वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 301–310
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 301–310
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वेदार्थ पारिजातः १२०१ दानेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति । दाने सर्व प्रतिष्ठितम् । तस्माद्दान परम वदन्ति । धर्मो विश्वस्य जगत प्रतिष्ठा । लोके धर्मिष्ठ प्रजा उपनर्पन्ति । धर्मेण पापमन्नुदति । धने सर्व प्रतिष्ठितम् । तस्माद् धर्म परम वदन्ति । प्रजनन वै प्रतिष्ठा लोके । साधु प्रजायास्तन्तुं तम्बान. पितृणामनृणो भवति । तदेव तस्था अनृणम् । तस्मात् प्रजनन परम वदन्ति' (तै ० आ० १०।६३ ) । 'अग्नयो वै त्रयी विद्या देवयान• पस्था गार्हपत्य ऋक् पृथिवीरयन्तरमन्वाहार्यपचनो यजुरन्तरिक्ष वान्देव्यमाहवनीयः सान सुजगो लोको वृहत् । तस्मात् परम वदन्ति । अग्निहोत्र सायप्रातर्गृहाणा निष्कृति स्विष्टं नुहुत यज्ञऋतूनां प्रायण सुवर्गस्य लोकम्य ज्योतिस्तस्मादग्निहोत्र परमं वदन्ति । यज्ञ इति । यज्ञेन हि देवा दिव गता । यज्ञेनासुरानपानुदन्त न द्विपन्त मित्रा यज्ञे सर्व प्रतिष्ठितम् । तस्नाद् यज्ञ परम वदन्ति मानस वै प्राजापत्यं पवित्र मानसेन मनसा साधु पश्यति । मानसा ऋपयः प्रजा असृजन्त । मानसे सर्व प्रतिष्ठितम् ' ( ) ( ) स्नान्मानसं परम वदन्ति तै ० ० २०१६३ पृ० १२३-१२४ । अत्रापि ब्राह्मणभागम्य प्रामाण्यस्वतस्त्वमनङ्गीकुर्वाणस्य मन्त्राणां तन्मूलत्वेनानुपस्थापयत प्रमाण- दारिद्र्यमेव सूच्यते । सनातनवेदिकानां तु ब्राह्मणभागस्यापि मन्त्रभागस्येव प्रामाण्यस्वतस्त्वमेव । धर्मे विधीनिव प्रामाण्यम् । विधीना च ब्राह्मणभाग एव सत्त्वाद् ब्राह्मणभागस्य धर्म प्रानाण्य युज्यत एव । तत्र प्रथमं सिद्धान्तानुसारेण पूर्वोक्तवच नव्याख्यानमुपस्थाप्यते । ही यज्ञ, अर्थात् दावा के आश्रय मे नब प्राणियों का जीवन होता है और दान से हो शत्रुओ को भी जीत कर अपना मित्र बना लेते हैं, इससे दान भी धर्म का लक्षण है | ( धर्मो० ) सब जगत् की प्रतिष्ठा धर्म ही है, धर्मात्मा का ही लोक में विश्वास है, धर्म से ही मनुष्न पापो से छुटकारा पाते है, जितने उत्तम काम है वे सब धर्म में हो लिये जाते है, इससे उत्तम धर्म को ही जानना चाहिये । (प्रजननं ० ) जिससे मनुष्यों का जन्म और प्रजा में वृद्धि होती है और जो परम्परा से ज्ञानियों की सेवा से ऋण अर्थात् बदले को पूरा करना होता है, इससे प्रजनन भी धर्म का हेतु है, क्योकिजो मनुष्यो को उत्पत्ति न हो तो धर्म को ही कौन करे । इस कारण से भी धर्म को हो प्रधान जानो । ( अग्नयो बै ० ) अर्थात् जिससे तुम लोग सागोपाय तीनो वेदो को पढो, क्योकि विद्वानो के ज्ञानमार्ग को प्राप्त होकर पृथिवी, आकाश और स्वर्ग ये तीनो प्रकार की विद्या सिद्ध होती है. इससे इन तीनो अग्नि अर्थात् वेदो को श्रेष्ठ कहते है । ( अग्निहोत्र ० ) प्रातः और सन्ध्या काल मे [अग्निहोत्र द्वारा ] वायु तथा वृष्टि-जल को दुर्गन्ध से छुड़ा कर सुगन्धित करते से सब मनुष्यो को स्वर्ग अर्थात् सुख की प्राप्ति होती है, इसलिये अग्निहोत्र को भी धर्म का लक्षण कहते है । ( यज्ञ इति ० ) यज्ञ से ही विद्वान् लोग स्वर्ग अर्थात् सुख की प्राप्त हाते है और शत्रुओ को जीतकर अपना मित्र कर लेते है, इससे यज्ञ को भी धर्म का लक्षण कहते है । ( मानसं वै ० ) मन के शुद्ध होने से ही विद्वान् लोग प्रजाप्रति अर्थात् परमेश्वर को जानकर नित्य सुख को प्राप्त हो सकते है, पवित्र मन से सत्य का ज्ञान होता है और उसमें जो विज्ञान [और प्राण ] आदि ऋषि अर्थात् गुण है, उनसे परमेश्वर और जीव लोग भी अपनी अपनी सब प्रजा को उत्पन्न करते है । अर्थात् परमेश्वर के विद्या आदि गुणो से मनुष्य की प्रजा उत्पन्न होती है । इससे मन को जो पवित्र और विद्यायुक्त करना है, यह भी धर्म का उत्तम लक्षण और साघन है । इससे मन के पवित्र होने से सब धर्म कार्य सिद्ध होते हैं । ये सब धर्म के ही लक्षण है? इनमे से कुछ तो पूर्व कह दिये और कुछ आगे भी कहेंगे' ( पृ० १२४१२४-१२७- १२७ )) ॥ यहा पर भी ब्राह्मण भाग को स्वतः प्रमाण न मानने वाले दयानन्द के पास इनके प्रमाणभूत मन्त्रों को उपस्थित न कर पाने के कारण प्रमाणो की दरिद्रता ही प्रतीत होती है । वैदिक सनातन धर्म के अनुयायी तो ब्राह्मणभाग को भी मन्त्रभाग के समान स्वतः प्रमाण मानते है । धर्म मे विधिवाक्य ही प्रमाण माने जाते हैं । ये विधिवाक्य ब्राह्मणभाग मे ही ज्यादातर उपलब्ध होते है, अतः ब्राह्मणभाग की धर्म के प्रति प्रामाणिकता उचित ही है । यहा पर पहले हम इस सिद्धान्त के अनुसार पूर्वोक्त श्रुतिवचनों की व्याख्या उपस्थित करते है । १५१
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वेदार्थपारिजातः १२७२ ' मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्रय' परमं तपः' इति श्रुत्या यत्तपो ब्रह्मात्मसाक्षात्कारसाधनं तदेव श्रौतस्मार्त- सर्वकर्मरूपतया प्रशस्यते । यद्वा तथाविधतपः सिद्ध्यर्थ जप्य मन्त्रमाह । ऋतं मनसा यथार्थवस्तुचिन्तन तपस्तपोरूपम्, सत्य यथार्थभाषणमपि तपः । श्रुतं पूर्वोत्तरमीमांसाभ्या वेदवेदान्ततात्पर्यावधारणपूर्वकं वेदार्थश्रवणं श्रुतम्, तदपि तप पूर्वोक्तहेतुत्वात् । शान्त शान्तिर्बाह्याभ्यन्तरेन्द्रियोपरन । दानं स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वक योग्यसम्प्रदानस्वत्वापादनम् । यज्ञोऽग्निहोत्रादि, तत्सर्वमपि तप एव । भूर्भुवःसुवरिति लोकत्रयात्मक यद्विराड् ब्रह्म हे तत्त्वजिज्ञासो, तदुपास्व तद्विषये विजातीयप्रत्ययान्तरितसजातीयप्रत्ययप्रवाहमादरेण कुरु । तदेतदुपासनमपि तपः । यत्तु—- 'इदानी तपसो लक्षणमुच्यते-ऋतं यत्तत्त्व ब्रह्मण एवोपासन यथार्थज्ञानं च सत्यं सत्यकथन सत्यमाचरणं च श्रुतं सर्वविद्याश्रवणं श्रवणं च शान्तमधर्मात् पृथक्कृत्य मनसो धर्मे स्थापन शान्ति.' ( सायणभाष्यान्विते तैत्तिरीयारण्यके दमः शम इति पदद्वयपाठो नास्त्येव ) ( पृ० १२२ ) इति, तदपि न मनोज्ञम्, तपोलक्षणस्याननु- गतत्वात् । मनसश्चेन्द्रियाणां च निग्रहस्यैव सर्वानुगतत्वोपपत्तेः । 