वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 281–290
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 281–290
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वार्थपारिजातः ११८१ - ' • ' यदपि दृष्ट्वा रूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापति । अश्रद्धामनृते दवाच्छ्रद्धां सत्ये प्रजापतिः ॥ ( यजु ० १ ९ ।७७ ) इत्यस्य भाष्य उक्तम्-' प्रजापतिः सत्यानृते धर्माधम प्रसिद्धलक्षणी दृष्ट्वा व्याकरोत् सर्वज्ञया स्वया विद्यया विभक्तौ कृतवानस्ति । कथमित्याहेति सर्वेपा मनुष्याणामनृतेऽसत्येऽधर्मेऽश्रद्धानदधात्, अर्थादधर्मेऽश्रद्धां कर्तुमाज्ञापयति, तथैव वेदशास्त्रप्रतिपादिते सत्ये प्रत्यक्षादिभि प्रमाणे परीक्षिते पक्षपातरहिते न्याय्ये धर्मे प्रजापतिः श्रद्धामदघात् । एवं सर्वैर्मनुष्यैः परमप्रयत्नेन स्वकीयं चित्त धर्मे प्रवृत्तमघमें निवृत्तं च सदैव कर्त्तव्यम्' (पृ० ११० ) इति । तदपि न युक्तम्, गौणार्थाश्रयणस्यायुक्तत्वात् । प्रजापतिरीश्वरः सत्यसङ्कल्पः, अमोधकर्मा च । त्वदुक्त- व्याख्यानदृष्ट्या यदीश्वरः सर्वेषां मनुष्याणामनृतेऽश्रद्धामदधात् सत्ये धर्मे च श्रद्धामदधात् तदा कुतो न सर्वे मनुष्या असत्येऽधर्मेऽश्रद्धावन्तः सत्ये धर्मे श्रद्धावन्तश्च जाताः । श्रद्धामदधादित्यस्य सत्ये श्रद्धां कर्तुमाज्ञापयतीत्यर्थस्तु मुख्यार्थ- त्यागेन गौणार्थाश्रयणमेव । तस्मान्महीधरादिसम्मत एवार्थोऽत्राक्षरमर्यादालभ्यः । स च- प्रजापतिः सत्यानृते भूतिमती दृष्ट्वा व्याकरोत् । नहि सर्वे सत्यानृतयोविविक्तं रूपं द्रष्टुं शक्नुवन्ति, अतः प्रजापतिरेव तयोरिदं सत्यमिदमनृतमिति पृथक्त्वं कृतवान् । इदं विवेचनमेव व्याकरणम् । विविच्यानृतेऽश्रद्धां नास्तिक्यमदधात्, अनृतस्याश्रद्धाया निमित्तत्वात् । सत्ये श्रद्धामदधात्, सत्यस्य श्रद्धानिमित्तत्वात् । श्रद्धा आस्तिकबुद्धिः । अत्र मन्त्रेषु नेश्वराज्ञा प्रकृता । विशेषतश्चायं विषयो मन्त्राणां व्याख्यानावसरे निरूपयिष्यते । यदपि-' दृते दह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् । मित्रस्याह चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे ॥ मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ॥॥' ( यजु ० ३६ | १८ ) । अस्यायमभिप्रायः - सर्वे मनुष्याः सर्वथा सर्वे: बनता हो, तदनुरूप आप लोगों का अन्तकरण एक रूप बन जाय । यहा पर अस् धातु के लट् लकार में ' बहुलं छन्दसि' इस सूत्र से शप् प्रत्यय का लुक् न होने पर 'असति' यह रूप बनता है । 'दृष्ट्वा रूपे ० ' इस मन्त्र का भाष्य दयानन्द ने इस प्रकार किया है- ' सब जगत् का अध्यक्ष जो ईश्वर है, उसने सत्य जो धर्म और असत्य जो अधर्म है, जिसके प्रकट और गुप्त लक्षण हैं, उनको सर्वज्ञ विद्या से ठीक ठीक देख कर सत्य और असत्य को अलग अलग किया है । उसने कहा है कि हे मानवों, तुम सब दिन अनृत अर्थात् झूठ, अन्याय के करने में अश्रद्धा अर्थात् प्रीति कभी मत करो | वैसे ही सत्य अर्थात् जो वेदशास्त्रोक्त हो, जिसकी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से परीक्षा की गई हो या की जाय, वही पक्षपात से अलग म्यायरूप धर्म है, उसके आचरण में सब दिन प्रीति रक्खो । जो जो तुम लोगो के लिये मेरी आज्ञा है, तदनुसार अपने आत्मा, प्राण और मन को सब पुरुषार्थं और कोमल स्वभाव से युक्त करके धर्म में सदा प्रवृत्त और अधर्म से निवृत्त करो' ( पृ० ११० ) । यह अर्थ भी ठीक नही है, क्योंकि मुख्यार्थ की उपलब्धि मे गौण अर्थ को स्वीकार करना अयुक्त है । प्रजापति अर्थात् ईश्वर सत्य संकल्प वाला और अमोध कर्म वाला है । आपकी व्याख्या के अनुसार यदि ईश्वर ने सभी मनुष्यों में अनूत में अश्रद्धा और सत्य धर्म में श्रद्धा उत्पन्न कर दी है, तो फिर सभी मनुष्यो की असत्य, अधर्म में अश्रद्धा और सत्य, धर्म में श्रद्धा स्थिर क्यों नही रहती । इसका यह अर्थ करना कि ईश्वर सत्य में श्रद्धा करने की आज्ञा देता है, मुख्यार्थ का त्याग कर गौण अर्थ का ग्रहण करने पर ही संभव हो सकता है । इसलिये यहाँ पर महीधर प्रभृति का किया गया अर्थ ही अक्षरों की मर्यादा से प्राप्त होता है । वह इस प्रकार है -' प्रजापति ने सत्य और अनृत की व्याख्या की । सभी मनुष्य सत्य और अनूत का विशद स्वरूप समझने में असमर्थ है, ऐसा सोच-कर प्रजापति ने ही यह अलग अलग बतलाया कि यह सच है और यह झूठा । यह इस प्रकार का विवेचन ही यहाँ पर व्याकरण पद से कहा गया है । इस तरह का विवेचन कर ईश्वर ने अन्त में अश्रद्धा उत्पन्न की, क्योकि अनृत अश्रद्धा का निमित्त है । उसने सत्य में श्रद्धा उत्पन्न की, क्योकि सत्य श्रद्धा को उत्पन्न करता है । श्रद्धा आस्तिक्य बुद्धि और अश्रद्धा नास्तिक्य बुद्धि कही जाती है । यहाँ पर 1 मन्त्रों में ईश्वर की आज्ञा का प्रसंग नही है । इस बात को विशेष रूप से मन्त्रो की व्याख्या करते समय स्पष्ट किया जायगा 1
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११८२ वेदार्थ पारिजातः सह सोहार्देनैव वर्तेरन्निति सर्वैरीश्वरोक्तोऽयं धर्म स्वीकार्यः । ईश्वरश्च प्रार्थनीयो यतो धर्मनिष्ठा स्यात् । हे सर्वदुःख- विनाशकेश्वर! मदुपरि कृपां विधेहि, यतोऽह सत्यधर्मं यथावद्विजानीयाम् । पक्षपातरहितस्य सुहृदश्चक्षुषा प्रेमभावेन सर्वाणि भूतानि मां सदा समीक्षन्ताम् अर्थाद् मम मित्राणि भवन्तु इतीच्छाविशिष्ट मां दृह सत्यसुखैः शुभगुणैश्च सह सदा वर्धय ॥ एवमहमपि मित्रस्य चक्षुषा निर्देरो भूत्वा वयमन्योन्यं समोक्षामहे सुखसम्पादनार्थ वर्तामहे, इतीश्वरोप- दिष्टो धर्मो हि सर्वैर्मनुष्यैरेक एव मन्तव्यः ( पृ ० १११ ) । अयमप्यर्थः पूर्वापरसम्बन्धशून्योऽविचारितरमणीयः, प्रकरणविरोधात् । यतो हि द्यौः शान्तिरित्यारभ्य ( ३६।१७ ) | यजूषि ' संदृशि जीव्यासमित्यन्यानि । अग्नि हृदयेनेत्याद्यध्यायसमाप्तिपर्यन्तमाश्वमेधिकम् । ( वा० स० ३ ९।८-१३ ) । स्वाध्याये मन्त्रपाठे प्रवर्ग्यमन्त्रादावस्याध्यायस्य दर्शनात् । तथा च प्रकरणानुसारेण हे महावीर दृते, दृ विदारणे । विदीर्णेऽपि जरया शरीरे मा मां त्वं बृंह दृढीकुरु । यद्वा दृते विदीर्णे कर्मणि मां दृह अच्छिद्रं कुरु, देवताप्रसादात् कर्मणां व्यङ्गत्वनिराकरणस्मरणात् । 'यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यून सम्पूर्णता याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥ ' ( शाण्डिल्यसूत्रे द्वितीयेऽध्याये द्वितीयाह्निके विशे सूत्रे टीकायामुद्धृता ) इति स्मृतेः ॥ यद्वा ससुषिरत्वात् सेक्तृत्वाद् दृतिर्महावीरः । हे दृते हे महावीर, मा दह दृढीकुरु । कथ दाढचं मित्याह-सर्वाणि भूतानि प्राणिनो मा मां मित्रस्य स्नेहवतः सुहृदश्चक्षुषा समीक्षन्तां सम्यक् पश्यन्तु । सर्वे मां मित्रदृष्ट्या पश्यन्तु नारिदृष्ट्या, सर्वेषा प्रियो भूयासमित्यर्थ । अहमपि सर्वाणि भूतानि मित्रस्य चक्षुषा पश्यामि सर्वे मे प्रियाः सन्त्वित्यर्थः । मित्रचक्षुः शान्तं भवति मित्र कञ्चन न हन्ति । न च कश्चन मित्रं हन्ति । एवं परस्पराद्रोहेण सर्वा स्वामी दयानन्द ने आगे 'दृते दृह मा' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत कर उसकी व्याख्या इस तरह से की है -' मनुष्य लोग आपस मे सब प्रकार के प्रेमभाव से सब दिन रहे । मनुष्यो के लिये यह उचित है कि जो वेदो मे ईश्वरोक्त धर्म है, उसी को ग्रहण करें और वेद रीति से ही ईश्वर की उपासना करे, जिससे कि मनुष्यो की धर्म मे ही प्रवृत्ति हो । हे सब दुखो के नाश करने वाले ईश्वर, आप हम पर कृपा कीजिये कि जिससे हम लोग आपस मे बैर को छोड कर एक दूसरे के साथ प्रेमभाव से रहे, सब प्राणी परस्पर एक दूसरे को मित्र जानकर बन्धु के समान व्यवहार करे, ऐसी इच्छा से युक्त हम लोगो को आप सत्य, सुख और शुभ गुणो से सदा बढाइये | इसी तरह से मैं भी सब मनुष्यादि प्राणियो को अपना मित्र समझू और हानि-लाभ, सुख-दुःख मे अपने आत्मा के समतुल्य ही सब जीवो को जानूँ । हम सब लोग आपस में मिलकर सदा मित्रभाव से रहे और सत्य- धर्म के आचरण मे सत्य सुखों को नित्य बढावें । इस तरह से जो ईश्वर का कहा धर्म है, वही एक सब मनुष्यो को मानने के योग्य हैं (पृ० १११ ) । यह अर्थ भी पूर्वापर सम्बन्ध से रहित और अविचारित रमणीय है और प्रकरण के विरुद्ध भी है । 'द्यौ: शान्ति:' इस मन्त्र से आरम्भ करके ' संदृशि जीव्यासम्' यहाँ तक यजुर्मन्त्र है ।' अग्नि हृदयेन' यहाँ से अध्याय समाप्ति पर्यन्त अश्वमेध संबन्धी मन्त्र है । स्वाध्याय, मन्त्रपाठ और प्रवर्ग्य मन्त्रों के प्रारम्भ मे इस अध्याय का विनियोग किया जाता है । इस तरह से प्रकरण के अनुसार यह अर्थ होता है- 'हे महावीर, वृद्धावस्था से इस शरीर के जीर्ण हो जाने पर भी तुम मुझे मजबूत बनाओ । अथवा मेरे इस कर्म में विघ्न पड़ जाने पर भी तुम उसको पूरा करो ॥ देवताओं के प्रसाद से कर्मों का वैगुण्य दूर हो जाता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है । यह स्मृतिवचन प्रसिद्ध है- 'जिसका स्मरण करने से और नाम का उच्चारण करने से तप, यज्ञ तथा अन्य क्रियाओं की न्यूनता तत्काल पूरी हो जाती है, उस अच्युत को मैं प्रणाम करता हू' । अथवा मशक में छिद्र रहता है और उससे पानी खीचा जाता है, अतः यहाँ पर उसी को महावीर कहा गया है । हे दृते, हे महावीर, तुम मुझे मजबूत बनाओ । मुझे तुम दृढ किस तरह से बनाओगे? इसका उपाय यह है कि सभी प्राणी मुझे मित्र के स्नेह से भरी दृष्टि से देखें । सभी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें, शत्रु की दृष्टि से नहीं । अर्थात् मैं सबका प्रिय हो सकूँ । मैं भी सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि देख सकूँ, अर्थात् सभी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित कर सकूँ । मित्र की दृष्टि शान्त होती है । मित्र किसी को नुकसान नही पहुँचाता और न कोई व्यक्ति ही मित्र को नुकसान पहुंचाता है । इस तरह से परस्पर सब कोई प्रेम से रहते हुए किसी को बिना नुकसान पहुँचाये हम मित्र की दृष्टि से देखें । यहाँ पर प्रकरण के अनुरोध से
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यदार्थपारिजातः ११८३ नहिंसन्तो मित्रस्य चक्षुषा वय समीक्षामहे पश्याम । अत्र प्रकरणानुसारेण महावीर एव सम्बोधनीयः । तत्रापि न पात्रविशेषमहावीरमात्रस्य सम्बोधनम्, किन्तु तदन्तर्यामिणः परमेश्वरस्यैव सम्बोधनमायाति । मदुपरि कृपा विधेहि यतोऽह सत्यधमं यथावद्विजानीयामिति मन्त्रार्थबहिर्भूतमेव सत्यसुखैः शुभगुणैश्च सह सदा वर्धयेत्यप्युदक्षरमेव । दृह इत्यस्य तु दृढीकरणं दीर्घायुष्यारोग्यादिप्रदानेनातरन्तु धर्मब्रह्मनिष्ठादाढर्यात् सम्भवति । सुखसम्पादनार्थं सर्वेषां स्वाभाविकी प्रवृत्तिरिति न सा विधेया, विधेरप्रवृत्तप्रवर्तकत्वनियमात् । ईश्वरोपदिष्टो धर्मः सर्वैर्मनुष्यंरेक एव मन्तव्य इत्यपि न मन्त्रार्थः, तद्बोधकपदाभावात् । ' अग्ने व्रतपते व्रत चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम् । इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि ॥ ' ( यजु ० १।५) । सर्वैर्मनुष्ये रीश्वरसहायेच्छा सदा कार्येति । नैव तस्य सहायेन विना सत्यधर्मज्ञान तस्यानुष्ठानपूर्तिश्च भवतः (पृ० १११ ) । अत्रापीच्छायाः कृत्यविषयत्वाद्विधेयता न सम्भवति, इच्छाया वस्तुसौन्दर्यज्ञानजनित्वनियमात् । यदुक्तम्-'हे अग्ने व्रतपते सत्यपते व्रतं सत्यधमं चरिष्यामि । अत्र प्रमाणम्- सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्याः ,, एतद्ध वै देवा व्रतं चरन्ति यत्सत्यम् सत्याचरणाद् देवा असत्याचरणान्मनुष्याश्च भवन्ति अतः सत्याचरणमेव धर्ममाहुः । तच्छकेयं यथा तत् सत्याचरणं धर्मं कर्तुमह शकेयं समर्थो भवेयम्, तम्मे राध्यताम्, तत्सत्यधर्मानुष्ठानं मे मम भवता राध्यताम् । कृपया सम्यक् सिद्ध क्रियताम् । किञ्च तद्व्रतमित्यत्राह - इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि । यत्सत्यपालनस्यैवाचरणम् अनृतादसत्याचरणाद् अधर्मात् पृथग्भूतं तदेवोपैमि । अस्यैव धर्मस्यानुष्ठानम् ईश्वरप्रार्थनया स्वपुरुषार्थेन च कर्तव्यम् । नापुरुषार्थिनमीश्वरोऽनुगृह्णाति । यथा चक्षुष्मन्त दर्शयति नान्धमेवमेव धर्मं कर्तुमिच्छन्तं महावीर को ही सम्बोधित किया जा सकता है । यह केवल महावीर नामक एक पात्रविशेष का सम्बोधन नही है, किन्तु उस पात्रविशेष में विद्यमान अन्तर्यामी परमेश्वर को ही यहाँ सम्बोधित किया जाता है । 