वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 271–280
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 271–280
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११७१ व्यापकाद् व्याप्यस्य संयोगसम्बन्धत्वात् । ( सह ) यत सर्व महते तस्मात् स एवै सहोऽस्ति । म खन्बैक एव वर्तते, न कश्चिद् द्वितीयस्तदधिकस्तनुत्यो वा एकशब्दस्य त्रिर्ग्रहणात् । अन सजातीय-विजातीय स्वगतभेद राहित्यमीश्वरे , वर्तते। एव द्वितीयस्येश्वरस्यात्यन्ननिषेधात् । कस्मात् एकवृदेक एवेत्युक्तत्वात् । स एष एव एकवत एकेन चेतनमात्रेण वस्तुनैव वर्तते । पुनरेक एवासहायः सन् य इद सकल जगद् रचयित्वा धारयतीत्यादिविशेषणयुक्तोऽम्ति, तस्य सर्वशक्तिमत्त्वात् । अस्मिन् सर्वशक्तिमति परमात्मनि सर्वे देवा पूर्वोक्ता वस्वादय एकवृत एकाधिकरणा एव भवन्ति । अर्थात् प्रलयानन्तरमपि तत्सामर्थ्य प्राप्यैकवृत्तयो भवन्ति' (पृ० १०४-१०५ इति) । तदेतदप्यविचारितरमणीयम्, पूर्वापरसम्बन्धशून्यत्वात् । किञ्च द्वित्वनिषेधेनैव तृतीयत्वादिनिषेधसम्भवे- नेतरनिषेधस्य वैयर्थ्य दुष्परिहरम् । एकपदेनैकत्वविधानसम्भवेनापि द्वितीयादिनिषेधेनै केश्वरविधानस्यानुपयोग एव । किञ्चानेकेश्वराणामैकमत्येन कार्यकरत्वे समुदायस्यैवेश्वरत्व न प्रत्येकस्य । प्रत्येकस्येश्वरत्वे वैमत्येन विरुद्धकार्य - सम्भव. । नह्येकस्य प्रपञ्चस्य युगपत् परिपिपालयिषाया सजिहीर्षाया च सत्या विरुद्वाभीष्टसिद्धि सम्भवति । द्विती- यस्योपासननिषेधोऽपि गगनकुसुमायित एव मन्त्रे तादृपदाभावात् । समुद्धृतमन्त्रेषु स एक. सर्वान् पश्यति न स कस्यापि दृश्यो भवतीत्यस्यार्थस्यापि वोधक. कश्चन शब्दो नास्ति । येनेदं सर्वं जगद् व्याप्त तमेवेद प्राप्तमस्तीत्यपि नाक्षरगम्योऽर्थं' । एकशब्दस्य त्रिर्ग्रहणेनापि तदाधिवयतत्तौत्यनिषेधकत्व कथम्? नहि पुनरुक्त्या शब्दानामपर्याय- वाचकता सम्भवति । नापि त्वदभिमते परमेश्वरे सजातीयविजातीयस्वगतभेद निषेधः सम्भवति, तस्यान्योन्याभाव- प्रतियोगित्वात् । एकेन चेतनमात्रेण वस्तुनैव वर्तत इत्यपि त्वद्रीत्या न सम्भवति, परमेश्वरस्य भोक्तृवर्गेणेव भोग्यवर्गेणापि सह वर्तमानत्वात् । तदपेक्षया एक एव वर्तत इत्यस्यैव सुवचत्वात् । पुनरेक एवासहाय इत्यशोऽपि निराधार एव । भी भेद नही और वह शून्य भी नही है । किन्तु जो सच्चिदानन्द आदि लक्षणो से युक्त, एकरस परमात्मा है, वही सदा से जगत् में परिपूर्ण होकर, पृथिवी आदि सब लोको को रचकर अपने मामर्थ्य से उनको ध रण कर रहा है । वह अपने कार्य में किसी की सहायता नही लेता, क्यो कि वह सर्वशक्तिमान् है । उसी परमात्मा के सामर्थ्य से वसु आदि सब देव, और पृथिवी आदि लोक ठहर रहे है और प्रलय मे भी उसके सामर्थ्य से लय होकर उसी में कारण रूप से बने रहते हैं ' ( पृ० १०५) । उक्त व्याख्या भी जब तक इस पर विचार नही किया जाता, तभीतक भली लगती है, क्योकि इस व्याख्या मे पूर्वापर प्रकरण से कोई सम्बन्ध नही है । इस व्याख्या मे यह भी दोष है कि जब द्वित्व का निषेध कर दिया गया तो उसी से त्रित्वादि का निषेध भी हो गया, तब पुन, इनका निषेध करना एक व्यर्थं का व्यापार हुआ । एक पद से भी जब एकत्व का विधान हो गया तो फिर द्वितीयादि का निषेध कर पुन एकत्व का विधान करना भी उसी तरह से व्यर्थ है । अनेक ईश्वर यदि मिलकर कोई काम करते है, तो समुदाय मे ही ईश्वरत्व मानना पडेगा, प्रत्येक में नही । प्रत्येक में यदि ईश्वरत्व माना जाय तो इनमे परस्पर विमति होने पर विरुद्ध कार्य होने लगेंगे । एक ही प्रपंच की परिपालन करने की और संहार करने की इच्छा यदि एक साथ होती है, तो ऐसी परिस्थिति मे परस्पर विरोधी अभीष्ट कार्य कैसे सिद्ध हो सकते है? द्वितीय की उपासना का निषेध भी आकाशकुसुम के समान है । मन्त्र मे इसका प्रतिपादक कोई पद है भी नही । ऊपर उद्धृत मन्त्रों में वह एक सबको देखता है, उसको कोई देख नहीं सकता, इस अर्थ के बोधक शब्द भी उपलब्ध नही है । जिससे यह सारा जगत् व्याप्त है, उसी परमात्मा को यह प्राप्त करना है, यह अर्थ भी मन्त्राक्षरो से नही निकलता । एक शब्द के तीन बार ग्रहण करने परभी उससे आधिक्य अथवा समानता का निषेध कैसे होगा? एक शब्द का बार बार उच्चारण करने पर उसकी अपर्यायता अर्थात् अर्थ मे भेद नही हो जाता । आप ईश्वर को जल स्वरूप स्वीकार करते हैं, उसमे सजातीय, विजातीय और स्वगत भेद का निषेध भी नही बन सकता, क्योकि वह अन्योन्याभाव का प्रतियोगी है । केवल एक चेतन वस्तु की ही सत्ता है, यह बात भी आपके मत के अनुसार नहीं बन सकती, क्योंकि परमेश्वर भोक्ता वर्ग के साथ ही नही, भोग्य वर्ग के साथ भी रहता है । इसकी अपेक्षा से तो यही कहना ठीक था कि वह अकेला ही है । पुनः आगे यह लिखना कि वह अकेला असहाय है, यह भी निराधार ही है!