'तपो नानशनात्परम्' इति कृच्छ्रादेरपि तत्रैव पर्यवसानात् । शमदमादिलक्षण तु पूर्वमेव खण्डितम् । – सत्य परं पर सत्यमिति । तत्र सायणरीत्येयं भूमिका ज्ञानप्रतिबन्धक महापातकोपपातकपरिहारेण योग्यतालक्षणा सिद्धिमुक्त्वा योग्यस्य पुरुषस्यापेक्षितेषु ज्ञानसाधनेषु न्यासस्य निरतिशयोत्कर्ष वक्तु सत्यादीन्येव । तत्र प्रथम साधनमुपन्यस्यति सत्यमिति । प्रमाणेन यथादृष्ट यथाश्रुतं }दश साधनानि प्रतियोगित्वेन वक्तव्यानि तथैवाभिवदनं सत्यम्, तच्च पर पुरुषार्थसाधनेषूत्कृष्टम् । परं सत्य पुनर्वचनमादरार्थम् । यद्वा परं ब्रह्म सत्यमत्यन्ता- ' मन और इन्द्रियो की एकाग्रता सर्वोत्कृष्ट तप है' इस श्रुति के अनुसार यहो तप आत्मसाक्षात्कार का साधक है । इसलिये इसी की श्रौतस्मार्त आदि सभी कर्मों के रूप में प्रशसा की जाती है । अथवा इस तरह के तप की सिद्धि के लिये जप करने योग्य मन्त्र को बताते है-ऋत कहते है मन से यथार्थ वस्तु का चिन्तन करना, यह तपोरूप ही है । सत्य यथार्थ भाषण को कहते है । यह भी तप है । पूर्व और उत्तर मीमासा की पद्धति से वेद और वेदान्त के तात्पर्य का अवधारण करने के साथ वेदार्थ के श्रवण को श्रुत कहते है, यह भी तप है । शान्त शब्द शान्ति का, बाह्य और आन्तर इन्द्रियो की उपरति का वाचक है । 'दान' किसी वस्तु से अपने स्वस्व को हटाकर उस पर किसी अन्य योग्य व्यक्ति का स्वत्व संपादन करना है । अग्निहोत्र प्रभृति यज्ञ है । ये सब तप ही कहलाते हैं । भू, भुवः, और सुवः इन तीन पदो से लोकत्रयात्मक विराड् ब्रह्म बोधित होता है । हे तत्त्व की जिज्ञासा वाले मनुष्यों, तुम उसकी उपासना करो, उसको जानो, विजातीय प्रत्ययो को हटा कर निरन्तर उसीके सजातीय स्वरूप प्रत्ययप्रवाह को आदरपूर्वक सेवन करो । इस तरह की यह उपासना भी तप कहलाती है । दयानन्द ने इसका जो यह अर्थ किया है कि-' तप इसको कहते है कि जो ऋत, अर्थात् यथार्थ तत्व मानवे, सत्य बोलने, श्रुत अर्थात् सब विद्याओं को सुनने- सुनाने, शान्त अर्थात् उत्तम कर्म करने और अच्छे स्वभाव को धारने में सदा प्रवृत्त रहे ( सायण भाष्य से युक्त तैत्तिरीय आरण्यक में शम और दम ये दोनों पद नही मिलते ) ' ( पृ० १२३ ) यह अर्थ अच्छा नही है, क्योकि इनमें तप का लक्षण अनुगत नहीं होगा । मन और इन्द्रियो का निग्रह ही सर्वत्र तप से अनुगत माना जाता है । 'अनशन से उत्कृष्ट ओर कोई तप नही है' यहाँ पर प्रदर्शित कृच्छ्रादि तप का भी अन्ततः इन्द्रियो के निग्रह मे ही तात्पर्य पर्यवसित होता है । दयानन्द-संमत शमदमादि के लक्षणो का खण्डन हम पहले ही कर चुके है । 'सत्यं परम्० ' इत्यादि श्रुति वाक्यो की सायण की पद्धति से भूमिका इस प्रकार है-ज्ञान के प्रतिबन्धक महापातक, उपपातक आदि के परिहार द्वारा योग्यता संपादन रूप सिद्धि को बताकर योग्य पुरुष के लिये अपेक्षित ज्ञान के साधनों में न्यास का निरतिशय उत्कर्ष बताने के लिये उसके प्रतियोगी के रूप में सत्य प्रभूति दस साधनो का वर्णन किया जाता है । उनमें से प्रथम साधन सत्य का उपस्थापन इस तरह से किया जाता है -प्रमाण से जैसा देखा गया और जैसा सुना गया, उसको उसी रूप में कहना सत्य
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वेदार्थपारिजात. १२०३ बाध्यम् । तद्वद् यथार्थवचनमपि व्यावहारिकवावशून्यमिति दृष्टान्तरूपेण पर सत्यमित्युच्यते । सत्येनाजीवनं यथार्थ भापणलक्षणेन सत्येन स्वर्गात् लोकात् कदाचन न च्यवन्ते । अनृतवादिनस्तु केनचित्पुण्येन स्वर्गं प्राप्यापि मिथ्याभाषणदोषेण सम्पूर्णतया कर्मफलमननुभूयैव प्रच्यवन्ते । हि यस्मात् सता सन्मार्गवर्तिनामृष्यादीना सम्वन्धि सत्य यथार्थभाषित्व तस्मात् सतामिद सत्यमिति व्युत्पत्त्यनुरोधेन सत्यवादित्वमेव परम मोक्षसाधनमिति वदन्तः केचिन्नहान्तः सत्ये रमन्ते क्रीडन्ते । यत्तु — ‘ सत्यभाषणात् सत्याचरणाच्च परं धर्मलक्षण किञ्चिन्नास्त्येव, कुत:? सत्येनैव नित्यं मोक्ष मुख मनारमुख च प्राप्य पुनः कदापि च्युतिर्न भवति । सत्पुरुषाणामपि सत्याचरणमेव लक्षणमस्ति । तस्मात् कारणात् नवमनुष्ये. सत्ये खलु रमणीयम्' ( पृ ० १२४ ) इति, तत्तु पौर्वापर्यानवधारणमूलकमक्षरार्थबहिर्भूत च धर्मलक्षणस्या- प्रकृतत्वात् । इह तु सत्यं परमित्युक्तम् । नहि सत्येन नोक्षसुख ससारसुख च प्राप्यत इत्युच्यत । सत्ये रमन्त इत्युक्तम् । नात्र विधिप्रत्ययो दृश्यते । किञ्च सर्वेर्मनुष्यैः सत्य एवं रमणीय चेत् तदा तपसि रमन्ते दमे रमन्ते शमे रमन्ते इत्यादिविरोधश्च स्यात्, मत्यभाषणस्यैव मोक्षसुखप्रापकत्वे न्यास एवात्यरेचयद् इत्युपसहारवाक्यविरोधश्च । तत्र नत्र सर्वत्यागलक्षणस्य न्यासस्यैव पूर्वोक्तसर्वसाधनापेक्षयातिरिक्तत्व ( श्रेष्ठत्व ) प्रतिपादनात् ॥ तस्मात् मायातु- नारि पूर्वोक्तव्याख्यानमेव युक्तम् । एव सत्यमेव परमिति नतमुक्त्वा द्वितीय मतमुच्यते तप इति । तपो नानशनात् परम्' इति तप परं मोक्षसाधनमित्यपि केषाञ्चिन्मतन् 1। तीर्थयात्राजपहोमादीनि बहूनि नपामि भवन्ति । तथापि तेष्वनशनाद् उपवासैक- कहलाता है । यह पुरुषार्थ के माघनो ने उत्कृष्ट माना जाता है । 