'मेरे ऊपर आप कृपा कीजिये, क्योंकि मैं सत्य और धर्म को यथोचित जानता हूँ यह अर्थ मन्त्राक्षरो से बाहर का है । सत्य, सुख और शुभ गुणो के साथ मुझे सदा बढाओ, यह बात भी उन अक्षरों से प्राप्त नही होती । दंह इस क्रिया का अर्थ मजबूत बनाओ, यही हो सकता है । दीर्घायुष्य, आरोग्य आदि के प्रदान द्वारा बाह्य दृढता और धर्म- ब्रह्मविषयक निष्ठा के द्वारा आन्तर दृढता प्राप्त होती है । सुख के संपादन के लिये सबकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, अतः उसका यहां विधान नही है, क्योकि विधि का यह नियम है कि वह वही प्रवृत्त कराती है, जहाँ पर कि मनुष्यकी स्वभावतः प्रवृत्ति नही होती । ईश्वर के उपदिष्ट धर्म को सभी मनुष्य एक ही मानें, यह भी अर्थ मन्त्र से नहीं निकलता, क्योकि इस अर्थ के बोधक पद वहाँ विद्यमान नही है । आगे ' अग्ने व्रतपते ' इस मन्त्र का अभिप्राय बताया गया है कि सब मनुष्य ईश्वर की सहायता की सदा इच्छा करे, क्योकि उसकी सहायता के बिना सत्य धर्म का पूर्ण ज्ञान और उसका अनुष्ठान कभी पूरा नही हो सकता । यहां पर भी इच्छा के कृति का विषय हुए बिना विषेयता संभव नही हो सकती । इच्छा का यह नियम है कि वह वस्तु के सौन्दर्य के ज्ञानमात्र से भी उत्पन्न होती है । इस मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार प्रस्तुत की गई है-'हे सत्यपते परमेश्वर, मैं जिस सत्यधर्म का अनुष्ठान करना चाहता हू, उसकी सिद्धि आपकी कृपा से ही हो सकती है । इस मन्त्र का अर्थ शतपथ ब्राह्मण में भी लिखा है कि-'जो मनुष्य सत्य के आचरण रूप व्रत को करते हैं, वे देव कहाते हैं और जो असत्य का आचरण करते हैं, उनको मनुष्य कहते है । इससे मैं उस सत्यव्रत का आचरण किया चाहता हूँ । मुझ पर आप ऐसी कृपा कीजिये कि जिससे मैं सत्यधर्म का अनुष्ठान पूरा कर सकूँ । उस अनुष्ठान को सिद्धि करने वाले एक आप हीहैं,3 अतः आपकी कृपा से सत्यरूप धर्म का अनुष्ठान मेरे लिये सदा के लिये सिद्ध हो । मै इस व्रत का पालन करना चाहता हूँ कि उन सब असत्य कार्यों से छुटकर में सत्य के आचरण में सदा दृढ रहूँ । मनुष्य को यह कहना उचित है कि ईश्वर ने मनुष्यों में जितना सामर्थ्य रक्खा है, उतना पुरुषार्थ अवश्य करे । उसके उपरान्त ईश्वर की सहायता की इच्छा करनी चाहिये | मनुष्यो में सामर्थ्य रखने का ईश्वर का यही प्रयोजन है कि मनुष्यों को अपने पुरुषार्थ से ही A सत्य का आचरण अवश्य करना चाहिये । जैसे कोई मनुष्य आँख वाले पुरुष को ही किसी चीज को दिखला सकता है, अन्धे को नहीं; इसी रीति से जो मनुष्य सत्यभाव,
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वेदार्थपारिजातः III पुरुषार्थकारिणमीश्वरानुग्रहाभिलाषिण प्रत्येवेश्वरः कृपालुर्भवति, नान्य प्रति चेति जीवे तत्सिद्धि कर्तुं साधनाना- मीश्वरेण पूर्वमेव रक्षित्वात्, तदुपयोग करणाच्च । येन पदार्थेन यावानुपकारो ग्रहीतुं शक्यस्तावान् स्वेनैव ग्रहीतव्य- स्तदुपरीश्वरानुग्रहेच्छा कर्तव्या' ( पृ ० ११२ ) इति । -, तत्रेदं विचारणीयम् यद्यपि सत्यं परमादरणीम् तथापि न तदेव धर्मोऽग्निहोत्रादिधर्माणामपि विहितत्वात् । पूर्वं मनुष्या एव देवा इति मतमपाकृतमेव । श्रुत्यर्थस्तु - देवाः सत्याचरणशीलाः मनुष्या अनृताचरण- शीला भवन्ति । देवानां यजनाय मनुष्यैरपि सत्याचरणाद्देवत्वमात्मनि सम्पादनीयम्, ' देवो भूत्वा देवान् यजेत्' इति श्रुतेः । अत एव सत्यधारणात् ' इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि' ( श ० १ | १ | १ | ४ ) इति श्रुतेः सार्थक्यम् । यच्चोक्तम- स्यैव धर्मस्याष्ठानमीश्वरकृपया स्वपुरुषार्थेन कर्तव्यमिति, तदुभयमपि प्रकरणविरुद्धम्, इहाध्याये दर्शपूर्ण मासेष्टि- विषयाणां मन्त्राणां प्रकृतत्वात् । येन पदार्थेन यावानुपकारो ग्रहीतुं शक्यस्तावान् स्वेनैव ग्रहीतव्यस्तदुपरीश्वरानु-, ग्रहेच्छा कार्येत्यपि विरुद्धमेव मन्त्राक्षरार्थबहिर्भूतत्वात् । अनुग्रहस्य माहात्म्यज्ञानेनानुग्रहेच्छायाः स्वतः सम्भवेन विधेयत्वानुपपत्तेः । कदाऽनुग्रहेच्छा कर्तव्येति नियमानुपपत्तिश्च पूर्वस्मादेव हेतोः । अनुग्रहस्तु पुरुषार्थप्रवृत्तावप्य- पेक्षणीय एव, 'एष ह्येवैनं साधु कर्म कारयति त यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते ' ( कौ ० ब्रा ० उ० ३।९ ) इति श्रुतेः । विविदिषापीच्छेव । तथा च सा यज्ञतपोदानादिभिः सम्पादनीया भवति । 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति । यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' ( क० उ ४।४।२२ ) इति श्रुत्या यज्ञादिद्वारेश्वरानुग्रहादेव वेदनसौन्दर्यज्ञानादिभिरिच्छा ', सम्पाद्यते । आत्मान्तःकरणादीनामप्यन्तर्याम्यनुग्रहेणैव प्रवृत्तिसम्भवाच्च । य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोज्न्तरो यमयति आत्मा य वेद, आत्मा यस्य शरीरम् एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' (श० १४।६।७।३० ), 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' ,,; पुरुषार्थ से धर्म को करना चाहता है उसी पर ईश्वर भी कृपा करता है अन्य पर नहीं क्योंकि ईश्वर ने धर्म करने के लिये बुद्धि आदि बढने के साधन जीव के साथ रक्खे है । जब जीव उनसे पूर्ण पुरुषार्थ करता है, तब परमेश्वर भी अपने पूरे सामर्थ्य से उस पर कृपा करता है, अन्य पर नही । जिस पदार्थ से जितना उपकार लिया जा सकता है, उतना अवश्य लेना चाहिये । इसके बाद ही ईश्वर की कृपा की आकाक्षा रखनी चाहिये । उसका उपयोग न करने पर ईश्वर का अनुग्रह नही प्राप्त हो सकता' ( पृ० ११२-११३ ) । यहा पर विचारणीय बात यह है कि यद्यपि सत्य परम आदरणीय है, तो भी केवल सत्य ही धर्म नही है, सत्य के अति- रिक्त अग्निहोत्रादि धर्मो का भी विधान है । पहले के मनुष्य ही देव हैं, इस मत का खण्डन हम कर चुके है । श्रुति का यह अर्थ है कि देवगण सत्य का आचरण करने वाले और मनुष्य असत्य का आचरण करते है । देवताओ का यजन करते समय मनुष्यो को भी सत्या- चरण द्वारा अपने में देवत्व का संपादन करना चाहिये । श्रुति कहती है कि 'स्वयं देवता बनकर देवताओ का पूजन करें । इसी लिये मनुष्य जब सत्य को धारण करता है, तब श्रुति की यह उक्ति सार्थक मानी जाती है कि 'मैं अब अनृत को छोडकर सत्य को प्राप्त करता हूँ । यह कहना कि इस धर्म का अनुष्ठान ईश्वर की