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संवार्थपारिजातः ११७२ वस्तुतस्तु तृतीयेऽनुवाके -' स एति सविता स्वदिवस्पृष्ठेऽविचाकशत्' इत्यारभ्य 'तस्येमे नव कोशा विष्टम्भाहिताः' इत्यन्तैर्मन्त्रः स परमेश्वरः सविता सन् दिवस्पृष्ठेऽविचाकशत् प्रकाशते, स एव रश्मिभिराभृत पूर्ण नभो महेन्द्र आवृत आवर्तनशील एति । स एव विधर्ता वायुरुच्छ्रित नभ एति । स एवार्यमा स वरुणः स महादेवो रुद्रः सौऽग्निः स एव सूर्यः स एव महायम. । त परमेश्वरमेते दश वत्सा इवोपाश्रित्य तिष्ठन्ति । कीदृशास्ते एकशीर्षाण एक प्रधान परमात्मतत्त्वं शीर्षस्थानीय येषु ते एकशीर्षाणः, ते चाधिष्ठानाधिष्ठेयभावेन युक्ता अधिष्ठानशीर्षसहिता दश भवन्ति । अधिष्ठानभूतमेक परमात्मान निगतम् । 'न द्वितीयो न ततीयः' इत्यादिभिस्तेषामेव निषेधः क्रियते । ' अध्यारोपापवादाभ्या निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते' इति न्यायात् । 'स सर्वस्मं पश्यति यच्च प्राणति यच्च न' इत्यंशो दयानन्देन स्वामिना नोद्धृतः तस्यार्थ एव सङ्कलितः । यच्च प्राणति प्राणिजात जङ्गम यच्च न प्राणति भोग्यजात स्थावरं वा सर्वस्मै पश्यति । सर्वहिताय पश्यति स्वरूपभूतया दृष्ट्या सर्व पूर्वोक्त' भोग्यभोक्तृजात सत्तावत्स्फूर्तिमच्च करोति । इदं सचेतनाचेतनं तमेव निगत तस्मिन्नेवाश्रितम्, तस्मिन् कल्पितत्वात् । स एष एक. सर्वकारणत्वात्, सर्वस्य तदनतिरिक्तत्वात्, तद्भेदकत्वासम्भवात् । तदेवाहैक एको वर्तते भोक्तृभोग्यरूपेणेत्येकवृत् । एक एव भोक्तृभोग्यरूपेण भासमानोऽप्येक एकधिष्ठानस्यैव परमार्थत्वात्, तदितरस्य कल्पितत्वेनापरमार्थत्वात् । सर्वे पूर्वोक्ता देवा एकस्मिन् ' परमात्मन्येव वर्तन्त इत्येकवृतो भवन्ति सन्ति । स पर्यगाच्छक्रमिति मन्त्रस्त्वन्यत्र व्याख्यातः । अथ वेदोक्तधर्मविषयः वेदोक्तधर्मविषयप्रसङ्गे यदुक्तम्-' सङ्गच्छध्व संवदध्वं स वो मनांसि जानताम् । देवा भाग यथा पूर्वे सजानाना उपासते ॥ ' ( ऋ ० स ० १ । १ ९ १।२ ) । व्याख्यात चेत्थम्- 'हे मनुष्या' मयोक्तं न्याय्य पक्षपातरहित सत्यलक्षणोज्ज्वलं वस्तुतः तीसरे अनुवाक में 'स एति सविता' यहा से लगा कर ' तस्येमे नव कोशा' इस मन्त्र तक उस परमेश्वर की ही स्तुति की गई है । इसका अर्थ यह है कि ' वह परमेश्वर सविता के रूप में आकाश में प्रकाशित होता है । वही अपनी किरणों से आकाश को भर कर महेन्द्र के समान निरन्तर आता जाता रहता है । वही विधर्ता वायु होकर इस उन्नत आकाश में विचरण करता है । वही अर्यमा, वरुण, महादेव रुद्र, अग्नि, सूर्य और महायम है । उस परमेश्वर को ये दस प्राण बछडे के समान आश्रित करके रहते हैं 1। ये प्राण कैसे है? एक प्रधान परमात्मतत्त्व इनके शीर्षस्थान में विद्यमान है । इनमे अधिष्ठान और अधिष्ठेय भाव है । इन में अधिष्ठान शीर्ष- स्थानीय है । उसके साथ ये दस होते है । अधिष्ठानभूत प्राण हा परमात्मा मे स्थित है, द्वितीय तृतीय आदि नही । इस श्रुति मे इन्ही का निषेध किया गया है । 'अध्यारोप और अपवाद के द्वारा ही निष्प्रपंच ब्रह्म को प्रपंचमय बना दिया जाता है ' यह न्याय यहा लागू होता है । इस प्रकरण का 'स सर्वस्यै० ' इत्यादि मन्त्र दयानन्द ने उद्धृत नही किया, केवल उसके अर्थ का संकलन कर लिया । इसका अभिप्राय यह है कि जो जंगम प्राणी श्वास-प्रश्वास लेते है और जो स्थावर भोग्य वस्तु इस प्राणन क्रिया से रहित है, यह परमात्मा उन सबको देखता है । वह अपनी स्वाभाविक दृष्टि से इस लिये देखता है कि सबका कल्याण हो । वह इस भोक्ता और भोग्यस्वरूप पूरे संसार को अपनी दृष्टि से स्फूर्तिमान् बना देता है । यह सचेतन और अचेतन जगत् उसी परमात्मा में आश्रित है, क्योंकि यह उसी में कल्पित हैं । वह अकेला ही है, क्योंकि वही सबका कारण है । उसके अतिरिक्त और किसी की भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, अतः उसका कोई भेदक नहीं हो सकता । वह अकेला ही भोक्ता और भोग्य रूप में विद्यमान है, अतः वह 'एकवृत्' कहलाता है । भोक्ता और भोग्य , रूप प्रतीत होने पर भी यह अकेला है क्योकि अधिष्ठान की ही यथार्थ स्थिति मानी जाती है । इस परमात्मा रूपी अधिष्ठान में अन्य सब भोक्ता भोग्य रूप जगत् कल्पित है, अतः उसकी परमार्थ सत्ता नही मानी जाती । ये पूर्वोक्त सभी देव एक परमात्मा में ही रहते हैं, अतः वे भी ' एकवृतः' कहलाते हैं । इसी प्रकरण के अन्त में स्वामी दयानन्द ने 'स पर्यंगात्' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत करके भी अपने मनोरथ को सिद्ध करने प्रयत्न किया है । इसकी व्याख्या हमने अन्यत्र की है ।
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मेष पारिजात ११७३ . धर्म यूय सङ्गच्छध्वं सम्यक् प्राप्नुत । अर्थात् तत्प्राप्त्यर्य सर्व विरोध परिहाय परस्पर तङ्गता भव । येन युष्माक- मुत्तम सुख सर्वदा बर्खेत, सर्वदु खनाशश्च भवेत् । सवदध्व सङ्गत भूत्वा परस्पर जल्पवितण्डादिविरुद्धवाद विहाय संप्रीत्या प्रश्नोत्तरविधानेन सदाद कुरुत । यतो युष्मासु सम्यक् सत्यविद्याद्युत्तमगुणा दा बबेरत् । स वो मनासि जानताम् । यूय जानन्तो विज्ञानमन्तो भवत । जानता वो युष्माक मनासि यथा ज्ञानवन्ति भवेयुस्तथा सम्यक् पुरुषार्थं कुरुत । अर्थाद् येन युष्मन्मनासि सदानन्दयुक्तानि स्युस्तथा प्रयतध्वम् । युष्माभिर्धर्म एव सेवनीयो नाधर्म इत्यत्र दृष्टान्त उच्यते - देवा यथा पूर्वे सञ्जानाना ये सम्यग् ज्ञानवन्तो देवा विद्वास आप्ता. पक्षपातरहिता ईश्वरधर्मोपदेश-प्रिया आसन् युष्मत्पूर्व विद्यामधीत्य वर्तन्ते, कि वा ये मृतास्ते यथाभागं यजनीय सर्वशक्तिमदादिलक्षणमोश्वर मदुक्त धर्मं चोपासते, तथैव युष्माभिरपि स एव धर्म उपासनीयः । यतो वेदप्रतिपाद्यो धर्मो निःशङ्कतया विदितश्च भवेत्' ( पृ ० १०६ ) इति । यद्यप्ययमुपदेशोऽतिसुन्दरस्तथापि नायं