'पर सम्यन्' इन तरह से उसी की पुनरुक्ति सत्य के प्रति आदर , ' कट करने के लिये है । अथवा इसका यह अर्थ हो सकता है कि परब्रह्म सत्य है अर्थात् उसका कभी बाघ नही होता । उसी तरह से यथार्थ वचन भी व्यावहारिक बाघ से रहित होता है । इस तरह मे दृष्टान्न के रूप में ' परं सत्यम्' इसकी व्याख्या की जा नकती हैं | सत्य से अर्थात् आजीवन यथार्थ भाषण रूप सत्य के प्रभाव में वन्तका स्वर्गलोक से कभी च्युत नही होता । असत्यवादी पुरुष, किसी तरह से किसी पुण्य के प्रभाव से यदि स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है तो भी मिथ्याभाषणरूप दोष के कारण पूरीतरह से कर्मफल को भोगे बिना ही स्वर्गलोक से च्युत हो जाता है । इसलिये सत्यभाषण, सन्मार्ग में निरत ऋषि-मुनियों की सत्यवादिता सदा उनके साथ रहती है, अतः यह सत्यवादिता हो मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ साधन है, ऐसा मानकर कुछ महात्मा सत्य के साथ ही सदा निरत रहते है । दयानन्द ने इस वाक्यखण्ड का अर्थ इस प्रकार किया है— सत्य भाषण और आचरण से उत्तम धर्म का लक्षण कोई भी नही है, क्योकि सत्पुरुषो मे भी सत्य ही सत्पुरुषपन है । सत्य से ही मनुष्यों को व्यवहार और मुक्ति का उत्तम सुख मिलता है जिससे छूटकर वे दुःख में कभी नही गिरते । इसीलिये सब मनुष्यो को सत्य में ही रमण करना चाहिये' (१० १२४ - १२५ ) । यह व्याख्या पूर्वापर सम्बन्ध की बिना अवधारणा किये की गई है और मन्त्राक्षरो से इसका कोई सम्बन्ध भी नही है । यहाँ पर धर्म के लक्षण का कोई प्रसंग नहीं है । यहाँ पर सत्य को श्रेष्ठता प्रतिपादित है । यहाँ पर यह नही कहा गया है कि सत्य से मोक्षसुख अथवा ससार का सुख प्राप्त होता है, किन्तु सत्य में रमण करते है. यह बात कही गई है । यहीं पर कोई विधि का प्रत्यायक प्रत्यय नही है । अपि च, यदि सभी मनुष्यों को सत्य में ही रमण करना है तो फिर तप, दम, राम आदि में रमण करने के विधान से इस वाक्य का विरोध होगा । सत्यभाषण से यदि मोक्षसुख की प्राप्ति हो जाती है, तो इस प्रकार के अन्तिम वाक्य में इन सभी मोक्ष के साधनो में न्यास सबसे बढकर है, इस प्रकार का उपसंहार करने से उससे इसका विरोध उपस्थित होगा । वेदान्त वाक्यों में सर्वत्र सर्वत्याग लक्षण संन्यास को हो मोक्ष के सभी साधनों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है । इसलिये इस वाक्यखण्ड का सायण का किया गया अर्थ ही सही है । इस तरह से सत्य की परमता का प्रतिपादन करने के बाद द्वितीय वाक्यखण्ड में तप की परमता का प्रतिपादक द्वितीय मत प्रदर्शित है - अनशन से बढकर कोई तप नही है, इस श्रुतिवाक्य के अनुसार कुछ लोगो के मत से तप ही मोक्ष का श्रेष्ठ साधन
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वदार्थपारिजातः १२०४ भक्तादिरूपादशनवर्जनात् परमुत्कृष्ट तपो नास्ति । यद्धि अनशनरूपं कृच्छ्रचान्द्रायणपराकादि परं तपोऽस्ति तद् दुर्धर्षम्, घर्षितुं सोढुमशक्यम् । अत एव आसमन्तात् सर्वेषा प्राणिनां तत्तपो दुर्धषं दुःशकमित्यनुभूयते । तस्मात्केचन श्रद्धालवोऽनशनरूपे तपसि रमन्ते । तृतीय मतमाह-दम इति । नियत ब्रह्मचारिण इति । वाक्चक्षुरिन्द्रियाणां बाह्यान्तरनिषिद्धेभ्यो निवृत्तिर्दमः । स एवोत्तमो मोक्षहेतुरिति मन्यमाना नैष्ठिकब्रह्मचारिण नियतं वदन्ति तस्माद्दमे रमन्ते । अथ चतुर्थं मतमाह--शम इत्यरण्ये | अन्तःकरणकोधादिदोषराहित्यं शमः स एवोत्तमो मोक्षहेतुरित्यरण्ये वर्तमाना मुनयो वनस्था. शमे रमन्ते }। अत्रापेक्षिकादेव दमशमी निरतिशयो इन्द्रियादीनामुपरमा एव । पञ्चम तत्र दानमिति । गोहिरण्यादीनां स्वकीयाना शास्त्रोक्तविधानेन स्वत्वपरित्यागपूर्वकयोग्यपात्र-स्वत्वापादनं दानम्, तदेव सर्वोत्कृष्टमोक्षसाधनमिति मत्वा सर्वे प्राणिनः प्रशसन्ति । दानादतिदुष्कर किञ्चिन्नास्ति । तनुत्यजापेक्षयापि घनत्यजानां दुर्लभत्वाद् धनार्थं प्राणानपि परित्यजतां पुरुषाणामुपलम्भात् । तस्माद् दाने रमन्ते । षष्ठ मतं धर्म इति । अत्र धर्मपदेन स्मृतिपुराणादिप्रतिपाद्यो वापीकूपतडागादिनिमोणरूपो धर्मो ग्राह्य', श्रौतकर्मणामुपरिष्टाद् यज्ञरूपेण वक्ष्यमाणत्वात् । राजामात्यश्रेष्ठयादयो मन्यन्ते तडागादिरूपेण धर्मे सर्वमिद रागात् परिगृहीतम् । सर्वेऽपि मनुष्यपश्वादय स्नानपानादिभिस्तत्र तुष्यन्ति । तादृशाद् धर्मादन्यद् दुश्चर नास्ति । तस्मात् कारणात् तादृशे धर्मे रमन्ते धनसम्पन्नाः । सप्तम मत प्रजन इति । प्रजनः पुत्राद्यत्पादन तस्यैवोत्तममोक्षसाधनत्व भूयांसो बहवः प्राणिनो मन्यन्ते, है । तीर्थयात्रा, जप, होम प्रभृति नाना प्रकार के तप होते हैं । इनमें अनशन से बढकर · उपवास, एक बार भोजन करना, आदि के रूप में भोजन का त्याग करने से बढकर दूसरा कोई तप नही है । यह अनशन रूप कुच्छ, चाद्रायण, पराक प्रभृति के विभेद से आचरित तप अत्यन्त दुर्घर्ष है, इसका आचरण कर पाना कठिन है । इसीलिये सभी प्राणियो के लिये इस प्रकार का तप बड़ा कठिन होता है । इसलिये कुछ श्रद्धालुजन अनशन रूप तप में निरत रहते है । तृतीय मत दम को उत्कृष्ट मानने वालो का है । ये नियत ब्रह्मचर्य का पालन करते है, वाणी, चक्षु प्रभृति इन्द्रियो की वाह्य और आभ्यन्तर निषिद्ध विषयो से निवृत्ति को दम कहते है ॥ यही मोक्ष का उत्तम साधन है, ऐसी निश्चित मान्यता नैष्ठिक ब्रह्मचर्य पालन करने वालो की है । इसलिये वे सदा दम के अभ्यास में ही निरत रहते है । चतुर्थ मत शमवादियो का है । साधक का अन्तःकरण जब क्रोधादि दोषो से उपरत हो जाता है, तो वह उसकी रामावस्था कहलाती है । यही मोक्ष का उत्तम साधन है, यह मत वन में निवास करने वाले सुनियो का है । वे वन मे रह कर इसी का अभ्यास करते है | यहा पर राम और दम का आपेक्षिक विधान है । इनकी निरतिशय अवस्था इन्द्रियादि की उपरति ही है । पंचम पक्ष दान की महत्ता को बताता है । अपने गाय, सुवर्ण आदि धन को शास्त्रोक्त विधि से उनके प्रति अपने स्वत्व को छोड़कर योग्य पात्र का स्वत्व संपादित करा देना दान कहलाता है । यही सर्वोत्कृष्ट साधन है, ऐसा मानकर सभी प्राणी दान करने वाले के प्रशंसक होते है । दान से कठिन और कोई वस्तु नही है । अपने शरीर का त्याग करने वाले मिल जायेंगे, किन्तु धन का त्याग करने वाले दुर्लभ है । ( इसके लिये 'चाम जाय पर दमडी न जाय' यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है) । धन के लिये प्राण दे देने वाले आदमी मिल जायेंगे । इसलिये दान की महत्ता को मानने वाले इसी में निरत रहते है । षष्ठ मत धर्म की उपासना का प्रतिपादक है । यहा पर धर्म पद से स्मृति-पुराणादि प्रतिपाद्य वापी, कूप, तडाग आदि के निर्माण का ग्रहण किया गया है, क्योकि श्रोत कर्मों का आगे यज्ञरूप में वर्णन किया गया है । राजा, राजमन्त्री, सेठ साहूकार इस बात को मानते हैं कि तडाग आदि का निर्माण धर्म में अनुराग का बोधक है । सभी मनुष्य, पशु-पक्षी आदि उनमें स्नान-पान आदि करके सन्तुष्ट होते है । इस तरह के धर्म से बढकर अन्य कोई दुष्कर कार्य नही है, इसलिये धन- सम्पन्न व्यक्ति इसी तरह के धर्म के कार्यों को करके सन्तुष्ट होते है । सप्तम मत प्रजन संबन्धी है । प्रजन का अर्थ पुत्रादि का उत्पादन है । उसीको बहुत से व्यक्ति मोक्ष का उत्तम साधन
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वेदार्थपारिजातः १२०५ दरिद्रैराढ्यं • शिष्टैरशिष्ट पण्डितैरितरंश्च पुत्रोत्पादनायातिशयेन प्रयतमानत्वात् । तस्मादेकैकस्य पुरुषस्य भूयिष्ठा । अतिवहव. प्रजोत्पादने रमन्ने– अष्टम मतमाह अग्नय इति । अग्नयोगाद आधा इत्युत्तममोक्षहेतव । तस्माद् गृहस्थैरग्नय आधातव्याः । - – नवमं महमाह अग्निहोत्रस्मादनिहोत्रे रमन्ते आहिनेष्वग्निषु सायप्रानश्चानुष्ठेयो होमो- ग्निहोत्रम् | नमुत्तममोक्षसाधनमिति केचित् । तन्मातेऽग्निहोत्रे रमन्ते दशम मतमाह --यज्ञ इति । दर्शपूर्णमामज्योतिष्टोमादिको यज्ञ उत्तमो मोक्षहेतुरित्यपरे वैदिका मन्यन्ते । हि यस्मात् देवा वर्तमाना पूर्वानुष्ठितेन यज्ञेन दिव गताः स्वर्गलोक प्राप्ता । तस्माद्वैदिका केचिद् यज्ञे रमन्ते । मानस-भिति । मनमेव निष्पाद्य मानसमुपासनमिति सगुणवह्मविदो बदन्ति । तस्मात् केचन वेदगतोपास्तिभागतात्पर्यविदो मानस उपासने रमन्ते । द्वादशं मतं न्यास इति । पूर्वकाण्डोकानामग्निहोत्रादिकर्मणामारुणिजाबालाद्युपनिषदुक्तप्रकारेण न्यासः परित्याग एवोत्तममोक्षहेतुरिति ब्रह्मा हिरण्यगर्भो मन्यते । न च बह्मा परो हि, परमात्मरूप । न तु पूर्वोक्तमतानुसारिण इव जीवः । यद्यप्यसावपि देहधारी. तथापि परो हि परमात्मैद ब्रह्मा हिरण्यगर्भ इति वक्तुं शक्यते, तच्छिष्यत्वेन तत्समानज्ञानत्वात् । 'यो ब्रह्माण विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । ( ६११८ ) इति श्वेताश्वतरोक्तेः । यानि पूर्वोक्तानि सत्यादीनि मानसान्तानि तानि तपस्येव भवन्ति तथापि पुत्रैषणा- वित्तैषणा- लोकैषणादिसर्वत्यागरूपन्यासापेक्षयाऽवराणि निकृष्टान्येव । तस्मन्यास एक एव सर्वाण्यत्यरेचयद् अतिक्रान्तवान्, 'उत्तमत्वतारतम्यस्य तत्रेव विश्रान्तत्वात् व्यास इति ब्रह्मा तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एव मानते हैं । दरिद्र हो या घनी, शिष्ट हो या अशिष्ट, पण्डित हो या मूर्ख, सभी लोग पुत्र की प्राप्ति के लिये बडा प्रयत्न करते है! इस तरह से एक एक व्यक्ति बहुत से पुत्रो के उत्पादन में रमने रहते हैं । अष्टम मत अग्नि संबन्धी है । गार्हपत्य प्रभूति अग्नियो का आधान हो मोक्ष का उत्तम साधन है । इसलिये गृहस्थ को का आधान करना चाहिये । नवम मत अग्निहोत्र मंबन्धी है । इस मत को मानने वाले अग्निहोत्र के अनुष्ठान में निरत रहते है! अग्नियो का आधान कर लेने के बाद प्रात काल और सायकाल इनमे किया जाने वाला होम अग्निहोत्र कहलाता है । यही मोक्ष का उत्तम साधन है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं । इसलिये ये लोग अग्निहोत्र के अनुष्ठान से ही लगे रहते हैं | दाम मत यज्ञवादियो का है । कुछ वैदिक मानते है कि दर्श-पूर्णमास, ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञ ही मोक्ष के उत्तम साधन है । आज स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओ ने पहले जो यज्ञो का अनुष्ठान किया था, उसी के फलस्वरूप वे वहा पहुंचे थे । इसलिये यशो मे रमते हैं । ग्यारहवा मत मानसवादियों का है । मानस उपासना मन से ही निष्पन्न होती है, ऐसा मगुण ब्रह्म को मानने वालों का मत है । इसलिये वेदगत उपासना काण्ड का तात्पर्य समझने वाले कुछ मनीषी मानसिक उपासना पर ही जोर देते है । न्यास संबन्धी बारहवा मत है । पूर्व काण्ड में प्रतिपादित अग्निहोत्र प्रभृति कर्मों का आरुणि-जाबाल आदि आचार्यों के द्वारा उपनिषदों में प्रतिपादित पद्धति से परित्याग ही मोक्ष का उत्तम साधन है । यह हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का मत है । यह ब्रह्मा परम परमात्मस्वरूप है, पूर्वोक्त मत के अनुसार जीव नही है । यद्यपि यह भी देहधारी हैं, तथापि परम परमात्मा ही हिरण्यगर्भ ब्रह्मा भी है, ऐसा कह सकते हैं, क्योंकि उनके शिष्य होने से ब्रह्मा का भी ज्ञान परमात्मा के समान ही है । श्वेताश्वतर श्रुति कहती है- 'जो पहले ब्रह्मा की सृष्टि करता है और बाद में उसको वेदो का उपदेश भी करता है' । यहा पर पूर्वोक्त सत्य से लेकर मानस उपासना पर्यन्त सभी तप के अन्तर्गत आते हैं । तो भी पुत्रैषणा 1, वित्तैषणा, लोकषणा आदि सब आकांक्षाओं के त्यागस्वरूप न्यास की अपेक्षा ये सब हीन कोटि के साधन है । इसलिये न्यास हो इन सबसे बढ़कर है । साधन की उत्तमता का तरतमभाव वहां आकर समाप्त हो जाता है । 'न्यास' इति ब्रह्मा अत्यरेचयत्' इस वाक्यखण्ड के अर्थ को बिना
