वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 311–320

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 311–320

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वेदार्थपारिजाता १२११ यदपि -- ' सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो य पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः । ' ( मु ० उ ० ३| १ | ५), ' सत्यमेव जयते नानृत सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रामन्त्यूषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ' ( मुण्डकोप० ३| १ | ६ ) ( पृ० १२७ ) 'सत्येन सत्यधर्माचरणेनैवात्मा लभ्यो नान्यथेति' ( पृ ० १२७ ) । तत्तु सत्यम् । परमिदं वक्तव्यम्- किं धर्मोऽप्यसत्यो भवति? यत्तु वेदप्रमाणबोधित कर्मोपासनादि तदेव धर्मपदव्यपदेश्य भवति । तत्रासत्यत्वशङ्केव नास्ति । पुन सत्येत्यशेन कस्य व्यावृत्तिः? किञ्च, मुले मत्यशब्दो विद्यते । मत्यधर्माचरणमिति कुतो लब्धम्? इति । यदपि - 'सत्यमाचरितमेव जयते । तेनैव मनुष्य. सदा विजय प्राप्नोति । अनृतेनाधर्माचरणेन पराजय च । तथा सत्यधर्मेणैव देवयानो विदुषां यः सदानन्दप्रदो मोक्षमार्गोऽस्ति, सोऽपि सत्येनैव विस्तृतः प्रकाशितो भवति 1। येन च सत्यधर्मानुष्ठानप्रकाशितेन मार्गेणाप्तकामा ऋषयस्तत्राक्रामन्ति गच्छन्ति । यत्र सत्यस्य धर्मस्य परम निधानमधि- करणं ब्रह्म वर्तते, तत्प्राप्य नित्यानन्द मोक्ष प्राप्ता भवन्ति, नान्यथेति । अत एव सत्यधर्मानुष्ठानमधर्मत्यागश्च सर्वे. कर्तव्य:' ( पृ ० १२७ ) इति, तदपि न साधु, स्वयमेवापरिनिष्ठितत्वात् । तथाहि -' विचित्रोऽय भाष्यकार । एकमेव मन्त्र सस्कृतेऽन्यथा व्याख्याति हिन्दीभाषाया चान्यथैव । 'सो सब आत्माओ का भी आत्मा है । उसको आज्ञापालन सब मनुष्यो को करना चाहिये ' । अयमर्थो मूलात् संस्कृतभाष्याच्च बहिर्भूत एव । अत्र सत्यमित्यस्य सत्यधर्मोऽर्थः सत्यभाषण वा? नाद्यः, प्रामाणविरहात् । नान्त्यः, तथाऽव्याख्यानात् । ब्रह्म सत्यस्य धर्मस्य कथमधिकरणम्? नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावस्य परमात्मनो धर्माद्यतीतत्वात् । वस्तुतस्तु शाङ्करभाष्यसम्मतोऽय मन्त्रार्थः --पूर्व परमात्मतत्त्वज्ञान प्रतिपादितमिदानी सम्यग्ज्ञानसह- कारोणि सत्यादिसाधनानि विधीयन्ते निवृत्तिप्रधानानि विदुषा विविदिषूणा च सर्वकर्मसन्यासविधानात् । अत एव ---- यह जो ' सत्येन लभ्यस्तपसा०' - ( मु० उ० ३ | १| ५ ), ' सत्यमेव जयते नानृतं - ( मुण्डकोप ० ३ | १ | ६ ) सत्यधर्म का आचरण करने से ही आत्मा की उपलब्धि हो सकती है, अन्य कोई उपाय नहीं है, आपने कहा, वहाँ तक तो ठीक है । किन्तु आप यह तो बताइये कि क्या धर्म असत्य भी होता है? वेद प्रमाण से बोधित जो कर्म, उपासना आदि है, उसी को धर्म शब्द से कहते है, ऐसी स्थिति में असत्यता की शङ्का भी नही हो सकती, तब ' सत्यधर्म ' के सत्य अंश से किसकी व्यावृत्ति आप कर रहे है? दूसरी बात यह है कि मूल में ( मूल ग्रन्थ में ) सत्य शब्द है । ' सत्यधर्म का आचरण' यह अर्थ किस शब्द से निकला? यह जो सत्य आचरण की ही जय होती है, उसी से मनुष्य सर्वदा विजय प्राप्त करता है, और असत्य धर्म के आचरण से पराजय पाता है । उसी प्रकार देवयान जो विद्वानों का सदा आनन्दप्रद मोक्षमार्ग है, वह भी सत्यधर्म से ही प्रकाशित होता है । सत्यधर्म के अनुष्ठान से प्रकाशित हुए जिस मार्ग से आप्तकाम ऋषि लोग वहाँ जाते है । यहाँ सत्यधर्म का परम निधान अर्थात् अधिकरण ब्रह्म है, उसे प्राप्त कर नित्यानन्दरूप मोक्ष को प्राप्त करने का अन्य कोई उपाय नही है । इसलिये सत्यधर्म का अनुष्ठान और अधर्म का त्याग सभी को करना चाहिये । आपने कहा, वह भी ठीक नही है, क्योंकि आप स्वयं ही अपने कथन पर स्थिर नहीं है । जैसे दयानन्द ने संस्कृत में मंत्र की व्याख्या कुछ की है । लेकिन उसी मंत्र की हिन्दी में व्याख्या कुछ और ही की है । 'सो सब आत्माओं का भी आत्मा है । उसकी आज्ञा का पालन सब मनुष्यो को करना चाहिये ' यह हिन्दी अर्थ उन्ही के मूल संस्कृतभाष्य से बिलकुल नहीं मिल रहा है । इन अनमेल भाष्यों को देखने से कहना पड़ रहा है कि यह स्वामी जी विचित्र भाष्यकार है । आप यह बताइये कि यहाँ पर ' सत्य' का अर्थ, सत्यधर्म है, या सत्यभाषण? प्रमाण के न होने से प्रथम अर्थ तो हो नहीं सकता । और दूसरा अर्थ इसलिये नही कि वैसा आपने व्याख्यान नही किया है । सत्यधर्म का अधिकरण ब्रह्म को कैसे बनाया जा सकता है? क्योंकि परमात्मा तो समस्त धर्मों से परे है । वह नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव है । मन्त्र का शाङ्कर भाष्यसम्मत वास्तविक !अर्थ इस प्रकार है-

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वेदार्थपारिजातः १२१२ नात्र सत्यधर्माचरणं विधीयते, किन्तु सत्येनानृतत्यागेन मृषावदनत्यागेन लभ्यः प्राप्तव्य आत्मा, तपसेन्द्रियमन एकाग्रता- रूपेण आत्मा प्राप्तव्यो ज्ञातव्यः, तत्त्वज्ञाने तादृशस्यैव तपस उपकारकत्वात् । 'मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तप:', 'समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्' इत्यादि स्मृतिश्रुतिभ्यः । तदेवात्मदर्शनाभिमुखी भावानुकूलम्, नेतरत् कृच्छ्रादि, एषामात्मा लभ्य इति सर्वत्रानुषङ्गः । सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मात्मसाक्षात्कारेण नित्यं सर्वदा ब्रह्मचर्येण स्त्रीव्यतिकराद्यभावेन । नित्यमिति सर्वत्रानुषज्यते । नित्यं सम्यग्ज्ञानेन नित्यं ब्रह्मचर्येण, 'न येषु जिह्यमनृतं न माया' ( पृ० १।