर्मस्पृक् भवति । सहवासपरि-चारिणीनां भृशालोकितै. तैजसत्वात् तत्तापै त्वदीयाङ्गाना म्लानिरेव भवति । तव च लीलारविन्दग्रहोऽपि साहसकर्मविधान-मेव भवति । प्रियतमस्य वक्षसि विराजमानाया त्वयि वनमालया विहरण हाकष्टशब्दास्पद हरिवक्षसि वनमालया सहैव लक्ष्मीविहरसीति वनमालाया किञ्चित्स्पन्दने न तया तदाघातशङ्कया नित्यभुक्ताया हा कष्टमिति वचासि सहसा निष्पद्यन्ते । तादृशी त्वदीया अतिसुकुमारा अप्राकृता तनूः कथ वाचा विमर्दक्षमा वाचा प्रतिपाद्यतया सङ्घर्षयोग्या न भवति । अतिसुकु-मारस्य श्रीवपुष पुरुषवचनस्तवनमप्ययुक्तमिति । हे श्रीः परमैश्वर्यप्रदायास्तव कमलदलसदृशाङ्गुलियुक्तं वेदान्तवेद्यं पादयुग्म प्रणतजनार्तिदावानलोपमम् । यदुपमर्दै: प्रेयस. कान्तवाहान्तराले हिमाम्भ.प्लुतिभिरिव नवत्व वहति । गुणो से अलकृत देखकर कवीन्द्रगण उत्प्रेक्षा करते है कि क्षीरसमुद्र के सार भाग से यह बना है । चन्द्र, कल्पलता, सुधा प्रभृति को वे क्षीर सागर का सार नही मानते । इतना कर लेने के बाद भी वे इसलिये सन्तुष्ट नही होते कि अकृत्रिम लक्ष्मी विग्रह की कृत्रिम वस्तु के सार के रूप में कल्पना ठीक नही है । हे श्री, आप की दयामय दृष्टि के लेशमात्र का प्रसार होने पर लोकपाल प्रभृति से लेकर आधुनिक समस्त प्रभुओ की दृष्टि विशिष्ट शोभा से सपन्न हो जाती है । सदा आप के सौन्दर्य रूपी मकरन्द का पान करने के कारण आप के प्रति भगवान् नारायण को पुण्डरीकाक्ष कहा जाता है । इस तरह से समस्त लोचनो से अतिशयिता के सपादन के लिये आपका अवलोकन ही प्रधान हेतु है । ऐसी स्थिति में आपके कटाक्ष के सौन्दर्य का वर्णन कैसे किया जा सकता है । हे पद्म, जिसके कटाक्ष के एक लेश को लेकर ब्रह्मा प्रभृति देवतागण कलह करने लगते है कि यह मेरा है, यह मेरा है, उन परमानन्दमय, प्रियतम के अवलोकन से उत्पन्न मद के कारण मतवाले, प्रेम भरे नेत्रो से हमारे जैसे शरणाभिलाषी लोगो को आप रक्षा करें, हम लोगो को आप अपनी करुणा की उद्वेल तरंगों से नहवा दे । लक्ष्मी की अतिशय सुकुमारता का वर्णन आचार्यवर्य पराशरभट्ट ने अपने गुणरत्नकोश के ' पादारुन्तुद० 'प्रभृति श्लोक में किया है । हे अम्ब, कमल की पराग भी आपके चरणों को कण्टक के समान पीडा पहुचाने वाली है । आपकी सेवा में लगी दासियों के बार-बार देखने से भी आप का शरीर म्लान हो जाता है, क्योकि नेत्रेन्द्रिय में विद्यमान तेजस्तत्व का अत्यन्त सूक्ष्मताप भी आपके कोमल शरीर को सह्य नही है । लीला के लिये कमल को पकडना भी आपके कोमल शरीर के लिये एक साहस का ही कार्य है । प्रियतम के वक्षस्थल पर जब आप विराजमान होती है, उस समय उनकी वनमाला भी आपके लिये अत्यन्त पीडाकर हो जाती है । भगवान् के वक्षस्थल पर वनमाला के साथ ही लक्ष्मी भी विहार करती है । उस समय वनमाला यदि थोड़ी सी भी इधर-उधर हो जाती है, तो उसके आघात की आशका से भय के मारे लक्ष्मी के मुह से 'हाय' शब्द निकल पडता है । इस तरह का आपका अत्यन्त सुकुमार यह अप्राकृत शरीर वाणी के विमर्द को, वाणी के द्वारा विविध रूप में किये गये वर्णन को कैसे सहन कर सकता है! इस अत्यन्त सुकुमार लक्ष्मी के शरीर का नाना पुरुषों के द्वारा नाना प्रकार से किया गया वर्णन भी उनके कष्ट को बढानेवाला ही है । है लक्ष्मी? आप परम ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली है । आपके कमलदल के समान अगुलीवाले, वेदान्तवेद्य, चरण कमल युगल प्रणतजनो के कष्ट को जला डालने के लिये दावानल के समान है ।