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१२०६ वेदार्थ पारिजात! अत्यरेचयत्' इति वचनरहस्यमज्ञात्वैव स्वामिदयानन्दो यत्किञ्चिदसम्बद्ध मेवोक्तवान् । यत्तु - 'ब्रह्मवर्चसेन विद्याग्रहणं ब्रह्मोच्यते' ( पृ० १२४ ) इति, तत्तु सर्व निर्मूलमेव । यदपि 'विदुषो लक्षणं मानसो व्यापार ' (पृ० १२४ ) इति, तदपि यत्किञ्चिदेव, निर्मूलत्वात् । तस्मात् सायणसम्मतं पूर्वोक्तव्याख्यानमेव युक्तम् । पूर्वोक्तमोक्षसाधनसमूहमुपपादयितुमाख्यायिकामाह - प्राजापत्यो हारुणिरिति ( पृ० १२३ ) । प्रजापतेः पुत्रो प्राजापत्यो हारुणिः स एव सुपर्णाख्याया. स्त्रियोऽपश्यत्वात् सुपर्णेय. 4 स स्वकीय पितर प्रजापतिमुपससार उत्तम- साघनजिज्ञासयोपसन्नवान् । उपसद्य चेवं पप्रच्छ । हे प्रजापते, भगवन्तो महर्षयः मोक्षसाधने किं साधन परममुत्कृष्ट वदन्ति । एवं पृष्टः स तस्मै प्रोवाच - तत्र प्रथमं दर्शयति 'सत्येन वायुरावाति' । योऽयं वायुरन्तरिक्षे वाति सोऽय पूर्वजन्मनि मनुष्यः सन् सत्यवादित्वं परिपाल्य तेनैव सत्येन वायुदेवतात्व प्राप्य इदानीं लोकानुग्रहायान्तरिक्षे वाति । तथैवादित्योऽपि पूर्वजन्मानुष्ठितेन सत्येन दिवि रोचते द्युलोके प्रकाशते । तदेतत्सत्यं वाचो वागिन्द्रियस्य प्रतिष्ठा स्थिरावस्थानम् । अनृत तु वाचोक्तनपि परैतिरक्रियत इति न वाचः प्रतिष्ठा । सत्ये सत्यभाषणे सर्व प्रामाणिक व्यवहारजात प्रतिष्ठितम् । तम्मात् सत्यमेव परम साधनमित्येव केचिदनुष्ठातारो वदन्ति । तत्रारुणेर्मुखविकासराहित्येनापरितोषं परिलक्ष्य द्वितीय साधनमाह-तपसा देवा इति । इदानी स्वर्गे वर्तमाना अग्नीन्द्रादयो देवा अग्रे पूर्वजन्मन्यनुष्ठितेनाशनपरित्यागरूपेण कृच्छ्रचान्द्रायणादितपसा देवतामारन देवतात्वमिदानीन्तनं प्राप्ताः । तथा वशिष्ठादय ऋषयः पूर्वानुष्ठितेन तपमा सुवरविन्दन् स्वर्गलोकमनुक्रमेण लब्धवन्तः । वयमपीदानीमभिचाररूपेण नवनापत्नान् ( शत्रून् ) अस्मदीयलाभविरोधिनः पुरुषानपि प्रणुदाय निराकुर्मः । अन्यदपि सर्वं फलजातं तपसि प्रतिष्ठितम् । तस्मादनशनरूपं नपः परम मोक्षसाधनं केचिद्वदन्ति । समझे स्वामी दयानन्द ने प्रकरण से असंबद्ध ऊल-जलूल व्याख्या कर दी है । ' ब्रह्मचर्य के सेवनपूर्वक विद्या का ग्रहण ब्रह्म कहलाता है (पृ० १२४ ) इस तरह की उक्तिया भी निर्मूल है । 'विद्वान् का नक्षण एक मानस व्यापार है' यह कथन भी विना आधार के व्यर्थ है । इसलिये इन वचनो का सायणसंमत अर्थ हो सही है । पूर्वोक्त मोक्षसाधनों के समूह की उपपत्ति के यहा पर एक आख्यायिका उद्धृत की गई है (पृ० १२३ ) | आरुणि ऋषि प्रजापति के पुत्र है, अतः प्राजापत्य कहलाते है । इनकी माता का नाम सुपर्णा था, इसलिये ये सुपर्णेय कहे गये है । ये एक बार मोक्ष के उत्तम साधनो को जानने की इच्छा से अपने पिता प्रजापति के पास पहुंचे और उनसे पूछा- हे प्रजापते, परम पूज्य, - सत्येन वायुरावाति । इसका साधनों में किसको सर्वोत्तम मानते हैं । ऐसा पूछने पर प्रजापति ने जो उत्तर दिया उनमें यह भी है महर्षि गण मोक्ष के तात्पर्य यह है कि यह जो वायु अन्तरिक्ष मे बह रहा है, वह जब पूर्वजन्म मे मनुष्य था, उस समय उसने सत्यवचन का उसी सत्यवादिता के प्रभाव से वायु देवता का पद मिला है और अब लोगो को अनुग्रह करने के लिये अन्तरिक्ष पालन किया । तरह से मादित्य भी पूर्वजन्म में अनुष्ठित सत्य के प्रभाव से ही अन्तरिक्ष में प्रकाशित हो रहा है । यह में बहता रहता है । इसीकि सत्य बोलने वाले की वाणी स्थिर रहती है, उसका कोई प्रतिवाद नही करता । अनृत वाणी का दूसरेसब सच बोलने का ही प्रभाव है है, इसलिये अनुत बोलने मे वाणी की प्रतिष्ठा नही रहती । सच बोलने में ही सारा प्रामाणिक व्यवहार प्रतिष्ठितलोग तत्काल खण्डन कर देते, के साधनों में सच बोलना ही उत्तम है इस तरह का कुछ लोगो का विचार है । रहता है । इसलिये मोक्ष प्रजापति ने देखा कि आरुणि के मुंह पर प्रसन्नता के कोई चिह्न नहीं हैं, वह इस,उसी प्रश्न का दूसरा उत्तर दिया- तपसा देवा इति । इस समय स्वर्ग में निवास करने वाले उत्तर से सन्तुष्ट नही हैं तो उन्होने -,अनुष्ठित भोजन का परित्याग कर कृच्छ्र चान्द्रायण प्रभूति व्रतो के प्रभाव से इस पद को अग्नि इन्द्र प्रभृति देवतागण पूर्वजन्म में तरह से वशिष्ठ प्रभृति ऋषियों ने पूर्व काल मे अनुष्ठित तप के प्रभाव से स्वर्गलोक तप के प्रभाव से अभी प्राप्त किया है । इसी अभिचार रूप तप के प्रभाव से हमारे लाभ के प्रतिबन्धक एवं विरोधी शत्रुओं का नाश करतेको हैप्राप्त। इसकेकिया अतिरिक्तहै । हम लोगअन्य भी इस समय है, ऐसा कुछ लोग कहते है ।की उपलब्धिया तप मे प्रतिष्ठित हैं । इसलिये अनशन रूप तप मोक्ष का श्रेष्ठ साधन सभी प्रकार