१६ ) इति वक्ष्यमाणत्वाच्च । कोऽसावात्मा य एतैः साधनेर्लस्य इत्याह- अन्तःशरीरे शरीरस्य मध्ये हृत्पुण्डरीकाकाशे ज्योतिर्मयो हि रुक्मवर्णः शुभ्रः शुद्धो यमात्मानं पश्यन्ति यतयो यत्नशीला न्यासिनः क्षीणदोषाः क्षीणक्रोधादिचित्तमला: स आत्मा नित्यं सत्यादिसाधनेर्व्यासिभिर्लभ्यते, न कादाचित्कैः सत्यादिभिरिति साधनस्तुत्यर्थोऽर्थवादः । सत्यमेवेति । अत्र सत्यवानेव जयति नानृतवादीत्यर्थः । न च सत्यपदस्य सत्यवति लक्षणाया कि बीजमिति वाच्यम्, तात्पर्यानुपपत्तेरेव बीजत्वात् । नहि सत्यानृतयोः केवलयोः पुरुषानाश्रितयोजयः पराजयो वा सम्भवति । सत्यवादिनानृतवादी पराभूयत इति तु प्रसिद्धमेव । अतः सिद्ध सत्यस्य बलवत्साधनत्वम् । शास्त्रतोऽपि सत्यस्य साधना- तिशयत्वं ज्ञायते । सत्येन यथाभूतवादव्यवस्थया पन्था देवयानाख्यो विततः सातत्येन प्रवृत्तः । नात्र प्रकाशित इत्यर्थः, घात्वर्थाननुगमात् । येन पथा आक्रमन्ति क्रमन्ते ऋषयो दर्शनवन्तः कुहकमायाशाठ्याहङ्कारदम्भानृतर्वाजता ह्याप्तकामा विगततृष्णाः, यत्र यस्मिन् तत्परमार्थतत्त्वं सत्यस्योत्तमसाधनस्य सम्बन्धि साध्यं परमं प्रकृष्टं निधानं पुरुषार्थरूपेण परमात्मतत्त्व का ज्ञान पहिले बताया, अब ययार्थ ज्ञान के सहायक निवृत्तिप्रधान सत्यादि साधनो को बताया जा रहा है । क्योकि विद्वान् और विविदिषुओ के सर्वकार्य संन्यास का विधान किया गया है । इस कारण ' सत्यधर्म के आचरण का विधान किया जा रहा है, यह नही कह सकते । किन्तु सत्य से अर्थात् अनृत ( झूठ ) भाषण के त्याग से आत्मा की प्राप्ति करनी चाहिये, अर्थात् मन और इन्द्रियो की एकाग्रतारूप तप के द्वारा आत्मा का ज्ञान हो सकता है । तत्त्वज्ञान के प्राप्त करने में उक्त प्रकार का तप ही उपकारक (सहायक ) होता है । स्मृति ने भी कहा है-' मनसश्चेन्द्रियाणा च काप्रयं परम तपः । श्रुति ने भी कहा है ' समाहितो भूत्वाऽऽत्म- न्येवात्मानं पश्येत्' इति । अर्थात् समाहित ( एकाग्र) होकर अपनी आत्मा को अपने मे ही देखे । तप वही है, जो मानसिक भाव को आत्मदर्शन के अभिमुख बनावे, अर्थात् जो आत्मज्ञान प्राप्त कराने में मन को अनुकूल ( सहायक ) बनावे, उसके अतिरिक्त कृच्छु-चान्द्रायणादि वैसे तप नहीं हैं, जो आत्मज्ञान करा सकें । 'एषाम् आत्मा लभ्य:' ( उन एकाग्र मनवालों को ही आत्म-ज्ञान होता है) । इस वाक्य का सर्वत्र सम्बन्ध करना चाहिये । सम्यक् ज्ञान अर्थात् ब्रह्मात्मसाक्षात्कार के द्वारा नित्य अर्थात् सर्वदा स्त्रीसम्बन्धराहित्यरूप ब्रह्मचर्य के द्वारा, 'नित्यम्' का सर्वत्र सम्बन्ध है । अर्थात् नित्य ( सर्वदा) सम्यग् ज्ञान से नित्य ( सर्वदा ) ब्रह्मचर्य से । ' न येषु जिह्यम् अनृतं न माया' (प्र ० १११६ ) ऐसा आगे कहा गया है । जो इन साधनों से लम्य है, वह आत्मा कौन है? इसके उत्तर में कहते हैं- शरीर के मध्य हृत्पुण्डरीक -आकाश में ज्योतिर्मय, श्वेत, शुद्ध जिस आत्मा को प्रयत्नशील और चित्त के क्रोधादि मल जिनके क्षीण हो गये है, ऐसे संन्यासी देखते है, वह आत्मा है । 'उसकी प्राप्ति (ज्ञान ) नित्य अनुष्ठीयमान सत्यादि साधनो से संन्यासियों को होती हैं । कभी कभी अनुष्ठीयमान सत्यादि साधनों से नही -- यह वाक्य साधन की स्तुति के लिये अर्थवाद है । सत्यमेवेति - सत्यभाषी ( सत्यवान्) की ही विजय होती है, असत्यभाषी की नही, यह अर्थ है । यहाँ पर ' सत्य' पद की ' सत्यवान्' में लक्षणा तात्पर्यानुपपत्ति के कारण की गई है । सत्य और अनृत की यदि किसी पुरुष मे वे विद्यमान नही है, तो उनकी जय और पराजय का कोई अर्थ नही होता । सत्यवादी व्यक्ति असत्यभाषी को पराजित कर देता है, यह बात तो लोक में प्रसिद्ध है । अतः मोक्ष के प्रति सत्य बलवान् साधन है, यह बात सिद्ध हो जाती है । शास्त्र भी इस बात का प्रतिपादन करते है कि सत्य मोक्ष का प्रबल साधन है । सत्य से अर्थात् जो जिस तरह से हुई है, उसको उसी रूप में उपस्थित करने से देवयान मार्ग सदा खुला रहता है । यहाँ पर वितत शब्द का अर्थ प्रकाशित हैं, यहीं नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस अर्थ में यह धातु कहीं प्रयुक्त हुआ नही देखा गया । जिस मार्ग से कि क्रान्त दृष्टि वाले और कल्पित माया, धूर्तता, अहङ्कार, पाखण्ड, असत्य आचरण, तृष्णा

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वेदार्थपारिजातः १२१३ निधीयत इति निधानं वर्तते । स पन्थाः सत्येन विततः, येन यथा ऋषयो ब्रह्मात्मदर्शनाय क्रमन्ते स पन्थाः सत्येन विततः सातत्येन प्रवृत्त ' । यच्च - ‘ चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' ( मो० सू० १ | १ | २), ' यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः' ( वैशेषिक- सूत्रे १ | १ | २ ) । अनयोरर्थः - 'वेदद्वारा या सत्यधर्माचरणस्य प्रेरणास्ति तयैव सत्यधर्मो लभ्यते । योऽनर्थाद् अधर्मा चरणाद् बहिरस्ति, अतो धर्माख्या लब्ध्वार्थो भवति । यस्येश्वरेण निषेधः क्रियते, सोऽनर्थरूपत्वाद् अधर्मोऽयमिति ज्ञात्वा सर्वैर्मनुष्यैस्त्याज्य:' (पृ० १२८ ) इति, तदपि विशृङ्खलम्, वेदद्वारा कीदृशी प्रेरणा? किंप्रमाणिका च सा? कथं च तया धर्मो लक्ष्यते? लक्षणा तु शब्दधर्मः । प्रेरणा तत्र द्वाराभूता ततो भिन्नैव स्यात् । नहि द्वारद्वारिणोरभेदः । योऽनर्थादधमद् बहिर्भूत्वा पूर्वं धर्माख्यां लभते, पश्चादर्थो भवति । धर्माख्यालाभेऽर्थभवनस्य कि प्रयोजनम्? यस्ये- श्वरेण निषेध क्रियते, सोऽनर्थरूपत्वादधर्मोऽयमिति चेत्, यस्य न निषेधः किन्तु विधानं स्यात्, तस्यानर्थत्वाभावात् सुतरामर्थत्वमित्यर्थपदस्य ( सूत्रे ) किं प्रयोजनम्? ईश्वरेण कथं निषेधः क्रियते, वेदेनेव स्वातन्त्र्येण वा? नान्त्यो मानाभावात् । नाद्य, विकल्पासहत्वात् । वेदेन निषेधोऽपि प्रेरणापेक्षस्तदनपेक्षो वा? प्रथमे प्रेरणया लक्षितत्वात् कथं न तस्यापि धर्मत्वमर्थत्व च स्यात्? नान्त्यः, धर्मस्यापि प्रेरणामन्तरापि कथ नाघमंस्यैव बोधः स्यात्? यदपि - 'यस्याचरणादभ्युदयः सांसारिकमिष्टसुखं पारमार्थिकं मोक्षसुखं च सम्यक् प्राप्तं स्यात्, स धर्मो विज्ञेय:, अतो विपरीतो ह्यधर्मश्च' ( पृ ० १२८ ) इति, तदपि न मनोज्ञम् इष्टसुखस्यानिर्वचनात् ॥ सुखं नाम नानिष्टं भवति कस्यचित् । न च विषसम्पृक्तमधुरान्नवत् पापसम्पृक्तसुखस्यानिष्टत्वमस्त्येवेति वाच्यम्, तत्र विषसम्पर्कस्यैवा- निष्टत्वात् । में आदि से रहित ऋषिगण उस परम तत्व तक पहुँचते है, जहाँ पर कि इस साधन स्वरूप सत्य का उत्कृष्ट साध्य खजाने के रूपउस विद्यमान रहता है । यह पूरा मार्ग सत्य की सहायता से ही सदा खुला रहता है । इसी मार्ग से ऋषिगण सत्य के सहारे सदा परम तत्व तक पहुँचते रहे हैं । इसके आगे ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म ' इस पूर्वमीमासा के सूत्र को और ' यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्म:' इस वैशेषिक वही उनकी व्याख्या ', सूत्र उद्धृतकरदर्शन के को इस तरह से की है- ईश्वर ने वेदों में मनुष्यों के लिये जिसके करते की आज्ञा दी है धर्म और जिसके करने की प्रेरणा नहीं की है, वह अधर्म कहलाता है |। परन्तु वह धर्म अर्थयुक्त, अर्थात् अधर्म का आचरण जो अनर्थ है, उससे अलग होता है । इससे धर्मं का हो जो आचरण करता है, वही मनुष्यों में मनुष्यपन है' ( १० १२८ ) | यह कथन भी हैअस्तव्यस्त? और है, क्योंकि इस व्याख्या में इन प्रश्नों का कोई उत्तर नही बनता कि वेदों के द्वारा कैसी प्रेरणा मिलती है? इसमे क्या प्रमाण उससे धर्म का बोध कैसे होता है? लक्षणा तो शब्द का धर्म है और प्रेरणा धर्म की द्वारभूत है । इसलिये ये दोनों परस्पर भिन्न ही माने जायेंगे । द्वार और द्वारी मे अभेद नही बन सकता । जो अधर्म का आचरण जो अनर्थ है, उससे अलग होकर पहले धर्म कहलाता और बाद में अर्थ होता है, इस व्याख्या में धर्म कहलाने के बाद अर्थ होता है, इसका क्या प्रयोजन है । जिसका ईश्वर हैनिषेध, उसकेकरतेअनर्थहैं, वहन,,,? अनर्थ रूप होने से अधर्म कहलाता है ऐसी यदि उसकी व्याख्या करें तो इससे जिसका निषेध नहीं है अर्थात् विधान्होने से अपनेआप अर्थता की सिद्धि हो जायगी । इस परिस्थिति में सूत्र में अर्थ पद का क्या प्रयोजन है? ईश्वर निषेध कैसे करता है वह स्वतन्त्र रूप से निषेध करता है या वेदों के माध्यम से । ईश्वर स्वतन्त्र रूप से ऐसा करता है, इसमें कोई प्रमाण नही है । अन्तिमपक्ष में पक्ष में भी यह विकल्प नहीं बन पाता कि ईश्वर वेद के द्वारा निषेध किसी की प्रेरणा से करता है या स्वतन्त्र रूप से? प्रथम प्रेरणा लक्षित है, अतः उसमें भी धर्मत्व और अर्थत्व की सिद्धि क्यो न मानी जाय । यदि वह स्वतन्त्र रूप से ऐसा करता है, तो उस परिस्थिति में धर्म की भी प्रेरणा के बिना ही अधर्म की तरह अवगति क्यों न मान ली जाय? वे आगे कहते है- 'जिसके आचरण करने से संसार में उत्तम सुख और निःश्रेयस अर्थात् मोक्षसुख की प्राप्ति होती है, उसी का नाम धर्म है । इसके विपरीत अधर्म कहलाता है' ( पृ ० १२८) । यह कथन भी गलत है, क्योंकि इष्ट सुख क्या है, इसका 1

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१२१४ वेदार्थपारिजाता तत्र मीमांसासूत्रस्य तु शाबरभाष्यसम्मतोऽयमर्थ. --चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनमाहुः, आचार्य- चोदितः करोमीति दर्शनात् । प्रवर्तकमिति प्रवृत्त्यनुकूलव्यापाररूपप्रवर्तनाबोधकलिङादिप्रत्ययघटितवचनं 'यजेत स्वर्गकाम:' इत्यादिरूपम् । तदुक्तं भट्टपादे:-' किमाद्यपेक्षित. पूर्णः समर्थः प्रत्ययो विधौ । तेन प्रवर्तकं वाक्यं शास्त्रेऽ- स्मिश्चोदनोच्यते ॥ ' इति । अर्थात् कि केन कथमिति साध्यसाधनेतिकर्तव्यतांशः पूर्णः सम्बद्धार्थको लिङादि. पुरुष- प्रवर्तने समर्थो भवति । तत्पूरकं च वाक्यं प्रवर्तकं वाक्ये चोदनेत्युच्यते ॥ चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यमत्रं सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टं चाथं शक्नोत्यवगमयितुम्, नान्यत् किञ्चनेन्द्रियम् । ' अत्यन्तासत्यपि ज्ञानमर्थे शब्दः करोति हि' (श्लो० वा० १।२।६ ) | नन्वयथाभूतमप्यर्थं ब्रूयाच्चोदनेति चेश, कारणदोषविषयबाघज्ञानाभावेन चोदनाजनितस्य ज्ञानस्यातथाभूतत्वासम्भवात् । तथाहि -प्रामाण्यमप्रामाण्यं च स्वत एव निर्णीयत इति सांख्याः । उभयमपि कारण- गुणदोषादिनेति तार्किकाः । अप्रामाण्यस्य स्वतस्त्वं प्रामाण्यस्य च परतस्त्वमिति बौद्धाः । प्रामाण्यं स्वतोऽप्रमामाण्यं तु परत इति मीमांसकाः । तदुक्तम्-'स्वतः सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमिति गम्यताम् । नहि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तु - मन्येन शक्यते ॥ ' ( श्लो० वा० १ | १ | २ | ४७ ) । उत्पन्नस्य ज्ञानस्य संशयात्मकत्वे उत्तरकाले बाधकप्रत्ययान्तरोत्पत्तौ कारणे दोषवत्ताज्ञाने च सत्यप्रामाण्यं भवति । प्रकृते वेदकर्तृस्मरणाभावादिनाऽपौरुषेयत्वे कारणदोषज्ञानमशक्यशङ्कम् । नापि ' अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम:' इति वाक्यात् संशयात्मकं ज्ञानं जन्यते । नाप्येतद्वाक्यजभ्यज्ञानस्याग्निहोत्रहोमात् स्वर्गो न भवतोति बाघकज्ञानं कदापि कस्यापि जायते । अतीन्द्रियसाध्यसाधनभावबाधे प्रत्यक्षानुमानादीनामप्रवृत्तः । निर्वाचन कर पाना कठिन है । सुख किसी को अनिष्ट नही होता । विष मिले भोजन की तरह पाप से मिला सुख भी अनिष्ट क्यों नही होगा? इसका उत्तर यही है कि भोजन मे जैसे विष का संपर्क अनिष्ट है, उसी तरह से सुख मे पाप का संपर्क भी अनिष्ट माना जायगा । ऊपर उद्धृत दोनों सूत्रों में से प्रथम मीमांसासूत्र का शावर भाष्य के अनुसार यह अर्थ है- 'क्रिया के प्रवर्तक वचन को चोदना नाम से कहा जाता है, 'आचार्य के कहने से करता हूँ इस तरह का प्रयोग देखा जाता है । 