मन्त्रस्यार्थो भवति । सर्वैः सर्वोपकारः कर्तव्य, धर्मेण परस्पर रक्षन्तु, इत्याद्युपदेशो नायुक्तस्तथाप्यसी नोक्तमन्त्रार्थत्वेन वर्णयितुं शक्यः, मन्त्राक्षराननुगमात् । तथाहि— नास्मिन् ,,, मन्त्र केनचिदपि शब्देन धर्मश्वच्यते न वात्र धर्मस्य लक्षण दृश्यते । पक्षपातरहितः न्याय्यः सत्याचरणयुक्तो धर्म इत्यशस्य दूरतोऽपि वोधकः कश्चन शब्दो मन्त्रे नोपलभ्यते । येन युष्माकमुत्तमं सुख वर्धेत दुःखविनाशश्च भवेदित्यपि न मन्त्रगम्योऽर्थः । जानन्तो विज्ञानवन्तो भवत इत्यशोऽपि मन्त्रार्थवहिर्भूतः । जानतां वो युष्माक मनासि यथा ज्ञानवन्ति भवेयुस्तथा पुरुषार्थं कुरुत, येन युष्मन्मनासि सदानन्दयुक्तानि स्युस्तथा प्रयतध्वमित्यपि निर्मूलम् । वेदो की रीति से धर्म के लक्षरग वेदो की रीति से धर्म के लक्षण बताने के प्रसंग मे दयानन्द ने ' संगच्छध्वं ० ' इत्यादि मन्त्र को उद्धृत कर उसकी इस --तरह से व्याख्या की है – 'देखो, परमेश्वर हम सभी के लिये धर्म का उपदेश करता है कि हे मनुष्यो । जो पक्षपातरहित, न्याय, सत्याचरण से युक्त धर्म है, तुम लोग उसी को ग्रहण करो, उससे विपरीत कभी मत चलो, किन्तु उसी की प्राप्ति के लिये विरोध को छोड़ कर परस्पर संगति में रहो, जिससे तुम्हारा उत्तम सुख सब दिन बढता जाय और किसी प्रकार का दुःख न हो । तुम लोग विरुद्ध वाद को छोड कर परस्पर अर्थात् आपस में प्रीति के साथ पढना-पढाना, प्रश्न -उत्तर सहित संवाद करो, जिससे तुम्हारी सत्यविद्या नित्य बढती रहे । तुम लोग अपने यथार्थ ज्ञान को नित्य बढाते रहो, जिससे तुम्हारा मन प्रकाशयुक्त होकर पुरुषार्थ को नित्य बढावे, जिससे तुम लोग ज्ञानी होकर नित्य आनन्द में बने रहो । तुम लोगो को धर्म का ही सेवन करना चाहिये, अधर्म का नही । जैसे पक्षपात रहित धर्मात्मा विद्वान् वेदरीति से सत्य धर्म का आचरण करते हैं, उसी प्रकार से तुम भी करो । क्योंकि धर्म का ज्ञान तीन प्रकार से होता है -एक तो धर्मात्मा विद्वानो की शिक्षा, दूसरा आत्मा की शुद्धि तथा सत्य को जानने की इच्छा और तीसरा परमेश्वर की कही वेदविद्या को जानने से ही मनुष्यों का सत्य- असत्य का यथावत् बोध होता है, अन्यथा नहीं' (पृ० १०६- १०७) । यद्यपि यह उपदेश बहुत सुन्दर है, किन्तु यह मन्त्र का अर्थ नही है । सब सब का उपकार करें । धर्मानुसार एक दूसरे की रक्षा करें । इस तरह का उपदेश अनुचित नही है, किन्तु यह अर्थ उस मन्त्र में से निकलता है, ऐसा नही कहा जा सकता, क्योकि इस अर्थ के बोधक पद उस में नही है । जैसे कि इस मन्त्र में किसी भी शब्द से धर्म की चर्चा अथवा उसका लक्षण यहाँ किया जा रहा है, ऐसी प्रतीति नही होती । पक्षपात से रहित, न्याय्य, सत्याचरण से युक्त धर्म है, इस बात को खेचतान करके भी बताने वाला कोई अंश मन्त्र में नही मिलता । जिससे आपका उत्तम सुख बढे और दुःख का विनाश हो, इस बात की भी मन्त्र में कोई चर्चा नही है । आप इसको ठीक तरह से जाने, यह अंश भी मन्त्र के बाहर का ही है । इस सत्यविद्या को जानकर तुम लोग अपने यथार्थ ज्ञान को नित्य बढाते रहो, जिससे कि तुम्हारा मन सदा आनन्द से भर जाय, ऐसा प्रयत्न करो, यह कथन भी निर्मूल है । तुमको धर्म का ही सेवन करना चाहिये अधर्म का नही । इसमें देवताओ का दृष्टान्त देकर देवता पद का अर्थ विद्वान् किया गया है । इसका हम खण्डन कर 1 1
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११७४ वेदार्थपारिजातः . युष्माभिर्धर्मं एवं सेवनीयो नाधर्मश्चेत्यत्र दृष्टान्त, देवा विद्वास इत्यपि खण्डितमेव । भाग सर्वशक्तिमदादिलक्षण- मीश्वरमित्यपि निर्मूलम् । तस्मात् सायणसम्मत एवार्थो युक्त । तथाहि- हे स्तोतार ( नात्र सर्वे मानवाः सम्बोधनार्हा, उपनयनादिसंस्कारवतामेव वेदाध्ययनश्रवणा- द्यधिकारात् ) यूय सङ्गच्छध्व सङ्गता भवत । 'समो गम्यृच्छिभ्याम्' ( पा ० सू ० १।३।२ ९ ) इत्यादिना तदर्थमेवात्मने- पदविधानात् । धर्मरूपस्य कर्मणोऽश्रवणादपि नात्र प्राप्त्यर्थो गमि. । सवदध्वं सह वदत परस्पर विरोध परित्यज्यैक- विधमेव दाक्य ब्रूतेति यावत् । नात्र जल्पवितण्डापरित्यागेन वादकथाविधान क्रियते, वादकथायाः शिष्टाचार्य- पूर्वकत्वात् । शिष्याचार्यसवादस्तु 'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यामितव्य.' (वृ० उ० २| ४| ५ ), ' तद्विजिज्ञासस्व' ( तै ० उ० ३| १ | १ ) इत्यादिश्रुतिभिर्विहित एव । अत एव ' व्यक्तवाचा समुच्चारणे' ( पा ० सू० १।३।५८ ) इति वदेरात्मनेपदम् । वो युष्माक मनासि सजानता समानमेकरूपमेवावगच्छन्तु वैमत्यमपहाय धर्मनीत्यादिकार्येष्वैकमत्यमेव युष्माक । भवत्वित्यर्थः । 'सम्प्रतिभ्यामनाघाने' ( पा ० सू० १ | ३ | ४६ ) इति जानातेरात्मनेपदम् । यथा पूर्वे पुरातना देवा सञ्जानाना ऐकमत्य प्राप्ता भाग हविर्भाग यथास्वं स्वीकुर्वन्ति तथैव यूयमपि वैमत्य परित्यज्य स्वीय धनादिक गृह्णन्त्वित्यर्थ । देवसम्वन्धाद् भागशब्देन हविर्भाग एवात्र ग्रहीतुमर्हः । भागशब्दस्य प्रसिद्ध हविर्भागमर्थमपहाय सर्वशक्तिमदादिलक्षण ईश्वरोऽर्थोऽप्रसिद्धोऽप्रासङ्गिकश्चेति । एवमेव देवशब्दस्य मुख्यं विशिष्टैश्वर्योपेतयोनि विशेष- मर्थ विहाय जीवन्तो नृता वा विद्वास एव देवा इत्यर्थग्रहणामपि न युक्तम्, प्रसिद्धपरित्यागेत प्रसिद्धकल्पनस्यान्याय्य- त्वात् । यथेति दृष्टान्तसूचक शब्दो भवति ॥ दृष्टान्तश्चाविसवाद्येव भवति । नहि मनुष्याणा जीवता मृताना वा देवत्व प्रसिद्धम् अविसवादि वा । न वा भागपदस्य धर्म ईश्वरो वार्थ. प्रसिद्धोऽविसवादी वा । किञ्च यान् प्रत्ययमुपदेशस्तेऽपि विद्वांस एवेति न तान् प्रति त एव दृष्टान्ताः सम्भवन्ति, अविदुषा मन्त्रार्थग्रहणसामर्थ्यासम्भवात् । तस्मात् सायणसम्नत एवार्थो विजयते । |, चुके भाग पद का अर्थ सर्वशक्ति सम्पन्न ईश्वर किया गया है इसमें भी कोई प्रमाण नही है । इसलिये मायण समत अर्थ ही यहाँ उचित माना जायगा । सायण का अर्थ इस प्रकार है- हे स्तुति करनेवालो, (यहाँ पर सभी मानव संबोधित नही हो सकते, क्योंकि उपनयन आदि संस्कार से संस्कृत व्यक्तियो को ही वेदाध्ययन, श्रवण आदि का अधिकार है ) तुम लोग एक साथ हो जाओ । इसी अर्थ को द्योतित करने के लिये यहाँ पर ' समो गम्य० ' इत्यादि पाणिनि सूत्र से आत्मनेपद का विधान होता है । धर्मरूप कर्म का श्रवण संभव नही है, इसलिये भी यहाँ पर गम् धातु का अर्थ प्राप्ति नही किया जा सकता । तुम लोग परस्पर विरोध छोड कर एक तरह की बात करो । यहाँ पर जल्पवितण्डा को छोड़ कर वाद कथा का विधान नही किया गया है, क्योकि वाद कथा शिष्य और आचार्य के बीच होती है । शिष्य और आचार्य का सवाद 'श्रोतव्यो मन्तव्य, तद्विजिज्ञासस्व ० ' इत्यादि श्रुतियो में कहा गया है । इसी लिये यहाँ पर ' व्यक्तवाचां समुच्चारणे ' इस पाणिनि के नियम के अनुसार आत्मनेपद का विधान हुआ है । तुम्हारे मन एक तरह की बात जानें, अर्थात् धर्म, नीति आदि कार्यों में तुम लोगो में परस्पर ऐकमत्य हो । यहाँ पर भी 'सम्प्रतिभ्या०' इत्यादि पाणिनि सूत्र के अनुसार ज्ञा धातु से आत्मनेपद हुआ है । जैसे पुरातन देवतागण एकमत होकर अपने अपने हविर्भाग को स्वीकार करते है, उसी तरह से तुम लोग भी परस्पर वैमनस्य छोडकर अपने भाग में प्राप्त धनादि का ग्रहण करो । देवता के सम्बन्ध से भाग शब्द से यहाँ पर हवि का ही ग्रहण किया जा सकता है । भाग शब्द के इस प्रसिद्ध अर्थ को छोड़कर उसका सर्वशक्तिमान् ईश्वर, यह अर्थ करना अप्रसिद्ध और अप्रासंगिक है । इस तरह से देव शब्द के भी 'विशिष्ट ऐश्वर्यं से युक्त योनिविशेष' इस मुख्य अर्थ को छोड़कर जीवित अथवा मृत विद्वान्, यह अर्थ करना भी उचित नही है । प्रसिद्ध को छोडकर अप्रसिद्ध की कल्पना करना अनुचित हैं । यथा यह दृष्टान्त सूचक शब्द है । दृष्टान्त ऐसा दिया जाता है, जिसमे किसी को विवाद न हो । जीवित अथवा मृत मनुष्यो के लिये देवता शब्द का प्रयोग न तो प्रसिद्ध है और यह सर्वसंमत ही है । इस तरह से भाग पद का भी धर्म अथवा ईश्वर अर्थ न तो प्रसिद्ध हो है और न सर्वसंमत ही है । दूसरी बात यह भी है कि जिनको यह उपदेश
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वेदार्थपारिजात ११७५ 'ममानो मन्त्र समिति समानी ममान मन मह चित्तमेषाम् । समान मन्त्रमभिमन्त्रये व समानेन वो ( )!हविपा जुहोमि । ऋ० सं० ४० १ ९ १६ हे मानवा वो युष्माक मन्त्रोऽर्थान्मामीश्वरमारभ्य पृथिवीपर्यन्ताना गुप्तप्र मद्धसामर्थ्यगुणाना पदार्थाना भावणमुपदेशन ज्ञान वा भवति यस्मिन् येन वा स मन्त्री विचारो भवितुमर्हति । तद्यथा राज्ञो मन्त्री सत्यासत्यविवेककर्ता सोऽपि सत्यज्ञानफल सर्वोपकारक समानस्तुल्योऽर्थाद्विरोधरहित एव भवतु । यदा बहुभिर्मनुष्यैमिलित्वा सन्दिग्धपदार्थाना विचार कर्तव्यो भवेत् तदा प्रथमत पृथक् पृथगपि सभासदा मतानि भवेयु ॥ तत्रापि सर्वेभ्य. सार गृहीत्वा यद्यत्सर्वमनुष्य हितकारक सद्गुणलक्षणान्वित मत स्यात् तत्मवं ज्ञात्वैकत्र कृत्वा नित्य समाचरत, यत प्रतिदिनं सर्वेषा मनुष्याणामुत्तरोतर मुखं वर्धेत । तथा समिति सामाजिक नियमव्यवस्था, अर्थाद् या न्यायप्रचाराढ्या सर्वमनुष्याणा मान्यज्ञानप्रदा ब्रह्मचर्यविद्याभ्यासशुभगुणसाधिका शिष्टसमया राज्यप्रवन्धाद्या-ह्लादिता परमार्थव्यवहारशोधिका बुद्धिशरीरवलारोग्यवर्धिनी शुभमर्यादापि समानी सर्वमनुष्यस्वतन्त्रदानसुखवर्ध- नायकरसैव कार्या । मनः सङ्कल्पविकल्पात्मकम्, सङ्कल्पोऽभिलाषेच्छेत्यादि, विकल्पोऽप्रीतिद्वेष इत्यादि । शुभगुणान् प्रति सङ्कल्पः, अशुभगुणान् प्रति विकल्पश्च रक्षणीय । एतद्धर्मकं युष्माकं मनः समानमन्योऽन्यमविरुद्धस्वभावमेवास्तु | यच्चित्त पूर्वापरानुभूतस्मरणात्मक धर्मेश्वरचिन्तन तदपि समानमर्थात् प्राणिना दु खनाशाय सुखवर्धनाय च स्वात्मवत् सम्यक् पुरुषार्थेनैव कार्यम् ॥ युष्माभि. परस्परस्य सुखोपकाराय सर्व सामथ्यं योजनीयम् । ये ह्येवं सर्वजीवानां --स्वात्नवद् वर्तन्ते तादृशाना परोपकारिणा परमुखदातृणामुपर्यहं कृपालुर्भूत्वा युष्माक पूर्वपरोक्तधर्ममाज्ञापयामि– इत्थमेव सर्वैः कर्तव्यमिति 1। येन युष्माक मध्ये नैव कदाचित्सत्यनाशोऽसत्यवृद्धिश्च भवेत् । समानेन वो हविर्दानं ग्रहण च तदपि सत्येन धर्मेण युक्तमेव कार्यम् । तेन समानेन हविषा वो युष्माक जुहोमि सत्यधर्मेण सदैवाह नियोजयामि, अतो यदुक्त एव धर्मो मन्तव्यो नान्य:' ( पृ० १०७ ) इति । दिया गया है, वे भी तो विद्वान् ही है, तो फिर वे अपने ही प्रति कैसे दृष्टान्त रूप मे उद्धृत किये जा सकते है? जो विद्वान् नही है, वह मन्त्र के अर्थ को समझ ही नही सकता । इस प्रकार इस मन्त्र का सायण का किया अर्थ ही सही माना जायगा । ' समानो मन्त्र:' इस मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार की गई है - 'हे मनुष्य लोगो, जो तुम्हारा मन्त्र, अर्थात् सत्य- असत्य का विचार है, वह समान हो, उसमें किसी प्रकार का विरोध न हो और जब तुम लोग मिल के विचार करो, तब तब सबके वचनो को अलग अलग सुन के जो जो धर्मयुक्त और जिसमें सबका हित हो, सो सो सब में से अलग करके, उसी का प्रचार करो, जिससे तुम सभी का बराबर सुख बढता जाय । इसी तरह से जिसमे सब मनुष्यो का मान, ज्ञान, विद्याभ्यास, ब्रह्मचर्य आदि आश्रम अच्छे अच्छे काम, उत्तम मनुष्यो की सभा से राज्य के प्रबन्ध का यथावत् करना और जिससे बुद्धि, शरीर, बल, पराक्रम आदि गुण वढे तथा परमार्थ और व्यवहार शुद्ध हो, ऐसी जो उत्तम मर्यादा है, सो भी तुम लोगो को एक ही प्रकार की हो, जिससे तुम्हारे सब श्रेष्ठ काम सिद्ध होते जायें । हे मानवो, तुम्हारा मन भी आपस मे विरोध रहित, अर्थात् सब प्राणियो के दुःख के नाश और सुख की वृद्धि के लिये अपने आत्मा के समतुल्य पुरुषार्थ वाला हो । शुभ गुणो की प्राप्ति की इच्छा को ' सकल्प' और दुष्ट गुणो के त्याग की इच्छा को ' विकल्प' कहते है }, जिससे जीवात्मा ये दोनो कर्म करता है, उसका नाम 'मन' है । उससे सदा पुरुषार्थं करो, जिससे तुम्हारा घर्मं सदा दृढ और अविरुद्ध हो । 