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वेदार्थपारिजातः १२०७ तत्राप्यपरितोषं दृष्ट्वा साधनान्तरमाह - दमेन दान्ता बाह्येन्द्रियनियमयुक्ताः पुरुषा दमेन स्वकीयं किल्बिषमवधुन्वन्ति नाशयन्ति । इमे ब्रह्मचारिण. स्वर्गमगच्छत् । स च दमो भूतानामाघर्षितुं सोढु दुःशकः । अस्मिन् सर्वमपेक्षित फल प्रतिष्ठितम् । तस्माद् दम परम युक्तिसाधनं केचिद्वदन्ति । सर्वत्र पूर्वसाधने परितोषराहित्याद् उत्तरसाधनोक्तिर्मन्तव्या । चतुर्थ साधन शमेन शान्ता अन्तःकरणक्रोधादिदोषरहिता पुरुषास्तेन शमेन शिवं कल्याणमय पुरुषार्थ-माचरन्ति । नारदद्या मुनयः शमेन स्वर्गमलभन्त । तम्मन्छम परम साधनमिति । ---- पञ्चम साधनमाह दान गोहिरण्यादिदान यज्ञाना सम्बन्धिनी दक्षिणा भवति । तस्माद्वस्थ श्रेष्ठं लोकेऽपि दानार वेदशास्त्रविदो मूढाच— सर्वे उपजीवन्ति । तया यो धनदानेनारातीः शत्रून् अपानुदन्त राजानो निराकृतवन्त । ये तु प्रबला द्विषन्तस्तेऽपि दानेन तुष्टा मित्राणि भवन्ति । तस्माद्दान परम वदन्ति । - माधनमाह धर्म इति । धर्मस्तडागप्रपादिरूपो विश्वस्य जगतः सर्वस्य प्राणिजातस्य प्रतिष्ठा | इत्येतत्प्रसिद्धम तथा लोके धर्मिष्ठम् अतिशयेन धर्मे प्रवतेमानं जनं प्रजा उपसर्पन्ति धर्माधर्मनिर्णयार्थ पुण्य-विशेषलाभार्थ वा । धर्मेण प्रायश्चित्तरूपेण पापमधर्ममपनुदन्ति विनाशयन्ति । सप्तममुच्यते - प्रजनन वै । प्रजनन पुत्रोत्पादनं गृहस्थानां प्रतिष्ठा, गृहकार्यनिर्वाहकत्वात् । 'सोऽय मनुष्यलोक. पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा' इति श्रुत्यन्तरात् । किञ्च प्रजाया पुत्रपौत्रादिरूपायास्तन्तु परम्परा साधुशास्त्रीयमार्गो यथा स्यात् तथा तन्वानः पितॄणा मृतानां पितृपितामहादीनामनृणो भवति । तदीयमृण पुत्रिणा प्रत्यर्पितं भवति यत्प्रजननम् । तदेव पत्रिण ऋणानःकरणहेतुस्तस्मात्तदेव परमं वदन्ति । इस उत्तर से भी आरुणि को सन्तुष्ट न देखकर प्रजापति ने पुनः कहा- दमेन । बाह्य इन्द्रियो को अपने वश मे करने वाले पुरुष दम के द्वारा अपने सारे पापों को नष्ट कर देते है । ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले दम की सहायता से ही स्वर्गलोग को प्राप्त करते है | सभी प्राणियो लिये इस दम का आचरण कर पाना बडा कठिन है । इस दम की सहायता से सभी इच्छित फल प्राप्त किये जा सकते है । इसलिये दम ही मुक्ति का श्रेष्ठ साधन है, ऐसा कुछ लोग कहते है । पूर्व की तरह ही यहा पर और आगे भी पूर्व साधन मे प्रश्नकर्ता को परितोष की प्राप्ति न देखकर ही उत्तर उत्तर साधन बढाने में प्रजापति की प्रवृत्ति हुई है । चतुर्थ साधन शम है । शम के आचरण के द्वारा पुरुष अन्तःकरण के दोष क्रोधादि से मुक्त होकर कल्याणमय पुरुषार्थ को अधिगति मे प्रवृत्ति होते हैं । नारद प्रभूति मुनियों ने शम से हो स्वर्गलोक को जाता है । इसलिये शम ही मोक्ष का उत्तम साधन है । पञ्चम साधन दान है । गाय, सोना आदि अपने पदार्थों को किसी योग्य पात्र को देना दान कहलाता है । यज्ञ में ऋत्विजों को दी गई दक्षिणा भी दान ही है । इसलिये लोक में बनी सेठ के पास जाकर जो कि दान करता है, वेदशास्त्र के ज्ञाता और मूर्ख सभी व्यक्ति आश्रय लेते है । इसी तरह से सैनिको को धन देकर राजा लोग अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने है । प्रबल शत्रु भी दान से I सन्तुष्ट होकर मित्र हो जाते है । इसलिये कुछ लोग दान को ही मोक्ष श्रेष्ठ साधन मानते छठा साधन धर्म है । तालाब बनवाना, प्याऊ चलाना जैसे धर्म-कार्य जगत् के सभी प्राणियो की भलाई के लिये है । यह प्रसिद्ध बात है । इसी तरह से सदा धर्म के बाचरण में निरत धर्मिष्ठ व्यक्ति के पास प्रजाजन धर्म और अधर्म निर्णय कराने के लिये अथवा पुण्यविशेष की प्राप्ति के लिये सदा पहुंचते रहते है । प्रायश्चित रूप धर्म के आचरण से अधर्म के स्वरूप पापसमूह का विनाश भी किया जाता है । सातव साधन प्रजनन है । प्रजनन का अर्थ है-पुत्रोत्पादन, गृहकार्य का निर्वाहक होने से वह गृहस्थो की प्रतिष्ठा है । श्रुति ने भी यही बताया है-' इस मनुष्यलोक को पुत्र के द्वारा ही जीता जा सकता है, अन्य किसी कर्म के द्वारा नही । ' और भी - पुत्र-पौत्रादिरूप प्रजा की परम्परा का विस्तार शास्त्रप्रतिपादित सन्मार्ग को अपनाकर करने से ही अपने मृत पिता-पितामह आदि पूर्वजों के ऋण को चुका सकता है और उनसे अनुण हो पाता है । पुत्रोत्पादन ही पुत्रियों के ऋणापाकरण का एक मात्र साधन है, इसलिये पुत्रोत्पादन को अत्यन्त श्रेष्ठता दी गई है ।
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वेदार्थपारिजातः १२०८ विद्या अष्टमं साधनमाह --अग्नय इति । गार्हपत्यो दक्षिणाग्निराहवनीय इति येऽग्नयस्त एव त्रयी तेषामग्नीनां मध्येवेदत्रयोक्तकर्मसाधनत्वात् वेदविहितत्वाच्च । देवयानो यागद्वारेण देवत्वप्रापको मार्गश्च । किञ्च गार्हपत्योऽग्निॠग्वेदात्मकः पृथिवीलोकस्वरूपो रथन्तरमामात्मकश्चेति प्रशस्यते । अन्वाहार्यपचनो दक्षिणाग्निर्यजुर्वे-दान्तरिक्षलोकवामदेव्यसामात्मक' । आहवनीयस्तु मामवेदस्वरूपस्वर्गलोकबृहत्तामात्मकः । तस्मादग्नीन् परमं वदन्ति । नवमं साधनमाह– अग्निहोत्रमिति सायप्रातश्चानुष्ठितमग्निहोत्र गृहाणां निष्कृतिः क्रयसाधन मूल्यम् ॥ अग्निहोत्राभावे क्षुधितोऽग्निगृहान् दहेतु । जग्निहोत्र स्विष्टं शोभनयागरूप सुहुत शोभनहोमरूपम् । देवतामुद्दिश्य द्रव्यत्यागो यागः, द्रव्यस्थाग्तो प्रक्षेपो होसः । यद्वा याज्यापुरोऽनुवाक्यात्रान् वषट्कारधानी यागः । स्वाहाकारप्रधान्ते होम: । एतद्यज्ञऋतूना प्रायण प्रारम्भः । अग्न्याधेयमग्निहोत्र दर्शपूर्णमासी आश्रयणम् चातुर्मास्यानि निरूढपशुवन्धः सौत्रामणी सप्तहविर्यज्ञा: । ऋतुशब्दो यूपवत्सु सोमयागेषु रूढ | अग्निप्टोनोऽत्यग्निष्टोम उक्थ्य. पोडशी बाजपेयोऽतिरात्र आप्तोर्यामश्चेति सप्त सोमसस्था' ऋतवः । तेषां सर्वेषां यज्ञऋतूनां प्रारम्भकमग्निहोत्रम् । अत एव स्वर्गस्य लोकस्य ज्योति प्रकाशकम् । तस्मादग्निहोत्र परम वदन्ति । दशमं साधनमाह -यज्ञ इति । यज्ञमुत्तम साधनमिति केचिदाहुः । यज्ञेन देवा दिवं गताः । यज्ञेनैव देवः असुरान्तानपानुदन्त । किञ्च सर्वकामप्राप्तिसाधनेन ज्योतिष्टोमेन द्वेषशान्तिकामस्य पूर्वं द्वेष कुर्वतोऽपि शत्रवो मित्राणि भवन्ति । यज्ञे नवं प्रतिष्ठितम् । तन्मात्तत् परम वदन्ति । आठवाँ साघन बताते है — गार्हपत्य