'यजेत स्वर्गकाम ' (स्वर्ग की कामनावाला यज्ञ करें) इस तरह के लिङ्आदि प्रत्ययो से घटिन, प्रवृत्ति के अनुकूल व्यापाररूप प्रवर्तना के बोधक वचन को प्रवर्तक कहा जाता है । जैसा कि भट्ट कुमारिल ने कहा है- 'कि केन (क्या, किससे ) इत्यादि अपेक्षित जिज्ञासाओं को पूर्ण करने और विधि मे प्रवृत्ति कराने में समर्थ वाक्य को इस शास्त्र में ' चोदना' के नाम से कहते है' । इसका अभिप्राय यह है कि कि केन कथम् (क्या किससे, कैसे ) ये तीन प्रश्न साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता के अर्थ की पूर्ति करते है । इनकी यथावत् पूर्ति करनेवाला जो प्रकरण से संबद्ध लिङ्गादि प्रत्यय पुरुष को प्रवृत्त कराने में समर्थ होता है और इसका प्रक वाक्य हो प्रवर्तक वाक्य अथवा ' चोदना' कहलाता है । चोदना ही भूत, भविष्यत् और वर्तमान, सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थ को भी बता पाने में समर्थ होती है, अन्य किसी इन्द्रिय मे यह सामर्थ्य नहीं है । यही बात श्लोकवात्तिक में भी कही गई है— ' अत्यन्त असत् पदार्थ का भी ज्ञान शब्द के द्वारा कराया जा सकताहै । यहां पर प्रश्न उठता है कि इस तरह से तो चोदना अयथार्थ पदार्थ का भी ज्ञान करावेगी? इसका उत्तर यह है कि कारण-दोष और विषय के बाघ का ज्ञान न होने से चोदना वाक्य से उत्पन्न हुआ ज्ञान अयथार्थ नही हो सकता । इस संबन्ध में सांख्यदर्शन का कथन है कि प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनो का निर्णय स्वत: होता है । तार्किको का कहना है कि कारणगत गुण और दोषों के आधार निर्णय होता है । बौद्धो का कहना है कि अप्रामाण्य का निर्णय स्वतः तथा प्रामाण्य का निर्णय परतः होता है । मीमांसकों पर इसका का कहना है कि प्रामाण्य का निर्णय स्वतः और अप्रामाण्य की प्रतीति परतः होती है । जैसा कि भट्ट कुमारिल ने कहा है-' सभी प्रमाणोका प्रामाण्य 4. स्वतः ही माना जाना चाहिये, क्योकि किसी वस्तु में अविद्यमान शक्ति को कोई उत्पन्न नही कर सकता' यदि संशयात्मक है और उत्तर काल में दूसरा बाधक प्रत्यय उत्पन्न हो जाता है और कारण में दोषवत्ता का ज्ञान हो जाता। उत्पन्न ज्ञाम है, तो उसको अप्रमाण मान लिया जाता है । प्रकृत में वेद के कर्ता की तो कोई स्मृति नही है, अतः उसको अपौरुषेय मानना पडेगा । अपौरुषेय ' इस ' अग्निहोत्र करे कारण में दोष के ज्ञान आदि की कोई आशंका ही नही उठ सकती और यहा पर स्वर्ग की कामनावाला व्यक्ति वेद मेंतरह के वाक्यों से संशयात्मक ज्ञान ही उत्पन्न होता है । इस वाक्य से उत्पन्न ज्ञान का अग्निहोत्र करने प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाण, से नहीं के किसी दूसरे वाक्य से कभी किसी का बाघ भी नहीं होता । अतीन्द्रिय कार्यकारणभाव का बाघ से स्वर्ग नही होता इस तरह

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वेदार्थपारिजातः १२१५ नापि किञ्चिदपोरुष वाक्यं तत्र प्रमाणं तदनुपलब्धेः । नापि ज्ञानमेव नोत्पद्यते, वाक्यादुत्पन्नस्य ज्ञानस्यापलापासंभवात् । तस्मात् स्वतः सिद्ध चोदनाजन्य ज्ञानं निरपवादं तिष्ठति । तस्मान्न वेदादन्या चोदना । 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम:' इत्यादिवैदिक विधिवाक्यमेव चोदनाशब्दार्थ ' । प्रकृते विधिवाक्यस्यैव चोदनापदार्थत्वात् । चोदनया चोभयमिह लक्ष्यतेऽर्थोऽनश्च । यो निःश्रेयसाय ज्योतिष्टोमादि स एवार्थः, यः प्रत्यवायाय श्येनादि. स एवानर्थः । तत्रानर्थो धर्मो मा भूदित्यर्थग्रहणं सार्थकम् । नात्र श्येनादिनिषेधवाक्यगम्य, तस्यापि विधिरूपचोदनाबोध्यत्वात् । न च तर्हि श्येनादि कथमनर्थः कर्तव्यतयोपदिश्यत इति वाच्यम्, श्येनादीनां कर्तव्यत्वेनानुपदिष्टत्वेऽपि यो हिंसितुमिच्छेत्तस्याभ्युपायतयोपदेशात् । अत एव ' श्येनेन अभिचरन् यजेत' इत्युपदेशः । तथा च श्येनादिफलीभूतहिंसायाश्चोदनालक्षणत्वसम्भवेन धर्मत्वप्रसक्तौ तद्वारणार्थमर्थशब्दः । नम्वेकं हीद वाक्यं चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मो नेन्द्रियादिलक्षण, अर्थश्च धर्मो नानर्थं इति कथमर्थद्वयं बोधयिष्यति, वाक्यभेदापत्तेरिति चेदुच्यते यत्र वाक्यादर्थद्वयं गम्यते तत्रैव वाक्यभेदप्रसङ्गः । तदपि वैदिकेषु सूत्रेष्वन्यतोऽवगतेऽर्थे सूत्रमेवमर्थ इदमित्यवगम्यते, भिन्नयोरेव वाक्ययोः सूत्रेणैकदेशस्यैव सूत्रणात् । अर्थो धर्म इत्येकं सूत्रम्, चोदनालक्षण इत्यपरम् । अस्य साकाङ्क्षत्वादनन्तरसूत्रगतो घर्मशब्दोऽनुषङ्गेण तदेकदेशतया कल्प्यते चोदनालक्षणो धर्मः । न चैवं धर्म इति सूत्रेणाचोदनालक्षणस्यापि धर्मत्व स्यात्, चोदनालक्षण इत्यनर्थस्यापि धर्मत्वं स्यादिति वाच्यम्, ' अर्थो धर्मः ' इति सूत्रादन्तर्णीतार्थस्यैव धर्मशब्दस्यानुषङ्गात् । तेनार्थत्वविशिष्ट एव चोदनालक्षणो धर्मः, अर्थोऽपि चोदनालक्षणत्व-विशिष्ट एव धर्मो न त्वविशिष्टः । होता । इसके विरोध में कोई दूसरा अपौरुषेय वाक्य भी प्रमाण रूप में उपलब्ध नही है । कोई ज्ञान उत्पन्न ही नही होता, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि वाक्य से उत्पन्न ज्ञान का अपलाप नही किया जा सकता । इसलिये स्वतः सिद्ध चोदनाजन्य ज्ञान का कोई अपवाद उपलब्ध नही है । वेद से भिन्न अन्य कोई चोदना वाक्य उपलब्ध नही है, इसलिये ' अग्निहोत्रं ०' प्रभृति वैदिक विधिवाक्य ही चोदना शब्द का अर्थ माना जा सकता है । प्रकृत व्याख्यस्थल में भी विधिवाक्य ही चोदना शब्द का अर्थ है । यहा पर चोदना अर्थात् विधिवाक्य से अर्थ और अनयं दोनों का बोध होता है । ज्योतिष्टोम प्रभृति कर्म निःश्रेयस के लिये है, अतः वह अर्थ है । इसके विपरीत प्रत्यवाय हेतु श्येनादि कर्म अनर्थ है । यह अनर्थ भी धर्म न कहलाने लगे, इसके लिये 'अर्थ' पद के ग्रहण की सार्थकता है । यहा पर श्येनादि याग का बोध निषेधक वाक्यों से नही होता, अपितु इन आभिचारिक प्रयोगों का बोध भी विधिरूप चोदना वाक्यो से ही होता है । प्रश्न है कि जब श्येनादि कर्म अनर्थ रूप है, तो उनका बोध विधिवाक्यों से कर्तव्य के रूप में कैसे होता है? इसका उत्तर यह है कि श्येनादि का उपदेश कर्तव्य के रूप न होकर जो शत्रु का नाश चाहता है, उसके लिये उपाय के रूप में इनका विधान है । इसलिये 'जो व्यक्ति अभिचार कर्म करना चाहता उसको श्येन याग का अनुष्ठान करना चाहिये' यह उपदेश वाक्य है । इस प्रकार से श्येनादि याग की फलस्वरूप हिंसा चोदना वाक्य से विहित है, इसमें धर्म के लक्षण की प्रयुक्ति न हो, इस उद्देश्य से सूत्र में 'अर्थ' शब्द का समावेश किया गया है । यहा पर पुनः शंका उठती है कि यहा पर वाक्य तो एक ही हैं, उसके ये दो अर्थ कैसे हो सकते है कि चोदनालक्षण अर्थ धर्म है, इन्द्रियादिलक्षण नहीं और अर्थ हो धर्म है $, अनर्थ नहीं । इस तरह से तो यहा पर वाक्यभेद रूप दोष की आपत्ति होगी । इसका उत्तर यह है कि जहा पर वाक्य से दो अर्थों की प्रतीति हो, वही पर वाक्यभेदरूप दोष की प्रसक्ति हो सकती है । वैदिक सूत्रों में अन्य प्रमाण से अर्थ के अवगत होने से यह सूत्र इस तरह से है, उसका अर्थ इस तरह से है, इसकी अवगति होती है । दो भिन्न वाक्यों को भी सूत्र एक ही मैं मिलाकर कह देना है । ' अर्थ धर्म है ' यह एक सूत्र है । यह चोदना लक्षण है, यह दूसरा सूत्र है । इसकी साकांक्षता के आधार पर अनन्तर सूत्रगत धर्म शब्द की अनुषंगत उसके एक देश के रूप में अनुवृत्ति हो जाती है और यह अर्थ होता है कि धर्मं चोदनालक्षण होता है । पुनः शंका उठती है कि इस तरह से तो इस सूत्र से अचोदना लक्षण वाक्य भी धर्म कहलावेगा और जो चोदना लक्षण है, उसमें अनर्थ के उत्पादक श्येनादि वाक्य भी धर्म कहलायेंगे । इसका उत्तर यह है कि ' अर्थों धर्म' इस सूत्र में अन्तर्निहित अर्थ शब्द के