कृपा और अपने पुरुषार्थ के आधार पर करना चाहिये, ये दोनो ही बातें प्रकरण विरुद्ध हैं, क्योंकि इस अध्याय में दर्श- पूर्णमास इष्टि से संबद्ध मन्त्र ही प्रकृत हैं । जिस पदार्थ से जितना उपकार लिया जा सकता है, उतना अवश्य लेना चाहिये । इसके बाद ही ईश्वर की कृपा को आकांक्षा रखनी चाहिये, यह बात भी विरुद्ध है, क्योंकि मन्त्राक्षरों में इसका कोई संकेत नही है । अनुग्रह के माहात्म्य का ज्ञान होने पर अनुग्रह की इच्छा स्वतः उत्पन्न होती है, अतः उसमें विधेय भाव की उपपत्ति हो नही होगी । इसी कारण से अनुग्रह की इच्छा कब करनी चाहिये, इसमें भी किसी नियम की उपपत्ति नही बन सकती । पुरुषार्थ में प्रवृत्त होने में भी ईश्वर के अनुग्रह को आवश्यकता है । कौषीतकि श्रुति का स्पष्ट कथन है कि ' भगवान् जिसको इस संसार से मुक्त करना चाहता है, उसको साधु कर्मों में प्रवृत्त कराता है' । ब्रह्म को जानने की इच्छा भी एक इच्छा ही है । यज्ञ, तप, दान आदि से विविदिषा सम्पादित होती है । 'इस ब्रह्म को ब्राह्मण वेदों के उपदेश से, यज्ञ, दान और अनश्वर तप के बल से जानना चाहते है' इस श्रुति के अनुसार यज्ञादि के अनुष्ठान से ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त करके ही, मनुष्य ब्रह्म के वेदन सौन्दर्य का ज्ञान होने पर ही इच्छा करता , 'है । अन्तर्यामी का अनुग्रह होने पर हो आत्मा अन्तःकरण प्रभृति को ब्रह्मवेदन में प्रवृत्ति हो सकती है । य आत्मनि तिष्ठन् यो
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वदार्थपारिजात' ११८५ बृ० उ० ३।७।२२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अतो घमं कर्तुमिच्छन्तमेव परमेश्वरोऽनुगृह्णातीत्यपि निरर्थकम्, इच्छा-नामपि परमेश्वरानुग्रहहेतुकत्वात् । 'परात्तु तच्छ्रुते: ( ब्र ० सू ० २।३।४१ ) इति न्यायात् । न चैव वैषम्यनै घृण्यादिकम्, र्वपूर्वकर्मसापेक्षत्वात् । तदुक्तम्— ' वैषम्यनैर्घुण्येन सापेक्षत्वात्' ( ब्र ० सू० २।१।३४ ), ' कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रति-[ द्धावैयर्थ्यादिभ्य ' ( ब्र ० सू० २।३।४२ ) इत्यादिप्रमाणेभ्यः । 'सक्रियस्य च यः प्रेषः स प्रेषो विषयो णिच । अत व यदा पूर्वसंस्कारेण पठन्त देवदत्त यज्ञदत्त प्रेरयति, तदैव पाठयतीति णिचः सार्थक्य भवति । अत एव न काष्ठ ।व्यतीति सम्भवति । वस्तुतो मन्त्रार्थस्त्वित्थम्—' अपरेणाहवनीयं प्रानिष्ठमग्निमीक्षमाणोऽप उपस्पृश्य व्रतमुपैम्यग्ने व्रतपत हमहमिति वा' ( का ० श्र० २।१।८६) इति कात्यायनस्मरणाद् यजमानः प्रानिष्ठमग्निमीक्षमाणोऽप उपस्पृश्या-न मन्त्रेण व्रत गृह्णाति । हे अग्ने, तन्नामकदेवताविशेष व्रतपते व्रतपालक, अत्र व्रतपदेन दर्शपूर्णमासाङ्गसत्यादिनियम-हणमेव मन्तव्यम् । अतः कर्मपूर्त्यनन्तरं व्रतत्यागोऽपि विहितः । 'व्रत विसृजते येनोपेयात्' ( का ० श्रौ ० ३।८।३) । नग्रहणे मन्त्रद्वयमुक्तम् । तयोर्मध्ये येन व्रतादानं प्रथमेन द्वितीयेन वा तदनुसारेण व्रत विसृजेत् । ' अग्ने व्रतपते नमचारिषम्, तदशकम्, तन्मेऽराधीदमहं य एवास्मि सोऽस्मि' ( यजु ० २२८ ) । पूर्वस्मिन् मन्त्रे चरिष्यामीति विष्यत्प्रयोगोऽत्र त्वचारिषमिति भूतार्थबोधकलकारप्रयोगः । अराधीदित्यपि भूतार्थकलकारप्रयोगः । पूर्वं व्रतग्रहणे-नृतान्मानुषभावात् सत्यं दिव्यं भावमुपगत आसम् इदानी व्रतविसर्गेण य एव मानुषोऽहमासं स एवाहमस्मीति केवलं त्यस्यैव ग्रहण तस्यागश्च नोपपद्यते । तस्मात् सायणादिसम्मतो मदुक्त एवार्थो युक्तः । त्वदाज्ञया व्रत चरिष्यामि र्मानुष्ठास्यामि । कर्मरूपस्य व्रतस्यैवाचरणं सम्भवति । नहि सत्यरूपस्य धर्मस्यानुष्ठानमिह प्रकृतं न वा ज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादि श्रुतिया इसमें प्रमाण है । इसी लिये धर्म का आचरण करने मे प्रवृत्त मनुष्य पर ही ईश्वर अनुग्रह करता है, यह न भी निरर्थक हैं, क्योकि यह धर्म के आचरण की इच्छा भी परमेश्वर के अनुग्रह पर ही निर्भर है । 'परात्तु तच्छ्रुतेः' यह बादरायण इसमे प्रमाण है । यदि कहा जाय कि इस तरह से तो ईश्वर पर वैपम्य और नैर्धृष्य का दोष आवेगा, सो ऐसी बात नही है, क्योकि वो के पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार ही ईश्वर सृष्टि करता है, अत ईश्वर पर विषम सृष्टि अथवा निर्दयता का आरोप नही किया सकता 1 ' वैषम्यनैर्घृण्ये ० ' इस बादरायण सूत्र मे इस बात को स्पष्ट किया गया है । 'कृतप्रयत्नापेक्षस्तु०' इत्यादि सूत्र भी इसमें प्रमाण | 'क्रिया में निरत व्यक्ति को जो आदेश दिया जाता है, वही आदेश णिच् प्रत्यय का भी विषय होता है' इस नियम के अनुसार जब संस्कार के अनुसार पढने मे प्रवृत्त देवदत्त को यज्ञदत्त प्रेरित करता है, तभी 'पढाता है' इस णिच् प्रत्यय की सार्थकता मानी जाती 1 अत काष्ठ को पढाता है, ऐसा प्रयोग नहीं बनता । इसका अभिप्राय यह है कि जीव अपने पूर्वाजित कर्मों के संस्कार के अनुसार प्रवृत्त होता है, तभी ईश्वर की प्रेरणा सार्थक हो सकती है और इससे ईश्वर पर उक्त दोषो की कोई संभावना भी नही रह जाती । वस्तुतः इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है- ' अपरेणाहवनीय ' इस कात्यायन श्रौतसूत्र के बताये विनियोग के अनुसार मान अपने सामने रखी हुई अग्नि को देखते हुए आचमन करने के बाद इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए व्रत का ग्रहण करता है कि अग्ने, आप व्रत के रक्षक है । यहा पर व्रत पद से दर्श- पूर्णमास कर्म के अंगभूत सत्याचरण आदि नियमों को ग्रहण करना ही माना ना चाहिये । इसीलिये कर्म की समाप्ति के बाद इन नियमो का त्याग भी विहित है । 'व्रतं विसृजते येनोपेयात्' इस कात्यायन वसूत्र के वचन का अभिप्राय यह है कि व्रत का ग्रहण करते समय दो मन्त्रो का विधान है । इनमें से प्रथम या द्वितीय जिस मन्त्र का चारण कर व्रत ग्रहण किया हो, उसी मन्त्र से व्रत का विसर्जन भी करे । व्रत का ग्रहण करते समय जो मन्त्र बोला जाता है, उसमें रिष्यामि' यह भविष्यकाल की क्रिया का प्रयोग है और विसर्जन मन्त्र में 'अचारिषम्' इव भूतकाल की क्रिया का । 'अराधीत् भी भूतार्थक लकार का प्रयोग है । पहले व्रत ग्रहण के द्वारा अनृत मनुष्यभाव को छोडकर सत्य दिव्यभाव को मैंने प्राप्त किया ,, अब जब मैं व्रत विसर्जन कर रहा हूं तो जैसे मैं पहले मनुष्य था उसी तरह पुनः मनुष्यभाव को ही प्राप्त कर रहा हूं । यहां केवल सत्य का ग्रहण अथवा उसका त्याग ही विहित नहीं है, किन्तु व्रत का ग्रहण और विसर्जन विहित है । इस लिये सायणादि संगत रा अर्थ ही इस मन्त्र का उचित है । आपकी आज्ञा से मैं व्रत का आचरण, कर्म का अनुष्ठान करूंगा । कर्मरूप व्रत का ही आचरण १४९