दक्षिणाग्नि, आहवनीय- ये तीन अग्नियाँ ही वेदत्रयी मे विहित तथा वैदिक कर्मानुष्ठान की सावन होने से, त्रयी विद्या कही जाती है । याग के द्वारा देवतात्व दिलाने वाले मार्ग को ' देवयान ' कहते हैं । और भी, उन अग्नियो मे गार्हपत्य अग्नि की प्रशंसा इसलिये की जाती है कि वह ऋग्वेद स्वरूप है, पृथिवीलोकस्वरूप है, तथा रथन्तरसामात्मक है । अन्वाहार्यपचन दक्षिणाग्नि की प्रशसा इसलिये की जाती है कि वह यजुर्वेदस्वरूप है, अन्तरिक्षलोकस्वरूप है और वामदेव्य सामात्मक है । आहवनीय अग्नि की प्रशंसा इसलिये की जाती है कि वह सामवेदस्वरूप है, स्वर्गलोकरूप है और बृहत्साम स्वरूप है । इसलिये अग्नियो को अत्यन्त श्रेष्ठता दी गई । ---- नवम साधन बताते हैं--अग्निहोत्रमिति । सायं और प्रात. किया हुआ अग्निहोत्र, गृह खरीदने का मानो मूल्य है । उस मूल्य को न चुकाने पर, अर्थात् अग्निहोत्र न करने पर क्षुषित हुआ अग्नि बहुत सभव है कि गृह को जला देगा | अग्निहोत्र को स्विष्ट और सुहुत अर्थात् शोभनयागरूप तथा शोभनहोमरूप बताया गया है । देवता को उद्देश्य करके किये जाने वाले द्रव्यत्याग को याग और अग्नि में किये जाने वाले द्रव्य के प्रक्षेप को होम कहते है । अथवा -- याज्या, पुरोनुवाक्या से युक्त और वषट्कार की प्रधानता जिसमे हो, वह याग है और होम वह है, जिसमे स्वाहाकार की प्रधानता हो । इस अग्निहोत्र का अनुष्ठान करना मानो यज्ञ तथा क्रतुओ का ही प्रारम्भ करना है । अग्न्याधेय, अग्नि- होत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रयण, चातुर्मास्य, निरूढनशुबन्ध, सौत्रामणीये हविर्यज्ञ है । यूपविशिष्ट सोम यागो मे क्रतु शब्द की प्रसिद्धि है । अग्निष्टोम अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, आप्तोर्याम – ये सात सोम संस्था वाले क्रतु है । उन समस्त यज्ञ और क्रतुओ का प्रारम्भक अग्निहोत्र ही है । इसी कारण वह स्वर्गलोक का प्रकाशक है, इसलिये अग्निहोत्र को श्रेष्ठ कहलाता है । दसवाँ साधन बताते है -यज्ञ इति । कुछ लोक यज्ञ को उत्तम साधन कहते हैं । यज्ञानुष्ठान से ही देवताओं ने स्वर्ग पाया । यज्ञ के बल पर ही देवताओं ने असुरो को परास्त किया । और भी - समस्त कामनाओं की प्राप्ति कराने वाले ज्योतिष्टोम के बल पर हो द्वेष को शान्त करने की कामना करने वाले व्यक्ति के द्वेष करने वाले शत्रु भी मित्र बन जाते हैं । यज्ञ में सब कुछ निहित । इसीलिये उसे श्रेष्ठ कहा जाता है ।
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वदार्थपारिजातः १२०६ एकादश साधनमाह-- मनसा निष्पाद्य मानसमुपासन यत् तदेव प्राजापत्य प्रजापतिपदप्राप्तिसाधनम्, अत एव पवित्रं चित्तशुद्धिकारणम् । मानसेनोपासनेन युक्तेन मनसान्त करणेन साधु पश्यति, अतीतानागतव्यवहितादि- वस्तुजात योगी सम्यक् साक्षात्करोति । मानसा ऋषय एकाग्रमनोयुक्ता विश्वामित्रादय ऋषय. स्वसङ्कल्पेन प्रजा बह्वीरसृजन्त । मानसे सवं प्रतिष्ठितम् । तस्मान्मानस परम वदन्ति । पौर्वापर्यानवधारणादेव स्वामिदयानन्दो द्वादशं - ' न्यासमुपेक्षितवान् । तथा च सम्यग् ब्रह्मचर्यसेवनेन विद्याग्रहणं ब्रह्मेत्युच्यते । सत्येन ब्रह्मणा वायुरागच्छति । सत्येनादित्य. । सत्येनैव मनुष्याणां प्रतिष्ठा । मानसा ऋषयः प्राणा विज्ञानादयश्च' ( पृ० १२४ ) इत्यादिक सर्वमज्ञान- विजृम्भितमेव, श्रुत्यक्षरप्रकरणासम्बद्धत्वात् । द्वादशं साधनमाह - न्यास इति । न्यास इत्युक्तो यो मोक्षहेतुस्तं ब्रह्माणं हिरण्यगर्भ मनीषिणो महर्षयः स्मृतिकर्तारः । तथा च ' संन्यासाद् ब्रह्मण: स्थानम्' इति स्मृतिः ॥ हिरण्यगर्भप्रदप्राप्तेरन्तरङ्गसाधनत्वात् तद्रूपत्वम | तमेव स्तोतुं तत्प्राप्यस्य हिरण्यगर्भस्य स्वरूप दर्शयति- ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सर इति - सन्यासस्तुतये हिरण्यगर्भावयवस्य संवत्सरस्य माहात्म्य दर्शयति संवत्सरोऽसावादित्य इति । सवत्सर प्रशस्य तमादित्यमण्डलद्वारेण सर्वव्यवहारहेतुतया च प्रशस्य यथोक्त सन्यासमेव स्तोतु संन्यासेन प्राप्ततत्त्वज्ञानं पुरुषं प्रशसति- 'स वा एष पुरुषः पञ्चधा पञ्चात्मा येन सर्वमिद प्रोत पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च दिशश्चावान्तरदिशश्च सर्वे सर्वमिद जगत् सभूतं सभव्य जिज्ञासाक्लृप्त ऋतजा रयिष्ठाः श्रद्धा सत्यो महस्वान् तमसोपरिष्टात् । यः संन्यासपूर्वक तत्त्वज्ञान सम्पादयः, स एव पुरुषः सर्वात्मकः । स च पञ्चधा पञ्चात्मा पञ्चविधस्वरूपो भवति । शब्दादिपञ्चक पृथिव्यादिपञ्चक चक्षुरादिपञ्चक ज्ञानेन्द्रियादिपञ्चक वागादिपञ्चकं प्राणादिपञ्चकं भवति । सर्वेषामेतावता ग्यारहवे साधन को बताते है - मन से निष्पन्न होने वाली जो मानसी उपासना है, वही प्रजापति पद की प्राप्ति का साधन है । इसीलिये अर्थात् चित्तशुद्धिकारक होने से हो उसे पवित्र कहा गया है । इस मानसी उपासना के बल पर ही योगी अपने अन्तरिन्द्रिय मन के द्वारा अतीत- अनागत व्यवहित वस्तुओं को भी अच्छी तरह से ठीक ठीक प्रत्यक्ष कर लेता है । मन को एकाग्र कर विश्वामित्र आदि ऋषियों ने स्वसंकल्प से ही बहुत सी प्रजा को उत्पन्न कर दिया । इससे स्पष्ट है कि मन में सब कुछ प्रतिष्ठित है, इसलिये मानसिक बल को श्रेष्ठ कहा गया है । पौर्वापर्य का अवधारण न कर पाने से हो स्वामी दयानन्द ने बारहवें न्यास की उपेक्षा 'को । अर्थात् बारहवें साधन का उल्लेख नही किया । तथा च ब्रह्मचर्य के सम्यक सेवन के साथ किये जाने वाले विद्याग्रहण को ही ब्रह्म शब्द से कहा जाता है । सत्यस्वरूप ब्रह्म के साथ वायु और आदित्य आते हैं, सत्य से ही मनुष्यों की प्रतिष्ठा है । मन से ही ऋषि, प्राण और विज्ञानादि है, यह सब कथन दयानन्द