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वेदार्थपारिजातः १२१६ यद्वा अर्थस्य सतश्चोदनालक्षणस्य धर्मत्वमुच्यत इत्येकार्थत्वमेव । अर्थाद् अस्मिन् सूत्रे यो धर्मः स चोदना-लक्षण इत्येव वचनव्यक्तिः, न तु यश्चोदनालक्षणः स धर्मः, तथात्वेऽनर्थस्यापि चोदनालक्षणत्वापत्तेः । तस्य व्यावृत्त्यर्थ - मर्थग्रहणमावश्यकमित्यर्थद्वय प्रयुक्तोऽर्थभेदः स्यात् । तत्र धर्मेऽर्थत्वस्य नित्यसिद्धत्वात् तद्धर्ममात्रमुद्दिश्य चोदनालक्षणत्वं विधीयते । न त्वर्थस्याप्युद्देश्य विशेषणत्वम्, किन्त्वर्थशब्दस्य नित्यानुवादत्वमेव । सृष्टिविद्याविषयः यत्तु सृष्टिविद्यासम्बन्धेन नासदीय सूक्तव्याख्यान कृतम्- 'यदा कार्यं जगन्नोत्पन्नमासीत् तदाऽसत् सृष्टेः प्राक् शुभ्यात्मकमाकाशमपि नासीत् । कुतः? तद्व्यवहारस्य वर्तमानाभावात् । नो सदासीत्तदानी तस्मिन् काले सत् प्रकृत्यात्मकमव्यक्तं सत्संज्ञकं यज्जगत्कारणं तदपि नो आसीन्नावर्तत । नासीद्रजः परमाणवोऽपि नासन् । नो व्योमा वरो यत् । व्योमाकाशमवरं यस्मिन् विराडाख्यं सोऽपि नासीत्, किन्तु परब्रह्मणः सामर्थ्याख्यमतीव सूक्ष्म सर्वस्यास्य परमकारणसज्ञकसेव तदानीमवर्तत । किमावरोवः यत्प्रातः कुहकस्यावर्षाकाले घूमाकारेण वृष्ट किञ्चिज्जालं वर्तमान भवति, नैतज्जलेन पृथिव्यावरणं भवति नदीप्रवाहादिक च चलति । अत एवोक्त तज्जल गहनं गभीरं किं भवति । नेत्याह - किमावरोव आवरकमाच्छादक भवति नैव कदाचित् तस्थातीवाल्पत्वात्, तथैव सर्वं जगत् सामर्थ्यादुत्पद्यास्ति । तच्छमणि शुद्धे ब्रह्मणि किं गहन गभीरमधिक भवति । नेत्याह- अतस्तद्ब्रह्मणः कदाचिन्नैवावरकं भवति । कुत:? जगत. किश्चिन्मात्रत्वाद् ब्रह्मणोऽनन्तत्वाच्च' ( पृ० १२ ९ -१३० ) इति, तदपि न युक्तम्, मन्त्राक्षरार्थाननुगमात् । तथाहि- ' असत् आसीत्' इत्यत्र असदित्यस्य शून्याकाशं नासीदित्यर्थः कुतो लब्धः? शब्दगुणकस्याकाशस्यासत्त्वायोगात् । आधार पर उसी के साथ धर्म शब्द का अन्वय होगा । इससे अर्थत्व विशिष्ट चोदना वाक्य ही धर्म कहलावेगा और अर्थ भी चोदनालक्षण से युक्त धर्म ही होगा । अविशिष्ट नही, इस प्रकार उस दोनों आपत्तियो का परिहार हो जायगा । अथवा यहां पर चोदनालक्षण से युक्त अर्थ को ही धर्मता का प्रतिपादन अभिप्रेत है, इस तरह से एकार्थता होने से वाक्यभेद दोष की प्रसक्ति नहीं होगी । अर्थात् इस सूत्र में यह धर्म हैं, वह चोदना लक्षण ही है, इसी तरह का वाक्यार्थ अभिप्रेत है, जो चोदना लक्षण है वह धर्म है, इस तरह की नहीं, क्योकि यह दूसरा अर्थ करने पर श्येनादि अनर्थ कर्म की भी चोदनालक्षणता के आधार पर धर्मता माननी पड़ जायगी । इसकी व्यावृत्ति के लिये 'अर्थ' पद का ग्रहण आवश्यक हो जायगा और इस प्रकार दो अर्थों के प्रयोग होने से अर्थभेद स्वतः हो जायगा । इसलिये यहा पर धर्म में अर्थता की स्थिति सदा विद्यमान रहती है, उसके आधार पर धर्म मात्र को उद्दिष्ट कर उसमें चोदना लक्षणता का विधान यहा अभिप्रेत है । अर्थ भी यहा पर उद्देश्य का विशेषण नही है, किन्तु अर्थ शब्द 1 की नित्यानुवादकता ही उसमें है । सृष्टिविद्या सबन्धी विचार स्वामी दयानन्द ने सृष्टिविद्या के संबन्ध में अपने विचार प्रकट करते हुए नासदीय सूक्त की व्याख्या अपने ढंग से की है । जैसे कि 'नासदासीत्' इस मन्त्र की व्याख्या वे इस तरह से करते है --'जब यह कार्यसृष्टि उत्पन्न नही हुई थी, तब एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और दूसरा जगत् का कारण अर्थात् जगत् बनाने की सामग्री विराजमान थी । उस समय असत् शून्य नाम आकाश, अर्थात् जो नेत्रों से देखने में नही आता, वह भी नही था, क्योकि उस समय उसका व्यवहार नही था । ( नो सदासीत्तदानी ) उस काल में ' सत्' अर्थात् सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण मिला के जो प्रधान बनता है, वह भी नही था । ( नासीद्रजः ) उस समय परमाणु भी नही थे तथा ( नो व्यो० ) विराट् अर्थात् जो सब स्थूल जगत् के निवास का स्थान है, वह भी नही था । ( किमा ० ) जो यह वर्तमान् जगत् है, वह भी अनन्त शुद्ध ब्रह्म को नही ढाँक सकता और उससे अधिक या अथाह भी नही हो सकता । कोहरा का जल पृथिवी को नहीं ढक सकता, उस जल से नदी में प्रवाह भी नही चल सकता और न वह कभी गहरा या उथला हो सकता है । इससे यह जाना जाता है कि परमेश्वर अनन्त है और जो यह उसका बनाया जगत् है, वह ईश्वर की अपेक्षा से कुछ भी नहीं है' ( पृ० १३०-१३१ ) किन्तु यह व्याख्या सही नही है, क्योकि इसमें मन्त्राक्षरो का सही अर्थ नही किया गया है । जैसे कि 'नासदासीत्' इस वाक्य में असत् शब्द का