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वेदार्थपारिजातः ११८६ , दर्शपूर्णमासाख्यस्य कर्मणस्त्वनुष्ठान सम्पन्नम् । तच्छकेयम् व्रतमचारिषमित्यतः प्राक् तदाचरण सम्पन्नम् । दर्शपूर्णमासाख्यस्य तत्कर्मानुष्ठात शक्तो भूयास त्वत्प्रसादात् । तन्मे राध्यतां मदीय तत्कर्म निर्विघ्नं फलपर्यन्तं सिद्ध्यतु | अग्निर्वे देवाना व्रतपतिः' (श० १ | १ | १ | २ ) इति श्रुत्याग्नेर्देवविशेषस्य व्रतपालकत्वश्रवणात् सर्वान्तिर्यामिणः परमेश्वरस्य तु सर्वदेव- प्रकृतित्वात् सर्वशक्तित्वात् सर्वपालकत्वेन व्रतपालकत्वमपि । इदमहं यजमानोऽस्मादनृतान्मनुष्यजन्मनो मनुष्यभावाद्वा उद्गत्य सत्यं देवशरीर देवभावं वा उपैमि प्राप्नोमि । सत्यमनुष्ठीयमानकर्मरूपेण प्रत्यक्षमिति मत्वान इदमिति विशिनष्टि । अनृतं मनुष्यजन्म, शीघ्रविनाशित्वात् । स्वाप्निको गजाश्वादि प्रपवो बोधमात्रेण शीघ्र निवर्तमान- त्वादन्त उच्यते 1। तथैव मनुष्यजन्मापि । सत्यं देवजन्म बहुकालस्थायित्वात्, यथा जागरगजादय: । 'इदमहमनृतात् सत्यमुपेमि' ( श० १ | १ | १ | ४ ) इति शातपथश्रुतेश्च । यद्यपि वेदान्तरीत्या चिरकालस्थायिनो जागरगजादिप्रपञ्चस्यापि ब्रह्मबोधान्निवर्तमानत्वाद् अनृतत्वमेव, तथापि प्रकृते स्थायित्वास्थायित्वाभ्यां दिव्यत्वादिव्यत्वाभ्यामेवानृतसत्यत्वोक्ति । यदपि - ' व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽप्नोति दक्षिणाम् । दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ||' ( यजुर्वेदे १ ९ ।३० ) । ' यदा मनुष्यो धर्मं जिज्ञासते सत्य चिकीर्षति तदैव सत्य विजानाति, तत्रैव मनुष्यैः श्रद्धेय नासत्ये चेति । यो मनुष्यः सत्यं व्रतमाचरति तदा दीक्षामुत्तमाधिकारमाप्नोति, यदा दीक्षितः सन् उत्तमगुणैरुत्तमाधिकारी भवति तदा सर्वतः सत्कृतः फलवान् भवति । सास्य दक्षिणा भवति । ता दीक्षया शुभगुणाचरणेनैवाप्नोति सा दक्षिणा । यदा ब्रह्मचर्यादिसत्यव्रतैः सत्काराढ्यः स्वस्यान्येषां च भवति, तदा चरणे श्रद्धां दृढ विश्वासमुत्पादयति । कुतः? सत्याचरण- मेव सत्कारकमस्त्यतो यदोत्तरोत्तरं श्रद्धा वर्धते, तदा तया श्रद्धया मनुष्यैः परमेश्वरो मोक्षधर्मादिकं च प्राप्यते नान्यथेति । अतः किमायातम्? सत्यप्राप्त्यर्थं सर्वदा श्रद्धोत्साहादिपुरुषार्थो वर्धयितव्य:' ( पृ ० ११३ ) इति, तन्न, यतो किया जा सकता है । सत्यरूप धर्म का अनुष्ठान यहाँ प्रकृत नही है और न 'व्रतमचारिषम्' ऐसा कहने से पहले उसका आचरण ही संपन्न हुआ है । हा, दर्श-पूर्णमास कर्म का अनुष्ठान अवश्य संपन्न हुआ है । 'तच्छकेयम्' का अर्थ है कि आपकी कृपा से मैं उस कर्म के अनुष्ठान में समर्थ होऊं । मेरा वह कर्म फलपर्यन्त निर्विघ्न संपन्न हो । ' देवनाओ मे अग्नि व्रतपति कहलाता है ' इस श्रुति के अनुसार अग्निनामक देवताविशेष ही यहा पर व्रत का पालक माना जाता है । सर्वान्तर्यामी परमेश्वर तो सभी ' देवताओ की प्रकृति है, वह सर्व- शक्तिमान् है, वह सबका पालक है, अतः व्रत का पालक भी है । मैं यजमान इस अनृत मनुष्यजन्म अथवा मनुष्यभाव से उठकर सत्य अर्थात् देवशरीर अथवा देवभाव को प्राप्त करता हूं । यहा पर सत्य अनुष्ठीयमान कर्म के रूप में प्रत्यक्ष है, ऐसा मानकर उसको ' इदम्' पद से विशिष्ट किया गया है । मनुष्य का जन्म अनृत इसलिये है कि वह शीघ्र विनाशी है । स्वप्न में देखे गये हाथी -घोडा आदि , प्रपंच जगने के साथ ही शीघ्र निवृत्त हो जाने से अन्त कहे जाते हैं उसी तरह से मनुष्य का जन्म भी अनृत है । देवता का जन्म सत्य कहा जाता है, क्योकि वह चिरकाल तक स्थिर रहता है, जैसे कि जाग्रदवस्था के हाथी -घोडा प्रभृति पदार्थ अपेक्षाकृत स्थायी है । 'इदमहमनृतात्' इत्यादि शतपथ श्रुति भी इसमें प्रमाण है । यद्यपि वेदान्त की पद्धति से चिरस्थायी जाग्रदवस्था के गजादि प्रपच की निवृत्ति भी ब्रह्म का अवबोध होने के साथ ही हो जाती है, अतः यह भी अनृत ही है, तो भी प्रकृत में स्थायित्व और अस्थायित्व, दिव्यत्व और अदिव्यत्व ही सत्य और अन्त के आधार माने गये है । इसके आगे ' व्रतेन दीक्षाम्' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत कर कहा है कि 'इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि जब मनुष्य धर्म को जानने की इच्छा करता है, तभी सत्य को जानता है । उसी सत्य में मनुष्यों को श्रद्धा करनी चाहिये, असत्य में कभी नहीं । जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात् उत्तम अधिकार के फल को पाता है । जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं । क्योकि धर्म आदि शुभ गुणो से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त करता है, अन्यथा नही । जब ब्रह्मचर्यं आदि सत्य व्रतो से अपना और दूसरे का अत्यन्त सत्कार होता है, तब उसी में दृढ विश्वास होता है, क्योकि सत्यधर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार कराने वाला है । फिर सत्य के आचरण में जितनी अधिक श्रद्धा बढ़ती जाती है, उतना ही मनुष्य व्यवहार और परमार्थ के सुख को प्राप्त करता जाता है, अधर्म के आचरण से नही । इससे