'चित्त' उसको कहते हैं, जिससे कि सब अर्थों का स्मरण अर्थात् पूर्वापर कर्मों का यथावत् विचार हो, वह भी तुम्हारा एक सा हो । 'सह' जो तुम्हारा मन और चित्त है, ये दोनो सब मनुष्यो के सुख ही के लिये प्रयत्न मे रहे । इस प्रकार से जो मनुष्य सबका उपकार करने और सुख देने वाले है, मैं उन्ही पर सदा कृपा करता हूँ । अर्थात् मैं उसके लिये आशीर्वाद और आज्ञा देता हूँ कि सब मनुष्य मेरी इस आत्मा के अनुकूल चलें, जिससे उनका सत्य धर्म बढे और असत्य का नाश हो । हे मनुष्य लोगो, जब जब कोई पदार्थ किसी को देना हो अथवा किसी से लेना हो, तब तब धर्म से युक्त ही करो । उससे विरुद्ध व्यवहार को मत करो । यह बात निश्चय पूर्वक जान लो कि मैं सत्य के साथ तुम्हारा और तुम्हारे साथ सत्य का संयोग करता | इसलिये कि तुम लोग इसी को धर्म मान के सदा करते रहो और इससे भिन्न को धर्म कभी मत मानों' (पृ० १०७- १०८ ) ।
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वेदार्थपारिजातः ११७६ अत्रापि व्याख्याने यद्यप्युपदेशोऽय नानुचितस्तथापि न स मन्त्रार्थ, मन्त्राक्षराननुगमात् । यथा -' यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्य स धर्म । मायाचारो मायया वर्तितव्य साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः । ' ( म० भा० उ० प० ३७१७ ) इत्यस्यार्थस्य ग्राह्यत्वेऽपि नास्योक्तमन्त्रार्थतेति, तद्वत् । मनुधातोविचारबोधकत्वेऽपि मन्त्रयतेर्गुप्तभाषणार्थकत्वेऽपि प्रकरणानुसारेण यथायोग्यमेव ज्ञानमन्त्रणादिरूपोऽर्थो गृह्यते, सर्वेषा ज्ञानस्य गुप्त- भाषणस्य समानत्वे जगद्व्यवहारविलोपापत्तेः । तद्यथेत्यादि राजमन्त्रिदृष्टान्तेन मन्त्रस्य सत्यज्ञानफलत्व सर्वोपकार- कत्वसाधनमप्युदक्षरमेव । नहि राजा वा राजमन्त्री वा सत्यज्ञानफल एव सर्वोपकारक एव वा भवति । 'यदा बहुभिः' ,, इत्यादिकमपि न विचारचारु मन्त्रेषु सख्याधिक्यस्यानपेक्षत्वात् मतभेदनिराकरणेन सर्वमुहितसुभग निष्कर्षस्यैव मन्त्रणाफलस्य लोकसिद्धत्वात् । समितिपदस्य सामाजिक नियमव्यवस्था शुभमर्यादा वा नार्थः, निष्प्रमाणत्वात् । यद्यप्युक्त- विशेषणा सामाजिक व्यवस्था शुभमर्यादा वा समादरणीयैव । शुभगुणान् प्रति सङ्कल्पाऽभिलाषेच्छादि, अशुभगुणान् प्रति विकल्पोऽप्रीतिद्वेषादिरूपो नानुचितस्तथापि त्वद्रीत्या मन पदार्थस्यैव तत्वे समानपदं व्यर्थमेव स्यात् । एवमेव चित्त पूर्वापरानुभूत स्मरणात्मकं धर्मेश्वरचिन्तन- मित्यपि विश्वङ्खलम्, अनुभूतस्मरण भवति नहि स्मरणमनुभूत भवनि, धर्मेश्वरचिन्तन सर्वप्राणिना दु खनाशाय सुख- वर्धनाय च स्वात्मवत् सम्यक् पुरुषार्थेन कर्तव्यमित्यपि न मन्त्रार्थः, तद्बोधकपदाभावात् । सह युष्माभिः परस्परसुखो- पकारायैव सर्व सामथ्यं योजनीयमित्यप्युदक्षरमेव । ' अभिगन्त्रये' इत्यस्य ' आज्ञापयामि' इति कथमर्थः? समान मन्त्रमित्यस्य युष्मानिति कथमर्थः? इस व्याख्या के अनुसार यहाँ जो उपदेश दिया गया है, वह यद्यपि अनुचित नही है, किन्तु वह मन्त्र का अर्थ नही है, मन्त्राक्षरो से यह बात निकलती नही । जैसे कि 'जो मनुष्य जिसके साथ जिस तरह का व्यवहार करता है, उसके साथ उसी के अनुसार बर्ताव करना चाहिये । कपट आचरण करने वाले के साथ कपटाचरण और भला व्यवहार करने वाले के साथ भला बर्ताव करना चाहिये' । महाभारत के इस श्लोक का अर्थ हमारे लिये ग्राह्य हो सकता है, किन्तु वह ऊपर उद्धृत मन्त्र का अर्थ नही माना जायगा, उसी तरह आपका किया गया अर्थ भी मन्त्र का अर्थ नही माना जा सकता । ' मनु' धातु यद्यपि विचार का बोधक है और इसका अर्थ गुप्त भाषण भी होता है, तो भी प्रकरण के अनुसार यथोचित ज्ञान अथवा मन्त्रणादि रूप अर्थ गृहीत होता है, सभी व्यक्तियो के ज्ञान अर्थात् गुप्त भाषण की समानता में सारा व्यवहार ही विलुप्त हो जायगा । यहाँ पर गजमन्त्री के दृष्टान्त से मन्त्र की सत्यज्ञानफलता और सर्वोपकारकता सिद्ध करना भी मन्त्राक्षरो के अनुरूप नही है, राजा अथवा राजमन्त्री सत्यज्ञानफल अथवा सर्वोप-कारक ही नही होता । सबके वचनो की बात भी विचार करने पर अच्छी नही लगती, क्योकि मन्त्रणा मे अधिक संख्या अपेक्षित नही मानी जाती । मतभेद का निराकरण करके सबके लिये हितकर एवं सुन्दर निष्कर्ष हो मन्त्रणा का फल लोक मे माना जाता है । 'समिति' शब्द का अर्थ सामाजिक नियम की व्यवस्था अथवा शुभ मर्यादा नही है, क्योकि इसमें कोई प्रमाण नही दिया गया । यद्यपि इस तरह की सामाजिक व्यवस्था अथवा शुभ मर्यादा हमारे लिये भी समादरणीय है । शुभ गुणों की प्राप्ति की इच्छा को ' संकल्प ' और दुष्ट गुणों के त्याग की इच्छा को ' विकल्प' कहते हैं, यह कथन भी अनुचित नही है, तो भी आपके मत के अनुसार यह सब अर्थ ' मन' पद का ही है, तो इस परिस्थिति में समान पद व्यर्थ हो जायगा । इस तरह 'चित्त' उसको कहते है, जिससे कि सब अर्थों का स्मरण अर्थात् पूर्वापर कर्म, धर्म, ईश्वर आदि का यथावत् विचार हो, यह कथन भी अटपटा सा है, अनुभूत वस्तु का स्मरण होता है, स्मरण की अनुभूति नही होती । धर्म और ईश्वर का चिन्तन सब प्राणियो के दुःख के नाश औरसुख की वृद्धि के लिये उसी तरह से लगन से करना चाहिये, जैसे कि कोई अपने लिये करता हो, यह भी मन्त्र का अर्थ नही हो सकता, क्योकि इसके प्रत्यायक पद वहीं नही है । तुम लोगों को परस्पर सुख देने और उपकार करने में ही सदा अपनी सामर्थ्य लगानी चाहिये, यह बात भी मन्त्राक्षरो के विपरीत है । ' अभिमन्त्रये ' इस क्रिया का अर्थ आज्ञा देता हूँ, यह कैसे हो सकता है? 'समानं मन्त्रम्' इन पदो का 'तुम लोगों से यह अर्थ कैसे हो सकता है?