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वदार्थपारिजातः १२१७ , किश्व कारणस्वरूपनिरूपणपरेय श्रुतिः कथ सृष्टिनिरूपणपरेत्युच्यते । नहि व्यवहाराभावेऽपि वस्तुसतोऽसत्त्वं सम्भवति, सुषुप्तो व्यवहाराभावेन प्रपश्वस्यासत्त्वापातात् । यदा कार्य जगन्नोत्पन्नमासीत् तदेत्युक्तेऽपि सृष्टेः प्रागिति कथनमपि निष्फलमेव । तस्मिन् काले प्रकृत्यात्मकमव्यक्त सत्सज्ञकं यज्जगत्कारण तदपि नो आसीनावर्तत, परमाणवोऽपि नासन् इत्यादिभि ' प्रथममन्त्रव्याख्याने सर्गात् प्राग् जगन्मूलकारणभूता प्रकृतिरपि नासीत् परमाणवोऽपि नासन् विराडपि नाभूत् केवल शुद्ध ब्रह्मैवासीद् इत्युक्त्या निर्विशेषाद्वैतवाद एवाभिप्रेतः स्याद् दयानन्दस्य | सत्यार्थप्रकाशादिषु च तेन जीवेश्वरप्रकृत्यादीनां सत्यत्वमुक्तम्, तदेतत् परस्परविरुद्धमेव । यत्त केनचिदुक्तम् - नात्र एवपदमन्यकारणाना व्यावृत्त्यर्थं प्रवृत्तम्, अपि तु परमकारणस्य प्राधान्य प्रतिपादयितुम्, एतच्चातीव सूक्ष्म सर्वस्यास्य परमकारणसज्ञकमित्यादिपदाना मिहोपादानात् । इह सामर्थ्यशब्देन सर्वशक्तिमतः शक्तिरेवोच्यते ' इत्यादि, तदप्यपास्तम्, यतो नंद शब्देनैव, सदादिपदैरपि प्रकृत्यादीना निषेधात् । यदप्युक्तम् – ' १।४।१२' मीमांसादर्शने ' अपशवो वान्ये गोअश्वेभ्यः पशवो गोअश्वा:' ( तै ० सं०५।२।९।४ ) । इत्यत्र गोऽश्वादीनां प्रशंसार्थमेवान्येषां पशुत्वनिषेधो न निषेधे तात्पर्यम्, नहि निन्दा निन्द्य निन्दितुं प्रवर्तते, अपितु विधेय स्तोतुमिति मीमासकन्यायात्' इति, तदपि तुच्छम्, गोऽश्वेभ्योऽन्येषा पशुत्वबोधकप्रत्यक्ष विरोधात्तत्रार्थवादस्य गौणार्थकत्वेन प्रशंसापर्यवसायित्वेऽपि प्रकृते तादृग्विरोधाभावेन तदयोगात् । अन्यथा 'न कदाचिदनीदृशं जगत्' इति अर्थ शून्य आकाश किस आधार पर किया गया है? क्योकि शब्द गुण वाला आकाश असत् नही माना जाता । दूसरी बात यह भी है कि इस श्रुति में जगत् के कारण का निरूपण किया है, इसका सृष्टि के निरूपण मे विनियोग कैसे किया जा सकता है? व्यवहार न होने से किसीवस्तु का अभाव नही सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर तो सुषुप्ति अवस्था मे जब किसी प्रकार का व्यवहार नही चलता, प्रपंच का अभाव मानना पड जायगा । 'जब यह कार्य जगत् उत्पन्न नही हुआ था तब' इतना कह देने पर इसके साथ ' सृष्टि से पहले इस कथन की कोई आवश्यकता नही है, क्योकि यह तो स्वयं ही ज्ञात हो जाता है । उस समय जगत् का कारण प्रकृत्यात्मक अव्यक्त, जिसको कि सत् भी कहा जाता है, विद्यमान नही था, परमाणु भी विद्यमान नही थे और न उस समम विराट् की ही कोई सत्ता थी, इस प्रकार से इस प्रथम मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द केवल शुद्ध ब्रह्म की ही सत्ता मानते है । इस व्याख्या के अनुसार वे निर्विशेष अद्वैतवाद को स्वीकार करते हैं । इसके विपरीत सत्यार्थप्रकाश आदि मे वे जीव, ईश्वर और प्रकृति की भी सत्यता स्वीकार करते हैं । इसमें स्पष्ट ही परस्पर विरोध है । यहाँ टिप्पणीकार का कहना है कि ' यहाँ ' एव' पद अन्य का निषेधक न होकर परम कारण की प्रधानता का प्रतिपादक क्योकि व्याख्याकार ने यह परब्रह्म की सामर्थ्य अत्यन्त सूक्ष्म है और इस सारे जगत् की मूल कारण है, इन शब्दो में उसकी व्याख्या की है । यहाँ सामर्थ्य शब्द से उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की शक्ति का ही ग्रहण होता है ' ( पृ ० १३० ), किन्तु यह प्रतिपादन भी उचित नहीं है, ' नैव' शब्द से सदादि पदों से गृहीत होने वाले प्रकृति, परमाणु आदि का निषेध स्पष्ट हो जाता है, क्योकि यह उन्ही से सम्बद्ध है । टिप्पणीकार ने आगे की टिप्पणी में लिखा है—'मीमासा दर्शन में ( १ | ४| १३ ) 'अपशवो वा अन्ये गोअश्वेभ्यः पशवो गोमश्वा ' इस तरह के वाक्यों पर विचार करते समय बताया गया है कि अन्य पशुओं में पशुत्व का निषेध गाय और घोड़े की प्रशंसा के लिये है । इस वाक्य का तात्पर्य अन्य पशुओं में पशुत्व का निषेध करने के लिये नही है । इसी प्रकार प्रकृत सूक्त में सदसत् आदि के , न कि सत्प्रकृति आदि के सर्वथा निषेध में ।अभाव का निर्देश परब्रह्म कीI जगदुत्पादक शक्ति की प्रशंसा या प्रधानता दिखाने में है मोमासकों का न्याय है कि निन्दा परक अर्थवाद निन्दा के लिये न होकर विधि की स्तुति के लिये माने जाते है । उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये (पू० १३१ ), किन्तु यह कथन भी इसलिये तुच्छ है कि उक्त वाक्य में गाय और घोडे के सिवाय अन्य पशुओं में पशुत्व का निषेध प्रत्यक्ष प्रमाण के विरुद्ध पडता है । इसलिये ऐसे स्थलों में अर्थवाद को गोणार्थक मान कर उक्त पशुओं को प्रशंसा में उसका विनियोग किया जाता है, किन्तु प्रकृत में तो ऐसा विरोध है नहीं, तब उसको गोणार्थक कैसे माना जा सकता है? अन्यथा ' यह जगत् सदा इसी रूप में विद्यमान रहता है, इसके मित्र रूप में कभी नही रहता, इस मीमासक दृष्टि के अनुसार जगत् का अनीदृश रूप १५३

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१२१८ वेदार्थपारिजातः मीमातादृष्ट्या जगतोऽपि निषेधः कारणप्राधान्यप्रदर्शनार्थमेव स्यात् । न तु तत्त्वयाऽपीष्यते, सृष्टिप्रलयाङ्गीकारात् । एवमेव दयानन्दरीत्या प्रकृतिपरमाण्वादीनामपि प्रलयकालेऽसत्त्वप्रदिपादनाद् गोतमकणादकपिलपतञ्जल्यादीनां मतानि वेदविरुद्धान्येवापद्येरन् । एवमेव ' किमावरीव. कुह कस्य' इति मन्त्रपदे कुहकमित्येक पदमभिप्रत्य कुहकस्येति षष्ठ्यन्तरूपं मत्वा शीतकाले प्रभाते पतनीयस्य तुषारस्य कुहक इति सज्ञां मत्वा लोकप्रसिद्धस्य कुहराशब्दस्य साम्यमुपादाय तथार्थ प्रतिपादितवान् दयानन्दः । परन्तु तादृशः श्रुत्यर्थस्तु सर्वथा निराधार एव, कुहकशब्दस्य तादृशेऽर्थे कुत्रचिदपि प्रयोगादर्शनात् । ' यत्प्रातः कुहकस्य बर्षाकाले घूमाकारेण वृष्टं किश्विज्जलमित्यादिकमपि निर्मूलमेव । 