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ववार्थपारिजातः ११८७ यदा धर्म जिज्ञासते तदा सत्य चिकीर्षति । एतेन धर्मजिज्ञासासत्यचिकीपयोहतुहेतुमद्भावी ज्ञायत । स च किं प्रमाणक इत्यद्याप्यनिश्चितमेव । धर्मसत्योरभेदे धर्मजिज्ञासाधर्मचिकीर्षयोः कार्यकारणभावोऽधिगन्तु शक्य, इच्छायाः सर्वत्र ' ' सौन्दर्यज्ञानजनितत्वानपायात् । ज्ञानजन्या भवेदिच्छा इतिन्यायेन सत्यज्ञाने सत्यचिकीर्षाया जन्यत्वसम्भवेऽपि सत्यचिकीर्षीया धर्मजिज्ञासाजन्यत्वाप्रसिद्धेः । सत्यचिकीर्षानन्तर सत्य विज्ञानमिति कथमुपपद्यते? सत्यज्ञानानन्तरमेव सत्यचिकीर्षासम्भवात् । ज्ञानानन्तरमेव तद्विषयकेच्छासम्भवात् । सत्यज्ञानानन्तरं दीक्षामुत्तमाधिकार प्राप्नोतीत्यपि प्रमाणापेक्षमेव, दीक्षापदस्योत्तमाधिकारार्थत्वे मानाभावात् । दीक्षित उत्तमाधिकारी सत्कृतः फलवान् भवति | सास्य दक्षिणा भवति । दक्षिणा उत्तमाधिकारप्राप्तेः फलत्वेनोक्ता । इह तु शुभाचरणेनैव तत्प्राप्तिरुच्यत इति कथं न परस्परव्याहतिः । पूर्वं सत्कारप्राप्तिरेव दक्षिणोक्ता । पुनश्चात्र दक्षिणाया. सत्काराढ्यतोच्यते । सत्काराढ्यया - दक्षिणया श्रद्धा वर्धते श्रद्धया मोक्षादिकं प्राप्यते । इत्थं त्वदुक्तेरेतावान्निष्कर्ष: – सत्यभाषणादिभिः सत्यादिव्यवहर्तुः , सत्कारो जायते । तेनैव सत्यभाषणादो श्रद्धा वर्धते । तथैव सत्यं मोक्षादिकं प्राप्यत इति । तच्च न युक्तम् क्वचिद्वैपरीत्यस्यापि दर्शनात् । किञ्चैवमन्वयव्यतिरेकादिभिः कार्यकारणे निर्णीयेते । येनाचरणेन सत्कारलाभस्तत्रैव विश्वासः स्यात् । तथात्वे ब्रह्मविद्यया सत्कारलाभ:, तेन तत्र श्रद्धा, श्रद्धया च तत्प्राप्तिरिति चक्रकापत्तिः । किञ्च, नावश्य सत्यब्रह्मचर्यादिभिः सत्कारलाभ, अतज्ज्ञेषु तदसम्भवात । वस्तुतस्तु नास्य मन्त्रस्यायमर्थः, किन्तु पञ्चविशीं कण्डिकामारस्यानेके कार्यकारणभावाः प्रदर्शिताः । ' अर्धर्चेरुक्थानां रूपं प्राप्नोति पढ़ेंः प्रणवैः निविदो न्यूङ्खानाप्नोति पयसा दुग्धेन सोम आप्यते । अश्विभ्यां प्रात- क्या सिद्ध हुआ? यह कि सत्य की प्राप्ति के लिये सब दिन श्रद्धा और उत्साह आदि पुरुषार्थ को मनुष्य लोग बढ़ाते हो जाय, जिससे सत्यधर्म की यथावत् प्राप्ति हो । ' यह कथन भी उचित नही है, क्योकि जब मनुष्य धर्म की जिज्ञासा करता है, तदुपरान्त सत्य का आचरण करता है । इससे धर्म की जिज्ञासा और सत्य की चिकीर्षा का कार्यकारणभाव प्रतीत होता है । इसमे क्या प्रमाण है, यह बात आजतक निश्चित नही हो पाई है । धर्म और सत्य का अभेद मानने पर धर्मजिज्ञासा और धर्मविकीर्षा का कार्यकारणभाव जाना जा सकता है । इच्छा सर्वत्र सौन्दर्य के ज्ञान के बाद ही पैदा होती है, इस नियम का वही व्यभिचार नही देखा जाता । ' इच्छा ज्ञान से उत्पन्न होती है' इस नियम के अनुसार सत्यज्ञान मे सत्य-चिकीर्षा की कारणता यद्यपि मानी जा सकती है, किन्तु इससे सत्यचिकीर्षा धर्मजिज्ञासा से उत्पन्न होती है, यह सिद्ध नही हो पाता । सत्य की चिकीर्षा के अनन्तर सत्य का ज्ञान कैसे उपपन्न हो सकता है, क्योकि सत्य के ज्ञान के बाद हो तो सत्य की चिकीर्षा हो सकती है । किसी वस्तु के ज्ञान के बाद हा तद्विषयक इच्छा होती है । सत्यज्ञान के अनन्तर दीक्षा अर्थात् उत्तम अधिकार को प्राप्त करता है, यह व्याख्यान भी प्रमाण को अपेक्षा रखता है, क्योकि दीक्षापद उत्तम अधिकारार्थक है, इसमें कोई प्रमाण उपलब्ध नही है । दीक्षित अर्थात् उत्तम अधिकारी जो सत्कृत अथवा फलवान् होता है, यही उसकी दक्षिणा है । दक्षिणा उत्तम अधिकार की प्राप्ति के फल के रूप मे प्रदर्शित है । यहाँ पर शुभ आचरण के द्वारा उसकी प्राप्ति बताई जाती है । इनमे परस्पर विरोध कैसे नही होगा? पहले सत्कार प्राप्ति को ही दक्षिणा बताया गया है । अब यहाँ पर दक्षिणा की सत्कार से सम्पन्नता वर्णित है | सत्कार से सम्पन्न दक्षिणा से श्रद्धा से बढती है और श्रद्धा से मोक्षादि की प्राप्ति होती है । इस तरह से आपकी उक्ति का यह निष्कर्ष निकलेगा कि- सत्य भाषण आदि के द्वारा सत्यादि का आचरण करने वाले व्यक्ति का समाज में सत्कार होता है । इसी से सत्य भाषण जैसे सत्कर्मों मे श्रद्धा बढती है और इसीसे सत्य मोक्षादि की प्राप्ति होती है । यह व्याख्या उचित नही है क्योकि कभी कभी इसके विपरीत भी देखने को मिलता है । अपि च, कार्यकारणभाव का निर्णय अन्वयव्यतिरेक से होता है । जिस आचरण से सत्कार मिलेगा, उसी में विश्वास होगा । इस तरह से ब्रह्मविद्या से सत्कार मिलेगा, सत्कार मिलने से उसमे श्रद्धा होगी और श्रद्धा होने से उसकी प्राप्ति होगी, इस चक्रक दोष मे आप घिर जायेंगे । सत्य ब्रह्मचर्य आदि के आचरण से सत्कार अवश्य मिलेगा, यह जरूरी नही है, क्योंकि जो इस बात को नही जानते मानते, उनसे पर संमान मिलने की कोई संभावना नही रहती । वस्तुतस्तु इस मन्त्र का आपका बताया यह अर्थ नही है, किन्तु इस प्रकरण की पचीसवी कण्डिका से आरम्भ करके अनेक कार्यकारणभाव वर्णित है । जैसे कि 'ऋचाओ के अर्धभाग से उक्थो की प्राप्ति होता है, पद अर्थात् प्रणव से निविद और न्यूख
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वेदार्थपारिजातः ११८८ सवनेनंन्द्रेण माध्यन्दिनं सवनं सरस्वत्या तृतीय सवन प्राप्यते । प्रकृते नियमितकर्मविशेषानुष्ठानेन व्रतेन दीक्षा-माप्नोति । दीक्षात्र संस्कारविशेष उच्यते । दीयते ज्ञानमत्यन्तं क्षीयते पापसञ्चयः । यया दीक्षा तु सम्प्राप्ता परलोक-प्रदायिनी ||' इत्याप्तोक्तेः शतपथादौ सोमादावपि बहुविधा दीक्षा उक्ताः । तया दीक्षया दक्षिणां दाक्षिण्यं कर्मणा- मनुष्ठानपाटव प्राप्नोति । तया दक्षिणया स्वान्तशुद्धया श्रद्धां श्रत् सत्य धीयते यस्यां सा श्रद्धा आस्तिक्यबुद्धि-स्तामाप्नोति । तया श्रद्धया सत्यं सत्यज्ञानादिलक्षण ब्रह्म प्राप्यते । ' श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्त ऋते श्रिताः । सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृताः ॥ ' ( अथर्व ० १०।१५।१-२ ) । यत्त्वस्याभिप्रायं वर्णयता श्रमेणेत्यादिमन्त्रेषु धर्मस्य लक्षणानि प्रकाश्यन्ते ( पृ० ११४ ) इत्युक्तम्, तदप्ययुक्तम्, सर्वधर्मानुगतलक्षणस्येहादर्शनात् । यदपि च-' श्रम' प्रयत्नः, पुरुषार्थ उद्यम, तपो घर्मानुष्ठानम्, तेन श्रमेणैव तपसा च सहेश्वरेण सर्वे मनुष्या सृष्टा रचिताः । अतो वेदेन परमेश्वरज्ञानेन युक्ता सन्तो ज्ञानिनः स्युः । ऋते ब्रह्मणि पुरुषार्थे चाश्रिता ऋत सर्वे: ' सेवमानाश्च सदैव भवन्तु । वेदशास्त्रेण प्रत्यक्षादिभि प्रमाणश्च परीक्षितेनाव्यभिचारिणा सत्येनावृता युक्ता मनुष्याः सन्तु । श्रिया शुभगुणाचरणोज्ज्वलया चक्रवर्तिराज्य सेवमानया प्रकृष्टया लक्ष्म्या वृता युक्ताः परमप्रयत्नेन भवन्तु । यशसा उत्कृष्टगुणग्रहण सत्याचरणं यशः, तेन परितः सर्वतो वृता युक्ताः सन्तः प्रकाशयितारश्च सन्तु' ( पृ ० ११४ ) । अत्र परमेश्वरेण मनुष्या इत्याद्यध्याहार किंमूलक इति वक्तव्यम्? वित्त इत्यस्य ज्ञानिनः स्युरिति कथमर्थः? | वस्तुतस्तु पारम्पर्येण ब्रह्मगवीविषयमेतत् सूक्तम् ॥ ब्राह्मणस्य गोब्रह्मगवी तां क्षत्रियो नादद्यात । आदद्याच्चेद् वाग्वीयं लक्ष्मीस्तं जहाति । ओजआदि नङ्क्ष्यति । सायणादिरीत्या 'वित्तत्ते' इत्येवं पाठः शुद्ध । तथा की प्राप्ति होती है, दूध से साम की प्राप्ति होती है । अश्विनी सम्बन्धी ऋचा से प्रातः सवन, ऐन्द्री से माध्यन्दिन सवन और सारस्वत ऋक् से तृतीय सवन की प्राप्ति होती है । ' प्रकृत में ' नियमित कर्मविशेष के अनुष्ठान से अर्थात् व्रत से दीक्षा को प्राप्ति होती है । ' यहाँ पर दीक्षा पद से संस्कारविशेष कहा जाता है । दीक्षा पद का प्रामाणिक संमत अर्थ यह है- 'जिससे उत्कृष्ट ज्ञान की प्राप्ति होती है, सचित पाप क्षीण हो जाते हैं, उसको दीक्षा कहते है । यह दीक्षा जिसको प्राप्त होती है, उसको उत्कृष्ट लोक की प्राप्ति होती है । ' शतपथ प्रभृति ब्राह्मणो मे सोमादि के प्रकरणो में अनेक प्रकार की दीक्षा का विधान है । उक्त दीक्षा से दक्षिणा, अर्थात् कर्मों के अनुष्ठान में कुशलता प्राप्त होती है । इस कुशलता के आधार पर अपने अन्तःकरण की शुद्धि के द्वारा दीक्षित व्यक्ति आस्तिक्य बुद्धि को प्राप्त करता है । इस आस्तिक्य बुद्धि के सहारे वह सत्य-ज्ञानादि लक्षण ब्रह्म को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है । इसके बाद ' श्रमेण तपसा ' इत्यादि अथर्ववेद के मन्त्र का अभिप्राय वर्णन करते हुए कहा है कि ' सब मनुष्यो को धर्म के इन लक्षणो का ग्रहण अवश्य करना चाहिये ' (पृ० ११४ ), यह कथन भी अयुक्त है, क्योकि सभी धर्मो में अनुगत होने वाला कोई सामान्य लक्षण यहाँ नहीं वर्णित है । आगे इसी की व्याख्या करते हुए जो यह बताया गया है कि -'ईश्वर ने परम प्रयत्न का करना और धर्म का आचरण करना, इन्ही धर्मों से युक्त मनुष्य को रचा है । इस कारण से ब्रह्म अर्थात् वेदविद्या और परमेश्वर के ज्ञान से युक्त होकर सब मनुष्य अपने अपने ज्ञान को बढावें । सब मनुष्य ऋत जो ब्रह्म, सत्यविद्या और धर्माचरण इत्यादि शुभ गुणों का सेवन करें । सब मनुष्य प्रत्य- क्षादि प्रमाणो से सत्य की परीक्षा करके सत्य के आचरण मे युक्त हो । हे मनुष्यो, तुम शुभ गुणों से प्रकाशित होकर 1 चक्रवर्ती राज्य आदि ऐश्वर्य को सिद्ध करके, अतिश्रेष्ठ लक्ष्मी से युक्त होकर, शोभा रूप श्री' को सिद्ध करके, उसके चारो और पहिन कर शोभित हो । सब मनुष्यों को उत्तम गुणो का ग्रहण करके सत्य के आचरण और यश अर्थात् उत्तम कीर्ति से युक्त होना चाहिये ' ( पृ० ११४) । यहा पर 'परमेश्वर ने मनुष्यो को' इन पदो का अध्याहार किस प्रमाण के आधार पर किया गया है? 'वित्त' इस पद का अर्थ 'ज्ञानी होवें' यह किस प्रमाण से किया गया है? वस्तुतस्तु परम्परा से यह सूक्त ब्राह्मण को गाय से संबद्ध है । ब्राह्मण की गाय को क्षत्रिय को नही लेना चाहिये । यदि क्षत्रिय ऐसा करता है, तो वाणी का बल और लक्ष्मी उसको छोड देती है, उसका तेज आदि भी नष्ट हो जाता है । सायणादि भाष्यकारों
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दार्थपारिजात. III च ब्रह्मणा ब्राह्मणेन श्रमेण लौकिकेनोद्यमेन तपसाऽनशनेन कृच्छ्रचान्द्रायणादिना सृष्टा प्राप्ता यद्वा ब्रह्मणा चतुर्मुखेन तपसा सृष्टा ब्राह्मणेन श्रमेणेय वित्ता प्राप्ता ऋते ब्रह्मणिश्रिता । सा च सत्येन सत्यादिधर्महेतुत्वात् सत्येनावृता परिवेष्टिता, सत्यमयीति यावत् । श्रिया सम्पत्त्या सत्यादिहेतुगोमूत्रगोमयादिहेतुत्वात् प्रावृता युक्ता । यशसा परीवृता, यशोहेतुत्वात् । 'स्वधया परिहिता श्रद्धया पर्यूढा गुप्ता यज्ञे प्रतिष्ठिता लोको निधनम्' ( अथर्व ० १२०५। ३ ) | पितृतृप्ति- हेतुपितृपिण्डादिकव्ययुक्तस्वधाकारहेतुत्वाद् इय ब्रह्मगवी स्वधया परिहिता स्वधापरिधानवती श्रद्धया पर्यढा श्रद्धया- स्तिक्यबुद्ध्या पर्यढा परित उद्यमाना दोक्षया सोमदीक्षया गुप्ता सुरक्षिता यज्ञे प्रतिष्ठिता देवयजनरूपे यज्ञे प्रतिष्ठाप गता, लोको आदित्सयाऽस्या अवलोकनमपि निधनं मृत्युहेतुः । 'तामाददानस्य ब्रह्मगवी जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य । अपक्रामति सूनृता वीयं पुण्या लक्ष्मी ॥' इति - सूक्तान्तिमेन मन्त्रेण ब्रह्मगवीप्रसङ्गस्य स्पष्टतयावगमात् । एतदर्थस्तु –'ता पूर्वोक्तविशेषणां ब्रह्मगवीमाददानस्य जिनतस्तस्योद्वेगं जनयतः क्षत्रियस्य सूनृता वाग् वीर्य पराक्रमः, पुण्या लक्ष्मीः समृद्धिश्व, अपक्रामति अपगच्छति ॥ अत एषु मन्त्रेषु सृष्टाः श्रिता मनुष्या इत्यर्थनिर्धारणं पौर्वापर्यविचारवेधुर्यमूलकमेव, तां ब्रह्मगवीमित्युत्तरमन्त्रविरोधात् । यत्तु <-'स्वधया परिहिताः परितः सर्वत स्वकीयपदाथशुभगुणधारणेनैव सन्तुष्य सर्वे मनुष्याः सर्वेभ्यो हितकारिण स्यु ' (पृ० ११५ ) इत्युक्तम् तत्तु नम्य स्वातन्त्र्यमात्रमेव, देवतृप्तिहेतोः स्वाहाशब्दस्येव पितृतर्पणहेतोः स्वधाशब्दस्यार्थानवगमात् । शुभगुणधारणेनैव मनुष्याणां सन्तुष्टिमर्वहितकारित्वसम्भवेन स्वकीयपदार्थशुभगुण- वारणेनेत्युक्तेनिरर्थकत्वात् । स्वधेत्यत्र स्वपदसार्थक्याय तथा व्याख्यानमिति चेत्तथात्वेऽपि नैरर्थक्यानपायात् । के मत से इस मन्त्र का 'वित्तन्ते' यह पाठ शुद्ध है । इस मन्त्र का सही अर्थ इस प्रकार है -'ब्राह्मण ने चौकिक उद्यम के सहारे और कृच्छ्र चान्द्रायण प्रभृति तपस्या करके इसको प्राप्त किया है । अथवा चतुर्मुख ब्रह्मा ने ब्राह्मण के सदृश तप करके इसको प्राप्त किया है । इसीलिये यह ऋतरूप ब्रह्म में प्रतिष्ठित है । यह सत्य अर्थात् सत्यादि धर्म की कारणभूत होने से आवृत्त है, परिवेष्टित है, अर्थात् सत्यमयी है । यह गाय सत्यादि आचरण में कारणभूत गोमूत्र, गोमय आदि की जननी है, अतः यह यत्र से चारों तरफ घिरी हुई है, क्योकि यह ब्राह्मण का यश बढाने में कारणभूत है' । 