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वेदार्थपारिजात. ११७७ सिद्धान्तरीत्या तु साम्मनस्यसम्पादनाय वृतोऽध्वर्युराचार्यो वात्र कथयति - अत्र पूर्वोऽर्धर्चः परोक्षकृतः, उत्तर: प्रत्यक्षकृतः । एषामेकस्मिन् कर्मणि प्रवृत्तानामृत्विजा स्तोतॄणा वा मन्त्र स्तुतिः शस्त्रस्तोत्रादिरूपा गुप्तभाषण वा समान एकविधोऽस्तु, अत एव हे मनुष्या इति सवोधन न युक्तम्, अनुपनीताद्यनधिकारात् । न च सर्वेषा मन्त्राणा विचाराणा गुप्तभाषणाना वा समानत्वमिष्टम्, तथात्वे विश्ववैचित्र्यविलोपापत्ते । तथा समितिः प्राप्तिरपि समानी एकरूपास्तु । यद्यपि स्तोतॄणामृत्विजां वेदानुसारेण दक्षिणाप्राप्तौ भेद एवास्ते नैकरूपता, तथापि तदतिरिक्तप्राप्तो समानत्वमिह विवक्षितम् । सामाजिकन्यायव्यवस्थाया मर्यादाया च समितिशब्दो न प्रसिद्धः, न वा तत्र समानता सम्भवति, वर्णाश्रमभेदेन तत्र वैरूप्यस्य शास्त्रसम्मतत्वात् । समितिशब्देन सभापीह न विवक्षिता, कार्यभेदेन सभाया नानात्वसम्भवात् । स्तोतॄणामृत्विजा वा समाने कर्मणि समानाप्राप्तिरेवेह विवक्षिता । मनः मननसाधनमन्तःकरणं चषां समानमेकविधमस्तु | चित्तं विचारजं ज्ञानं सह सहित परस्परस्यैकार्थेनैकीभूतमस्तु | लक्ष्यमेक निश्चित्य तदुद्देश्येन विचारजन्यज्ञानानामेकार्थविषयत्वमेवैकरूप्यम् । अह च वो युष्माक समानमेकविधं मन्त्रमभिमन्त्रये ऐकविध्याय सस्करोमि । तथा वो युष्माकं स्वभूतेन समानेन साधारणेन हविषा चरुपुरोडासादिना अह जुहोमि । अत्र 'होश्छन्दसि' ( पा० सू ० २।३।३ ) इति सूत्रेण कर्मणि कारके तृतीया । वषट्कारेण हविः प्रक्षिपामीत्यर्थः । , सोमादौ यथा घृतस्पर्शेनैकमत्येन कार्यकरणाय तानूनप्त्र कर्म क्रियते तथैव स्तोतॄणामृत्विजामन्येषा वाभीष्टजनानामैकमत्याय साम्मनस्याय वा जपहोमाभिषेकादो एषां मन्त्राणामुपयोगो भवति, वाञ्छाकल्पलतादावपि तथा प्रयोगदर्शनात् । यद्यत्र सर्वे मनुष्याः सम्बोध्याः, यदि च जुहोमीत्यत्र परमेश्वस्य कर्तृत्वमभ्युपगम्य हे मानवाः, समानेन हविषा सत्यधर्मेण सहैवाहं सदा नियोजयामीत्यर्थः स्यात्, तदा सङ्कल्पत्वाद् ईश्वरेण तथा नियोगे सति कथ तदन्यधर्मे मनुष्याणां प्रवृत्तिः स्यात्, दृश्यते च विविधधर्मेषु जनानां प्रवृत्तिः, तस्मात् पूर्वोक्त एवार्थो न त्वदुक्तोऽर्थः । सिद्धान्ततः यह मन्त्र सामनस्य संपादन के लिये वृत अध्वर्यु अथवा आचार्य की उक्ति है । इसका पूर्वार्ध परोक्षकृत और उत्तरार्ध प्रत्यक्षकृत है । इसका अर्थ है - सामनस्य संपादन में प्रवृत्त ऋत्विजो अथवा स्तोताओं की मन्त्र -स्तोत्रादि रूप स्तुति अथवा गुप्त भाषण एक तरह का हो । इसीलिये 'हे मनुष्यो' यह सबोघन यहाँ उचित नही माना जा सकता, क्योकि अनुपनीत व्यक्ति का वेदाध्ययन में अधिकार नही माना जाता । अपि च, सभी मन्त्रो, विचारो अथवा गुह्यभाषणो की समानता मानी भी नही जा सकती, ऐसा मानने पर विश्व के वैचित्र्य की उपपत्ति न हो सकेगी । इसी तरह समिति अर्थात् प्राप्ति भी समान एक रूप हो । यद्यपि स्तोता ऋत्विजो की दक्षिणा प्राप्ति में वेद के अनुसार भेद हो रहता है, एकरूपता नही, तो भी अन्य प्राप्तियो की समानता यहाँ अभिप्रेत है । सामाजिक न्याय व्यवस्था अथवा मर्यादा में ' समिति' शब्द प्रसिद्ध नही है । यहाँ समानता हो भी नही सकती, वर्ण और आश्रम के भेद से इसमें वैषम्य शास्त्रसंमत है । स्तोता अथवा ऋत्विजो के समान कार्य में समान प्राप्ति की बात ही यहाँ विवक्षित है । मन अर्थात् मनन का साधन अन्तःकरण इनका समान हो । चित्त अर्थात् विचार से उत्पन्न हुआ ज्ञान मन के साथ परस्पर समानार्थक होकर रहे । यहाँ पर ऐकरूप्य का अर्थ है एक लक्ष्य को निश्चित करके उसकी पूर्ति के लिये विचारपूर्वक एकाग्रता की स्थापना । मैं भी तुम्हारे लिये एक ही तरह की बात सोचता हूँ, एक तरह के संस्कार की कल्पना करता हू तथा तुम लोगों की सर्वसाधारण हवि, चरु पुरोडाश आदि से हवन करता हूँ । यहाँ पर ' होश्छन्दसि ' इस सूत्र से कर्म कारक में तृतीया विभक्ति का विधान है । अतः यह अर्थ हुआ कि वषट्कार का उच्चारण करते हुए आहुति प्रदान करता हूं ॥ सोमादि याग में जैसे घृत-स्पर्शपूर्वक ऐकमत्य से 'तानूनप्त्र' कर्म किया जाता है, उसी तरह स्तोता, ऋत्विक् अथवा अन्य अभीष्ट जनों के ऐकमत्य अर्थात् सामनस्य के लिये जप, होम, अभिषेक आदि के प्रसंग में इन मन्त्रों का उपयोग होता है । वाञ्छा-कल्पलता आदि में भी इस तरह के प्रयोग देखे जाते हैं । यदि यहाँ पर सभी मनुष्यों को संबोधित करना हो और यदि ' जुहोति' इस क्रिया का कर्ता परमेश्वर को मानकर यह अर्थ किया जाय कि हे मनुष्यों, समान हवि और सत्य धर्म में मैं तुम लोगों को नियुक्त करता हू, तो ईश्वर तो सत्यसंकल्प है, वह यदि सब मनुष्यों को सत्यधर्म में नियुक्त करता है, तो मनुष्य की तब असत्य और अधर्म १४८
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वेदार्थपारिजातः ११७८ 'समानी व आकृतिः समाना हृदयानि वः । समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥' (ऋ ० स ०१०।१ ९ १।४ ) हे मानवा:! युष्माकं यत्सामर्थ्यमस्ति तद्धर्मसम्बन्धे परस्परमविरुद्ध कृत्वा सर्वैः सुख वर्धनीयम् । आकूतिरध्यवसायः, उत्साह आप्तरीतिर्वा । सापि वो युष्माकं परस्परोपकारकरणेन सर्वेषा जनाना सुखायैव भवतु । यथा मदुपदिष्टस्य धर्मस्य विलोपो न स्यात्, तथैव कार्यम् । वो युष्माकं मानसानि प्रेमप्रचुराणि कर्माणि निर्वैराय समानान्यविरुद्धान्येव सन्तु । अत्र प्रमाणम्-'कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरघुतिर्हीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव । तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति' ( श० का ० १४। ४। १३ ।