'न मृत्युरासीत्' (ऋ ० स० १० । १२ ९ । २ ) इत्यस्य तु व्याख्यान न कृतम् । ' इयं विसृष्टि:' (ऋ ० सं ० १० / १२ ९ / ७ ) इत्यत्र चोक्तम्- 'यतः परमेश्वरादियं प्रत्यक्षा विसृष्टिविविधा सृष्टिराबभूवोत्पन्नासीदस्ति च ता स एव दधे धारयति रचयति वा यदि वा विनाशयति यदि वा न रचयति । योऽस्याध्यक्षः स्वामी परमे व्योमन् तस्मिन् परमे प्रकृष्टे व्योमवद् व्यापके परमेश्वरे एवेदानीमपि सर्वा सृष्टिर्वर्तते । प्रलयावसरे सर्वस्यादिकारणे परब्रह्मसामर्थ्य प्रलीना च भवति 1। सोऽध्यक्षः परमेश्वरोऽस्ति । हे अङ्ग मित्र जीव, त यो वेद स विद्वान् परमानन्दमाप्नोति । यदि त सर्वेषा मनुष्याणा परमिष्ट सच्चिदानन्दलक्षणं नित्यं कश्चिन्नैव वेद, वा निश्च- यार्थे, स परमं सुख नैवाप्नोति' इति, तदपि विशृङ्खलमेव, यतो हि- 'यतः परमेश्वरादियं प्रत्यक्षा सृष्टिराबभूवोत्पन्ना- सीदस्ति तां स एव दघे ' इत्यादि दयानन्दोक्त्या तन्मतेन ब्रह्मण उपादानकारणत्वमेवायाति, उत्पत्तिस्थितिलयाधारत्व- स्यैवोपादानत्वात् । नहि घटादयः कुलालसामर्थ्य विलीना भवन्ति । तदपि प्रकृत्युपादानत्ववादिनस्तस्य स्वमतविरुद्ध- में निषेध भी कारण की प्रधानता को बताने के लिये ही माना जायगा, किन्तु ऐसा तो आप भी नही मानते, क्योकि हमारी ही तरह आप भी सृष्टि और प्रलय की बात मानते है । इसी तरह दयानन्द के मत से जब प्रलयावस्था में प्रकृति, परमाणु आदि की सत्ता मानी जाती है, गोतम, कणाद, कपिल, पतजलि प्रभृति ऋषियों के मत वेदविरुद्ध माने जायेंगे, किन्तु ऐसा माना नही जाता, अत: दयानन्द की व्याख्या ही शास्त्रविरुद्ध मानी जायगी । इसी तरह से 'किमावरीवः कुह क्स्य' मन्त्र के इस अश में ' कुहक' को एक पद मानकर उसको षष्ठी विभक्ति के एक वचन में यहां प्रयुक्त कर दयानन्द ने उसका शीतकाल में प्रातःकाल छा जाने वाला तुषार (कुहरा) अर्थ किया है, किन्तु इस तरह का अर्थ सर्वथा निराधार है, क्योकि कुहक शब्द का कुहरा अर्थ कही भी देखने को नही मिलता । इसलिये जाडे के दिनो में धुएँ के जैसा चारों तरफ बरसता हुआ जल इस तरह का मन्त्र का अर्थ सर्वथा निराधार माना जायगा । 'न मृत्यु ' इत्यादि पाँच मन्त्रों को सुगमार्थ मानकर दयानन्द ने उसकी व्याख्या नहीं की है । 'इयं विसृष्टि:' इस सातवें मन्त्र की व्याख्या करते हुए वे कहते है-'जिस परमेश्वर के रचने से यह नाना प्रकार का जगत् उत्पन्न हुआ है, वही इस जगत् को धारण करता है, इसका नाश करता है और वही इसका मालिक भी है । है मित्रों, जो मनुष्य उस परमेश्वर को अपनी बुद्धि से जानता है, वही परमेश्वर को प्राप्त कर सकता है और जो उसको नही जानता, वही दुःख में पडता है । जो आकाश के समान व्यापक है, उसी ईश्वर में सब जगत् निवास करता है और जब प्रलय होता है, तब भी सब जगत् कारण रूप होकर ईश्वर के सामर्थ्य में रहता है और फिर भी उसी से उत्पन्न होता है । इस तरह से यह परमेश्वर मालिक है' ( पृ ० १३१ ) | किन्तु यह व्याख्या भी परस्पर असंबद्ध है, क्योंकि जिस परमेश्वर से इस परिदृश्यमान सृष्टि की उत्पत्तिहो सबका,, है उसको वही वारण करता है दयानन्द की इस उक्ति के अनुसार उनके मत में ब्रह्म को उपादान हुई,, -, क्योंकि जो उत्पत्ति स्थिति और लय का आधार है उसको उपादान माना जाता है । घट पट आदि कारण ही माना जा सकता है-,, में नही । दयानन्द तो प्रकृति, को उपादान शक्ति में विलीन नहीं हो पाते अपने अपने उपादानो में ही वे विलीन होते हैं निमित्त पदार्थ कुम्हार जुलाई आदि की

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वेवाथपारिजात: १२१६ मेव स्यात् । यदपि 'हे अङ्ग जीव' इति, तदपि निरर्थकम्, कथ जोवाऽङ्गपदायः? अङ्गशब्दस्य सम्बोधनार्थकत्वात् । यस्तं विद्वान् स परमानन्दमाप्नोति, सच्चिदानन्दलक्षणं नित्यं कश्चिन्नैव वेद, स परमसुखमपि नाप्नोतीति कुतोऽर्थोऽ- वधारित:? मन्त्रे तादृशपदस्याभावात् । सायणसम्मतो मन्त्रार्थस्त्वित्थम्- 'नासदासीन्नो सदासीत्तदानी नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् । किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद् गहनं गभीरम् ॥ ' (ऋ० मं० १०।१२ ९ ।१ ) अस्मिन्नेव सूक्ते तन्महिना जायमानैकमिति मन्त्रे सृष्टिवर्णनदर्शनान्नासीदिति मन्त्रे निरस्तसमस्तप्रपञ्चा सृष्टेः प्रागवस्था ( अर्थात् प्रलयावस्था) प्रतिपाद्यते ॥ तदानी प्रलयदशायामवस्थितं यदस्य जगतो मूलकारणम्, तत् असत् शशविषाणखपुष्पादितुल्यं निरुपाख्य नासीत् । तादृशस्य सद्भूतप्रपञ्चोत्पत्ति प्रति कारणत्वानुपपत्तेः । नो सत् तन्मूलकारणं सत् । आत्मवदत्यन्ताबाध्यं सदपि नासीत् । यद्यपि सदसतो परस्परविलक्षणे, तत एव भावाभावरूपयोस्तयोः सहावस्थानमपि न सम्भवति, तत एव तादात्म्यमपि तयोर्न सम्भवति, किन्तु सत्त्वासत्त्वाभ्यां निर्वक्तुमनर्हमनिर्वाच्यमेवासीत् तन्मूलकारणम् । ननु -'आनीदवातम्' (ऋ० सं० १०।१२ ९ ।२ ) इति तस्य सत्त्वमेवाग्रे विवक्ष्यत इति चेन्न, पारिशेष्या- मायाया एव सत्त्वासत्त्वनिषेधेनानिर्वाच्यत्वोपपत्तेः । न च तथापि तत्र तदानीमिति विशेषणं निरर्थकम्, तादृशानिर्वाच्य- त्वस्य मायायाः सृष्टिकालेऽपि पारमार्थिकसत्त्वाभावेनोपपत्तेरिति वाच्यम्, जिज्ञासुबुद्धावनायासेन तदारोहार्थ तदानी- मित्युक्तेः सार्थक्यात् । यद्यपि मृण्मयस्यामवजातस्य स्वकालेऽपि नृण्मात्रत्व तथापि स्वोत्पत्तेः प्राक् सर्वं मृत्तिकेवासीद् इति बुद्धावनायासेन यथायाति न तथा वर्तमानकाले, तथैव यद्यपि सृष्टिकालेऽपि मायाया अनिर्वाच्यत्वमेव तथाप्याञ्ज- मानते हैं, ब्रह्म को नही, अतः (ब्रह्म की उपादानता का सिद्धान्त) स्पष्ट हो उनके मत के विरुद्ध पडेगा । इसी तरह से अंग' पद का 'जीव' अर्थ कर 'हे मित्र लोगो, इस तरह स संबोधित करना भी निराधार है, क्योकि ' अंग' पद का अर्थ 'जीव' कैसे हो सकता है? वह तो केवल संबोधन के अर्थ में प्रयुक्त होता है । 'जो उसको जानता है, वह परमानन्द को प्राप्त करता है और जो इस सच्चिदानन्द लक्षण नित्य परमात्मा को नही जानता, वह परम सुख को भी नहीं पा सकता, मन्त्र का यह अर्थ भी कहाँ से निकलेगा? क्योकि मन्त्र में इस तरह के पद नही दिखाई पड़ते । सायण ने इस मन्त्र का अर्थ यह किया है - इस नासदीय सूक्त के ही 'तम्महिना' इत्यादि तृतीय मन्त्र मे सृष्टि का वर्णन देखने को मिलता है, अतः 'नासदासीत्' इस मन्त्र में सृष्टि से पहले की प्रलयावस्था का, जिसमें समस्त जागतिक प्रपंच विलीन रहता है, वर्णन किया गया है । उस प्रलयावस्था में स्थित इस जगत् का मूल कारण खरगोश की सीग या आकाश के पुष्प की तरह निरुपाख्य ( अलीक ) नही था, क्योकि इस तरह का मूल कारण सत्स्वभाव प्रपंच को उत्पत्ति नही कर सकता । इसी तरह से यह मूलकारण सत्स्वभाव का भी नही था, अर्थात् आत्मा के स्वरूप की तरह अत्यन्त अबाध्य स्वभाव वाला भी नही था । यद्यपि सत् और असत् ये दोनों परस्पर अत्यन्त विलक्षण है, इसलिये भाव और अभाव स्वभाव