'स्वषया ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है -' यह ब्राह्मण की गाय पितरो की तृप्ति के कारण पितृपिण्ड प्रभृति कव्यसे युक्त स्वधाकार में की निष्पत्ति में प्रधान कारण होती है, इसलिये यह स्वधाकार से परिहित अर्थात् परिधान वाली होकर श्रद्धा बुद्धि का आश्रय बनती है । यह सोमादि यागो में प्राप्त की गई दीक्षा से सुरक्षित होकर यज्ञ में प्रतिष्ठित होती है । इस गाय को जो व्यक्ति ग्रहण करने की इच्छा से देखता है, वह भी उसकी मृत्यु का कारण हो सकता है' । इस सूक्त के अन्तिम मन्त्र 'तामाददानस्य' में यह प्रसंग ब्राह्मण की गाय से संबद्ध है, इसकी स्पष्ट प्रतीति हो जाती है । इसका अर्थ इस प्रकार है - ' पूर्वोक्त विशेषणो से युक्त इस ब्राह्मण की गाय को जो क्षत्रिय लेना चाहता है और इस प्रकार उस ब्राह्मण को उद्विग्न करना चाहता है, उसको सूनृत वाणी, पराक्रम, पुण्यप्रद लक्ष्मी और समृद्धि छोडकर चली जाती है । अत: इन मन्त्रों में 'सृष्ट' पद का ' सहारा लेने वाले मनुष्य' यह अर्थ करना पूर्वापर प्रकरण का विचार न कर पाने को ही सूचित करता है, क्योकि आगे के मन्त्र में परिदृष्ट 'ब्रह्मगवी' पद से इसकी संगति किसी भी प्रकार से नही बैठती । इस मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार की जाती हैं कि 'सब प्रकार से मनुष्य लोग स्वधा अर्थात् अपने ही पदार्थों का धारण करें । इस अमृत रूप व्यवहार से सदा युक्त हो' ( पृ० ११५ ) । यह अर्थ व्याख्याकार को स्वतन्त्र प्रवृत्ति का द्योतक है, क्योकि स्वाहा शब्द जैसे देवताओं की तृप्ति का द्योतक है, उसी प्रकार स्वधा शब्द पितृवर्ग की तृप्ति के लिये प्रयुक्त होता है, इस अर्थ की उनको प्रतीति नही है । शुभ गुणो के धारण करने से ही मनुष्यों की सन्तुष्टि और सर्वहितकारिता संभव हो सकती है, अतः स्वकोय पदार्थ अर्थात् शुभ गुण का धारण करना, यह कथन सर्वथा निरर्थक है । 'स्वधा' शब्द में स्वपद की सार्थकता के लिये ऐसी व्याख्या करने
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वेदार्थपारिजाता ११६० स्वकीय- परकीय- माधारणपदार्थगुणधारणम्य तदपेक्षयाप्युत्कर्षाधायकत्वाच्च । परिहिता इत्यस्य हितकारिण इति , व्याख्यानमपि निराधारमेव । श्रद्धया ऊढाः प्राप्तवन्त इत्यप्यसङ्गतम् किं प्राप्तवन्त इत्यनुक्तेः । दीक्षापदस्य सद्भिः कृतः सत्योपदेश इत्यर्थेऽपि मूलमपेक्षितम् । यज्ञपदस्य देवयजनरूप प्रसिद्धार्थमपहायेतस्ततो मुधैव परिधावनम् । लोको निधनमित्यस्य अयं लोकः सर्वेषां मनुष्याणा निधन यावन्मृत्युर्न भवेत्तावत्सर्वोपकारकं सत्कर्मानुष्ठान कर्तुं ' योग्यमस्तीति सर्वैर्मन्तव्यमिति व्याख्या तु सर्वथापि निरगंला । लोकनिधनशब्दयो मामानाधिकरण्यानुपपत्ते । यावन्मृत्युर्न भवेत् तावत्मत्कर्मानुष्ठान कर्तु योग्यमित्यस्यार्थस्य बोधकपद नुपलब्धे । यच्च - ' ओजश्च सहश्च, सहश्च बलं च, वाक् चेन्द्रिय च, श्रीश्च धर्मश्च' ( अथर्व ० १२ | ५| ३ | ७ ) इत्यस्य व्याख्याने उक्तम्—' ओजो न्यायपातनान्वित पराक्रमः, तेज. प्रगल्भता घृष्टता निर्दीनता च सत्ये व्यवहारे कर्तव्या । सहश्च सुखदुःखहानिलाभक्लेशप्रदवर्तमानप्राप्तावपि हर्षशोकाकरणं तन्निवारणार्थं परमप्रयत्नानुष्ठानं महन च सर्वे सदा कर्तव्यम् । बलं च ब्रह्मचर्यादिनियमाचरणेन शरीरबुद्धयादिरोगनिवारणं दृढाङ्गता निश्चलबुद्धित्वसम्पादन भीषणकर्मयुक्तं बलं च कार्यम, वाक् च विद्याशिक्षासत्यमधुरभाषणादिशुभगुणयुक्ता वाणी कार्या । इन्द्रिय मनआदीनि वाग्भिन्नानि षड्ज्ञानेन्द्रियाणि नत्यधर्माचरणयुक्तानि पापाद् व्यतिरिक्तानि च सदैव रक्षणीयानि 1। श्रीश्च सम्राड्राज्यश्रीः परमपुरुषार्थेन कार्येति । धर्मश्चायमेव वेदोक्तो न्याय: पक्षपातरहितः सत्याचरणयुक्तः सर्वोपकारकश्च धर्म सदैव सर्वैः सेवनीयः । अस्यैवेय पूर्वापरा सर्वा व्याख्यास्तीति बोध्यम्' ( पृ० ११५ ) इति । सर्वमप्येतद् व्याख्यान यादृच्छिक मन्त्राक्षरार्थसम्बन्धशून्यम् । सर्वत्रैव च यदृच्छयैव क्रियापदाध्याहार इत्येतदपव्याख्यानमेव, पूर्वापरविरुद्ध चैतत्, तानि सर्वाण्यपक्रामन्ति ब्रह्मगवीमाददानस्य जिनतो ब्राह्मण क्षत्रियस्ये- पर भी उसकी निरर्थकता का अपाकरण नही हो पाता । स्वकीय और परकीय सर्व साधारण गुणो को धारण करना, उससे भी अधिक श्रेयस्कर है । 'परिहिता' इस पद का 'हितकारी' यह अर्थ करना भी निराधार है । 'श्रद्धा से प्राप्त किया' यह अर्थ भी असंगत है, क्योकि क्या प्राप्त किया? इसका उत्तर नही दिया गया है । दोक्षा पद का अर्थ 'सज्जनो द्वारा किया गया सत्य उपदेश' यह करने में भी कोई आधार अपेक्षित है । यज्ञ पद का देवयजन रूप प्रसिद्ध अर्थ न कर इधर-उधर हाथ मारना व्यर्थ है । 'लोको निधनम्' इसका अर्थ यह लोक सब मनुष्यों का मृत्यु पर्यन्त उपकार और सत्कर्मों का अनुष्ठान करने के योग्य है, ऐसा सबको जानना चाहिये, यह व्याख्या भी सर्वथा निरर्गल है, क्योकि लोक और निधन शब्द का सामानाधिकरण्य नहीं बन सकता । जबतक मृत्यु नही होती, तब तक सत्कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिये, इस अर्थ के बोधक पद यहा उपलब्ध नही है । , ' ओजश्च सहश्च ० ' इस मन्त्र की व्याख्या में कहा गया है- 'ओज धर्म के पालन से युक्त पराक्रम, तेज प्रगल्भता, अर्थात् भयरहित होकर दीनता से दूर रहना, सह सुख- दुख, हानि-लाभ आदि की प्राप्ति मे भी हर्ष-शोकादि छोडकर सत्यधर्म मे दृढ रहना, दुःख का निवारण और सहन करना, बल ब्रह्मचर्य आदि अच्छे नियमो से शरीर का आरोग्य, बुद्धि की चतुराई आदि बल का बढाना, वाक् सत्यविद्या की शिक्षा, सत्य-मधुर अर्थात् कोमल प्रिय भाषण करना, इन्द्रिय मन, पांच ज्ञानेन्द्रियों और पाच कर्मेन्द्रियों को पाप कर्मों से रोक कर सदा सत्य पुरुषार्थ में प्रवृत्त रखना, श्री चक्रवर्ती राज्य की सामग्री को सिद्ध करना, धर्म वेदोक्त न्याय से युक्त होकर पक्षपात को छोड़कर सत्य ही का सदा आचरण और असत्य का त्याग करना तथा जो सबका उपकार करने वाला और जिसका फल इस जन्म और परजन्म में आनन्द है, उसी को धर्म और उनसे उलटा करने को अधर्म कहते है । उसी धर्म की यह सब व्याख्या हैं, जो कि ' सगच्छध्वं' इस मन्त्र से लेकर ' यतोऽभ्युदय ० ' इस सूत्र तक जितने धर्म के लक्षण लिखे हैं, वे सब लक्षण मनुष्यो के लिये ग्रहण करने के योग्य हैं । इससे पहले कही गई और आगे कही जाने वाली सब व्याख्याएं इसी की है ' ( ११५-११६ ) । यह पूरा व्याख्यान मनमाना है, मन्त्रो के अक्षरो के साथ इसका कोई संबन्ध नही है । सभी जगह अपने मन के माफिक क्रिया पद का अध्याहार कर लिया गया है । इसलिये यह पूरा गलत है । पूर्वापर से इसका कोई संबन्ध नहीं है । 'तानि सर्वाणि' इस