के अज्ञान का ही विलासमात्र है, क्योकि श्रुति के अक्षरो तथा प्रकरण से उस कथन का कोई सम्बन्ध नही है । बारहवें साधन को बताते है —न्यास इति । जिसे न्यास कहते हैं वह मोक्ष का हेतु है । वह हिरण्यगर्भपद की प्राप्ति का अन्तरङ्ग साधन होने से स्मृतिकर्ता महर्षियों ने उसे हिरण्यगर्भ ब्रह्मा कहा है । ' संन्यास से ब्रह्म का स्थान प्राप्त होता है' इस प्रकार स्मृति का भी उल्लेख है । उसी की स्तुति करने के लिये उसके द्वारा प्राप्य हिरण्यगर्भ के स्वरूप को प्रदर्शित करते है - ' ब्रह्मा,,,, 'विश्व स्वयंभू प्रजापति संवत्सर इस प्रकार संन्यास की स्तुति के लिये हिरण्यगर्भ के अवयवभूत संवत्सर के माहात्म्य कोदिखाते है - 'संवत्सरोऽसावादित्य इति । आदित्यमण्डल के द्वारा और समस्त व्यवहार का हेतु होने से उस संवत्सर की प्रशंसा कर यथोक्त संन्यास की ही स्तुति करने के लिये संन्यास के द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष की प्रशंसा की जा रही है - स वा एष पुरुष इति । जो संन्यासपूर्वक तत्वज्ञान का संपादन करता है, वही पुरुष सर्वात्मक होता हुआ पञ्चात्मा पंचविध स्वरूप का हो जाता है । अर्थात् शब्दादिपञ्चक, पृथिव्यादिपञ्चक, चक्षुरादिपञ्चक, ज्ञानेन्द्रियादिपञ्चक, वागादिपञ्चक और प्राणादिपञ्चक, ये सब स्वरूप उसके हो जाते १५२
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वेदार्थपारिजात: १२१० वस्तूनां स्वरूपभूतो भवति । येन ब्रह्मरूपेण सर्वं जगत् सूत्रे मणिगणा इव प्रोतं तदेव सर्वम्, तत्त्वदृष्ट्या तद्व्यतिरे-केणाभावात् । पृथिव्यादिकं सर्वं जगत् सभूतं सभव्यं सर्वं तदेव । यद्यपि तत्त्वविदपि मूढपुरुषवदेव देहादिरूपो दृश्यते, तथा जिज्ञासाक्लृप्तो जिज्ञासया वेदान्तविचारेण सर्वात्मकतया निश्चितो भवति । ऋतजा ऋतेन सत्येन प्रामाणिकेन ज्ञानेन सर्वात्मा जातः । स च रयिष्ठाः रयिर्धनं गुरूपदेशः, तत्रैव तिष्ठतीति रयिष्ठाः, न तूपदेशरहितानां तथा प्रतीतिरित्यर्थः । ईदृशस्वरूपविज्ञानस्य श्रद्धया लभ्यत्वादसी श्रद्धारूप । सत्यमबाध्य यद् ब्रह्म तत्स्वरूपत्वादय सत्यः, महस्वान् स्वयंप्रकाश' । अत एव तमसा संसारकारणेन विमुक्तत्वादुपरिष्टाद् वर्तते । ज्ञानफलं दर्शयति- 'ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो न मृत्युमुपयाहि विद्वान्' इति । हे आरुणे, त्वं त पुरुष परमात्मानं हृदा हृत्पुण्डरीके नियमितत्वात् हृदयरूपे मनसैव पूर्वोक्तसर्वत्यागरूपसाधनप्रकारेण ज्ञात्वा विद्वान् तेनैव ज्ञानेन युक्तः सन् भूयः पुनर्मृत्युं नोपयाहि मा प्राप्नुहि । ज्ञानिनो वर्तमानदेहपाते सति जन्माभावात् पुनर्मृत्युर्नास्ति । 'तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः' ( तै ० आ० १०।६३ ) । यस्मात् परमपुरुषार्थस्यान्तरङ्गं साधनं तस्मादेषां सत्यादीनां तपसां मध्ये न्यासं सर्वत्यागरूपं संन्यासमतिरिक्तमुत्कृष्टसाधनं मनीषिण आहुः I इत्थं प्रकरणपर्यवसितमर्थमबुद्धवैव यत्किञ्चिदनर्गलमुक्तवान् दयानन्दो महाशयः । किमर्थमेतद्वाक्यजात स उद्धृतवान्, कथं च तद्वाक्यजातं तत्सिद्धान्तपोषकमिति सामाजिका विचारयन्तु । साधनोत्कर्षतारतम्य मजानन्नेव क्वचित् किमपि जल्पन् न संकुचतीत्येव दयानन्दस्य पाण्डित्यमाभाति । हैं । इन समस्त वस्तुओ का स्वरूप उसी का स्वरूप है । सूत्र में पिरोये हुए मणियों के समान यह समस्त जगत् जिस ब्रह्मरूप से ओत-प्रोत है, अतः तात्त्विक दृष्टि से देखने पर यह जगत् तन्मय अर्थात् तदरूप ही हैं, उसके अतिरिक्त कुछ है ही नही । भूत और भव्य सम्पूर्ण जगत् ब्रह्ममय है । तत्त्ववेत्ता पुरुष भो यद्यपि मूढपुरुष के समान ही देहादिधारण किया हुआ दिखलाई देता है, तथापि जिज्ञासापूर्वक वेदान्तविचार के द्वारा उसकी सर्वात्मकता स्पष्ट हो जाती है । ऋतजा - प्रामाणिक सत्यज्ञान होने के कारण वह सर्वात्मरूप हो गया है । वह रयिष्ठ भी है, क्योंकि 'रे' का अर्थ होता है- धन अर्थात् गुरूपदेश, उसी में वह स्थित रहता है, इस कारण उसे रयिष्ठ कहा जाता है । उपदेश रहित लोगों की रयिष्ठ के रूप में प्रतीति नहीं होती । इस प्रकार के स्वरूपविज्ञान की उपलब्धि, श्रद्धा से होती है, इसलिये वह श्रद्धारूप है । सत्य अर्थात् मबाध्य जो ब्रह्म है, तत्स्वरूप होने से इसे सत्य कहा गया है । यह महस्वान् अर्थात् स्वयंप्रकाश है, इसी कारण संसार के कारणभूत तम से रहित होने से वह सबसे ऊपर अर्थात् परे है । ज्ञान का फल दिखाते हैं- ज्ञात्वा तमेवेति । हे आरुणे! तुमने उस परम पुरुष परमात्मा को अपने हृदयकमल में नियमित कर लेने के कारण, अर्थात् पूर्वकथित संन्यास ( सर्वत्याग) रूपसाधन के द्वारा मन में उसे जान लिया है, अतः तुम विद्वान् हो, इसी ज्ञान से अब तुम पुनः मृत्यु को प्राप्त होगे । तात्पर्य यह है कि ज्ञानी के वर्तमान देह का पात होने पर पुनर्जन्म न होने से उसकी मृत्यु होने का प्रश्न ही नहीं उठता । तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाह । सर्वत्यागरूप यह संन्यास, परम पुरुषार्थं रूपमोक्ष का अन्तरङ्ग साधन होने से सत्यादिजितने तप हैं, उन सबकी अपेक्षा उसे विद्वानों ने उत्कृष्टतम साधन बताया है । यह प्रकरणपर्यवसित अर्थ है, किन्तु स्वामी दयानन्द प्रकरणपर्यवससित उक्त अर्थ को नही समझ पाये, इसलिये वे ऊटपटाग अनर्गल बकवास कर उठे । स्वामी दयानन्द ने अपने सिद्धान्त की पुष्टि के लिये क्या समझकर उन वाक्यो को उद्धृत किया और वे उसके सिद्धान्त के कैसे पोषक हो पा रहे हैं? उस पर भी पाठकगण थोड़ा सा विचार कर लें । साधनो की उत्कृष्टता के तरतमभाव को समझे बिना हो 3 चाहे जहाँ कुछ भी कह देने में संकोच न करना ही दयानन्द का पाण्डित्य है ।