वाले इन दोनों की एक जगह स्थिति नही हो सकती । इसीलिये इन दोनो का परस्पर तादात्म्य नही माना जा सकता, किन्तु यहाँ इन शब्दों का अर्थ यही है कि वह मूलकारण प्रलयावस्था में सत् रूप से और असत् रूप से भी बताने लायक नही था । शंका उठती है कि 'आनीतदवात' इस अगले मन्त्र में इस मूलकारण को सत्स्वभाव माना गया है, किन्तु यह सही नही है, क्योंकि वस्तुतः यहाँ माया में ही सत्त्व और असत्त्व का निषेध किया गया है, अतः माया को ही अनिर्वाच्य माना जायगा । इस मन्त्र में अनिर्वाच्य भाया को कहा गया है और अगले मन्त्र मे सत्स्वभाव परब्रह्म की चर्चा है । इस पर पुनः शंका उठ सकती है कि यदि यहाँ माया का ग्रहण किया जाता है, तो उसके लिये ' तदानी' इस शब्द का प्रयोग करना व्यर्थ होगा, किन्तु माया तो उस प्रलयावस्था में ही नही, सृष्टिदशा में भी अनिर्वाच्य ही मानी जाती है, क्योंकि उसकी पारमार्थिक सत्ता किसी भी अवस्था में नही मानी जाती । किन्तु इसका समाधान यह है कि जिज्ञासु को इस विषय का सरलता से ज्ञान हो जाय, इसके लिये 'तदानी' इस पद की सार्थकता है । यद्यपि मिट्टी का बर्तन अपनी वर्तमान स्थिति में भी मिट्टी के सिवाय और कुछ नही है, तो भी अपनी उत्पत्ति के पूर्व 1

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 320 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः १२२० स्येन बुद्धयारोहाय तदानीमित्युक्तिः । न च व्यावहारिकसत्तावतां पृथिव्यादीना शक्त्यात्मना तदानीमपि सत्त्वात् कथं नो सदासीदिति सत्त्वनिषेध इति वाच्यम्, तत्र पारमार्थिकसत्त्वस्यैव निषेधविषयत्वात् । तदेवोच्यते – 'नासीद्रज: ' (ऋ० सं ० १०।१२ ९ ।१ ) । 'लोको रजासीत्युच्यते' (नि० ४।१ ९ ) इति रीत्या रजः शब्देन लोका उच्यन्ते । रजासीति स्थाने रज इति सामान्यापेक्षमेकवचनमपि सङ्गच्छते । तथा च व्योम्नः पृथङ्निर्देशाद् व्योम्नोऽधस्तनाः पातालादयः पृथिव्यन्ता नासन्निति रजः शब्देन त एव निषिद्धयन्ते । व्योमान्तरिक्ष नासीत् । पर इति सकारान्त पद परस्तादित्यर्थे 1 तथा च व्योम्नः परस्तादुपरि देशे द्युलोकप्रभृतिसत्यलोकान्त यदस्ति तदपि नासीत् । अनेन चतुर्दशभुवनगर्भ ब्रह्माण्ड स्वरूपेण निषिद्ध भवति । अथ तदावरकत्वेन पुराणेषु प्रसिद्धानि पृथिव्यादीनि महदन्तान्यावरणानि च आवरीवशब्देनोच्यन्ते । तान्यपि निषिद्धयन्ते । आवरीवः किमासीत्, नासीदित्यर्थः 1। अत्राक्षेपार्थकः किंशब्दः । तथा किमावरणीय तत्त्वमावरकं पृथिव्यादिमहदन्तमावरीव अत्यन्तमावृणुयात् । आवार्याभावात्तदावरकमपि नासीदित्यर्थः । वृणोतेर्यङ्लुगन्तात् छान्दसे लङि तिपि रूपमेतत् । यद्वा किंतत्त्वमावरक वृणुयात्? अब्रियमाणवत्तदपि स्वरूपेण नासीदित्यर्थ । आवृण्वत् तत्त्वं कुह कुत्र देशेऽवस्थायावृणोति । आधारभूतस्तादृशो देशोऽपि नासीदित्यर्थः । कस्य भोक्तुः शमन् शर्मणि सुखादि-लक्षणे भोगे निमित्तभूते सति तदावरकं तत्त्वमावृणुयात् । जीवानामुपभोगार्था सृष्टिर्भवति । तस्यां सत्यामेव ब्रह्माण्डस्य पृथिव्यादिभिरावरण भवति । प्रयलदशायां भोक्तारो जीवाः उपाधिप्रलयात् प्रलीना इति कश्चिद् भोक्ता न सम्भवती- (पिण्डावस्था में ) जैसे यह बात सरलता से समझ में आ जाती है कि सब कुछ मिट्टी है, वही स्थिति जब वह बरतन का आकार धारण कर लेता है, तब नही रह जाती । उसी प्रकार यद्यपि सृष्टि दशा में भी माया अनिर्वाच्य ही मानी जाती है, तो भी इस बात को सरलता से समझाने के लिये यहाँ बताया है कि उस प्रलयावस्था मे भी यह अनिर्वाच्य ही रहती है । यदि यह पूछा जाय कि व्यावहारिक सत्ता वाले पृथिवी प्रभृति पदार्थों की शक्ति रूप में स्थिति प्रलयावस्था मे भी मानी जाती है, तब उसकी सत्ता का निषेध कैसे किया जा सकता है, तो उसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि यहाँ उनकी पारमार्थिक सत्ता का ही निषेध किया गया है । 'नासीद्रजः ' इस कथन से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है । निरुक्त के वचन के अनुसार यहाँ रज शब्द लोक का वाची है । यद्यपि लोक अनेक है, अतः बहुवचन मे रजस् शब्द का प्रयोग होना चाहिये, तो भी लोकसामान्य का बोध कराने के लिये यहाँ एक वचन ही प्रयुक्त है । यहाँ आकाश का अलग से निर्देश किया गया है, इसलिये आकाश के नीचे स्थित पाताल से पृथिवी तक के लोको का यहाँ रजस् शब्द से निषेध माना जायगा । अर्थात् न तो उस समय आकाश ( अन्तरिक्ष ) की कोई सत्ता थी और न इसके नीचे स्थित पातालादि पृथिव्यन्त लोगों की सत्ता थी । 'परस्' यह सकारान्त पद परस्तात् के अर्थ में प्रयुक्त है । इसलिये इसका यह अर्थ होगा कि अन्तरिक्ष से ऊपर स्थित स्वर्ग से लेकर सत्यलोक पर्यन्त भुवनो की भी उस समय कोई स्थिति नही थी । इस तरह से प्रलयावस्था में चौदह भुवनों को अपने पेट में समेटे समूचे ब्रह्माण्ड का निषेध यहाँ विवक्षित है । आवरीव शब्द से पुराणों में आवरण के रूप में वर्णित पृथिवी से लेकर महत्तत्त्व पर्यन्त तत्त्वों का बोध होता है । प्रलयावस्था में इनका भी निषेध किया जाता है । क्या आवरीय की उस समय स्थिति थी? अर्थात् नही थी । यहाँ कि शब्द का अर्थ आक्षेप है कि यह पृथिव्यादि महत्तत्व पर्यन्त आवरक तत्व किसको आवृत करेगा? जब कोई आवरणीय पदार्थ नही है, तब आवरक की भी स्थिति कैसे हो सकती है? यङ्लुगन्त वृणोति धातु से छान्दस लङ्लकार में तिप् प्रत्यय होने पर यह रूप बनता है । अथवा इसका यह अर्थ भी किया जा सकता है कि वह आवरक तत्व कौन है, जो कि आवरण डाले । आवरणीय पदार्थ की तरह आवरक की भी वस्तुतः उस समय कोई स्थिति नही रहती । यदि कोई पदार्थ ऐसा है कि जो आवरण डालेगा तो वह कहाँ रहकर ऐसा करेगा? अर्थात् इस तरह का कोई आधारभूत स्थान भी उस समय नही बच रहता, जहाँ ठहर कर कि यह आवरक पदार्थ आवरणीय वस्तु पर अपना आवरण डाले । उस प्रलयावस्था में किस भोक्ता के सुखादि स्वरूप उपभोगों का सहारा लेकर यह आवरण डालेगा? जीवों के सुख-दुःखादि उपभोग के लिये सृष्टि होती है । सृष्टि होने पर ही ब्रह्माण्ड पृथिवी प्रभूति से भरता है । प्रलयावस्था में भोक्ता जीवों की उपाधि के