९ ) । मनसा विविच्य पुनरनुष्ठातव्यम् । शुभगुणाना-,, मिच्छा कामः तत्प्राप्त्यनुष्ठानेच्छा सङ्कल्पः पूर्वं सशय कृत्वा पुननिश्चय करणेच्छारूपः सशयो विचिकित्सा ईश्वर- सत्यधर्मादिगुणानामुपर्यंत्यन्तं विश्वासः श्रद्धा, अनीश्वरवादाधर्माद्युपरि सर्वथा ह्यनिश्रयोऽश्रद्धा, सुखदुःखप्राप्त्यापि - ईश्वरधर्माद्युपरि सदैव निश्चयरक्षण घृति । अशुभगुणानामाचरण नैव कार्यमित्यधैर्यमधृतिः । सत्यधर्मानाचरणे ऽसत्याचरणे मनसः सङ्कोचो घृणा हीः, शुभगुणान् शीघ्र धारयेदिति वारणावती वृत्तिर्धीः । असत्याचरणादीश्व- राज्ञाभङ्गात् पापाचरणाद् ईश्वरो नः सर्वत्र पश्यतीति मत्वा भयवृत्तिर्भीः । एतद्धर्मक मनो वो युष्माक समान तुल्यमस्तु 1। यथा वः सुसहासति । हे मनुष्याः, युष्माक यथा परस्पर मुसहायेन सति सम्यक् सुखोन्नतिः स्यात् तथा सर्वैरपि प्रयत्नो विधेयः । सर्वान् सुखिनो दृष्ट्वा चित्त आह्लादः कार्यः । नैव कञ्चिदपि दुखिनं दृष्ट्वा सुखं केनापि कर्तव्यम्, किन्तु यथा सर्वे स्वतन्त्राः सुखिनः स्युस्तथैव सर्वैः कार्यम्' (पृ ० १०८-१०९ ) इति । तदेतदपि विश्वङ्खलमेव । अत्रेद विचारणीयम्-' अत्र प्रमाणम्' इति कस्मिन्नर्थे प्रमाणमुपन्यस्तम्, मनसः ?,,. साम्ये मनसि वा नाद्यः अत्र प्रमाणे मनःसाम्यस्याप्रतिपादनात् । नान्त्यः प्रकरणविरोधात् । मन स्वरूपस्य मे प्रवृत्ति कैसे संभव हो सकती है? यह देखा जाता है कि मनुष्य की प्रवृत्ति विविध कार्यों में होती है । इसीलिये इस मन्त्र का सिद्धान्ती संमत अर्थ ही ठीक है, आपका बताया हुआ नही । 'समानी व: ' इत्यादि मन्त्र का दयानन्द संमत अर्थ यह है-'ईश्वर इस मन्त्र का प्रयोजन कहता है कि हे मनुष्यो! तुम्हारा जितना सामर्थ्य है, उसको धर्म के साथ मिलाकर सब सुखो को सब दिन बढाते रहो । निश्चय, उत्साह और धर्मात्माओ के आचरण को 'आकूति' कहते है । हे मनुष्यो, तुम्हारा सब पुरुषार्थ सब जीवो के सुख के लिये सदा हो, जिससे मेरे कहे धर्म का कभी त्याग न हो । सदा वैसा ही प्रयत्न करते रहो, जिससे कि तुम्हारे हृदय अर्थात् मन के सब व्यवहार आपस मे सदा प्रेमसहित और विरोध से अलग रहे । मन शब्द का अनेक बार ग्रहण करने में यह प्रयोजन है कि मन के अनेक अर्थ जाने जाय । इसमे 'कामः सकल्पः' इत्यादि श्रति प्रमाण है । प्रथम विचार करके सब उत्तम व्यवहारो का आचरण करना और बुरो की छोड देने का नाम 'काम' है । सुख और विद्यादि शुभ गुणो को प्राप्त करने के लिये प्रयत्न से अत्यन्त पुरुषार्थ करने की इच्छा को 'संकल्प' कहते है । जो जो काम करना हो, उस उसको प्रथम शंका कर करके ठीक निश्चय पर पहुँचने के लिये जो संदेह उठाया जाता है, उसको ' विचिकित्सा' कहते है । ईश्वर और सत्य धर्म आदि शुभ गुणो मे निश्चयात्मक विश्वास को स्थिर करना ही 'श्रद्धा' कहलाती है । अविद्या, कुतर्क, बुरा काम करना, ईश्वर को न मानना और अन्याय आदि अशुभ गुणो से सब प्रकार से अलग रहने का नाम 'अश्रद्धा' है । सुख-दुःख, हानि -लाभ आदि के होने पर भी अपने धीरज का न छोडना ' धृति' कहलाती है । बुरे कामो में दृढ न होने को ' अधृति' कहते है । झूठे आचरण करने और सच्चे कामो को न करने मे मन को लज्जित करने को 'हो' कहते है । श्रेष्ठ गुणो को शीघ्र धारण करने वाली वृत्ति 'घी' कहलाती है । ईश्वर की आज्ञा अर्थात् सत्याचरण धर्म करना और उससे उलटे पाप के आचरण से नित्य डरते रहना 'भो' कहलाती है । इन सब गुणों वाली वस्तु का नाम ' मन ' है । इसको सब तरह से सबके सुख के लिये युक्त करो । हे मनुष्यों, जिस प्रकार पूर्वोक्त धर्मसेवन से तुम लोगों को उत्तम सुखो की बढती हो और जिस श्रेष्ठ सहाय से आपस में एक दूसरे का सुख बढ़े, ऐसा काम सदा करते रहो । किसी को दुःखी देखकर अपने मन में सुख मत मानो, किन्तु सबको सुखी करके अपने आत्मा को सुखी जानो । जिस प्रकार से स्वाधीन होकर सब लोग सदा सुखी रहें, वैसा ही यत्न करते रहो' (पृ० १० ९ - ११० ) ।
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वेदार्थ पारिजात ११७६ :', अप्रक्रान्तत्वात् । शुभगुणानामिच्छा काम इत्यपि न युक्तम् शुभेतरगुणानामिच्छाया अकामत्वापत्तेः । इच्छामात्रं कामपदाभिलप्यमिति शास्त्रप्रसिद्धिः । अत एव पाशविककामकर्मज्ञानानां मृत्युपदाभिलप्यानां वैदिककामकर्मज्ञान- लक्षणयाऽविद्यया अतितरणं श्रुतम् । 'अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते' ( वा० स० ४० ११४ ) । ' पूर्वं सशयं ' कृत्वा पुनर्निश्चयकरणेच्छारूपः सशयो विचिकित्सा इति विचिकित्सालक्षणं किमूलकं किंप्रमाणकमित्येतदपि वक्तव्यमासीत् । सशयमात्रस्य विचिकित्सापरत्वे वाघाभावात् । निश्चयकरणेच्छायाः संशयरूपत्वे मानाभावश्च । निश्चयकरणेच्छाया जिज्ञासानतिरिक्तत्वेन विचिकित्सायाः संशयापरपर्यायाया जिज्ञासाजनकत्वेऽपि जिज्ञासारूपत्वा- सम्भवात् । गुरुशास्त्रवाक्येषु विश्वासः श्रद्धेत्यनेनैवोपपत्ती ईश्वरसत्यधर्माद्युपरि इत्यादिलक्षण गौरवावहमेव । ' क ईश्वरः किं सत्यं कः सत्यधर्म इत्यादिजिज्ञासायाः शास्त्रमन्तराऽनिवृत्तेः । न च प्रत्यक्षानुमानाभ्यां तन्निर्णयः सम्भवति, ' ' ( | | | ), ' ' ( ), नावेदविन्मनुते त बृहन्तम् तै० ब्रा० ३ १२ ९ ७ तं स्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि बृ० उ० ३।९।२६ ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ' ( मी ० सू० १ १/२ ), 'य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति ' ( ),न सुखं न परो गतिम् ॥ भ० गी० १६।२३ इति वचनशतविरोधाच्च । एवमेवाश्रद्धालक्षणमध्य पूर्णमेव अनीश्वरवादाधर्माद्युपरि सर्वथा निश्चयाभावेऽपि कथञ्चिन्निश्चयस्याश्रद्धात्वानापत्तेः । अनीश्वरवादाधर्मादिष्व- ( )विश्वासोऽश्रद्धेत्यस्यैव सुवचत्वाच्च । ईश्वरवादे धर्मादिषु चाविश्वासोऽश्रद्धेति प्रतिभाति । एवं घृतिलक्षणमपि न सङ्गतम्, सर्वत्र धारणाशक्तेरेव घृतित्वसम्भवेऽमुकांशे धैर्यरक्षणस्य वृतित्वानुपपत्तेः । शरीरादिधारणे घृतिप्रयोगानु-पपत्तेश्च । एवमषैर्यंलक्षणमपि न सङ्गतम्, अशुभगुणानामाचरणं नैव कार्यमित्यस्याधैर्यत्वाप्रसिद्धेः । किञ्च धैयं यह व्याख्या भी अस्त-व्यस्त है । यहाँ पर विचारणीय बात यह है कि ' अत्र प्रमाणम्' इस वाक्य से किस विषय में प्रमाण उपस्थित किया गया है? मन के साम्य में अथवा मन के विषय में? इसमें प्रथम पक्ष नही बनता, क्योंकि यहां पर मन की समानता का प्रतिपादन नही किया गया है । अन्तिम पक्ष भी नही बनता,, क्योकि उसका प्रकरण से विरोध होगा । यहा पर मन का स्वरूप नही वर्णित है । 'काम' शुभ गुणो की इच्छा को कहते है, यह कथन भी ठीक नही है, क्योकि ऐसा मानने पर अशुभ गुणो की इच्छा को ' काम' न कह सकेंगे । इच्छा मात्र कामपद से कही जाती है, ऐसो शास्त्र की प्रसिद्धि है । इसीलिये पाशविक काम, कर्म और ज्ञान ' मृत्यु' पद से बोधित होते हैं और वैदिक काम, कर्म और ज्ञानलक्षण अविद्या में इस ' मृत्यु' का अतितरण 'अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा०' इत्यादि श्रुति मे प्रतिपादित है । 'पहले शका उठा कर बाद में किसी एक निश्चय पर पहुँचने की इच्छा को 'विचिकित्सा' कहते है, विचिकित्सा ?के इस लक्षण में प्रमाण क्या है इसको बताना चाहिये था । सराय मात्र को विचिकित्सा मानने में भी कोई बाधा नही है । किसी निश्चय पर पहुँचने की इच्छा भी संशयात्मक होती है, इसमें कोई प्रमाण नही है । निश्चय पर पहुँचने की इच्छा जिज्ञासा से अतिरिक्त नही है । विचिकित्सा संशय का हो दूसरा नाम है । इससे जिज्ञासा की उत्पत्ति होती है, वह स्वयं जिज्ञासात्मक नही होती । गुरु और शास्त्र-वाक्यों में विश्वास को 'श्रद्धा' कहते हैं, इतना ही कहना पर्याप्त है । इसके बाद श्रद्धा के लक्षण में ईश्वर, धर्मं और सत्य आदि का संनिवेश करना गौरवावह ही हो सकता है । ईश्वर, सत्य, सत्यधर्म आदि क्या है? इस जिज्ञासा की निवृत्ति बिना शास्त्र के नही हो सकती । प्रत्यक्ष और अनुमान प्रम्प से भी इसका निश्चय नही हो सकता, क्योकि ऐसा मानने पर ऊपर उद्धृत तथा अन्य सैकडो शास्त्र-वचनों से विरोध उपस्थित हो जायगा । इसी तरह से अश्रद्धा का लक्षण भी यहा अधूरा ही है, क्योकि अनीश्वर वाद, अधर्म आदि में सर्वथा अनिश्चय न होने पर भी किसी प्रकार से निश्चय हो जाने पर उसको अश्रद्धा नही कह सकते । इसकी अपेक्षा यही कहना अधिक सरल है कि अनीश्वरवाद, अधर्म आदि में अविश्वास को अश्रद्धा कहते है । घृति का लक्षण भी संगत नही है, क्योकि सर्वत्र धारणा-शक्ति ही धृति नाम से कही जाती है । इस अवस्था में अमुक अंश में धैर्य की रक्षा धृति नहीं कही जा सकती और शरीरादि के धारण में धृति शब्द का प्रयोग देखा भी नही जाता । इसी तरह से अधैर्य का लक्षण भी असंगत है, क्योकि अशुभ गुणों को आचरण में नहीं लाना चाहिये, इस बात को कोई अधैर्य पद से अभिव्यक्त नहीं करता । धैर्य को धृति कहते हैं, धैर्य के अभाव को अधृति कहते हैं, ऐसा कहने पर भी धर्म, परमेश्वर आदि के निश्चय में धैर्य का होना घृतित्व और अशुभ गुणों के आचरण में धैर्य का न होना अधृतित्व
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वेदार्थपारिजातः ११८० वृतिस्तदभावोऽधृतिरित्युक्त्यापि धर्मपरमेश्वरादिनिश्चये धैर्यस्य धृतित्वमशुभगुणानामाचरणे वैर्याभावस्यावृतित्व- मायात्येव । ह्रीपदं लज्जार्थकमेव । आस्तिकानां शुभकर्मानाचरणेऽशुभकर्माचरणे च लज्जा भवत्येव । इदमत्रावधेयम्, — कर्मणामेव शुभानामशुभानां वाऽऽचरणं सम्भवति, न गुणानामिच्छादीनाम् । यतो हि ते कृत्यगोचरत्वेन आचरणा- भूमयः । 'जानाति, इच्छति, अथ करोति' इति रीत्या ज्ञानेच्छानन्तरमेव कृत्युदयेन ज्ञानेच्छाऽगोचरस्य कृत्य- विषयतैव । एव धीपदस्य निश्चयात्मिका वृत्तिरेवार्थः । शुभगुणान् शीघ्रं धारयेति कारणावती वृत्तिरिव परघनस्त्रया- ।, दिक शीघ्र प्राप्स्यामीति धारणावत्या वृत्तेरपि धीत्वाविशेषात् । भीलक्षणमपि स्वात्माश्रयदोषदुष्टम् भयवृत्ति- भियोरभेदात् । —- श्रीशाङ्करभाष्यानुसारी कामसङ्कल्पादीनामयमर्थःकामसङ्कल्पादीनामयमर्थः कामःकामः स्त्रीव्यतिकराभिलाषादिः । सङ्कल्पः प्रत्युपस्थितविषयविकल्पनं शुक्लनीलादिभेदेन 1। विचिकित्सा सशयज्ञानम् । श्रद्धा अदृष्टार्थेषु कर्मस्वास्तिक्यबुद्धिः । , अश्रद्धा तद्विपरीता बुद्धिः । धृतिर्धारणम् देहाद्यवसाद उत्तम्भनम् । अधृतिस्तद्विपर्ययः । ह्रीर्लज्जा । धीः प्रज्ञा । ( ) भीर्भयम् इत्येवमादिकं सर्वं मन एव ॥ बृ० उ० १।५।३ स्वेच्छ्या यस्य कस्यचिच्छब्दस्य यत्किञ्चिदर्थंकरणे शाब्दबोधेऽराजकतैव स्यात् । यथा वः सुसहायेन सम्यक् स्वसति सुखोन्नतिः स्यात्, तथा सर्वैः प्रयत्नः कर्तव्य इत्यपि निष्प्रमाणक एवार्थः । सायणादिसम्मतोऽस्य मन्त्रस्यार्थस्तु —हे ऋत्विग्यजमाना अधिकारिजना वा, वो युष्माकम् आकृति: सङ्कल्पोऽव्यवसाय: समानी एकविधास्तु । वो युष्माकं हृदयानि समानान्येकविधानि सन्तु । यथा येन प्रकारेण वः युष्माक सुसहः शोभनं साहित्यम् असति भवति तथा वो युष्माकं मनः अन्तःकरणं प्रत्येकापेक्षया एकवचनम्, समान-मेकरूपमस्तु | अस्तेर्लटि ' बहुलं छन्दसि' ( पा० सू० २।४ / ७३ ) इति शपो लुगभावे 'असति' इति रूपम् । है, यह बात आ ही जाती है । ' ह्री' पद का प्रयोग लज्जा के अर्थ में होता है । शुभ कर्म का आचरण न करने और अशुभ कर्मों को करने में आस्तिक जनो को लज्जा का अनुभव होता है । यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि अशुभ अथवा शुभ कर्मों का ही आचरण हो सकता है, इच्छादि गुणों का आचरण कथमपि संभव नही हो सकता । मनुष्य के कार्यों से हो उसके गुणो की प्रतीति हो सकती है, अतः वे आचरण के विषय नही हो सकते । 'जानता है, इच्छा करता है, तब कार्य में प्रवृत्त होता है' इस नियम के अनुसार ज्ञान और इच्छा के बाद ही कृति का उदय होता है, अतः जो ज्ञान और इच्छा का विषय न हो, वह कृति का विषय भी नही बन सकता । इसी तरह से घी शब्द का अर्थ भी निश्चयात्मक वृत्ति होगा, आपका किया अर्थ नही, क्योंकि शुभ गुणो को शीघ्र धारण करो इस धारणावती वृत्ति की तरह दूसरे के घन, स्त्री आदि को शीघ्र प्राप्त कर लू, इस तरह की धारणा वाली वृत्ति में भी तो आपका लक्षण जा सकता है | आपका ' भी' शब्द का लक्षण भी स्वात्माश्रयदोष से दुष्ट है, क्योंकि भय की वृत्ति और भय ये दोनो अभिन्न है । शाकरभाष्य के अनुसार काम, संकल्प आदि पदो का अर्थ यह है-' काम' स्त्री आदि पदार्थों की अभिलाषा को कहते है, सामने उपस्थित विषय के बारे मे सोचने को ' संकल्प ' कहते है, ' विचिकित्सा संशय ज्ञान कहलाता है, अदृष्टार्थक कर्मों में आस्तिक्य बुद्धि ' श्रद्धा' है । इससे विपरीत बुद्धि 'अश्रद्धा' कही जाती है । ' धृति' धारणा अर्थात् देहादि के अवसाद से मन को उठाना है, इसका विपर्यय 'अषृति' है, ' हो' को लज्जा, 'घी' को प्रज्ञा और ' भी' भय को कहते हैं । ये सब मन के ही व्यापार है । अपनी इच्छा के अनुसार जिस किमी शब्द का मनमाना अर्थ करने पर शाब्द बोध में अराजकता उत्पन्न हो जायगी । जैसे तुम लोगो की अच्छे सहायकों के मिल जाने से सुखपूर्वक उन्नति हो, उस तरह से सब लोगों को मिलकर प्रयत्न करना चाहिये, यह अर्थ भी प्रमाण रहित ही है । इस मन्त्र का सायणादि संमत अर्थ यह है--'हे ऋत्विजो > यजमानों, अथवा अधिकारी जनों, आप लोगों का संकल्प, अध्यवसाय एक तरह का हो, आप लोगो के हृदय समान विचार वाले हो, जिस तरह से आप लोगों का यह सुन्दर साहित्य, सहयोग